नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या

 

मातृवत् लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका, नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या ||

वास्तव में ऐसी श्रद्धा और प्रज्ञा से युत होती है गुरु की सत्ता – गुरु की प्रकृति – जो माता के सामान  ममत्व का भाव रखती है तो पिता के सामान उचित मार्गदर्शन भी करती है | आज गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व है – हमारे विचार से सभी पर्वों में सबसे उत्तम पर्व है गुरु पूर्णिमा का पर्व | क्योंकि गुरु अपने ज्ञान रूपी अमृत जल से शिष्य के व्यक्तित्व की नींव को सींच कर उसे दृढ़ता प्रदान करता है और उसका रक्षण तथा विकास करता है | तो सर्वप्रथम तो समस्त गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ | वास्तव में तो – यज्ञोपवीत को छोड़कर –  गुरु पूजा न तो किसी प्रकार का कोई कर्मकाण्ड है और न ही गुरु पर किसी प्रकार का कोई उपकार ही है | यह तो एक अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रयोग है । जिसके द्वारा शिष्य अपनी श्रद्धा और सङ्कल्प के सहारे गुरु के समर्थ व्यक्तित्व के साथ स्वयं को युत करता है । गुरु की पूजा करके, गुरु के प्रति सम्मान के भाव सुमन समर्पित करके गुरु के पूर्ण रूप से विकसित प्राणों के ही कुछ अंश शिष्य को आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त होते हैं जो उसे जीवन भर दिशा निर्देश देते रहते हैं | गुरु शिष्य को ज्ञान और पुरुषार्थ का मार्ग दिखाता है, किन्तु यह शिष्य पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार उस ज्ञान और पुरुषार्थ में वृद्धि करके प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है | क्योंकि अन्ततोगत्वा पुरुषार्थ तो व्यक्ति को स्वयं ही करना पड़ता है | वास्तव में देखा जाए तो गुरु और शिष्य एक दूसरे के पूरक होते हैं | जिस प्रकार गुरु अपने ज्ञान और शक्ति से शिष्य के उत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील रहता है उसी प्रकार शिष्य का भी कर्तव्य होता है कि वह गुरु का उचित सम्मान करे |

हमारे देश में पौराणिक काल से ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूजा के रूप में मनाया जाता है | इसी दिन पंचम वेद “महाभारत” के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्मदिन भी माना जाता है और इसीलिए इसे “व्यास पूर्णिमा” भी कहा जाता है | और महर्षि वेदव्यास को ही आदि गुरु भी माना जाता है इसीलिए व्यास पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है | भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, पुराणों और उपपुराणों की रचना की, ऋषियों के अनुभवों को सरल बना कर व्यवस्थित किया, पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना की तथा विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन किया । इस सबसे प्रभावित होकर देवताओं ने महर्षि वेदव्यास को “गुरुदेव” की संज्ञा प्रदान की तथा उनका पूजन किया । तभी से व्यास पूर्णिमा को “गुरु पूर्णिमा” के रूप में मनाने की प्रथा चली आ रही है | बौद्ध ग्रंथों के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के पाँच सप्ताह बाद भगवान बुद्ध ने भी सारनाथ पहुँच कर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही अपने प्रथम पाँच शिष्यों को उपदेश दिया था | इसलिये बौद्ध धर्मावलम्बी भी इसी दिन गुरु पूजन का आयोजन करते हैं |

प्राचीन काल में जब आश्रम व्यवस्था थी तब २५ वर्ष की आयु हो जाने तक विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर ही समस्त शास्त्रों का तथा युद्ध, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला इत्यादि कलाओं का, ज्योतिष आदि अनेकों विधाओं आदि का अध्ययन किया करते थे | और प्रायः यह अध्ययन निःशुल्क होता था | गुरुजन इस कार्य के लिये किसी प्रकार की “दक्षिणा” आदि नहीं लेते थे | उन गुरुजनों तथा उनके आश्रम में रह रहे शिष्यों के जीवन यापन का समस्त भार गृहस्थ लोग वहन किया करते थे | उस समय आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन तथा शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात् गुरुकुल छोड़कर जब सांसारिक जीवन में प्रविष्ट होने का समय होता था उस समय भी गुरुजनों का पूजन करके यथाशक्ति गुरुदक्षिणा आदि देने की प्रथा थी | और इस गुरुपूजा के अवसर पर न केवल गुरुओं का स्वागत सत्कार किया जाता था, बल्कि माता पिता तथा अन्य गुरुजनों की भी गुरु के समान ही पूजा अर्चना की जाती थी | वैसे भी व्यक्ति के प्रथम गुरु तो उसके माता पिता ही होते हैं |

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से प्रायः वर्षा आरम्भ हो जाती है और उस समय तो चार चार महीनों तक इन्द्रदेव धरती पर अमृत रस बरसाते रहते थे | आवागमन के साधन इतने थे नहीं, इसलिए उन चार महीनों तक सभी ऋषि मुनि एक ही स्थान पर निवास करते थे | अतः इन चार महीनों तक प्रतिदिन गुरु के सान्निध्य का सुअवसर शिष्य को प्राप्त हो जाता था और उसकी शिक्षा निरवरोध चलती रहती थी | क्योंकि विद्या अधिकाँश में गुरुमुखी होती थी, अर्थात लिखा हुआ पढ़कर कण्ठस्थ करने का विधान उस युग में नहीं था, बल्कि गुरु के मुख से सुनकर विद्या को ग्रहण किया जाता था | गुरु के मुख से सुनकर उस विद्या का व्यावहारिक पक्ष भी विद्यार्थियों को समझ आता था और वह विद्या जीवनपर्यन्त शिष्य को न केवल स्मरण रहती थी, बल्कि उसके जीवन का अभिन्न अंग ही बन जाया करती थी | इस समय मौसम भी अनुकूल होता था – न अधिक गर्मी न सर्दी | तो जिस प्रकार सूर्य से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता तथा फसल उपजाने की सामर्थ्य प्राप्त होती है उसी प्रकार गुरुचरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञानार्जन की सामर्थ्य प्राप्त होती थी और उनके व्यक्तित्व की नींव दृढ़ होती थी जो उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती थी |

