Monthly Archives: October 2019

छठ पूजा

सूर्योपासना का पर्व छठ पूजा

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर, दिवाकर नमस्तुभ्यं, प्रभाकर नमोस्तुते |

सप्ताश्वरथमारूढ़ं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्, श्वेतपद्यधरं देव तं सूर्यप्रणाम्यहम् ||

कोरोना के आतंक के बीच दीपावली के पाँचों पर्व हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हो चुके हैं और आज कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से छठ पूजा का आरम्भ हो रहा है… आज से सारा वातावरण हमहूँ अरघिया देबई हे छठी मैया, केलवा के पात पर, जल्दी उगी आज आदित गोसाईं, आदित लिहो मोर अरगिया, दरस दिखाव ए दीनानाथ, उगी है सुरुजदेव, हे छठी मैया तोहर महिमा अपार, कांच ही बाँस के बहंगिया बहंगी चालकत जाए जैसे अनेकों मधुर लोकगीतों से गुंजायमान हो उठेगा… अस्तु, सर्वप्रथम सभी को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ…

सन्तान तथा परिवार के सुख की कामना से किया जाने वाला सूर्यदेव की आराधना का पर्व छठ पूजा चार दिवसीय पर्व होता है | प्रथम दिवस यानी चतुर्थी तिथि को नहाय खाय होता है | जैसा कि नाम से जी विदित होता है – इस दिन स्नानादि का विशेष महत्त्व होता है | इस दूँ व्रत करने वाला व्यक्ति स्नानादि से निवृत्त होकर सात्विक भोजन करता है तथा चार दिनों तक पृथिवी पर शयन करता है | इस दिन विशेष रूप से लौकी की सब्ज़ी बनाई जाती है क्योंकि लौकी को बहुत पवित्र माना जाता है तथा इसमें पर्याप्त मात्रा में जल होने के कारण इसके सेवन से आने वाले दिनों में व्रती को बल प्राप्त होता है |

दूसरे दिन पञ्चमी तिथि को खरना होता है जिसमें गुड़ तथा साठी के चावल से खीर बनाई जाती है | साथ ही मूली, केला तथा पूरियाँ आदि रखकर छठी मैया की पूजा की जाती है | व्रती भी सारा दिन उपवास रखकर रात्रि को यही भोजन ग्रहण करता है |

तीसरे दिन षष्ठी तिथि को छठ पूजा होती है | दिन भर व्रत रखकर सायंकाल नदीतट पर जाकर सूर्यदेव को अर्घ्य समर्पित किया जाता है | फिर अगले दिन यानी सप्तमी तिथि को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके उदित होते सूर्य को अर्घ्य प्रदान करके व्रत का पारायण किया जाता है | भगवान भास्कर को जल देते समय ॐ सूर्याय नमः” अथवा “ॐ घृणि: सूर्याय नम:” या “ॐ घृणि: सूर्य: आदित्य:” अथवा “ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय मनोवांछित फलं देहि देहि” इत्यादि मन्त्रों का जाप किया जाता है | या फिर गायत्री मन्त्र का जाप किया जाता है | इस प्रकार छठ पर्व केवल व्रत मात्र न होकर व्रती के लिए कठिन तपस्या भी है |

इस वर्ष चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व आज नहाय खाय से आरम्भ हुआ है तथा 21 नवम्बर को प्रातः सूर्योदय का अर्घ्य प्रदान करने के बाद इसका पारायण किया जाएगा | 17 नवम्बर को अर्द्धरात्र्योत्तर एक बजकर अठारह मिनट के लगभग चतुर्थी तिथि का आगमन हुआ था | आज 6:46 पर सूर्योदय के समय भोर के स्नान के साथ पर्व का आरम्भ हो चुका है | छठ पूजा के दिन यानी बीस नवम्बर को सूर्योदय का समय है 6:47 तथा सूर्यास्त सायं पाँच बजकर छब्बीस मिनट पर होगा | उन्नीस नवम्बर को रात्रि दस बजे के लगभग षष्ठी तिथि आरम्भ होगी | 21 नवम्बर शनिवार को सूर्योदय 6:48 पर है | इस दिन शनिवार को चन्द्रमा धनिष्ठा नक्षत्र में तथा सप्तमी तिथि होने के कारण द्विपुष्कर योग भी पड़ रहा है जो अत्यन्त शुभ योग माना जाता है |

जैसा कि सभी जानते हैं, छठ पर्व हिन्दू समुदाय के लिए मूलतः भगवान सूर्य  की आराधना का पर्व है | वास्तव में देखा जाए तो हिन्दू धर्म के देवताओं में केवल सूर्य और चन्द्रमा ही ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा तथा अनुभव किया जा सकता है | सम्भवतः इसीलिए विभिन्न पर्वों पर इन्हीं की उपासना का विधान है | साथ ही इन पर्वों के द्वारा इस वास्तविकता का भी भान होता है कि प्राचीन काल में प्रकृति के प्रति कितना अधिक सम्मान का भाव न केवल समाज के एक विशिष्ट वर्ग अपितु जन साधारण के मन में भी था | दक्षिण भारत में इस पर्व को स्कन्द षष्ठी के रूप में भी मनाया जाता है | इस दिन भगवान शिव और पार्वती के पुत्र स्कन्द यानी कार्तिकेय की पूजा अर्चना का विधान है |

सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत हैं उनकी दो पत्नियाँ – उषा (भोर की प्रथम किरण) तथा प्रत्यूषा (सूर्यास्त के समय की अन्तिम किरण) अथवा सन्ध्या | छठ पर्व के अवसर पर सूर्य के साथ उनकी इन दोनों शक्तियों की भी आराधना की जाती है | प्रातःकाल में उषा की प्रथम किरण के साथ आरम्भ होकर प्रत्यूषा काल में सूर्य की अन्तिम किरण तक पूजा अर्चना चलती रहती है | ऐसा सम्भवतः इसलिए किया जाता रहा हो कि सूर्य को ऊर्जा तथा जीवनी शक्ति का स्रोत माना जाता है | यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है – चैत्र शुक्ल षष्ठी को और कार्तिक शुक्ल षष्ठी को | जिनमें कार्तिक शुक्ल षष्ठी के छठ पर्व को विशेष धूम धाम के साथ मनाया जाता है | यह पर्व दीपावली के लगभग एक सप्ताह बाद पवित्र नदियों के तटों पर मनाया जाता है |

छठ पूजा के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं | माना जाता है कि भगवान राम और माता सीता जब चौदह वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या वापस लौटे थे तो उन्होंने दीपावली के छः दिन बाद कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखकर छठ पूजा की थी | सूर्यवंशी होने के कारण भगवान राम के लिए भगवान सूर्य की प्रार्थना आवश्यक ही थी |

एक अन्य मान्यता के अनुसार सूर्यदेव और कुन्ती के पुत्र कर्ण ने षष्ठी पूजा के रूप में अपने पिता और समस्त चराचर के लिए ऊर्जा प्रदान करने वाले सूर्यदेव की उपासना आरम्भ की थी | उसने घण्टों जल के मध्य खड़े होकर भगवान भास्कर को अर्घ्य प्रदान किया था जिसके फलस्वरूप वह महान योद्धा बना | आज भी कमर तक जल के मध्य खड़े होकर भगवान भास्कर को अर्घ्य प्रदान किया जाता है |

एक अन्य मान्यता के अनुसार पाण्डवों के वनवास की अवधि में द्रौपदी ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखकर सूर्यदेव की उपासना की थी जिसके परिणामस्वरूप समस्त कुरुवंश का संहार करने में पाण्डव समर्थ हुए थे |

कुछ लोग इसे भगवती के कात्यायनी रूप के साथ भी जोड़ते हैं | षष्ठी तिथि माता कात्यायनी की पूजा के लिए मानी जाती है, क्योंकि नवदुर्गा में माता कात्यायनी का स्थान छठी देवी के रूप में माना जाता है |

एक मान्यता यह भी है कि कार्तिक शुक्ल पञ्चमी के सूर्यास्त तथा षष्ठी के सूर्योदय के मध्य किसी समय महर्षि वशिष्ठ की प्रेरणा से भगवान सूर्य की आराधना करते समय राजर्षि विश्वामित्र के मुख से अनायास ही गायत्री मन्त्र फूट पड़ा था |

मान्यताएँ अनेक हैं – पौराणिक भी और लोकमान्यताएँ भी – किन्तु मूल तथ्य यह है छठ पूजा मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला भगवान भास्कर की आराधना का चार दिवसीय लोक पर्व है, जो कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को आरम्भ होकर कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सम्पन्न होता है |

ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् ।।

सृष्टिकर्ता प्रकाशमान भगवान आदित्यदेव हम सबके हृदयों से जड़ता का अन्धकार दूर कर चेतना, ज्ञान तथा सद्गुणों का प्रकाश प्रसारित करें, इसी कामना के साथ सभी को छठ पूजा की अग्रिम रूप से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ…

शुक्र का वृश्चिक में गोचर

दीपावली की गहमा गहमी समाप्त हुई, अब दो नवम्बर को छठ पूजा का आयोजन होगा, जिसका आरम्भ कल कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से हो जाएगा | सभी को छठ पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

