श्री कृष्ण जन्माष्टमी

कल से देश भर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन और उल्लासपूर्ण पर्व की धूम मची हुई है | सभी को भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ |

वास्तव में श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व इतना भव्य है कि न केवल भारतीय इतिहास के लिये, वरन विश्व के इतिहास के लिये भी अलौकिक एवम् आकर्षक है और सदा रहेगा | उन्होंने विश्व के मानव मात्र के कल्याण के लिये अपने जन्म से लेकर निर्वाण पर्यन्त अपनी सरस एवं मोहक लीलाओं तथा परम पावन उपदेशों से अन्तः एवं बाह्य दृष्टि द्वारा जो अमूल्य शिक्षण मानव मात्र को दिया वह किसी वाणी अथवा लेखनी की वर्णनीय शक्ति एवं मन की कल्पना की सीमा में नहीं आ सकता |

श्री कृष्ण षोडश कला सम्पन्न पूर्णावतार होने के कारण “कृष्णस्तु भगवान स्वयम्” हैं | उनका चरित्र ऐसा है कि हर कोई उनकी ओर खिंचा चला आता है | कृष्ण एक ऐसा विराट स्वरूप हैं कि किसी को उनका बालरूप पसन्द आता है तो कोई उन्हें आराध्य के रूप में देखता है तो कोई सखा के रूप में | किसी को उनका मोर मुकुट और पीताम्बरधारी, यमुना के तट पर कदम्ब वृक्ष के नीचे वंशी बजाता हुआ प्राणप्रिया राधा के साथ प्रेम रचाता प्रेमी का रूप भाता है तो कोई उनके महाभारत के पराक्रमी और रणनीति के ज्ञाता योद्धा के रूप की सराहना करता है और उन्हें युगपुरुष मानता है | वास्तव में श्रीकृष्ण युगप्रवर्तक पूर्ण पुरूष हैं । वास्तव में श्रीकृष्ण एक ऐसे प्रेममय, दयामय, दृढ़व्रती, धर्मात्मा, नीतिज्ञ, समाजवादी दार्शनिक, विचारक, राजनीतिज्ञ, लोकहितैषी, न्यायवान, क्षमावान, निर्भय, निरहंकार, तपस्वी एवं निष्काम कर्मयोगी हैं जो लौकिक मानवी शक्ति से कार्य करते हुए भी अलौकिक चरित्र के महामानव हैं…

कहने का अर्थ यह कि कृष्ण के चरित्र में एक आदर्श पुत्र, आदर्श सखा, आदर्श प्रेमी और पति, आदर्श मित्र, निष्पक्ष और निष्कपट व्यवहार करने वाले उत्कृष्ट राजनीतिक कुशलता वाले एक आदर्श राजनीतिज्ञ, आदर्श योद्धा, आदर्श क्रान्तिकारी, उच्च कोटि के संगीतज्ञ इत्यादि वे सभी गुण दीख पड़ते हैं जो उन्हें पूर्ण पुरुष बनाते हैं | कोई भी साधारण मानव श्रीकृष्ण की तरह समाज की प्रत्येक स्थिति को छूकर, सबका प्रिय होकर राष्ट्रोद्धारक बन सकता है |

इसी अवसर पर प्रस्तुत है श्री कृष्णाष्टकम्…

भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनम्, स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम् |

सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकम्, अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम् ||

मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनम्, विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् |

करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरम्, महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ||

कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलम्, व्रजांगनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम् |

यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया, युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ||

सदैव पादपंकजं मदीयमानसे निजम्, दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम् |

समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणम्, समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम् ||

भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकम्, यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् |

दृगन्तकान्तभंगिनं सदा सदालिसंगिनम्, दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम् ||

गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरम्, सुरद्द्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनम् |

नवीनगोपनागरं नवीनकेलिलम्पटम्, नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम् ||

समस्तगोपनन्दनं हृदम्बुजैकमोदनम्, नमामि कुंजमध्यगं प्रसन्नभानुशोभनम् |

निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकम्, रसालवेणुगायकं नमामि कुंजनायकम् ||

विदग्धगोपिकामनोमनोज्ञतल्पशायिनम्, नमामि कुंजकानने प्रवृद्धवन्हिपायिनम् |

किशोरकान्तिरंजितं दृगंजनं सुशोभितम्, गजेन्द्रमोक्षकारिणं नमामि श्रीविहारिणम् ||

यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा, मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम् |

प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान्, भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान् ||

