बुध का मिथुन में गोचर

बुध को सामान्यतः एक सौम्य ग्रह माना जाता है | मिथुन तथा कन्या राशियों और आश्लेषा, ज्येष्ठा तथा रेवती नक्षत्रों का अधिपतित्व इसे प्राप्त है | कन्या राशि बुध की उच्च राशि है तथा मीन में यह नीच का हो जाता है | सूर्य, शुक्र और राहु के साथ इसकी मित्रता तथा चन्द्रमा के साथ इसकी शत्रुता है और शनि, मंगल, गुरु और केतु के साथ यह तटस्थ भाव में रहता है | दस जून को प्रातः 7:33 के लगभग बुध का मिथुन राशि में प्रवेश होगा | वहाँ से 25 जून को 18:05 के लगभग कर्क राशि में प्रविष्ट हो जाएगा | तो, जानने का प्रयास करते हैं बुध के मिथुन राशि में गोचर के विभिन्न राशियों पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

मेष – आपके लिए तृतीयेश और षष्ठेश होकर बुध का गोचर आपके तृतीय भाव में अपनी ही राशि में हो रहा है | सम्भावना कुछ ऐसी प्रतीत होती है कि आवश्यकता होने पर आर्थिक रूप से भाई बहनों का सहयोग प्राप्त हो सकता है | यद्यपि कुछ विवाद भी सम्भव है, किन्तु अन्त में परिणाम आपके पक्ष में ही होगा |

वृष – आपका द्वितीयेश और पंचमेश होकर बुध का गोचर आपके दूसरे भाव में ही हो रहा है | आर्थिक दृष्टि से अनुकूलता होने के साथ ही आपकी वक्तव्यता तथा आपके लेखन में निखार इस अवधि में आ सकता है जिसके कारण आपसे लोग प्रभावित भी होंगे | आपके व्यवहार में उदारता, कोमलता एवं सौम्यता दिखाई देगी जिसका प्रभाव आपके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर निश्चित ही पड़ेगा | सन्तान के लिए भी समय अनुकूल प्रतीत होता है |

मिथुन – आपके लिए बुध योगकारक होकर अपनी ही राशि में लग्न में गोचर कर रहा है | परिवार में मंगलकार्यों का आयोजन हो सकता है | परिवार में परस्पर सौहार्द का वातावरण रहेगा और समय आमोद प्रमोद में व्यतीत होगा | सामाजिक गतिविधियों में भी वृद्धि की सम्भावना है | परिवारजनों का सहयोग अआप्को अपने कार्य में उपलब्ध होता रहेगा |

कर्क – कर्क राशि के लिए तृतीयेश और द्वादशेश होकर बुध का गोचर आपके बारहवें भाव में ही हो रहा है | भाई बहनों का सहयोग भी अपने कार्य में आपको प्राप्त रहने की सम्भावना है | कार्य के सिलसिले में आपको तथा आपके भाई बहनों को दूर पास की यात्राएँ भी करनी पड़ सकती हैं, किन्तु इन यात्राओं के दौरान आपको अपने तथा अपने भाई बहनों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा |

सिंह – आपके लिए बुध द्वितीयेश और एकादशेश होकर आपके एकादश में ही गोचर कर रहा है | आपके लिए विशेष रूप से भाग्योदय का समय प्रतीत होता है | व्यवसाय में प्रगति, नौकरी में पदोन्नति तथा अर्थ और यश प्राप्ति के संकेत हैं | साथ ही यदि आप कोई नया कार्य आरम्भ करना चाहते हैं तो उसके लिए भी अनुकूल समय प्रतीत होता है | बड़े भाई का सहयोग आपको प्राप्त रह सकता है |

कन्या – आपके लिए आपका लग्नेश तथा दशमेश होकर बुध योगकारक ग्रह है तथा दशम स्थान में गोचर कर रहा है | आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के योग हैं | समाज में आपका मान-सम्मान तथा प्रभाव में वृद्धि की सम्भावना है | साथ ही कार्य की दृष्टि से भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपको नवीन प्रोजेक्ट्स प्राप्त होते रह सकते हैं और आप लम्बे समय तक उनमें व्यस्त रह सकते हैं तथा उनके माध्यम से धनलाभ कर सकते हैं |

तुला – आपके लिए बुध भाग्येश तथा द्वादशेश भाग्य स्थान में ही गोचर कर रहा है | लम्बी विदेश यात्राओं के संकेत प्रतीत होते हैं | साथ ही यदि आपका कार्य किसी रूप में विदेशों से सम्बन्धित है तो उसमें उन्नति की भी सम्भावनाएँ हैं | इसके अतिरिक्त धर्म तथा आध्यात्मिकता की ओर आपकी रूचि बढ़ सकती है | आप किसी धार्मिक संस्था अथवा अस्पताल आदि के लिए धन दान भी करने की योजना बना सकते हैं |

वृश्चिक – आपके लिए बुध अष्टमेश और एकादशेश है तथा आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | कहीं से आकस्मिक लाभ की सम्भावना है | व्यावसायिक रूप्प से भी अप्रत्याशित सफलता की सम्भावना है | किन्तु आपके स्वभाव में नकारात्मकता आपके व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक जीवन पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है | साथ ही स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है |

