Category Archives: गुरु

गुरु का वृश्चिक में गोचर

वृश्चिक में गुरु के गोचर का सिंह राशि पर सम्भावित प्रभाव

कल 11 अक्टूबर को देवगुरु बृहस्पति अपने शत्रु ग्रह शुक्र की राशि तुला से निकल कर मित्र ग्रह मंगल की वृश्चिक राशि में प्रस्थान कर चुके हैं | अब तक हम इस गोचर के मेष, वृषभ, मिथुन और कर्क राशियों पर सम्भावित प्रभावों के विषय में लिख चुके हैं | आज जानने का प्रयास करते हैं कि एक Astrologer के अनुसार सिंह राशि के जातकों पर गुरु के वृश्चिक राशि में गोचर के क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

सिंह राशि से पंचमेश और अष्टमेश होकर गुरु का गोचर आपकी राशि से चतुर्थ भाव में हो रहा है | आपके चतुर्थ भाव से गुरु की दृष्टियाँ आपके अष्टम भाव, दशम भाव तथा बारहवें भाव पर आ रही हैं | ये गोचर आपके लिए मिश्रित फल देने वाला प्रतीत होता है | कार्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | यदि आप किसी नौकरी में हैं तो आपका कहीं ट्रांसफर भी सम्भव है | किन्तु हो सकता है जिस स्थान पर आपका ट्रांसफर हो वह स्थान आपके लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुकूल न रहे | यदि आपका अपना व्यवसाय है तो व्यवसाय से सम्बन्धित यात्राओं में वृद्धि भी हो सकती है | यात्राओं के दौरान आपको अपने स्वास्थ्य और अपने आवश्यक Documents की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है | साथ ही यात्राओं पर पैसा भी अधिक खर्च हो सकता है | परिवार में कोई शुभ कार्य सम्पन्न हो सकता है उसमें भी आवश्यकता से अधिक धन का व्यय हो सकता है | साथ ही कार्य स्थल में विरोधियों की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | इसके लिए आपको अपना स्वयं का Temparament नियन्त्रित रखने की आवश्यकता होगी | परिवार में वातावरण सौहार्दपूर्ण रहने की सम्भावना है | यदि आपक नया वाहन, नया घर अथवा ऑफिस खरीदना चाहते हैं तो उसके लिए भी समय अनुकूल प्रतीत होता है | घर बनाना भी आरम्भ कर सकते हैं और सम्भावना ऐसी भी है कि इसी अवधि में आप उस घर में प्रविष्ट भी हो सकते हैं |

सामाजिक गतिविधियों में वृद्धि के ही साथ मान सम्मान में वृद्धि की भी सम्भावना है | नौकरी की तलाश भी इस अवधि में पूर्ण हो सकती है | नौकरी बदलना चाहते हैं तो उसके लिए भी समय अनुकूल प्रतीत होता है | विद्यार्थियों तथा प्रतियोगी परीक्षा के छात्रों के लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | पॉलिटिक्स से यदि आपका सम्बन्ध है तो आपको कोई नया पद भी प्राप्त हो सकता है, किन्तु उसके साथ ही कार्यभार में भी वृद्धि की सम्भावना है | धार्मिक गतिविधियों में भी वृद्धि की सम्भावना है |

प्रेम सम्बन्धों के लिए यह गोचर अनुकूल फल देने वाला प्रतीत होता है | यदि अविवाहित हैं तो आपके कार्यक्षेत्र में ही आपको कोई व्यक्ति Prapose कर सकता है | विवाहित हैं तो दाम्पत्य जीवन में माधुर्य बना रहने की भी सम्भावना है |

स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है – विशेष रूप से यात्राओं के दौरान | स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर अधिक धन खर्च करना पड़ सकता है | 28 अक्टूबर से 27 दिसम्बर के मध्य विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है |

अन्त में, उपरोक्त परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |

साथ ही, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/12/jupiter-transit-in-scorpio-for-leo/

 

