मेरा अन्तर इतना विशाल

मेरा अन्तर इतना विशाल

समुद्र से गहरा / आकाश से ऊँचा / धरती सा विस्तृत

जितना चाहे भर लो इसको / रहता है फिर भी रिक्त ही

अनगिन भावों का घर है ये मेरा अन्तर

कभी बस जाती हैं इसमें आकर अनगिनती आकाँक्षाएँ और आशाएँ

जिनसे मिलता है मुझे विश्वास और साहस / आगे बढ़ने का

क्योंकि नहीं है कोई सीमा इस मन की

चाहे जितनी ऊँची पेंग बढ़ा लूँ / छू लूँ नभ को भी हाथ बढ़ाकर

क्योंकि धरती और आकाश दोनों ही हैं मेरा घर

या पहुँच जाऊँ नभ के भी पार / जहाँ न हो धरती का भी कोई आकर्षण

या चाहे अपनी कल्पनाओं से करा दूँ मिलन / धरा और आकाश का

इतना कुछ छिपा है मेरे इस अन्तर में / फिर भी है ये रीता का रीता

खिले हैं अनगिनती पुष्प मेरे अन्तर में

आशाओं के, विश्वासों के, उत्साहों के

न तो कोई दीवार है इसके चारों ओर / न ही कोई सीमा इसकी

अतुलित स्नेह का भण्डार मेरे इस अन्तर में

आ जाता है जो एक बार / नहीं लौटता फिर वो रिक्त हस्त

अपने इसी खालीपन में तो मिलता है मुझे

विस्तार अपार

नहीं चाहती भरना इसे पूरी तरह

भर गया यदि यह रीता घट / तो कहाँ रह जाएगा स्थान

नवीन भावनाओं के लिए… नवीन आशाओं के लिए…

इसीलिए तो प्रिय है मुझे

अपना ये विशाल अन्तर

क्योंकि रहता है सदा इसमें / अवकाश अपार…

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निशा से भोर तलक – भोर से फिर निशा तलक – एक कहानी

हर सुबह आती है लेकर एक नई कहानी…

हर नवीन दिवस के गर्भ में छिपे होते हैं

न जाने कितने रहस्य निशा बावरी के…

जैसे जैसे चढ़ता है दिन / होने लगते हैं अनावृत जो धीरे धीरे…

जो बनाते हैं हमें सक्षम

ताकि कर सकें हम पालन अपने समस्त कर्तव्यों का…

हर दिन का सौन्दर्य होता है दिव्य और अनूठा…

ऐसा दिव्य / ऐसा अनूठा / जो करता है नृत्य सूर्यकिरणों संग

और खोलता है एक रहस्य / कि जीवन नहीं है बोझ…

जीवन तो है एक उत्सव / प्रकाश का / गीत और संगीत का / नृत्य का…

फिर धीरे धीरे ढलता है दिन

उतरती आती है सन्ध्या परी / हौले हौले / लुटाती अपना मादक सौन्दर्य…

जिसे देख आरम्भ हो जाती है मौन साधना दिवस की

ताकि बचा रहे बहकने से / सन्ध्या सुन्दरी के यौवन की मदिरिमा से…

और मिल जाता है अवकाश उस सुन्दरी को

सुनाने को अपना राग जगत प्रियतम को…

आरम्भ कर देती है झिलमिलाते तारकों संग मस्ती भरा नृत्य

धवल चन्द्रिका के मधुहास युक्त सरस गान पर…

और जब थक कर हो जाती है बेसुध / तो आती है शान्त निशा

ले जाती है सखी सन्ध्या को / ढाँप कर अपने आँचल में

और मौन हो छिप जाती हैं भोर के पीछे दोनों सखियाँ

करने को कुछ पल विश्राम…

तब फिर से सुबह आती है लेकर एक नई कहानी

और देती है संदेसा निज प्रियतम को

कि आएँ / और प्रस्तुत करें नृत्य रजत रश्मियों संग

सृष्टि के मनोरम सभागार में

दिवस निशा का ये खेल / देता है संदेसा हर जन को

कि मत बैठो थक कर / चाहे कितना भी किया हो श्रम

बढ़ते जाओ अपनी दिशा में… पाना है जो लक्ष्य अपना…

कि मत घबराओ / यदि हो जाए कोई द्वार बन्द

देखो आगे बढ़कर / खुलेगा कोई नया द्वार

आशा का / विश्वास का / उत्साह का / उमंग का

जो पहुँचायेगा लक्ष्य तक तुम्हें

निर्बाध / निरवरोध

क्योंकि यही तो क्रम है सृष्टिचक्र का… प्रकृति का…

शाश्वत… सत्य… चिरन्तन…

 

