Monthly Archives: November 2019

ध्यान के लिए सुविधाजनक आसन – स्वामी वेदभारती जी

अपने लिए सुविधाजनक आसन का चयन :

टाँगों में लचीलेपन के अभाव में सम्भव है कुछ प्रारम्भिक साधकों को सिद्धासन आरम्भ में सुविधाजनक न लगे | आप टाँगों को आर पार मोड़कर ऐसा कोई भी आसन बना सकते हैं जिससे आपके शरीर को इधर उधर झूले बिना, हिले डुले बिना स्थिर होकर बैठने में सहायता मिले, अथवा जैसा कि पहले बताया गया – आरम्भ में आप मैत्री आसन में भी बैठ सकते हैं | यहाँ पुनः इस बात को दोहराना आवश्यक हो जाता है कि जिस भी आसन में आप बैठें – सबसे पहले आपका सिर गर्दन और धड़ एक सीध में होना चाहिए जिससे आपकी रीढ़ सीढ़ी रहे, उसके बाद ही टाँगों को किसी विशेष प्रकार से रखिये |

कुछ अभ्यासियों को अगले आसनों को सीखने की इतनी शीघ्रता होती है कि भली भाँति सीखे बिना ही उन्हें लगाना आरम्भ कर देते हैं | जिसका परिणाम यह होता है कि वे उचित रूप से नहीं बैठ पाते, क्योंकि वे कन्धों को ऊपर खींचकर कूबड़ सा बना लेते हैं जिससे रीढ़ में बल पड़ जाता है | ऐसा करने का दुष्परिणाम यह होगा कि आपके शरीर जो बैठने में असुविधा होगी और आपके श्वास की प्रक्रिया में बाधा पड़ेगी | साथ ही ध्यान की प्रगाढ़ता के लिए उपयोगी ऊर्जा के भीतरी स्रोत भी इससे अवरुद्ध हो जाएँगे |

कमर की माँसपेशियों के साथ समस्याएँ :

बचपन से ही ग़लत ढंग से चलने और बैठने के स्वभाव के कारण बहुत से लोगों का बैठने के ढंग – आसन यानी PosturesPosture ही बिगड़ चुका होता है | और इस कारण रीढ़ को सहारा देने वाली माँसपेशियाँ पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पातीं और आयु में वृद्धि के साथ साथ माँसपेशियों में बल पड़ना आरम्भ हो जाता है | जिससे उनके शरीर को ही नुकसान पहुँचता है | जब आप प्रथम बार ध्यान के लिए बैठना आरम्भ करते हैं तब सम्भव है आपको लगे कि आपकी कमर की माँसपेशियाँ दुर्बल हैं और कुछ मिनट बैठने के बाद ही आप आगे की ओर झुक जाते हैं |

यदि आप दिन भर बैठने, खड़े होने और चलने के समय अपने शरीर के अंगों की स्थिति पर ध्यान देना आरम्भ कर देंगे तो बहुत शीघ्र आप इस समस्या से मुक्ति पा सकते हैं | यदि आप अपने शरीर को ढीला ढाला या झुका हुआ पाते हैं तो अपनी मुद्रा सुधारें | ऐसा करने से आपकी कमर की माँसपेशियाँ भली भाँति कार्य करना आरम्भ कर देंगी | कुछ हठ योग के आसन जैसे भुजंगासन, नौकासन, धनुरासन और बालासन भी आपकी कमर की माँसपेशियों को बल देने में सहायक होंगे, जिससे वे माँसपेशियाँ आपकी रीढ़ के स्तम्भ को सहारा दे सकें |