इस बीच सोमवार 28 अक्तूबर को प्रातःकाल आठ बजकर बत्तीस मिनट के लगभग समस्त सांसारिक सुख, समृद्धि, विवाह, परिवार सुख, कला, शिल्प, सौन्दर्य, बौद्धिकता, राजनीति तथा समाज में मान प्रतिष्ठा में वृद्धि आदि का कारक शुक्र अपनी स्वयं की राशि तुला से निकलकर मंगल की वृश्चिक राशि में प्रविष्ट हो चुका है | शुक्र के वृश्चिक राशि में प्रवेश के समय कार्तिक कृष्ण अमावस्या तिथि, नाग करण और प्रीति योग था तथा बुध और गुरु के साथ शुक्र इस समय विशाखा नक्षत्र पर था | यहाँ से 31 से अनुराधा तथा दस नवम्बर से ज्येष्ठा नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए अन्त में 21 नवम्बर को दिन में बारह बजकर तेईस मिनट के लगभग धनु राशि और मूल नक्षत्र पर प्रस्थान कर जाएगा | शुक्र की अपनी राशि वृषभ से वृश्चिक राशि सप्तम भाव तथा तुला के लिए वृश्चिक राशि द्वितीय भाव बन जाती है | साथ ही वृश्चिक राशि के लिए शुक्र द्वादशेश और सप्तमेश बन जाता है | इन्हीं समस्त तथ्यों के आधार पर जानने का प्रयास करते हैं कि प्रत्येक राशि के लिए शुक्र के वृश्चिक राशि में गोचर के सम्भावित परिणाम क्या रह सकते हैं…

किन्तु ध्यान रहे, ये समस्त फल सामान्य हैं | व्यक्ति विशेष की कुण्डली का व्यापक अध्ययन करके ही किसी निश्चित परिणाम पर पहुँचा जा सकता है | अतः कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन कराने के लिए किसी Astrologer के पास ही जाना उचित रहेगा |

मेष : आपका द्वितीयेश और सप्तमेश होकर शुक्र का गोचर आपके अष्टम भाव में हो रहा है | इस अवधि में एक ओर जहाँ किसी प्रकार से भी गुप्त विरोधियों की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है | आप स्वयं भी इस दौरान ऐसा कोई कार्य न करें जिसके कारण आपकी मान प्रतिष्ठा को किसी प्रकार की हानि होने की सम्भावना हो | वहीं दूसरी ओर आपके कार्य की दृष्टि से तथा आर्थिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | किन्तु पैसे के लेन देन के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है | आपकी वाणी प्रभावशाली बनी रहेगी | Opposite Sex की ओर इस अवधि में आपका झुकाव बढ़ सकता है | आगे बढ़ने से पूर्व पार्टनर के सम्बन्ध में पूरी जानकारी अवश्य हासिल कर लें | साथ ही पार्टनरशिप में कार्य आरम्भ करना चाहते हैं तो उसके लिए भी यह गोचर अनुकूल नहीं प्रतीत होता | यदि आप महिला हैं तो आपको विशेष रूप से स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है |

वृषभ : आपका राश्यधिपति तथा षष्ठेश होकर शुक्र आपके सप्तम भाव में गोचर करने जा रहा है | आपके उत्साह और मनोबल में वृद्धि के साथ ही आपका व्यक्तित्व भी इस अवधि में प्रभावशाली रहने की सम्भावना है | साथ ही यदि आप कलाकार हैं या सौन्दर्य से सम्बन्धित किसी कार्य जैसे ब्यूटी पार्लर आदि का कार्य है तो आपके लिए यह गोचर विशेष रूप से भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आय के नवीन स्रोत आपके तथा आपके जीवन साथी के समक्ष उपस्थित हो सकते हैं | यदि किसी के साथ Romantic Relationship में हैं तो उसमें विघ्न उपस्थित हो सकता है | विवाहित हैं तो दाम्पत्य जीवन में भी किसी मित्र के कारण तनाव उत्पन्न होने के संकेत हैं | सुख सुविधाओं के साधनों में वृद्धि के योग हैं |

मिथुन : आपका पंचमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से छठे भाव में हो रहा है | एक ओर आपके लिए उत्साह में वृद्धि के योग प्रतीत होते हैं तो वहीं दूसरी ओर आपके लिए यह गोचर चुनौतियों से भरा हुआ भी हो सकता है | उन मित्रों को पहचानकर उनसे दूर होने की आवश्यकता है जो आपसे प्रेम दिखाते हैं लेकिन मन में ईर्ष्या का भाव रखते हैं | यदि आप कलाकार अथवा वक्ता हैं तो आपके कार्य की दृष्टि से अनुकूल समय प्रतीत होता है | किसी कोर्ट केस का निर्णय आपके पक्ष में आ सकता है | साथ ही विदेश यात्राओं के भी योग प्रतीत होते हैं | इन यात्राओं के दौरान अपने स्वास्थ्य के प्रति विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है |

कर्क : आपका चतुर्थेश और एकादशेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से पंचम भाव में हो रहा है | सन्तान के साथ यदि कुछ समय से किसी प्रकार की अनबन चल रही है तो उसके दूर होने की सम्भावना इस अवधि में की जा सकती है | मान सम्मान तथा आय में वृद्धि के संकेत हैं | नौकरी के लिए इन्टरव्यू दिया है तो उसमें भी सफलता की सम्भावना है | आप इस अवधि में नया घर अथवा वाहन भी खरीद सकते हैं अथवा खरीदने की योजना बना सकते हैं | अपने वर्तमान घर को भी Renovate करा सकते हैं | सन्तान प्राप्ति के भी योग प्रतीत होते हैं | सन्तान के लिए भी यह गोचर समय अनुकूल प्रतीत होता है | आपके व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन होने की सम्भावना है | आप अथवा आपकी सन्तान उच्च शिक्षा, नौकरी अथवा कला के प्रदर्शन के लिए विदेश यात्रा भी कर सकते हैं |