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गुरु का वृश्चिक में गोचर

वृश्चिक में गुरु के गोचर का कर्क राशि पर सम्भावित प्रभाव

देवगुरु बृहस्पति आज ही रात्रि 8:39 के लगभग अपने शत्रु ग्रह शुक्र की राशि तुला से निकल कर मित्र ग्रह मंगल की वृश्चिक राशि में प्रस्थान करेंगे | वृश्चिक राशि में गोचर करते हुए गुरु वृश्चिक राशि को तो प्रभावित करेगा ही, साथ ही गुरु की दृष्टियाँ वृश्चिक राशि से पञ्चम भाव यानी स्वयं अपनी राशि मीन पर, वृश्चिक से सप्तम भाव यानी वृषभ राशि और वृश्चिक राशि से भाग्य स्थान यानी कर्क राशि पर रहेंगी | इस प्रकार गुरु अपने इस गोचर में वृश्चिक के साथ साथ मीन, वृषभ तथा कर्क राशियों को भी प्रभावित करेगा | निश्चित रूप से इन राशियों के लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक रहने की सम्भावना की जा सकती है | आइये जानने का प्रयास करते हैं कि कर्क राशि के जातकों पर गुरु के वृश्चिक राशि में गोचर के क्या सम्भावित परिणाम हो सकते हैं…

कर्क राशि से षष्ठेश और भाग्येश होकर पंचम भाव में गुरु का गोचर हो रहा है जहाँ से आपके भाग्य स्थान, लाभ स्थान तथा स्वयं आपकी लग्न पर गुरु की दृष्टियाँ आ रही हैं | आपके लिए यह गोचर अत्यन्त भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | अच्छे और प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ आपके सम्पर्क बन सकते हैं | यदि आपने समझदारी से काम लिया तो इन सम्बन्धों के माध्यम से आपको अपने कार्य में सहायता प्राप्त हो सकती है | आपकी प्रतियोगी क्षमता में भी वृद्धि की सम्भावना है जिसके कारण यदि आप नई नौकरी के लिए प्रयत्नशील हैं तो उसमें भी सफलता प्राप्त होने की सम्भावना है |

सम्भव है बीच बीच में कुछ समस्याओं का भी सामना करना पड़ जाए, विशेष रूप से 28 अक्टूबर से 27 दिसम्बर के मध्य जब गुरु शनि के नक्षत्र अनुराधा पर होंगे | किन्तु अपनी निर्णायक क्षमता के बल पर आप उन समस्याओं का समाधान सरलता से कर सकेंगे | सम्भव है आपिस अवधि में कहीं पैसा Invest भी कर दें, जिसका आपको भविष्य में लाभ हो सकता है | आप किसी नौकरी में हैं तो आपकी पदोन्नति के भी अवसर प्रतीत होते हैं |

मित्रों का सहयोग और साथ भी इस अवधि में आपको उपलब्ध रह सकता है और आप उनके साथ आमोद प्रमोद में भी समय व्यतीत कर सकते हैं | आपकी रूचि इस अवधि में धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों की ओर भी बढ़ सकती है | आपकी सन्तान के लिए तथा विद्यार्थियों के लिए भी यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | सन्तान प्राप्ति के भी योग इस अवधि में हैं |

जीवन साथी के साथ सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण बने रह सकते हैं और आप सन्तान के लिए भी प्रयास कर सकते हैं | किन्तु यदि आपने अपना Temprament सही नहीं रखा तो किसी बात पर विवाद भी हो सकता है | जीवन साथी के साथ किसी तीर्थ स्थान की यात्रा के लिए अथवा घूमने के लिए भी जा सकते हैं |

स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है | पेट से सम्बन्धित कोई समस्या आपको परेशान कर सकती है – विशेष रूप से 28 अक्टूबर से 27 दिसम्बर के मध्य | अपने खान पान पर यदि संयम रखेंगे तो बहुत सी समस्याओं से बचे रह सकते हैं |

अन्त में, उपरोक्त परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |

साथ ही, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

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गुरु का वृश्चिक राशि में गोचर