कुछ अभ्यासार्थी जिनका बैठने का ढंग सही नहीं होता वे प्रायः पूछते हैं कि ध्यान के समय क्या दीवार का सहारा Sitting Posturesलिया जा सकता है ? आरम्भ में मुद्रा सीधी करने के लिए के लिए आप ऐसा कर सकते हैं, लेकिन किसी बाहरी सहारे पर अधिक समय तक निर्भर रहना उचित नहीं होगा | आरम्भ से ही पूर्ण एकाग्रता और नियमित अभ्यास के द्वारा आसन को ठीक करने का प्रयास करें | अपने किसी मित्र से कह सकते हैं कि वह देखकर बताए कि आपका आसन उचित है अथवा नहीं | अथवा शीशे में एक ओर से देखकर स्वयं ही अनुमान लगाने का प्रयास कीजिए | यदि आपकी रीढ़ पूर्ण रूप से सीध में होगी तो अपनी कमर पर हाथ फिराने पर रीढ़ की हड्डी में उभारों पर गाँठ का अनुभव नहीं होगा |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/30/meditation-and-its-practices-23/

ध्यान के लिए आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान में बैठने के लिए आसन (Posture) :

बहुत सारे आसन हैं जिनमें आपकी रीढ़ सीढ़ी रहती है और आप आराम से सुविधाजनक स्थिति में अपनी टाँगों को किसी प्रकार से तोड़े मरोड़े बिना बैठे रह सकते हैं | वास्तव में ध्यान में हाथों अथवा पैरों पर ध्यान देने की अपेक्षा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आपकी रीढ़ सीधी हो | इस क्रम में मैत्री आसन और सुखासन के विषय में कल लिखा जा चुका है | आज स्वस्तिक और सिद्ध आसन…

स्वस्तिक आसन : जो लोग स्वस्तिकासन में सुविधापूर्वक बैठ सकते हैं उनके लिए इस आसन के कई लाभ होते हैं |स्वस्तिकासन यदि आपकी टाँगों में अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन है तो सुखासन की अपेक्षा इस आसन में लम्बे समय तक ध्यान के लिए आपका बैठना अधिक सुविधाजनक रहेगा | क्योंकि इसमें आपका आधार और अधिक विस्तृत हो जाता है | ज़मीन पर आपके शरीर का भार समान रूप से होता है और आप पहले से भी अधिक स्थिर होकर शरीर को बिना इधर उधर हिलाए डुलाए बैठे रह सकते हैं |

इस आसन में सुखासन की भाँति घुटने सामने वाले पैर पर टिके नहीं होते अपितु सीधे ज़मीन पर टिके होते हैं | इस आसन का एक लाभ यह भी है कि टखनों की हड्डियों पर दबाव कम पड़ता है |

सिद्धासन : सिद्धासन के लिए अपने ध्यान के आसन पर आराम से बैठ जाइए और बाईं टाँग को घुटने से धीरे से सिद्धासनमोड़कर बाएँ पैर को दाहिनी जँघा के पास लाइए | बाएँ पैर का तलवा दाहिनी जँघा के भीतर के भाग के सामने सपाट रखा हो | अब दाहिने घुटने को मोड़िये और दाहिने पैर को बाएँ पैर की पिंडली पर इस तरह रखिये कि दाहिने पैर का तलवा बाईं जँघा के साथ लगा हो | दाहिने पैर के बाहरी भाग को अँगुलियों को आपस में चिपकाकर बाईं जँघा और बाएँ पैर की पिंडली के बीच में रखिये | अब बाएँ पैर की अँगुलियों को दाहिनी जँघा और पिंडली के बीच में रखने के लिए धीरे से उठाइये और कुछ इस तरह रखिये कि अँगूठा दिखाई पड़े | इस तरह एक सन्तुलित और दृढ़ आसन बन जाएगा जो ध्यान में बहुत सहायक होगा | सम्भव है सिद्धासन का यह वर्णन पढ़कर आपको लगे कि यह बहुत उलझा हुआ है, किन्तु इन दिशा निर्देशों के अनुसार अभ्यास करेंगे तो यह आसन लगाना आपके लिए कठिन नहीं होगा |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/29/meditation-and-its-practices-22/

ध्यान के आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान में बैठने के लिए आसन (Posture) :