भाव है कि बृज भूमि के जो एकमात्र आभूषण हैं, समस्त पापों को जो नष्ट कर देते हैं, अपने भक्तों को जो आनन्दित करते हैं, मस्तक पर मोर मुकुट और हाथों में सुरीली वंशी धारण करते हैं, जो काम कला के सागर हैं और कामदेव का मान मर्दन करने वाले हैं, सुन्दर विशाल नेत्रों वाले, ब्रज गोपों का शोक हरण करने वाले, कर कमलों में जिन्होंने गिरिराज को धारण किया था, जिनिकी चितवन मनोहर है, जिन्होंने देवराज इन्द्र का भी मान मर्दन कर दिया था, जिनके कानों में कदम्ब पुष्पों के कुण्डल शोभायमान होते हैं, जो बृजबालाओं के एकमात्र आधार हैं, जन जन के मनरूपी सरोवर में जिनके चरणकमल विराजमान रहते हैं, अत्यन्त सुन्दर अलकों वाले, जिन्होंने पृथिवी का भार कम करने का संकल्प लिया हुआ है और जो संसार सागर के कर्णधार हैं, जिनका कटाक्ष अत्यन्त कमनीय है, नित्य नूतन लीला जो करते हैं, जिन्होंने बिजली जैसी आभा से युक्त पीताम्बर धारण किया हुआ है, जो दैदीप्यमान सूर्य के समान शोभायमान हैं और समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं, सुमधुर वेणुवादन करते जो गान करते हैं, जो कुंजवन में बढ़ी हुई दावाग्नि का पान कर जाते हैं, ऐसे नन्द नन्दन को हम भजन करते हुए नमन करते हैं | हम जहाँ भी और जिस भी परिस्थिति में रहें श्री कृष्ण की कथाओं का पाठ हम निरन्तर करते रहें…

एक बार पुनः श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/03/shree-krishna-janmashtami-3/

 

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श्री कृष्ण जन्माष्टमी

श्री कृष्ण जन्म महोत्सव

रविवार 2 सितम्बर 2018 को स्मार्तों की श्री कृष्ण जन्माष्टमी है और सोमवार 3 सितम्बर को वैष्णवों की श्री कृष्ण जयन्ती है | उससे पूर्व कल यानी शनिवार 1 सितम्बर को भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम की जयन्ती है | सर्वप्रथम सभी को बलभद्र जयन्ती और श्री कृष्ण जन्म महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ…

कल भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को भगवान् श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म महोत्सव मनाया जाता है और इस प्रकार श्री कृष्ण जन्म महोत्सव का भी आरम्भ हो जाता है | बलराम – जिन्हें बलभद्र और हलायुध भी कहा जाता है – भगवान विष्णु के अष्टम अवतार माने जाते हैं | इन्हें शेषनाग का अवतार भी माना जाता है | हलायुध नाम होने के कारण ही भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को हल षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है |

बलभद्र

उसके बाद दो दिन भगवान् श्री कृष्ण का जन्म महोत्सव धूम धाम के साथ मनाया जाता है | दो दिन इसलिए कि प्रथम दिन स्मार्तों की जन्माष्टमी होती है और दूसरे दिन वैष्णवों की | प्रायः जन सामान्य के मन में जिज्ञासा होती है कि पञ्चांग में स्मार्तों का व्रत और वैष्णवों का व्रत लिखा होता, पर स्मार्त और वैष्णव की व्याख्या क्या है ?

सामान्य रूप से जो लोग शिव की उपासना करते हैं उन्हें शैव कहा जाता है, जो लोग भगवान् विष्णु के उपासक होते हैं उन्हें वैष्णव कहा जाता है और जो लोग माँ भगवती यानी शक्ति के उपासक होते हैं वे शाक्त कहलाते हैं | किन्तु इसी को कुछ सरल बनाने की प्रक्रिया में केवल दो ही मत व्रत उपवास आदि के लिए प्रचलित हैं – स्मार्त और वैष्णव | जो लोग पञ्चदेवों के उपासक होते हैं वे स्मार्त कहलाते हैं – पञ्चदेवों के अन्तर्गत गणेश, द्वादश आदित्य, रूद्र, विष्णु और माँ भगवती को अंगीकार किया गया है | जो लोग नित्य नैमित्तिक कर्म के रूप में इन पाँच देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं वे स्मार्त कहलाते हैं और ये लोग गृहस्थ धर्म का पालन करते हैं | जो लोग केवल भगवान् विष्णु की उपासना करते हैं और मस्तक पर तिलक, भुजाओं पर चक्र और शंख आदि धारण करते हैं तथा प्रायः सन्यासी होते हैं उन्हें वैष्णव कहा जाता है |

वैष्णव-शैव-शाक्त

स्मार्तों के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पहले दिन होती है – जिस दिन अर्द्ध रात्रि को अष्टमी तिथि रहे तथा श्री कृष्ण के जन्म के समय अर्थात अर्द्धरात्रि को रोहिणी नक्षत्र भी रहे | और वैष्णवों की जन्माष्टमी दूसरे दिन होती है | कुछ लोग इसे इस प्रकार भी मानते हैं कि जिस दिन मथुरा में श्री कृष्ण का जन्म हुआ था उस दिन स्मार्तों की जन्माष्टमी होती है और दूसरे दिन जब कृष्ण को नन्दनगरी में पाया गया उस दिन वैष्णवों की जन्माष्टमी होती है जिसे नन्दोत्सव के नाम से भी जाना जाता है |