“अज्ञान्तिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया, चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः |” अर्थ सर्वविदित ही है – अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर भगाने के लिये जिस गुरु ने ज्ञान की शलाका से नेत्रों को प्रकाश प्रदान किया उस गुरु का मैं अभिवादन करता हूँ | तथा “गुरुर्ब्रह्मागुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरुर्सक्षात्परब्रहम तस्मै श्री गुरवे नमः |” अर्थात शिष्य के लिये तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब कुछ गुरु ही होता है | वही उसके लिये परब्रह्म होता है | भारतीय संस्कृति में गुरु को गोविन्द अर्थात उस परम तत्व ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है, क्योंकि वह गुरु ही होता है जो शिष्य के मन से अज्ञान का आवरण हटाकर उसे ज्ञान अर्थात ईश्वर के दर्शन कराता है, तभी तो कहा गया है कि “गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय | बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो मिलाय ||”

आज स्थिति यह है कि ५ सितम्बर को हम टीचर्स डे तो मनाते हैं, जो कि अच्छी बात है – क्योंकि उस दिन हम अपने देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिवस मनाते हैं – लेकिन विचारणीय बात यह है कि गुरु पूर्णिमा बस एक औपचारिक पर्व भर बनकर रह गया है | कुछ संगीत आदि कलाओं की शिक्षा देने वाले घरानों को इसका अपवाद अवश्य कहा जा सकता है | क्योंकि वहाँ संगीत आदि का ज्ञान भी गुरुमुख से सुनकर या गुरु के समक्ष बैठकर क्रियात्मक रूप से ही ग्रहण किया जाता है | संगीत आदि कलाओं का ज्ञान कोई पुस्तकों का विषय नहीं है |

आज स्थिति यह है कि स्कूल कालेजों में “गुरु” अथवा “शिक्षक” न रहकर “टीचर” रह गए हैं  | जिनके लिये विद्यादान शिष्य को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाने की अपेक्षा धनोपार्जन का साधन अधिक होता है | उसी प्रकार शिष्य के लिये भी ज्ञानार्जन उस परम तत्व से साक्षात्कार का माध्यम न रहकर अच्छी नौकरी प्राप्त करने अथवा अच्छा व्यवसाय स्थापित करने के लिये ऊँची शिक्षा ग्रहण करके उसका सर्टिफिकेट अथवा डिग्री प्राप्त करने का माध्यम ही बन गया है | उच्च शिक्षा प्राप्त करके व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति करने की सोचना अच्छी बात है, लेकिन शिक्षा के, ज्ञान के उच्च और उदात्त आदर्शों का व्यावसायीकरण हो जाना अच्छी बात नहीं | शिक्षा का व्यावसायीकरण हो जाने पर गुर शिष्य के मध्य स्वस्थ और पवित्र सम्बन्ध स्थापित हो ही नहीं सकता |

रही सही कसर पूरी कर दी है तथाकथित “सद्गुरुओं” ने जिन्होंने समाज की धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए स्वयं का इतना पतन कर लिया है कि उनके लिये शिष्य से येन केन प्रकारेण धन तथा अन्य प्रकार के लाभ प्राप्त करना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है जीवन का | और कुछ ढोंगी गुरु तो और भी नीचे गिर जाते हैं – आए दिन अखबारों और टी वी चैनल्स के माध्यम से ऐसी घटनाओं की जानकारी मिलती रहती है | और ऐसा नहीं है कि उनके भक्तों में केवल अनपढ़ कहे जाने वाले लोग ही शामिल हों, अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इन ढोंगी गुरुओं के चक्कर में फँस जाते हैं |

देखा जाए तो आज कुछ ही गिने चुने “सद्गुरु” ऐसे होंगे जो आगम निगम और पुराणों का, उपनिषदों आदि का महर्षि वेदव्यास के समान सम्पादन करके शिष्यों के लिये समर्पित कर दें | ऐसे गुरु कभी यह नहीं कहते कि वे गुरु हैं और लोगों को मोक्ष का मार्ग, ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाने के लिये आए हैं | वे उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये कभी कुछ ऐसा नहीं बताते जो तर्क संगत न हो | सरल और विनम्र होते हैं | उनके मन में शिष्यों के प्रति भी तथा अन्य लोगों के प्रति भी अगाध स्नेह भरा होता है | ज्ञान का सच्चे अर्थों में भण्डार होते हैं | पर ऐसे गुरु हैं कितने, और उन्हें खोजा किस तरह जाए ? स्कूल कालेजों में भी विद्यार्थियों को मन से पढ़ाने वाले शिक्षक मिल सकते हैं, जो ट्यूशन के लालच में स्कूल का काम घर पर ट्यूशन के समय कराने के लिए नहीं छोड़ेंगे बल्कि स्कूल में पूरा कराएँगे | जो किताबी ज्ञान के साथ साथ बच्चों को संस्कारवान भी बना सकते हैं | किन्तु इस सबके लिए आवश्यकता है कि आधुनिक तथाकथित प्रगति की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाए स्कूल कालेजों में भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखते हुए शिक्षा व्यवस्था बनाई जाए जहाँ “फोटोकापी” बनाने के स्थान पर एक योग्य और सुसंस्कृत व्यक्तित्व के विकास की ओर ध्यान दिया जाए | प्रगति तो आवश्यक है, किन्तु उसके लिए अन्धाधुन्ध कुछ भी कर गुज़रना अच्छी बात नहीं | क्योंकि पढ़ाई पैसे से नहीं होती वरन् गुरु में यदि अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण निष्ठा है, अपने विषय का पूर्ण ज्ञान है, शिष्य के प्रति तथा अपने कर्तव्य के प्रति पूरी ईमानदारी का भाव है तब ही वह गुरु लालच का त्याग करके अपना कार्य करेगा |

