Category Archives: अध्यात्म

ध्यान में भोजन का प्रभाव – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान की तैयारी की बात कर रहे हैं तो आगे बढ़ने से पूर्व ध्यान की तैयारी से सम्बद्ध कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्यों को भी समझ लेना आवश्यक होगा |

ध्यान के समय भोजन का प्रभाव :

योग का मनोविज्ञान चार प्राथमिक स्रोतों का वर्णन करता है – चार प्राथमिक इच्छाएँ जो हम सभी को प्रेरित करती हैं, और ये हैं – भोजन, सम्भोग, निद्रा और आत्मरक्षण की अभिलाषा | इन चारों इच्छाओं में असन्तुलन से शारीरिक और भावनात्मक दुष्परिणाम होते हैं, जिनके कारण ध्यान केन्द्रित करने की सामर्थ्य में व्यवधान उत्पन्न होता है |

ध्यान के दृष्टिकोण से ताज़ा और सादा भोजन स्वास्थ्यवर्द्धक होता है, न कि अधिक पका हुआ, अधिक चिकनाई से युक्त अथवा अधिक तला भुना | असन्तुलित आहार से पाचन सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जिनसे ध्यान की प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न होता है | ताज़ा, सादा और प्राकृतिक आहार पोषक होता है, सुपाच्य होता है और इसीलिए लाभदायक होता है |

जिस वातावरण में भोजन किया जाए वह आनन्ददायक और सकारात्मक होना चाहिए | अज के दिनों में जहाँ पति पत्नी और बच्चे अपनी अपनी व्यस्तताओं के चलते सारा दिन घर से बाहर रहने को विवश होते हैं, वहाँ साथ बैठने और दिन भर के घटनाक्रम पर चर्चा करने का सौभाग्य उन्हें बस भोजन के समय ही मिलता है | परिवार के लोगों में इतनी समझ होनी चाहिए कि भोजन करते समय किसी भी प्रकार की अप्रिय अथवा नकारात्मक चर्चा न करें | प्रसन्नचित्त रहना उत्तम स्वास्थ्य की कुँजी है | जो लोग अच्छे स्वास्थ्य के इस महत्त्वपूर्ण रहस्य के प्रति जागरूक हैं वे जानते हैं कि भोजन करते समय उन्हें प्रसन्नचित्त रहना है | मन की प्रसन्न और आह्लादक स्थिति का हमारे पाचन तन्त्र और अन्तर्ग्रन्थियों से मल आदि के निष्कासन आदि पर व्यापक प्रभाव पड़ता है |

यदि हम अपने शरीर की कार्यप्रणाली और भाषा को समझ जाते हैं तो बहुत से रोगों और शारीरिक समस्याओं से बचा जा सकता है | जब सुस्वादु और पौष्टिक भोजन आनन्ददायक वातावरण में प्रसन्नचित्त से ग्रहण किया जाता है तो हमारा शरीर लार और आमाशय का रस पैदा करता है | जिससे भोजन को पचाने में सहायता मिलती है | उदासीनता अथवा क्रोध की स्थिति में अथवा नकारात्मक चर्चाओं के साथ किया गया भोजन पाचन सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न करता है |

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अध्यात्म और मनोविज्ञान

अध्यात्म और मनोविज्ञान

अक्सर लोग वैराग्य के अभ्यास द्वारा मन का निग्रह करके ईश्वर प्राप्ति की बात करते हैं | यह प्रक्रिया अध्यात्म की प्रक्रिया है | यहाँ हम बात कर रहे हैं अध्यात्म और मनोविज्ञान के परस्पर सम्बन्ध की | क्या सम्बन्ध है आपस में अध्यात्म और मनोविज्ञान का ? क्या अध्यात्म के द्वारा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा सम्भव है ? किन परिस्थितियों में मनुष्य भ्रमित हो सकता है ? तो, सबसे पहले विचार करते हैं कि मनुष्य भ्रमित कब होता है | किन परिस्थितियों में वह उचित निर्णय नहीं ले पाता |

