Category Archives: आश्विन

नक्षत्र एक विश्लेषण

प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार जातक की चारित्रिक विशेषताएँ तथा उसका व्यक्तित्व

हम बात कर रहे हैं अश्विनी नक्षत्र के विषय में | इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है, बड़ी और चमकदार आँखें होती हैं और चौड़ा मस्तक होता है | स्वास्थ्य सामान्यतः अच्छा रहता है | साहित्य और अस्न्गीत में सी जातक की रूचि हो सकती है | शुद्ध हृदय इस जातक की वाणी मधुर होती है | यह जातक विद्वान्, स्थिर प्रकृति, अपने कार्यों में कुशल, विश्वसनीय तथा अपने परिवार में सम्मानित व्यक्ति होता है | आत्मसम्मान की भावना उसमें कूट कूट कर भरी होती है और जब दूसरे उसका सम्मान करते हैं तो उसे बहुत अच्छा लगता है | आर्थिक रूप से सम्भव हो मध्यम स्तर का हो, किन्तु दयालु तथा दानादि करने वाला होता है और धार्मिक प्रकृति का होता है | छोटी से छोटी बातों को बारीकी से देखना इसका स्वभाव होता है और दूसरों की छोटी से छोटी भूल की ओर इशारा करने में इसे संकोच नहीं होता | यह जातक आज्ञाकारी, सत्यवादी, अपने अधीनस्थ लोगों की तथा परिवार के लोगों की देखभाल करने वाला, अच्छे स्वभाव का, कार्य को समय पर पूर्ण करने वाला तथा वेद शास्त्रों का ज्ञाता भी हो सकता है |

यदि जातक की कुण्डली में यह नक्षत्र अशुभ प्रभाव में होगा तो जातक अहंकारी हो सकता है तथा अकारण ही घूमते रहने में इसकी रूचि हो सकती है | अशुभ प्रभाव में होने पर जातक दूसरों को धोखा भी दे सकता है तथा आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित भी रह सकता है | विवाहित व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध बनाना ऐसे जातक अक स्वभाव हो सकता है | गठिया बुखार, शरीर में दर्द अथवा स्मृतिहीनता जैसी समस्या से ग्रस्त हो सकता है |

इस नक्षत्र का प्रथम चरण “तस्करांश” कहलाता है, दूसरा चरण “भोग्यांश”, कहलाता है, तीसरा चरण “विलक्षणान्श” और चतुर्थ चरण “धर्मांश” कहलाता है | प्रथम तीन चरणों में उत्पन्न जातक प्रायः अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से होते हैं और साहसी, धनी, उत्तम भोजन करने वाले, पढ़े लिखे होते हैं किन्तु अकारण ही बेचैन रहते हैं और Restless होते हैं तथा सदा लड़ने को तत्पर रहते हैं | जीवन में समस्त सुखों का उपभोग करते हैं | Highly sexy हो सकते हैं और दूसरों के जीवन साथी के साथ इनके सम्बन्ध हो सकते हैं | चतुर्थ पाद में जन्म लेने वाले जातक प्रायः ईश्वरभक्त होते हैं और धनी तथा दयालु होते हैं |

अधोमुखी यह नक्षत्र तमोगुण प्रधान नक्षत्र है तथा नक्षत्र पुरुष की दाहिनी जँघा में इसका निवास माना गया है | वैदिक पञ्चांग के अनुसार यह नक्षत्र अश्विनी माह का प्रमुख नक्षत्र है – जो सितम्बर-अक्टूबर के मध्य आता है | मेष राशि में 13 डिग्री बीस मिनट तक इसका विस्तार होता है | इस नक्षत्र से सम्बन्धित वस्तुएँ हैं अश्व, उत्तम वस्त्राभूषण, वाहन तथा लोहे और स्टील से निर्मित अन्य वस्तुएँ |