साथ ही धर्म और आध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों को भी “धर्म” और “आध्यात्मिकता” में अन्तर समझना होगा और धर्मान्धता तथा धर्मोन्माद का त्याग करना होगा | तभी एक ऐसे गुरु को प्राप्त कर सकते हैं जो स्वयं को “भगवान” बताने की अपेक्षा अपने शिष्यों के मानस में ज्ञान रूपी चंद्रमा की धवल ज्योत्स्ना प्रसारित करके अज्ञान रूपी अमावस्या से शिष्य को मुक्ति दिला सके | क्योंकि गुरु केवल शिक्षक ही नहीं होता अपितु माता के समान हम पर ममता का भाव रखते हुए हमें संस्कार भी प्रदान करता है और पिता के समान हमें उचित मार्ग भी दिखाता है | हमारा आत्मबल बढ़ाता है | हमें अपनी अन्तःशक्ति से परिचित कराके उसे विकसित करने के उपाय भी बताता है | साधना का मार्ग सरल बनाता है – फिर चाहे वह साधना आत्मतत्व से साक्षात्कार के लिये हो अथवा धनोपार्जन के योग्य बनने के लिये विद्यालय और कालेजों की शिक्षा की हो | ऐसा हो जाने पर ही गुरु पूर्णिमा का पर्व सार्थक हो पाएगा | और तभी प्रत्येक शिष्य गुरु के प्रति कृतज्ञ भाव से, गुरु के चरणों में श्रद्धानत होकर समर्पित हो सकेगा |

केवल एक दिन गुरु पूजा को उत्सव के रूप में मनाकर हम सब शान्त होकर बैठ जाते हैं अगले वर्ष की प्रतीक्षा में | हमें जीवनपर्यन्त गुरु के उपकारों का स्मरण करना चाहिए | तो आइये एक बार पुनः गुरु के चरणकमलों में सादर अभिवादन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें | जय गुरुदेव…..

गुरुदेव

 

बेहद याद आते हो तुम

बेहद याद आते हो तुम
जब बरसती हैं सुख की रसभीनी बून्दें / मानस पर मेरे
जब होती है कोई उपलब्धि मुझे / या मेरे अपनों को
सोचती हूँ, काश तुम होते पास मेरे / सुनाती ख़ुशी से उछल कर तुम्हें
गिनाती अपनी सबकी उपलब्धियाँ
और तब तुम भी झूमते मेरे साथ ख़ुशी में / लगा लेते मुझे अपने गले
उत्साह से देते थपकियाँ मेरी पीठ पर

ताकि बढ़ती रहूँ मैं इसी तरह सदा / चरम लक्ष्य की ओर अपने |

बेहद याद आते हो तुम
जब पाती हूँ ख़ुद को एकाकी / भरी भीड़ में भी
जब नहीं सुनी जाती बात मेरी / नहीं समझी जाती सोच मेरी
जब छा जाते हैं दुःख के काले बादल / पर नहीं बरसता अमृत रस कहीं से भी
जब नहीं मिलता हल किसी समस्या का / नहीं मिलता उत्तर किसी प्रश्न का
तब ढूँढती हैं आँखें तुम्हें हर ओर
मिल जाओ तुम कहीं / और भाग कर छिप जाऊँ मैं / आँचल में तुम्हारे
समा जाऊँ गोद में तुम्हारी / बन कर फिर वही छोटी सी गुड़िया
और मेरे बालों में स्नेहसिक्त अँगुलियाँ फिराते तुम
प्यार से देते थपकियाँ मेरी पीठ पर / बोलो नेहपगी दृढ़ वाणी में
तुम्हारा कोई भी कष्ट नहीं है बड़ा / तुम्हारी संकल्पशक्ति और साहस से
तुम्हारी कोई भी समस्या / कोई भी प्रश्न नहीं है बड़ा / तुम्हारी योग्यता से
गिर पड़ने पर मेरे / हाथ पकड़ उठा लो मुझे / और बोलो
उठो, साहस के साथ जगाओ / अपने सुप्त पड़ चुके संकल्पों को
प्रयास करो कौशल, उत्साह और साहस के साथ / पाने का अपने लक्ष्य को
पीछे रह जायेंगे सारे अवसाद / सारी समस्याएँ
मिल जायेंगे तब उत्तर / सभी प्रश्नों के ।
पर नहीं आज तुम साथ मेरे
मात्र अहसास भर है होने का तुम्हारे / मेरी आत्मा में / मेरे अस्तित्व में
क्योंकि तुम्हीं से तो बना है अस्तित्व मेरा

सींचा जिसे तुमने अपने रक्त से / अपने नेह जल से / अपनी ममता से
अपने संकल्प से दृढ़ता से जुड़े रहेने को / दिया आधार जिसे तुमने अपने विश्वास का

सजाने को जिसका रूप दिए तुमने आभूषण / साहस और उत्साहों के

ऊँचा उड़ने को जिसे दिए तुमने पंख / आदर्श, नैतिकता और संकल्पों के
हाँ, तुम सदा साथ हो मेरे / मेरी यादों में / मेरी सोचों में / मेरे अस्तित्व में

अभिषिक्त करते हुए सदा अपने नेहमिश्रित आशीषों से…

फिर भी न जाने क्यों… बेहद याद आते हो तुम…

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मेघों ने बाँसुरी बजाई

मौसम ने अपनी ही एक पुरानी रचना याद दिला दी:-

मेघों ने बाँसुरी बजाई, झूम उठी पुरवाई रे |

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

उमड़ा स्नेह गगन के मन में, बादल बन कर बरस गया

प्रेमाकुल धरती ने नदियों की बाँहों से परस दिया |

लहरों ने एकतारा छेड़ा, कोयलिया इतराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

बूँदों के दर्पण में कली कली निज रूप निहार रही

धरती हरा घाघरा पहने नित नव कर श्रृंगार रही |

सजी लताएँ, हौले हौले डोल उठी अमराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

अँबुवा की डाली पे सावन के झूले मन को भाते

हर इक राधा पेंग बढ़ाए, और हर कान्हा दे झोंटे |

हर क्षण, प्रतिपल, दसों दिशाएँ लगती हैं मदिराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

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बहारें

दो तीन दिनों से भारी उमस और बीच बीच में घिर आई घटाओं को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे तेज़ बारिश होगी | पर लगान वाला क़िस्सा हो रहा था… मेघराज झलक दिखलाकर अपनी प्यारी सखी मस्त हवा के पंखों पर सवार हो न जाने कहाँ उड़ जाते थे… पर आख़िरकार आज सुबह कुछ अमृत की बूँदें अपने अमृतघट से छलका ही दीं… मौसम कुछ ख़ुशनुमा हो गया… और इस भीगे मौसम में याद हो आई अपने बचपन की…