भय व आतंक के वातावरण में मनुष्य लक्ष्य च्युत हो जाता है, उसे कर्तव्याकर्तव्य का भान नहीं रहता, और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में कई बार वह ग़लत निर्णय ले बैठता है | यह भय किसी भी बात का हो सकता है | अक्सर सुनने में आता है कि प्रेम करने वाले नवविवाहितों को “ऑनर किलिंग” के नाम पर मौत के घाट उतार दिया गया | कहीं किसी दादी ने अपनी लड़की के सर से भूत का साया उतारने के लिये अपनी ही पोती की बलि दे दी | कहीं किसी पुत्र ने सम्पत्ति विवाद के चलते अपने माता पिता को ही मौत की नींद सुला दिया | कहीं विवाहेतर सम्बन्धों के कारण पति अथवा पत्नी ने अपने जीवन साथी की ही जान ले ली | इनमें ये मनोविकार कहीं समाज के भय अथवा झूठे अहंकार की पुष्टि हेतु, तो कहीं धर्म के भय से, तो कहीं कुछ छिन जाने के भय से आ जाते हैं | कुछ लोगों का स्वभाव होता है केवल “मैं” और “मेरा” (जिसे Attention seeking syndrome भी कहा जाता है) के कारण दूसरों को परेशान करना और स्वयं भी उपहास का पात्र बन जाना |

किन्तु विचारणीय बात यह है कि क्या स्वस्थ मनोवृत्ति वाले लोग ऐसे कृत्य कर सकते हैं ? वास्तव में ऐसे लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग हैं | किसी न किसी प्रकार की कुंठा से ग्रस्त हैं ये लोग | कहीं कोई एथलीट खेल में प्रथम आने के लिये नशीली दवाओं का सेवन करता पकड़ा जाता है | यह प्रतिष्ठा का भय है | धर्म का भय, लोक मर्यादा का भय, जाति अथवा समाज का भय, मान प्रतिष्ठा का भय – किसी प्रकार का भी भय मनुष्य को विक्षिप्त कर सकता है |

और इन सबसे भी बढ़कर होता है मृत्यु का भय | हम अपने रास्ते यातायात के नियमों के अनुकूल गाड़ी चला रहे हैं कि अचानक ऐसा होता है कि किसी दूसरी कार का ड्राइवर बिना आगे पीछे दाएँ बाएँ देखे गाड़ी सड़क पर ले आता है | उस समय दो ही बातें हो सकती हैं – यदि हममें समझदारी है, साहस है, तो हम सफ़ाई से अपनी गाड़ी एक ओर को बचाकर निकाल ले जाने का प्रयास करेंगे | इतने पर भी यदि दुर्घटना घट जाती है तो उसमें हमारा कोई दोष नहीं होगा | किन्तु यदि हममें साहस का अभाव है और हम आशंकित अथवा भयभीत हो जाते हैं तो हमारी गाड़ी किसी दूसरी गाड़ी से अवश्य ही टकराएगी और हम अपने साथ साथ दूसरी गाड़ी के ड्राइवर को भी दुर्घटना का शिकार बना देंगे |

कभी कभी कुछ मन्दबुद्धि लोग सत्ता, धन या पद के दम्भ में भी लक्ष्यच्युत होकर उल्टे सीधे काम कर बैठते हैं | सत्ता खोने का भी भय मनुष्य को आतंकित करता रहता है | आतंकित अथवा भयग्रस्त होकर किसी भी प्रकार का अनुचित कार्य कर बैठना भ्रमित होना है | कहने का तात्पर्य है कि मोहवश, क्रोधवश, लोभवश अथवा अहंकारवश मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है, भ्रमित हो जाता है | अतः इस भ्रम से मुक्ति पाने के लिये मन से मृत्यु का तथा अन्य किसी भी प्रकार का भय दूर करके, व्यर्थ के मोह, लोभ, क्रोध अथवा अहंकार से मुक्त होकर लक्ष्यप्राप्ति की ओर अग्रसर होना आवश्यक है | ज्ञानी पुरुष के साथ यह स्थिति नहीं आती, क्योंकि उसे पूर्ण सत्य अर्थात जीवन के अन्तिम सत्य का ज्ञान हो जाता है | जिसे यह ज्ञान नहीं होता उसे ही दिशा निर्देश की आवश्यकता होती है |