धनु – आपके लिए सप्तमेश और दशमेश होकर बुध योगकारक हो जाता है तथा आपकी राशि से सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | आप तथा आपके जीवन साथी के लिए व्यावसायिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | पार्टनरशिप में कोई कार्य कर रहे हैं तो उसमें भी उन्नति की सम्भावना है | नौकरी में हैं तो पदोन्नति की भी सम्भावना है | लेखकों तथा बुद्धिजीवियों और मीडियाकर्मियों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है |

मकर – बुध आपका षष्ठेश और भाग्येश है तथा आपकी राशि से छठे भाव में गोचर कर रहा है | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसमें अनुकूल परिणाम की सम्भावना की जा सकती है | साथ ही बहुत समय से चली आ रही जोड़ों और माँसपेशियों में दर्द के इलाज़ का भी पता इस अवधि में लग सकता है | प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे लोगों के लिए समय अनुकूल फल देने वाला प्रतीत होता है किन्तु उन्हें परिश्रम अधिक करना पड़ेगा |

कुम्भ –  आपका पंचमेश और अष्टमेश होकर बुध आपकी राशि से पंचम भाव में गोचर कर रहा है | किसी प्रकार की अप्रत्याशित घटना की सम्भावना की जा सकती है | आपकी सन्तान तथा विद्यार्थियों के लिए यह गोचर विशेष रूप से अनुकूल प्रतीत होता है | किन्तु इसके साथ ही सन्तान के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है | साथ ही सन्तान के साथ किसी प्रकार की बहस से बचने का भी प्रयास आवश्यक है |

मीन – आपके लिए चतुर्थेश और सप्तमेश होकर बुध आपका योगकारक बन जाता है तथा आपके चतुर्थ भाव में ही गोचर कर रहा है | आपके तथा आपके जीवन साथी के लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आप कोई नया घर खरीदने की योजना बना सकते हैं | आपको अपने परिवारजनों का तथा मित्रों का सहयोग प्राप्त होता रहेगा तथा परिवार में सौहार्द का वातावरण रहने की सम्भावना है ||

ये समस्त फल सामान्य हैं | व्यक्ति विशेष की कुण्डली का व्यापक अध्ययन करके ही किसी निश्चित परिणाम पर पहुँचा जा सकता है | अतः कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन कराने के लिए किसी Vedic Astrologer के पास ही जाना उचित रहेगा |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/06/07/mercury-transit-gemini/

 

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केतु कवचम्

भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य और चन्द्रमा के परिक्रमा मार्गों को परस्पर काटते हुए दो बिन्दुओं के नाम हैं जो पृथिवी के सापेक्ष परस्पर एक दूसरे से विपरीत दिशा में 180 अंशों के कोण पर स्थित होते हैं | राहु की ही भाँति केतु भी कोई खगोलीय पिण्ड नहीं है, अपितु एक छाया ग्रह ही है | यह ग्रह आध्यात्मिकता, भावनाओं तथा अच्छे और बुरे कार्मिक प्रभावों का द्योतक भी है तथा व्यक्ति को आध्यात्म मार्ग में प्रवृत्त करने के लिए उसकी भौतिक सुख सुविधाओं का नाश तक करा सकता है | यह तर्क, बुद्धि, ज्ञान, वैराग्य, कल्पना, अन्तर्दृष्टि, मर्मज्ञता, विक्षोभ और अन्य मानसिक गुणों का कारक है। सर्पदंश तथा अन्य किसी प्रकार के विष के प्रभाव से मुक्ति दिलाने वाला भी माना जाता है | केतु की दशा में में किसी लम्बी बीमारी से भी मुक्ति प्राप्त हो सकती है | केतु को सर्प का धड़ भी माना गया है और माना जाता है कि जैसे सर के बिना केवल धड़ को कुछ भी दिखाई नहीं दे सकता उसी प्रकार केतु की दशा भी लोगों को दिग्भ्रमित कर सकती है | मानव शरीर में केतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है | कुछ Vedic Astrologer इसे नपुंसक ग्रह मानते हैं तो कुछ नर | इसका स्वभाव मंगल की भाँति उग्र माना जाता है तथा मंगल के क्षेत्र में जो कुछ भी आता है उन्हीं सबका प्रतिनिधित्व केतु भी करता है और “कुजवत केतु:” अर्थात कुज यानी मंगल के समान फल देता है | यह जातक की जन्म कुण्डली में राहु के साथ मिलकर कालसर्प योग भी बनाता है | यदि किसी भाव में केतु स्वग्रही ग्रह के साथ स्थित हो तो उस भाव, उस ग्रह तथा उसके साथ स्थित अन्य ग्रहों के शुभाशुभत्व में वृद्धिकारक होता है | साथ ही यदि द्वादश भाव में केतु स्थित हो तो अपनी दशा में यह मोक्षकारक भी माना गया है |

केतु को प्रसन्न करने तथा उसके अशुभत्व को कम करने के लिए प्रायः Vedic Astrologer केतुकवच के जाप का सुझाव देते हैं | केतु के इस कवच के ऋषि हैं त्रयम्बक तथा यह ब्रह्माण्डपुराण से उद्धृत है…

|| अथ श्री केतुकवचम् ||

अस्य श्रीकेतुकवचस्तोत्र मन्त्रस्य त्रयम्बक ऋषिः, अनुष्टप् छन्दः,  केतुर्देवता, कं बीजं, नमः शक्तिः, केतुरिति कीलकम्, केतुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ||