इस वर्ष रविवार दो सितम्बर को सूर्योदय से लेकर रात्रि आठ बजकर सैंतालीस मिनट तक सप्तमी तिथि है और उसके बाद अष्टमी तिथि का आगमन हो जाएगा | साथ ही रात्रि 08:49 से आरम्भ होकर तीन सितम्बर को रात्रि 08;04 तक रोहिणी नक्षत्र भी रहेगा | किन्तु अष्टमी तिथि 07:19 तक रहेगी | अतः स्मार्तों का श्री कृष्ण जन्म महोत्सव दो सितम्बर को मनाया जाएगा, जिस दिन पूरा दिन उपवास रखने के बाद अर्द्धरात्रि में व्रत का पारायण करेंगे |

इस दिन भानु सप्तमी भी है | भानु सप्तमी – अर्थात जब रविवार के दिन सप्तमी तिथि रहे उसे भानु सप्तमी कहते हैं और इस दिन भगवान् सूर्य की उपासना की जाती है |

वैष्णवों की कृष्ण जन्माष्टमी तीन सितम्बर को होगी और रात्रि सात बजकर उन्नीस मिनट तक उनका व्रत का पारायण हो जाएगा क्योंकि उसके बाद नवमी तिथि का आगमन हो जाएगा |

श्री कृष्ण जन्म महोत्सव चाहे स्मार्त परम्परा से मनाया जाए अथवा वैष्णव परम्परा से – पूरा देश में इन दो तीन दिनों तक उत्सव का वातावरण विद्यमान रहता है | कहीं दही हांडी, तो कहीं भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का मंचन… कहीं कृष्ण के बालरूप की झाँकियाँ… समूचा देश जैसे कृष्ण के रंग में रंग जाता है…

Shree Krishna Janmashtami

अस्तु, भगवान् कृष्ण की ही भाँति हम सब भी अन्याय का नाश और न्याय की रक्षा का संकल्प लें… इसी कामना के साथ सभी को भगवान् श्री कृष्ण के जन्म महोत्सव की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/30/shree-krishna-janmashtami/

 

शिवस्तुति:

आज श्रावण कृष्ण त्रयोदशी / चतुर्दशी को प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि का पावन पर्व है | हम सभी ने देखा काँवड़ में गंगाजल भर कर लाने वाले काँवड़ यात्री शिवभक्तों का उत्साह | न जाने कहाँ कहाँ से आकर पूर्ण श्रद्धा के साथ हरिद्वार ऋषिकेश तक की लम्बी यात्रा करके ये काँवड़ यात्री गंगा से जल भरकर लाते हैं और शिवरात्रि के दिन यानी आज अपने अपने गाँव शहर जाकर बाबा भोले शंकर का श्रद्धा भक्तिपूर्वक अभिषेक करते हैं |

वर्ष में प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की शिवरात्रि मास शिवरात्रि कहलाती है | इनमें दो शिवरात्रि विशेष महत्त्व की मानी जाती हैं – फाल्गुन माह की शिवरात्रि जिसे महाशिवरात्रि भी कहा जाता है और इसे शिव-पार्वती के विवाह का प्रतीक माना जाता है | और दूसरी ये श्रावण माह की मास शिवरात्रि | यों तो पूरा श्रावण माह ही भगवान् शिव की पूजा अर्चना और अभिषेक के लिए नियत होता है, किन्तु मान्यता है कि उसमें भी शिवरात्रि के दिन अभिषेक करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है | इसीलिए साधक आज पूरा दिन उपवास रखकर रात्रि को शिवलिंग का अभिषेक करते हैं |

आज रात्रि को 10:44 तक त्रयोदशी तिथि है और उसके बाद चतुर्दशी तिथि का आगमन होगा | यों तो सारा दिन ही शिवाभिषेक होता रहेगा, किन्तु सायंकाल प्रदोषकाल से भगवान् शिव की विशेष पूजा अर्चना आरम्भ हो जाएगी जो कल प्रातः तक चलती रहेगी | ज्योतिषीय यानी Astrologer के दृष्टिकोण से देखें तो प्रदोषकाल में वणिज करण, वज्र योग और पुनर्वसु नक्षत्र रहेगा और अर्द्धरात्रि के अभिषेक के समय सिद्धि योग आ जाएगा | तो इस शुभावसर पर प्रस्तुत है स्कन्द पुराण के कुमारिका खण्ड में स्कन्द मुनि द्वारा की गई भगवान् शिव की स्तुति:

|| अथ श्रीस्कन्दमहापुराणे कुमारिकाखण्डे शिवस्तुति: ||

स्कन्द उवाच:
नमः शिवायास्तु निरामयाय नमः शिवायास्तु मनोमयाय |
नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय ||
नमो भवायास्तु भवोद्भवाय नमोऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय |
नमोऽस्तु ते गूढमहाव्रताय नमोऽस्तु मायागहनाश्रयाय ||

