है रचा बसा हर एक कण में

एक दिन सुबह सुबह मन्दिर के बाहर हंगामा सुना तो कारण जानने की जिज्ञासा मन में हुई और जा पहुँची घटना स्थल पर | जाकर देखा तो कुछ लोग मन्दिर से कुछ दूर खड़ी एक कार को हटवाना चाहते थे | कार जिस लड़की की थी वह बाथरूम में थी और ऑफिस जाने के लिये तैयार हो रही थी | 8 बजे तक उसे घर से चले भी जाना था | उसकी माँ को ड्राइविंग आती नहीं थी | पास जाकर देखा तो कार मन्दिर से इतनी दूरी पर थी कि मन्दिर में आने जाने में कोई रुकावट नहीं थी | यदि दो लाइन बनाकर भी जाना होता तब भी पूरा रास्ता खुला था | और साथ में मन्दिर का मुख्य द्वार तो पूरी तरह ख़ाली था, वहाँ तो कोई वाहन नहीं खड़ा था | इस पर पण्डित जी और दूसरे भक्तगणों का तर्क था कि “कार भगवान जी की मूर्ति के सामने आ रही है |” जबकि ऐसा भी बिल्कुल नहीं था | ये सब देखकर मैं सोचने लगी कि धार्मिक स्थलों के नाम पर इस तरह की बेहूदा हरकतें आख़िर क्यों ? आख़िर कब तक ? मैं प्रायः देखती हूँ कि सर्दियों की दोपहर में धूप सकती महिलाएँ अपने भगवान जी की मूर्तियों के लिये सुन्दर सुन्दर स्वेटर फ्राक वगैरा बुनती रहती हैं “हमारे भगवान जी को ठण्ड लगती है न…” पत्थर की मूर्ति की सर्दी गर्मी का ख़याल रखना अपनी श्रद्धा का विषय है, इस विषय में मुझे कुछ नहीं कहना | लेकिन क्या कभी किसी ग़रीब नंगे का तन ढकने का विचार मन में आया ? मन्दिरों में होने वाले धार्मिक आयोजनों में छप्पन भोगों का प्रसाद लगाया जाता है, और यह प्रसाद केवल उन्हीं लोगों को प्राप्त हो सकता है जो इसके लिये तगड़ा चन्दा देते हैं | शेष लोगों को केवल हलवा-पूरी देकर वहाँ से भगा दिया जाता है | काश इस प्रकार के छप्पन भोग के स्थान पर ग़रीबों का पेट भरने की सोचें… नारायणी सेवा करें… यदि एक भी ग़रीब दुखियारे को गले से लगा लिया तो परमात्मा से साक्षात्कार इसी जन्म में इसी पृथिवी पर हो जाएगा… उसके लिये दूसरा जन्म लेने की या किसी दूसरे लोक में जाने की आवश्यकता नहीं… क्योंकि वास्तविक परमात्मतत्व तो हमारी अन्तरात्मा ही है… और यह आत्मा सृष्टि के हर कण में विद्यमान है… फिर मानव मानव में ये भेद क्यों ??? आख़िर क्यों ???

ना मन्दिर में, ना मस्ज़िद में, ना गिरजे या गुरद्वारे में |
उसको मत खोजो बाहर, वह तो बस्ता है हर एक दिल में ||
मन्दिर में पत्थर की मूरत को जी भरकर नहलाते हो |
आ जाए कोई प्यासा दर पर, तो उसको दूर भगाते हो ||
छप्पन चीज़ों का भोग तो उस प्रस्तर प्रतिमा को देते हो |
और “कर्म करो” गीता की ये शिक्षा भूखे को देते हो ?
ईश्वर की प्रतिमा को मौसम के सभी वस्त्र पहनाते हो |
पर एक ग़रीब नंगे का तन ढकने को न आतुर होते हो ||
ऊँची आवाज़ों में माइक पर ईश्वर अल्लाह जपते हो |
पर दीन हीन की करुण पुकारों से हरदम कतराते हो ||
ऐ काश कभी झाँको मन में, ऐ काश कभी आँखें खोलो |
अपनी आत्मा को झकझोरो, कातर को बाँहों में भर लो ||
गर ऐसा कर पाए, तो जानो ईश मिलेगा भू पर ही |
है नहीं अलग वह मानव से, है रचा बसा हर एक कण में ||

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/01/11/%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/

 

 

 

