Category Archives: घट स्थापना

शारदीय नवरात्रों की तिथियाँ

शरद् नवरात्रि की तिथियाँ

शनिवार 28 सितम्बर – आश्विन कृष्ण अमावस्या – महालया के नाम से भी जिसे जाना जाता है – हम सभी अपने समस्त पितृगणों को श्रद्धापूर्वक विदा करेंगे – इस निवेदन के साथ कि हमारा आतिथ्य स्वीकार करने इसी प्रकार आते रहेंगे और अपना आशीर्वाद हम पर सदा बनाए रखेंगे | उसके दूसरे दिन यानी रविवार 29 सितम्बर को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से घट स्थापना तथा जौ की खेती के साथ माँ भगवती के आवाहन और आराधना का नौ दिवसीय पर्व “शारदीय नवरात्र” के रूप में आरम्भ हो जाएगा | सर्वप्रथम सभी को शारदीय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ… माँ भगवती अपने नौ रूपों के साथ हम सभी के साथ उपस्थित रहें और सभी का मंगल करें…

वास्तव में लौकिक दृष्टि से ये देखा जाए तो हर माँ शक्तिस्वरूपा माँ भगवती का ही प्रतिनिधित्व करती है – जो अपनी सन्तान को जन्म देती है, उसका भली भांति पालन पोषण करती है और किसी भी विपत्ति का सामना करके उसे परास्त करने के लिए सन्तान को भावनात्मक और शारीरिक बल प्रदान करती है, उसे शिक्षा दीक्षा प्रदान करके परिवार – समाज और देश की सेवा के योग्य बनाती है – और इस सबके साथ ही किसी भी विपत्ति से उसकी रक्षा भी करती है | इस प्रकार सृष्टि में जो भी जीवन है वह सब माँ भगवती की कृपा के बिना सम्भव ही नहीं | इस प्रकार भारत जैसे देश में जहाँ नारी को भोग्या नहीं वरन एक सम्माननीय व्यक्तित्व माना जाता है वहाँ नवरात्रों में भगवती की उपासना के रूप में उन्हीं आदर्शों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता है |

इसी क्रम में यदि आरोग्य की दृष्टि से देखें तो दोनों ही नवरात्र ऋतु परिवर्तन के समय आते हैं | चैत्र नवरात्र में सर्दी को विदा करके गर्मी का आगमन हो रहा होता है और शारदीय नवरात्रों में गर्मी को विदा करके सर्दी के स्वागत की तैयारी की जाती है | वातावरण के इस परिवर्तन का प्रभाव मानव शरीर और मन पर पड़ना स्वाभाविक ही है | अतः हमारे पूर्वजों ने व्रत उपवास आदि के द्वारा शरीर और मन को संयमित करने की सलाह दी ताकि हमारे शरीर आने वाले मौसम के अभ्यस्त हो जाएँ और मौसमों से सम्बन्धित रोगों से उनका बचाव हो सके तथा हमारे मन सकारात्मक विचारों से प्रफुल्लित रह सकें |

आध्यात्मिक दृष्टि से नवरात्र के दौरान किये जाने वाले व्रत उपवास आदि प्रतीक है समस्त गुणों पर विजय प्राप्त करके मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने के | माना जाता है कि नवरात्रों के प्रथम तीन दिन मनुष्य अपने भीतर के तमस से मुक्ति पाने का प्रयास करता है, उसके बाद के तीन दिन मानव मात्र का प्रयास होता है अपने भीतर के रजस से मुक्ति प्राप्त करने का और अंतिम दिन पूर्ण रूप से सत्व के प्रति समर्पित होते हैं ताकि मन के पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाने पर हम अपनी अन्तरात्मा से साक्षात्कार का प्रयास करें – क्योंकि वास्तविक मुक्ति तो वही है |