नमोऽस्तु शर्वाय नमः शिवाय नमोऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय |
नमोऽस्तु कालाय नमः कलाय नमोऽस्तु ते कालकलातिगाय ||
नमो निसर्गात्मकभूतिकाय नमोऽस्त्वमेयोक्षमहर्द्धिकाय |
नमः शरण्याय नमोऽगुणाय नमोऽस्तु ते भीमगुणानुगाय ||
नमोऽस्तु नानाभुवनाधिकर्त्रे नमोऽस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे |
नमोऽस्तु कर्मप्रसवाय धात्रे नमः सदा ते भगवन् सुकर्त्रे ||
अनन्तरुपाय सदैव तुभ्यमसह्यकोपाय सदैव तुभ्यम् |
अमेयमानाय नमोऽस्तु तुभ्यं वृषेन्द्रयानाय नमोऽस्तु तुभ्यम् ||
नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमोऽस्तु ते व्याधिगणापहाय |
चराचरायाथ विचारदाय कुमारनाथाय नमः शिवाय ||
ममेश भूतेश महेश्वरोऽसि कामेश वागीश बलेश धीश |
क्रोधेश मोहेश परापरेश नमोऽस्तु मोक्षेश गुहाशयेश ||

भाव है कि :— समस्त प्रकार के रोग-शोक से रहित, सबके मनों में निवास करने वाले, समस्त देवता जिनकी पूजा करते हैं, जो अपने भक्तों पर सदा कृपादृष्टि रखते हैं, समस्त चराचर की उत्पत्ति-पालन-विनाश का जो कारण हैं, जिन्होंने काम का संहार किया, जो मायारूपी गहन वन के आश्रय हैं, पुरातन सिद्धरूप, कालरूप, स्वाभाविक ऐश्वर्य व समृद्धि से युक्त, जिनकी महिमा अपरिमित है, काल की कला का भी अतिक्रमण करने वाले, सबको शरण देने वाले, निर्गुण ब्रह्मस्वरूप, अत्यन्त गुणी गणों द्वारा जिनका अनुसरण किया जाता है, समस्त भुवनों पर जिनका अधिकार है, जो सबके धाता और कर्ता हैं, जिनके अनन्त रूप हैं, जिनका कोप दुष्टों के लिए असह्य है, जिनके स्वरूप को समझ पाना असम्भव है, वृषभराज जिनका वाहन हैं, जो स्वयं महौषधिरूप होने के कारण समस्त व्याधियों के नाशक हैं, तत्त्व का निर्णय करने वाली शक्ति जिनके द्वारा प्राप्त होती है, परम कल्याणस्वरूप कुमारनाथ हैं, समस्त भोगों-वाणी-बल-बुद्धि के अधिपति, क्रोध और मोह पर शासन करने वाले, हृदय मध्य निवास करने वाले परापर के स्वामी और मुक्तिदाता परम स्वरूप आपको नमस्कार है |

शिव उवाच:
ये च सायं तथा प्रातस्त्वनकृतेन स्तवेन माम् ।
स्तीष्यन्ति परया भक्त्या श्रृणु तेषां च यत्फलम् ॥  ९  ॥
न व्याधिर्न च दारिद्र्यं न च चैवेष्टवियोजनम् ।
भुक्त्वा भोगान दुर्लभांश्च मभ यास्यन्ति सह्य ते ॥  १० ॥

स्कन्द मुनि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने कहा कि हे मुनि! जो लोग सायंकाल और प्रातःकाल श्रद्धाभक्ति पूर्वक तुम्हारे द्वारा कही गई इस स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे उन्हें अभीष्ट फल की प्राप्ति होगी तथा हर प्रकार की व्याधि और दारिद्रय से मुक्ति प्राप्त होगी | उनका कभी अपने प्रियजनों से वियोग नहीं होगा और संसार में दुर्लभ भोगों का भोग करते हुए अन्त में परमधाम को प्राप्त करेंगा |

|| इति श्रीस्कन्दमहापुराणे कुमारिकाखण्डे शिवस्तुति: सम्पूर्णा ||

देवाधिदेव भगवान् शंकर सभी की रक्षा करते हुए सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/09/shiva-stuti/