केतु करालवदनं चित्रवर्णं किरीटिनम् |

प्रणमामि सदा केतुं ध्वजाकारं ग्रहेश्वरम् ||

चित्रवर्णः शिरः पातु भालं धूम्रसमद्युतिः |

पातु नेत्रे पिंगलाक्षः श्रुती मे रक्तलोचनः ||

घ्राणं पातु सुवर्णाभश्चिबुकं सिंहिकासुतः |

पातु कंठं च मे केतुः स्कन्धौ पातु ग्रहाधिपः ||

हस्तौ पातु श्रेष्ठः कुक्षिं पातु महाग्रहः |

सिंहासनः कटिं पातु मध्यं पातु महासुरः ||

ऊरुं पातु महाशीर्षो जानुनी मेSतिकोपनः |

पातु पादौ च मे क्रूरः सर्वाङ्गं नरपिंगलः ||

य इदं कवचं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम् |

सर्वशत्रुविनाशं च धारणाद्विजयि भवेत् ||

|| इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे केतुकवचं सम्पूर्णम् ||

अन्त में, छाया ग्रह केतु हम सभी को अध्यात्म मार्ग में प्रवृत्त करते हुए सभी का कल्याण करे…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/06/01/ketu-kavacham/

 

 

 

श्री दशरथकृत शनि स्तुति:

शनि के विषय में अनेक प्रकार के पौराणिक उपाख्यान उपलब्ध होते हैं | शनि को सूर्य और उनकी पत्नी छाया का पुत्र तथा उचित कर्मफलों को प्रदान करने वाला न्यायाधीश माना जाता है | किन्तु साथ ही पिता सूर्य का शत्रु भी माना जाता है | शनि को स्वाभाविक मारक ग्रह माना जाता है | किन्तु सत्य तो यह है कि शनि प्रकृति में सन्तुलन का कारक है | Vedic Astrologer किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में शनि की स्थिति-युति-दृष्टि के आधार पर कुण्डली का अवलोकन करके यह ज्ञात कर पाते हैं कि वह व्यक्ति कितना कर्मठ होगा या कितना आलसी | शनि की शुभ स्थिति व्यक्ति को कर्मठ, निडर व धनी बनाती है किन्तु अशुभ स्थिति धनहीन, आलस्यपूर्ण तथा डरपोक बनाती है | इसका वर्ण वैदूर्यमणि, बाणपुष्प तथा अलसी के पुष्प के समान निर्मल होता है और अपने प्रकाश से अन्य वर्णों को प्रकाशित करता हुआ जन साधारण के लिए शुभफलदायी होता है…

वैदूर्यकान्ति रमल: प्रजानां वाणातसीकुसुमवर्णविभश्च शरत: |

अन्यापि वर्ण भुवगच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद ||

शनि के न्याय के सम्बन्ध में सती के अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह से लेकर ऋषि अगस्त्य को राक्षसों से मुक्ति में सहायता प्रदान करना, राजा हरिश्चन्द्र की कथा, नल दमयन्ती आदि के अनेक उपाख्यान पुराणों में उपलब्ध होते हैं | पद्मपुराण में आख्यान है कि शनि राजा दशरथ के सूर्यवंशी होने के कारण उनसे क्रुद्ध हो गए और उनके राज्य में घोर दुर्भिक्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई | राजा दशरथ जब शनि से युद्ध करने के लिए गए तो उनके पराक्रम से शनि प्रभावित हुए और उनसे वर माँगने को कहा | तब महाराज दशरथ ने विधिपूर्वक उनकी स्तुति करके उन्हें प्रसन्न किया और उन्हें शनि ने यथेच्छ वर प्रदान किया |

आज शनिवार भी है और प्रदोष का व्रत भी | प्रदोष के व्रत में यों तो भगवान् शंकर की पूजा अर्चना का विधान है, किन्तु शनि प्रदोष होने के कारण शनि की स्तुति भी शुभ फलदायी मानी जाती है | अतः प्रस्तुत है पद्मपुराण में राजा दशरथ द्वारा कहा गया शनि स्तोत्र…

|| अथ श्री दशरथकृत शनिस्तुति: ||

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ||
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च |
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ||
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेSथ वै नम: |
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोSस्तु ते ||
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम: |
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ||
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखाय नमोSस्तु ते |
सूर्यपुत्र नमस्तेSस्तु भास्करे भयदाय च ||
अधोदृष्टे नमस्तेSस्तु संवर्तक नमोSस्तु ते ।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिन्शाय नमोSस्तु ते ||
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च |
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ||
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेSस्तु कश्यपात्मजसूनवे |
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ||
देवासुरमनुष्याश्च  सिद्घविद्याधरोरगा: |
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ||
प्रसादं कुरु  मे  देव  वरार्होSमुपागतः |
एवं स्तुतस्तद: सौरिर्ग्रहराजो महाबलः ||

|| इति श्रीदशरथकृत शनिस्तुति: सम्पूर्णम् ||

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/26/shani-stuti/

 

