Category Archives: कथा

रात भर छाए रहे बादल

रात भर छाए रहे बादल / प्रतीक्षा में भोर की

और उनसे झरती नेह रस की हलकी हलकी बूँदें

भिगोती रहीं धरा बावली को नेह के रस में…

बरखा की इस भीगी रुत में

पेड़ों की हरी हरी पत्तियों / पुष्पों से लदी टहनियों

के मध्य से झाँकता सवेरे का सूरज

बिखराता है लाल गुलाबी प्रकाश इस धरा पर…

मस्ती में मधुर स्वरों में गान करते पंछी

बुलाते हैं एक दूसरे को और अधिक निकट

आपस में मिलकर एक हो जाने को

मिटा देने को सारा दुई का भाव…

मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू / फूलों की भीनी महक

मलयानिल की सुगन्धित बयार

कर देती हैं तब मन को मदमस्त…

और चाहता है मन गुम हो जाना / किन्हीं मीठी सी यादों में…

वंशी के वृक्ष से आती मीठी ध्वनि के साथ

चंचल पवन के झकोरों से मस्ती में झूमती टहनियों को देख

तन मन हो जाता है नृत्य में लीन…

ये प्रेमी वृक्षों के साथ गलबहियाँ किये / मस्ती में झूमती लताएँ

जगा देती हैं मन में राग नया

और तब बन जाता है एक गीत नया

अनुराग भरा, आह्लाद भरा…

फिर अचानक / कहीं से खिल उठती है धूप

और हीरे सी दमक उठती हैं हरी हरी घास पर बिखरी बरखा की बूँदें…

धीरे धीरे ढलने लगता है दिन

सूर्यदेव करने लगते हैं प्रस्थान / अस्ताचल को

और खो जाती है समस्त प्रकृति / इन्द्रधनुषी सपनों में

ताकि अगली भोर पुनः प्रभात के दर्शन कर

रची जा सके एक और नई रचना

भरी जा सके चेतनता / सृष्टि के हरेक कण कण में…

यही क्रम है बरखा की रुत में प्रकृति का

शाश्वत… सत्य… चिरन्तन… किन्तु रहस्यमय…

जिसे लखता है मन आह्लादित हो

और हो जाता है गुम

इस सुखद रहस्य के आवरण में

पूर्ण समर्पण भाव से……….

 

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हरी भरी प्रकृति

एकाग्रता, प्रेम, शान्ति, आशा, उत्साह और उमंग – जीवन जीने के लिए इन्हीं सबकी आवश्यकता होती है – और हरितवर्णा प्रकृति हमें यही उपहार तो देती है… आइये अपनी इस प्रेरणास्रोत हरि भरी प्रकृति का स्वागत करना अपना स्वभाव बनाएँ…

