नक्षत्र – एक विश्लेषण

वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों का महत्त्व

प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि नक्षत्रों को वैदिक ज्योतिष में इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया गया ? जैसा कि हमने पहले भी बताया, नक्षत्र किसी भी ग्रह की गति तथा स्थिति को मापने के लिए एक स्केल अथवा मापक यन्त्र का कार्य करते हैं | यही कारण है कि पञ्चांग (Indian Vedic Ephemeris) के पाँच अंगों में एक प्रमुख अंग नक्षत्र को माना जाता है | पञ्चांग के पाँच अंग हैं – तिथि (चन्द्रमा की गति के अनुसार), वार (सप्ताह का दिन), योग (चन्द्रमा के विविध योग), करण (यह भी चन्द्रमा के ही विविध योग हैं), और नक्षत्र | इस प्रकार नक्षत्र पञ्चांग का एक महत्त्वपूर्ण अंग हो जाता है |

किसी भी माह में आने वाली पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उस माह का नाम उसी नक्षत्र के नाम पर होता है | किसी भी शुभ, माँगलिक अथवा आवश्यक कार्य को करने के लिए जो मुहूर्त अर्थात अनुकूल समय नियत किया जाता है उसकी गणना भी नक्षत्रों के ही आधार पर होती है | विवाह से पूर्व वर वधू की कुण्डलियों का मिलान (Horoscope Matching) भी इन नक्षत्रों के ही आधार पर किया जाता है | यात्रा आरम्भ करने के लिए, कोर्ट में केस फाइल करने के लिए, किसी रोग से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अथवा हमारे दिन प्रतिदिन के अन्य भी अनेक कार्यों में हम इन नक्षत्रों की सहायता लेते हैं | वैदिक परम्परा में तो बच्चे के विद्यारम्भ के लिए भी शुभ मुहूर्त निश्चित किया जाता है जब वह अपने गुरु के समक्ष प्रथम बार उपस्थित होता है | ऐसा माना जाता है कि विपत और वध नक्षत्र में कोई भी आवश्यक अथवा शुभ कार्य नहीं किया जाना चाहिए |

इस समस्त प्रक्रिया का उद्देश्य यही है कि कार्य से सम्बन्धित ग्रह की अनुकूल अथवा प्रतिकूल स्थिति का आकलन कर सकें | जितनी भी ग्रह दशाएँ हैं – चाहे वह विंशोत्तरी दशा हो, अष्टोत्तरी हो, कृष्णमूर्ति हो या कोई भी हो – सभी केवल नक्षत्रों पर ही आधारित हैं | यदि किसी जातक का जन्म क्रूर अथवा अशुभ नक्षत्र में हुआ है अथवा किसी जातक की किसी ऐसे ग्रह की दशा चल रही है जो किसी अशुभ नक्षत्र में स्थित है तो उस व्यक्ति को उस नक्षत्र से सम्बन्धित देवता की पूजा अर्चना तथा दानादि आदि के द्वारा उस नक्षत्र के अशुभ प्रभाव को कम करने का सुझाव दिया जाता है | महाभारत में पूरा का पूरा एक अध्याय ही अशुभ नक्षत्रों का अशुभत्व कम करने के विषय में है | तो नक्षत्रों के महत्त्व को कैसे कम करके आँका जा सकता है ?

वैदिक साहित्य में नक्षत्रों का बड़ा सूक्ष्म विवेचन उपलब्ध होता है क्योंकि उस समय ज्योतिष नक्षत्र प्रधान था | वेदों में नक्षत्रों के उडू, रिक्ष, नभ, रोचना आदि पर्यावाची नाम भी उपलब्ध होते हैं | ऋग्वेद में तो एक स्थान पर सूर्य को भी नक्षत्र की संज्ञा दी गई है | अन्य नक्षत्रों में उस समय सप्तर्षि और अगस्त्य का नाम आता है | नक्षत्रों से सम्बन्धित सूची विशेष रूप से अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, शतपथ ब्राहमण और गणित ज्योतिष के सबसे प्राचीन ग्रन्थ लगध के वेदांग ज्योतिष में उपलब्ध होती है | ऋग्वेद के अनुसार जिस लोक का कभी क्षय नहीं होता उसे नक्षत्र कहा जाता है | तेत्तिरीय संहिता के अनुसार सभी नक्षत्र देव ग्रह हैं और रोचन तथा शोभन हैं और आकाश को अलंकृत करते हैं | इनके मध्य सूक्ष्म जल का समुद्र है, ये उसमें तैरते हैं | इसीलिए सम्भवतः इन्हें तारा अथवा तारक भी कहा जाता है |