गंगा दशहरा – आपः देवता

आज दस दिन से चले आ रहे #गंगा_दशहरा का समापन है | इससे पूर्व बाईस अप्रैल को गंगा सप्तमी थी | बहुत से लोगों ने पुण्य प्राप्ति के लिए गंगा के पवित्र जल में स्नान किया होगा | होना भी चाहिए, क्योंकि जल जीवन की अनिवार्य आवश्यकता होने के साथ ही प्रगति का संवाहक भी है | वैदिक साहित्य में जितने अधिक मन्त्र और स्तुतियाँ किसी न किसी रूप में जल के लिए उपलब्ध होती हैं उतनी सम्भवतः किसी अन्य देवता के लिए नहीं उपलब्ध होतीं | जल के देवता मित्र और वरुण को भाई माना गया है तथा ये द्वादश आदित्यों (मित्रावरुणौ – देवमाता अदिति के पुत्र) में गिने जाते हैं |

व्यावहारिक दृष्टि से भी देखें तो जल का सबसे अधिक उपयोग होता है क्योंकि इसके द्वारा जीवन को ऊर्जा और गति प्राप्त होती है | यदि मनुष्य को पौष्टिक और कर्मठ बने रहना है तो उसे शुद्ध जल का अधिकाधिक सेवन करने की सलाह दी जाती है | क्योंकि जल का मुख्य गुण है नमी और शीतलता प्रदान करते हुए दोषों को समाप्त करना | जल ही विद्युत् के रूप में प्रकाश देता है तो भाप बनकर पुनः पृथिवी को सिंचित करके प्राणीमात्र के लिए भोज्य पदार्थों, वनस्पतियों तथा औषधियों आदि की उत्पत्ति का कारण बनता है | जल तत्व के ही कारण मन भावमय है, वाणी सरस है तथा नेत्रों में आर्द्रता और तेज विद्यमान है | अथर्ववेद में जल के गुणों का विस्तार से वर्णन मिलता है | यजुर्वेद में भी कहा गया है कि जल को दूषित करना तथा वनस्पतियों को हानि पहुँचाना जीवन के लिए हानिकारक है | ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में प्राथना है कि हमें शुद्ध जल तथा औषधियाँ उपलब्ध हों | वेदों में जल को “आप: देवता” कहा गया है और पूरे चार सूक्त इसी “आप: देवता” के लिए समर्पित हैं | अस्तु, गंगा दशहरा के पावन पर्व पर प्रस्तुत है इसी आपः सूक्त के कुछ अंश…

अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् || पृञ्चतीर्मधुना पयः ||

अमूया उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह || ता नो हिन्वन्त्वध्वरम् ||

अपो देवीरूप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः || सिन्धुभ्यः कर्त्व हविः ||
अप्स्व अन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये || देवा भवत वाजिनः ||
अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा ||
अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः ||

आपः पृणीत भेषजं वरुथं तन्वेSमम || ज्योक् च सूर्यं दृशे ||

इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि ||
यद्वाहमभिदु द्रोह यद्वा शेप उतानृतम् ||

आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि ||
पयस्वानग्न आ गहि तंमा सं सृज वर्चसा || (प्रथम मण्डल सूक्त 23/16-23)

यज्ञ करने वालों के सहायक मधुर जल माताओं के समान पुष्टि प्रदान करते हैं तथा दुग्ध को पुष्ट करते हैं | सूर्य किरणों में समाहित जल हमारे यज्ञों के लिए उपलब्ध हों | जिस जल का सेवन हमारी गायें करती हैं तथा जो पृथिवी और अन्तरिक्ष में समान रूप से प्रवाहित है उस जल के लिए हम हवि समर्पित करते हैं | अमृतमय औषधीय गुणों से युक्त जल की प्रशंसा से समस्त देवता उत्साह प्राप्त करें | जल में समस्त औषधियाँ तथा समस्त सुखों को प्रदान करने वाली अग्नि अर्थात ऊर्जा समाहित है | ऐसा जल जीवन रक्षक औषधियों को हमारे शरीर में स्थापित करे ताकि हम चिरकाल तक नीरोग रहकर सूर्य का दर्शन करते रहें | हे जल के देवताओं ! हमसे अज्ञानवश द्वेष, आक्रोश, असत्य आदि जो कुछ भी दुराचार हुए हों उन सबको आप हमसे दूर प्रवाहित कर दें | जल में प्रवृष्ट होकर हमने जो स्नान किया है उसके कारण हम रस से आप्लावित हो गए हैं | ये जल हमें वर्चस्व प्रदान करें | हम इनका स्वागत करते हैं |

आपो यं वः प्रथमं देवयन्त इन्द्रानमूर्मिमकृण्वतेल: |
तं वो वयं शुचिमरिप्रमद्य घृतेप्रुषं मधुमन्तं वनेम ||

तमूर्मिमापो मधुमत्तमं वोSपां नपादवत्वा शुहेमा |
यस्मिन्निन्द्रो वसुभिर्मादयाते तमश्याम देवयन्तो वो अद्य ||

शतपवित्राः स्वधया मदन्तीर्देवीर्देवानामपि यन्ति पाथः |
ता इन्द्रस्य न मिनन्तिं व्रतानि सिन्धुभ्यो हण्यं घृतवज्जुहोत ||