इस प्रक्रिया में प्रथम तीन दिन दुर्गा के रूप में माँ भगवती के शक्ति रूप को जागृत करने का प्रयास किया जाता है ताकि हमारे भीतर बहुत गहराई तक बैठे हुए तमस अथवा नकारात्मकता को नष्ट किया जा सके | उसके बाद के तीन दिनों में देवी की लक्ष्मी के रूप में उपासना की जाती है कि वे हमारे भीतर के भौतिक रजस को नष्ट करके जीवन के आदर्श रूपी धन को हमें प्रदान करें जिससे कि हम अपने मन को पवित्र करके उसका उदात्त विचारों एक साथ पोषण कर सकें | और जब हमारा मन पूर्ण रूप से तम और रज से मुक्त हो जाता है तो अंतिम तीन दिन माता सरस्वती का आह्वाहन किया जाता है कि वे हमारे मनों को ज्ञान के उच्चतम प्रकाश से आलोकित करें ताकि हम अपने वास्तविक स्वरूप – अपनी अन्तरात्मा – से साक्षात्कार कर सकें |

नवरात्रों में माँ भगवती की उपासना के समय हम सभी के यही प्रयास रहे इसी कामना के साथ प्रस्तुत है इस वर्ष के नवरात्रों की तिथियों की तालिका…

रविवार 29 सितम्बर – आश्विन शुक्ल प्रतिपदा – प्रथम नवरात्र और घट स्थापना मुहूर्त प्रातः 6:13 से 7:40 तक / अभिजित मुहूर्त 11:47 से 12:35 तक / देवी के शैलपुत्री रूप की उपासना / चन्द्र दर्शन

सोमवार 30 सितम्बर – आश्विन शुक्ल द्वितीया – द्वितीय नवरात्र – देवी के ब्रह्मचारिणी रूप की उपासना

मंगलवार 1 अक्तूबर – आश्विन शुक्ल तृतीया – तृतीय नवरात्र – देवी के चन्द्रघंटा रूप की उपासना / चित्रांगदा देवी की उपासना

बुधवार 2 अक्तूबर – आश्विन शुक्ल चतुर्थी – चतुर्थ नवरात्र – देवी के कूष्माण्डा रूप की उपासना / उपांग ललिता व्रत – ललिता पञ्चमी

गुरुवार 3 अक्तूबर – आश्विन शुक्ल पञ्चमी – पञ्चम नवरात्र – देवी के स्कन्दमाता रूप की उपासना

शुक्रवार 4 अक्तूबर – आश्विन शुक्ल षष्ठी – षष्ठ नवरात्र – देवी के कात्यायनी रूप की उपासना / सरस्वती आवाहन

शनिवार 5 अक्तूबर – आश्विन शुक्ल सप्तमी – सप्तम नवरात्र – देवी के कालरात्रि रूप की उपासना / महालक्ष्मी पूजन / सरस्वती पूजन

रविवार 6 अक्तूबर – आश्विन शुक्ल अष्टमी – अष्टम नवरात्र – महाष्टमी – देवी के महागौरी रूप की उपासना / सरस्वती बलिदान

सोमवार 7 अक्तूबर – आश्विन शुक्ल नवमी – नवम नवरात्र – देवी के सिद्धिदात्री रूप की उपासना / सरस्वती विसर्जन

मंगलवार 8 अक्तूबर – आश्विन शुक्ल दशमी – विजयादशमी – अपराजिता देवी की उपासना / विजय मुहूर्त दोपहर दो बजकर चौबीस मिनट से तीन बजकर ग्यारह मिनट तक / दुर्गा प्रतिमा विसर्जन

माँ भगवती सभी का कल्याण करें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/09/26/dates-of-navaratri-festival-2019/

 

 

नवरात्रों में घट स्थापना

नवरात्रों में घट स्थापना

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा यानी 29 सितम्बर रविवार से समस्त हिन्दू सम्प्रदाय में हर घर में माँ भगवती की पूजा अर्चना का नव दिवसीय उत्सव शारदीय नवरात्र के रूप में आरम्भ हो जाएगा | सर्वप्रथम सभी को शारदीय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ…

