मैं आशा पुष्प खिला जाती

मुझमें ही आदि, अन्त भी मैं, मैं ही जग के कण कण में हूँ |

है बीज सृष्टि का मुझमें ही, हर एक रूप में मैं ही हूँ ||

मैं अन्तरिक्ष सी हूँ विशाल, तो धरती सी स्थिर भी हूँ |

सागर सी गहरी हूँ, तो वसुधा का आँचल भी मैं ही हूँ ||

मुझमें है दीपक का प्रकाश, सूरज की दाहकता भी है |

चन्दा की शीतलता, रातों की नीरवता भी मुझमें है ||

मैं ही अँधियारा पथ ज्योतित करने हित खुद को दहकाती |

और मैं ही मलय समीर बनी सारे जग को महका जाती ||

मुझमें नदिया सा है प्रवाह, मैंने न कभी रुकना जाना |

तुम जितना भी प्रयास कर लो, मैंने न कभी झुकना जाना ||

मैं सदा नई चुनती राहें, और एकाकी बढ़ती जाती |

और अपने बल से राहों के सारे अवरोध गिरा जाती ||

मुझमें है बल विश्वासों का, स्नेहों का और उल्लासों का |

मैं धरा गगन को साथ लिये आशा के पुष्प खिला जाती ||

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मन का तीरथ

मन के भीतर एक तीर्थ बसा, जो है पुनीत हर तीरथ से

जिसमें एक स्वच्छ सरोवर है, कुछ अनजाना, कुछ पहचाना |

इस तीरथ में मन की भोली गोरैया हँसती गाती है

है नहीं उसे कोई चिंता, ना ही भय उसको पीड़ा का ||

चिंताओं के, पीड़ाओं के अंधड़ न यहाँ चल पाते हैं

हर पल वसन्त ही रहता है, पतझड़ न यहाँ टिक पाते हैं |

पर कठिन बड़ा इसका मग है, और दूर बहुत सरवर तट है

जिसमें हैं सुन्दर कमल खिले, हासों के और उल्लासों के ||

कैसे तट का पथ वह पाए, कैसे पहुँचे उस सरवर तक

पंथी को चिंता है इसकी, होगी कब वो पुनीत वेला |

लेकिन मन में विश्वास भरे, संग संवेदन पाथेय लिये

चलता जाए राही कोई, तो पा ही जाएगा मंज़िल ||

होगी हरीतिमा दिशा दिशा, होगा प्रकाश हर निशा निशा

एक शान्तिपूर्ण उल्लास लिये थिरकेगा केवल प्रेम वहाँ |

फिर धीरे धीरे सरवर में जितना गहरे वह उतरेगा

जग की चिंताओं को तज, वह परमात्मभाव हो जाएगा ||

 

 

काले मेघा जल्दी से आ

पिछले कुछ दिनों से धूल भरे आँधी तूफानों का सामना हो रहा है सभी को | बादल आते हैं, पर मानों सबसे गुस्सा होने के कारण उड़ जाते हैं | यही सब सोचते सोचते कुछ पंक्तियाँ अनायास ही बन गईं, प्रस्तुत हैं…

