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महागौरीति चाष्टमम्

अष्टम नवरात्र – देवी के महागौरी रूप की उपासना के लिए कुछ मन्त्र

या श्री: स्वयं सुकृतीनाम् भवनेषु अलक्ष्मी:, पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि: |

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा, तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ||

देवी का आठवाँ रूप है महागौरी का | माना जाता है कि महान तपस्या करके इन्होंने अत्यन्त गौरवर्ण प्राप्त किया था | ऐसी मान्यता है कि दक्ष के यज्ञ में सती के आत्मदाह के बाद जब पार्वती के रूप में उन्होंने जन्म लिया तब नारद के कहे अनुसार उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया जिसके कारण पार्वती का रंग काला और शरीर क्षीण हो गया | तब शिव ने पार्वती को गंगाजल से स्नान कराया जिसके कारण इनका वर्ण अत्यन्त गौर हो गया और इन्हें महागौरी कहा जाने लगा |

इस रूप में भी चार हाथ हैं और माना जाता है इस रूप में ये एक बैल अथवा श्वेत हाथी पर सवार रहती हैं | इनके वस्त्राभूषण श्वेत हैं और ये वृषभ पर सवार हैं – श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना – श्वेत वस्त्राभूषण धारण करने के कारण भी इन्हें महागौरी भी कहा जाता है और श्वेताम्बरी भी कहा जाता है | इनके दो हाथों में त्रिशूल और डमरू हैं तथा दो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं | यह देवी अत्यन्त सात्विक रूप है | वृषभ पर सवार होने के कारण इनका एक नाम वृषारूढ़ा भी है | अत्यन्त गौर वर्ण होने के कारण इनकी उपमा कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमा से भी दी जाती है |

माँ गौरी की उपासना का मन्त्र है:

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि: | महागौरी शुभं दधान्महादेवप्रमोददा ||

इसके अतिरिक्त श्रीं क्लीं ह्रीं वरदायै नमः” इस बीज मन्त्र के जाप के साथ भी देवी के इस रूप की उपासना की जा सकती है |

इसके अतिरिक्त कात्यायनी देवी की ही भाँति महागौरी की उपासना भी विवाह की बाधाओं को दूर करके योग्य जीवन साथी के चुनाव में सहायता करती है | महागौरी की उपासना से व्यक्ति को मिलन विकारों से मुक्ति प्राप्त होती है | माना जाता है कि सीता जी ने भी भगवान् राम को वर प्राप्त करने के लिए महागौरी की उपासना की थी |

जो Astrologers नवदुर्गा को नवग्रहों के साथ सम्बद्ध करते हैं उनका मानना है कि राहु के दुष्प्रभाव के शमन के लिए महागौरी की उपासना की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होगा |

महागौरी के रूप में माँ भगवती सभी का कल्याण करें और सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम् |

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम

पूर्णन्दुनिभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम् |

वराभीतिकरां त्रिशूलडमरूधरां महागौरी भजेम् ||

पट्टाम्बरपरिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणीरत्नकुण्डलमण्डिताम् ||

प्रफुल्लवदनां पल्ल्वाधरां कातंकपोलां त्रैलोक्य मोहनम् |

कमनीया लावण्यां मृणालचन्दनगन्धलिप्ताम् ||

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकटहन्त्री त्वंहि धनैश्वर्यप्रदायनीम् |

ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

सुखशान्तिदात्री धनधान्यप्रदीयनीम् |

डमरूवाद्यप्रिया आद्या महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रयहारिणीम् |

वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

सप्तमं कालरात्रि

सप्तम नवरात्र – देवी के कालरात्रि रूप की उपासना

त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं समरमूर्धनि तेSपि हत्वा ।

नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तमस्माकमुन्मदसुरारि भवन्न्मस्ते ।।

देवी का सातवाँ रूप कालरात्रि है | सबका अन्त करने वाले काल की भी रात्रि अर्थात् विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि है | इस रूप में इनके चार हाथ हैं और ये गधे पर सवार दिखाई देती हैं | इनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और पाश दिखाई देते हैं | एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | इस रूप में इनका वर्ण श्याम है तथा ये प्रतिकार अथवा क्रोध की मुद्रा में दिखाई देती हैं | श्यामवर्णा होने के कारण भी इन्हें कालरात्रि कहा जाता है | इस मुद्रा में इनका भाव अत्यन्त कठोर तथा उत्तेजित दिखाई देता है | देवी का यह आक्रामक तथा नकारात्मक रूप है |

कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ||

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी ।।

दैत्यों के बढ़ते आतंक को देख देवी का मुख क्रोध से काला पड़ गया था और अत्यन्त भयानक मुद्रा हो गई थी | देवी के इसी रूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है |

ततः कोपं चकारोच्चै: अम्बिका तानरीन् प्रति, कोपेन चास्या वदनमसीवर्णमभूत्तदा ||

दैत्य शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था । इससे चिंतित होकर सभी देवतागण शिव जी के पास गए । शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने की प्रार्थना की । शिव जी की बात मानकर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया तथा शुम्भ-निशुम्भ का वध कर दिया । लेकिन जैसे ही देवी रक्तबीज का वध करने को उद्यत हुईं तो उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न होते चले गए । इसे देख देवी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया, जिसने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया ।

क्लीं ऐं श्रीं कालिकायै नमः” कालरात्रि का बीज मन्त्र है और इस मन्त्र के जाप के द्वारा इनकी उपासना करने से ये प्रसन्न होती हैं |

इनकी पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें शुभंकारी भी कहते हैं । यह रूप इस कटु सत्य का द्योतक भी है कि जीवन सदा आह्लादमय और सकारात्मक ही नहीं होता | जीवन का एक दूसरा पक्ष भी होता है जो दुष्टतापूर्ण, निन्दनीय, अन्धकारमय अथवा नकारात्मक भी हो सकता है | आज जिस तरह से रक्तबीज की भाँति अनगिनत आतंकी उत्पन्न होते जा रहे हैं उनके विनाश के लिए तो कालरात्रि के ही रूप की आवश्यकता है | क्योंकि दुष्ट का संहार दुष्टता से ही किया जा सकता है |

सम्भवतः इनके रूप के कारण ही कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि भगवती का यह रूप शनि का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही शनि की ही भाँति प्रसन्न हो जाएँ तो “शुभंकरी” हो जाती हैं, अतः शनि की उपासना कालरात्रि की उपासना के रूप में भी की जा सकती है…

माँ भगवती देवी कालरात्रि के इस रूप में हम सबके जीवन से नकारात्मकता और अज्ञान के अन्धकार का नाश करके सकारात्मकता और ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित करें…

ध्यान

करालवदनां घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम् |

कालरात्रिं करालिकां दिव्यां विद्युतमालाविभूषिताम ||

दिव्यं लौहवज्रखड्गवामोघोर्ध्वकराम्बुजाम् |

अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम ||

महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा |

घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम् ||

सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम् |

एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृद्धिदाम् ||

स्तोत्र पाठ

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती |

कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता ||

कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी |

कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी ||

क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी |

कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा ||

 

देवी के कूष्माण्डा रूप की उपासना

चतुर्थ नवरात्र – देवी के कूष्माण्डा रूप की उपासना

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः |

कल चतुर्थ नवरात्र है – चतुर्थी तिथि – माँ भगवती के कूष्माण्डा रूप की उपासना का दिन | इस दिन कूष्माण्डा देवी की पूजा अर्चना की जाती है | देवी कूष्माण्डा – सृष्टि की आदिस्वरूपा आदिशक्ति | इनका निवास सूर्यमण्डल के भीतरी भाग में माना जाता है | अतः इनके शरीर की कान्ति भी सूर्य के ही सामान दैदीप्यमान और भास्वर है |

