Monthly Archives: May 2020

ध्यान

मन की वृत्ति होती है पुरानी आदतों की लीक से चिपके रहना और उन अनुभवों के विषय में सोचना जो सम्भवतः भविष्य में कभी न हों | मन वर्तमान में, यहीं और इसी समय में जीना नहीं जानता | ध्यान हमें वर्तमान का अनुभव करना सिखाता है | ध्यान की सहायता से जब मन अन्तःचेतना में केन्द्रित हो जाता है तो वह अपनी आत्मा के गहनतम स्तर में प्रवेश कर जाता है | और तब मन किसी प्रकार का भेद अथवा बाधा उत्पन्न नहीं करता और पूर्ण रूप से चेतना को केन्द्रित करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है | और यही ध्यान की पहली शर्त है | वे लोग वास्तव में भाग्यशाली हैं जिन्हें इस सत्य का ज्ञान है और जिन्होंने ध्यान का अभ्यास आरम्भ कर दिया है | उनसे भी अधिक सौभाग्यशाली वे लोग हैं जो नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास कर रहे हैं | और सबसे अधिक सौभाग्यशाली वे कुछ लोग हैं जिन्होंने ध्यान को अपने जीवन में प्राथमिकता दी है और नियमित रूप से इसका अभ्यास करते हैं |

ध्यान का अभ्यास आरम्भ करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि ध्यान वास्तव में है क्या | फिर अपने अनुकूल अभ्यास का चयन करके कुछ समय तक बिना किसी अवकाश के और यदि सम्भव हो तो प्रत्येक दिन एक निश्चित समय पर इसका अभ्यास करने की आवश्यकता है | कुछ लोगों में धैर्य का अभाव होने के कारण वे कुछ समय अभ्यास करके छोड़ देते हैं और यह मान बैठते हैं कि यह पद्धति निरर्थक और अप्रामाणिक है | यह तो ऐसा हुआ कि एक बच्चा ट्यूलिप का पौधा लगाए और सोचने लगे कि सप्ताह भर में उस पर पुष्प आ जाएँगे – जो कि सम्भव ही नहीं है – और ऐसा होते न देखकर निराश हो जाए | यदि आप नियमित अभ्यास करेंगे तो निश्चित रूप से प्रगति होगी | नियमित अभ्यास से सुधार में असफल होने की सम्भावना ही नहीं है | आरम्भ में आप अनुभव करेंगे कि शरीर का तनाव शान्त हो रहा है और भावनाओं में स्थिरता आ रही है | धीरे धीरे और गहन अनुभव होने आरम्भ हो जाएँगे | ध्यान के कुछ विशेष लाभ समय के साथ धीरे धीरे होते हैं – नाटकीय रूप से अथवा सरलता से नहीं हो जाते | ध्यान का अभ्यास नियमित रूप से किया जाएगा तो ध्यान प्रगाढ़ होता जाएगा | आगे हम बताएँगे कि इस बात का निश्चय कैसे किया जाए कि ध्यान में कितनी दृढ़ता आई है और यह भी कि अगले चरण पर कब जाया जाए |

किसी विषय पर मनन करना अथवा सोचना ध्यान नहीं है | चिन्तन, मनन – विशेष रूप से कुछ प्रेरणादायक विषयों जैसे सत्य, शान्ति और प्रेम आदि के विषय में सोचना विचारना अर्थात मनन करना – चिन्तन करना – सहायक हो सकता है, किन्तु यह ध्यान की प्रक्रिया से भिन्न प्रक्रिया है | मनन करने में आप अपने मन को एक विशेष विषय की जानकारी प्राप्त करने में, उसके अर्थ और मूल्य को समझने में लगा देते हैं | ध्यान की प्रक्रिया में चिन्तन और मनन को एक अलग अभ्यास के रूप में जाना जाता है, हाँ कभी किसी स्तर पर यह सहायक हो सकती है | जब आप ध्यान में होते हैं तो मन को किसी विषय पर सोचने का सुझाव नहीं देते हैं, बल्कि इस मानसिक प्रक्रिया से बहुत ऊपर उठ जाते हैं |