काले मेघा जल्दी से आ, भूरे मेघा जल्दी से आ ||

घाम ये कैसा चहक रहा है, अँगारे सा दहक रहा है |

लुका छिपी फिर अब ये कैसी, मान मनुव्वल अब ये कैसी ||

कितने आँधी तूफाँ आते, धूल धूसरित वे कर जाते

पल भर में धरती पर अपना ताण्डव नृत्य दिखा वे जाते |

तेरी घोर गर्जना से सब आँधी तूफाँ हैं भय खाते

आकर उनको दूर भगा तू, वसुन्धरा का मन हरषा तू ||

सूख रही हैं ताल तलैया, सूख रही हैं सागर नदियाँ

रूठ रहे हैं गाय बछरिया, रूठ गई है मस्त गोरैया |

कोयल की पंचम है रूठी, भँवरे की भी गुँजन रूठी

आके सबको आज मना तू, धरती पर हरियाली ला तू ||

माना हमने जंगल काटे, सारे पेड़ कर दिए नाटे

पर इन्सानी अपराधों का इनको अब तू दण्ड न दे रे |

ये सब तेरा ही मुँह ताकें, तुझसे ही हैं आस लगाएँ

इनको थोड़ी राहत दे दे, पूरी इनकी चाहत कर दे ||

तू रूठा तो साथ में तेरे वसुन्धरा भी रूठ रहेगी

अपनी वसु सन्तानों को जगती से फिर वह दूर रखेगी |

होगा क्या फिर आज सोच ले, जग के मन की व्यथा समझ ले

दाने पानी को तरसें सब, ऐसा मत तू प्रण अब ले रे ||

पर गुस्से में नहीं बरसना, प्यार भरा तू राग सुनाना

और ता धिन मृदंग की लय पर इस सारे जग पर छा जाना |

ताल विलम्बित में तू आना, गत के संग फिर भाव दिखाना

प्यारी मस्त बिजुरिया संग मस्ती में भर फिर नर्तन करना ||

राही

आज प्रस्तुत है मेरी अपनी ही एक पुरानी रचना… राही…

विरह मिलन की धूप छाँव में सुख दुःख के डग भरने वाला
और चढ़ाई उतराई में सदा अथक ही चलने वाला |
एक बूँद वाले जलघट में अगम सिन्धु भरने का चाही
धूल धूसरित भूखा प्यासा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
सुरभित वन उपवन गिरि कानन, जल खग कूजित झीलों वाली
समझ रहा जिसको तू मंज़िल, शिलाखण्ड वह मीलों वाली |
भग्न मनोरथ, पग पग पर दी तुझे दिखाई असफलता ही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
बात न पूछो तुम साथी की, ये बादल आते जाते हैं
जीवन की चंचल लहरों पर कब हम किसे रोक पाते हैं |
मधुर मिलन तो घड़ी दो घड़ी, पल भर ही पी की गलबाँही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
प्रिय प्रहसन ऊषा का पल भर, रह जाता देखा अनदेखा
दिन दोपहरी सन्ध्या रजनी, फिर अनन्त जीवन का लेखा |
सन्ध्या का संकेत समझ ले, जो तेरा पथ सम्बल राही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
आशाओं की चिता जलेगी, रथ टूटेंगे अरमानों के
दिन रहते काफ़िला रुकेगा, पंख जलेंगे परवानों के |
लेकिन बस तुम तुम्हीं रहोगे, और तुम्हारी मंज़िल राही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||

शून्य – एक अद्भुत अनुभूति

शून्य क्या है / एक अद्भुत अनुभूति

मुक्ति पानी है आवेगों से अपने

तो शून्य करना होगा सभी आवेगों को

पान करना है यदि अमृत का

तो शून्य करना होगा कषाय जल से पूर्ण अपने हृदय रूपी घट को

पाना है प्रकाश / तो शून्य करना होगा अन्धकार को

बढ़ना है आगे / तो निरन्तर रहना होगा गतिमान

और शून्य करना होगा भाव को सन्तुष्टि के

पाना है प्रेम / तो शून्य करना होगा मन को

स्वयं को आच्छादित करना होगा शून्य से

ताकि समा सके उसमें अथाह स्नेह

पाना है ज्ञान / तो शून्य होना होगा पूर्णज्ञान के अभिमान से

शून्य में है ध्वनि अद्भुत राग की

और पूर्णता में है समाप्ति उस राग की / जो पूर्ण होकर बन जाता है विराग

आरम्भ है शून्य / पूर्णता है अवसान

शून्य से आरम्भ है जीवन का / पूर्ण हुए तो अवसान है

समस्त प्रकृति का अवलम्ब / एकमात्र शून्य ही तो है

और अन्त में लय भी शून्य में ही हो जाना है

सृष्टि का आरम्भ गति और लय सब शून्य में ही है

तो निरन्तर गतिमान रखे वाले शून्य की उपेक्षा क्यों ?

गति पर विराम लगा देने वाले पूर्ण का मोह क्यों ?