Advertisements

धरा आकाश की सीमाएँ

पूस की ठण्डी रात ठिठुरती आती है

इठलाती हुई बिखराती है ओस में भीगी चन्दा की चाँदनी

और बाँध लेती है समस्त चराचर को अपने सम्मोहन में |

हो जाता है चाँद भी सम्मोहित

देखकर अपनी प्रियतमा का धवल सौन्दर्य

और तब रच जाता है रास शीतल धवल प्रकाश का |

आह्लादित हो खिल उठती हैं दसों दिशाएँ

और मदमस्त बनी गर्व से इठलाती ठिठुरती रात

झूम उठती है देखकर अपना बुना जाल सम्मोहन का |

किन्तु जब हार जाती है अपनी ही ठिठुरन से

तो वापस लौटने लगती है ठिठुरती भोर को आगे करके

जिसके साथ साथ ऊपर उठता जाता है

कोहरे की चादर चीरकर गुनगुनी धूप लुटाता सूर्य

जो देता है संदेसा जग को

जागो नींद से, आगे बढ़ो, उठो ऊँचे

इतने, कि छू न सके तुम्हें कोई भी बाधा |

कितना भी छाया हो घना कुहासा

सन्देहों का, निराशाओं का, अविश्वासों का

छँट जाता है स्वयं ही, अनुभव करके पंथी की दृढ़ता का ताप |

उसी तरह, जैसे छँट जाता है घना कोहरा

जब नहीं झेल पाता ताप सूर्य के दृढ़ निश्चय का

कि जो भी हो, जग में फिर से प्रेम का उजियारा भरने

जग में फिर से नवजीवन का उल्लास भरने

जग में फिर से आशा और विश्वास का ताप भरने

चीरकर इस घने कोहरे की चादर

उठना ही होगा मुझे ऊँचा… और ऊँचा…

कि सिमट जाएँ जहाँ धरा आकाश की समस्त सीमाएँ

देने को मुझे मार्ग आगे बढ़ने का / ऊँचा उठने का…

 

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2017/12/23/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%81/

 

अस्तित्व और लक्ष्य

हर सुबह की एक नई कहानी / एक नया गीत

हर दिन का एक नया क़िस्सा / बन जाने को उपन्यास

गुनगुना कर भोर की मधुर रागिनी / मस्त गोरैया

समा जाएगी गुनगुनी गोद में धूप की |

दिन चढ़ेगा धीरे धीरे / लिए हुए अपनी आँखों में

“कल” के अधूरे सपने / जो पूरे करने होंगे “आज”

देखने होंगे कुछ नए सपने / बनानी होंगी कुछ नई योजनाएँ

जिन्हें पूरा करना होगा “कल” |

करने को होगा बहुत कुछ नया हर पल

भरा हुआ उत्साहों से / उमंगों से / आशाओं से

तो कभी कभी कुछ निराशाओं और हताशाओं से भी |

इसी तरह धीरे धीरे नीचे उतर आएगी शाम

होने लगेगा शान्त कोलाहल

घिरेगी रात / समा जाएगा सब कुछ आँचल में उसके

जैसे छुप जाए नन्हा कोई बालक / आँचल में अपनी माँ के

और तब बुनी जाएँगी फिर से न जाने कितनी नई कहानियाँ

चादर तले अँधेरे की |

कुछ “कल” की आधी छूटी कहानियाँ / “आज” बन जाएँगी उपन्यास

तो कुछ “आज” के नए किस्से “कल” के लिए दे जाएँगे

फिर से एक नई कहानी / या एक नया गीत

जिसे गुनगुनाएगी “कल” फिर एक गोरैया

अपनी मधुर आवाज़ में / मस्ती में / प्यार में / जोश में

और समा जाएगी फिर से गुनगुनी धूप की गोद में |

ऐसे ही लुका छिपी में दिन और रात की

जाग जाएगी और एक नई भोर

दिखाते हुए हमारे अस्तित्व का एक पक्ष नया

खिल जाएगी और एक नई सुबह

देती हुई पूरा करने को एक लक्ष्य नया |

बीतते जाएँगे इसी तरह पल छिन दिन मास युग और कल्प

यही तो है क्रम जीवन का… प्रकृति का…

निरन्तर ! शाश्वत !! चिरन्तन !!!

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2017/12/19/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af/

 

शीत की पीत भोर

भोर के केसर जैसी लालिमायुत रश्मि पथ पर

धीरे धीरे आगे बढ़ता ऊपर उठता सूर्य

संदेसा देता है कि उठो, जागो मीठी नींद से

क्योंकि शीत की ये सुहानी पीत भोर

करती है नवीन आशा का संचार कण कण में…

आगे पढ़ें……..