याः सूर्यो रश्मिभिराततान याम्य इन्द्री अरदद् गातुभूर्मिम्।।
तो सिन्धवो वरिवो धातना नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः || (सप्तम मण्डल सूक्त 47/1-4)

हे जलदेवता ! आपका मधुर प्रवाह सोमरस में मिला है जिसे स्वर्ग की कामना से हम इन्द्रदेव को अर्पित कर रहे हैं | आज हम समस्त जीव भी उसी सोमरस का पान करेंगे | आप समस्त जीवों को तृप्ति प्रदान करते हुए पवित्र भी करते हो | आप हमारे यज्ञों की निर्विघ्न सम्पन्नता हेतु यज्ञों में उपस्थित रहते हो | ये समस्त जलाशय इसी प्रकार निरन्तर प्रवाहित रहें इस हेतु हम यज्ञों का आयोजन करते रहें | हे सिन्धु ! जिन जलप्रवाहों को सूर्येदेव अपनी रश्मियों से गतिमान रखते हैं तथा इन्द्र जिनके प्रवाह के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं ऐसी जलधाराएँ निरन्तर हमें धन धान्य से परिपूर्ण करती हुई हमारा कल्याण करती रहें |

समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य मध्यात्पुनाना यन्त्यनिविशमानाः |
इन्द्रो या वज्री वृषभोरराद ता आपो देवीरिह मामवन्तु ||

या आपो दिव्या उत वा स्त्रवन्ति रवनित्रिमा उत वा याः स्वयञ्जाः |
समुद्रार्था याः शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु ||

यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यञ्जनानाम् |
मधुश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु ||

यासु राजा वरुणो यासु सोमो विश्वेदेवा या सूर्जं मदन्ति |
वैश्वानरो यास्वाग्निः प्रविष्टस्ता आपो दवीरिह मामवन्तु || (सप्तम मण्डल सूक्त 49/1-4)

समुद्र जिनमें ज्येष्ठ हैं, जो दिव्य जल आकाश से वर्षा के रूप में हमें प्राप्त होते हैं, जो नदियों, कुँओं और स्रोतों से निरन्तर प्रवाहित होते हुए समस्त जड़ चेतन को पवित्र करते हुए समुद्र में जा मिलते हैं, इन्द्र जिन्हें मार्ग दिखाते हैं, सत्यासत्य के साक्षी वरुण जिनके देवता हैं, स्वयं वरुण-सोम-अग्नि विश्व की व्यवस्था के निमित्त जिनमें निवास करते हैं, जिनमें विद्यमान समस्त देव जिनके द्वारा अन्न आदि से आनन्दित होते हैं वे रसपूर्ण, दीप्तिमती तथा समस्त को पवित्र करने वाली नदियाँ हमारी रक्षा करें…

वैदिक ऋषि की इसी मंगलकामना के साथ सभी को गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/24/ganga-dussehra/

 

गंगा दशहरा – नदी का सम्मान नारी का सम्मान

मेरे लेख का शीर्षक “नदी का सम्मान नारी का सम्मान” सम्भव है अटपटा सा लगे, वह भी गंगा दशहरा जैसे महान पर्व के अवसर पर, किन्तु यह शीर्षक कितना सटीक है इसका लेख के अन्त में स्वतः भान हो जाएगा |

प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दहशरा के अवसर पर दस दिवसीय गंगा दशहरा के पर्व का समापन होता है | माना जाता है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में गंगा का अवतरण पृथिवी पर हुआ था | इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तक चलने वाले इस गंगा स्नान का आरम्भ अधिक ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा यानी 16 मई से हो गया था और अधिक ज्येष्ठ शुक्ल दशमी यानी 24 मई को यह स्नान सम्पन्न होगा | यों 23 मई को लगभग 19:14 पर दशमी तिथि का आगमन होगा, किन्तु सूर्योदय में नवमी तिथि नहीं होगी | सूर्योदय में 24 मई को दशमी तिथि होगी इसलिए पर्व उसी दिन मनाया जाएगा | सूर्योदय का समय 5:26 है और दशमी तिथि सूर्योदय से लेकर सायं 6:18 तक रहेगी | सूर्योदय के समय तैतिल करण और वज्र योग होगा तथा सूर्य वृषभ राशि और कृत्तिका नक्षत्र में तथा चन्द्र कन्या राशि और उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में होगा | इस दिन श्रद्धालुगण पवित्र गंगा के जल में स्नान करते हैं और दान पुण्य करते हैं | गंगा दशहरा के ठीक बाद निर्जला एकादशी आती है | इस दिन शीतल पेय पदार्थों के दान की प्रथा है | ये दोनों ही पर्व ऐसे समय आते हैं जब सूर्यदेव अपने प्रचण्ड रूप में आकाश के मध्य उपस्थित होते हैं, सम्भवतः इसलिए भी इन दिनों गंगा में स्नान तथा शीतल वस्तुओं के दान की प्रथा है |

किन्तु इन पर्वों का महत्त्व केवल इसीलिए नहीं है कि इस दिन गंगा का अवतरण पृथिवी पर हुआ था अथवा सूर्य की किरणों की दाहकता अपने चरम पर होती है | अपितु गंगा अथवा जल की पूजा अर्चना करने के और भी अनेक कारण हैं |