औषधि ग्रहण करने के लिए तथा स्वास्थ्य में सुधार सम्बन्धी कार्य आरम्भ करने के लिए यह नक्षत्र अत्यन्त अनुकूल माना जाता है | इसके अतिरिक्त यात्रा आरम्भ करने के लिए, कृषिकर्म आरम्भ करने के लिए, बच्चे को प्रथम बार विद्यालय भेजने के लिए, गृहनिर्माण आरम्भ करने और गृहप्रवेश के लिए तथा अन्य भी सभी प्रकार के शुभ कार्यों का आरम्भ करने के लिए यह नक्षत्र शुभ माना जाता है | हाथी और घोड़ों की ख़रीद फ़रोख्त के लिए तथा नए वाहन में प्रथम बार यात्रा करने के लिए और नवीन वस्त्राभूषण धारण करने के लिए भी यह नक्षत्र अनुकूल माना गया है | किन्तु विवाह से सम्बन्धित कार्यों के लिए यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता |

यदि यह नक्षत्र अशुभ प्रभाव में हो तो उस अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए घोड़ों के सहित रथ दान करने का अथवा पितृ कर्म करने का सुझाव दिया जाता है | इस युग में रथ घोड़े आदि दान करना सम्भव नहीं अतः ज्योतिषी घोड़े सहित रथ की मूर्ति दान करने का सुझाव देते हैं |

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नक्षत्र एक विश्लेषण

प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार जातक की चारित्रिक विशेषताएँ तथा उसका व्यक्तित्व

पिछले अध्यायों में हम प्रत्येक नक्षत्र के नाम की व्युत्पत्ति और उसके अर्थ, नक्षत्रों के आधार वैदिक महीनों के विभाजन, नक्षत्रों के देवता, अधिपति ग्रह आदि विषयों पर चर्चा करने के साथ ही इस विषय पर भी प्रकाश डाल चुके हैं कि किस राशि में किस नक्षत्र का कितने अंशों तक प्रसार होता है | साथ ही नक्षत्रों के गुण (सत्व, रज, तमस), उनके लिंग, जाति अथवा वर्ण, नाड़ी, योनी, गण, वश्य तथा प्रत्येक नक्षत्र के तत्वों पर भी संक्षेप में चर्चा कर चुके हैं | अब इस अध्याय से इन्हीं समस्त विषयों पर विस्तार से बात करने का प्रयास करेंगे |

इस अध्याय से हमारा प्रयास होगा यह बताने का कि इन समस्त नक्षत्रों के देवताओं, अधिपति ग्रहों, गुणों, लिंग, नाड़ी, योनी, गण, वश्य, जाति तथा तत्वों आदि को यदि ध्यान में रखकर किसी कुण्डली का निरीक्षण परीक्षण किया जाए तो जातक विशेष की Personality और उसका गुण स्वभाव किस प्रकार का हो सकता है | क्योंकि जैसा कि सदा लिखते आए हैं कि किसी एक ही आधार पर किसी जातक के गुण स्वभाव तथा व्यक्तित्व का ज्ञान करना अर्थ का अनर्थ भी कर सकता है | इस प्रक्रिया में कुण्डली का समग्र अध्ययन करने की आवश्यकता होती है | साथ ही प्रत्येक नक्षत्र से सम्बन्धित पदार्थों और वस्तुओं के विषय में बात करेंगे | नक्षत्रों के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए Remedies पर चर्चा करेंगे कि किस नक्षत्र के लिए क्या उपाय किया जाना चाहिए | तो आज सबसे पहले प्रथम नक्षत्र अश्विनी को लेते हैं:

अश्विनी :

सदैव सेवाभ्युदितो विनीतः सत्यान्वितः प्राप्तसमस्तसम्पत् |

योषाविभूषात्मजभूरितोष: स्यादश्विनी जन्मनि मानवस्य ||

अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न जातक देखने में आकर्षक, भाग्यशाली, चतुर, आभूषणप्रिय, Opposite Sex के लोगों द्वारा प्रेम किया जाने वाला, बहादुर, बुद्धिमान तथा दृढ़ इच्छाशक्ति से युक्त होता है | वैज्ञानिक अथवा डॉक्टर हो सकता है | अपने Subordinates तथा सहकर्मियों के द्वारा सम्मान का पात्र हो सकता है तथा सरकारी तन्त्रों से उसे लाभ प्राप्त हो सकता है |