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2017/12/14/%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b0/

 

 

 

शुभ प्रभात

आज हम सभी किसी न किसी बात से चिन्तित रहते हैं | किसी ने हमारी बात नहीं सुनी या हमें “तू” करके बोल दिया – हमें अपना अपमान लगने लगता है | रात दिन इस बात की चिन्ता सताती रहती है कि जो कुछ हमारे पास है – धन, सम्पत्ति, परिवार, मान-प्रतिष्ठा – कुछ भी – वो कोई छीन न ले या उसकी हानि न हो जाए | बीमारी का भय, मृत्यु का भय, किसी प्रकार के अभाव का भय, असफलता का भय – न जाने कितने प्रकार के भयों के साए में हम सब अपना जीवन व्यर्थ गँवा देते हैं | यदि हम उस परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर निष्काम भाव से अपने समत कर्म करते रहेंगे तो किसी प्रकार का भय हमें सताएगा ही नहीं और जीवन सरल तथा सुखी हो जाएगा |

भय

सत्ता जो हो जाती है असत्य

नृत्य क्या है / जीवन जीने की एक कला

इसीलिए तो समूचा जीवन ही है एक नृत्य

मस्ती में भर / भूलकर सारा विषाद / मिलकर एक दूसरे के साथ

वैसे ही जैसे / किया नृत्य नटवर नागर ने

तो हुआ पूर्ण वो नृत्य / राधा के महारास के साथ

नटराज ने मचाया ताण्डव

तो शान्त किया हिमसुता ने / रचकर मधुर लास्य

रचाती रहती है नित नवीन नृत्य / ब्रहमाण्ड के रंगमंच पर / प्रकृति नटी

क्योंकि नृत्य है एक ऐसा राग / जो हो जाता है परिणत विराग में

क्योंकि नृत्य है एक ऐसी आग / जो हो जाती है परिणत आह्लाद में

इसीलिए करती हूँ मैं नृत्य / रचाती हूँ महारास / बनकर प्रकृतिरूपा

उठाती हूँ दोनों हाथों को आकाश की ओर

और हस्तक बना / भर लेती हूँ सारा आकाश अपने हाथों में

घूमती हूँ बिन्दु के सामान / लेती हूँ अनेको तिहाईयाँ / आवर्तन / गतें और परनें

लख कर मेरा मादक नृत्य / थिरक उठते हैं पाँव विराट के भी

झूम उठता है सकल जड़ चेतन / जब साथ में मेरे झूमता है विराट

बढ़ती जाती है गति / बढ़ते जाते हैं आवर्त / हर गत पर / हर भाव पर

नहीं टोकती कोई मुद्रा मुझे / नहीं करती कोई इशारा / रुक जाने का

और मैं नाचती जाती हूँ / घूमती जाती हूँ बिना रुके / बेदम तिहाइयों पर

उन्माद में भर घूमती घूमती / हो जाती हूँ एक / उस विशाल के साथ

हो जाती हूँ चेतनाशून्य / और खो जाती हूँ उस शून्य में

आनन्द के उस क्षण में / जी लेती हूँ सारा जीवन एक ही साथ

आनन्द के उस क्षण में / जब हो जाता है शिथिल मेरा मन

भूल जाती हूँ सारा ज्ञान / सारी उपलब्धियाँ

और कर देती हूँ समर्पित स्वयं को / उस असीम के लिए

हो जाती हूँ विलीन उसमें ही / सदा सदा के लिए

यही है सत्ता का सत्य / जो हो जाती है असत्य / जब मिल जाती है उस चरम सत्य में…

850633581_107155

दशलाक्षण पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ

मित्रों, आज १९ अगस्त से २६ अगस्त तक श्वेताम्बर जैन मतावलम्बियों का पर्यूषण पर्व आरम्भ हो चुका है | पर्यूषण के अन्तिम दिन यानी २६ अगस्त से दिगम्बरों के पर्यूषण पर्व अर्थात क्षमावाणी पर्व और दशलाक्षण पर्व का आरम्भ हो जाएगा जो ५ सितम्बर को सम्पन्न होगा | यों तो साल में तीन बार दशलाक्षण मनाया जाता है, लेकिन भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (अनन्त चतुर्दशी) तक मनाए जाने वाले पर्व का विशेष महत्त्व माना जाता है | इसका मुख्य कारण है इसमें आने वाला साम्वत्सरिक पर्व | यह साम्वत्सरिक पर्व पर्यूषण का ही नही वरन् समस्त जैन धर्म का प्राण है । इस दिन साम्वत्सरिक प्रतिक्रमण किया जाता है जिसके द्वारा वर्ष भर में किए गए पापों का प्रायश्चित्त करते हैं । साम्वत्सरिक प्रतिक्रमण के बीच में ही सभी ८४ लाख जीव योनी से क्षमा याचना की जाती है । नवरात्रों की ही भाँति पर्यूषण पर्व भी संयम और आत्मशुद्धि के पर्व हैं | इन पर्वों में त्याग, तप, उपवास, परिष्कार, संकल्प, स्वाध्याय और आराधना पर बल दिया जाता है |