भारतीय सभ्यता और संस्कृति में पर्यावरण की सुरक्षा का कितना अधिक महत्त्व है और प्राचीन काल में लोग इस बात के प्रति कितने अधिक जागरूक थे इस बात का पता इसी से लग जाता है कि समस्त वैदिक और वैदिकोत्तर साहित्य में वृक्षों तथा नदियों की पूजा अर्चना का विधान है | इन समस्त बातों को धर्म के साथ जोड़ देने का कारण भी यही था कि व्यक्ति प्रायः धर्मभीरु होता है और धार्मिक भावना से ही सही – जन साधारण प्रकृति के प्रति सहृदय बना रहकर उसका सम्मान करता रहे | जल जीवन का आवश्यक अंग होने के कारण वरुण को जल का देवता मानकर वरुणदेव की उपासना का विधान भी इसीलिए है | किसी भी धार्मिक तथा माँगलिक अनुष्ठान के समय जल से परिपूर्ण कलश की स्थापना करके उसमें समस्त देवी देवताओं का, समस्त नदियों और समुद्रों अर्थात समस्त जलाशयों का तथा समस्त जलाशयों को धारण करने वाली पृथिवी का आह्वाहन किया जाता है |

वास्तव में लगभग समस्त सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित  हुईं | किसी भी सभ्यता का मूलभूत आधार होता है कि लोग प्रकृति के प्रति, पञ्चतत्वों के प्रति किस प्रकार का दृष्टिकोण रखते हैं | किस प्रकार का व्यवहार प्रकृति के प्रति करते हैं | और जल क्योंकि प्रकृति का तथा मानव जीवन का अनिवार्य अंग है इसलिए जलाशयों के किनारे ही सभ्यताएँ फली फूलीं | मानव जीवन में जन्म से लेकर अन्त तक जितने भी कार्य हैं – जितने भी संस्कार हैं – सभी में जल की कितनी अनिवार्यता है इससे कोई भी अपरिचित नहीं है | कुम्भ, गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, गंगा जयन्ती आदि जितने भी नदियों की पूजा अर्चना से सम्बन्धित पर्व हैं उन सबका उद्देश्य वास्तव में यही था कि नदियों के पौष्टिक जल को पवित्र रखा जाए – प्रदूषित होने से बचाया जाए | दुर्भाग्य से आज ये समस्त पर्व केवल “स्नान” मात्र बन कर रह गए हैं | आए दिन नदियों के प्रदूषण के विषय में समाचार प्राप्त होते रहते हैं | सरकारें इन नदियों की साफ़ सफाई का प्रबन्ध भी करती हैं | लेकिन कोई भी सरकार कितना कर सकती है यदि जन साधारण ही अपनी जीवनदात्री नदियों का सम्मान नहीं करेगा ? जितनी भी गन्दगी होती है आज नदियों में बहाई जाती है |

हम लोग जब बाहर के किसी देश में जाते हैं तो वहाँ के जलाशयों की खुले दिल से प्रशंसा करते हैं और साथ ही अपने देश के जलाशयों में फ़ैल रही गन्दगी के विषय में क्रोध भी प्रकट करते हैं | लेकिन वहाँ के जलाशय इतने स्वच्छ होने का कारण है कि वहाँ जन साधारण जलाशयों की स्वच्छता के प्रति – प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जागरूक है | वहाँ इन जलाशयों को गन्दगी बहाने का साधनमात्र नहीं माना जाता | किन्तु हम हर जगह घूम फिरकर जब अपने देश वापस लौटते हैं तो जलाशयों में गन्दगी बहाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान बैठते हैं | हम एक ओर बड़ी बड़ी गोष्ठियों में जल के संचय की बात करते हैं, दूसरी ओर हम स्वयं ही जल का दुरूपयोग करने से भी स्वयं को नहीं रोक पाते |

कहने का अभिप्राय यह है कि हम कितने भी गंगा सप्तमी या गंगा दशहरा या कुम्भ के पर्वों का आयोजन कर लें, जब तक अपने जलाशयों का और प्रकृति का सम्मान करना नहीं सीखेंगे तब तक कोई लाभ नहीं इन पर्वों पर गंगा में स्नान करने का | नदियाँ जीवन का माँ के समान पोषण करती हैं, माँ के समान संस्कारित अर्थात शुद्ध करती हैं, इसीलिए नदियों को “माता” के सामान पूज्यनीय माना गया है | इसीलिए जब तक हम अपनी नदियों का सम्मान करना नहीं सीखेंगे तब तक हम नारी का सम्मान भी कैसे कर सकते हैं ? क्योंकि नारी भी नदी का – प्रकृति का ही तो रूप है – जो जीवन को पौष्टिक बनाने के साथ ही संस्कारित भी करती है… यदि उसे निर्बाध गति से प्रवाहित होने दिया जाए तथा पल्लवित और पुष्पित होने का अवसर प्रदान किया जाए…

अस्तु, सभी को गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ… इस आशा के साथ हम नारी का प्रतिरूप अपनी नदियों की पवित्रता और स्वच्छता को अक्षुण्ण रहने देंगे…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/23/ganga-dashehara/

