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गोपाष्टमी

कार्तिक शुक्ल अष्टमी गोपाष्टमी के नाम से जानी जाती है | कल अर्द्धरात्र्योत्तर दो बजकर छप्पन मिनट से अष्टमी तिथि है जो कल सूर्योदय से पूर्व चार बजकर छप्पन मिनट तक रहेगी | यह पर्व विशेष रूप से मथुरा वृन्दावन और बृज के क्षेत्रों में मनाया जाने वाला पर्व है | इसी प्रकार का पर्व महाराष्ट्र और उसके आस पास के क्षेत्रों में दीपावली से पूर्व कार्तिक कृष्ण द्वादशी को “गौवत्स द्वादशी” के नाम से भी मनाया जाता है | गोवर्धन पूजा की ही भाँति गोपाष्टमी पर्व का भी भारतीय लोक जीवन में काफी महत्व है | पौराणिक तथा लोक मान्यताओं के अनुसार कृष्ण ने समस्त गोप ग्वालों को अपने प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता बताई कि हमारे नदी, पर्वत, वन, गउएँ, वनस्पतियाँ सब प्राणिमात्र के लिए कितने जीवनोपयोगी हैं | तो क्यों न हम इन्द्र जैसे देवताओं की पूजा करने की अपेक्षा अपने इन प्राकृतिक संसाधनों की पूजा अर्चना करें | इस बात पर इन्द्र कुपित हो गए और उनके क्रोध के कारण बृज में मूसलाधार वर्षा के कारण बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई तो उससे बचने के लिए कृष्ण समस्त बृजवासियों को गोवर्धन पर्वत के नीचे ले गए और सात दिन तक सब उसी पर्वत के नीचे रहकर मूसलाधार वर्षा से सबको बचाते रहे | अन्त में गोपाष्टमी के दिन इन्द्र ने अपनी हार स्वीकार कर ली और कृष्ण से क्षमा याचना की | इसी की स्मृति में गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाता है |

कुछ ऐसी भी लोक मान्यता है कि इसी दिन से कृष्ण ने गौओं को वन में ले जाना आरम्भ किया था जिसके लिए माता यशोदा ने ऋषि शाण्डिल्य से मुहूर्त भी निकलवाया था |

मान्यताएँ और कथाएँ जितनी भी हों, वास्तविकता तो यह है कि इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है | शास्त्रों में गाय को गंगा नदी के समान ही पवित्र माना गया है | भविष्य पुराण में लक्ष्मी का स्वरूप भी गाय को माना गया है | जिस प्रकार देवी लक्ष्मी को समस्त प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली माना गया है उसी प्रकार गाय भी व्यक्ति के लिए अनेक प्रकार से सुख समृद्धिदायक होती है | गाय के दूध से जहाँ स्वास्थ्य लाभ होता है वहीं उसका गोबर खाद में काम आने के अतिरिक्त अनेक प्रकार के औषधीय गुणों से युक्त भी माना जाता है | साथ ही गाय में समस्त देवताओं का वास भी माना जाता है | पद्मपुराण के अनुसार गाय के मुख में चारों वेदों का निवास है | अन्य वैदिक मान्यताओं के अनुसार गाय के अंग प्रत्यंग में दिव्य शक्तियों का निवास है | अर्थात गाय केवल दूध देने वाला पशु मात्र ही नहीं है अपितु देवताओं की प्रतिनिधि है | इस प्रकार गौ सम्पूर्ण मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय है |

जैसा कि पिछले लेख में भी लिखा था, वैदिक संस्कृति में गौ का बहुत महत्त्व माना गया है | आश्रमों के नित्य प्रति के कार्यों में गौ से प्राप्त प्रत्येक वस्तु का उपयोग होता था इसलिए आश्रमों में गौ पालन अनिवार्य था | पंचगव्य का प्रयोग कायाकल्प करने के लिए किया जाता था | आयुर्वेद ग्रन्थों में भी इसका वर्णन उपलब्ध होता है | अथर्ववेद में तो पूरा का पूरा सूक्त ही गौ को समर्पित है |

“गावो भगो गाव इन्द्रो मे” (अथर्ववेद सा. 4/21/5) अर्थात मेरा सौभाग्य और मेरा ऐश्वर्य दोनों गायों से ही है | “स्व आ दमे सुदुधा पस्य धेनु:” (ऋग्वेद 2/35/7) अर्थात अपने घर में ही उत्तम दूध देने वाली गौ हो |

इसके अतिरिक्त गौ को रुद्रों की माता, वसुओं की कन्या तथा आदित्यों की बहिन माना गया है और ऐसी भी मान्यता है कि गाय की नाभि में अमृत होता है | इस प्रकार अनगिनत मन्त्र गौ की महिमा से युक्त वैदिक और पौराणिक साहित्य में उपलब्ध होते हैं | साथ ही गाय में समस्त देवों का वास भी माना गया है | और ऐसा सम्भवतः गौ की उपादेयता के कारण ही माना गया होगा | प्राचीन काल में घरों के भीतर और बाहर गोबर के लेप का भी कारण यही था गोबर में स्थान को स्वच्छ और कीटाणु मुक्त रखने के तत्व होते हैं | ऐसा भी माना जाता है कि अपने सींगों के माध्यम से गाय सभी आकाशीय ऊर्जाओं को संचित कर लेती है और वही ऊर्जा हमें गौमूत्र, दूध और गोबर तथा गौ दुग्ध से प्राप्त अन्य पदार्थों जैसे घी, दही, छाछ मक्खन आदि के द्वारा प्राप्त होती हैं | माना जाता है कि गुरु वशिष्ठ ने तो गाय की उपादेयता के कारण ही कुछ प्रजातियाँ भी तैयार की थीं जिनमें कपिला, देवनी, नन्दिनी और भौमा प्रमुख थीं |

इसी समस्त के प्रति श्रद्धा और आस्था व्यक्त करने हेतु कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी पर्व के रूप में मथुरा, वृंदावन और बृज के अन्य क्षेत्रों के साथ साथ प्रायः समस्त उत्तर भारत में हिन्दू परिवारों में इस पर्व को मनाया जाता है | आज के दिन गायों और उनके बछड़े को सजाकर उनकी पूजा करके उन्हें वन में भेजा जाता है और सायंकाल उनके घर लौटने पर पुनः उनकी पूजा की जाती है |

अस्तु, मूल रूप से गौ वंश तथा उनकी रक्षा के महत्त्व को प्रदर्शित करते हुए गौवत्स द्वादशी और गोपाष्टमी जैसे पर्वों के महत्त्व को हम सब भी समझें तथा प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनें, इसी कामना के साथ सभी को गोपाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

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