ध्यान सम्मोहन अथवा आत्म विमोहन की स्थिति भी नहीं है | सम्मोहन में या तो किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा अथवा स्वयं अपने ही द्वारा मन को एक सुझाव दिया जाता है | यह सुझाव कुछ इस प्रकार का हो एकता है – “आप सो रहे हैं अथवा विश्राम कर रहे हैं |” अर्थात सम्मोहन में मन की धारणाओं को जागृत करके उनमें किसी प्रकार के परिवर्तन अथवा उन्हें नियन्त्रित करने का प्रयास किया जाता है | इस प्रक्रिया के द्वारा मन को इस बात का विश्वास दिलाने का प्रयास किया जाता है कि यह क्रिया उसके लिए लाभदायक है और उसे दिए गए आदेशों एक अनुसार विचार करना चाहिए – सोचना चाहिए | कई बार इस प्रकार के सुझाव वास्तव में बहुत अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं – क्योंकि सुझावों में प्रभाव छोड़ने की प्रबल शक्ति होती है | दुर्भाग्य से नकारात्मक सुझाव भी हम पर उतना ही गहरा प्रभाव डालते हैं और निश्चित रूप से वह नकारात्मक ही होता है |

ध्यान की अवस्था ऐसी अवस्था होती है जिसमें न तो आप मस्तिष्क को किसी प्रकार का सुझाव देते हैं और न ही उसे किसी प्रकार नियन्त्रित करने का प्रयास करते हैं | आप केवल मस्तिष्क को देखते रहते हैं और उसे शान्त एवं स्थिर होने देते हैं | अपने मन को अनुमति देते हैं कि वह आपको आपके भीतर ले जाए और आपकी आत्मा के गहनतम स्तर को जानने और अनुभव करने में आपकी सहायता करे | सम्मोहन अथवा आत्मनिर्देश जैसे अभ्यासों से कुछ रोगों के निदान में सहायता मिल सकती है – क्योंकि इनका चिकित्सकीय प्रभाव हो सकता है, किन्तु ध्यान के साथ इन्हें मिलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए | हमारे ऋषि मुनियों ने कहा है कि ध्यान की प्रक्रिया सम्मोहन से पूर्ण रूप से भिन्न प्रक्रिया है | ध्यान मन को किसी प्रकार के भ्रम से रहित और पूर्ण रूप से स्पष्ट स्थिति में ले जाता है और किसी भी प्रकार के सुझाव अथवा बाह्य प्रभाव से मुक्ति दिलाता है |

ध्यान कोई ऐसा अपरिचित अभ्यास भी नहीं है जिसके कारण आपको अपनी मान्यताओं और संस्कृति को त्यागना पड़े अथवा धर्म परिवर्तन करना पड़े | बल्कि ध्यान स्वयं को प्रत्येक स्तर पर जानने की एक व्यावहारिक, वैज्ञानिक और क्रमबद्ध पद्धति है | ध्यान का सम्बन्ध संसार की किसी संस्कृति अथवा धर्म से नहीं है, बल्कि यह एक शुद्ध और सरल पद्धति है जीवन को गहराई से जानने की और अन्त में प्रकृतिस्थ हो जाने की |

कई बार साधक चिन्ता में पड़ जाता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि ध्यान के अभ्यास से उसके धार्मिक विश्वासों में बाधा उत्पन्न हो जाएगी अथवा किसी अन्य संस्कृति या धर्म को अपनाना पड़ेगा | ऐसा कुछ भी नहीं है |

