Category Archives: गीत

रिक्त पात्र – शून्य

क्या करना है पूर्ण पात्र का, उसका कोई लाभ नहीं है |

रिक्त पात्र हो, तो उसमें कितना भी अमृत भर जाना है ||1||

सकल सृष्टि है टिकी शून्य पर, और शून्य से आच्छादित है |

शून्य से है पाता प्रकाश जग, पूर्ण हुआ तो अन्धकार है |

क्या करना है आच्छादन का, मुझको तो प्रकाश पाना है |

पूर्ण हुई तो ठहर जाऊँगी, मुझे शून्य में बह जाना है ||2||

प्राणवायु भी शून्य कक्ष में बहती, सबको जीवन देती |

कक्ष भरा हो तो फिर वह भी भारी होकर दुःख पहुँचाती |

शून्य बने अस्तित्व, तो उसमें पीड़ा का कोई काम नहीं है |

क्या करना है निजता का, मुझको सर्वस्व लुटा जाना है ||3||

निजता तो है स्वार्थपरक, है जिससे अहंभाव ही बढ़ता |

और अस्तित्वविहीन रहे तो मन आनन्दित हुआ झूमता |

पूर्णज्ञान से बढ़कर कोई और नहीं अज्ञान जगत में |

बन अज्ञानी मुझे शून्य में मिलकर नव प्रकाश पाना है ||4||

परम तत्व का भेद न जानूँ, चरम सत्य का तथ्य न जानूँ |

योगी और वियोगी में क्या भेद, न मैं यह भी पहचानूँ |

मेरा राग विराग बना मन में नीरवता भर जाता है |

शून्य हुई चेतनता, मुझको नीरवता में खो जाना है ||5||

 

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ.

आज 14 अगस्त है, स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व सन्ध्या… और कल फिर से पूरा देश स्वतन्त्रता दिवस की वर्षगाँठ पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाएगा… अपने सहित सभी को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…

स्वतन्त्रता – आज़ादी – व्यक्ति को जब उसके अपने ढंग से जीवंन जीने का अवसर प्राप्त होता है तो निश्चित रूप से उसका आत्मविश्वास बढ़ने के साथ ही उसमें कर्त्तव्यपरायणता की भावना भी बढ़ जाती है और उसकी सम्वेदनशीलता में भी वृद्धि होती है | क्योंकि स्वतन्त्र व्यक्ति को जीवन में रस का अनुभव होने लगता है – उत्साह और उमंग से भरा मन नृत्य करने लगता है – व्यक्ति को विकास की गति को तीव्र करने की सामर्थ्य प्राप्त होने के साथ ही उसे नियन्त्रित करने की समझ भी प्राप्त होती है – उसकी विचारधारा को सकारात्मक दिशा प्राप्त होती है – उसमें आत्मचिन्तन तथा आत्मनिर्णय की भावना दृढ़ होती है | जब व्यक्ति इस प्रकार से पूर्ण रूप से प्रफुल्लित होगा तो भला क्यों न वह अपना यह उत्साह – अपनी यह उमंग – अपने जीवन का ये रस – दूसरों में बाँटने का इच्छुक होगा ? वह हर किसी के साथ एकता और बराबरी का व्यवहार स्वतः ही करने लग जाएगा | स्वतन्त्र व्यक्ति के मन में किसी प्रकार के भेद भाव के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता |

इस स्वतन्त्रता दिवस पर आइये मिलकर संकल्प लें कि हम देश को स्वस्थ, सुखी तथा हरा भरा बनाने में योगदान देंगे…

प्रस्तुत है अपनी ही एक पुरानी रचना की कुछ पंक्तियाँ… स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनाओं के साथ…