यही कार्य श्रीकृष्ण ने किया | अर्जुन ने जब दोनों सेनाओं में अपने ही प्रियजनों को आमने सामने खड़े देखा तो उनकी मृत्यु से भयाक्रान्त हो श्री कृष्ण की शरण पहुँचे “शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” तब भगवान ने सर्वप्रथम उनके मन से मृत्यु का भय दूर किया | मृत्यु को अवश्यम्भावी, देह को असत् तथा आत्मा को सत् बताते हुए अर्जुन को लोकमर्यादानुसार धर्ममार्ग पर चलते हुए लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग बताया | उनका लक्ष्य उन्हें बताया | थोड़ी फटकार देते हुए उनसे कहा कि जब तू अशोच्य के विषय में शोक करता है तो फिर बुद्धिमानों की भाँति बातें करने का नाटक क्यों करता है ? तू तो मुझे बिल्कुल उन्मत्त जान पड़ता है जो मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्पर भावों को एक साथ दिखा रहा है | जबकि वास्तवकिता तो यह है कि आत्मज्ञानी न तो मृत वस्तुओं के विषय में शोक करता है और न ही जीवित वस्तुओं के विषय में कुछ सोचता है | जिस प्रकार शरीर की कौमार, यौवन और जरा ये तीन अवस्थाएँ होती हैं उसी प्रकार एक चौथी अवस्था भी होती है – देहान्तर प्राप्ति की अवस्था | जिस प्रकार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करने पर आत्मा न तो मरती है और न ही पुनः उत्पन्न होती है, उसी प्रकार एक देह की समाप्ति पर आत्मा नष्ट नहीं हो जाती और न ही दूसरी देह में प्रवेश करने पर उसकी पुनरुत्पत्ति ही होती है – क्योंकि जिसका अन्त ही नहीं हुआ उसकी पुनरुत्पत्ति कैसे होगी… वह तो अजर अमर शाश्वत सत्य है…

“अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत !” 2/13 स्वप्न व माया के शरीर की भाँति ये सब शरीर अन्तवन्त हैं | जबकि आत्मा नित्य और निर्विकार है | अतः आत्मा को नित्य और निर्विकार मानकर तू युद्ध कर |

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ध्यान के लिए तैयारियाँ – स्वामी वेदभारती जी

हम बात कर रहे हैं कि ध्यान के अभ्यास के लिए स्वयं को किस प्रकार तैयार करना चाहिए | इसी क्रम में आगे :

पञ्चम चरण : ध्यान में बैठना :

श्वास के अभ्यासों के महत्त्व के विषय में पिछले अध्याय में चर्चा की थी | श्वास के उन विशिष्ट अभ्यासों को करने के बाद आप अब ध्यान के लिए तैयार हैं | ध्यान के आसन में बैठ जाइए (आगे ध्यान के लिए कुछ आसनों का भी वर्णन करेंगे) और बस अपने मन्त्र के प्रति अथवा सार्वभौम मन्त्र “सोSहम्” के प्रति मन को सावधान कीजिए | ‘सोSहम्” की ध्वनि का श्वास के साथ विशेष रूप से सम्बन्ध होता है | श्वास भीतर लेते समय मन ही मन में “सो” की ध्वनि को सुनने का प्रयास करें और श्वास बाहर निकालते समय “हम्” की ध्वनि को सुनें |