सिंह : आपका तृतीयेश और दशमेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से चतुर्थ  भाव में हो रहा है | उत्साह में वृद्धि का समय प्रतीत होता है | आप कोई नया वाहन अथवा घर खरीदने की योजना बना सकते हैं | कार्य में उन्नति तथा आय में वृद्धि के संकेत हैं | किसी महिला मित्र के माध्यम से कोई नया कार्य भी आपको प्राप्त हो सकता है और इस कार्य में आप बहुत समय तक व्यस्त रहते हुए धनलाभ भी कर सकते हैं | परिवार में आनन्द का वातावरण रहेगा | किसी कन्या का विवाह भी इस अवधि में सम्भव है | नौकरी में पदोन्नति की सम्भावना है | मान सम्मान और पुरूस्कार आदि का लाभ भी हो सकता है | सुख सुविधाओं के साधनों में वृद्धि के संकेत हैं |

कन्या : आपका द्वितीयेश और भाग्येश होकर शुक्र आपकी राशि से तीसरे भाव में हो रहा है | एक ओर जहाँ आपके छोटे भाई बहनों के लिए कार्य की दृष्टि से समय अनुकूल प्रतीत होता है वहीं दूसरी ओर आपके लिए भी कार्य में वृद्धि तथा आय में वृद्धि के संकेत प्रतीत होते हैं | आपको इस अवधि में कुछ ऐसे नवीन प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आपकी प्रशंसा होगी और भविष्य में उन प्रोजेक्ट्स का लाभ आपको प्राप्त होगा | आपकी प्रभावशाली वाणी का लाभ भी आपको प्राप्त हो सकता है | आपका कार्य कहीं विदेश से सम्बन्ध रखता है अथवा आप किसी प्रकार की Alternative Therapy से सम्बन्ध रखते हैं या दस्तकार हैं तो आपके लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है |

तुला : लग्नेश और अष्टमेश होकर शुक्र आपकी राशि से दूसरे भाव में गोचर कर रहा है | आर्थिक रूप से स्थिति में दृढ़ता आने के साथ ही आपके लिए कार्य से सम्बन्धित लम्बी विदेश यात्राओं के योग भी प्रतीत होते हैं | नवीन प्रोजेक्ट्स इस अवधि में प्राप्त होते रह सकते हैं जिनके कारण आप बहुत समय तक व्यस्त रहकर अर्थ लाभ भी कर सकते हैं | आपकी वाणी तथा व्यक्तित्व का प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा और जिसके कारण आपकी प्रशंसा भी होगी तथा आपको किसी प्रकार का पुरूस्कार आदि भी प्राप्त हो सकता है | धार्मिक तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि में वृद्धि हो सकती है | आप सपरिवार कहीं घूमने जाने की योजना भी बना सकते हैं | किन्तु साथ ही विरोधियों की ओर से सावधान रहने की भी आवश्यकता है |

वृश्चिक : आपके लिए आपका सप्तमेश और द्वादशेश होकर शुक्र आपकी लग्न में ही गोचर कर रहा है | आप इस अवधि में अपने शारीरिक सौन्दर्य को निखारने में अधिक व्यस्त रह सकते हैं | Romantically यदि कहीं Involve हैं तो उस सम्बन्ध में अन्तरंगता के संकेत प्रतीत होते हैं | विवाहित हैं तो दाम्पत्य जीवन में भी माधुर्य तथा अन्तरंगता बने रहने के संकेत हैं | Opposite Sex के प्रति आपका रुझान इस अवधि में बढ़ सकता है | विदेश यात्राओं में वृद्धि के संकेत भी प्रतीत होते हैं | इन यात्राओं में किसी के प्रति आप आकर्षित हो सकते हैं जो विवाह सम्बन्ध में भी परिणत हो सकता है | किन्तु स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है |

धनु : आपका षष्ठेश और एकादशेश होकर शुक्र का गोचर आपके बारहवें भाव में हो रहा है | आपके लिए यात्राओं में वृद्धि के संकेत प्रतीत होते हैं | इन यात्राओं से एक ओर आपके कार्य में प्रगति की तथा आर्थिक स्थिति में दृढ़ता आने की सम्भावना है तो वहीं दूसरी ओर इन यात्राओं में पैसा भी अधिक खर्च हो सकता है | साथ ही इन यात्राओं के दौरान अपने स्वास्थ्य तथा Important Documents का भी ध्यान रखने की भी आवश्यकता है | वाहन आदि चलाते समय भी किसी प्रकार की दुर्घटना आदि से सावधान रहने की आवश्यकता है | महिलाओं को अधिक रक्तस्राव की समस्या हो सकती है अतः अपनी Gynaecologist से नियमित चेकअप अवश्य कराती रहें |