कुत्सितः ऊष्मा कूष्मा – त्रिविधतापयुतः संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः स कूष्माण्डा – अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है वे देवी कूष्माण्डा कहलाती हैं | इस रूप में देवी के आठ हाथ माने जाते हैं | इनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, सुरापात्र, चक्र, जपमाला और गदा दिखाई देते हैं | यह रूप देवी का आह्लादकारी रूप है और माना जाता है कि जब कूष्माण्डा देवी आह्लादित होती हैं तो समस्त प्रकार के दुःख और कष्ट के अन्धकार दूर हो जाते हैं | क्योंकि यह रूप कष्ट से आह्लाद की ओर ले जाने वाला रूप है, अर्थात् विनाश से नवनिर्माण की ओर ले जाने वाल रूप, अतः यही रूप सृष्टि के आरम्भ अथवा पुनर्निर्माण की ओर ले जाने वाला रूप माना जाता है | इनका एक हाथ में पात्र लिए हुए इनके उदार पर रखा होता है | इस प्रकार यह रूप इस बात का भी प्रतीक है कि समस्त ब्रह्माण्ड इनके उदर में स्थित है | मान्यता है कि इन्हीं के उदर से समस्त ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है |

माना जाता है कि भगवती का यह रूप सूर्य के सामान तेजवान तथा प्रकाशवान है और सम्भवतः इसीलिए जो भारतीय ज्योतिषी – Astrologer – अथवा विद्वान् दुर्गा के नौ रूपों का सम्बन्ध नवग्रहों से मानते हैं उनकी ऐसी भी मान्यता है कि व्यक्ति के कुण्डली – Horoscope – में यदि सूर्य से सम्बन्धित कोई दोष है, अथवा तक के अध्ययन, कर्मक्षेत्र अथवा सन्तान से सम्बन्धित किसी प्रकार की समस्या हो या पंचम भाव से सम्बन्धित कोई समस्या है तो इन समस्त दोषों के निवारण हेतु कूष्माण्डा देवी की उपासना करनी चाहिए | माना जाता है कि जब ये प्रसन्न होती हैं तब समस्त प्रकार के अज्ञान स्वतः दूर हो जाते हैं और ज्ञान का प्रकाश हर ओर प्रसारित हो जाता है | इनकी उपासना से बहुत से रोगों में भी शान्ति प्राप्त होती है | कूष्माण्डा देवी की उपासना के लिए मन्त्र है:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ।

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ।।

इसके अतिरिक्त ऐं ह्रीं देव्यै नमः” अथवा “ऐं ह्रीं कूष्माण्डा देव्यै नमः” कूष्माण्डा देवी के इन बीज मन्त्रों में से किसी एक मन्त्र के जाप के साथ भी देवी के इस रूप की आराधना की जा सकती है |

समस्त देवताओं ने जिनकी उपासना की वे देवी कूष्माण्डा के रूप में सबके सारे कष्ट दूर कर हम सबका शुभ करें…

कूष्माण्डा मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

ध्यान

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम् |

सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम् ||

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थदुर्गात्रिनेत्राम् | कमण्डलु चापबाणपदमसुधाकलशचक्रगदाजपवटीधराम् ||

पट्टाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकारभूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणि रत्नकुण्डलमण्डिताम् ||

प्रफुल्लवदनां चारूचिबुकां कांतकपोलां तुंगकुचाम् |

कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ||

स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादिविनाशनीम् |

जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम् ||

जगतमाता जगत्कर्त्री जगदाधाररूपणीम् |

चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम् ||

त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःखशोकनिवारिणीम् |

परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम् ||

शिव पुराण और कोरोना वायरस

सोशल मीडिया में एक बात दावा तेजी से वायरल हो रही है और उसमें दावा किया जा रहा है कि यह मन्त्र शिवपुराण का है और इसमें भगवान शिव से प्रार्थना की गई है कि हे महादेव आप करुणा के अवतार हैं, रुद्र रूप हैं, अशुभ का संहार करने वाले हैं, मृत्युंजय हैं | आज कोरोना जैसे वायरस ने महामारी फैलाई हुई है उससे हमारी रक्षा कीजिए | साथ ही यह भी दावा किया जा रहा है कि इस वायरस का जन्म चीन देश में हुआ है, मांसाहार के कारण हुआ है, और आज इसने सारे संसार को त्रस्त किया हुआ है | इस कोरोना वायरस से हमारी रक्षा कीजिए | इसका एक audio भी साथ ही वायरल हो रहा है | कई मित्रों ने हमसे पूछा कि क्या वास्तव में यह मन्त्र शिव पुराण से है ? सम्भवतः वे लोग इसलिए भी पूछना चाहते होंगे कि यदि शिव पुराण से हो तो इसका जाप आरम्भ कर दिया जाए |