देवशयनी एकादशी

देवशयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी, पद्मनाभा एकादशी

हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्त्व है | प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती है, और अधिमास हो जाने पर ये छब्बीस हो जाती हैं | इनमें से आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है | इस एकादशी को पद्मनाभा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है | तथा उसके लगभग चार माह बाद सूर्य के तुला राशि में आ जाने पर आने वाली कार्तिक शुक्ल एकादशी देव प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है |

“आषाढ़ शुक्लपक्षे तु शयनी हरिवासर: |

दीपदानेन पलाशपत्रे भुक्त्याव्रतेन च

चातुर्मास्यं नयन्तीह ते नरा मम वल्लभा: ||” – पद्मपुराण उत्तरखण्ड / 54/24, 32

मान्यता है कि इन चार महीनों में – जिन्हें चातुर्मास कीं संज्ञा दी गई है – भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन हेतु प्रस्थान कर जाते हैं | भगवान विष्णु की इस निद्रा को योग निद्रा भी कहा जाता है | इस अवधि में यज्ञोपवीत, विवाह, गृह प्रवेश आदि संस्कार वर्जित होते हैं |

भारतीय संस्कृति में व्रतादि का विधान पूर्ण वैज्ञानिक आधार पर मौसम और प्रकृति को ध्यान में रखकर किया गया है | चातुर्मास अर्थात आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर श्रावण, भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीने वर्षा के माने जाते हैं | भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए वर्षा के ये चार महीने कृषि के लिए बहुत उत्तम माने गए हैं | किसान विवाह आदि समस्त सामाजिक उत्तरदायित्वों से मुक्त रहकर इस अवधि में पूर्ण मनोयोग से कृषि कार्य कर सकता था | आवागमन के साधन भी उन दिनों इतने अच्छे नहीं थे | साथ ही चौमासे के कारण सूर्य चन्द्र से प्राप्त होने वाली ऊर्जा भी मन्द हो जाने से जीवों की पाचक अग्नि भी मन्द पड़ जाती है | अस्तु, इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए जो व्यक्ति इन चार महीनों में जहाँ होता था वहीं रहकर अध्ययन अध्यापन करते हुए आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता था तथा खान पान पर नियन्त्रण रखता था ताकि पाचन तन्त्र उचित रूप से कार्य कर सके | और वर्षा ऋतु बीत जाते ही देव प्रबोधिनी एकादशी से समस्त कार्य पूर्ववत आरम्भ हो जाते थे |

सुप्तेत्वयिजगन्नाथ जगत्सुप्तंभवेदिदम् । विबुद्धेत्वयिबुध्येतजगत्सर्वचराचरम् ॥

हे जगन्नाथ ! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सो जाता है तथा आपके जागने पर समस्त चराचर पुनः जागृत हो जाता है तथा फिर से इसके समस्त कर्म पूर्ववत आरम्भ हो जाते हैं…

आज देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास का आरम्भ हो रहा है… देवशयनी एकादशी सभी के लिए शुभ हो और चातुर्मास में सभी अपने अपने कर्तव्य धर्म का सहर्ष पालन करें… यही शुभकामना अपने साथ ही सभी के लिए… पूरा पढ़ने के लिए क्लिक करें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/23/devashayani-ekadashi/

 

संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में गर्भाधान संस्कार का ही महत्त्व है | क्योंकि गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तान की उत्पत्ति है | अतः उत्तम सन्तान की कामना करने वाले माता पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन दोनों को पवित्र तथा स्वस्थ रखने के लिए यह संस्कार किया जाता था |

गर्भः संधार्यते येन कर्मणा तद्गर्भाधानमित्यनुगतार्थं कर्मनामधेयम् | – पूर्वमीमांसा 1/4/2

निषिक्तो यत्प्रयोगेण गर्भः सन्धार्यते स्त्रिया | तद्गर्भलम्भनं नाम कर्म प्रोक्तं मनीषिभ: || – शौनक

वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् | कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च || – मनु

गर्भः सन्धार्यते येन कर्मणा तद् गर्भाधानमित्यनुगतार्थं कर्मनामधेयम् | – जैमिनी

सभी के भाव स्पष्ट हैं – जिस संस्कार कर्म के द्वारा स्त्रियाँ गर्भ धारण करती हैं वह गर्भाधान संस्कार (Garbhaadhaan Sanskaar) कहलाता है |

गर्भाधान और इसके बाद किये जाने वाले पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण आदि संस्कार केवलमात्र धार्मिक अनुष्ठान – Rituals – भर ही नहीं हैं | इनका आध्यात्मिक महत्त्व है | इन समस्त संस्कारों का उद्देश्य यही था कि गर्भ में भी और जन्म के बाद भी शिशु स्वस्थ तथा प्रसन्नचित्त रहे तथा धीरे धीरे इस समस्त सृष्टि से उसका सम्बन्ध प्रगाढ़ हो सके | गर्भ धारण करने के बाद अनेक प्रकार के प्राकृतिक दोषों के आक्रमण होते रहने की सम्भावना होती है, जिनसे बचने के लिए यह संस्कार किया जाता है | इसके करने से गर्भ सुरक्षित रहता है तथा सुयोग्य सन्तान उत्पन्न होती है | चिकित्सा शास्त्र भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि गर्भाधान के समय पति-पत्नी के मन के जो भाव होंगे उनका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य पड़ेगा |