धर्म जहाँ सिखाता है कि आपकी धारणाएँ और विश्वास क्या होने चाहियें, वहीं ध्यान सीधा स्वयं को अनुभव करना सिखाता है | धर्म और ध्यान इन दोनों प्रक्रियाओं के बीच किसी प्रकार का संघर्ष है ही नहीं | पूजा अर्चना धर्म के अंग हैं, जिनके द्वारा दिव्य शक्ति से सम्पर्क साधने का प्रयास किया जाता है | आप एक साथ दोनों ही हो सकते हैं – पूजा अर्चना करने वाले धार्मिक व्यक्ति भी और ध्यान का अभ्यास करने वाले साधक भी | लेकिन ध्यान के अभ्यास के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं कि आप जिस धर्म का पालन कर रहे हैं वही करते रहे अथवा उसे छोड़ दें और कोई नया धर्म अपना लें |

 

ब्रह्म मुहूर्त

आज पुनः ध्यान के अभ्यास पर वापस लौटते हैं | ध्यान के लिए अनुकूल आसनों पर हम बात कर रहे थे | आज बात करते हैं ध्यान के अभ्यास के लिए उचित समय की |
ये बात सत्य है कि ध्यान के साधक को ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर छोड़ देना चाहिए और दैनिक कृत्यों के बाद योग और ध्यान के अभ्यास आरम्भ कर देने चाहियें |

24 घंटे में 1440 मिनट होते हैं | उन्हें 30 भागों में बांटेंगे तो 48 मिनट का एक भाग आएगा | यही 48 मिनट का एक भाग मुहूर्त कहलाता है और इस प्रकार दिन भर में 30 मुहूर्त होते हों | जिनमें सूर्योदय के पूर्व के दो मुहूर्त विष्णु और ब्रह्म मुहूर्त कहलाते है तथा सूर्योदय के समय के साथ ही इनका समय भी बदलता रहता है | जैसे कल 5:23 पर दिल्ली में सूर्योदय होगा | इस आधार पर सूर्योदय से पूर्व 3:50 से 4:38 तक का समय विष्णु मुहूर्त और 4:38 से 5:26 तक का समय ब्रह्म मुहूर्त के अन्तर्गत माना जाएगा | लेकिन इसके लिए हर दिन सूर्योदय काल से मुहूर्त गणना करनी होगी जो कि ध्यान के साधक के लिए उचित नहीं है, क्योंकि उसे तो एक निश्चित समय पर अभ्यास करने का स्वभाव अपना बनाना होगा | इसलिए सामान्य रूप से प्रातः 4:24 से 5:12 तक 48 मिनट का समय ब्रह्म मुहूर्त माना जाता है |

ब्रह्म मुहूर्त के बारे में ज्योतिषियों का कहना है कि इस मुहूर्त में उठने से जातक को बुद्धि, बल, सौन्दर्य और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है | इस मुहूर्त में वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर अधिकतम रहता है | माना जाता है कि इस मुहूर्त में उठने से जातक की बुद्धि, बल, सौंदर्य और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है | यदि इस समय योग, ध्यान, प्राणायाम अथवा किसी अन्य प्रकार का व्यायाम किया जाता है तो शरीर को शुद्ध ऑक्सीजन मिलती है जिससे फेफड़ों की शक्ति बढ़ती है और रक्त शुद्ध होता है | यही कारण है कि आयुर्वेद के अनुसार इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है | ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है | साथ ही इस समय वातावरण पूर्ण रूप से शान्त रहता है जिसके कारण ध्यानादि प्रक्रियाओं में मन भी एकाग्र सरलता से हो जाता है |

तो, हम सभी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का अभ्यास करें ताकि ध्यान की प्रक्रिया सुचारु रूप से सम्पन्न हो सके और ध्यान के अभ्यास में अधिक गहनता आ सके…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2020/05/30/brahma-muhurta/

मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा

मैं आदिहीन, मैं अन्त हीन, मैं जन्म मरण से रहित सदा |
मुझमें ना बन्धन माया का, मैं तो हूँ शाश्वत सत्य सदा ||
जिस दिवस मृत्यु के घर में यह आत्मा थक कर सो जाएगी
तन लपटों का भोजन होगा, बन राख़ धरा पर बिखरेगा |
उस दिन तन के पिंजरे को तज स्वच्छन्द विचरने जाऊँगी
मेरी आत्मा मानव स्वरूप, फिर भी मैं शाश्वत सत्य सदा ||

