Category Archives: अध्यात्म

दिनचर्या और जीवन शैली

गत सात दिसम्बर को WOW India की ओर से Lifestyle diseases यानी एक अननुशासित दिनचर्या के कारण होने वाली बीमारियों पर चर्चा के लिए एक वर्कशॉप का आयोजन किया गया | आयोजन सफल रहा | लेकिन उसके बाद जब हमने रिपोर्ट पोस्ट की तो कुछ लोगों ने बात की कि आज के समय में जो लोग Working हैं, यानी कहीं नौकरी आदि करते हैं उनके लिए किसी भी दिनचर्या और जीवन शैली का पूरी शिद्दत से पालन करना असम्भव हो जाता है उनके कार्यभार और समय के अभाव के कारण | उनकी बात से हम सहमत हैं – बहुत से लोगों को – महिलाओं को भी और पुरुषों को भी – कई बार ऐसी नौकरी होती है जहाँ उन्हें शिफ्ट ड्यूटी करनी पड़ती है – कभी दिन की तो कभी रात की | इसलिए ऐसे लोगों का प्रश्न बिल्कुल सही है कि कैसे एक अनुशासित दिनचर्या और एक स्वस्थ जीवन शैली को अपनाया जा सकता है ?

यहाँ सबसे पहले तो एक बात कहना चाहेंगे कि एक आदर्श दिनचर्या और जीवन शैली अपनाकर हम केवल अपने स्वास्थ्य को ही अच्छा नहीं बनाए रखते, अपितु मानसिक, आध्यात्मिक, शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक विभिन्न स्तरों पर आवश्यकतानुरूप एक सन्तुलित जीवन जी कर एक सुखद परिवार और सुखद समाज के निर्माण में भी योगदान दे सकते हैं |

अब बात करते हैं कि दिनचर्या और जीवन शैली कहते किसे हैं | दिनचर्या मन और शरीर के सन्तुलन के साथ एक ऐसा दैनिक कार्यक्रम है जो प्रकृति के चक्र को ध्यान में रखकर किया जाता है | यही कारण है हर व्यक्ति की अपनी एक विशेष दिनचर्या होती है और वह हमारी जीवन शैली का मूल होती है | यानी हम कह सकते हैं कि हमारी दिनचर्या हमारी जीवन शैली का ही एक अभिन्न अंग है | एक आदर्श दिनचर्या के लिए स्वस्थ जीवन शैली की आवश्यकता है और एक स्वस्थ जीवन शैली के लिए अनुशासित दिनचर्या की आवश्यकता है |

हमारी दिनचर्या ऐसी होनी चाहिए कि जिससे हमारा स्वास्थ्य बेहतर रहे | और जब स्वास्थ्य की बात करते हैं तो Routine and lifestyleशारीरिक, मानसिक, सामाजिक सभी प्रकार के स्वास्थ्य के विषय में बात करते हैं | तो, यदि कुछ सरल से उपायों को अनुशासनात्मक रूप से अपनी हमारी जीवन शैली भी अपने आप स्वस्थ होती जाती है | और जब हमारी दिनचर्या पूर्णतः अनुशासित होगी तथा स्वस्थ जीवन शैली का पालन करेंगे तो लक्ष्य प्राप्ति में कोई समस्या नहीं होगी |

इसमें सबसे पहले आता है समय का ध्यान रखना – यदि हमने अपने समय को अच्छी तरह व्यवस्थित कर लिया – जिसे सरल भाषा में टाइम मैनेजमेंट कहा जाता है – तो किसी प्रकार की भागमभाग की आवश्यकता ही नहीं होगी और हमारी दिनचर्या सुचारु रूप से चलती रहेगी |

सरल और स्वस्थ दिनचर्या से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं, दोष सन्तुलित होते हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है और इन का आरम्भ ताज़गीभरा रहने से सारा दिन ही आनन्द से व्यतीत होता है और हम उस के अपने समस्त कर्म भली भाँति सम्पन्न करने में सक्षम हो सकते है |

शेष आगे…. पूर्णिमा

https://www.wowindia.info/health-awareness/2019/12/11/routine-and-lifestyle/

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ध्यान के कुछ अन्य आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के कुछ अन्य आसन :

ध्यान के लिए उपयुक्त आसनों पर वार्ता के क्रम में हमने मैत्री आसन, सुखासन, स्वस्तिकासन और सिद्धासन पर बात की | कुछ अन्य आसन भी ध्यान में बैठने के लिए अनुकूल हो सकते हैं | जैसे:

वज्रासन : कुछ लोग जिनके कूल्हों अथवा घुटनों में किसी प्रकार की समस्या हो वे ऐसे किसी भी आसन में बैठने में कठिनाई का अनुभव कर सकते हैं जिनमें टाँगों को एक दूसरे के आर पार करना पड़ता हो | वे लोग टखनों के ऊपर घुटनों को रखकर भी ध्यान का अभ्यास कर सकते हैं | इसे “वज्रासन” कहा जाता है |वज्रासन

सीधे ज़मीन पर इस आसन में यदि बैठेंगे तो पैरों और टखनों पर अधिक ज़ोर पड़ेगा जिसके कारण माँसपेशियों में कोई समस्या हो सकती है | यदि आप इस आसन में बैठना अधिक पसन्द करते हैं तो आपको बता दें आजकल बाज़ार में इसके लिए लकड़ी की बेंच भी उपलब्ध है | आप एक बेंच ख़रीद कर ला सकते हैं | इस बेंच पर सीधे बैठ सकते हैं जिससे आपके पैरों और टखनों पर कम जोर पड़ेगा | इस आसन से लाभ एक सीमा तक ही सम्भव है | जैसे : लम्बी अवधि के ध्यान में इस आसन पर बैठने में शरीर में स्थिरता का अभाव रहता है और शरीर एक ओर को झुकने अथवा झूलने लगता है | फिर भी जिन साधकों को शारीरिक समस्याएँ इस प्रकार की हैं उनके लिए यही आसन उचित रहेगा |