राशिचक्र के इस प्रथम नक्षत्र का अर्थ है अश्वारोही यानी घुड़सवार | पौराणिक कथाओं में अश्विनी का विवरण एक अप्सरा के रूप में उपलब्ध होता है | उसे विश्वकर्मा की पुत्री तथा सूर्य की पत्नी के रूप में जाना जाता है | ऐसे विवरण उपलब्ध होते हैं कि जब अश्विनी अपने पति का तेज सहन नहीं कर सकी तो उसने छाया (शनि की माता) को अपने पति की सेवा के लिए नियुक्त किया और अपनी पहचान छिपाने के लिए वन में जाकर अश्वि – घोड़ी – का रूप बनाकर रहने लगी | अश्विनी का दूसरा नाम संज्ञा भी है | जब छाया ने सूर्य को सारी बातें बताईं तो तो वे भी वन में चले गए और अश्व के रूप में अपनी पत्नी के साथ रहना आरम्भ कर दिया | यही अप्सरा अश्विनी दोनों अश्विनी कुमारों की माता मानी जाती है | ऐसी भी मान्यताएँ हैं कि सूर्य का वीर्य इतना बलशाली था कि माँ अश्विनी उसे अपने गर्भ में धारण नहीं कर सकीं और उन्होंने उसे अपने दोनों नासारन्ध्रों में धारण कर लिया (पौराणिक कथाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए) | जुडवाँ अश्विनी कुमार देवों के चिकित्सक माने जाते हैं |

इस नक्षत्र के अन्य नाम तथा अर्थ हैं नासत्य – जो सत्य न हो, दस्त्रा – असभ्य, आक्रामक, विनाशकारी, गधा, दो की संख्या, चोर, शीत ऋतु, अश्वियुक् – घुड़सवार, तुरग – वाजि – अश्व – हय आदि अश्व के पर्यायवाची |

इस नक्षत्र का प्रतीक है घोड़े का सर – क्योंकि इस नक्षत्र में तीन तारे अश्व के सर की आकृति बनाते हुए होते हैं | दोनों अश्विनी कुमार इस नक्षत्र के देवता हैं जिनकी प्रसिद्धि एक सैनिक, अश्वारोही तथा चिकित्सक के रूप में है | इस नक्षत्र का स्वामी है केतु तथा अधिपति ग्रह है मंगल | लघु संज्ञा वाला यह नक्षत्र वैश्य वर्ग, देव गण, आदि नाड़ी, अश्व योनि तथा चतुष्पद वश्य के अन्तर्गत आता है | पुरुष प्रकृति का यह नक्षत्र वायु तत्व प्रधान है तथा इसका वर्ण यानी रंग रक्त के समान लाल माना जाता है |

इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक अश्वारोही हो सकता है, अश्वों की देखभाल करने वाला हो सकता है, अश्वों की चोरी करने वाला हो सकता है अथवा अश्वों से सम्बन्धित व्यवसाय से उसे अर्थलाभ हो सकता है | वह एक सैनिक भी हो सकता है अथवा रोगों के निदान की अद्भुत सामर्थ्य से युक्त एक अच्छा चिकित्सक भी हो सकता है | वह सेना का कोई अधिकारी भी हो सकता है और कोई सेवक भी हो सकता है | कारागार में किसी पद पर उसकी नियुक्ति हो सकती है अथवा कोर्ट या पुलिस विभाग में कार्यरत हो सकता है | प्रायः ऐसा देखा गया है कि जिस जातक के ग्रह इस नक्षत्र में अनुकूल स्थिति में स्थित होते हैं वह एक सफल चिकित्सक होता है |

इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक ट्रांसपोर्ट अथवा Travel Agencies से सम्बन्धित किसी विभाग में भी कार्यरत हो सकता है | किसी आधिकारिक पद पर आसीन हो सकता है | कन्या और कुम्भ लग्नों के लिए इन राशियों से तीसरे भाव का स्वामी तथा भाई बहनों (Siblings) का कारक मंगल यदि इस नक्षत्र में विद्यमान हो तो जातक के जुड़वाँ भाई बहन हो सकते हैं | यदि पितृकारक या सूर्य अथवा गुरु अथवा नवमेश या दशमेश इस नक्षत्र में विद्यमान हो तो जातक के पिता के Twin Siblings हो सकते हैं |