वृश्चिक में गुरु के गोचर का मेष राशि पर सम्भावित प्रभाव

देवगुरु बृहस्पति की उपासना ज्ञान, विज्ञान, बुद्धि, धर्म और आध्यात्म के साथ-साथ भाग्य वृद्धि, विवाह तथा सन्तान सुख की प्राप्ति के लिए की जाती है | किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु पिता का कारक भी होता है और किसी कन्या की कुण्डली में पति के लिए भी गुरु को देखा जाता है | साथ ही माना जाता है कि यदि किसी व्यक्ति का गुरु बली हो तो वह व्यक्ति विद्वान् होता है तथा उसे अपने ज्ञान के ही कारण यश और धन की प्राप्ति होती है | इन्हें देवगुरु की उपाधि से विभूषित किया गया है अतः इन्हें “गुरु” भी सम्बोधित किया जाता है | ये शील और धर्म के अवतार माने जाते हैं | नवग्रहों के समूह का नायक माने जाने के कारण इन्हें गणपति और गणाधिपति नामों से भी सम्बोधित किया जाता है | धनु और मीन दो राशियों तथा पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद नक्षत्रों का स्वामित्व गुरु के पास है | कर्क इनकी उच्च राशि तथा मकर निम्न राशि है | सूर्य, चन्द्रमा और मंगल के साथ इनकी मित्रता है, बुध तथा शुक्र शत्रु ग्रह हैं और शनि के साथ ये तटस्थ भाव में रहते हैं | गुरुदेव एक राशि पर लगभग एक वर्ष तक भ्रमण करते हैं | वक्री और अस्त आदि होने की स्थिति में कभी कभी इस अवधि में कुछ घट बढ़ भी हो सकती है | इस वर्ष 11 अक्टूबर को रात्रि 8:39 के लगभग देवगुरु बृहस्पति अपने शत्रु ग्रह शुक्र की राशि तुला से निकल कर मित्र ग्रह मंगल की वृश्चिक राशि में प्रस्थान करेंगे | वृश्चिक राशि में अपने भ्रमण के दौरान गुरुदेव 28 अक्टूबर से अनुराधा नक्षत्र में और 27 दिसम्बर से ज्येष्ठा नक्षत्र में भ्रमण करते हुए अन्त में 29 मार्च 2019 को 20:07 के लगभग अपनी स्वयं की राशि धनु और मूल नक्षत्र में प्रविष्ट हो जाएँगे | इस बीच 16 नवम्बर से 16 दिसम्बर तक गुरु को भगवान् भास्कर का साथ भी मिलेगा और 12 नवम्बर से 10 दिसम्बर तक गुरुदेव अस्त भी रहेंगे | 10 अप्रेल 2019 को 22:05 के लगभग गुरु का वक्री होना आरम्भ होगा और वक्री होते हुए 23 अप्रेल की रात को पुनः वृश्चिक राशि में लौट आएँगे | 11 अगस्त को 19:42 के लगभग गुरु मार्गी हो जाएँगे और इसी अवस्था में पाँच नवम्बर तक भ्रमण करते हुए अन्त में पाँच नवम्बर को प्रातः सूर्योदय से पूर्व 05:16 के लगभग पुनः अपनी स्वयं की धनु राशि में प्रविष्ट हो जाएँगे | वृश्चिक में पुनः अपनी यात्रा के दौरान गुरु का गोचर 23 अप्रेल से पुनः ज्येष्ठा नक्षत्र पर रहेगा |

वृश्चिक राशि में गोचर करते हुए गुरु वृश्चिक राशि को तो प्रभावित करेगा ही, साथ ही गुरु की दृष्टियाँ वृश्चिक राशि से पञ्चम भाव यानी स्वयं अपनी राशि मीन पर, वृश्चिक से सप्तम भाव यानी वृषभ राशि और वृश्चिक राशि से भाग्य स्थान यानी कर्क राशि पर रहेंगी | इस प्रकार गुरु अपने इस गोचर में वृश्चिक, मीन, वृषभ तथा कर्क राशियों को प्रभावित करेगा | निश्चित रूप से इन राशियों के लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक रहने की सम्भावना की जा सकती है |

उपरोक्त समस्त तथ्यों के आधार पर आज से आरम्भ कर रहे हैं कि प्रत्येक राशि पर इस गोचर के क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं… सबसे पहले, आइये जानने का प्रयास करते हैं कि मेष राशि के जातकों पर गुरु के वृश्चिक राशि में गोचर के क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

आपके लिए आपका भाग्येश और द्वादशेश होकर गुरु आपकी राशि से अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | आपके लिए यह गोचर मिश्रित फल देने वाला कहा जा सकता है | सम्भव है आरम्भ में आपको अपने कार्यों में किसी प्रकार के व्यवधान का अनुभव हो जिसके कारण आपका मन भी अशान्त रह सकता है | किन्तु चिन्ता की आवश्यकता नहीं है, समस्याओं का समाधान भी स्वयं ही होता चला जाएगा |