सिद्धासन : इसकी चर्चा पहले भी की है | यह कुछ ऐसे साधकों को सिखाया जाता है जो ध्यान के अन्य आसनों के अभ्यस्त हो चुके हैं, साधारण साधकों के लिए यह आसन न तो उपयोगी ही है और न ही वे इसे सरलता से लगा सकते हैं | क्योंकि पद्मासन की भाँति ही इस आसन के लिए भी शरीर को एक विशेष स्थिति में रखने की आवश्यकता होती है | और यह तभी सहायक हो सकता है जब इसे नियमबद्ध और उचित रीति से किया जाए | यदि आप इस आसन में उचित और सुविधाजनक रीति से नहीं बैठ पाते तो आपको इससे लाभ होने की अपेक्षा समस्याएँ ही अधिक उत्पन्न होंगी | ध्यान के प्रारम्भिक साधकों के लिए अथवा संसारी लोगों के लिए सिद्धासन का सुझाव देना उचित नहीं होगा |

जो लोग ध्यान में पारंगत हैं अथवा ध्यान को जिन्होंने अपने जीवन में प्राथमिकता दी है वे धीरे धीरे इस आसन में बैठना सीख सकते हैं | हाँ जो लोग समाधि की अवस्था को प्राप्त होना चाहते हैं उन्हें निश्चित रूप से ध्यान के समय इस आसन का अभ्यास करना चाहिए | ध्यान में पारंगत साधक अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इस आसन में बैठने का अभ्यास डाल सकते हैं | जब एक कुशल छात्र बिना किसी कष्ट के एक ही समय में तीन घंटे से अधिक अवधि के लिए बैठने लगता है तब “आसनसिद्धि” हो जाती है | लेकिन प्रारम्भिक विद्यार्थी जो अभी तक इस आसन के लिए तैयार नहीं हैं वे इस आसन में असुविधा का ही अनुभव करेंगे | जिस आसन का अभ्यास आपने नहीं किया है ऐसे आसन में बैठने के प्रयास में माँसपेशियों और नसों में खिंचाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं |

सिद्धासन में बैठने के लिए मूलबन्ध – जिसमें गुदा की माँसपेशियों को सँकुचित करके भीतर की ओर खींचा जाता है – सिद्धासनलगाते हुए बाएँ पैर की एड़ी को मूलाधार – अंडकोष – पर रखिये | अब दूसरे पैर की एड़ी को जननेन्द्रिय के ऊपर प्यूबिक बोन (Pubic Bone) यानी जँघा के ऊपर की अस्थि पर रखिये | पैरों और टाँगों को इस तरह रखिये कि टखने एक सीध में अथवा एक दूसरे को स्पर्श कर सकें | दाहिने पैर की अँगुलियों को बाँयी जँघा और पिण्डली के बीच में कुछ इस भाँति रखिये कि केवल बड़ी अँगुली दिखाई दे | अब बाँए पैर की अँगुलियों को उठाकर दाहिनी जँघा और पिण्डली के बीच में इस प्रकार रखें कि केवल बड़ी अंगुलि दिखाई दे | दोनों हाथ दोनों घुटनों पर रखिये |

ध्यान रहे, हम इस आसन की सलाह नहीं देते – उन लोगों को छोड़कर जो किसी योग्य प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में इसे सीख रहे हैं | क्योंकि अगर इसे ठीक से नहीं किया गया तो जैसा ऊपर कहा गया है – साधकों को किसी प्रकार की शारीरिक समस्या का सामना करना पड़ सकता है | परम्परा से तो ये आसन उन व्यक्तियों को सिखाया जाता है जो सन्यासी जीवन व्यतीत करना चाहते हैं | लेकिन यह सोचना भी उचित नहीं होगा कि केवल पुरुष ही इस आसन को लगा सकते हैं, कम सुविधाजनक होते हुए भी महिला साधिकाएँ और नन्स इस आसन के अभ्यास करती हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/12/09/meditation-and-its-practices-24/

धार्मिक आस्था का मूल आध्यात्म

धार्मिक आस्था का मूल अध्यात्म

सामान्य रूप से भारत में छः दर्शन प्रचलित हैं | इनमें एक वर्ग उन दर्शनों का है जो नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं | इनमें प्रमुख है चार्वाक सिद्धान्त | यह दर्शन केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है | ईश्वर की सत्ता नहीं मानता और शरीर को ही प्रमुख मानता है | आत्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करता | बौद्ध दर्शन प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण मानता है | विश्व के सभी पदार्थों को क्षणिक मानता है | यह भाव जगत के अन्तः स्वरूप और दृश्य स्वरूप दोनों को सत्य मानता है और यह भी स्वीकार करता है कि जगत की बाह्य और अन्तः सत्ता दोनों स्वतन्त्र हैं | जैन दर्शन कर्मवाद को प्रमुखता देता है, जगत को अनादि मानता है | सत् को उत्पत्ति और विनाश से रहित स्वीकार करता है | सम्यक् दर्शन, सम्यक् चरित्र और सम्यक् ज्ञान ही मोक्ष के साधन माने जाते हैं | ईश्वर की सत्ता और वेद की प्रामाणिकता को जैन और बौद्ध दोनों ही दर्शन स्वीकार नहीं करते |

दूसरा वर्ग आस्तिक दर्शनों का है | आस्तिक दर्शन ईश्वर की सत्ता स्वीकार करते हैं और वेद को प्रमाण मानते हैं | इनमें सर्वप्रथम वैशेषिक दर्शन है | यह ईश्वर और जीव को नित्य तत्व मानता है और वेद को ईश्वरीय वाणी स्वीकार करता है | न्याय दर्शन प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द को प्रमाण मानता है | शरीर और आत्मा को पृथक मानता है | वेद की प्रामाणिकता तथा ईश्वर के कर्तृत्व को स्वीकार करता है | सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष दो तत्वों को स्वीकार करता है | प्रकृति अचेतन है और पुरुष चेतन | प्रकृति और पुरुष के विवेक से निर्लिप्त स्वरूप का ज्ञान हो जाना ही मोक्ष का हेतु है | वेदों की प्रामाणिकता सांख्य को स्वीकार है | योग दर्शन सांख्य का ही सहयोगी दर्शन है | मीमाँसा कर्मकाण्ड का दर्शन है | इसका उद्देश्य ही शास्त्रों पर प्रबल निष्ठा उत्पन्न करके अधर्म की निवृत्ति तथा धर्म की प्रवृत्ति करना है | इन सबके अतिरिक्त द्वैतवाद और अद्वैतवाद आदि मान्यताएँ भी हैं | ये सब वैष्णव दर्शन कहे जाते हैं | शैव और वैष्णव दोनों दर्शन सविशेष ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं |

ये सभी दर्शन एकत्व में अनेकत्व और अनेकत्व में एकत्व का बोध कराते हैं | उपनिषदों और पुराणों के द्वारा वेदार्थ का विस्तार करके आचार्यों ने धर्म के व्यावहारिक एवं व्यापक रूप को व्यक्त करने का प्रयास किया है, और यही धार्मिक आस्था भारतीय जन मानस में व्याप्त है | आज हमारे समाज के मानस में पुराणों द्वारा प्रतिपादित आस्था व्याप्त है | हमारे जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जिस पर धार्मिकता का प्रभाव न हो | जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सोलह संस्कारों से सभी परिचित हैं | हमारे जन्म के समय गाए जाने वाले सोहर, विवाह के अवसर के घोड़ी बन्ने, पर्वों और उत्सवों पर गए जाने वाले गीत सभी में धार्मिक आस्था झलकती है | नृत्य, लोक गाथाएँ, लोक संगीत सभी पूर्णतः धार्मिकता से ओत प्रोत हैं | भारत के किसी भी प्रान्त के निवासी – चाहे वे आदिवासी हों या जनजातियाँ हों – सभी के मनों में धार्मिक आस्था समान रूप से विद्यमान है | देव पूजा, श्राद्ध, पितृ पूजा सभी को स्वीकार्य है | चाहे कश्मीर के अमरनाथ हों या गुजरात के रंगनाथ, उदयपुर के द्वारकाधीश हों, कच्छ के सोमनाथ हों अथवा मध्यप्रदेश के महाकाल, तमिल के तिरुपति बाला जी हों या केरल के गुरुवयूर हों अथवा तमिलनाडु के पद्मनाभ, उड़ीसा के जगन्नाथ, बिहार के वैद्यनाथ, बंगाल की महाकाली, नेपाल के पशुपतिनाथ हों अथवा काशी के विश्वनाथ, अयोध्या के राम हों या मथुरा के कृष्ण – सभी में सारे ही भारतवासियों की पूर्ण आस्था है | बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार और रामेश्वर सभी हम सबके लिये दिव्य तीर्थ हैं | शिव, विष्णु, दुर्गा, सरस्वती, सूर्य, गायत्री सभी के उपास्य हैं | सन्ध्या उपासना और ब्रह्म विद्या में सभी की आस्था है | शिष्टाचार, अभिवादन और आशीर्वाद सर्वत्र एक ही रूप में स्वीकृत है | हमारे व्रतोत्सव होली दिवाली विजयदशमी जन्माष्टमी शिवरात्रि दुर्गा पूजा गणेश पूजा सभी हमारे धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं | स्वर्ग नरक देवलोक प्रेतलोक आदि की मान्यताएँ सिद्ध करती हैं कि इस धार्मिक आस्था के कारण ही भारत एक है, अखण्ड है | गौ की महत्ता और मातृ भूमि के प्रति स्वर्ग से भी बढ़कर आदर हमारी धार्मिक आस्था के आधार हैं | आदि शंकराचार्य, निम्बकाचार्य, बल्लभाचार्य, रामानन्द, चैतन्य, रामदास, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, कबीर, नानक, सूर, तुलसी, मीरा तथा गार्गी मैत्रेयी जैसी विदुषियों आदि द्वारा स्थापित की हुई धार्मिक आस्था – जो पूर्ण रूप से भारत के समृद्ध दर्शन का प्रतिनिधित्व करती है – ही आज भारतीय जन मानस में व्याप्त है और सदा व्याप्त रहेगी | आज जो संघर्ष और विघटनकारी स्थितियाँ हैं वे केवल धार्मिक आस्था के अभाव के कारण ही हैं | यदि हम अपने इन धार्मिक आदर्शों का पालन करना आरम्भ कर दें तो वर्तमान की बहुत सी समस्याओं का समाधान हो सकता है | लेकिन इतना भी ध्यान अवश्य रहे कि धार्मिक आस्था किसी प्रकार के सतही रीति रिवाज़ों के साथ धन और पद का फूहड़ प्रदर्शन नहीं होती अपितु पूर्ण रूप से अध्यात्मपरक होती है…

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ध्यान के लिए सुविधाजनक आसन – स्वामी वेदभारती जी

अपने लिए सुविधाजनक आसन का चयन :

टाँगों में लचीलेपन के अभाव में सम्भव है कुछ प्रारम्भिक साधकों को सिद्धासन आरम्भ में सुविधाजनक न लगे | आप टाँगों को आर पार मोड़कर ऐसा कोई भी आसन बना सकते हैं जिससे आपके शरीर को इधर उधर झूले बिना, हिले डुले बिना स्थिर होकर बैठने में सहायता मिले, अथवा जैसा कि पहले बताया गया – आरम्भ में आप मैत्री आसन में भी बैठ सकते हैं | यहाँ पुनः इस बात को दोहराना आवश्यक हो जाता है कि जिस भी आसन में आप बैठें – सबसे पहले आपका सिर गर्दन और धड़ एक सीध में होना चाहिए जिससे आपकी रीढ़ सीढ़ी रहे, उसके बाद ही टाँगों को किसी विशेष प्रकार से रखिये |

कुछ अभ्यासियों को अगले आसनों को सीखने की इतनी शीघ्रता होती है कि भली भाँति सीखे बिना ही उन्हें लगाना आरम्भ कर देते हैं | जिसका परिणाम यह होता है कि वे उचित रूप से नहीं बैठ पाते, क्योंकि वे कन्धों को ऊपर खींचकर कूबड़ सा बना लेते हैं जिससे रीढ़ में बल पड़ जाता है | ऐसा करने का दुष्परिणाम यह होगा कि आपके शरीर जो बैठने में असुविधा होगी और आपके श्वास की प्रक्रिया में बाधा पड़ेगी | साथ ही ध्यान की प्रगाढ़ता के लिए उपयोगी ऊर्जा के भीतरी स्रोत भी इससे अवरुद्ध हो जाएँगे |