मकर : आपका योगकारक आपकी राशि से आपकी राशि से लाभ स्थान में गोचर कर रहा है | उत्साह तथा कार्य में वृद्धि के साथ ही धनलाभ के भी संकेत हैं | यदि आपका कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसके अनुकूल दिशा में प्रगति की सम्भावना है | यदि आप किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो उसमें भी आपको सफलता प्राप्त हो सकती है | कार्य तथा आय में वृद्धि के साथ ही मान सम्मान में भी वृद्धि की सम्भावना है | रुके हुए कार्य पूर्ण होने की सम्भावना है | जो लोग अभी तक आपकी बात नहीं समझ पा रहे थे वे अब आपके सुझावों का अनुमोदन कर सकते हैं, जिसका लाभ आपको अपने कार्य में निश्चित रूप से प्राप्त हो सकता है | अविवाहित हैं तो जीवन साथी की तलाश भी इस अवधि में पूर्ण हो सकती है | प्रेम सम्बन्ध विवाह में परिणत हो सकता है अथवा कोई नया प्रेम सम्बन्ध भी स्थापित हो सकता है | स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है |

कुम्भ : आपका योगकारक शुक्र आपकी राशि से दशम भाव में गोचर कर रहा है | आपके कार्य में हर प्रकार से लाभ के संकेत हैं | नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ स्थानान्तरण के भी संकेत हैं | आपका अपना व्यवसाय है तो उसमें भी प्रगति की सम्भावना है | कलाकारों को किसी प्रकार का पुरूस्कार आदि भी प्राप्त हो सकता है | सहकर्मियों का सहयोग आपको प्राप्त रहेगा जिसके कारण आपके कार्य समय पर पूर्ण होते रहेंगे | परिवार में आनन्द का वातावरण बना रह सकता है | आप अपने लिए नया घर अथवा वाहन भी खरीद सकते हैं, अथवा खरीदने की योजना बना सकते हैं | जिस घर में अभी निवास करते हैं उसे Renovate भी करा सकते हैं | सामाजिक गतिविधियों में वृद्धि के साथ ही मान प्रतिष्ठा में वृद्धि के भी संकेत हैं |

मीन : आपके लिए तृतीयेश और अष्टमेश होकर शुक्र का गोचर आपके नवम भाव में हो रहा है | आपके लिए यह गोचर अत्यन्त भाग्यवर्धक प्रतीत होता है | एक ओर परिवार में सौहार्द का वातावरण बना रहेगा वहीं दूसरी ओर आपके कार्य में भी प्रगति की सम्भावना की जा सकती है | आप इस अवधि में नया घर अथवा वाहन भी खरीद सकते हैं | अथवा जिस घर में आप रहते हैं उसे ही Renovate और Decorate करा सकते हैं | परिवार में माँगलिक कार्यों की भी सम्भावना है | कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं के भी योग बन रहे हैं | इन यात्राओं में आपको सफलता प्राप्त हो सकती है | आपके छोटे भाई अथवा बहन का विवाह इस अवधि में हो सकता है | किन्तु छोटे भाई बहनों के साथ व्यर्थ की बहस से बचने का प्रयास आवश्यक है | साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि बढ़ सकती है |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें इसी कामना के साथ एक बार पुनः छठ पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/30/venus-transit-in-scorpio/

 

 

 

 

 

भाई भाई के मध्य भाई दूज

भाई दूज भाई भाई के मध्य भी हो तो कैसा रहे

कल यों ही दो मित्रों की बातें सुनकर मन में कुछ विचार उत्पन्न हुआ जो मित्रों के साथ साझा करने की सोची | एक मित्र दूसरे मित्र से बोल रहा था कि भाई कल दिल्ली वापस आ रहा हूँ और तब हम दोनों भाई मिलकर भाई दूज मनाएँगे | मन में विचार आया कि बात तो सही है, बहन भाई की मङ्गलकामना से भाई का तिलक कर सकती है तो दो भाई आपस में एक दूसरे की मङ्गलकामना से भाई दूज का तिलक क्यों नहीं कर सकते ? मित्रों के साथ इस विचार को साझा किया तो मज़ाक़ मज़ाक़ में शुरू हुई बात ने एक गम्भीर मन्त्रणा का रूप ले लिया जिसे देखकर अच्छा भी लगा और बात को आगे बढ़ाने का मन भी हुआ | अधिकाँश मित्रों ने पुराणों का तर्क देकर इस पर्व को भाई बहन के मध्य ही रहने देने की बात कही – क्योंकि पौराणिक आख्यान यही कहते हैं |