भले ही दिल्ली की इन गगनचुम्बी इमारतों में कोयल की पंचम या पपीहे की पियू पियू की पुकारें सुनाई नहीं देतीं… भले ही भँवरे की खरज की गुंजार को कान तरस जाते हैं… भले ही उन रंग बिरंगे छोटे बड़े पंछियों का सितार के तारों की झनकार सी मधुर आवाज़ों में सुरीला राग छिड़ना अब कम हो गया हो… फिर भी बरखा की रिमझिम वो पुरानी यादें तो ताज़ा करा ही देती है…

वो तीन चार महीने की अच्छी धुआंधार बारिश… वो पतनालों से गिरते पानी का किसी गड्ढे में इकट्ठा हो जाना और उसमें कागज़ की नाव बनाकर छोड़ना और ख़ुशी से तालियाँ बजाकर उछलना… स्कूल कॉलेज जाते छाते लेकर तो भी क्या मज़ाल कि भीगने से बच ही जाएँ… मेघराज अपना प्रेम कुछ इस अन्दाज़ में उंडेलते थे कि तन के साथ साथ मन भी भीज भीज जाता था… और भीगने से बचना ही कौन चाहता था…

वो घर से बैग में नमक छिपाकर ले जाना और रास्ते में किसी पेड़ से कच्ची अमियाँ तोड़कर हिलमिल कर नमक के साथ चटखारे लेकर खाते जाना… वो घर वापसी में छाते एक तरफ़ रख पीपल के चबूतरे पर बैठकर आपस में बतियाते हुए अपने बालों के रिबन खोल देना और गीली हवा के साथ अपनी जुल्फों को मस्ती में बहकने देना…

घर पहुँचते ही माँ की मीठी सुरीली रसभरी आवाज़ कानों में पड़ना “पूनम, आ गईं बेटा, आओ देखो हमने कितनी तरह की पकौड़ियाँ बनाई हैं, जल्दी से आ जाओ…” और बैग पटक गीले कपड़ों में ही रसोई में घुस जाना… भले ही पकौड़ियों के साथ माँ की मीठी फटकार भी क्यों न सुननी पड़ जाए “कितनी बार कहा बरसाती ख़रीद लो, पर तुम क्या कभी कुछ सुनोगी ?” फिर पापा की तरफ़ मुख़ातिब हो जाना “और तुम भी… कुछ नहीं कहते इसे… इतना सर चढ़ा रखा है… बीमार पड़ेगी ऐसे भीग कर तो मत बोलना…” और भूरी आँखों वाले पापा का मीठी हँसी हँसकर अपनी बिटिया को गले से लगाकर बोलना “अरी भागवान, चिन्ता मत करो, हमारी बिटिया को कुछ नहीं होगा…” और इसी तरह हँसते बतियाते दिन भर के हमारे कारनामों की जानकारी ले लेना… क्या कुछ याद करें… क्या कुछ भूलें… बहरहाल, उन्हीं दिनों की याद में प्रस्तुत हैं कुछ पंक्तियाँ…

हीरों के हारों सी चमकें फुहारें, और वीणा के तारों सी झनकें फुहारें |

धवल मोतियों सी जो झरती हैं बूँदें, तो पाँवों में पायल सी खनकें फुहारें ||

कोयल की पंचम में मस्ती लुटातीं, तो पपिहे की पीहू में देतीं पुकारें |

कली अनछुई को रिझाने को देखो षडज में ये भँवरे की देतीं गुंजारें ||

मेघों के डमरू की धुन सुनके मस्ती में बहकी हैं जातीं ये चंचल बयारें |

दमकती है बिजली तो भयभीत गोरी सी काँपी हैं जातीं ये चंचल बयारें ||

दिल की उमस से पिघलती हैं बूँदें, और मल्हारें गाती बरसती हैं बूँदें |

धड़कन सी देखो धड़कती हुई और मचलती हुई ये बरसती हैं बूँदें ||

मस्ती भरा मद टपकता है जिनसे, वो आमों की डालों पे लटकी हैं बौरें |

हरेक दिल में मदमस्त जादू जगाती और खुशबू उड़ाती ये लटकी हैं बौरें ||

कहो कैसे कोई उदासी में डूबे, जो मस्ती भरे गीत गाती बहारें |

कि रिमझिम के मीठे नशीले सुरों में हैं कितनी ही तानें सजाती बहारें ||

10

 

रात भर छाए रहे हैं

रात भर छाए रहे हैं, मेघ बौराए रहे हैं

देख बिजली का तड़पना, मेघ इतराए रहे हैं |

बाँध कर बूँदों की पायल, है धरा भी तो मचलती

रस कलश को कर समर्पित, मेघ हर्षाए रहे हैं ||

पहन कर परिधान सतरंगी, धरा भी है ठुमकती

रास धरती का निरख कर, मेघ ललचाए रहे हैं |

तन मुदित, हर मन मुदित, और मस्त सारी चेतना है

थाप देकर धिनक धिन धिन, मेघ लहराए रहे हैं ||

सुर से वर्षा के उमंगती रागिनी मल्हार की है

और पवन की बाँसुरी सुन, मेघ पगलाए रहे हैं |

मस्त नभ निज बाँह भरकर चूमता है इस धरा को

करके जल थल एक देखो, मेघ इठलाए रहे हैं ||

Radiant Cloudy Sky over Sea Water

अध्यात्मयुत सूक्ष्म मनोविज्ञान

कर्ममार्ग पर अग्रसर होने में ऐसा अनेक बार हो सकता है कि व्यक्ति कर्तव्य और अकर्तव्य का भेद बुला बैठे और संशयग्रस्त हो जाए | जब जब भी इस प्रकार के संशय की स्थिति आती है कि व्यक्ति को कर्म अकर्म का कोई ज्ञान नहीं रहता तब तब श्रीकृष्ण जैसे किसी मनश्चिकित्सक की आवश्यकता होती है |