आज़ादी का दिन फिर आया |
बड़े यत्न से करी साधना, कितने जन बलिदान हो गए |
किन्तु हाय दुर्भाग्य, न जाने कहाँ सभी वरदान खो गए |
सत्य धर्म और शान्ति प्रेम का राग न मिलकर हमने गाया…
वर्षा आई उमड़ घुमड़ कर, काली घनी घटाएँ छाईं |
गरजे घन कारे कजरारे, मगर बिजलियाँ ही बरसाईं |
मन का मानस रहा शुष्क ही, कभी न ओर छोर लहराया…
बगिया भी है आँगन भी है, और गढ़े भी हैं हिण्डोले
पर मदमाती नहीं गुजरिया, कौन कहो फिर झूला झूले ?
मनभावन सावन फिर आया, लेकिन एक मल्हार न गाया…
जगमग जगमग दीवाली के जाने कितने दीप जलाए |
नगर नगर और गाँव गाँव में हर घर आँगन सभी सजाए |
किन्तु कहाँ का गया अँधेरा, और कहाँ उजियाला छाया…
मतवाली होली भी आई, लेकिन राख़ उड़ाती आई |
कलित कपोलों पर गुलाल की लाली कहीं न पड़ी दिखाई |
ढोल बजे, नूपुर भी छनके, मगर न केसर का रंग छाया…
महल सभी बन गए दुमहले, और दुमहले किले बन गए |
कितने मिले धूल में, लेकिन कितने नये कुबेर बन गए |
आयोगों का गठन हुआ, मन का संगठन नहीं हो पाया…
फिर भी है संतोष कि धरती अपनी है, अम्बर अपना है |
अपने घर को आज हमें फिर नई सम्पदा से भरना है |
किन्तु अभी तक हमने अपना खोया बहुत, बहुत कम पाया…
ग्राथित हो रहे अनगिनती सूत्रों की डोरी में हम सारे |
होंगे सभी आपदाओं के बन्धन छिन्न समस्त हमारे |
श्रम संयम आर अनुशासन का सुगम मन्त्र यदि हमको भाया…

पथ पर बढ़ते ही जाना है

अभी बढ़ाया पहला पग है, अभी न मग को पहचाना है |

अभी कहाँ रुकने की वेला, मुझको बड़ी दूर जाना है ||

कहीं मोह के विकट भँवर में फँसकर राह भूल ना जाऊँ |

कहीं समझकर सबको अपना जाग जाग कर सो ना जाऊँ |

मुझको सावधान रहकर ही सबके मन को पा जाना है ||

और न कोई साथी, केवल अन्तरतम का स्वर सहचर है

साधन पथ का पथिक मनुज है, और साधना अजर अमर है |

इसीलिए शैथल्य त्याग कर मुझे कर्म में जुट जाना है ||

परिचित निज दुर्बलताओं से, आदर्शोन्मुख श्वास श्वास पर

मंझधारों से डरे बिना अब बढ़ते जाना लहर लहर पर |

बाधाओं को दूर भगा निज लक्ष्य मुझे पाते जाना है ||

रजकण हिमगिरी ज्यों बन जाता, जलकण ज्यों सागर हो जाता |

जैसे एक बीज ही बढ़कर वट विशाल होकर छा जाता |

उसी भाँति मुझको भी जग के सारे मग पर छा जाना है ||

हो उच्छृंखल या श्रद्धानत या स्वच्छन्द विचरने वाला |

जैसा है मानव मानव है, जग की प्रगति इसी पर निर्भर |

अपनी दुर्बलताओं ही में इसे नया सम्बल पाना है ||

भय बाधा से भीति मानकर आगे पीछे कदम हटाना

नहीं रीत इस पथ की, ना ही कर्मयोगी का है यह बाना |

ह्रदय रक्त से ही नवयुग की आशा का साधन पाना है ||

निरत साधना में जो अपनी, उसे न सुध आती है जग की |

अविरत गति चलने वाले को चिंता कभी न होती मग की |

शूल बिछे हों या अंगारे, पथ पर बढ़ते ही जाना है ||

 