श्वास को लम्बी और मृदुल होने दें | स्थिरचित्त बैठकर मन को अपने मन्त्र में केन्द्रित करें | सुविधाजनक स्थिति में ध्यान के आसन में बैठे हुए मन को स्थिर और केन्द्रित होने दें | जितनी देर तक आप सुविधापूर्वक बैठ सकते हैं अथवा उस समय जितना समय आपके पास है उसके अनुसार जितनी देर आप चाहें बैठ सकते हैं | जब आप ध्यान से बाहर आना चाहें तो सबसे पहले श्वास प्रक्रिया पर ध्यान दें और फिर शरीर पर | अन्तःचेतना से बाह्य चेतना में धीरे धीरे क्रम से आएँ | हाथों की हथेलियों को आधा मोड़कर आँखों को ढाँप लें | फिर आँखों को खोलकर पहले हथेलियों को देखें फिर हाथों को | ध्यान की अवस्था में आपके मन के साथ क्या होता है और आप मन के साथ किस प्रकार कार्य करते हैं इस विषय पर आगे चर्चा की जाएगी |

तो इस प्रकार ध्यान के अभ्यास का क्रम हुआ – सबसे पहले नहा धोकर अथवा केवल हाथ मुँह धोकर तैयार हो जाएँ, फिर शरीर को खींचने के और कुछ योग के आसन करें, उसके बाद विश्राम के अभ्यास, फिर श्वास के अभ्यास और अन्त में ध्यान का अभ्यास |

अगले अध्याय में ध्यान पर भोजन के प्रभाव के विषय में बात की जाएगी…

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ध्यान और इसका अभ्यास – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान और इसका अभ्यास

ध्यान के लिए स्वयं को तैयार करना :

हम बात कर रहे हैं कि ध्यान के अभ्यास के लिए स्वयं को किस प्रकार तैयार करना चाहिए | इसी क्रम में आगे : तृतीय चरण…

ध्यान की तैयारी के लिए विश्राम के अभ्यास (Relaxation Exercises) :

शरीर को खींचने के अभ्यास (Stretch Exercises) के बाद कुछ देर का विश्राम का अभ्यास लाभदायक होगा | सुविधाजनक स्थिति में भूमि पर अथवा किसी गद्दे पर कमर के सहारे बिल्कुल सीधे लेट जाइए | सर के नीचे एक पतला तकिया लगा लीजिये | शरीर को चादर अथवा पतले तौलिये से ढक लीजिये | आपके हाथ शरीर से कुछ दूरी पर और हथेलियाँ ऊपर की ओर होनी चाहियें | दोनों पैर सुविधानुसार एक दूसरे से कुछ दूरी पर हों |

निश्चित कर लीजिये कि शरीर का भार सब अंगों में बराबर बंटा हुआ है और आपका शरीर इधर उधर झूल नहीं रहा है – अर्थात स्थिर है | सर बिल्कुल बीच में है – इधर उधर को लुढ़का हुआ नहीं है – अन्यथा गर्दन में खिंचाव आ सकता है | विश्राम के ये आसन “शवासन” कहलाता है, क्योंकि आप पूरी तरह से स्थिर और शान्त स्थिति में लेटे होते हैं | धीरे से अपनी आँखें बन्द कीजिए और कुछ देर के लिए अपनी श्वासों के आवागमन पर ध्यान दीजिये | नाक के छिद्रों में बिना किसी झटके अथवा रुकावट के श्वास के आवागमन (Inhale and Exhale) को अनुभव कीजिए |

इस आसन में लेटे हुए आप विश्राम के कुछ अभ्यास कर सकते हैं – जैसे क्रम से अपने शरीर की माँसपेशियों पर ध्यान दीजिये और ऊपर से नीचे तक सम्पूर्ण शरीर पर भ्रमण कीजिए | इस पर विस्तार से चर्चा आगे करेंगे |

विश्राम के अभ्यास छोटे होने चाहियें और दस मिनट से अधिक समय के नहीं होने चाहियें | इस अभ्यास की अवधि में आपको अपने मन को सावधान रहने का आदेश देना होगा, क्योंकि बहुत से लोगों की प्रवृत्ति होती है कि इस अभ्यास के दौरान वे निद्रादेवी की गोद में पहुँच जाते हैं |

चतुर्थ चरण : श्वास के अभ्यासों के द्वारा मन और स्नायुमण्डल को शान्त करना :