कमर की माँसपेशियों के साथ समस्याएँ :

बचपन से ही ग़लत ढंग से चलने और बैठने के स्वभाव के कारण बहुत से लोगों का बैठने के ढंग – आसन यानी PosturesPosture ही बिगड़ चुका होता है | और इस कारण रीढ़ को सहारा देने वाली माँसपेशियाँ पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पातीं और आयु में वृद्धि के साथ साथ माँसपेशियों में बल पड़ना आरम्भ हो जाता है | जिससे उनके शरीर को ही नुकसान पहुँचता है | जब आप प्रथम बार ध्यान के लिए बैठना आरम्भ करते हैं तब सम्भव है आपको लगे कि आपकी कमर की माँसपेशियाँ दुर्बल हैं और कुछ मिनट बैठने के बाद ही आप आगे की ओर झुक जाते हैं |

यदि आप दिन भर बैठने, खड़े होने और चलने के समय अपने शरीर के अंगों की स्थिति पर ध्यान देना आरम्भ कर देंगे तो बहुत शीघ्र आप इस समस्या से मुक्ति पा सकते हैं | यदि आप अपने शरीर को ढीला ढाला या झुका हुआ पाते हैं तो अपनी मुद्रा सुधारें | ऐसा करने से आपकी कमर की माँसपेशियाँ भली भाँति कार्य करना आरम्भ कर देंगी | कुछ हठ योग के आसन जैसे भुजंगासन, नौकासन, धनुरासन और बालासन भी आपकी कमर की माँसपेशियों को बल देने में सहायक होंगे, जिससे वे माँसपेशियाँ आपकी रीढ़ के स्तम्भ को सहारा दे सकें |

कुछ अभ्यासार्थी जिनका बैठने का ढंग सही नहीं होता वे प्रायः पूछते हैं कि ध्यान के समय क्या दीवार का सहारा Sitting Posturesलिया जा सकता है ? आरम्भ में मुद्रा सीधी करने के लिए के लिए आप ऐसा कर सकते हैं, लेकिन किसी बाहरी सहारे पर अधिक समय तक निर्भर रहना उचित नहीं होगा | आरम्भ से ही पूर्ण एकाग्रता और नियमित अभ्यास के द्वारा आसन को ठीक करने का प्रयास करें | अपने किसी मित्र से कह सकते हैं कि वह देखकर बताए कि आपका आसन उचित है अथवा नहीं | अथवा शीशे में एक ओर से देखकर स्वयं ही अनुमान लगाने का प्रयास कीजिए | यदि आपकी रीढ़ पूर्ण रूप से सीध में होगी तो अपनी कमर पर हाथ फिराने पर रीढ़ की हड्डी में उभारों पर गाँठ का अनुभव नहीं होगा |

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ध्यान के आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान में बैठने के लिए आसन (Posture) :

बहुत सारे आसन हैं जिनमें आपकी रीढ़ सीढ़ी रहती है और आप आराम से सुविधाजनक स्थिति में अपनी टाँगों को किसी प्रकार से तोड़े मरोड़े बिना बैठे रह सकते हैं | वास्तव में ध्यान में हाथों अथवा पैरों पर ध्यान देने की अपेक्षा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आपकी रीढ़ सीधी हो | और इस आसन में बैठने के लिए सबसे सरल आसन है

मैत्री आसन :मैत्री आसन

इस आसन में आप किसी कुर्सी अथवा बेंच पर बैठ सकते हैं | आपके पैर फर्श पर सीधे रखे हों अथवा बेंच के ऊपर सुखासन में हों | इस आसन का प्रयोग कोई भी कर सकता है | यहाँ तक कि जिनके शरीर में लचीलापन नहीं होता अथवा जिन्हें भूमि पर बैठने में कठिनाई होती है वे लोग भी इस आसन में आराम से बैठ सकते हैं | इस आसन में बैठने से ध्यान के समय आपको किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नहीं होगा |

सुखासन : यदि आपके शरीर में लचीलापन है तो आप एक वैकल्पिक आसन – सुखासन – में बैठना चाहेंगे | इसमें आप दोनों टाँगों को एक दूसरे के आर पार मोड़कर बैठते हैं | अर्थात एक पैर दूसरे पैर के घुटने के नीचे ज़मीन पर टिका होता है और दूसरे पैर का घुटना उस पैर पर आराम से रखा होता है | एक मोटे तह किये हुए कम्बल पर बैठिये जिससे आपके घुटनों और टखनों पर अधिक दबाव न पड़ने पाए | आपके ध्यान का आसन अर्थात जिस आसन या स्थान पर आप बैठे हैं वह स्थिर हो, किन्तु न तो अधिक कठोर हो और न ही हिलने डुलने वाला हो | यह आसन अधिक ऊँचा भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे आपके शरीर की स्थिति में व्यवधान उत्पन्न होगा |

यदि आपकी टाँगों में लचीलापन नहीं है अथवा जाँघ की माँसपेशियों में तनाव है तो आप देखेंगे कि आपके घुटने सुखासनज़मीन पर टिक नहीं पाते | इस स्थिति में कूल्हों के नीचे एक और कुशन अथवा तह किया हुआ एक और कम्बल लगा सकते हैं जिससे आपको बैठने में सहायता मिलेगी | आसन में बैठने से पहले यदि शरीर को खिंचाव देने वाले सरल से अभ्यास (Stretch Exercises) कर लिए जाएँ तो शरीर में लचीलापन बढाने में सहायता मिलती है जिससे आप और अधिक सुविधापूर्वक ध्यान के लिए बैठ सकते हैं | जिस भी आसन का आप चयन करें उसका नियमित रूप से अभ्यास कीजिए और उसे जल्दी जल्दी बदलने का प्रयास मत कीजिए | यदि आप नियमित रूप से एक ही आसन में बैठने का अभ्यास करते हैं तो हीरे धीरे वह आसन आपके लिए स्थिर और अधिक सुविधाजनक हो जाएगा |

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ध्यान के आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के आसन (Posture)