कजरारी बरसात

रात भर से रुक रुक कर बारिश हो रही है – मुरझाई प्रकृति को मानों नए प्राण मिल गए हैं… वो बात अलग है कि दिल्ली जैसे महानगरों में तथा दूसरी जगहों पर भी – जहाँ आबादी बढ़ने के साथ साथ “घरों” की जगह “मल्टीस्टोरीड अपार्टमेंट्स” के रूप में कंकरीट के घने जंगलों ने ले ली है… बिल्डिंग्स कारखाने बनाने के लिए पेड़ों पर बिना सोचे समझे ही कुल्हाड़ी चलाई जा रही हैं… पहाड़ों की कटाई के कारण पहाड़ खिसके जा रहे हैं… ऐसे में बरसात में मिट्टी की सौंधी सुगन्ध अब केवल स्मृतिशेष रह गई है… कोयल की पंचम के संग सुर मिलाते पपीहे की पिहू पिहू अब आपको मेघ मल्हार नहीं सुना पाती… लेकिन फिर भी मृदंग की थाप के समान बादलों के गम्भीर गर्जन की लय पर पवन देव से मिल कर मतवाली हो चुकी बूँदों का मधुरिम गान, और इस सबको देख कर मस्त हुई दामिनी का मादक नृत्य – इतना ही काफ़ी है मन के प्यासे पपीहे की नीरवता को दूर भगा उसे आह्लादित करने के लिए… कोई पत्थरदिल ही होगा जिसके मन का बिरवा ऐसे शराबी मौसम में झूम न उठेगा… इसी बात पर प्रस्तुत हैं बरखा की बूँदों के रस में डूबी कुछ पंक्तियाँ…