आपका व्यय और भाग्य स्थानों का स्वामी होकर गुरु आपके अष्टम भाव से आपके व्यय भाव के साथ ही आपके धन भाव Invest को भी देख रहा है | यदि आपने कहीं पैसा किया हुआ है तो उसमें धनलाभ की सम्भावना की जा सकती है | पैसा Invest करने के लिए यह गोचर अनुकूल नहीं प्रतीत होता | अचानक ही किसी ऐसे स्रोत से धनलाभ की भी सम्भावना है जहाँ के विषय में आपने कल्पना भी नहीं की होगी, किन्तु इसके साथ ही आपके खर्चों में भी वृद्धि की सम्भावना है |

आपके चतुर्थ भाव पर भी गुरु की दृष्टि आ रही है | आप किसी प्रॉपर्टी पर पैसा खर्च कर सकते हैं | किन्तु अभी नई प्रॉपर्टी खरीदना आपके लिए अनुकूल नहीं रहेगा | पैसे के लेन देन में सावधानी रखने की आवश्यकता है | साथ ही ऐसे लोगों को पहचान कर उनसे दूर रहने की आवश्यकता है जो आपके लिए किसी प्रकार भी नकारात्मक हो सकते हैं |

कुछ क्षेत्रों के लिए यह गोचर शुभ हो सकता है | जैसे यदि आप कोई शोध कार्य कर रहे हैं तो उसमें प्रगति की तथा सफलता प्राप्त होने की सम्भावना की जा सकती है | यदि आप अध्ययन अध्यापन का अथवा किसी प्रका की Alternative Healing जैसे होमेयोपेथी या किसी प्रकार की Counselling आदि के क्षेत्र से सम्बद्ध हैं तो आपके कार्य में प्रगति की सम्भावना है |

इस अवधि में यात्राओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | यात्राएँ कार्य की दृष्टि से तो अनुकूल रह सकती हैं किन्तु स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता होगी – विशेष रूप से 29 मार्च 2019 से 23 अप्रेल 2019 तक | इस समय में अपने पिता के भी स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता होगी | शेष समय में क्योंकि मित्र ग्रहों शनि और बुध के नक्षत्रों पर गुरु का गोचर रहेगा अतः परिणाम अनुकूल हो सकते हैं |

किन्तु ध्यान रहे, ये परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता है, और भी बहुत से सूत्रों के आधार पर कुण्डली का परीक्षण किया जाता है | अतः इसके लिए किसी योग्य ज्योतिषी से कुण्डली के विषय में बात करनी चाहिए…

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श्री बृहस्पति स्तोत्रम्

भारतीय वैदक ज्योतिष – Indian Vedic Astrology – के अनुसार देवगुरु बृहस्पति यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में उत्तम स्थिति में हैं तो जातक को ज्ञानवान, लब्धप्रतिष्ठ, उत्तम सन्तान तथा जीवन साथी से युक्त तथा अपने ज्ञान के बल पर जीविकोपार्जन करने वाला बनाते हैं | साथ ही प्रायः देखा गया है कि गुरु की स्थिति जातक की कुण्डली में यदि अनुकूल हो तो उसकी दशा अन्तर्दशा में समस्त कामनाओं की पूर्ति भी होने की सम्भावना रहती है | किन्तु वही गुरु यदि अशुभ स्थिति या प्रभाव में हो तो जातक दरिद्र, क्रोधी तथा दुर्बुद्धि भी हो सकता है | गुरुदेव सदा प्रसन्न रहें इस कामना से प्रायः Vedic Astrologer कुछ मन्त्रों के जाप का विधान बताते हैं | जिनमें गुरु स्तोत्र भी आते हैं | प्रस्तुत हैं गुरु स्तोत्र के दो रूप, जातक अपनी सुविधानुसार किसी भी स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं…

यह प्रथम स्तोत्र “मन्त्रमहार्णव” से उद्धृत है…

पीताम्बर: पीतवपु: किरीटी, चतुर्भुजो देवगुरु: प्रशान्त: |
दधाति दण्डं च कमण्डलुं च, तथाक्षसूत्रं वरदोsस्तु मह्यम् ||
नम: सुरेन्द्रवन्द्याय देवाचार्याय ते नम: |
नमस्त्वनन्तसामर्थ्यं देवासिद्धान्तपारग: ||
सदानन्द नमस्तेSस्तु नम: पीडाहराय च |
नमो वाचस्पते तुभ्यं नमस्ते पीतवाससे ||
नमोSद्वितीयरूपाय लम्बकूर्चाय ते नम: |
नम: प्रहृष्टनेत्राय विप्राणां पतये नम: ||