तो यहाँ सबसे पहले तो एक बात कहना चाहेंगे कि ईश्वर से अपने कष्टों के समाधान के लिए प्रार्थना करना, मन्त्र का जाप करना कोई बुरी बात नहीं है – बल्कि ऐसा करने से एक प्रकार का मानसिक सम्बल प्राप्त होता है, क्योंकि अधिकाँश में मनुष्य धर्मभीरु है | तो आप निशंक होकर इस मन्त्र का भी जाप कर सकते हैं | नवरात्र चल रहे हैं तो बता दें कि श्री दुर्गा सप्तशती में तो इस प्रकार के अनेकों श्लोक उपलब्ध होते हैं जिनमें रोगों तथा अन्य सभी प्रकार की आधी व्याधियों से जन साधारण की रक्षा की बात कही गई है:

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | दारिद्रयदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्र चित्ता ||

अर्थात, हे देवी, आप सभी प्राणियों के भय को हर कर स्वस्थ व्यक्तियों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणकारी बुद्धि प्रदान करती हैं | आप दुःख दारिद्र्य को हरने वाली तथा सब पर उपकार करने के लिए आपका चित्त सदा ही दया से आर्द्र रहता है |

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके |

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ||

अर्थ स्पष्ट है |

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे |

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ||

अर्थात, शरणागतों, दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवी आपको नमस्कार है |

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते |

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमोऽस्तु ते ||

अर्थात, आप सर्वस्वरूपा हैं, सर्वेश्वरी हैं तथा समस्त प्रकार की दिव्य शक्तियों से सम्पन्न दिव्य रूपा हैं, हमारी सभी भयों से रक्षा कीजिए, हम आपको नमन करते हैं |

और निम्नलिखित मन्त्र तो है ही रोगनाश के लिए…

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् |

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ||

अर्थात, हे देवी ! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हैं | जो लोग आपकी शरण में हैं, उनपर विपत्ति तो आ ही नहीं सकती तथा ऐसे लोग अपनी शरण में आए हों को भी शरण दे सकते हैं |

इसी प्रकार के बहुत से मन्त्र न केवल दुर्गा सप्तशती में बल्कि बहुत से वैदिक ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं | और जैसा कि ऊपर लिखा, मन्त्र जाप श्रेष्ठ होता है | तो जो मन्त्र इस चित्र में दिया गया है वह तो किसी व्यक्ति ने बनाया ही कोरोना के सम्बन्ध में है और उसका जाप यदि आप करना चाहें तो अवश्य कीजिए | सम्भव है उससे लाभ भी हो | किन्तु, यह मन्त्र शिव पुराण का कदापि नहीं है, किसी व्यक्ति ने स्वयं इसकी रचना करके शिव पुराण के नाम से इसे प्रचारित कर दिया है | अच्छा होता यदि वह रचनाकार अपने स्वयं के नाम से ही इसका प्रचार करते, क्योंकि उन्होंने संसार के कल्याण की कामना से इस मन्त्र की रचना करके एक महान कार्य किया है |

बहरहाल, नवरात्र के दिनों में माँ भगवती सहित सभी देवी देवताओं से यह प्रार्थना तो की जा सकती ही है कि समस्त संसार को इस कोरोना नाम की आपत्ति से मुक्ति प्रदान करें | और विश्वास कीजिए, सच्चे मन से की गई प्रार्थनाएँ कभी निष्फल नहीं जातीं – किन्तु उसके साथ हमें अपने वैज्ञानिकों और डॉक्टर्स द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का पालन करना नहीं भूलना चाहिए – जैसे, साफ़ सफाई का ध्यान रखना, सामाजिक दूरी बनाए रखना इत्यादि | यदि ऐसा नहीं किया तो सारे मन्त्र निष्फल हो जाएँगे |

तृतीया चंद्रघंटा

तृतीय नवरात्र – देवी के चंद्रघंटा रूप की उपासना

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या, निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या |

तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ||

कल आश्विन शुक्ल तृतीया है – तीसरा नवरात्र – देवी के चन्द्रघंटा रूप की उपासना का दिन | चन्द्रः घंटायां यस्याः सा चन्द्रघंटा – आल्हादकारी चन्द्रमा जिनकी घंटा में स्थित हो वह देवी चन्द्रघंटा के नाम से जानी जाती है – इसी से स्पष्ट होता है कि देवी के इस रूप की उपासना करने वाले सदा सुखी रहते हैं और किसी प्रकार की बाधा उनके मार्ग में नहीं आ सकती |

माँ चन्द्रघंटा का वर्ण तप्त स्वर्ण के सामान तेजोमय है | इस रूप में देवी के दस हाथ दिखाए गए हैं और वे सिंह पर सवार दिखाई देती हैं | उनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, चक्र, जपमाला, त्रिशूल, गदा और तलवार सुशोभित हैं | अर्थात् महिषासुर का वध करने के निमित्त समस्त देवों के द्वारा दिए गए अस्त्र देवी के हाथों में दिखाई देते हैं |

ॐ अक्षस्नक्परशुं गदेषु कुलिशं पद्मं धनु: कुण्डिकाम्

दण्डं शक्तिमसिंच चर्म जलजं घंटाम् सुराभाजनम् |

शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननाम्

सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ||

शान्ति-सौम्यता और क्रोध का मिश्रित भाव महिषासुरमर्दिनी के इस रूप के मुखमंडल पर विद्यमान है जो एक ओर जहाँ साधकों को शान्ति तथा सुरक्षा का अनुभव कराता है तो दूसरी ओर आतताइयों को क्रोध में गुर्राता हुआ भयंकर रूप जान पड़ता है जो पिछले रूपों से बिल्कुल भिन्न है और इससे विदित होता है कि यदि देवी को क्रोध दिलाया जाए तो ये अत्यन्त भयानक और विद्रोही भी हो सकती हैं | इनकी उपासना के लिए मन्त्र है:

पिंडजप्रवरारूढा चन्द्र्कोपास्त्रकैर्युता, प्रसादं तनुते मद्यं चन्द्रघंटेति विश्रुता |

इसके अतिरिक्त ऐं श्रीं शक्त्यै नमः” माँ चन्द्रघंटा के इस बीज मन्त्र के जाप साथ भी देवी की उपासन अकी जा सकती है |

माता पार्वती के विवाहित स्वरूप को भी चन्द्रघंटा कहा जाता है | माना जाता है कि भगवान शिव से विवाह के पश्चात पार्वती ने अपने मस्तक पर अर्द्ध चन्द्र के जैसा तिलक लगाना आरम्भ कर दिया था जिस कारण उनका नाम चन्द्रघंटा हुआ | सम्भवतः इसीलिए उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात में इस दिन को गणगौर पूजा के रूप में मनाया जाता है |

जो Astrologers भगवती के नौ रूपों को नवग्रह से सम्बद्ध करते हैं उनकी मान्यता है कि माँ भगवती का यह रूप शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है तथा जिनकी कुण्डली में शुक्र से सम्बन्धित कोई दोष हो अथवा जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आती हो उन्हें देवी के इस रूप की पूजा अर्चना करनी चाहिए | साथ ही व्यक्ति की जन्म कुण्डली में द्वितीय और सप्तम भाव का प्रतिनिधित्व भी माँ चन्द्रघंटा को ही प्राप्त है |

माँ चन्द्रघंटा के रूप में भगवती सभी की रक्षा करें और सभी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

मूल मंत्र

||ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः ||

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता |
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता ||

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम् |

सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम् ||

मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम् |

खड्गगदात्रिशूलचापशरपदमकमण्डलुमाला वराभीतकराम् ||

पट्टाम्बरपरिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणि रत्नकुण्डलमण्डिताम ||

प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांतकपोलां तुंगकुचाम् |

कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम् ||

स्तोत्र पाठ

आपद्दुद्धारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम् |

अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम् ||

चन्द्रमुखी इष्टदात्री इष्टमन्त्रस्वरूपणीम् |

धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम् ||