कजरारी बरसात जो आई, मन का बिरवा नाच उठा |

बूँदों के संग सतरंगी सपनों में वह तो झूम उठा ||

सिहर सिहर पुरवैया चलती, धरती सारी लहराती |

वन में मोर मोरनी नाचें, कोयलिया गाना गाती ||

आसमान भी सात रंग की सुर सरगम सुन झूम उठा |

बूँदों के संग सतरंगी सपनों में वह तो झूम उठा ||

आज मेघ पर चढ़ी जवानी, बौराया सा फिरता है |

किन्तु पपीहा तृप्त हुआ ना, ये कैसा पागलपन है ||

मस्त बिजुरिया की तड़पन को लख कर वह भी हूक उठा |

बूँदों के संग सतरंगी सपनों में वह तो झूम उठा ||

जिस पपिहे की प्यास बुझा पाया ना कोई भी बादल

अरी दामिनी, मधु की गागर से तू उसकी प्यास बुझा ||

घन की ताधिन धिन मृदंग पर पात पात है झूम उठा |

बूँदों के संग सतरंगी सपनों में वह तो झूम उठा ||

लहरों का या खेल

लहरों का या खेल अनोखा, लहरों का यह खेल |

एक लहर इस तट को जाती, दूजी उस तट को है जाती

कभी कभी पथ में हो जाता है दोनों का मेल ||

अनगिन नौका और जलयान यहाँ हैं लंगर डाले रहते

और अनगिनत राही इस उस तट पर नित्य उतरते रहते |

इसी तरह तो वर्ष सदी और कल्प यहाँ हैं बीते जाते

पर न कभी रुकने पाता है ऐसा अद्भुत खेल ||

एक सनातन क्रम में चलता, नित्य नया पर रूप बदलता

जग जीवन एक डोर बंधी कठपुतली जैसा सदा नाचता |

किसी चक्र सम ऊपर नीचे भाग्य निरन्तर चक्कर खाता

पर न कभी थमने पाता है मायावी यह खेल ||

किन्तु कौन यह, जो कि स्वयं को जरा काल मृत्युंजय कहता

एक डोर को काट, दूसरी में पुतली को बाँध नचाता |

इस जगती को बार बार वह निज की क्रीडास्थली बताता

कोई समझ न पाया उसको जिसका है यह खेल ||

ऐसो आयो सावन

ऐसो आयो सावन, चारों और नशा सा घुलता जाए |

कौन किसे अब कुछ समझाए, जग पर मदहोशी सी छाए ||

मेघा गरज गरज घहराए, मन की वीणा झनकी जाए |

बिजुरी दमक दमक दमकाए, पग की पायल शोर मचाए ||

बन में मोर मोरनी नाचें, हिय में और उछाह भर जाए |

पपीहा पिहू की टेर लगाए, मन बौराया झूमा जाए ||

अम्बुवा की डाली पर देखो कोयल कुहुक कुहुक हुलसाए |

मतवाले मौसम में भीज भीज मन पेंग बढ़ाता जाए ||

प्रियतम सागर करे इशारा तो फिर लाज शरम अब कैसी |

सारे बन्धन तज कर नदियाँ पिया मिलन को उमड़ी जाएँ ||

झूम झूम तरु झुकें धरा पर, प्यार भरा एक चुम्बन ले लें |

धरा बावरी हरा घाघरा पहन मस्त हो थिरकी जाए ||

ऐ भाई ज़रा देखके चलो

ये कौन सा मुक़ाम है, फ़लक नहीं ज़मीं नहीं

के शब नहीं सहर नहीं, के ग़म नहीं ख़ुशी नहीं

कहाँ ये लेके आ गई हवा तेरे दयार की ||

गुज़र रही है तुमपे क्या बनाके हमको दर-ब-दर

ये सोचकर उदास हूँ, ये सोचकर है चश्मे तर

न चोट है ये फूल की, न है ख़लिश ये ख़ार की ||

पता नहीं ऊपर वाले के दयार की हवा सदी के महान कवि श्री गोपालदास नीरज जी को भी कहाँ उड़ा ले गई | वो नीरज जो दिल की शायरी से ग़म का नग़मा लिखकर ख़त की शक्ल में रवाना कर देते थे ताकि हज़ारों रंग के नज़ारे उस ख़त से खिल उठें | लेकिन शायद उस ऊपरवाले को भी ज़रूरत महसूस हुई होगी कि कोई उसके लोक में आकर हर किसी को सावधान करने के लिए पुकारे “ऐ भाई ज़रा देखके चलो…”

जीवन दर्शन को गीतों में ढालने वाला नीरज जी के जैसा महान गायक कभी मरता नहीं, अपने गीतों के रूप में जीवन के यथार्थ से सबको परिचित कराता सदा के लिए अमर हो जाता है…

विनम्र श्रद्धांजलि उस महान आत्मा को… उन्हीं की पंक्तियों के साथ…

है प्यार हमने किया जिस तरह से उसका न कोई जवाब

ज़र्रा थे लकिन तेरी लौ में जलकर हम बन गए आफ़ताब

हमसे है ज़िन्दा वफ़ा और हमही से है तेरी महफ़िल जवाँ

हम जब न होंगे तो रो रो के दुनिया ढूँढेगी मेरे निशाँ

https://youtu.be/xwFstp6EtL0

https://youtu.be/pzWNlUduP_Q

https://youtu.be/vTQkB6MvKZc

 