नमो भार्गवशिष्याय विपन्नहितकारक: |
नमस्ते सुरसैन्याय विपन्नत्राणहेतवे ||
विषमस्थस्तथा नृणां सर्वकष्टप्रणाशनम् |
प्रत्यहं तु पठेद्यो वै तस्य कामफलप्रदम् ||

|| इति मन्त्रमहार्णवे बृहस्पतिस्तोत्रम् ||

 

निम्नलिखित स्तोत्र स्कन्दपुराण से उद्धृत है…

|| अथ श्री बृहस्पतिस्तोत्रम् ||

अस्य श्री बृहस्पतिस्तोत्रस्य गृत्समद ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, बृहस्पतिर्देवता, बृहस्पति प्रीत्यर्थं जपे विनियोग:

गुरुर्बृहस्पतिर्जीव: सुराचार्यो विदां वरः |

वागीशो धिषणो दीर्घश्मश्रुः पीताम्बरो युवा ||

सुधादृष्टिर्ग्रहाधीशो ग्रहपीडापहारकः |

दयाकरः सौम्यमूर्तिः सुरार्च्यः कुड्मलद्युतिः ||

लोकपूज्यो लोकगुरुः नीतिज्ञो नीतिकारकः |

तारापतिश्चाङ्गिरसो वेदवेद्यः पितामहः ||

भक्त्या बृहस्पतिं स्मृत्वा नामान्येतानि यः पठेत् |

अरोगी बलवान् श्रीमान् पुत्रवान् स भवेन्नरः ||

जीवेत् वर्षशतं मर्त्यः पापं नश्यति नश्यति |

यः पूजयेत् गुरुदिने पीतगन्धाक्षताम्बरैः ||

पुष्पदीपोपहारैश्च पूजयित्वा बृहस्पतिम् |

ब्रह्मणान् भोजयित्वा च पीडाशान्तिर्भवेत् गुरोः ||

|| इति श्री स्कन्दपुराणे बृहस्पतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||

देवगुरु बृहस्पति सभी को सद्बुद्धि प्रदान कर ज्ञान विज्ञान में पारंगत करते हुए समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/07/shree-brihaspati-stotram/

 

देवगुरु बृहस्पति

नवग्रहों की बात करते समय देवगुरु बृहस्पति की चर्चा की जाए तो हिन्दू धर्म के नवग्रहों में देवगुरु बृहस्पति की उपासना ज्ञान, विज्ञान, बुद्धि, धर्म और आध्यात्म के साथ-साथ भाग्य वृद्धि, विवाह तथा सन्तान सुख की प्राप्ति के लिए की जाती है | किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु पिता का कारक भी होता है और किसी कन्या की कुण्डली में पति के लिए भी गुरु को देखा जाता है | गुरु या शुक्र में से कोई एक अथवा दोनों ही यदि अस्त हों तो उस स्थिति में प्रायः विवाह की अनुमति Vedic Astrologer नहीं देते | साथ ही माना जाता है कि यदि किसी व्यक्ति का गुरु बली हो तो वह व्यक्ति विद्वान् होता है तथा उसे अपने ज्ञान के ही कारण यश और धन की प्राप्ति होती है | प्रायः देखा जाता है कि यदि किसी के घर में बहुत अधिक धर्म ग्रन्थ रखे हों तो देखते के साथ ही लोग बोल देते हैं कि इस व्यक्ति का बृहस्पति प्रबल होगा | जैसा कि ऊपर ही लिखा है, इन्हें देवगुरु की उपाधि से विभूषित किया गया है अतः इन्हें “गुरु” भी सम्बोधित किया जाता है | ये शील और धर्म के अवतार माने जाते हैं | नवग्रहों के समूह का नायक माने जाने के कारण इन्हें गणपति भी कहा जाता है | ज्ञान और वाणी के देवता गुरु ने “बार्हस्पत्य सूत्र” की रचना भी की थी | इनका वर्ण पीला है तथा इनके हाथों में दण्ड, कमण्डल और जपमाला शोभायमान रहते हैं | दैत्यगुरु शुक्राचार्य के ये कट्टर विरोधी हैं | इस विषय में भी एक पौराणिक कथा उपलब्ध होती है कि अंगिरस मुनि से भार्गव शुक्र और बृहस्पति दोनों एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे | अंगिरस अपने पुत्र बृहस्पति पर अधिक ध्यान देते थे और शुक्र के साथ भेद भाव करते थे | इस बात से खिन्न होकर शुक्र ने अंगिरस से शिक्षा लेनी बन्द कर दी और तभी से शुक्र और बृहस्पति में शत्रुता का भाव हो गया और शुक्र ने दैत्यों का साथ देना आरम्भ कर दिया |