एक मित्र ने बड़ा तर्कसंगत उत्तर लिखा “पुरुष में अहंकार होता है जिससे भाई भाई लड़ते रहते हैं | पिता की संपत्ति हड़पने के लिये गला काटने को तैयार रहते हैं | ऐसे भाई दूसरे भाई की रक्षा क्या करेंगे ? वहीं बहन, यमुना की तरह कालिया से त्रासित होकर भी श्यामल रंग होने के बावजूद भाई के कुशलता की कामना करती है | सहोदर का स्नेह प्राचीन काल से भाई-बहन के बीच ही रहा है, भाई भाई तो महाभारत करवा देते हैं |”

धन्यवाद प्राणनाथ मिश्रा जी, भाई-भाई के मध्य भाई दूज की बात से हम इसी बिन्दु पर पहुँचना चाहते थे | यदि भाई भी भाई को और मित्र भी मित्र को भाई मानकर टीका करने लग जाएँ तो शायद ये “महाभारत” फिर से लिखने का कारण ही न बने | क्योंकि धार्मिक भाव से एक दूसरे के प्रति स्नेहशील रहेंगे दोनों | जैसे रक्षाबंधन को ही लीजिये, पौराणिक काल से यजमान और पुरोहित एक दूसरे को रक्षा सूत्र बाँधते हैं, शत्रु को मित्र बनाने के लिए रक्षा सूत्र बाँधा जाता है, आचार्य रवीन्द्रनाथ टैगोर ने तो बंग भंग के विरोध में लोगों को एकजुट करने के लिए राखी बाँधने का आन्दोलन चलाया था – यानी किसी तर्क और नीति संगत बात को जन आन्दोलन का रूप देने के लिए – ताकि जन साधारण उसका महत्त्व समझ सके – रक्षा बन्धन जैसा कार्य किया जा सकता है | बंगाल के हिन्दू-मुसलमानों को आपसी भाईचारे का संदेश देने के लिए टैगोर ने राखी का उपयोग किया था | रवीन्द्रनाथ टैगोर चाहते थे कि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे को राखी बाँधकर शपथ लें कि वे जीवन भर एक-दूसरे की सुरक्षा का एक ऐसा रिश्ता बनाए रखेंगे जिसे कोई तोड़ न सके |

पर्यावरण और प्रकृति की सुरक्षा के विषय में चिन्ता करने वाले लोग वृक्षों की रक्षा के लिए रक्षा बन्धन के दिन तथा अन्य अवसरों पर भी “वृक्षाबन्धन” करते हैं | वट सावित्री अमावस्या को वटवृक्ष की पूजा, इसके अतिरिक्त पीपल के वृक्ष की, आँवले के वृक्ष और तुलसी के वृक्ष इत्यादि की पूजा इस का तो प्रतीक हैं | किसी भी अच्छे प्रयास को यदि धर्म के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसका प्रभाव निश्चित रूप से मानव मात्र पर पड़ता है, क्योंकि स्वभावतः मनुष्य धर्मभीरु होता है | इसी प्रकार से यदि भाई दूज जैसे पवित्र और हर्षपूर्ण अवसर का भी ऐसा ही सदुपयोग किया जाए और इसे भाई-बहन के स्नेह के प्रतीक के साथ ही जन साधारण के मध्य तथा प्रकृति के प्रति स्नेह के प्रतीक के रूप में मनाया जाए तो हमारे विचार से इसका महत्त्व और भी बढ़ जाएगा |

गोवर्धन पूजा, भाई दूज, यम द्वितीया, चित्रगुप्त जयन्ती

कल सबने ख़ूब धूम धाम से दीपोत्सव तथा लक्ष्मी पूजन का आयोजन किया | आज यानी दीपावली के अगले दिन – पाँच पर्वों की इस श्रृंखला की चतुर्थ कड़ी है – गोवर्धन पूजा और अन्नकूट | इस त्यौहार का भारतीय लोक जीवन में काफी महत्व है | इसके पीछे एक कथा प्रसिद्ध है कि एक बार बृज में मूसलाधार वर्षा के कारण बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई तो उससे बचने के लिए कृष्ण समस्त बृजवासियों को गोवर्धन पर्वत के नीचे ले गए और सात दिन तक सब उसी पर्वत के नीचे रहकर मूसलाधार वर्षा से स्वयं को बचाते रहे | तब कृष्ण ने समस्त गोप ग्वालों को अपने प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता बताई कि हमारे नदी, पर्वत, वन, गउएँ, वनस्पतियाँ सब प्राणिमात्र के लिए कितने जीवनोपयोगी हैं | तो क्यों न हम इन्द्र जैसे देवताओं की पूजा करने की अपेक्षा अपने इन प्राकृतिक संसाधनों की पूजा अर्चना करें |

इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है | गोवर्धन पूजा में गौ धन यानी गायों की पूजा की गौ धनजाती है | शास्त्रों में गाय को गंगा नदी के समान ही पवित्र माना गया है | साथ ही लक्ष्मी का स्वरूप भी गाय को माना जाता है | जिस प्रकार देवी लक्ष्मी को समस्त प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली माना गया है उसी प्रकार गाय भी व्यक्ति के लिए अनेक प्रकार से सुख समृद्धिदायक होती है | गाय के दूध से जहाँ स्वास्थ्य लाभ होता है वहीं उसका गोबर खाद में काम आने के अतिरिक्त अनेक प्रकार के औषधीय गुणों से युक्त भी माना जाता है | साथ ही गाय में समस्त देवताओं का वास भी माना जाता है | इस प्रकार गौ सम्पूर्ण मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय है | गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोवर्धन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की |

कल यानी कार्तिक शुक्ल द्वितीया – भाई दूज – जिसे यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है – का पावन पर्व है | भाईदूजनेपाल में इसे भाई टीका कहते हैं | यम द्वितीया नाम के पीछे भी एक कथा है कि समस्त चराचर को सत्य नियमों में आबद्ध करने वाले धर्मराज यम बहुत समय पश्चात अपनी बहन यमी से मिलने के लिए इसी दिन गए थे | यमी अपने भाई से मिलकर बहुत प्रसन्न हुई और उनकी ख़ूब आवभगत की | बहन के स्नेह से प्रसन्न यमराज ने बहन से वर माँगने के लिए कहा तो यमी ने दो वरदान माँगे – एक तो यह कि यह दिन भाई बहन के प्रेम के लिए विख्यात हो और दूसरा यह कि इस दिन जो भाई बहन यमुना के जल में स्नान करें वे आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाएँ | कहते हैं तभी से ये प्रथा चली कि कार्तिक धुकल द्वितीया को सभी भाई अपनी बहनों के घर जाकर टीका कराते हैं और अपनी दीर्घायु तथा सुख समृद्धि के लिए उनका आशीर्वाद लेते हैं |

एक कथा एक वर्ग विशेष के साथ जुड़ी हुई है | माना जाता है कि आज के ही दिन धर्मराज यम के लेखाकार चित्रगुप्त का जन्मदिवस है | भगवान चित्रगुप्त परमपिता ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न माने जाते हैं | मृत्यु जीवन का चरम सत्य है इससे कोई अनभिज्ञ नहीं है | जो भी प्राणी धरती पर जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है क्योंकि प्रकृति के सन्तुलन के निमित्त यही विधि का विधान है | चाहे कोई भगवान हों, ऋषि मुनि हों – कोई भी हों – जीवन के इस सत्य को कोई झुठला नहीं पाया | सभी को निश्चित समय पर इस नश्वर शरीर का त्याग करना ही पड़ता है | और यह भी एक सत्य है कि मरणोपरान्त क्या होता है यह एक रहस्य ही बना हुआ है | गीता दर्शन के अनुसार तो इस शरीर का त्याग करते ही आत्मा तुरन्त नवीन शरीर धारण कर लेती है:

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि ग्रहणाति नरो पराणि |

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यानि संयाति नवानि देही ||

किन्तु ऐसी भी मान्यता है कि आत्मा किस शरीर में प्रविष्ट होगा अथवा किस लोक में जाएगा इसका निश्चय उस “दूसरे” लोक में जाने के बाद ही होता है | पौराणिक मान्यता के अनुसार इस मृत्युलोक के ऊपर एक दिव्य लोक है जहाँ न जीवन का हर्ष है और न मृत्यु का शोक – वह लोक जीवन मृत्यु तथा समस्त प्रकार के भावों से परे है | जीवात्मा को इस दिव्य लोक में जाना है अथवा अपने किन्हीं संचित कर्मों का फल भोगने के लिए या किसी नवीन ज्ञान के अर्जन के लिए पुनः पृथिवी पर वापस लौटना है इसका निर्णय धर्म और नियम संयम के देवता यमराज के द्वारा किया जाता है | चित्रगुप्त को इन्हीं यमराज का लेखाकार माना जाता है | गरुड़ पुराण में इस प्रकार के अनेक सन्दर्भ उपलब्ध होते हैं | इन्हें महाशक्तिमान क्षत्रिय के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है | ऋग्वेद के एक मन्त्र में चित्र नामक राजा का सन्दर्भ आया है जिन्हें चित्रगुप्त माना जाता है:

चित्र इद राजा राजका इदन्यके यके सरस्वतीमनु |
पर्जन्य इव ततनद धि वर्ष्ट्या सहस्रमयुता ददत ||