चाहती हूँ, शून्य की इस अद्भुत अनुभूति को

आधार बनाकर जीवन का / सजा लूँ एक नवीन राग

जो बन जाए आधार मेरे मन की नीरवता का

और उसी नीरवता में खोकर / शून्य के पथ पर गतिमान रहकर

अन्त में विलीन हो जाऊँ उसी शून्य में

जहाँ अस्तित्व हो केवल सच्चिदानन्दस्वरूप निज आत्मा का

जो अजर अमर है तो केवल इसलिए

क्योंकि आधार है उसका / केवल शून्य…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/07/shunya/

शीतलाष्टमी

आज चैत्र कृष्ण अष्टमी को उत्तर भारत में शीतला माता की पूजा की जा रही है | कुछ स्थानों पर यह पूजा कल की गई थी | वैसे शीतला देवी की पूजा अलग अलग स्थानों पर अलग अलग समय की जाती है | कहीं माघ शुक्ल षष्ठी को इसका आयोजन होता है तो कहीं वैशाख कृष्ण अष्टमी को तो कहीं चैत्र कृष्ण सप्तमी-अष्टमी को | कुछ स्थानों पर होली के ब्वाद प्रथम सोमवार अथवा बुधवार को शीत्लाल माता की पूजा का विधान है | कुछ लोगों ने कल यह पूजा की थी | किन्तु चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को शीतला पूजा का विशेष महत्त्व है | इसके लिए पहले दिन शाम को भोजन बनाकर रख दिया जाता है और अगले दिन उस बासी भोजन का ही देवी को भोग लगाया जाता है और उसी को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है | इसका कारण सम्भवतः यही रहा होगा कि इसके बाद ऐसा मौसम आ जाता है जब भोजन बासी बचने पर खराब हो जाता है और उसे फिर से उपयोग में नहीं लाया जा सकता | और इसी कारण से कुछ स्थानों पर इसे “बासडा” अथवा “बसौड़ा” भी कहा जाता है | इस दिन लोग लाल वस्त्र, कुमकुम, दही, गंगाजल, कच्चे अनाज, लाल धागे तथा बासी भोजन से माता की पूजा करते हैं | शीतला देवी की पूजा मुख्य रूप से ऐसे समय में होती है जब वसन्त के साथ साथ ग्रीष्म का आगमन हो रहा होता है | चेचक आदि के संक्रमण का भी मुख्य रूप से ऋतु परिवर्तन का यही समय होता है |

शीतला माता का वाहन गर्दभ को माना जाता है तथा इनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू तथा नीम के पत्ते रहते हैं | इन सबका भी सम्भवतः यही प्रतीकात्मक महत्त्व रहा होगा कि इस ऋतु में प्रायः व्यक्तियों को चेचक खसरा जैसी व्याधियाँ हो जाती थीं | रोगी तेज़ ज्वर से पीड़ित रहता था और उस समय रोगी की हवा करने के लिए सूप ही उपलब्ध रहा होगा | नीम के पत्तों के औषधीय गुण तो सभी जानते हैं – उनके कारण रोगी के छालों को शीतलता प्राप्त होती होगी तथा उनमें किसी प्रकार के इन्फेक्शन से भी बचाव हो जाता होगा | स्कन्द पुराण में शीतला माता की पूजा के लिए शीतलाष्टक भी उपलब्ध होता है | वैसे शीतला देवी की पूजा करते समय निम्न मन्त्र का जाप किया जाता है:

वन्देsहम् शीतलां देवीं रासभस्थान्दिगम्बराम्

मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम् ||

अर्थात गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश और मस्तक पर सूप का मुकुट धारण करने वाली भगवती शीतला की हम वन्दना करते हैं | इसी मन्त्र से यह भी प्रतिध्वनित होता है कि शीतला देवी स्वच्छता की प्रतीक हैं – हाथ में झाडू इसी तथ्य की पुष्टि करती है कि हम सबको स्वच्छता के प्रति जागरूक और कटिबद्ध होना चाहिए, क्योंकि चेचक, खसरा तथा अन्य भी सभी प्रकार के Infections का मुख्य कारण तो गन्दगी ही है | साथ ही हाथ में कलश होने का अभिप्राय है कि जहाँ स्वच्छता होगी वहाँ स्वास्थ्य उत्तम रहेगा, और स्वास्थ्य उत्तम रहेगा तो समृद्धि भी बनी रहेगी | सूप का भी यही तात्पर्य है कि परिवार धन धान्य से परिपूर्ण रहे |

देवी का नाम भी सम्भवतः इसी लोकमान्यता के कारण शीतला पड़ा होगा कि शीतला देवी की उपासना से दाहज्वर, पीतज्वर, फोड़े फुन्सी तथा चेचक और खसरा जैसे रक्त और त्वचा सम्बन्धी विकारों तथा नेत्रों के इन्फेक्शन जैसी व्याधियों में शीतलता प्राप्त होती है और ये व्याधियाँ निकट भी नहीं आने पातीं | आज के युग में भी शीतला देवी की उपासना स्वच्छता की प्रेरणा के दृष्टिकोण से सर्वथा प्रासंगिक प्रतीत होती है |