 

लॉक डाउन के दौरान टाइम मैनेजमेंट

हम आज बात कर रहे हैं टाइम मैनेजमेंट की | आज प्रायः लोगों को कहते सुना जाता है कि हम अमुक कार्य करना चाहते हैं, लेकिन क्या करें – हमारे पास समय ही नहीं है | कार्य की सफलता और लक्ष्य प्राप्ति की यदि बात करते हैं तो हमें आज की समस्याओं को भी समझना होगा | आज के समय में जो लोग Working हैं, यानी कहीं नौकरी आदि करते हैं, निश्चित रूप से उनके लिए किसी भी दिनचर्या और जीवन शैली का पूर्ण तत्परता से पालन करना प्रायः असम्भव हो जाता है उनके कार्यभार और समय के अभाव के कारण | बहुत से लोगों की – महिलाओं की भी और पुरुषों की भी – कई बार ऐसी नौकरी होती है जहाँ उन्हें शिफ्ट ड्यूटी करनी पड़ती है – कभी दिन की तो कभी रात की | और आज के समय में लॉक डाउन के चलते तो कम्पनियों ने अपने यहाँ काम करने वालों पर इतना बोझ लाद दिया है कि न उन्हें दिन का होश है न रात का, न खाने का होश है न पीने का | प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि इस प्रकार की दिनचर्या में एक स्वस्थ जीवन शैली को कैसे अपनाया जाए ?

यह सही है कि एक आदर्श दिनचर्या और जीवन शैली अपनाकर हम केवल अपने स्वास्थ्य को ही अच्छा नहीं बनाए रखते, अपितु मानसिक, आध्यात्मिक, शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक विभिन्न स्तरों पर आवश्यकतानुरूप एक सन्तुलित जीवन जी कर एक सुखद परिवार और सुखद समाज के निर्माण में भी योगदान दे सकते हैं |

सबसे पहले ये जानना आवश्यक है कि दिनचर्या और जीवन शैली कहते किसे हैं | दिनचर्या मन और शरीर के सन्तुलन के साथ एक ऐसा दैनिक कार्यक्रम है जो प्रकृति के चक्र को ध्यान में रखकर किया जाता है | यही कारण है हर व्यक्ति की अपनी एक विशेष दिनचर्या होती है – यानी दिन प्रतिदिन का रूटीन होता है और वह हमारी जीवन शैली का मूल होता है | यानी हम कह सकते हैं कि हमारी दिनचर्या हमारी जीवन शैली का ही एक अभिन्न अंग है | एक आदर्श दिनचर्या के लिए स्वस्थ जीवन शैली की आवश्यकता है और एक स्वस्थ जीवन शैली के लिए अनुशासित दिनचर्या की आवश्यकता है |

हमारी दिनचर्या ऐसी होनी चाहिए कि जिससे हमारा स्वास्थ्य बेहतर रहे | और जब स्वास्थ्य की बात करते हैं तो शारीरिक, मानसिक, सामाजिक सभी प्रकार के स्वास्थ्य के विषय में बात करते हैं | तो, यदि कुछ सरल से उपायों को अनुशासनात्मक रूप से अपना लिया जाए तो हमारी जीवन शैली भी अपने आप स्वस्थ होती जाती है | और जब हमारी दिनचर्या पूर्णतः अनुशासित होगी तथा स्वस्थ जीवन शैली का पालन करेंगे तो लक्ष्य प्राप्ति में कोई समस्या नहीं होगी |