आपकी श्वास प्रक्रिया प्रभावशाली रूप से परिवर्तित होती रहती है – जिसका व्यापक प्रभाव आपके शारीरिक तनाव पर और मन की शान्ति तथा स्पष्टता पर पड़ता है | ध्यान के अभ्यास से पहले ध्यान के आसन में बैठकर कुछ विशेष यौगिक विधि से श्वास के अभ्यास करने चाहियें | इनसे शान्तिपूर्ण मानसिक स्थिति प्राप्त करने में, भीतर ध्यान केन्द्रित करने में तथा स्थिरता प्राप्त करने में सहायता प्राप्त होगी | सम्भव है आरम्भ में कुछ अभ्यासी इन अभ्यासों में समय नष्ट करना उचित न समझें, लेकिन यदि आपने एक बार ये अभ्यास करने आरम्भ कर दिए तो आप आश्चर्यजनक रूप से अपने ध्यान में दृढ़ता और गहनता का अनुभव करेंगे | भावनात्मक सन्तुलन और मन की स्पष्टता (Clarity of Mind) में श्वास के इन अभ्यासों का अद्भुत योगदान होता है | अगले अध्यायों में श्वास के कुछ ऐसे विशेष अभ्यासों का वर्णन किया जाएगा जिनका ध्यान की प्रक्रिया में विशाल और लाभदायक प्रभाव होता है |

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कर्मयोग – कर्म की तीन संज्ञाएँ

जैसा कि पहले लिखा, कर्ता के भाव के अनुसार कर्म की तीन संज्ञाएँ होती हैं – कर्म, अकर्म और विकर्म | इन तीन संज्ञाओं के साथ साथ हमारे शास्त्रकारों ने कर्म के तीन रूप भी बताए हैं | इनमें प्रथम है संचित कर्म | अनेक जन्मों से लेकर अब तक के संगृहीत कर्म ही संचित कर्म कहलाते हैं | कर्म तब तक क्रियारूप में रहते हैं जब तक वे क्रियमाण होते हैं, और पूरा होते ही तत्काल संचित बन जाते हैं | संचित केवल प्रेरणा देता है, तदनुसार कार्य करने को बाध्य नहीं करता | कर्म करने में तो मनुष्य का वर्तमान समय का पुरुषार्थ ही प्रधान कारण होता है | यदि यह पुरुषार्थ संचित के अनुकूल होगा तो उसके द्वारा उत्पन्न हुई कर्म प्रेरणा में सहायक सिद्ध होगा, और यदि प्रतिकूल होगा तो उस कर्म प्रेरणा को रोक भी देगा | उदाहरण के लिये यदि वर्तमान में कोई व्यक्ति अच्छी संगति में रहता है और उसके संचित भी वैसे ही हैं तो वह सदा अच्छे कर्म ही करेगा, किन्तु संचित तो श्रेष्ठ हैं लेकिन वर्तमान में संगति अच्छी नहीं है तो उस व्यक्ति को अच्छे कर्म करने में कठिनाई होगी | पुरुषार्थ संचित के प्रतिकूल होने के कारण वह समय पर अच्छे कर्म करने से वंचित रह जाएगा |

कर्म का दूसरा रूप है प्रारब्ध | पाप पुण्य के संचित में से कुछ अंश एक जन्म के भोग के उद्देश्य से प्रारब्ध बनता है | इस प्रकार जब तक संचित शेष रहता है प्रारब्ध बनता रहता है, और संचय की समाप्ति होते ही मोक्ष हो जाता है | प्रारब्ध का यह भोग भी दो प्रकार का होता है | चित्त की भावनाओं के द्वारा किया गया भोग मानसिक होता है – जैसे सब प्रकार से सुखी होने के बाद भी कोई व्यक्ति चिंतित रहता है तो यह मानसिक भोग अथवा प्रारब्ध होता है | दूसरा रूप होता है सुख दु:खादि की प्राप्ति | यह दैवयोग अथवा स्वेच्छा से भी होता है – जैसे अचानक किसी दुर्घटना का घट जाना अथवा जान बूझकर आग में कूद जाना |