बहुत सारे आसन हैं जिनमें आपकी रीढ़ सीढ़ी रहती है और आप आराम से सुविधाजनक स्थिति में अपनी टाँगों को किसी प्रकार से तोड़े मरोड़े बिना बैठे रह सकते हैं | वास्तव में ध्यान में हाथों अथवा पैरों पर ध्यान देने की अपेक्षा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आपकी रीढ़ सीधी हो | और इस आसन में बैठने के लिए सबसे सरल आसन है

मैत्री आसन :मैत्री आसन

इस आसन में आप किसी कुर्सी अथवा बेंच पर बैठ सकते हैं | आपके पैर फर्श पर सीधे रखे हों अथवा बेंच के ऊपर सुखासन में हों | इस आसन का प्रयोग कोई भी कर सकता है | यहाँ तक कि जिनके शरीर में लचीलापन नहीं होता अथवा जिन्हें भूमि पर बैठने में कठिनाई होती है वे लोग भी इस आसन में आराम से बैठ सकते हैं | इस आसन में बैठने से ध्यान के समय आपको किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नहीं होगा |

सुखासन : यदि आपके शरीर में लचीलापन है तो आप एक वैकल्पिक आसन – सुखासन – में बैठना चाहेंगे | इसमें आप दोनों टाँगों को एक दूसरे के आर पार मोड़कर बैठते हैं | अर्थात एक पैर दूसरे पैर के घुटने के नीचे ज़मीन पर टिका होता है और दूसरे पैर का घुटना उस पैर पर आराम से रखा होता है | एक मोटे तह किये हुए कम्बल पर बैठिये जिससे आपके घुटनों और टखनों पर अधिक दबाव न पड़ने पाए | आपके ध्यान का आसन अर्थात जिस आसन या स्थान पर आप बैठे हैं वह स्थिर हो, किन्तु न तो अधिक कठोर हो और न ही हिलने डुलने वाला हो | यह आसन अधिक ऊँचा भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे आपके शरीर की स्थिति में व्यवधान उत्पन्न होगा |

यदि आपकी टाँगों में लचीलापन नहीं है अथवा जाँघ की माँसपेशियों में तनाव है तो आप देखेंगे कि आपके घुटने सुखासनज़मीन पर टिक नहीं पाते | इस स्थिति में कूल्हों के नीचे एक और कुशन अथवा तह किया हुआ एक और कम्बल लगा सकते हैं जिससे आपको बैठने में सहायता मिलेगी | आसन में बैठने से पहले यदि शरीर को खिंचाव देने वाले सरल से अभ्यास (Stretch Exercises) कर लिए जाएँ तो शरीर में लचीलापन बढाने में सहायता मिलती है जिससे आप और अधिक सुविधापूर्वक ध्यान के लिए बैठ सकते हैं | जिस भी आसन का आप चयन करें उसका नियमित रूप से अभ्यास कीजिए और उसे जल्दी जल्दी बदलने का प्रयास मत कीजिए | यदि आप नियमित रूप से एक ही आसन में बैठने का अभ्यास करते हैं तो हीरे धीरे वह आसन आपके लिए स्थिर और अधिक सुविधाजनक हो जाएगा |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/28/meditation-and-its-practices-21/