शेष आगे…

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी महीनों का विभाजन और उनके वैदिक नाम:-

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम पहले बहुत कुछ लिख चुके हैं | अब हम चर्चा कर रहे हैं कि किस प्रकार हिन्दी महीनों का विभाजन नक्षत्रों के आधार पर हुआ तथा उन हिन्दी महीनों के वैदिक नाम क्या हैं | इस क्रम में चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद माह के विषय में पूर्व में लिख चुके हैं, आज आश्विन और कार्तिक माह…

आश्विन : इस माह में तीन नक्षत्र आते हैं – रेवती, अश्विनी और भरणी, किन्तु अश्विनी नक्षत्र प्रमुखता से होने के कारण इसका नाम आश्विन हुआ | अर्थात, इस माह में चन्द्रमा सबसे अधिक अश्विनी नक्षत्र के निकट भ्रमण करता है | शरद पूर्णिमाइसका वैदिक नाम है “इष”, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है इच्छा करना – इश धातु से ही इच्छा शब्द की निष्पत्ति हुई है | किसी वस्तु को खोजने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | किसी का पक्ष लेना, किसी बात का निर्णय करना, कोई निश्चय करना, चयन करना आदि अर्थों में इस शब्द का प्रयोग वैदिक और वेदिकोत्तर साहित्य में होता रहा है | बलिष्ठ, द्रुत गति से चलना, भोजन करना आदि के लिए यह शब्द प्रयुक्त होता है | किसी को Comfort पहुँचाने के लिए, किसी वस्तु में वृद्धि के लिए, आकाश से बरसते मन को प्रसन्न करते वर्षा के पानी के लिए तथा कोमल वस्तुओं के लिए इस शब्द का अनेकों रूपों में प्रयोग होता आया है | मन को जो आनन्दित करे ऐसा माह माना जाता है, सम्भवतः इसी कारण इसी माह में नवरात्र भी आरम्भ हो जाते हैं तथा विजया दशमी के साथ ही बहुत से अन्य पर्व इस माह में मनाए जाते हैं | किसी भी प्रकार के शुभ कार्यों के लिए यह माह उत्तम माना जाता है |

कार्तिक : इस महा में दो नक्षत्र होते हैं – कृत्तिका और रोहिणी | किन्तु कृत्तिका नक्षत्र की प्रमुखता इस माह में रहती दीपदानहै – अर्थात चन्द्रमा इस माह में सबसे अधिक कृत्तिका नक्षत्र पर भ्रमण करता है – इसलिये इसका नाम कार्तिक पड़ा | इसका वैदिक नाम है “अर्ज” जो एक धातु है और जिसका अर्थ होता प्राप्त करना – to get, to earn | इसके अतिरिक्त किसी वस्तु को कहीं भेजने – Dispatch करने के लिए, हटाने – Remove करने के लिए, किसी की रक्षा करने के लिए, सुरक्षित रखने के लिए, किसी पर अधिकार प्राप्त करने के लिए, किसी को आकर्षित करने के लिए, कार्य करने अथवा किसी वस्तु का निर्माण करने के लिए, किसी को आज्ञा देने के लिए भी अर्ज शब्द का प्रयोग होता है | ऐसी मान्यता है कि इस माह में गंगा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करना भाग्यवर्द्धक होता है | वास्तव में अश्विन माह से ग्रीष्म कुछ शान्त होने लगती है जो कार्तिक मास आने तक बहुत आनन्ददायक शरद ऋतु में परिवर्तित हो जाती है | ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं से शान्ति प्रदान करने वाली शरद पूर्णिमा के अगले दिन से आरम्भ होने वाले कार्तिक माह की पूर्णिमा – जिसे कार्तिकी पूर्णिमा और देव दिवाली भी कहा जाता है – को तो गंगा स्नान का बहुत ही महत्त्व माना जाता है | कार्तिक अमावस्या यानी दीपावली तो समस्त चराचर प्रकृति को उल्लसित करने वाला पर्व होता ही है |

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