कर्म का तीसरा रूप है क्रियमाण | स्वेच्छा से किया गया कर्म क्रियमाण होता है और यह फलभोग के लिये बाध्य करता है | इस प्रकार संचित से प्रेरणा, प्रेरणा से क्रियमाण, क्रियमाण से पुनः संचित और उस संचित के अंश से प्रारब्ध – इस प्रकार कर्म प्रवाह जीवन में निरन्तर तब तक प्रवाहित होता रहता है जब तक एक एक संचित कर्म समाप्त नहीं हो जाता, और जब प्रारब्ध भोग कर सारा संचित समाप्त हो जाता है तब प्राप्त होती है मुक्ति | इतना तो निश्चित है कि बिना भोग के मुक्ति नहीं, किन्तु यह भोग अथवा इसके लिये किया गया कर्म निष्काम होना चाहिये | क्योंकि सकाम होते ही फिर से वह संचित हो जाएगा |

अब फिर से प्रश्न उत्पन्न होता है कि निष्काम कर्म की परिभाषा क्या है ? गीता के अनुसार भगवदर्पण भाव से भगवत्प्रीत्यर्थ अनासक्त भाव से तथा फल की इच्छा से रहित होकर जो कर्म किया जाता है वह मुक्ति का साधन होता है | शास्त्रोक्त विधि से सकाम कर्म करने वाला उस सिद्धि को तो प्राप्त कर लेता है जिसके लिये उसने वह कर्म किया है, किन्तु मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता | गीता में यत्र तत्र सर्वत्र इसी आशय के कथन उपलब्ध होते हैं | निष्काम कर्म का महत्व बताते हुए गीता में कहा गया है “निहाभिक्रमनाशोSस्ति प्रत्यवायो न विद्यते, स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||” (2/40)

इस निष्काम कर्मयोग में न तो आरम्भ का नाश है, न ही विपरीत फल का दोष है, अतः इस निष्काम कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मृत्यु के महान भय से उद्धार कर देता है | निष्काम भाव से कर्म करने का एकमात्र हेतु परमात्मतत्व की प्राप्ति रह जाता है | उसका लक्ष्य इंतना ऊँचा हो जाता है कि उसे बाहरी फलों का कोई ध्यान ही नहीं रहता | वह उस परमात्मतत्व के सामने जगत के बड़े से बड़े पदार्थों को भी तुच्छ समझता है “दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनन्जय, बुद्धो शरणमन्विच्छ कृपण: फलहेतव: ||” (2/49)

इस प्रकार गीता में कहीं भी कर्महीनता का समर्थन नहीं मिया गया है, अपितु कर्म के लिये प्रेरित करते हुए उसे निष्काम भाव से करने का पक्ष लिया गया है | और गीता का निष्काम कर्मयोग सर्वथा भक्तिमिश्रित है तथा फल और आसक्ति का त्याग कर भगवान की आज्ञानुसार भगवदर्थ समत्व बुद्धि से शास्त्रविहित कर्मों को करना ही उसका स्वरूप है | इसी कारण से वह मुक्ति का साधन है “सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय:, मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् | चेतसा सर्व कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः, बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: स ततं भव ||” (18/56,57)

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गीता – कर्मयोग – कर्म की तीन संज्ञाएँ

गीता के जीवन-दर्शन के अनुसार मनुष्य बहुत महान है और असीम शक्ति का भण्डार है | वास्तव में गीता एक ऐसा पवित्र ग्रंथ है जो मनुष्य को सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है | मृत्यु के संभावित भय को दूर कर हमें कर्तव्यपरायण होने की शिक्षा देता है | मनुष्य को बताता है कि बिना फल की चिन्ता के किया गया कर्म सर्वश्रेष्ठ होता है | कर्म की सविस्तार चर्चा करते हुए गीता में कहा गया है “कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं न विकर्मण:, अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: |” (4/17) – कर्म की गति गहन है | “करमन की गति न्यारी |”