यही कारण है कि पति पत्नी दोनों को यह सिखाया जाता था कि विवाह के बाद सबसे पहले वे यह विचार करें कि उन्हें कब सन्तान उत्पन्न करनी है और किस प्रकार की सन्तान की उनकी कामना है | साथ ही अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें और उसके लिए जो भी आवश्यक उपाय करने हों वे करें | उसके बाद गर्भाधान का विचार करें | अर्थात गर्भाधान से पूर्व माता पिता दोनों को शारीरिक और मानसिक रुप से स्वयं को तैयार करना आवश्यक है, क्योंकि आने वाली सन्तान उनकी ही आत्मा का प्रतिरुप होती है | इसीलिए तो पुत्र को आत्मज और पुत्री को आत्मजा कहा जाता है |

किसी भी व्यक्ति को अपना तन और मन दोनों स्वस्थ तथा प्रसन्न रखने के लिए सबसे पहले उत्तम और पौष्टिक भोजन ग्रहण करना होगा | माता जैसा भोजन करेगी उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य पड़ेगा | साथ ही उचित व्यायाम भी शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है | उसके बाद घर का वातावरण आनन्दमय होगा तो मन स्वतः प्रसन्नता से आन्दोलित रहेगा | इसके अतिरिक्त माता पिता की मानसिक परिपक्वता के लिए उत्तम साहित्य का अध्ययन, मन को प्रसन्न करने वाला तथा ज्ञानवर्द्धक वार्तालाप और श्रेष्ठ लोगों का साहचर्य भी आवश्यक है | इतना सब कुछ हो जाएगा तो उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य ही पड़ेगा तथा माता पिता स्वयं ही अपने जन्म लेने वाले शिशु के लिए अच्छे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं | महाभारत को यदि इतिहास ग्रन्थ मानते हैं तो अभिमन्यु का उदाहरण सबको ज्ञात ही है |

क्रमशः…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/06/22/samskaras-3/

संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – एक ऐसी यात्रा – एक ऐसा चक्र जो निरन्तर गतिशील रहता है आरम्भ से अवसान और पुनः आरम्भ से पुनः अवसान के क्रम में – यही है भारतीय दर्शनों का सार जो निश्चित रूप से आशा और उत्साह से युक्त है – समस्त प्रकृति का यही तो नियम है | ये समस्त सूर्य चाँद तारकगण उदित होते हैं, इनका अवसान होता है पुनः उदित होने के लिए | समस्त प्रकृति रज:धर्मिणी है इसीलिए वह रजस्वला भी होती है | रजस्वला होने के कारण ही अपने गर्भ से समस्त वनस्पतियों इत्यादि को जन्म देती है | वनस्पतियाँ पुष्पादि सब जन्म लेते हैं – पतझर में सब झर जाते हैं – सूख कर नष्ट हो जाते हैं पुनः नवीन रूप में जन्म लेने के लिए | किसी प्रकार के नैराश्य के लिए वहाँ स्थान ही नहीं है – यदि कुछ है तो पुनः पुनः उदित होते रहने का – पुनः पुनः आरम्भ होते रहने का – नवांकुरों के पुनः पुनः पल्लवित होते रहने का उत्साह | मानव भी प्रकृति का ही एक अंग हैं और इसीलिए उसका भी जन्म-मृत्यु-ज़रा अवस्थाओं के कर्तव्यों को पूर्ण कर लेने के बाद अवसान हो जाता है – ताकि पुनः जन्म लेकर वह अपने शेष कर्मों को पूर्ण कर सके | ताकि यह उत्साह बना रहे और व्यक्ति समस्त बाधाओं को पार करते हुए अपने कर्ममार्ग पर निरन्तर गतिशील रहते हुए अग्रसर रहे – इसी के लिए संस्कारों की आवश्यकता का अनुभव हुआ |