“देव ग्रहा: वै नक्षत्राणि य एवं वेद गृही भवति |

रोचन्ते रोचनादिवी सलिलंवोइदमन्तरासीतयदतरस्तंताकानां तारकत्वम् ||”

शतपथ ब्राहमण के अनुसार समस्त देवताओं का घर नक्षत्र लोक ही है – नक्षत्राणि वै सर्वेषां देवानां आयतनम् |

ऋग्वेद के दशम मण्डल के पचासीवें सूक्त में कहा गया है कि चन्द्रमा नक्षत्रों के मध्य विचरण करता है, और वहाँ सोमरस विद्यमान रहता है : अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहित: |

इस प्रकार वैदिक साहित्य में नक्षत्रों के विषय में व्यापक चर्चा उपलब्ध होती है | और इसका कारण यही है कि वेदों की प्रवृत्ति यागों के निमित्त हुई और यज्ञ मुहूर्त विशेष की अपेक्षा रखते हैं | मुहूर्त का अत्यन्त सूक्ष्म ज्ञान नक्षत्रों के आधार पर गणना करके ही सम्भव था…

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नक्षत्र एक विश्लेषण

नक्षत्रों का महत्त्व

समस्त बारह वैदिक मासों का आधार नक्षत्र मण्डल ही है | प्रत्येक माह को पूर्ण चन्द्र की रात्रि पूर्णिमा कहलाती है | पूर्णिमा को जो नक्षत्र पड़ता है, वैदिक महीनों का नाम उन्हीं नक्षत्रों के नाम पर होता है | अर्थात प्रत्येक पूर्णिमा का चन्द्र नक्षत्र उस माह के वैदक नाम है | जैसे, चित्रा से चैत्र माह, विशाखा से वैशाख इत्यादि | किन्तु किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व पहले हमें नक्षत्रों के विषय में विस्तार से जानना होगा |

तारों के एक समूह को नक्षत्र कहते हैं | वस्तुतः नक्षत्र एक ऐसा मापक यन्त्र यानी स्केल है जिसके द्वारा हम किसी ग्रह की एक राशि से दूसरी राशि तक पहुँचने की अवधि अर्थात यात्रा की लम्बाई नाप सकते हैं | उदाहरण के लिए हम जानना चाहते हैं कि मंगल को अपनी वर्तमान राशि से दूसरी राशि पर पहुँचने में कितना समय लगेगा | इसके लिए आवश्यक है कि हमें मंगल की वर्तमान स्थिति का पता हो कि वर्तमान में वह किस नक्षत्र के किस चरण अर्थात किस भाग पर स्थित है | और वहाँ से जिस राशि पर उसे जाना है वहाँ किस नक्षत्र का कौन सा चरण हो सकता है | इस सबका अध्ययन कर लेने के बाद हम कह सकते हैं कि मंगल ने इतने समय में इतनी दूर की यात्रा की है, इतनी दूर की यात्रा और शेष है, तो पिछली यात्रा की अवधि के आधार पर वह लगभग इतनी अवधि में शेष यात्रा पूर्ण करेगा |

इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि मान लीजिये हम कहीं जा रहे हैं | मार्ग में हम कुछ बोर्ड्स देखते हैं जिन पर उस स्थान का नाम तथा पहले और दूसरे स्थान से उसकी दूरी लिखी होती है | इसके द्वारा हमें पता लग जाता है कि अब तक हम इस स्थान पर पहुँच चुके हैं अथवा इतनी दूरी तय कर चुके हैं और अब हमें अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए इतनी दूरी और तय करनी है जो हम लगभग इतने समय में पूरी कर सकते हैं | मार्ग में लगे ये बोर्ड्स स्थान विशेष तथा एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी के सूचक होते हैं | नक्षत्र इसी प्रकार के साईनबोर्ड्स हैं जिनके माध्यम से हम एक स्थान से हम किसी ग्रह की एक राशि से दूसरी राशि पर पहुँचने की दूरी और समय का अनुमान लगा सकते हैं | इस प्रकार नक्षत्र किसी ग्रह की एक राशि से दूसरी राशि के लिए यात्रा के दौरान दोनों राशियों के मध्य की दूरी तथा मार्ग के पड़ावों यानी नक्षत्रपदों का ज्ञान कराने वाले मापक यन्त्र यानी स्केल हैं | नक्षत्रों का शाब्दिक अर्थ है “आकाश में तारामण्डल के मध्य चन्द्रमा का मार्ग |”

जब हम कहीं यात्रा करते हैं तो मार्ग को लम्बाई को नापने के लिए मील अथवा किलोमीटर का प्रयोग किया जाता है | इसी प्रकार ग्रहों की पूर्व से पश्चिम तक की यात्रा में उनकी परस्पर दूरी तथा गति नापने के लिए नक्षत्रों का भी विभाजन किया गया है | हमारे खगोलशास्त्रियों यानी Astronauts ने समूचे भाचक्र अर्थात Zodiac को 27 बराबर भागों में विभक्त किया है | भाचक्र में राशिचक्र के ये सत्ताईस भाग ही नक्षत्र कहलाते हैं | प्रत्येक नक्षत्र में तारों का एक समूह होता है | नक्षत्र के ये तारे एक साथ मिलकर एक आकृति अथवा Image बनाते हैं जैसे हाथी, सर, सर्प, गाड़ी इत्यादि | खुले और साफ़ आकाश में हम इन आकृतियों को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं | इन 27 नक्षत्रों से ग्रहों की स्थिति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है | जिस प्रकार अपनी यात्रा के दौरान मार्ग में लगे साईनबोर्ड्स से हमें पता चल जाता है कि हम अमुक समय अमुक स्थान पर पहुँच रहे हैं और यात्रा के आरम्भ से इतने मील या किलोमीटर तक की दूरी तक आ चुके हैं | उसी प्रकार एक ज्योतिषी अथवा खगोल वैज्ञानिक नक्षत्रों की सहायता से आसानी से यह बता सकता है कि अमुक ग्रह अमुक समय इतनी डिग्री पर अमुक नक्षत्र में होगा, या अबसे पूर्व एक विशेष समय पर यह ग्रह इतनी डिग्री में इस नक्षत्र पर था | प्रत्येक नक्षत्र की अवधि 13 डिग्री 20 मिनट की होती है तथा प्रत्येक नक्षत्र चार भागों में विभक्त होता है | ये चारों भाग नक्षत्र के चरण अथवा पद कहलाते हैं | प्रत्येक पद तीन डिग्री बीस मिनट का होता है | अब, क्योंकि प्रत्येक राशि तीस डिग्री की होती है इसलिए हर राशि में सवा दो नक्षत्र आते हैं – अर्था दो नक्षत्र पूरे और तीसरे नक्षत्र का चौथाई भाग यानी एक पद | इस प्रकार चार राशियों में नौ नक्षत्र पूरे आ जाते हैं और इस प्रकार 27 नक्षत्र बारह राशियों में बराबर विभक्त हो जाते हैं |

क्योंकि हर नक्षत्र कुछ तारों का एक समूह होता है इसलिए प्रत्येक नक्षत्र का नाम उस नक्षत्र में सम्मिलित तारकदल में सबसे अधिक प्रकाशित तारे के नाम पर होता है | उदाहरण के लिए चित्रा नक्षत्र में सम्मिलित तारकसमूह में सबसे अधिक प्रकाशित तारा है चित्रा इसलिए इस नक्षत्र का नाम चित्रा रखा गया |