ऋग्वेद के अनुसार बृहस्पति को अंगिरस मुनि और उनकी पत्नी स्मृति का पुत्र माना गया है | माना जाता है कि इन्होने प्रभास तीर्थ के निकट भगवान् शिव की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और देवगुरु की पदवी तथा नवग्रह मण्डल में स्थान प्राप्त किया |

धनु और मीन दो राशियों तथा पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद नक्षत्रों का स्वामित्व गुरु के पास है | कर्क इनकी उच्च राशि तथा मकर निम्न राशि है | सूर्य, चन्द्रमा और मंगल के साथ इनकी मित्रता है, बुध तथा शुक्र शत्रु ग्रह हैं और शनि के साथ ये तटस्थ भाव में रहते हैं | इनका तत्व आकाश है तथा ये पूर्व और उत्तर दिशा तथा शीत ऋतु के स्वामी माने जाते हैं | क्योंकि इनका तत्व आकाश है अतः जिस व्यक्ति की कुण्डली में गुरु अच्छी स्थिति में होगा उस व्यक्ति के जीवन में निरन्तर प्रगति और विस्तार की सम्भावना रहती है | इन जातकों का व्यवसाय मुख्य रूप से अध्ययन-अध्यापन, लेखन, खगोल तथा ज्योतिष विद्या से सम्बन्धित ज्ञान, गणित तथा बैंक आदि से सम्बन्धित कार्य, वक़ालत अथवा फाइनेंस कम्पनी से सम्बन्धित कार्य माना जाता है | पवित्र अथवा धार्मिक स्थल, बुद्धि और ज्ञान, वेद वेदान्त और तर्क शास्त्र का ज्ञान, बड़े भाई तथा पुत्र पौत्र आदि का प्रतिनिधित्व गुरु के पास है | साथ ही जिनका गुरु प्रभावशाली होता है वे लोग कुछ भारी शरीर के होते हैं | यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु अच्छी स्थिति में नहीं अथवा पीड़ित है तो उसे मधुमेह तथा पेट से सम्बन्धित रोगों की सम्भावना रहती है | सोलह वर्ष की गुरुदेव की दशा होती है तथा ये एक राशि में पूरे एक वर्ष तक भ्रमण करते हैं, किन्तु कभी कभी वक्री, मार्गी अथवा अतिचारी होने की स्थिति में एक राशि में एक या दो माह अधिक भी रुक जाते हैं |

गुरु को बली बनाने अथवा उन्हें प्रसन्न करने के लिए Vedic Astrologer बहुत से मन्त्रों का जाप का सुझाव देते हैं | उन्हीं में से प्रस्तुत हैं कुछ मन्त्र… आप अपनी सुविधानुसार किसी भी एक मन्त्र का जाप कर सकते हैं…

वैदिक मन्त्र : ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु

यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्

पौराणिक मन्त्र :

ॐ देवानां च ऋषीणां गुरुं कांचनसन्निभम्

बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्

तन्त्रोक्त मन्त्र : ॐ ऎं क्रीं बृहस्पतये नम: अथवा ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम: अथवा  ॐ श्रीं श्रीं गुरवे नम:

बीज मन्त्र : ॐ बृं बृहस्पतये नम:

गायत्री मन्त्र : ॐ अंगिरोजाताय विद्महे वाचस्पते धीमहि तन्नो गुरु प्रचोदयात्

अथवा ॐ आंगिरसाय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि तन्नो जीव:प्रचोदयात्

देवगुरु बृहस्पति सभी के ज्ञान का विस्तार करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/04/deva-guru-brihaspati/