भारत के अन्य दर्शनों की भाँति जैन दर्शन का भी अन्तिम लक्ष्य सत्यशोधन करके परमानन्द की उपलब्धि करना है | इसे ही तत्वज्ञान कहते हैं | धर्म चाहे कोई भी हो, यदि उसमें तत्वज्ञान नहीं होगा, तत्वज्ञों के द्वारा बताए गए व्यवहार आदि नहीं होंगे, तो ऐसा धर्म जड़ हो जड़ हो जाता और उसमें मानव मात्र की सत्य निष्ठा नहीं बन पाती | अतः धर्म और तत्वज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक हैं | धर्म का बीज जिजीविषा, सुख की अभिलाषा और दुःख के प्रतिकार में ही निहित है |

जीवन को प्रगतिशील और उल्लासमय बनाए रखने के लिये तथा पारस्परिक संगठन और सहयोग को जीवित रखने के लिये ही उत्सवों और पर्वों का आयोजन किया जाता है | ये उत्सव केवल सामजिक सहयोग को ही बढ़ावा नहीं देते वरन् साथ साथ धार्मिक परम्परा को भी जीवित रखते हैं | और इस प्रकार मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक व्यवहार भी शनैः शनैः अभ्यास में आता जाता है | इस प्रकार जैन सम्प्रदाय का पर्यूषण और दशलाक्षण पर्व एक ऐसा ही सामाजिक पर्व है जो मनुष्य को मनुष्य के साथ मनुष्य के रूप में जोड़कर उसमें सम्यक् चारित्र्य और सम्यक् दृष्टि का विकास करता है | शास्त्र से धर्म की देह का अर्थात धर्म के बाह्य रूप का निर्माण होता है | यही कारण है कि किसी भी सम्प्रदाय के व्रतोत्सव आदि के विधान शास्त्रानुमोदित होते हैं, क्योंकि धर्म की देह अर्थात धर्म के बाह्य स्वरूप का निर्माण शास्त्रों से ही होता है | शास्त्रोक्त विधि विधानों का अनुसरण करते हुए व्यक्ति के चरित्र में सत्य, धर्म, शान्ति, प्रेम, निस्वार्थ भाव, उदारता और विनय विवेक आदि सद्गुणों का विकास होता है | यही सद्गुण धर्म की आत्मा कहलाते हैं |

सत्य की प्राप्ति के लिये बेचैनी और विवेकी स्वभाव इन दो तत्वों पर आधारित जीवन व्यवहार ही पारमार्थिक धर्म है | जैन सम्प्रदाय का पर्यूषण पर्व ऐसे ही पारमार्थिक धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है | जैन धर्म के अन्तिम तीर्थंकर महावीर के आचार विचार का सीधा और स्पष्ट प्रतिबिम्ब मुख्यतया आचारांगसूत्र में देखने को मिलता है | उसमें जो कुछ कहा गया है उस सबमें साध्य, समता या सम पर ही पूर्णतया भार दिया गया है | सम्यग्दृष्टिमूलक और सम्यग्दृष्टिपोषक जो जो आचार विचार हैं वे सब सामयिक रूप से जैन परम्परा में पाए जाते हैं | गृहस्थ और त्यागी सभी के लिये ६ आवश्यक कर्म बताए गए हैं | जिनमें मुख्य सामाइय है | त्यागी हो या गृहस्थ, वह जब भी अपने अपने अधिकार के अनुसार धार्मिक जीवन को स्वीकार करता है उसे यह प्रतिज्ञा करनी पड़ती है “करोमि भन्ते सामाइयम् |” जिसका अर्थ है कि मैं समता अर्थात समभाव की प्रतिज्ञा करता हूँ | मैं पापव्यापार अथवा सावद्ययोग का यथाशक्ति त्याग करता हूँ | साम्यदृष्टि जैन परम्परा के आचार विचार दोनों ही में है | और समस्त आचार विचार का केन्द्र है अहिंसा | जैन धर्म में अहिंसा को इतना व्यापक बना दिया गया है कि मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट पतंग आदि जीवित प्राणी ही नहीं वरन वनस्पति, पार्थिव जलीय आदि सूक्ष्मातिसूक्ष्म जन्तुओं तक की हिंसा से आत्मौपम्य की भावना द्वारा निवृत्त होने को कहा गया है | आत्मौपम्य की भावना – अर्थात समस्त प्राणियों की आत्मा को अपनी आत्मा मानना |