इसका सबसे प्रमुख अंग है समय का ध्यान रखना – यदि हमने अपने समय को अच्छी तरह व्यवस्थित कर लिया – जिसे सरल भाषा में टाइम मैनेजमेंट कहा जाता है – तो किसी प्रकार की भागमभाग की आवश्यकता ही नहीं होगी और हमारी दिनचर्या सुचारु रूप से चलती रहेगी | और इस विश्व संकट की घड़ी में टाइम मैनेज करना सबसे पहली आवश्यकता है | यहीं पर सबसे बड़ी समस्या का सामना करना पड़ता है | जो महिलाएँ होम मेकर हैं उनके साथ समस्या यह है कि सारा परिवार घर पर है – साथ में बच्चों की ऑन लाइन क्लासेज़ चल रही हैं तो पति का वर्क फ्रॉम होम चल रहा है | इस स्थिति में उन्हें कई बार अपने ही लिए समय नहीं मिल पाता है | वहीं दूसरी ओर जिन लोगों का वर्क फ्रॉम होम चल रहा है उन पर कार्य का इतना अधिक भार आ गया है कि वे लोग भी अपने लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं | इस स्थिति में किया क्या जाए ?

चाहे वर्किंग हैं या होम मेकर, सबसे पहले हमें अपने दिन प्रतिदिन के कामों की प्राथमिकताओं के आधार पर एक लिस्ट तैयार करने की आवश्यकता है | जो कार्य यानी टास्क पूरी होती जाए उसे लिस्ट से काट दिया जाए | फिर इसी तरह आने वाले दिन के लिए लिस्ट तैयार कर लें | हर दिन इस अभ्यास को करेंगे तो आपका स्वभाव बन जाएगा ऐसा करना, और फिर आपको कागज़ पर लिखकर लिस्ट नहीं बनानी पड़ेगी – आपके मस्तिष्क में सब फीड हो जाएगा और स्वतः ही आप उसी के अनुसार कार्य करना आरम्भ कर देंगे | उस लिस्ट में थोड़ा समय अपने लिए भी लिखकर रखें और देखें किस समय अपने लिए समय निकाल सकते हैं |

जो समय आपने अपने लिए चुना है उसके लिए आपको Decide करना है कि आप उस समय का किस प्रकार सदुपयोग करना चाहते हैं | आप उस समय परिवार के साथ मिलकर बैठ सकते हैं | उस समय में अपना कोई शौक़ पूरा कर सकते हैं – जैसे पढ़ना लिखना संगीत सुनना इत्यादि, Relaxation exercises कर सकते हैं – पाँच मिनट काफी हैं इसके लिए, शरीर को Stretch करने के अभ्यास कर सकते हैं | कुर्सी पर बैठे बैठे ही प्राणायाम कर सकते हैं | कुछ समय मिल जाए तो अपनी कोई Hobby पूरी कर सकती हैं | ऑफिस का कार्य कर रहे हैं तो आप अपने बॉस को भी इस बात को समझाकर कुछ पलों के लिए उन्हें भी विश्राम की सलाह दे सकते हैं | क्योंकि कोरोना के चलते अभी बहुत समय तक यही स्थिति रहने वाली है – ऐसा आपको डराने के लिए नहीं – बल्कि ये एक ऐसी कठोर वास्तविकता है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता |

सरल और स्वस्थ दिनचर्या से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं, दोष सन्तुलित होते हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है और अनेकों व्यस्तताओं के बाद भी सारा दिन आनन्द से व्यतीत होता है और हम अपने समस्त कर्म भली भाँति सम्पन्न करने में सक्षम हो सकते है – फिर चाहे आज की भाँति लॉक डाउन का समय ही क्यों न हो | किन्तु ध्यान रहे, समय को नियन्त्रित किये बिना – यानी Time management के बिना ऐसा सम्भव नहीं…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2020/05/28/time-management-during-lock-down/

 

प्रगति का सोपान सकारात्मकता

प्रगति का सोपान सकारात्मकता

व्यक्ति के लिए हर दिन – हर पल एक चुनौती का समय होता है | और आजकल के समय में जब सब कुछ बड़ी तेज़ी से बदल रहा है – यहाँ तक कि प्रकृति के परिवर्तन भी बहुत तेज़ी से ही रहे हैं – इस सारे बदलाव और जीवन की भागम भाग के चलते मनुष्य के मन में बहुत सी शंकाएँ अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर घर करती जा रही हैं | इन्हीं शंकाओं के कारण हम सब अनेक प्रकार की नकारात्मकताओं के शिकार भी होते जा रहे हैं |