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श्री गुरुकवचम्

ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः

हिन्दू धर्म के नवग्रहों में देवगुरु बृहस्पति की उपासना ज्ञान और बुद्धि के साथ-साथ भाग्य वृद्धि, विवाह और सन्तान का सुख प्राप्त करने के लिए भी की जाती है | भारतीय ज्योतिष शास्त्रों तथा Vedic Astrologers के अनुसार किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु यदि अच्छी अस्थिति में हों – उच्च का हो, केन्द्र अथवा मूल त्रिकोण में हो, वर्गोत्तम हो इत्यादि इत्यादि… तो वह व्यक्ति ज्ञानवान बनता है तथा अपने ज्ञान के बल पर ही उसे मान प्रतिष्ठा, धन, पुरूस्कार आदि की उपलब्धि जीवन में होती रहती है तथा उसे अच्छी और सुयोग्य सन्तान का सुख प्राप्त होता है | किन्तु यदि वही गुरु विपरीत स्थिति में हो या विपरीत प्रभाव में हो तो जातक को मानसिक कष्ट के साथ ही अनेक बाधाओं का सामना भी करना पड़ सकता है | विवाह तथा सन्तान प्राप्ति में भी बाधा का सामना करना पड़ सकता है | सन्तान की ओर से कष्ट हो सकता है | वह व्यक्ति अत्यन्त क्रोधी या चिडचिडा हो सकता है तथा अनेक प्रकार के दुर्गुण भी उसमें हो सकते हैं |

गुरु के अशुभ प्रभाव को दूर करके गुरुदेव को शान्त करने तथा बली बनाने के लिए अनेक मन्त्रों के जाप की सलाह दी जाती है, उन्हीं में से एक है “बृहस्पति कवच”, जिसका एक सरल प्रकार यहाँ प्रस्तुत है…

कवच आरम्भ करने से पूर्व गुरु गायत्री का 108 बार जप करें –
“ॐ अंगिरोजाताय विद्महे, वाचस्पते धीमहि, तन्नो गुरु: प्रचोदयात ||”

इसके बाद विनियोगपूर्वक बृहस्पति कवच का पाठ अथवा श्रवण करें:-

|| अथ श्री बृहस्पति कवचं (गुरु कवचं) ||

|| श्री गणॆशाय नम: ||

अस्य श्री बृहस्पतिकवचमहामन्त्रस्य ईश्वर ऋषि:, अनुष्टुप छन्द: बृहस्पतिर्दॆवता, गं बीजं, श्रीं शक्ति:, क्लीं कीलकम्‌, बृहस्पति प्रसाद सिद्ध्यर्थॆ जपॆ विनियॊग: ||

अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् |
अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ||
बृहस्पति: शिर: पातु ललाटं पातु में गुरु: |
कर्णौ सुरुगुरु: पातु नेत्रे मेंSभीष्टदायक: ||
जिह्वां पातु सुराचायो नासां में वेदपारग: |
मुखं मे पातु सर्वज्ञो कण्ठं मे देवता शुभप्रद: ||
भुजौ आङ्गिरस: पातु करौ पातु शुभप्रद: |
स्तनौ मे पातु वागीश: कुक्षिं मे शुभलक्षण: ||
नाभिं देवगुरु: पातु मध्यं पातु सुखप्रद: |
कटिं पातु जगदवन्द्य: ऊरू मे पातु वाक्पति: ||
जानु जङ्गे सुराचायो पादौ विश्वात्मकस्तथा |
अन्यानि यानि चाङ्गानि रक्षेन् मे सर्वतो गुरु: ||
इत्येतत् कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर: |
सर्वान् कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ||

|| इति श्री ब्रह्मयामलोक्तम्‌ बृहस्पति कवचं सम्पूर्णम् ||

देवगुरु बृहस्पति सभी के ज्ञान का विस्तार करते हुए सभी को समस्त सुख समृद्धि प्रदान करें…