जैन पर्व कुछ एक दिवसीय होते हैं और कुछ बहुदिवसीय | लम्बे त्यौहारों में विशेष जैन पर्वों की ६ अट्ठाइयाँ हैं | उनमें जैसा कि ऊपर बताया, पर्यूषण पर्व की अट्ठाई सर्वश्रेष्ठ समझी जाती है | इनके अतिरिक्त तीन अट्ठाइयाँ चातुर्मास की तथा दो औली की होती हैं | पर्यूषण पर्व के दौरान यत्र तत्र जैन समाज में धार्मिक वातावरण दिखाई देता है | सभी निवृत्ति और अवकाशप्राप्ति का प्रयत्न करते हैं | खान पान एवम् अन्य भोगों पर अँकुश रखते हैं | शास्त्र श्रवण और आत्म चिन्तन करते हैं | तपस्वियों, त्यागियों और धार्मिक बन्धुओं की भक्ति करते हैं | जीवों को अभयदान देने का प्रयत्न करते हैं | और सबके साथ सच्ची मैत्री साधने की भावना रखते हैं | इस पर्व को दशलाक्षणी पर्व भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें दश लक्षणों का पालन कहा जाता है | ये दश लक्षण हैं: विनम्रता, माया का नाश, निर्मलता, आत्मसत्य का ज्ञान – और यह तभी सम्भव है जब व्यक्ति मितभाषी और स्थिर मन वाला हो, संयम, तप, त्याग, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य तथा क्षमायाचना | श्वेताम्बर सम्प्रदाय में यह पर्व आठ दिन का होता है, और उसके अन्तिम दिन यानी भाद्रपद शुक्ल पंचमी से दिगम्बरों के पर्यूषण का आरम्भ हो जाता है जो दस दिनों तक चलता है और भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को सम्पन्न होता है | इन दिनों भगवान महावीर की कथाओं का श्रवण किया जाता है | अपनी कठोर साधना के द्वारा भगवान महावीर ने जिन सत्यों का अनुभव किया था वे प्रमुख रूप से तीन हैं : दूसरे के कष्ट को अपना कष्ट समझना, समाज के हित के लिए अपनी सुख सुविधाओं का पूर्ण रूप से बलिदान कर देना ताकि परिग्रह लोकोपकार की भावना में परिणत हो जाए, इस प्रकार सतत जागृति की अवस्था प्राप्त होती है, जिसके द्वारा मनुष्य अतम निरीक्षण कर सकता है – ताकि उसके आत्मपुरुषार्थ में किसी प्रकार की कमी न आने पाए |

सच्चा सुख और सच्ची शान्ति प्राप्त करने के लिये एकमात्र उपाय यही है कि व्यक्ति अपनी जीवन प्रवृत्ति का सूक्ष्मता से अवलोकन करे और कभी भी किसी के साथ अनजाने में भी कोई छोटी सी भी भूल हो गई हो तो उसके लिए हृदय से क्षमा याचना करे और दूसरे को उसकी पहाड़ सी भूल के लिए भी क्षमादान दे |

क्षमादान और क्षमायाचना के इस महापर्व में सभी जैन मतावलम्बी संकल्प लेते हैं “खम्मामि सव्व जीवेषु – सब जीवों से मैं क्षमायाचना करता हूँ, सव्वे जीवा खमन्तु मे – सारे जीव मुझे क्षमा करें, मित्त्ति मे सव्व भू ए सू – सभी जीवों के साथ मेरा मैत्री का भाव रहे, वैरं मज्झणम् केण इ – किसी के साथ मेरा वैर न रहे |” आत्मिक शुद्धि का मूल मन्त्र इसी प्रकार का क्षमाभाव है | मन को स्वच्छ उदार और विवेकी बनाकर समाज के संगठन की दिशा में इससे बड़ा और क्या प्रयत्न हो सकता है |

अस्तु, क्षमायाचना के साथ आप सभी को क्षमावाणी और दशलाक्षणी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

पर्यूषण