 

 

 

जेठ की तपती दोपहरी और वृक्षारोपण

जेठ की तपती दुपहरी में हमारी उम्र के बहुत से लोगों को याद आता होगा अपने गाँव के घर का चबूतरा और उसके बीचों बीच सर ऊँचा किये खड़ा नीम का पेड़ | किसी के घर में खड़े जामुन-आम-अमरूद के पेड़ मुस्कुराते रहते होंगे | तो किसी के घर के बाहर बरगद और पीपल के वृक्ष आग उगलती दोपहरी से राहत दिलाने शीतल हवा घर के भीतर पहुँचाते होंगे | और तुलसी गुलाब तो हर घर के आँगन में सुगन्धित हवा लुटाते ही रहते होंगे | पर आज वो ये सब केवल कल का सपना भर बनकर रह गया है | आज हम पण्डितों तथा Vedic Astrologers द्वारा निर्दिष्ट तुलसी विवाह, वट-पीपल के वृक्ष की पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी करते हैं, किन्तु इस सबके मूल में निहित महान और उदात्त भावना पर विचार नहीं करते |

मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए प्रकृति पर निर्भर है यह सत्य है | किन्तु सभ्यता की अन्धी दौड़, शहरीकरण के दबाव, बढती जनसँख्या और आधुनिकीकरण की उत्कट लालसा ने सबसे अधिक प्रहार प्रकृति पर ही किया है | फिर चाहे वह नदियों का दोहन हो अथवा जंगलों की कटाई | अज जिस तरह तेज़ी से जंगल काट काट कर रातों रात पहाड़ों को नंगा करते हुए हम कंक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं उसके सामने क्या हम अपने लिए विनाश का द्वार नहीं खोल रहे ? हम वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए एक पल को भी नहीं सोचते कि इसी तरह चलता रहा तो एक दिन हम बस घरों के भीतर एयरकंडीशनर की नकली हवा और सूर्य के प्रकाश का भ्रम देते दूधिया बल्वों की चमक पर ही आश्रित होकर रह जाएँगे जिसके फलस्वरूप अनेक रोगों का शिकार होकर अपने विनाश को ही आमन्त्रित करेंगे |

मनुष्य को अनादि काल से ही अपने दिन प्रतिदिन के कार्यों में लकड़ी की आवश्यकता रही है | लोग उस समय सादा व शान्त जीवन जीने के आदी थे | जनसँख्या सीमित होने के कारण लोगों के निवास की समस्या भी उस समय नहीं थी | इस प्रकार किसी भी रूप में पर्यावरण प्रदूषण से भी लोग परिचित नहीं थे | फिर भी उस समय का जनसमाज वृक्षारोपण के प्रति तथा उनके पालन के प्रति इतना जागरूक और सचेत था कि वृक्षों के साथ उसने भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे | यही कारण था कि भीष्म ने मुनि पुलस्त्य से प्रश्न किया था कि “पादपानां विधिं ब्रह्मन्यथावद्विस्तराद्वद | विधिना येन कर्तव्यं पादपारोपणम् बुधै ||” अर्थात हे ब्रह्मन् ! मुझे वह विधि बताइये जिससे विधिवत वृक्षारोपण किया जा सके | – पद्मपुराण २८-१

भीष्म के इस प्रश्न के उत्तर में पुलस्त्य ने वृक्षारोपण तथा उनकी देखभाल की समस्त विधि बताई थी | उसके अनुसार जिस प्रकार हिन्दू मान्यता के अन्तर्गत व्यक्ति के विविध संस्कार किये जाते हैं जन्म से पूर्व से लेकर अन्तिम यात्रा तक उसी प्रकार वृक्ष के भी किये जाते थे | बीज बोने के समय गर्भाधान संस्कार की ही भाँति धार्मिक अनुष्ठान किये जाते थे | जैसे जैसे बीज अँकुरित होता जाता था, उस पर पत्तियाँ फूल फल आदि आते जाते थे – हर अवसर पर कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान किया जाता था | किसी वृक्ष की पत्तियाँ कब तोडनी हैं, किस प्रकार तोडनी हैं इस सबका पूरा एक विधान होता था | उस समय तो औषधि के निमित्त भी वृक्षों की ओर ही देखा जाता था – तो उस सबके लिए भी पूरा विधान था कि किस वृक्ष का कौन सा अंग किस रोग में काम आता है और किस प्रकार उसे तोडना चाहिए तथा तोड़ने से पूर्व किस प्रकार धार्मिक अनुष्ठान आदि के द्वारा वृक्ष से आज्ञा लेनी चाहिए | साथ ही यह भी आवश्यक था कि एक व्यक्ति जितने वृक्ष काटेगा उसके दुगुने वृक्ष लगाएगा भी और उनकी देखभाल भी करेगा |