ध्यान एक ऐसी सरल प्रक्रिया है कि जिसका आनन्द हर कोई ले सकता है | जैसा कि पहले भी बता चुके हैं – ध्यान के लिए शान्तचित्त होकर सुविधाजनक, आरामदायक और स्थिर आसन में बैठ जाएँ | शरीर को स्थिर करें, श्वास प्रक्रिया को स्थिर और लयबद्ध करें, और मन को स्थिर तथा केन्द्रित करें | ध्यान की इन तीनों प्रक्रियाओं के विषय में विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है –

  • शरीर की स्थिति किस प्रकार होनी चाहिए कि वह ध्यान के समय विश्रान्त, स्थिर और सुविधापूर्ण स्थिति में रह सके |
  • श्वास प्रक्रिया को स्थिर और लयबद्ध करने की क्या आवश्यकता है और
  • इसे किस प्रकार किया जा सकता है |
  • मन को स्थिर और लक्ष्य पर किस प्रकार केन्द्रित किया जाए कि ध्यान की स्थिति स्वतः प्राप्त की जा सके |

ये तीन स्थितियाँ चेतना को शरीर के बाह्य स्तर से बहुत गहरी अन्तःचेतना अथवा सूक्ष्म स्तर तक ले जाती हैं | सबसे पहले शरीर की स्थिति…

ध्यान के लिए बैठने के आसन :

ध्यान के लिए उपयुक्त आसन में बैठने के लिए तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है – आसन स्थिर हो, दृढ़ हो, आरामदायक हो और सुविधाजनक हो | यदि ध्यान के समय शरीर इधर उधर हिलता डुलता झूलता रहेगा, शरीर में कहीं खिंचाव या दर्द होगा तो ध्यान के अभ्यास में निश्चित रूप से बाधा पड़ेगी | कुछ लोग समझते हैं कि ध्यान के लिए पद्मासन जैसे कठिन आसन में बैठना आवश्यक है | किन्तु ऐसा नहीं है | ध्यान के आसन के लिए केवल एक बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है कि आप ऐसे आसन में बैठें कि आपका सर, गर्दन और धड़ एक सीध में हों जिससे आपको श्वास लेने में सुविधा हो और आप श्वास के आवागमन को अपने उदर में अनुभव कर सकें |

सिर, गर्दन और धड़ की स्थिति :

ध्यान के सभी आसनों में सिर और गर्दन बिल्कुल बीच में होने चाहियें ताकि गर्दन न तो इधर उधर झूल सके और न ही एक ओर को झुक सके | सिर को गर्दन से सहारा मिलना चाहिए और कन्धों अथवा गर्दन में किसी प्रकार का खिंचाव हुए बिना गर्दन कन्धों के ऊपर स्थिर रहे | चेहरा सामने की ओर और नेत्र धीरे से बन्द हों | नेत्रों को आराम से बिना किसी दबाव के अपने आप बन्द होने दें | दुर्भाग्य से कुछ लोगों को बताया जाता है कि ध्यान की प्रक्रिया में सिर के ऊपर एक विशेष बिन्दु पर एकटक देखना है | किन्तु ऐसा करने से नेत्रों की माँसपेशियों में खिंचाव पड़ता है और कभी कभी तो सिर में दर्द तक हो जाता है | योग की प्रक्रिया में ऐसे कुछ अभ्यास हैं जिनमें नेत्रों को किसी एक बिन्दु पर स्थिर करना होता है, किन्तु ध्यान की प्रक्रिया में ऐसा नहीं है | चेहरे की माँसपेशियों पर कोई खिंचाव डाले बिना उन्हें ढीला छोड़ देना है | मुँह भी बिना किसी प्रयास अथवा दबाव के आराम से बन्द होना चाहिए | श्वास का आवागमन नासारन्ध्रों (Nostrils) से होना चाहिए |

कन्धों, भुजाओं और हाथों की स्थिति :

ध्यान के सभी आसनों में आपके कन्धे और हाथ ढीले छोड़े हुए (Relaxed) हों और आराम से आपके घुटनों पर रखे हुए हों | आपकी कलाई इतनी ढीली पड़ी हुई हो कि अगर कोई उसे उठाना चाहे तो बिना किसी प्रयास के उठा सके | आपका अँगूठा और तर्जनी अँगुली हलके से कुछ इस तरह जुड़े हुए हों कि उनका घेरा बन जाए, जिसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि एक परिधि है जिसके भीतर ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/27/meditation-and-its-practices-20/

धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

हम प्रायः दो शब्द साथ साथ सुनते हैं – संस्कृति और धर्म | संस्कृति अपने सामान्य अर्थ में एक व्यवस्था का मार्ग है, और धर्म इस मार्ग का पथ प्रदर्शक, प्रकाश नियामक एवं समन्वयकारी सिद्धान्त है | अतः धर्म वह प्रयोग है जिसके द्वारा संस्कृति को जाना जा सकता है | भारत में आदिकाल से ही आदर्श व्यक्ति और आदर्श समाज के विकास के लिये धर्म का आश्रय लिया गया है | धर्म की प्रधानता, धार्मिक प्रेरणा एवं धार्मिक भावनाओं का अन्य सब प्रेरणाओं पर प्रभुत्व केवल भारतीय संस्कृति की ही विशेषता नहीं है, अपितु यह सदा से ही समस्त संसार में मानव मन तथा मानव समाज की सर्वमान्य अवस्था रही है | भारत ने सम्पूर्ण धर्म का मूल वेद को स्वीकार किया है, अतः भारतीय दृष्टि के अनुसार जो वेदानुकूल है, वेद सम्मत है, वही धर्म है | वेदज्ञों की स्मृति तथा शील ही धर्म है, और यह शील तेरह प्रकार का है – ब्रह्मण्यता, देव-पितृ भक्ति, सौम्यता, अनसूयता, मृदुता, मित्रता, प्रियवादिता, सत्यता, कृतज्ञता, शरण्यता, कारुण्य, प्रशान्ति और वेदों के आचार तथा वेदों के वैकल्पिक विषयों में आत्मतुष्टि |