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/03/09/sheetala-ashtami/

 

 

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस

कल 8 मार्च को समस्त विश्व में महिला दिवस से सम्बन्धित कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा | नारी के अधिकारों के विषय में, “अबला नारी” की सुरक्षा के विषय में विभिन्न मंचों और टी वी चैनल्स पर गोष्ठियाँ और परिचर्चाएँ होंगी | लेकिन इस विषय में एक ही दिन चर्चा किसलिए ? क्यों न हमारा व्यवहार ही ऐसा हो कि इस प्रकार की चर्चाओं की आवश्यकता ही न रह जाए ? हम सभी जानते हैं कि सारी की सारी प्रकृति ही नारीरूपा है – अपने भीतर अनेकों रहस्य समेटे – शक्ति के अनेकों स्रोत समेटे – जिनसे मानवमात्र प्रेरणा प्राप्त करता है… और जब सारी प्रकृति ही शक्तिरूपा है तो भला नारी किस प्रकार दुर्बल या अबला हो सकती है ?

पिछले दिनों कुछ कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ, जहाँ चर्चा का विषय था कि कामकाजी महिलाएँ समाज और परिवार के लिए वरदान हैं या अभिशाप | और ये आयोजन महिला समितियों द्वारा ही आयोजित किये गए थे | बहुत सी महिलाओं का मानना था कि जो महिलाएँ काम के लिए घर से बाहर जाती हैं वे अपने परिवार की उपेक्षा करती हैं और इसीलिए उनके परिवारों में नैतिक संस्कारों का अभाव रहता है | आश्चर्य हुआ कि आज जब स्त्री शारीरिक, मानसिक, अध्यात्मिक और आर्थिक हर स्तर पर पूर्ण रूप से सशक्त और स्वावलम्बी है तब भी क्या इस प्रकार की चर्चाओं का कोई महत्त्व रह जाता है ? क्या कामकाजी महिलाएँ भी परिवार के प्रति उतनी ही समर्पित नहीं होतीं जितनीं घर में रहने वाली महिलाएँ ? और हम यह क्यों भूल जाते हैं कि नैतिक शिक्षा बच्चों को देने का उत्तरदायित्व जितना माँ पर होता है उतना ही पिता पर भी होता है ? माँ तो नैतिकता का पाठ पढ़ाती रहे और पिता अनैतिक कर्म करता रहे तो क्या बच्चे को उस पिता के भी संस्कार नहीं मिलेंगे ? वास्तविकता तो यह है कि आज की नारी को न तो पुरुष पर निर्भर रहने की आवश्यकता है न ही वह किसी रूप में पुरुष से कमतर है | आज की महिला केवल ड्राइंगरूम की सजावट की वस्तु या छुई मुई का गुलदस्ता भर नहीं रह गई है, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान में, नैतिक-पारिवारिक-आर्थिक-सामाजिक-राजीतिक हर स्तर पर विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही हैं |

पुरुष की महत्ता को भी कम करके नहीं आँका जा सकता | पुरुष – पिता के रूप में नारी का अभिभावक भी है और गुरु भी, तो भाई के रूप में उसका मित्र भी है और पति के रूप में उसका सहयोगी और सलाहकार भी | आवश्यकता है कि दोनों अपने अपने महत्त्व को समझने के साथ साथ दूसरे के महत्त्व को भी समझकर उसे समान भाव से स्वीकार करें | और इसके लिए प्रयास हम महिलाओं को ही करना होगा | जब तक हम स्वयं अपनी नाज़ुक छवि से ऊपर उठकर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्तर पर सशक्त होने का प्रयास नहीं करेंगी तब तक हम इसी प्रकार अपने अधिकारों की लड़ाई लडती रहेंगी |