तो इस प्रकार गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यन्त जितने भी संकार व्यक्ति के किये जाते हैं वे सभी इस जन्म से पुनर्जन्म तक की यात्रा के ही तो विभिन्न मार्ग और विभिन्न पड़ाव हैं | संस्कारों की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि व्यक्ति सरलतापूर्वक आनन्दित भाव से इस यात्रा में आगे बढ़ सके | अन्यथा जन्म तो पशु का भी होता है, और पशु भी उसी परमात्मतत्व का एक अतिसूक्ष्म अणु है, किन्तु – क्योंकि उसे संस्कारित नहीं किया जाता इसलिए वह “पशु के समान” व्यवहार करता है | “पशु के समान” इसलिए कहा क्योंकि यदि हम चाहें अपने पशुओं को भी संस्कारित कर सकते हैं –  उन्हें भी बहुत कुछ सिखा सकते हैं – व्यवहार करना सिखा सकते हैं | यही व्यवहार सिखाने की प्रक्रिया संस्कार कहलाती है | मनुष्य क्योंकि बुद्धि का प्रयोग अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक करता है इसलिए उसके लिए संस्कारों की प्रक्रिया कुछ अलग प्रकार की होती है |

ऋषि गौतम ने 40 संस्कारों का उल्लेख किया है | महर्षि अंगिरा 25 संस्कारों की बात करते हैं | कहीं कहीं 48 संस्कार भी उपलब्ध होते हैं | किन्तु वर्तमान में षोडश संस्कारों का उल्लेख प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है :

गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो जातकर्म च |

नामक्रिया निष्क्रमणो अन्न्प्राशनं वपनक्रिया: ||

कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भ: क्रियाविधि: |

केशान्त स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह: ||

प्रेताग्नि संग्रहश्चैव संस्कारा: षोडश स्मृता: || (व्यासस्मृति 1/13-15)

अर्थात सबसे प्रथम गर्भाधान संस्कार है जो जन्म से पूर्व का अर्थात गर्भ धारण करने के समय किया जाने वाला संस्कार है | उसके बाद कुछ संस्कार बच्चे के जन्म से पूर्व किये जाते हैं और कुछ बाद में अन्तिम यात्रा पर्यन्त समय समय पर किये जाते रहते हैं | अपने इस लेख में हम विवाह आदि संस्कारों का सूक्ष्म वर्णन करेंगे, किन्तु गर्भ से पूर्व तथा बाद के संस्कारों का विस्तार से विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे |

क्रमशः…

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बुध का मिथुन में गोचर

बुध को सामान्यतः एक सौम्य ग्रह माना जाता है | मिथुन तथा कन्या राशियों और आश्लेषा, ज्येष्ठा तथा रेवती नक्षत्रों का अधिपतित्व इसे प्राप्त है | कन्या राशि बुध की उच्च राशि है तथा मीन में यह नीच का हो जाता है | सूर्य, शुक्र और राहु के साथ इसकी मित्रता तथा चन्द्रमा के साथ इसकी शत्रुता है और शनि, मंगल, गुरु और केतु के साथ यह तटस्थ भाव में रहता है | दस जून को प्रातः 7:33 के लगभग बुध का मिथुन राशि में प्रवेश होगा | वहाँ से 25 जून को 18:05 के लगभग कर्क राशि में प्रविष्ट हो जाएगा | तो, जानने का प्रयास करते हैं बुध के मिथुन राशि में गोचर के विभिन्न राशियों पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

मेष – आपके लिए तृतीयेश और षष्ठेश होकर बुध का गोचर आपके तृतीय भाव में अपनी ही राशि में हो रहा है | सम्भावना कुछ ऐसी प्रतीत होती है कि आवश्यकता होने पर आर्थिक रूप से भाई बहनों का सहयोग प्राप्त हो सकता है | यद्यपि कुछ विवाद भी सम्भव है, किन्तु अन्त में परिणाम आपके पक्ष में ही होगा |

वृष – आपका द्वितीयेश और पंचमेश होकर बुध का गोचर आपके दूसरे भाव में ही हो रहा है | आर्थिक दृष्टि से अनुकूलता होने के साथ ही आपकी वक्तव्यता तथा आपके लेखन में निखार इस अवधि में आ सकता है जिसके कारण आपसे लोग प्रभावित भी होंगे | आपके व्यवहार में उदारता, कोमलता एवं सौम्यता दिखाई देगी जिसका प्रभाव आपके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर निश्चित ही पड़ेगा | सन्तान के लिए भी समय अनुकूल प्रतीत होता है |

मिथुन – आपके लिए बुध योगकारक होकर अपनी ही राशि में लग्न में गोचर कर रहा है | परिवार में मंगलकार्यों का आयोजन हो सकता है | परिवार में परस्पर सौहार्द का वातावरण रहेगा और समय आमोद प्रमोद में व्यतीत होगा | सामाजिक गतिविधियों में भी वृद्धि की सम्भावना है | परिवारजनों का सहयोग अआप्को अपने कार्य में उपलब्ध होता रहेगा |