भारत एक धर्मप्राण देश है और यहाँ का जनमानस धर्म पर अवलम्बित है | जीवन के सभी छोटे बड़े कार्य यहाँ धर्म के आधार पर व्यवस्थित होते हैं | धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया है “धारयतीति धर्मः” अर्थात् समाज या व्यक्ति को धारण करने वाले तत्व को धर्म कहा जाता है | इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि “धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है | वास्तव में विश्व में विनाश की ओर जाने की प्रवृत्ति धर्मत्याग से ही आई है | प्राचीन समाज ने कहा “धर्मं चर” अर्थात् धर्म का आचरण करो, उसी से कल्याण होगा | आधुनिक समाज का नारा है “धर्म और ईश्वर की दासता से मुक्ति पाओ | यह दुर्बलता है | नियम बन्धन व्यर्थ हैं | मन स्वतन्त्र रहना चाहिये | मन की आज्ञा मानो |”

धर्म सदा एक ही है, अनेक नहीं हो सकता | अग्नि का धर्म उष्णता है, वह एक ही है, उसका अन्य कोई धर्म नहीं है | आज जो राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म, समाज धर्म, मानव धर्म आदि के नारे हैं वे सभी भ्रामक हैं | धर्म सौ दो सौ नहीं हो सकते | धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है ? दुःखहीन शाश्वत सुख पाने का भ्रान्तिहीन प्रयत्न ही धर्म है | धर्म का यही स्वरूप भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठित है | यही प्रयत्न मानव को अन्तर्मुखी बनाता है | जो प्रयत्न बहिर्मुख करता है वही अधर्म है | अन्तर्मुखी प्रेरणा भारत के जन जन में सर्वत्र देखने को मिल सकती है | धनी-निर्धन, पढ़ा लिखा-अनपढ़, हर व्यक्ति यही वाक्य कहता मिलेगा “अरे यह धन और धरती यहीं रह जाएँगे, कोई छाती पर रखकर नहीं ले जाएगा |” इस प्रकार सिद्ध होता है कि भारत के जन मानस में धर्म त्याग भावना के रूप में प्रतिष्ठित है | यह बात दूसरी है कि उसके अनुसार आचरण मुखर नहीं है |

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन |

सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत: || – गीता 18/9

जो कर्म फलेच्छा तथा आसक्ति को छोड़कर यह कर्तव्य है ऐसा जानकार किया जाता है वह त्याग सात्त्विक त्याग है और वही धर्म की भावना का मूलाधार है…

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ध्यान में भोजन का महत्त्व – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के अभ्यास के लिए भोजन किस प्रकार का तथा किस प्रकार किया जाना चाहिए इसी क्रम में आगे…

निश्चित रूप से जितने भी प्रकार का भोजन आप करते हैं उस सबका अलग अलग प्रभाव आपके शरीर पर होता है | हल्का और ताज़ा भोजन जिसमें सब्ज़ियाँ, फल और अनाज का मिश्रण हो वह सुपाच्य होता है | जबकि भारी और अच्छी तरह से तला भुना भोजन पचने में घण्टों लग जाते हैं | साथ ही एक और बात आपको अनुभव होगी कि कुछ आहार ऐसे हैं जिनके सेवन से ध्यान के समय आप स्पष्टता, विश्रान्ति और ध्यान में केन्द्रस्थ होने का अनुभव करते हैं | इसके विपरीत कुछ खाद्य पदार्थों के सेवन से अनेक प्रकार के व्यवधानों का अनुभव होता है | कुछ खाद्य पदार्थ आपको बेचैन, चिडचिडा और तनावग्रस्त बनाते हैं और आपको घबराहट का अनुभव होता है | कुछ आपको आलसी और जड़ बनाते हैं | इतना भारीपन आपके शरीर और मन में भर देते हैं कि ध्यान के अभ्यास के समय आपके लिए चेतन बने रहना कठिन हो जाता है | जैसे जैसे आप खाद्य पदार्थों के प्रति अपने शरीर की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन आरम्भ कर देंगे आप समझ जाएँगे कि कौन से खाद्य पदार्थ आपकी मानसिक स्थिति पर कैसा प्रभाव डालते हैं |

ध्यान के लिए केवल शाकाहारी होना ही आवश्यक नहीं है | यह जाने बिना कि सन्तुलित शाकाहार क्या है – आपके भोजन में परिवर्तन से – अर्थात शाकाहारी बनने से – अनेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं | इसलिए अपने स्वयं के प्रति उदार बनने की आवश्यकता है | सन्तुलित शाकाहारी भोजन जिसमें ताज़े फलों, दूध से बने पदार्थों तथा अच्छी तरह पकी सब्ज़ियों का, अनाज का और दालों आदि का समावेश हो और कम चिकनाई वाला हो तो लाभदायक होगा | जैसे जैसे आपका ध्यान का अभ्यास नियमित होता जाएगा वैसे वैसे भोजन तथा दूसरी बहुत सी वस्तुओं के प्रति आपका आकर्षण स्वस्थ दिशा की ओर परिवर्तित होता जाएगा |

भोजन और पेय पदार्थों का ध्यान की गहराई पर बहुत प्रभाव पड़ता है, और जैसा पहले भी बताया गया, ध्यान का अभ्यास करते करते भोजन और पेय पदार्थों के सम्बन्ध में जागरूकता आपको स्वयं ही आती जाएगी | बहुत से लोग जो अधिक मात्रा में कॉफ़ी, चाय और इसी प्रकार के अन्य पेय पदार्थों का सेवन अधिक समय से करते आ रहे हैं उन्हें ध्यान के अभ्यास से समझ में आने लगता है कि इनके कारण अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं | भोजन तथा उसका ध्यान के अभ्यास और मनुष्य की चेतना पर प्रभाव इतना व्यापक विषय है कि इस पर अलग से पूरी एक पुस्तक लिखी जा सकती है | कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव…

भोजन और ध्यान के अभ्यास के मध्य कम से कम तीन चार घंटे का अन्तराल अवश्य रखें |

विचार करें कि दिन में क्या भोजन किया और उसका आपके ध्यान के अभ्यास पर क्या प्रभाव पड़ा |

ताज़ा और सुपाच्य भोजन करें जिससे ध्यान के समय मन में स्पष्टता और शान्ति बनी रहे |