कर्म, अकर्म और विकर्म का परिपाक करके ही विचार करना चाहिये | याज्ञवल्क्य तथा अन्य स्मृतिकारों ने तो मानवता के पतन का करण ही यह बताया है कि यदि मनुष्य विधि नियम रूप से प्रतिपादित कर्मों का त्याग तथा निषिद्ध कर्मों की उपादेयता अर्थात इन्द्रियों को अनुशासित सीमा के अतिरिक्त प्रवाहित होने देगा तो मानवता का पतन निश्चित है “विहितस्यानुष्ठानात् निन्दितस्य च सेवनात् अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणाम् नरः पतनमृच्छति |”

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि कौन से कर्म कर्तव्य हैं और कौन से अकर्तव्य ? तथा मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है अथवा परतन्त्र ? और क्या भोग के बिना कर्मों का नाश और मुक्ति सम्भव है ? यद्यपि कर्म के रहस्य को समझने में बुद्धिमान पुरुषों की बुद्धि भी चकरा जाती है “किं कर्म किमकर्मेति कवयोSप्यत्र मोहिता: |” तथापि गीता में इसका अत्यन्त युक्तियुक्त वर्णन उपलब्ध होता है | गीता का तृतीय अध्याय तो कर्मयोग के नाम से ही जाना जाता है, किन्तु अन्य अनेकों स्थानों पर भी कर्म की चर्चा आई है, जो भक्तिमिश्रित है |

कर्म की तीन संज्ञाएँ बताई गई हैं – कर्म, अकर्म और विकर्म | इनमें पहली संज्ञा है कर्म | मन वाणी और शरीर से होने वाली विधिसंगत उत्तम क्रिया ही कर्म है | किन्तु ऐसी क्रिया भी कर्ता के भावों की भिन्नता के कारण अकर्म या विकर्म बन जाती है | जैसे फल की इच्छा से शुद्ध भावनापूर्वक जो यज्ञ तप दान सेवा आदि विधिसंगत उत्तम कर्म किया जाता है वह कर्म होता है | किन्तु यदि उन्हीं विधेय कर्मों के फल की कामना के रूप में अशुद्ध भावना है तो वह कर्म विधेय होते हुए भी उसमें तमोगुण आ जाने के कारण विकर्म बन जाता है “मूढ़ग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः, परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् |” (17/19)

इसी प्रकार आसक्तिरहित भगवदर्पण बुद्धि से अपना कर्तव्य समझ कर जो कर्म किया जाता है, कर्तापन के अभिमान से रहित होकर जो कर्म किया जाता है वह अकर्म हो जाता है “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्, यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् | शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:, सन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ||” (9/27,28) इस प्रकार के भावार्थयुक्त अनेकों कथन गीता में यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं |

दूसरे प्रकार के कर्म विकर्म कहलाते हैं | ये कर्म निषिद्ध होने के कारण दुःखदायी होते हैं | ये कर्म निन्दित होते हुए भी यदि शुद्ध फल की कामना से किये जाएँ तो कर्म बन जाते हैं “जातस्य हि ध्रुवोर्मृत्यु: ध्रुवं जन्म मृतस्य च, तस्मादपरिहार्येSर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि |” (2/27) जैसे कि हिंसा निषिद्ध कर्म है, किन्तु लोककल्याणार्थ यदि किसी आतंकी का वध करना पड़ जाए तो उसमें लोककल्याण की शुद्ध भावना निहित होने के कारण वह विकर्म भी कर्म की श्रेणी में आ जाता है | इसी प्रकार आसक्ति और अहंकार से रहित होकर शुद्ध भाव से किये गए विकर्म भी अकर्म हो जाते हैं “सुखसु:खे समं कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ, ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि |” (2/38) तथा “यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते, हत्वापि सा इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते |” (18/17)