मैं आशा पुष्प खिला जाती

मुझमें ही आदि, अन्त भी मैं, मैं ही जग के कण कण में हूँ |

है बीज सृष्टि का मुझमें ही, हर एक रूप में मैं ही हूँ ||

मैं अन्तरिक्ष सी हूँ विशाल, तो धरती सी स्थिर भी हूँ |

सागर सी गहरी हूँ, तो वसुधा का आँचल भी मैं ही हूँ ||

मुझमें है दीपक का प्रकाश, सूरज की दाहकता भी है |

चन्दा की शीतलता, रातों की नीरवता भी मुझमें है ||

मैं ही अँधियारा पथ ज्योतित करने हित खुद को दहकाती |

और मैं ही मलय समीर बनी सारे जग को महका जाती ||

मुझमें नदिया सा है प्रवाह, मैंने न कभी रुकना जाना |

तुम जितना भी प्रयास कर लो, मैंने न कभी झुकना जाना ||

मैं सदा नई चुनती राहें, और एकाकी बढ़ती जाती |

और अपने बल से राहों के सारे अवरोध गिरा जाती ||

मुझमें है बल विश्वासों का, स्नेहों का और उल्लासों का |

मैं धरा गगन को साथ लिये आशा के पुष्प खिला जाती ||

मन का तीरथ

मन के भीतर एक तीर्थ बसा, जो है पुनीत हर तीरथ से

जिसमें एक स्वच्छ सरोवर है, कुछ अनजाना, कुछ पहचाना |

इस तीरथ में मन की भोली गोरैया हँसती गाती है

है नहीं उसे कोई चिंता, ना ही भय उसको पीड़ा का ||

चिंताओं के, पीड़ाओं के अंधड़ न यहाँ चल पाते हैं

हर पल वसन्त ही रहता है, पतझड़ न यहाँ टिक पाते हैं |

पर कठिन बड़ा इसका मग है, और दूर बहुत सरवर तट है

जिसमें हैं सुन्दर कमल खिले, हासों के और उल्लासों के ||

कैसे तट का पथ वह पाए, कैसे पहुँचे उस सरवर तक

पंथी को चिंता है इसकी, होगी कब वो पुनीत वेला |

लेकिन मन में विश्वास भरे, संग संवेदन पाथेय लिये

चलता जाए राही कोई, तो पा ही जाएगा मंज़िल ||

होगी हरीतिमा दिशा दिशा, होगा प्रकाश हर निशा निशा

एक शान्तिपूर्ण उल्लास लिये थिरकेगा केवल प्रेम वहाँ |

फिर धीरे धीरे सरवर में जितना गहरे वह उतरेगा

जग की चिंताओं को तज, वह परमात्मभाव हो जाएगा ||

 

 

काले मेघा जल्दी से आ

पिछले कुछ दिनों से धूल भरे आँधी तूफानों का सामना हो रहा है सभी को | बादल आते हैं, पर मानों सबसे गुस्सा होने के कारण उड़ जाते हैं | यही सब सोचते सोचते कुछ पंक्तियाँ अनायास ही बन गईं, प्रस्तुत हैं…

काले मेघा जल्दी से आ, भूरे मेघा जल्दी से आ ||

घाम ये कैसा चहक रहा है, अँगारे सा दहक रहा है |

लुका छिपी फिर अब ये कैसी, मान मनुव्वल अब ये कैसी ||

कितने आँधी तूफाँ आते, धूल धूसरित वे कर जाते

पल भर में धरती पर अपना ताण्डव नृत्य दिखा वे जाते |

तेरी घोर गर्जना से सब आँधी तूफाँ हैं भय खाते

आकर उनको दूर भगा तू, वसुन्धरा का मन हरषा तू ||

सूख रही हैं ताल तलैया, सूख रही हैं सागर नदियाँ

रूठ रहे हैं गाय बछरिया, रूठ गई है मस्त गोरैया |

कोयल की पंचम है रूठी, भँवरे की भी गुँजन रूठी

आके सबको आज मना तू, धरती पर हरियाली ला तू ||

माना हमने जंगल काटे, सारे पेड़ कर दिए नाटे

पर इन्सानी अपराधों का इनको अब तू दण्ड न दे रे |

ये सब तेरा ही मुँह ताकें, तुझसे ही हैं आस लगाएँ

इनको थोड़ी राहत दे दे, पूरी इनकी चाहत कर दे ||

तू रूठा तो साथ में तेरे वसुन्धरा भी रूठ रहेगी

अपनी वसु सन्तानों को जगती से फिर वह दूर रखेगी |

होगा क्या फिर आज सोच ले, जग के मन की व्यथा समझ ले

दाने पानी को तरसें सब, ऐसा मत तू प्रण अब ले रे ||

पर गुस्से में नहीं बरसना, प्यार भरा तू राग सुनाना

और ता धिन मृदंग की लय पर इस सारे जग पर छा जाना |

ताल विलम्बित में तू आना, गत के संग फिर भाव दिखाना

प्यारी मस्त बिजुरिया संग मस्ती में भर फिर नर्तन करना ||