रामचरितमानस में एक प्रसंग आता है कि जामवंत, हनुमान, अंगद आदि वानर सेना के साथ माता सीता का पता लगाने जाते हैं | बहुत समय व्यतीत हो जाता है किन्तु वे अपने कार्य में सफल नही हो पाते | सब सोचते हैं कि कार्य पूर्ण किये बिना यदि वापस गए तो सुग्रीव हमें जीवित नहीं छोड़ेंगे, और यदि यहाँ पड़े रहे तो वैसे ही भूख प्यास से हम सब मारे जाएँगे | क्या करें क्या न करें | वही किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति | तभी जटायु का भाई सम्पाति वहाँ आता है और बताता है कि माता सीता को रावण ने अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा हुआ है | मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, किन्तु तुम लोगों को राम का यह कार्य अवश्य करना चाहिये | वानर शत योजन सागर पार करके लंका जाने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे थे | जामवन्त को लगता था कि वे बूढ़े हो चुके हैं | अंगद और हनुमान भी सशंकित थे कि वे लोग सम्भवतः लंका नहीं जा पाएँगे | अपना बल ही वे भूल चुके थे | तब जामवन्त ने कहा :

“पवन तनय, बल पवन समाना, बुद्धि बिबेक बिग्यान निधाना |
कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होत तात तुम्ह पाहीं |
राम काज लगि तव अवतारा, सुनतहिं भयऊ पर्वताकारा ||” – किष्किन्धाकाण्ड

“हनुमान तुम चुप क्यों बैठे हो ? तुम्हारा बल तो पवन के समान है | बुद्धि, विवेक और विज्ञान के तुम निधान हो | संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जो तुम कर न सको | तुम्हारा तो जन्म ही भगवान के कार्य के लिये हुआ है |” इतना सुनकर हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण हुआ और बोले “यदि ऐसा है तो मैं अभी जाता हूँ और माता सीता को देखकर वापस आता हूँ | कार्य पूर्ण होने पर मुझे भी हर्ष होगा – जब लगि आवौं सीतहि देखी, होहहि काजु मोहि हरष विसेषी – सुन्दरकाण्ड…” और वे तुरंत पर्वताकार होकर लंका की ओर चल दिये | इस प्रकार हनुमान के संशय को जामवंत ने दूर किया |

अर्जुन के साथ भी यही स्थिति थी | उन्हें भी मोहवश अपने लक्ष्य का भान नहीं रहा था | वही उन्हें बताना था | इसीलिये उन्होंने कहा कि समस्त कामनाओं का त्याग करके कर्तव्य कर्म करो | ज्ञानी व्यक्ति का यही लक्षण है | अर्जुन ने फिर संशय किया कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर आप मुझे हिंसा जैसे क्रूर कर्म में क्यों लगाते हैं ? भगवान ने उत्तर दिया कि तुम्हारा कर्तव्य कर्म युद्ध ही है | तीनों लोकों में मेरा तो कोई कर्तव्य कर्म नहीं है, फिर भी मैं कर्म करता हूँ | यदि मैं ऐसा नहीं करूँगा तो लोक मर्यादा का उल्लंघन होगा |

संशय अभी ही दूर नहीं हुआ था | अतः बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होने की प्रक्रिया आरम्भ हुई | अर्थात् सूक्ष्म मनोविज्ञान | सर्वप्रथम अर्जुन को भगवान ने विराट स्वरूप के दर्शन कराए | युद्ध में मरने वाले लोगों का समूह दिखाया | ताकि अर्जुन सोचने को विवश हो जाएँ कि यह युद्ध तथा यह जनहानि अवश्यम्भावी है | अतः धर्म की रक्षा हेतु युद्ध के लिये तत्पर होना ही पड़ेगा | प्रश्न मात्र राज्य प्राप्ति का ही नहीं था | प्रश्न था कि कायरतापूर्वक अन्याय तथा अत्याचार होते देखते रहना क्या उचित है ? अर्जुन सोचने को विवश तो हुए, किन्तु ऊहापोह की स्थिति फिर भी बनी ही रही | अतः भगवान ने एक लीला रची |

भगवान ने सोचा अभी पूरा झटका नहीं लगा है | उधर एक दिन जब अर्जुन का रथ लेकर कहीं दूर गए हुए थे तो उनके पीछे कौरवों ने चक्रव्यूह का निर्माण कर दिया | उनकी योजना युधिष्ठिर को बन्दी बनाने की थी | क्योंकि अर्जुन के अतिरिक्त उनके किसी भाई अथवा उनकी सेना के किसी व्यक्ति को चक्रव्यूह का भेदन नहीं आता था | अर्जुन के सोलह वर्ष के पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदन तो आता था, किन्तु उससे बाहर निकलना नहीं आता था | कारण था कि अभिमन्यु जब सुभद्रा के गर्भ में थे तब अर्जुन ने सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन की विधि बताई थी, किन्तु सुनते सुनते सुभद्रा को नींद आ गई थी और उससे बाहर निकलने की विधि वे नहीं सुन पाई थीं | इसलिये अभिमन्यु बस चक्रव्यूह भेदना ही जानते थे | किन्तु उस समय उन्हें युद्ध में भेजने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था |

अभिमन्यु बड़ी वीरता से लड़े | उनका सारथि मारा गया | रथ टूट गया | सारे अस्त्र समाप्त हो गए तो उन्होंने टूटे हुए रथ के पहिये को ही अपना अस्त्र बना लिया | किन्तु अन्त में वह भी टूट गया और निहत्थे अभिमन्यु को कौरव सेना ने घेर कर मार डाला | सबसे बड़ी विडम्बना यह थी कि भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजन – जिन पर अर्जुन को अगाध श्रद्धा थी और जिन्हें वे धर्म तथा मर्यादा के रक्षक समझते थे तथा जिनके कारण ही वे युद्ध से विमुख हो रहे थे – चुपचाप ये सब अनाचार होते देखते रहे थे | अन्ततः अर्जुन का इन दोनों गुरुजनों पर से भी विश्वास उठ गया और वे युद्ध के लिये तत्पर हो गए और उन्होंने सूर्यास्त से पूर्व ही चक्रव्यूह का निर्माण करने वाले जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा कर ली और कृष्ण की सहायता से उसमें वे सफल भी हुए |