बहुत शीघ्र आप अनुभव करने लगेंगे कि अल्कोहल और इसी प्रकार के अन्य उत्तेजक पदार्थों के सेवन से ध्यान में बाधा उत्पन्न होती है | ध्यान को भली भाँति समझने वाला कोई भी व्यक्ति यह नहीं सोचता कि किसी प्रकार की नशीली दवाओं अथवा अल्कोहल आदि के सेवन से ध्यान की स्थिति प्राप्त करने में सहायता प्राप्त होती है | इस प्रकार के पदार्थ अपने विषैले प्रभावों के कारण शरीर में बेचैनी और मन में व्यवधान उत्पन्न करते हैं | अल्कोहल व्यक्ति को जड़, आलसी और उदासीन बनाता है – जो ध्यान की सबसे बड़ी बाधा है | बहुत से लोग जो ध्यान से उत्पन्न शान्ति में डूब जाते हैं उनकी इस प्रकार के पदार्थों के प्रति रुचि स्वतः ही समाप्त हो जाती है |

भोजन की ही भाँति निद्रा भी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका ध्यान पर विशेष प्रभाव पड़ता है | नींद यदि बहुत कम हो तो आपमें आलस्य बना रहेगा और ध्यान के समय आप चेतन नहीं रह पाएँगे | जबकि बहुत अधिक नींद भी इस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है – आपको जड़ बना सकती है, बेचैन कर सकती है और आपको ध्यान केन्द्रित करने में असमर्थता का अनुभव हो सकता है |

नींद एक ऐसी सम्मोहिनी प्रक्रिया है जिसका ध्यान के समय अवश्य विचार करना चाहिए | साधारण शब्दों में कहें तो ध्यान जितना गहरा होता जाएगा नींद उतनी ही कम होती जाएगी | क्योंकि ध्यान शरीर और मन दोनों के लिए एक गहरी विश्रान्ति की स्थिति बना देता है |

ध्यान के अभ्यास में जितनी प्रगति होगी और आपके जीवन में ध्यान का जितना अधिक महत्त्व बढ़ता जाएगा आप स्वयं ही ध्यान के लिए ऐसे समय की खोज शुरू कर देंगे जब आप अधिक ताज़ा और चुस्त अनुभव करते होंगे और इस प्रकार ध्यान आपके जीवन को व्यवस्थित करने का मूल साधन बन जाएगा | साथ ही भोजन, नींद और ऐसी ही अन्य दूसरी गतिविधियाँ इसमें व्यवधान उत्पन्न न करके इसके लिए सहायक बन जाएँगी |

अगले अध्याय में ध्यान के आसनों पर वार्ता…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/25/meditation-and-its-practices-19/

ध्यान और इसका अभ्यास – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के अभ्यास पर वार्ता करते हुए ध्यान के अभ्यास में भोजन की भूमिका पर हम चर्चा कर रहे हैं | इसी क्रम में आगे…

भोजन भली भाँति चबाकर करना चाहिये | अच्छा होगा यदि भोजन धीरे धीरे और स्वाद का अनुभव करते हुए ग्रहण किया जाए | पाचनतंत्र को और अधिक उत्तम बनाने के लिए भोजन में तरल पदार्थों की मात्रा अधिक होनी चाहिए | ताज़े फल और सलाद भी आपके भोजन का आवश्यक अंग होने चाहियें | भूख से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कारण बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं | भोजन के बाद मुँह और दाँतों की सफाई करें और पाचनतंत्र को विश्राम दें | दो भोजन के बीच में कुछ नाश्ता आदि न लें | वास्तव में भोजन ध्यान के अभ्यास, सम्भोग तथा नींद से कम से कम चार घंटे पूर्व कर लेना चाहिए | अर्थात ध्यान के अभ्यास और भोजन में, सम्भोग और भोजन में अथवा निद्रा और भोजन में कम से कम चार घंटे का अंतराल रखेंगे तो आपके लिए श्रेष्ठ रहेगा | भोजन के तुरन्त सोने के लिए चले जाना स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं होता |

पाचन क्रिया और भोजन के प्रति आपके शरीर की प्रतिक्रिया का आपके ध्यान एक अभ्यास पर व्यापक प्रभाव पड़ता है | क्योंकि भोजन करने के तीन चार घंटे बाद तक ध्यान का अभ्यास नहीं किया जा सकता इसीलिए प्रातः जल्दी उठकर ध्यान का अभ्यास करना सबसे अधिक उपयुक्त रहेगा | उस समय आपका शरीर पिछले दिन के भोजन को पचा चुका होता है और हल्का तथा चुस्त अनुभव कर रहा होता है | शाम को यदि आपने देर से भोजन किया है अथवा भरपेट भारी भोजन किया है तो आपको देर रात तक प्रतीक्षा करनी होगी इस बात के लिए कि आपका भोजन पच जाए और तब आप ध्यान का अभ्यास आरम्भ करके ध्यान केन्द्रित कर सकें |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/22/meditation-and-its-practices-18/

अध्यात्मपरक मन:चिकित्सा

मनःचिकित्सक अनेक बार अपने रोगियों के साथ सम्मोहन आदि की क्रिया करते हैं | भगवान को भी अपने एक मरीज़ अर्जुन के मन का विभ्रम दूर करके उन्हें युद्ध के लिये प्रेरित करना था | अतः जब जब अर्जुन भ्रमित होते – उनके मन में कोई शंका उत्पन्न होती – भगवान कोई न कोई झटका उन्हें दे देते | यही कारण था की महाभारत के युद्ध में प्रायः अधिकाँश नियमों को उठाकर ताक पर रख दिया गया था | क्योंकि उस समय की परिस्थितियों के अनुसार किसी प्रकार भी उस धर्मयुद्ध में विजय प्राप्त करके समस्त व्यवस्था को सुनियोजित रूप देना ही अर्जुन का लक्ष्य था | उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अर्जुन को समत्व बुद्धि अपनानी थी | उसे शत्रु मित्र छोटे बड़े सबके लिये समान भाव रखते हुए युद्ध में प्रवृत्त होना था | तभी एक ओर जहाँ वह दुर्योधन तथा दु:शासन आदि कौरवों से युद्ध कर सकता था वहीं भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों के साथ युद्ध करने में भी उसका संकोच समाप्त हो सकता था | इसीलिये कृष्ण ने उसे योग का उपदेश दिया | यही थी अन्तर्मुखी होने की प्रक्रिया – सूक्ष्म मनोविज्ञान, और इसी से समझ में आ सकता था जीवन का मूल्य |

“नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पम्प्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || गीता – – 2/40

मनश्चिकित्सक का प्रथम कर्तव्य है रोगी को यथार्थ का ज्ञान कराना | आरम्भ ही अभिक्रम है – इस कर्मयोग रूप मोक्ष मार्ग में अभिक्रम का नाश नहीं होता तथा चिकित्सा आदि की भाँति इसमें प्रत्यवाय अर्थात् विपरीत फल नहीं है | इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मरण रूप महान संसार भय से रक्षा करता है |

ध्यान योग का बहिरंग साधन कर्म है | अतः जब तक ध्यान योग पर आरूढ़ होने में समर्थ नहीं तब तक कर्तव्य कर्म अवश्य करते रहना चाहिये | जैसे जैसे ध्यान योग के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती जाती है – मनुष्य के समस्त कर्म स्वतः ही समाप्त होते जाते हैं | यद्यपि कर्म कूप तालाब आदि छोटे जलाशयों की भाँति अल्प फल देने वाले होते हैं – तो भी ज्ञान निष्ठा का अधिकार मिलने से पूर्व कर्म ही करते रहना चाहिये | साथ ही, न तो कर्मफल में तृष्णा होनी चाहिये और न ही “यदि कर्मफलं न इष्यते किं कर्मणा दुःखरूपेण |” भाव से कर्म में अनासक्ति ही होनी चाहिये | फलतृष्णा रहित पुरुषार्थ द्वारा कार्य किये जाने पर अन्तःकरण की शुद्धि होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है | अतः सिद्धि असिद्धि में समत्व भाव से कर्म करना चाहिये – समत्वं योग उच्यते | सकाम कर्म करने वाले तो कृपण होते हैं | इसी कृपणता के कारण मनुष्य विक्षिप्त होता है, भयभीत होता है – यह सोचकर कि उसके किये गए कर्म का फल उसे मिलेगा भी अथवा नहीं, और मिलेगा तो कितने समय में मिलेगा, कैसा मिलेगा – आदि आदि… अर्थात् उसमें वणिकबुद्धि आ जाती है | जब बुद्धि इस मोहात्मक अविवेक का उल्लंघन कर जाती है तब वह बिल्कुल शुद्ध हो जाती है | समाधि में अर्थात् चित्त के समाधान द्वारा विक्षिप्त हुई बुद्धि अचल और दृढ़ हो जाती है – स्थिर हो जाती है | अतः यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धि की स्थिरता चाहने वाले को इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है | यही है अध्यात्मयुत मनोविज्ञान |

भारतीय जीवन दर्शन – भारतीय मनोविज्ञान – अध्यात्म पर ही आधारित है | भारतीय जन मानस में एक ही आस्था है “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” और इस प्रकार अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा अन्ततः मोक्षरूप परम पद को प्राप्त करना | इस लक्ष्य से थोड़ा सा भी च्युत होते ही मति विभ्रम हो जाता है | यही कारण था कि भगवान का विराट रूप देखकर जब अर्जुन भयभीत और भ्रमित हो गए तब भगवान ने उनसे यही कहा कि तू युद्ध करे या न करे, इन सबका अन्त तो अवश्यम्भावी है | फिर क्यों नहीं तू निमित्त मात्र होकर युद्ध करता ? मनःचिकित्सक का वास्तविक कार्य यही है – यथार्थ का ज्ञान कराना – मनुष्य को उसकी ज़मीन से जोड़ना |

इस प्रकार अर्जुन को यह जो अन्तर्मुखी बनाने की प्रक्रिया हुई यही है सूक्ष्म मनोविज्ञान | तदुपरान्त भगवान ने अर्जुन को आत्मस्वरूप के दर्शन कराए और धीरे धीरे ज्ञान का बीजारोपण किया | इस प्रकार उनके मन को परिवर्तित करके उन्हें त्याग और वैराग्य का मार्ग बताया | जिससे उनके मन के विभ्रम का, मोह का नाश हुआ और वे कर्तव्य कर्म में प्रस्तुत हुए | यह थी अध्यात्म के द्वारा अर्जुन की मनश्चिकित्सा | युद्ध के लिये कटिबद्ध अर्जुन ने स्वयं कहा “नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव || गीता – 18/73 हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हुई | इसलिये मैं संशयरहित होकर स्थिरबुद्धि वाला हो गया हूँ और अब आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

सम्भवतः कुछ लोगों का विचार हो कि निष्काम कर्मयोग तो सन्यासियों के लिये होता है, गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिये, सामाजिक जीवन जीने वालों के लिये तो यह निष्काम कर्मयोग सम्भवतः उन्हें कर्म ही न करने दे | किन्तु यदि ऐसा होता तब तो अर्जुन – जो कि मोहवश क्षात्रधर्म से विमुख होकर गाण्डीव छोड़कर बैठ गए थे – गीता का उपदेश सुनकर सब कुछ छोड़ छाड़ कर सन्यासी हो जाते | किन्तु ऐसा नहीं हुआ | अपितु इस उपदेश को सुनकर ही उन्होंने आजीवन गृहस्थ रहकर अपने कर्तव्य का पालन किया |

जब इस प्रकार अध्यात्म मार्ग से मन का विभ्रम दूर करके, उसे स्थिर करके कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त किया जा सकता है, तो भला क्यों नहीं किसी भी बड़े से बड़े अपराधी का भी हृदय परिवर्तन नहीं किया जा सकता इस प्रकार अध्यात्म परक मन:चिकित्सा के द्वारा ? यहाँ तक कि सम्पूर्ण समाज का हृदय परिवर्तन किया जा सकता है | और फिर तब किसी भी प्रकार के सामाजिक भय से, धर्म के भय से, लोक मर्यादा के भय से, जाति के भय से, मान प्रतिष्ठा के भय से, अथवा अन्य किसी भी प्रकार के मानसिक विकार से व्यक्ति को, समाज को मुक्ति प्राप्त हो सकती है और अनेक प्रकार के अपराधों को होने से रोका जा सकता है | इस प्रकार की अध्यात्मपरक मन:चिकित्सा का मार्ग कठिन अवश्य है, लम्बा भी है, किन्तु इसके परिणाम भी उतने ही दूरगामी हैं…

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