कहते हैं सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से जब भगवान विष्णु ने अपनी योग माया से सृष्टि की कल्पना की तो उनकी नाभि से एक कमल का प्रादुर्भाव हुआ जिस पर एक पुरूष आसीन था | क्योंकि इसकी उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की रचना और चित्रगुप्त नमस्तुभ्यम्सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से हुई थी अत: इन्हें “ब्रह्मा” नाम दिया गया | इन्हीं से सृष्ट की रचना के क्रम में देव-असुर, गन्धर्व, किन्नर, अप्सराएँ, स्त्री-पुरूष, पशु-पक्षी और समस्त प्रकृति का प्रादुर्भाव हुआ | बाद में इसी क्रम में यमराज का भी जन्म हुआ जिन्हें धर्मराज की संज्ञा प्राप्त हुई क्योंकि धर्मानुसार उन्हें जीवों को दण्ड देने का कार्य सौंपा गया था | अब धर्मराज को अपने लिए एक लेखाकार सहयोगी की आवश्यकता हुई | धर्मराज की इस माँग पर ब्रह्मा जी समाधिस्थ हो गये और एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद जब वे समाधि से बाहर आए तो उन्होंने अपने समक्ष एक तेजस्वी पुरुष को खड़े पाया जिसने उन्हें बताया कि उन्हीं के शरीर से उसका जन्म हुआ है | तब ब्रह्मा जी ने उसे नाम दिया “चित्रगुप्त” | क्योंकि इस पुरूष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था अत: ये कायस्थ कहलाये | कायस्थ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता अपने शरीर में स्थित | अपनी इन्द्रियों पर जिसका पूर्ण नियन्त्रण हो गया हो वह भी कायस्थ कहलाता है |

भगवान चित्रगुप्त एक कुशल लेखक हैं और इनकी लेखनी से जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय प्राप्त होता है । आज के दिन धर्मराज यम और चित्रगुप्त की पूजा अर्चना करके उनसे अपने दुष्कर्मों के लिए क्षमा याचना का भी विधान है |

जो भी मान्यताएँ हों, जो भी किम्वदन्तियाँ हों, यम द्वितीया यानी भाई दूज भाई बहन का एक स्नेह तथा उल्लासमय पर्व है | इस उल्लास तथा स्नेहमय पर्व की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

आस्था और विचारधारा – डॉ दिनेश शर्मा

आस्था और विश्वास किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत मसला है, उसे किसी अन्य पर क्यों थोपा जाए ? इसी पर प्रकाश डालता डॉ दिनेश शर्मा का लेख…
आस्था और विचारधारा
डॉ दिनेश शर्मा
हर आदमी की अपनी धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा है । कोई कट्टर मुसलमान है तो कोई कट्टर हिन्दू , सिख या क्रिश्चियन । कोई नास्तिक है तो कोई आस्तिक । कोई कांग्रेसी है, भाजपाई है, सपाई है, बसपाई है, वामपंथी है । सबको ऐसा होने का पूरा पूरा हक़ है । दिक्कत वहां आती है जहां हम अपनी विचारधारा या आस्था को दूसरों से श्रेष्ठ मानकर बहस खड़ी करते हैं । आप अपनी विचारधारा और आस्था को अगर बेहतरीन मानते है तो उसमे कोई परेशानी नही है । आप उस श्रेष्ठता के भाव को अपने अंदर रखिये और खुश रहिये । कई बार आप खास दोस्तों और रिश्तेदारों से अपनी आस्था या विचारधारा की बेहतरी सिद्ध करने के चक्कर में आपसी रिश्ते खराब कर लेते है । वो अच्छी बात नही है ।
बदकिस्मती से चाहे समाज हो या देश, उपनिवेश हो या संसार , ऐसी ही वजहों से अलगाववाद पनप रहा है। हज़ारों साल पहले ये दुनिया छोटे छोटे कबीलों में बंटी हुई थी । हर कबीले की अपनी परम्पराएं और मान्यताएं थी, छोटा मोटा देवता था, रीति रिवाज थे । आवाजाही के साधन विकसित नही थे तो लोगों के आपसी संपर्क भी सीमित ही थे । आज सब कुछ बदल गया है ।
बिखरे कबीले विज्ञान और टेक्नोलोजी के धागे से जब जुड़ने लगे तो एक दूसरे की भिन्न मान्यताओं , आस्थाओं और विचारधाराओं से रूबरू हुए । सबने एक दूसरे से जहां बहुत कुछ अलग अलग सीख कर अपने बुद्धिबल को विकसित किया वही भिन्न आस्थाओं की वजह से विरोध भी पनपे जिनकी वजह से हिंसक संघर्षों में लाखों निरपराध जाने गयी । इस हिंसा की बड़ी वजहों में दूसरों पर अपनी आस्था आरोपित करना भी था ।
आज फिर दुर्भाग्य से वैसी ही आस्थाओं और विचारधाराओं को आरोपित करने वाली स्थितियां बनने लगी हैं । इतिहास से सबक न लेने वाली सभ्यताएं इतिहास की दुखद दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति झेलने को अभिशप्त हो जाती हैं । इसीलिए मैंने शुरू में कहा कि आप अपनी विचारधारा और आस्था की श्रेष्ठता के भाव को अपने अंदर रखिये और खुश रहिये । अपने दोस्तों और जानने वालों से अपनी आस्था या विचारधारा की बेहतरी सिद्ध करने के चक्कर में आपसी रिश्ते मत खराब करिए ।