 

बहुत याद आते हो तुम

आज फिर यों ही याद आ गए तुम |

कल बैठी देख रही थी एक तस्वीर / इन्द्रधनुष की

जो उतारी थी कभी किसी पहाड़ी पर

सात रंगों की माला धारण किये / इन्द्रधनुष |

और याद आ गया मुझे अपना वो बचपन

कि अक्सर बारिश के बाद

जब भी दीख पड़ता था ये प्यारा सा इन्द्रधनुष

हम देते थे संदेसा उसे / पहुँचाने को उन अपनों के पास

जो जा बैठे थे दूर कहीं / दूसरी दुनिया में

दादी बाबा और दूसरे वो अपने

जिन्होंने बढ़ाया था सदा उत्साह और बरसाया सा असीम स्नेह

कोमल मन पर |

क्योंकि बचपन में कभी दिखाते हुए इन्द्रधनुष / बताया था आपने ही तो

“अपने कभी मरते नहीं, तारे बन कर आकाश में चमकते रहते हैं

और लुटाते रहते हैं अपना स्नेह और आशीर्वाद / वहीं बैठे

जब भी उनसे कुछ कहना चाहो

इन्द्रधनुष को बता देना

पहुँचा देगा संदेसा वो उन तक तुम्हारा…

लिख कर सात रंगों की स्याही से…” |

पर कहाँ अब वो बरसातें / कि जिनके बाद दीख पड़े सतरंगी इन्द्रधनुष

क्योंकि काट कर पेड़ / कर डाला धरा को निर्वस्त्र / स्वार्थी मनुष्य ने |

कहाँ से अब वो उमडें / घुमड़ घुमड़ कर मेघराज की सेनाएँ भी

क्योंकि धरा और नदियों से उठते प्रेरणादायी वाष्पकण

तो सूख चुके हैं जाने कब के |

अब तो आते हैं तेज़ आँधी और तूफ़ान

और कर जाते हैं धूल धूसरित पल भर में हर घर आँगन को |

काश कि फिर से पेड़ उगाकर

वापस लौटा लाएँ ऋतुओं की सखियों को

ताकि सावन में जब बरखा रानी झूमती गाती आए

तो देख सकूँ मैं फिर से वो अनोखा इन्द्रधनुष

जो ले जाएगा मेरा संदेसा पास तुम्हारे…

कि तुम याद बहुत आते हो / ये जानते हुए भी

कि तारे बने तुम लुटा रहे हो / आशीष और नेह की इन्द्रधनुषी किरणें…

मेरे कोमल मन पर… निरन्तर… अनवरत…

मैं आशा पुष्प खिला जाती

मुझमें ही आदि, अन्त भी मैं, मैं ही जग के कण कण में हूँ |

है बीज सृष्टि का मुझमें ही, हर एक रूप में मैं ही हूँ ||

मैं अन्तरिक्ष सी हूँ विशाल, तो धरती सी स्थिर भी हूँ |

सागर सी गहरी हूँ, तो वसुधा का आँचल भी मैं ही हूँ ||

मुझमें है दीपक का प्रकाश, सूरज की दाहकता भी है |

चन्दा की शीतलता, रातों की नीरवता भी मुझमें है ||

मैं ही अँधियारा पथ ज्योतित करने हित खुद को दहकाती |

और मैं ही मलय समीर बनी सारे जग को महका जाती ||

मुझमें नदिया सा है प्रवाह, मैंने न कभी रुकना जाना |

तुम जितना भी प्रयास कर लो, मैंने न कभी झुकना जाना ||

मैं सदा नई चुनती राहें, और एकाकी बढ़ती जाती |

और अपने बल से राहों के सारे अवरोध गिरा जाती ||

मुझमें है बल विश्वासों का, स्नेहों का और उल्लासों का |

मैं धरा गगन को साथ लिये आशा के पुष्प खिला जाती ||

मन का तीरथ

मन के भीतर एक तीर्थ बसा, जो है पुनीत हर तीरथ से

जिसमें एक स्वच्छ सरोवर है, कुछ अनजाना, कुछ पहचाना |

इस तीरथ में मन की भोली गोरैया हँसती गाती है

है नहीं उसे कोई चिंता, ना ही भय उसको पीड़ा का ||

चिंताओं के, पीड़ाओं के अंधड़ न यहाँ चल पाते हैं

हर पल वसन्त ही रहता है, पतझड़ न यहाँ टिक पाते हैं |

पर कठिन बड़ा इसका मग है, और दूर बहुत सरवर तट है

जिसमें हैं सुन्दर कमल खिले, हासों के और उल्लासों के ||

कैसे तट का पथ वह पाए, कैसे पहुँचे उस सरवर तक

पंथी को चिंता है इसकी, होगी कब वो पुनीत वेला |