कर्क – कर्क राशि के लिए तृतीयेश और द्वादशेश होकर बुध का गोचर आपके बारहवें भाव में ही हो रहा है | भाई बहनों का सहयोग भी अपने कार्य में आपको प्राप्त रहने की सम्भावना है | कार्य के सिलसिले में आपको तथा आपके भाई बहनों को दूर पास की यात्राएँ भी करनी पड़ सकती हैं, किन्तु इन यात्राओं के दौरान आपको अपने तथा अपने भाई बहनों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा |

सिंह – आपके लिए बुध द्वितीयेश और एकादशेश होकर आपके एकादश में ही गोचर कर रहा है | आपके लिए विशेष रूप से भाग्योदय का समय प्रतीत होता है | व्यवसाय में प्रगति, नौकरी में पदोन्नति तथा अर्थ और यश प्राप्ति के संकेत हैं | साथ ही यदि आप कोई नया कार्य आरम्भ करना चाहते हैं तो उसके लिए भी अनुकूल समय प्रतीत होता है | बड़े भाई का सहयोग आपको प्राप्त रह सकता है |

कन्या – आपके लिए आपका लग्नेश तथा दशमेश होकर बुध योगकारक ग्रह है तथा दशम स्थान में गोचर कर रहा है | आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के योग हैं | समाज में आपका मान-सम्मान तथा प्रभाव में वृद्धि की सम्भावना है | साथ ही कार्य की दृष्टि से भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपको नवीन प्रोजेक्ट्स प्राप्त होते रह सकते हैं और आप लम्बे समय तक उनमें व्यस्त रह सकते हैं तथा उनके माध्यम से धनलाभ कर सकते हैं |

तुला – आपके लिए बुध भाग्येश तथा द्वादशेश भाग्य स्थान में ही गोचर कर रहा है | लम्बी विदेश यात्राओं के संकेत प्रतीत होते हैं | साथ ही यदि आपका कार्य किसी रूप में विदेशों से सम्बन्धित है तो उसमें उन्नति की भी सम्भावनाएँ हैं | इसके अतिरिक्त धर्म तथा आध्यात्मिकता की ओर आपकी रूचि बढ़ सकती है | आप किसी धार्मिक संस्था अथवा अस्पताल आदि के लिए धन दान भी करने की योजना बना सकते हैं |

वृश्चिक – आपके लिए बुध अष्टमेश और एकादशेश है तथा आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | कहीं से आकस्मिक लाभ की सम्भावना है | व्यावसायिक रूप्प से भी अप्रत्याशित सफलता की सम्भावना है | किन्तु आपके स्वभाव में नकारात्मकता आपके व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक जीवन पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है | साथ ही स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है |

धनु – आपके लिए सप्तमेश और दशमेश होकर बुध योगकारक हो जाता है तथा आपकी राशि से सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | आप तथा आपके जीवन साथी के लिए व्यावसायिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | पार्टनरशिप में कोई कार्य कर रहे हैं तो उसमें भी उन्नति की सम्भावना है | नौकरी में हैं तो पदोन्नति की भी सम्भावना है | लेखकों तथा बुद्धिजीवियों और मीडियाकर्मियों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है |

मकर – बुध आपका षष्ठेश और भाग्येश है तथा आपकी राशि से छठे भाव में गोचर कर रहा है | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसमें अनुकूल परिणाम की सम्भावना की जा सकती है | साथ ही बहुत समय से चली आ रही जोड़ों और माँसपेशियों में दर्द के इलाज़ का भी पता इस अवधि में लग सकता है | प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे लोगों के लिए समय अनुकूल फल देने वाला प्रतीत होता है किन्तु उन्हें परिश्रम अधिक करना पड़ेगा |

कुम्भ –  आपका पंचमेश और अष्टमेश होकर बुध आपकी राशि से पंचम भाव में गोचर कर रहा है | किसी प्रकार की अप्रत्याशित घटना की सम्भावना की जा सकती है | आपकी सन्तान तथा विद्यार्थियों के लिए यह गोचर विशेष रूप से अनुकूल प्रतीत होता है | किन्तु इसके साथ ही सन्तान के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है | साथ ही सन्तान के साथ किसी प्रकार की बहस से बचने का भी प्रयास आवश्यक है |

मीन – आपके लिए चतुर्थेश और सप्तमेश होकर बुध आपका योगकारक बन जाता है तथा आपके चतुर्थ भाव में ही गोचर कर रहा है | आपके तथा आपके जीवन साथी के लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आप कोई नया घर खरीदने की योजना बना सकते हैं | आपको अपने परिवारजनों का तथा मित्रों का सहयोग प्राप्त होता रहेगा तथा परिवार में सौहार्द का वातावरण रहने की सम्भावना है ||

ये समस्त फल सामान्य हैं | व्यक्ति विशेष की कुण्डली का व्यापक अध्ययन करके ही किसी निश्चित परिणाम पर पहुँचा जा सकता है | अतः कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन कराने के लिए किसी Vedic Astrologer के पास ही जाना उचित रहेगा |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

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