सम्भवतः विधि विधान पूर्वक वृक्षारोपण तथा नियमित वृक्षार्चन आज की व्यस्त जीवन शैली को देखते हुए हास्यास्पद प्रतीत हो – किन्तु सामयिक अवश्य है | वृक्षों का विधिपूर्वक आरोपण करना, सन्तान के समान उन्हें संस्कारित करना तथा देवताओं के समान प्रतिदिन उनकी अर्चना का विधान कोरे अन्धविश्वास के कारण ही नहीं बनाया गया था – अपितु उसका उद्देश्य था जनसाधारण के हृदयों में वृक्षों के प्रति स्नेह व श्रद्धा की भावना जागृत करना | ये समस्त तुलसी विवाह, वट-पीपल आदि के वृक्ष की पूजा आदि भी इसी प्रक्रिया के ही अंग थे | स्वाभाविक है कि जिन वृक्षों को आरोपित करते समय सन्तान के समान माँगलिक संस्कार किये गए हों, देवताओं के समान जिन वृक्षों की नियमपूर्वक श्रद्धाभाव से उपासना की जाती हो उन्हें अपने किसी भी स्वार्थ के लिये मनुष्य आघात कैसे पहुँचा सकता है ? वेदी व मण्डल बनाने का उद्देश्य भी सम्भवतः यही था कि लोग आसानी से वृक्षों तक पहुँच न सकें | उस समय वनों की सुरक्षा तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता किसी दण्ड अथवा जुर्माने के भय से नहीं थी – अपितु वृक्षों के प्रति स्वाभाविक वात्सल्य ए़वं श्रद्धा के कारण थी |

दैनिक जीवन में लकड़ी की आवश्यकता से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता और इसके लिए वृक्षों की कटाई भी आवश्याक है | किन्तु, उपरोक्त समस्त पौराणिक तथ्यों में से कुछ भी यदि हम स्वीकार कर लें तो वृक्षों की कटाई के बाद भी वृक्षों का अभाव और उस अभाव से होने वाले दुष्परिणामों से हम स्वयं को, अपनी आने वाली कई पीढ़ियों को और प्रकृति को बचा सकते हैं…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/21/our-green-angels/

 

 

 

शनि कवचम्

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् |

छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ||

भारतीय वैदिक ज्योतिष में शनि को मन्दगामी भी कहा जाता है | यह इतना मन्दगति ग्रह है कि एक राशि से दूसरी राशि में जाने में इसे ढाई वर्ष का समय लगता है, किन्तु वक्री, मार्गी अथवा अतिचारी होने की दशा में इस अवधि में कुछ समय का अन्तर भी आ सकता है | माना जाता है कि शनि हमारे कर्मों का फल हमें प्रदान करता है | प्रायः इसे स्वाभाविक मारक और अशुभ ग्रह माना जाता है | विशेष रूप से इसकी दशा, ढैया तथा साढ़ेसाती को लेकर जन साधारण में बहुत भय व्याप्त रहता है | जिस व्यक्ति की कुण्डली में शनि प्रतिकूल अवस्था में होता है तो इसके वात प्रकृति होने के कारण जातक को वायु विकार, कम्प, हड्डियों तथा दाँतों से सम्बन्धित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है | इसकी दशा 19 वर्ष की मानी जाती है | शनि को प्रसन्न करके उसके दुष्प्रभाव को शान्त करने के लिए Vedic Astrologer कुछ मन्त्रों के जाप का सुझाव देते हैं | जिनमें शनि कवच भी शामिल है | अतः, प्रस्तुत है कश्यप ऋषि द्वारा प्रणीत शनिकवचम्…

कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम: |

सौरि: शनैश्चरो मन्द: पिप्पलादेन संस्तुत: ||

कोणस्थ (कोण में विराजमान) पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्रान्तक, यम, सौरि, शनैश्चर, मन्द, पिप्पलाद शनिदेव के इन दशनामों का स्मरण करते हुए प्रस्तुत है शनिकवचम्…

|| अथ श्री शनिकवचम् ||

अस्य श्री शनैश्चरकवचस्तोत्रमन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, शनैश्चरो देवता,  शीं शक्तिः, शूं कीलकम्, शनैश्चरप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ||

नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् |

चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः ||

ब्रह्मोवाच :

श्रुणूध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् |

कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ||

कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् |

शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ||

ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दन: |

नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कर्णौ यमानुजः ||

नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा |

स्निग्धकण्ठंश्च मे कण्ठं भुजौ पातु महाभुजः ||

स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रदः |

वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितत्सथा ||

नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्द: पातु कटिं तथा |

ऊरू ममान्तक: पातु यमो जानुयुगं तथा ||

पादौ मन्दगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः |

अङ्गोपाङ्गानि सर्वाणि रक्षेन्मे सूर्यनन्दन: ||

इत्येतत्कवचं दिव्यं पठेत्सूर्यसुतस्य यः |

न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः ||

व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोSपि वा |

कलत्रस्थो गतो वापि सुप्रीतस्तु सदा शनिः ||

अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे |

कवचं पठतो नित्यं न पीडा जायते क्वचित् ||

इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यनिर्मितं पुरा |

द्वादशाष्टमजन्मस्थदोषान्नाशयते सदा ||

जन्मलग्नास्थितान्दोषान्सर्वान्नाशयते प्रभुः ||

II इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्मनारदसम्वादे शनैश्चरकवचं सम्पूर्णम् ||

शान्ति तथा सन्तुलन के पर्याय शनिदेव सबके जीवन में प्रसन्नता और शान्ति प्रसारित करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/19/shani-kavacham/