कर्मों की तीसरी संज्ञा है अकर्म | जो कर्म या कर्मत्याग किसी फल की उत्पत्ति का कारण न हो वह अकर्म हो जाता है “प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्, आत्मान्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते || दु:खेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्प्रह:, वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते || यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्, नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||” (2/55-57)

कर्ता के भावानुसार कर्म और विकर्म की भाँति अकर्म भी कर्म या विकर्म हो जाता है | यदि किसी व्यक्ति को कर्म त्यागने के पश्चात यह अभिमान आ जाए कि उसने तो कर्मों का त्याग किया है तो यह “त्यागरूप” कर्म हो जाएगा | इसी प्रकार स्वार्थ के कारण या दूसरों को ठगने के लिये कर्मत्याग विकर्म हो जाता है | “कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्, इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ||” (3/6) तथा “नियतस्य तु सन्यास: कर्मणो नोपपद्यते, मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तिते | दु:खमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन, स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ||” (18/7,8)

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ध्यान के लिए स्वयं को तैयार करना – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के लिए स्वयं को तैयार करना :

ध्यान के अभ्यास के लिए आपने अपने लिए उचित स्थान और अनुकूल समय का निर्धारण कर लिया तो समय की नियमितता भी हो जाएगी | अब आपको स्वयं को तैयार करना है ध्यान के अभ्यास के लिए | इस विषय में क्रमबद्ध रूप से तैयारी करनी होगी | इसी क्रम में…

प्रथम चरण – ध्यान के अभ्यास के लिए शरीर को तैयार करना :

सबसे पहले शरीर को बाह्य स्तर पर तैयार करने की आवश्यकता है | आपका शरीर यदि ऊर्जावान, सुखी, तनावरहित और स्वच्छ होगा तो ध्यान का अभ्यास भी सरल हो जाएगा | स्नान करके अथवा केवल हाथ मुँह और पैर धो लेने से भी आप स्वयं को चुस्त अनुभव करने लगेंगे | साथ ही प्रातःकाल उठने के बाद नित्य कर्म – मल मूत्र त्याग – करने के बाद स्वयं को ध्यान के लिए तैयार करते हैं तो आपका शरीर ध्यान में सुविधा का अनुभव करेगा |

द्वितीय चरण – शरीर को ढीला छोड़ना और खींचना  (Relaxation and Stretch Exercises) :

कुछ लोग सारी रात सोने के बाद जब प्रातःकाल नींद से जागते हैं तो उन्हें शरीर में अकड़ाहट और कुछ दर्द का अनुभव होता है | इस स्थिति में गर्म जल से स्नान और शरीर को धीरे धीरे खींचने के अभ्यास (stretch exercises) आपके शरीर के लिए ध्यान में बैठने में सहायक होंगे |

हठयोग के आसन विशेष रूप से शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए और उसे इतना दृढ़ और लचीला बनाने के लिए ही विकसित किये गए हैं कि ध्यान के लिए आराम से बैठा जा सके | ये आसन शरीर को कोमल बनाते हैं | किसी योग्य प्रशिक्षक से इन अभ्यासों को व्यक्तिगत रूप से सीखना चाहिए |

कमर और टाँगों को कसने और ढीला छोड़ने के अभ्यासों से ध्यान में सुविधा होगी | कुछ मिनट के लिए शरीर को कसने जैसे योगासन आपके ध्यान की गुणवत्ता में वृद्धि करेंगे | तनावपूर्ण aerobic exercises के विपरीत हठयोग के आसन न तो आप थकाते ही हैं और न ही आपके शरीर को आवश्यकता से अधिक फुर्तीला बना देते हैं | अपितु आपको धीरे धीरे  चुस्त बनाते हैं, माँसपेशियों को आराम पहुँचाते हैं, मानसिक तनाव को दूर करने में सहायक होते हैं और आपके ध्यान को केन्द्रित करने में सहायता पहुँचाते हैं |

आरम्भ में ध्यान से पहले पाँच से दस मिनट शरीर को कसने और विश्रान्त करने के अभ्यास कीजिए ताकि आपका शरीर ध्यान के लिए तैयार हो जाए |

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