किन्तु इस सबसे घबराकर निष्कर्मण्य होकर बैठ रहना, किसी तनाव का शिकार होकर बैठ रहना या अपने आप पर से विश्वास उठा लेना – कि नहीं, हमसे ये नहीं होगा – ये सब स्वस्थ मानसिकता के लक्षण नहीं हैं | हमें साहस और समझदारी के साथ हर चुनौती का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहने का प्रयास करना चाहिए – क्योंकि जीवन गतिशीलता का ही नाम है | और इसका एक ही उपाय है – आशावान बने रहकर हर परिस्थिति में से कुछ सकारात्मक खोजने का प्रयास किया जाए | सकारात्मकता का एक सिरा भी यदि हाथ में आ गया तो उसके सहारे आगे बढ़ने का और उस परिस्थिति या व्यक्ति के अन्य सकारात्मक पक्षों को ढूंढ निकालने का कार्य किया जा सकता है | और यदि अधिक सकारात्मकता नहीं भी दीख पड़ती है – क्योंकि हम स्वयं बहुत सी शंकाओं से घिरे हुए हैं – तो जो सिरा हाथ आया है उसे ही मजबूत बनाने का प्रयास करेंगे तो अन्य नकारात्मकताएँ सकारात्मकता में परिणत होती जाएँगी |

इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि परिस्थिति की नकारात्मकताओं के साथ समझौता किया जाए | नहीं, बल्कि उन्हें सकारात्मक बनाने का प्रयास करना है | क्योंकि जीवन में कभी भी सब कुछ सकारात्मक या मनोनुकूल नहीं उपलब्ध होता है | और नकारात्मकताओं के धागे इतने एक दूसरे से बँधे हुए होते हैं कि एक धागे को खींचेंगे तो सारा का सारा आवरण उधड़ता चला जाएगा और तब सारे तार ऐसे उलझ जाएँगे कि उन्हें सुलझाना असम्भव हो जाएगा |

इसीलिए हमारे मनीषियों ने कहा है कि सुख और दुःख, सफलता और असफलता सबमें समभाव रहते हुए कर्तव्य कर्म करते रहना चाहिए | मन को शान्त करने का अभ्यास करते रहना चाहिए | अच्छा बुरा सब पानी के बुलबुले के समान है जो नष्ट होना ही है | हम सबका ध्येय वो बुलबुला नहीं है, उसके पीछे का वो गहरा और अथाह समुद्र है जिसकी हलचल इस सबका कारण है – जिसकी सतह पर ये बुलबुले दीख पड़ते हैं |

सकारात्मकता और नकारात्मकता के फेर में पड़कर हमारी खोज प्रायः उन वस्तुओं या परिस्थितियों पर केन्द्रित होकर रह जाती है जो वास्तविक नहीं हैं और इसी कारण असंतुष्टि का भाव बना रहता है – जो मानसिक तनाव का सबसे बड़ा कारण है |

वास्तव में जिन्हें हम सकारात्मक और नकारात्मक कहते हैं, सफलता और असफलता कहते हैं – उनमें से कुछ भी वास्तविक नहीं है | केवल मात्र हमारे स्वयं के “अहं” – जिसे ईगो कहा जाता है – की सन्तुष्टि और असन्तुष्टि की उपज होती है | या फिर हमारे परिवार, गुरुजनों, समाज आदि ने हमारे मन में कहीं बहुत गहराई में इसे आरोपित कर दिया होता है | जिस दिन हम इस यथार्थ को समझ गए उस दिन न केवल हमारा मन शान्त हो जाएगा, बल्कि हम हर वस्तु, हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में समभाव रहकर केवलमात्र सकारात्मक विचारों और भावों के साथ जीना सीख जाएँगे | यह कार्य कठिन हो सकता है, किन्तु अभ्यास करेंगे तो असम्भव भी नहीं होगा…

हम सभी हर परिस्थिति में सकारात्मकता बनाए रखें यही कामना है… क्योंकि जीवन में प्रगति का एक सोपान यही है…