लेकिन मन में विश्वास भरे, संग संवेदन पाथेय लिये

चलता जाए राही कोई, तो पा ही जाएगा मंज़िल ||

होगी हरीतिमा दिशा दिशा, होगा प्रकाश हर निशा निशा

एक शान्तिपूर्ण उल्लास लिये थिरकेगा केवल प्रेम वहाँ |

फिर धीरे धीरे सरवर में जितना गहरे वह उतरेगा

जग की चिंताओं को तज, वह परमात्मभाव हो जाएगा ||

 

 

काले मेघा जल्दी से आ

पिछले कुछ दिनों से धूल भरे आँधी तूफानों का सामना हो रहा है सभी को | बादल आते हैं, पर मानों सबसे गुस्सा होने के कारण उड़ जाते हैं | यही सब सोचते सोचते कुछ पंक्तियाँ अनायास ही बन गईं, प्रस्तुत हैं…

काले मेघा जल्दी से आ, भूरे मेघा जल्दी से आ ||

घाम ये कैसा चहक रहा है, अँगारे सा दहक रहा है |

लुका छिपी फिर अब ये कैसी, मान मनुव्वल अब ये कैसी ||

कितने आँधी तूफाँ आते, धूल धूसरित वे कर जाते

पल भर में धरती पर अपना ताण्डव नृत्य दिखा वे जाते |

तेरी घोर गर्जना से सब आँधी तूफाँ हैं भय खाते

आकर उनको दूर भगा तू, वसुन्धरा का मन हरषा तू ||

सूख रही हैं ताल तलैया, सूख रही हैं सागर नदियाँ

रूठ रहे हैं गाय बछरिया, रूठ गई है मस्त गोरैया |

कोयल की पंचम है रूठी, भँवरे की भी गुँजन रूठी

आके सबको आज मना तू, धरती पर हरियाली ला तू ||

माना हमने जंगल काटे, सारे पेड़ कर दिए नाटे

पर इन्सानी अपराधों का इनको अब तू दण्ड न दे रे |

ये सब तेरा ही मुँह ताकें, तुझसे ही हैं आस लगाएँ

इनको थोड़ी राहत दे दे, पूरी इनकी चाहत कर दे ||

तू रूठा तो साथ में तेरे वसुन्धरा भी रूठ रहेगी

अपनी वसु सन्तानों को जगती से फिर वह दूर रखेगी |

होगा क्या फिर आज सोच ले, जग के मन की व्यथा समझ ले

दाने पानी को तरसें सब, ऐसा मत तू प्रण अब ले रे ||

पर गुस्से में नहीं बरसना, प्यार भरा तू राग सुनाना

और ता धिन मृदंग की लय पर इस सारे जग पर छा जाना |

ताल विलम्बित में तू आना, गत के संग फिर भाव दिखाना

प्यारी मस्त बिजुरिया संग मस्ती में भर फिर नर्तन करना ||

राही

आज प्रस्तुत है मेरी अपनी ही एक पुरानी रचना… राही…

विरह मिलन की धूप छाँव में सुख दुःख के डग भरने वाला
और चढ़ाई उतराई में सदा अथक ही चलने वाला |
एक बूँद वाले जलघट में अगम सिन्धु भरने का चाही
धूल धूसरित भूखा प्यासा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
सुरभित वन उपवन गिरि कानन, जल खग कूजित झीलों वाली
समझ रहा जिसको तू मंज़िल, शिलाखण्ड वह मीलों वाली |
भग्न मनोरथ, पग पग पर दी तुझे दिखाई असफलता ही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
बात न पूछो तुम साथी की, ये बादल आते जाते हैं
जीवन की चंचल लहरों पर कब हम किसे रोक पाते हैं |
मधुर मिलन तो घड़ी दो घड़ी, पल भर ही पी की गलबाँही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
प्रिय प्रहसन ऊषा का पल भर, रह जाता देखा अनदेखा
दिन दोपहरी सन्ध्या रजनी, फिर अनन्त जीवन का लेखा |
सन्ध्या का संकेत समझ ले, जो तेरा पथ सम्बल राही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||
आशाओं की चिता जलेगी, रथ टूटेंगे अरमानों के
दिन रहते काफ़िला रुकेगा, पंख जलेंगे परवानों के |
लेकिन बस तुम तुम्हीं रहोगे, और तुम्हारी मंज़िल राही
बिना रुके तू चला जा रहा, कहाँ तेरी मंज़िल ओ राही ||