भारतीय संस्कृति में जन मानस में धार्मिक आस्था

भारत में उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक अनगिनत जातियाँ हैं | उन सबके अपने अपने कार्य व्यवहार हैं, रीति रिवाज़ हैं, जीवन यापन की अनेकों शैलियाँ हैं, अनेकों पूजा विधियाँ हैं, उपासना के पंथ हैं और अनेकों प्रकार के कर्म विस्तार हैं, तथापि उनका धर्म एक ही है | क्योंकि उन सभी को धर्म के दश लक्षण समान रूप से स्वीकार हैं – धृति क्षमा दामो अस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह, धीर्विद्या सत्यमक्रोध दशकं धर्मलक्षणं |” और यह जो कार्य व्यवहार में अनेकरूपता दिखाई देती है उसका कारण है स्वभावगत और परिस्थितिगत विभिन्नता | जीवन का क्षेत्र बहुत व्यापक है | मनुष्य को जन्म से मृत्यु तक अनेक अवस्थाओं को पार करना पड़ता है | अतः देश काल अवस्था पात्र आदि के भेद से व्यवहार में अनेकरूपता आ जाती है और कार्यक्षेत्र में प्रयत्नों के अनेक भेद हो जाते हैं | उदाहरण के लिये अन्तर्मुख होने का जैसा प्रयत्न पूजा के आसान पर हो सकता है वैसा भोजन के आसन पर नहीं | प्रत्येक कार्य में अन्तर्मुखता बनी रहे और मानसिक पवित्रता सुरक्षित रहे इसके लिये ही इतने कर्म विस्तार हैं |

यहाँ एक तथ्य यह भी विचारणीय है कि मानव की प्रकृति भी उसी प्रकार विकारी है जिस प्रकार विश्व के अन्य पदार्थ विकारी हैं | इसीलिये मनुष्य आदर्शों से अलग भी हटता है और उन आदर्शों के नाम पर ही अपने दम्भ का प्रसार भी करता है | जब दम्भ के द्वारा आदर्श आच्छन्न हो जाते हैं तो महापुरुष उस दम्भ का संशोधन करते हैं और ये संशोधन ही नवीन सम्प्रदाय बन जाते हैं तथा धर्म के नाम से पुकारे जाने लगते हैं | दम्भ का संशोधन करने वाले महापुरुष समाज की तात्कालिक विकृति को दूर करने के लिये देश और काल की परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग साधनों को प्रमुखता देते हैं | कभी सत्य को, कभी अहिंसा को, कभी अस्तेय त्याग ब्रह्मचर्य आदि को | क्योंकि ये ही सार्वभौमिक धर्म हैं | इन नये सम्प्रदाय प्रवर्तकों ने कभी यह नहीं कहा कि वे कोई नया धर्म चला रहे हैं | महापुरुषों द्वारा इन्हीं सार्वभौमिक धर्मों की शिक्षा मानव को दी गई न कि किसी सम्प्रदाय विशेष की | किन्तु धर्म विमुख लोगों ने उनके इस मार्ग में रुकावटें डालीं और संकीर्ण साम्प्रदायिक भावों तथा असहिष्णुता को जन्म दिया | इसी ने जन मानस की नैतिक भावना को एक ऐसा बहाना दे दिया कि वह अपनी सर्वोच्च प्रकृति और नियम नीति के प्रति विद्रोह कर उठा |

यहाँ तक जो कुछ कहा गया है वह धर्म का स्वरूप स्पष्ट करने के लिये कहा गया है | ऐसा नहीं है कि इस युग में धर्म पर से आस्था और विश्वास बिल्कुल ही उठ गया है | अधिकाँश जन मानस आज भी जीवन मरण, लोक परलोक, ईश्वरीय विधान आदि पर आस्था रखता है | नवीनता के बहाव में बहकर भी उसे यह होश अवश्य है कि उसकी सुरक्षा का एकमात्र साधन धर्म ही है | आज भी वह प्रेम, त्याग, सज्जनता, सहिष्णुता, दयालुता आदि में आस्था रखता है और यह मानता है कि सच्चा ईश्वरीय राज्य राम और कृष्ण के आदर्शों से ही प्राप्त हो सकता है | इन आदर्शों को प्राप्त करने के लिये गीता रामायण आदि से ही प्रेरणा प्राप्त हो सकती है | पुनर्जन्म और मुक्तिवाद की सम्पत्ति आज तक भी इस देश में सुरक्षित है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/28/religious-beliefs-in-the-public-mind-in-indian-culture/