लहरों का या खेल

लहरों का या खेल अनोखा, लहरों का यह खेल |

एक लहर इस तट को जाती, दूजी उस तट को है जाती

कभी कभी पथ में हो जाता है दोनों का मेल ||

अनगिन नौका और जलयान यहाँ हैं लंगर डाले रहते

और अनगिनत राही इस उस तट पर नित्य उतरते रहते |

इसी तरह तो वर्ष सदी और कल्प यहाँ हैं बीते जाते

पर न कभी रुकने पाता है ऐसा अद्भुत खेल ||

एक सनातन क्रम में चलता, नित्य नया पर रूप बदलता

जग जीवन एक डोर बंधी कठपुतली जैसा सदा नाचता |

किसी चक्र सम ऊपर नीचे भाग्य निरन्तर चक्कर खाता

पर न कभी थमने पाता है मायावी यह खेल ||

किन्तु कौन यह, जो कि स्वयं को जरा काल मृत्युंजय कहता

एक डोर को काट, दूसरी में पुतली को बाँध नचाता |

इस जगती को बार बार वह निज की क्रीडास्थली बताता

कोई समझ न पाया उसको जिसका है यह खेल ||

अरे मैं ही तो हूँ वह

मैं हूँ मन, मैं हूँ बुद्धि…

मैं हूँ लहर, मैं ही हूँ सागर भी…

किन्तु नहीं है अधिकार मेरा आज़ादी पर लहरों की…

हाँ, सागर का रेतीला तट अवश्य है नीचे मेरे पाँवों के

जो कभी भी खिसक कर

गिरा सकता है मुझे नीचे

उसी तरह, जैसे मेरी बुद्धि

खींचती है मुझे नीचे, और नीचे…

मैं ही हूँ पवन, मैं हूँ मलय सुगन्ध भी…

किन्तु नहीं रोक सकती मैं स्वच्छन्द प्रवाहित होती मलय पवन को

उसे है अधिकार लुटाने का मेरी सारी सुगन्ध

मानस पर समूची प्रकृति के

क्योंकि प्रकृति से ही तो पाई है मैंने ये सुवास…

मन का क्या है…

मन तो इकठ्ठा करता है ज्ञान

और ख़ुद क़ैद हो जाता है उसी ज्ञान में

और हो जाते हैं बन्द द्वार नवीन ज्ञान के…

जो कुछ ज्ञान है मुझे वह है मात्र आकार

और है कला पूर्ण करने की कार्य को…

जिसने विस्मृत करा दिया है उस ज्ञान को

कि नहीं है मुझसे परे कुछ भी…

जिसने तिरोहित करा दिया है उस अहसास को

कि मैं एक हूँ

लहरों और समुद्र की तरह…

पवन और सुगन्ध की तरह…

कि मैं वही हूँ, अरे मैं ही तो हूँ “वह” !!!

 

 

ऐसो आयो सावन

ऐसो आयो सावन, चारों और नशा सा घुलता जाए |

कौन किसे अब कुछ समझाए, जग पर मदहोशी सी छाए ||

मेघा गरज गरज घहराए, मन की वीणा झनकी जाए |

बिजुरी दमक दमक दमकाए, पग की पायल शोर मचाए ||

बन में मोर मोरनी नाचें, हिय में और उछाह भर जाए |

पपीहा पिहू की टेर लगाए, मन बौराया झूमा जाए ||

अम्बुवा की डाली पर देखो कोयल कुहुक कुहुक हुलसाए |

मतवाले मौसम में भीज भीज मन पेंग बढ़ाता जाए ||

प्रियतम सागर करे इशारा तो फिर लाज शरम अब कैसी |

सारे बन्धन तज कर नदियाँ पिया मिलन को उमड़ी जाएँ ||

झूम झूम तरु झुकें धरा पर, प्यार भरा एक चुम्बन ले लें |

धरा बावरी हरा घाघरा पहन मस्त हो थिरकी जाए ||

प्रेम और ध्यान

मैंने देखा, और मैं देखती रही / मैंने सुना, और मैं सुनती रही

मैंने सोचा, और मैं सोचती रही / द्वार खोलूँ या ना खोलूँ |

प्रेम खटखटाता रहा मेरा द्वार / और भ्रमित मैं बनी रही जड़

खोई रही अपने ऊहापोह में |

तभी कहा किसी ने / सम्भवतः मेरी अन्तरात्मा ने

तुम द्वार खोलो या ना खोलो / द्वार टूटेगा,

और प्रेम आएगा भीतर

कब, इसका भान भी नहीं हो पाएगा तुम्हें |

हाँ, यदि करती रही प्रयास इसे पाने का

गणनाएँ और मोल भाव

तो लौटना होगा रिक्त हस्त

क्योंकि रह जाएगा वह बाहर ही द्वार के |

क्या होगा, इसका प्रश्न क्यों ?

कब होगा, इसका विचार क्यों ?

कैसे होगा, इसका चिन्तन क्यों ?

कितना होगा, इसका मनन क्यों ?

छोड़ दो ये सारे प्रश्न, विचार, चिन्तन और मनन

प्रेम के प्रकाश को करने दो पार

सीमाएँ अपने समस्त तर्कों की

और तब, प्रेम बन जाएगा ध्यान |

ध्यान, जो तुम स्वयं हो

ध्यान, जो होगा तुममें

ध्यान, जो होगा तुम्हारे लिये

ध्यान, जो होगी तुम स्वयम् ||

प्रेम का लक्ष्य

प्रेम पहुँचता है अपनी पूर्णता पर

जब दो व्यक्ति

लाँघ जाते हैं सारी सीमाएँ प्रेम की

और खो जाते हैं एक दूसरे में

मिला देते हैं अपना अपना अस्तित्व

एक दूसरे में

रोप देते हैं बीज

नि:स्वार्थ मासूम प्रेम से युक्त नई सृष्टि का

और तब बन जाता है प्रेम

भक्ति और ध्यान और महा आनन्द

जो ले जाते हैं व्यक्ति को

मार्ग पर उसके चरम लक्ष्य के |

लक्ष्य ?

सांसारिक सुखों से ऊपर उठकर

संस्कारों का ऋण चुकाकर

मोक्ष की प्राप्ति का……