इस प्रकार धीरे धीरे अर्जुन के मन का संशय तथा परिजनों की मृत्यु का भय दूर करके उन्हें युद्ध के लिये कटिबद्ध किया गया | जयद्रथ वध के समान ही महाभारत युद्ध में अनेक बार कृष्ण ने छल का सहारा लिया | जैसे “अश्वत्थामा मृतः” के शोर से शत्रुसेना में भगदड़ मचवा दी | भीष्म के सामने शिखण्डी को खड़ा कर दिया – इत्यादि इत्यादि… कारण – रोग को दूर करने के लिये कभी कभी कड़वी दवा भी देनी पड़ती है | मनःचिकित्सक भी अनेक बार अपने रोगियों के साथ सम्मोहन आदि की क्रिया करते हैं | भगवान को भी अपने एक मरीज़ अर्जुन के मन का विभ्रम दूर करके उन्हें युद्ध के लिये प्रेरित करना था | अतः जब जब अर्जुन भ्रमित होते – उनके मन में कोई शंका उत्पन्न होती – भगवान कोई न कोई झटका उन्हें दे देते | यही कारण था की महाभारत के युद्ध में प्रायः अधिकाँश नियमों को उठाकर ताक पर रख दिया गया था | क्योंकि उस समय की परिस्थितियों के अनुसार किसी प्रकार भी उस धर्मयुद्ध में विजय प्राप्त करके समस्त व्यवस्था को सुनियोजित रूप देना ही अर्जुन का लक्ष्य था | उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अर्जुन को समत्व बुद्धि अपनानी थी | उसे शत्रु मित्र छोटे बड़े सबके लिये समान भाव रखते हुए युद्ध में प्रवृत्त होना था | तभी एक ओर जहाँ वह दुर्योधन तथा दुशासन आदि कौरवों से युद्ध कर सकता था वहीं भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों के साथ युद्ध करने में भी उसका संकोच समाप्त हो सकता था | इसीलिये कृष्ण ने उसे योग का उपदेश दिया | यही थी अन्तर्मुखी होने की प्रक्रिया – सूक्ष्म मनोविज्ञान, और इसी से समझ में आ सकता था जीवन का मूल्य |

“नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पम्प्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || – २/४०” मनश्चिकित्सक का प्रथम कर्तव्य है रोगी को यथार्थ का ज्ञान कराना | आरम्भ ही अभिक्रम है – इस कर्मयोगरूप मोक्षमार्ग में अभिक्रम का नाश नहीं होता तथा चिकित्सा आदि की भाँति इसमें प्रत्यवाय अर्थात् विपरीत फल नहीं है | इस कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मरण रूप महान संसार भय से रक्षा करता है |

ध्यानयोग का बहिरंग साधन कर्म है | अतः जब तक ध्यानयोग पर आरूढ़ होने में समर्थ नहीं हो जाते तब तक कर्तव्य कर्म अवश्य करते रहना चाहिये | जैसे जैसे ध्यानयोग के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती जाती है – मनुष्य के समस्त कर्म स्वतः ही समाप्त होते जाते हैं |

यद्यपि कर्म कूप तालाब आदि छोटे जलाशयों की भांति अल्प फल देने वाले होते हैं – तो भी ज्ञान निष्ठा का अधिकार मिलने से पूर्व कर्म ही करते रहना चाहिये |

साथ ही, न तो कर्मफल में तृष्णा होनी चाहिये और न ही “यदि कर्मफलं न इष्यते किं कर्मणा दुःखरूपेण |” भाव से कर्म में अनासक्ति ही होनी चाहिये | फलतृष्णा रहित पुरुषार्थ द्वारा कार्य किये जाने पर अन्तःकरण की शुद्धि होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है | अतः सिद्धि असिद्धि में समत्व भाव से कर्म करना चाहिये – समत्वं योग उच्यते |

सकाम कर्म करने वाले तो कृपण होते हैं | इसी कृपणता के कारण मनुष्य विक्षिप्त होता है, भयभीत होता है – यह सोचकर कि उसके किये गए कर्म का फल उसे मिलेगा भी अथवा नहीं, और मिलेगा तो कितने समय में मिलेगा, कैसा मिलेगा – आदि आदि… अर्थात् उसमें वणिकबुद्धि आ जाती है | जब बुद्धि इस मोहात्मक अविवेक का उल्लंघन कर जाती है तब वह बिल्कुल शुद्ध हो जाती है | समाधि में अर्थात् चित्त के समाधान द्वारा विक्षिप्त हुई बुद्धि अचल और दृढ़ हो जाती है – स्थिर हो जाती है | अतः यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धि की स्थिरता चाहने वाले को इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है | यही है अध्यात्मयुत मनोविज्ञान |

भारतीय जीवन दर्शन – भारतीय मनोविज्ञान – अध्यात्म पर ही आधारित है | भारतीय जन मानस में एक ही आस्था है “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” और इस प्रकार अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा अन्ततः मोक्षरूप परम पद को प्राप्त करना | इस लक्ष्य से थोड़ा सा भी च्युत होते ही मति विभ्रम हो जाता है | यही कारण था कि भगवान का विराट रूप देखकर जब अर्जुन भयभीत और भ्रमित हो गए तब भगवान ने उनसे यही कहा कि तू युद्ध करे या न करे, इन सबका अन्त तो अवश्यम्भावी है | फिर क्यों नहीं तू निमित्त मात्र होकर युद्ध करता ? मन:चिकित्सक का वास्तविक कार्य यही है – यथार्थ का ज्ञान कराना – मनुष्य को उसकी ज़मीन से जोड़ना |

इस प्रकार अर्जुन को यह जो अन्तर्मुखी बनाने की प्रक्रिया हुई यही है सूक्ष्म मनोविज्ञान | तदुपरान्त भगवान ने अर्जुन को आत्मस्वरूप के दर्शन कराए और धीरे धीरे ज्ञान का बीजारोपण किया | इस प्रकार उनके मन को परिवर्तित करके उन्हें त्याग और वैराग्य का मार्ग बताया | जिससे उनके मन के विभ्रम का, मोह का नाश हुआ और वे कर्तव्य कर्म में प्रस्तुत हुए | यह थी अध्यात्म के द्वारा अर्जुन की मनश्चिकित्सा | युद्ध के लिये कटिबद्ध अर्जुन ने स्वयं कहा “नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव || १८/७३” हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हुई | इसलिये मैं संशयरहित होकर स्थिरबुद्धि वाला हो गया हूँ और अब आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