जली हुई रस्सी – डॉ दिनेश शर्मा

मुझे पता है तुमने मुझे देख लिया था पर फोन की स्क्रीन पर आंख जमाये शो ऐसे किया जैसे मै कमरे में हूँ ही नही । फिर खिड़की की तरफ देखते हुए फोन कान पर लगा कर तुमने बात करनी शुरू कर दी ऐसा दिखा कर जैसे कोई बहुत ज़रूरी काल है । दरअसल दूसरी तरफ लाइन पर कोई था ही नही बावजूद इसके कि तुमने हैलो हैलो बोलकर बातचीत ऐसे शुरू की जैसे किसी खास मसले पर बहुत सीरियस बात हो रही थी । मुझे कैसे पता लगा ? जब तुम्हारी तथाकथित गंभीर बात चल रही थी तभी तुम्हारे फोन की घंटी बजने लगी ।

हा हा हा हा हा  !!

दरअसल तुम्हे यह दिखाने में बड़ी परेशानी है कि तुम एकदम वेल्ले हो यानी एकदम खाली । मुझे पता है कि तुमने ऊंचे लेवल की अफसरी की है । तुम्हारी नाक पर मक्खी भी बैठने से घबराती थी । दफ्तर के सामने कार रुकते ही चपरासी तुम्हारी कार का दरवाजा खोल कर तुम्हारा डेढ़ किलो का बैग बड़े एहतियात से लेकर तुम्हारे पीछे पीछे सीढ़िया चढ़ कर तुम्हारी चमड़े मढ़ी बड़ी कुर्सी की साइड टेबल पर जमा दिया करता था । दफ्तर के छोटे बड़े बाबू, स्टेनो, सेक्रेटरी बारी बारी से घबराए गुड़ मॉर्निंग बोलने आते थे और तुम्हारी नज़रे-इनायत के तलबगार बने फाइलें बगल में दबाए अपने वजूद को भींचे चौकस रहते थे । बड़े बड़े पैसे वाले , करोड़पति बिजनेसमैन तुम्हारी कलम और कुर्सी की ताकत से थर्राते थे । दरअसल सरकारी ओहदे की बदौलत तुमने बड़े रौब से राज किया, बच्चों को पढ़ा कर विदेशों में सेटल किया, इधर उधर बेनामी प्रॉपर्टीज खरीदी, अच्छा खासा काला सफेद बैंक बेलेंस बनाया ।

पर अब तुम अकेले हो । बच्चे विदेशों में है और अपनी जिंदगी में तुम्हारा दखल साल में बीस दिन से ऊपर बर्दाश्त नही करते । तुम जानते हो तुम्हारे व्यवहार की वजह से तुम्हे ज्यादा पसंद नही करते ।  उन्होंने अपनी माँ से कह दिया है कि पापा को दिल्ली में ही रहने दो । नौकर चाकर है न देखभाल करने के लिए । तुम जीवन भर अफसरी के गुरुर में ऐसे अकड़े रहे कि तुम्हारा कोई दोस्त ही नही बना । जब तक कुर्सी पर थे तो काम निकालने के चक्कर जो लोग आगे पीछे घूमते थे, वे तुम्हारे नहीं कुर्सी के इर्द गिर्द घूमते थे । आज भी वैसा ही कर रहे है । पर अब तुम रिटायर्ड हो चुके हो और कुर्सी पर कोई और है ।

अंदर से तो तुम टूट चुके हो । अकेले पड़ गए हो । महंगा घर, बड़ी गाड़ी और अच्छी खासी पेंशन तुम्हारा अकेलापन दूर नही करती ।  कलाई में बंधी रोलेक्स की महंगी घड़ी बार बार देखने से वक़्त नही कटता ।

अब तुम खिसियाये हुए मेरे सामने खड़े हो । तुम एक्सप्लेन करने की कोशिश कर रहे हो कि बात करते करते फ़ोन की घंटी कैसे और क्यों बज गयी । रस्सी जल गयी पर अकड़ अब तक नही गयी । ऐसा करो तुम अपने मोबाइल पर वीडियो गेम खेला करो । मैं चलता हूँ । बहुत काम है । फिर मिलूंगा ।