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जन्म कुण्डली

व्यक्ति के जन्म के समय ग्रह नक्षत्रों तथा राशियों आदि की जो स्थिति होती है उनका जो चक्र बनाया जाता है वह कुण्डली अथवा जन्म लग्न पत्रिका कहलाती है | ग्रह नक्षत्रों आदि की स्थिति हर स्थान पर एक सी नहीं होती | हर देश, प्रान्त तथा शहर में स्थानीय समय के अनुसार सूर्य का तथा विभिन्न राशियों का उदय होता है | इस इष्ट काल को जानने के लिए किसी भी ज्योतिषी को पञ्चांग का ज्ञान होना आवश्यक है | इष्टकाल में जो राशि पूर्व में उदय होती है वही लग्न कहलाती है और वह जन्म कुण्डली का प्रथम भाव या घर होता है | उसके बाद फिर क्रमशः हर भाव में एक एक राशि रखी जाती है | इन बारह भावों में समस्त नवग्रहों की स्थिति होती है | जिनमें राहु और केतु को छोड़कर शेष सात ग्रह बारह राशियों के अधिपति होते हैं

जातक की लग्न कुण्डली तैयार हो जाती है तो उसके बाद फिर उसके नवांश, दशांश, द्वादशांश इत्यादि विभिन्न वर्ग बनाए जाते हैं | प्रत्येक वर्ग व्यक्ति के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है | उसके पश्चात लग्न कुण्डली तथा इन वर्ग कुण्डलियों का तुलनात्मक अध्ययन करके तथा उनमें राशियों, ग्रहों और नक्षत्रों की अलग अलग स्थितियों के आधार पर, इनके बलाबल के आधार पर तथा इनके स्वभाव आदि के आधार पर कुण्डली का अध्ययन करके एक ज्योतिषी व्यक्ति के जीवन में घटने वाली सम्भावित शुभाशुभ घटनाओं के विषय में फलकथन करता है तथा जीवन के विविध क्षेत्रों में उसका मार्गदर्शन करता है |

इस प्रकार ज्योतिष विज्ञान सम्भावनाओं का विज्ञान होते हुए भी पूर्ण रूप से वैज्ञानिक पद्धति है | व्यक्ति के जन्म के समय ग्रह नक्षत्रों की जो स्थिति होती है उनका प्रभाव न केवल मनुष्य पर बल्कि समूची प्रकृति पर पड़ता है | किसी व्यक्ति की कुण्डली का अध्ययन करके एक Vedic Astrologer एक सम्भावित जानकारी व्यक्ति को दे सकता है कि उसके जीवन की दिशा क्या हो सकती है तथा उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किस प्रकार के प्रयास करने चाहियें |

जातक की कुण्डली का गहनता के साथ समग्र रूप से अध्ययन करके व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली सम्भावित घटनाओं की जानकारी व्यक्ति को देने का प्रयास एक Vedic Astrologer करता है और व्यक्ति उन सबको ध्यान में रखकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए उचित प्रयास करना आरम्भ कर देता है | उदाहरण के लिए, व्यक्ति की जन्मकुण्डली के अध्ययन से या ज्ञात हो सकता है कि उसके लिए किस प्रकार का व्यवसाय उचित रहेगा और उसके लिए उसे किस प्रकार का अध्ययन करना चाहिए, कौन सा समय ऐसा है जब उसके विवाह के प्रबल योग बन रहे हैं इत्यादि इत्यादि…

इस प्रकार जातक की जन्म कुण्डली का निर्माण एक अत्यन्त गहन गणितीय प्रक्रिया है और वैदिक फलित ज्योतिष का सबसे प्रमुख अंग है…

अन्त में यही, कि दिशा निर्देश देना ज्योतिषी का कार्य है, किन्तु कर्म तो आपको करना ही होगा | आपकी ग्रह दशाएँ कितनी भी अनुकूल क्यों न हों, यदि आप एकनिष्ठ होकर सार्थक प्रयास नहीं करेंगे तो अनुकूल दशाओं को प्रतिकूल परिणाम देने में भी देर नहीं लगेगी…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/04/12/horoscope/