सम्भवतः कुछ लोगों का विचार हो कि निष्काम कर्मयोग तो सन्यासियों के लिये होता है, गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिये, सामाजिक जीवन जीने वालों के लिये तो यह निष्काम कर्मयोग सम्भवतः उन्हें कर्म ही न करने दे | किन्तु यदि ऐसा होता तब तो अर्जुन – जो कि मोहवश क्षात्रधर्म से विमुख होकर गाण्डीव छोड़कर बैठ गए थे – गीता का उपदेश सुनकर सब कुछ छोड़ छाड़ कर सन्यासी हो जाते | किन्तु ऐसा नहीं हुआ | अपितु इस उपदेश को सुनकर ही उन्होंने आजीवन गृहस्थ रहकर अपने कर्तव्य का पालन किया | जब इस प्रकार आध्यात्म मार्ग से मन का विभ्रम दूर करके, उसे स्थिर करके कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त किया जा सकता है, तो भला क्यों नहीं किसी भी बड़े से बड़े अपराधी का ह्रदय परिवर्तन नहीं किया जा सकता इस प्रकार अध्यात्म परक मन:चिकित्सा के द्वारा ? यहाँ तक कि सम्पूर्ण समाज का ह्रदय परिवर्तन किया जा सकता है | और फिर तब किसी भी प्रकार के सामाजिक भय से, धर्म के भय से, लोक मर्यादा के भय से, जाति के भय से, मान प्रतिष्ठा के भय से, अथवा अन्य किसी भी प्रकार के मानसिक विकार से व्यक्ति को, समाज को मुक्ति प्राप्त हो सकती है और अनेक प्रकार के अपराधों को होने से रोका जा सकता है | इस प्रकार की अध्यात्मपरक मन:चिकित्सा का मार्ग कठिन अवश्य है, लंबा भी है, किन्तु इसके परिणाम भी उतने ही दूरगामी हैं |

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अध्यात्म गुरु और मनोचिकित्सक

अक्सर लोग ध्यान और वैराग्य के अभ्यास द्वारा मन का निग्रह करके ईश्वर प्राप्ति की बात करते हैं | यह प्रक्रिया अध्यात्म की प्रक्रिया है | इस प्रक्रिया के लिए गुरु के बताए मार्ग का अनुसरण करना होता है | मन को ध्यानावस्थित करना वास्तव में एक कठिन प्रक्रिया है – क्योंकि मन गतिमान होता है – चंचल होता है – बहुत शीघ्र ही मोहग्रस्त हो जाता है – अनेकों वासनाएँ और इच्छाएँ मन को जकड़े रखती हैं – और इन सबके कारण कर्तव्य अकर्तव्य का बोध ही व्यक्ति को नहीं रहता तो ध्यान की प्रक्रिया तो फिर इसके बहुत बाद में आरम्भ होती है | यही कारण है कि अध्यात्म गुरु को मनोचिकित्सक की भूमिका का भी निर्वाह करना पड़ जाता है अपने प्रशिक्षु के मन को व्यवस्थित करके उसे सही दिशा निर्देश देने के लिए | यहाँ प्रश्न किया जा सकता है कि क्या क्या सम्बन्ध है आपस में अध्यात्म और मनोविज्ञान का जो गुरु को मनोचिकित्सक का कार्य भी करना पड़ जाता है ? क्या अध्यात्म के द्वारा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा सम्भव है ? किन परिस्थितियों में मनुष्य भ्रमित हो सकता है ? तो, सबसे पहले विचार करते हैं कि मनुष्य भ्रमित कब होता है ?

भय व आतंक के वातावरण में मनुष्य अपने लक्ष्य से भटक जाता है, उसे कर्तव्य अकर्तव्य का भान नहीं रहता, और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में कई बार वह ग़लत निर्णय ले बैठता है | यह भय किसी भी बात का हो सकता है | अक्सर सुनने में आता है कि प्रेम करने वाले नवविवाहितों को “ऑनर किलिंग” के नाम पर मौत के घाट उतार दिया गया तो कहीं कुछ विकृत मानसिकता वाले युवकों ने निर्भया जैसा वीभत्स काण्ड कर डाला | कहीं किसी पुत्र ने सम्पत्ति विवाद के चलते अपने माता पिता को ही मौत की नींद सुला दिया | कहीं विवाहेतर सम्बन्धों के कारण पति अथवा पत्नी ने अपने जीवन साथी की ही जान ले ली |

किन्तु इस प्रकार के मनोविकार व्यक्ति में अकारण या अनायास ही नहीं आते | कहीं इनका कारण होता है बच्चों का अनुचित रूप से पालन पोषण – जिसके कारण उन्हें न परिवार का भय रहता है और न समाज का और न ही किसी प्रकार के दण्ड का | होता है तो केवल मिथ्या अहंकार अथवा लोभ अथवा मात्र मन की विकृति | इसके अतिरिक्त कुछ घटनाएँ कहीं समाज के भय के कारण होती हैं तो कहीं कारण होता है धर्म का भय | कई बार कहीं बिना किसी भय के भी केवल झूठे अहंकार के कारण भी ऐसी स्थिति हो जाती है | कहीं किसी अन्य कारण से भी लोग अनुचित कर्म कर जाते हैं | जैसे एक बार एक घटना का पता चला कि एक दादा ने अपनी ही चार पाँच बरस की पोती को अपनी हवस का शिकार बना डाला, आदि आदि… ऐसी पाशविकताएँ क्या स्वस्थ मनोवृत्ति वाले लोग कर सकते हैं ?