देखा जाए तो नारी सेवा और त्याग का जीता जागता उदाहरण है, इसलिए उसे अपने सम्मान और अधिकारों की किसी से भीख माँगने की आवश्यकता ही नहीं… वह ममतामयी और स्नेहशीला है तो अवसर आने पर साक्षात दुर्गा भी बन सकती है… वह आकाश में ऊँची उड़ने के सपने भी देखती है – किन्तु साथ ही उसके पाँव पूरी तरह से ज़मीन पर जमे रहते हैं और यदि वह ठान ले तो कोई बड़े से बड़ा आँधी तूफ़ान भी उसे उसके संकल्प से हिला नहीं सकता… नारी तो एक ऐसी धुरी है कि जिसके चलने से जीवन में गति आ जाती है… एक ऐसी मधुर बयार है जो अपने कन्धों पर सारे उत्तरदायित्वों का बोझ उठाते हुए भी निरन्तर प्रफुल्ल भाव से प्रवाहित रहती है…

यहाँ भगवान् बुद्ध से जुड़ा एक प्रसंग याद आता है, जिसका ज़िक्र हमने अपने उपन्यास “नूपुरपाश” में भी किया था…

वैशाली पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे | सभी नागरिक एकत्र होकर भगवान बुद्ध की शरण गए और उन्हें सारी बात बताई तो उन्होंने सबसे पहला प्रश्न किया “आपके राज्य में खेती की क्या स्थिति है ?” लोगों का उत्तर था “बहुत अच्छी भगवान्…”

“और अर्थ व्यवस्था…” बुद्ध ने आगे पूछा | “बिल्कुल सुदृढ़…” नागरिकों के प्रतिनिधि ने उत्तर दिया “खेती अच्छी होगी तो अर्थ व्यवस्था अपने आप मजबूत हो जाएगी | हर किसी के पास अपना व्यवसाय है, रोज़गार है, हर किसी के लिए शिक्षा की पूर्ण व्यवस्था है…”

“और सैन्य व्यवस्था…”

“भगवान् हमारी चतुरंगिणी सेना हर प्रकार के आधुनिक अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित, पूर्ण रूप से प्रशिक्षित तथा शक्तिमान है…”

बुद्ध कुछ देर सोचते रहे, फिर अचानक ही पूछ बैठे “अच्छा एक बात और बताएँ, राज्य में महिलाओं की क्या स्थिति है ?”

“हमारे यहाँ हर महिला न केवल पूर्ण रूप से स्वाधीन और सम्मानित है अपितु भली भाँति शिक्षित, कार्यकुशल तथा परिवार, समाज और राष्ट्र के नव निर्माण तथा चहुँमुखी विकास की दिशा में निरन्तर प्रयत्नशील भी है – फिर चाहे वह गणिका हो या गृहस्थन…”

तब उन्हें आश्वस्त करते हुए भगवान् बुद्ध ने कहा “फिर आप किसी प्रकार की चिन्ता मत कीजिए… कोई शत्रु आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता… जिस देश का किसान, युवा और नारी स्वस्थ हों, प्रसन्नचित्त हों, सम्मानित हों, उस देश का कोई भी शत्रु कुछ अनर्थ नहीं कर सकता…”

आवश्यकता है भगवान् बुद्ध से जुड़े इस प्रसंग को हमें अपना लक्ष्य बनाने की… अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ – इस आशा और विश्वास के साथ कि हम अपने महत्त्व और प्रतिभाओं को समझकर परिवार, समाज और देश के हित में उनका सदुपयोग करेंगी…

मुझमें है आदि, अन्त भी मैं, मैं ही जग के कण कण में हूँ |

है बीज सृष्टि का मुझमें ही, हर एक रूप में मैं ही हूँ ||

मैं अन्तरिक्ष सी हूँ विशाल, तो धरती सी स्थिर भी हूँ |

सागर सी गहरी हूँ, तो वसुधा का आँचल भी मैं ही हूँ ||

मुझमें है दीपक का प्रकाश, सूरज की दाहकता भी है |

चन्दा की शीतलता मुझमें, रातों की नीरवता भी है ||

मैं ही अँधियारा जग ज्योतित करने हित खुद को दहकाती |

और मैं ही मलय समीर बनी सारे जग को महका जाती ||

मुझमें नदिया सा है प्रवाह, मैंने न कभी रुकना जाना |

तुम जितना भी प्रयास कर लो, मैंने न कभी झुकना जाना ||

मैं सदा नई चुनती राहें, और एकाकी बढ़ती जाती |

और अपने बल से राहों के सारे अवरोध गिरा जाती ||

मुझमें है बल विश्वासों का, स्नेहों का और उल्लासों का |

मैं धरा गगन को साथ लिये आशा के पुष्प खिला जाती ||

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