वास्तव में ऐसे लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हैं | किसी न किसी प्रकार की कुंठा से ग्रस्त हैं ये लोग | कहीं कोई एथलीट खेल में प्रथम आने के लिये नशीली दवाओं का सेवन करता पकड़ा जाता है | यह प्रतिष्ठा का भय है | धर्म का भय, लोक मर्यादा का भय, जाति अथवा समाज का भय, मान प्रतिष्ठा का भय – किसी प्रकार का भी भय मनुष्य को विक्षिप्त कर सकता है | और इन सबसे भी बढ़कर होता है मृत्यु का भय | हम अपने रास्ते यातायात के नियमों के अनुकूल गाड़ी चला रहे हैं कि अचानक ऐसा होता है कि किसी दूसरी कार का ड्राइवर बिना आगे पीछे दाएँ बाएँ देखे गाड़ी सड़क पर ले आता है | उस समय दो ही बातें हो सकती हैं – यदि हममें समझदारी है, साहस है, तो हम सफ़ाई से अपनी गाड़ी एक ओर को बचाकर निकाल ले जाने का प्रयास करेंगे | इतने पर भी यदि दुर्घटना घट जाती है तो उसमें हमारा कोई दोष नहीं होगा | किन्तु यदि हममें साहस का अभाव है और हम आशंकित अथवा भयभीत हो जाते हैं तो हमारी गाड़ी किसी दूसरी गाड़ी से अवश्य ही टकराएगी और हम अपने साथ साथ दूसरी गाड़ी के ड्राइवर को भी दुर्घटना का शिकार बना देंगे |

कभी कभी कुछ मन्दबुद्धि लोग सत्ता, धन या पद के दम्भ में भी लक्ष्यच्युत होकर उल्टे सीधे काम कर बैठते हैं | क्योंकि हमारे दम्भ पर, अहंकार पर, भय पर, क्रोध पर, मोह पर, लोभ पर हमारा नियन्त्रण नहीं है | दम्भ, अहंकार, क्रोध, मोह, लोभ, आतंक अथवा भय से ग्रस्त होकर किसी भी प्रकार का अनुचित कार्य कर बैठना ही भ्रम की अवस्था होती है | क्योंकि मोहवश, क्रोधवश, लोभवश अथवा अहंकारवश मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है, भ्रमित हो जाता है | अतः इस भ्रम से मुक्ति पाने के लिये मन से मृत्यु का तथा अन्य किसी भी प्रकार का भय दूर करके, व्यर्थ के मोह, लोभ, क्रोध अथवा अहंकार से मुक्त होकर लक्ष्यप्राप्ति की ओर अग्रसर होना आवश्यक है | ज्ञानी पुरुष के साथ यह स्थिति नहीं आती, क्योंकि उसे पूर्ण सत्य अर्थात जीवन के अन्तिम सत्य का ज्ञान हो जाता है | जिसे यह ज्ञान नहीं होता उसे ही दिशा निर्देश की आवश्यकता होती है |

यही कार्य श्रीकृष्ण ने किया | अर्जुन ने जब दोनों सेनाओं में अपने ही प्रियजनों को आमने सामने खड़े देखा तो उनकी मृत्यु से भयाक्रान्त हो श्री कृष्ण की शरण पहुँचे “शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” तब भगवान ने सर्वप्रथम उनके मन से मृत्यु का भय दूर किया | मृत्यु को अवश्यम्भावी, देह को असत् तथा आत्मा को सत् बताते हुए अर्जुन को लोकमर्यादानुसार धर्ममार्ग पर चलते हुए लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग बताया | उनका लक्ष्य उन्हें बताया | थोड़ी फटकार देते हुए उनसे कहा कि जब तू अशोच्य के विषय में शोक करता है तो फिर बुद्धिमानों की भाँति बातें करने का नाटक क्यों करता है ? तू तो मुझे बिल्कुल उन्मत्त जान पड़ता है जो मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्पर भावों को एक साथ दिखा रहा है | जबकि वास्तवकिता तो यह है कि आत्मज्ञानी न तो मृत वस्तुओं के विषय में शोक करता है और न ही जीवित वस्तुओं के विषय में कुछ सोचता है | जिस प्रकार शरीर की कौमार, यौवन और जरा ये तीन अवस्थाएँ होती हैं उसी प्रकार एक चौथी अवस्था भी होती है – देहान्तर प्राप्ति की अवस्था | जिस प्रकार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करने पर आत्मा न तो मरती है और न ही पुनः उत्पन्न होती है, उसी प्रकार एक देह की समाप्ति पर आत्मा नष्ट नहीं हो जाती और न ही दूसरी देह में प्रवेश करने पर उसकी पुनरुत्पत्ति ही होती है : “अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत !” २/१३ स्वप्न व माया के शरीर की भांति ये सब शरीर अन्तवन्त हैं | जबकि आत्मा नित्य और निर्विकार है | अतः आत्मा को नित्य और निर्विकार मानकर तू युद्ध कर |

अर्जुन को अभी भी संशय था कि भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों के साथ युद्ध करना धर्मविरुद्ध होगा | इस संशय को दूर करने के लिये ही कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि आत्मा अकर्ता है | और जब आत्मा अकर्ता है तो उसके मरने, मारने, जलने, गलने जैसी क्रियाएँ हो ही नहीं सकतीं | ये सब तो स्थूल शरीर के धर्म हैं | और यदि आत्मा को लोकप्रसिद्धि के अनुसार अनेक शरीरों की उत्पत्ति और विनाश के साथ साथ उत्पन्न और नष्ट होता हुआ मान भी लें तो भी इस विषय में शोक करना उचित नहीं, क्योंकि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मर चुका है उसका पुनर्जन्म निश्चित है | अतः युद्ध करना धर्मसंगत है | और क्षत्रिय का तो धर्म ही युद्ध करना है | यदि तू युद्ध किये बिना ही पीछे हट गया तो तिरस्कार और दया का पात्र होगा | युद्ध करते करते यदि वीरगति को प्राप्त हुआ तो स्वर्ग में जाएगा और सौभाग्य से यदि जीत गया तो पृथिवी का भोग करेगा | वैसे भी तेरा अधिकार कर्म करने में है न कि कर्मफल में | इस प्रकार अर्जुन के मन से मृत्यु का भय दूर करने के लिये आत्मा के विषय में बताकर उसके मन में ज्ञान का बीजारोपण किया कृष्ण ने | क्योंकि डाक्टर या वैद्य का एक कर्तव्य यह भी है कि यदि मरीज़ के मन में उसकी बीमारी को लेकर किसी प्रकार का भ्रम है तो उस भ्रम को दूर करने के लिये वह मरीज़ को हर बात की सही सही जानकारी दे | और यही कार्य भगवान ने किया |

इस प्रकार यही सिद्ध होता है कि अध्यात्म के मार्ग पर चलते हुए कर्मरत रहने वाला व्यक्ति भी जब किसी कारणवश मोहग्रस्त अथवा भ्रमित हो जाता है तो उसके अध्यात्म गुरु को मनोचिकित्सक की भूमिका का भी निर्वाह करना पड़ जाता है |

GUru JI & Ma