भारतीय वैदिक परम्परा के अनुसार किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को करते समय सर्वप्रथम कलश स्थापित करके वरुण देवता का आह्वाहन किया जाता है | आश्विन और चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा को घटस्थापना के साथ माँ दुर्गा की पूजा अर्चना आरम्भ हो जाती है | घट स्थापना के मुहूर्त पर विचार करते समय कुछ विशेष बातों पर ध्यान रखना आवश्यक होता है | सर्वप्रथम तो अमायुक्त प्रतिपदा – अर्थात सूर्योदय के समय यदि कुछ पलों के लिए भी अमावस्या तिथि हो तो उस प्रतिपदा में घट स्थापना शुभ नहीं मानी जाती | इसी प्रकार चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में घटस्थापना अशुभ मानी जाती है | माना जाता है कि चित्रा नक्षत्र में यदि घट स्थापना की जाए तो धननाश और वैधृति योग में हो तो सन्तान के लिए अशुभ हो सकता है | साथ ही देवी का आह्वाहन, स्थापन, नित्य प्रति की पूजा अर्चना तथा विसर्जन आदि समस्त कार्य प्रातःकाल में ही शुभ माने जाते हैं | किन्तु यदि प्रतिपदा को सारे दिन ही चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग रहें या प्रतिपदा तिथि कुछ ही समय के लिए हो तो आरम्भ के तीन अंश त्याग कर चतुर्थ अंश में घटस्थापना का कार्य आरम्भ कर देना चाहिए |

इस वर्ष 28 सितम्बर को रात्रि ग्यारह बजकर छप्पन मिनट के लगभग प्रतिपदा तिथि का आगमन हो जाएगा और 29 सितम्बर को रात्रि आठ बजकर तेरह मिनट तक प्रतिपदा रहेगी | 29 सितम्बर को प्रातः छह बजकर बारह मिनट पर सूर्योदय कन्या लग्न में हो रहा है | उस समय किन्तुघ्न करण और ब्रह्म योग होगा | सूर्य और चन्द्र दोनों ही कन्या राशि और हस्त नक्षत्र में हैं | इसके अतिरिक्त लग्न में ही बुध, शुक्र और मंगल भी आकर उत्तम योग बना रहे हैं | इस प्रकार 6:13 से 7:40 तक कन्या लग्न में घट स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त है | यदि इस समय में कलश स्थापना में असुविधा हो तो अभिजित मुहूर्त ऐसा मुहूर्त होता है जिसमें कुछ सोच विचार नहीं करना पड़ता | 11:47 से 12:35 तक अभिजित मुहूर्त है | इस अवधि में भी कलश स्थापित किया जा सकता है |

घट स्थापना करते समय जो मन्त्र बोले जाते हैं उनका संक्षेप में अभिप्राय यही है कि घट में समस्त ज्ञान विज्ञान का, समस्त ऐश्वर्य का तथा समस्त ब्रह्माण्डों का समन्वित स्वरूप विद्यमान है | किसी भी अनुष्ठान के समय घट स्थापना के द्वारा ब्रहमाण्ड में उपस्थित शक्तियों का आह्वाहन करके उन्हें जागृत किया जाता है ताकि साधक को अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त हो और उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण हों | साथ ही घट स्वयं में पूर्ण है | सागर का जल घट में डालें या घट को सागर में डालें – हर स्थिति में वह पूर्ण ही होता है तथा ईशोपनिषद की पूर्णता की धारणा का अनुमोदन करता प्रतीत होता है “पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते” | इसी भावना को जीवित रखने के लिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के समय घटस्थापना का विधान सम्भवतः रहा होगा |

नवरात्रों में भी इसी प्रकार घट स्थापना का विधान है | घट स्थापना के समय एक पात्र में जौ की खेती का भी विधान है | अपने परिवार की परम्परा के अनुसार कुछ लोग मिट्टी के पात्र में जौ बोते हैं तो कुछ लोग – जिनके घरों में कच्ची ज़मीन उपलब्ध है – ज़मीन में भी जौ की खेती करते हैं | किन्हीं परिवारों में केवल आश्विन नवरात्रों में जौ बोए जाते हैं तो कहीं कहीं आश्विन और चैत्र दोनों नवरात्रों में जौ बोने की प्रथा है | इन नौ दिनों में जौ बढ़ जाते हैं और उनमें से अँकुर फूट कर उनके नौरते बन जाते हैं जिनके द्वारा विसर्जन के दिन देवी की पूजा की जाती है | कुछ क्षेत्रों में बहनें अपने भाइयों के कानों में और पुरोहित यजमानों के कानों में आशीर्वाद स्वरूप नौरते रखते हैं | इसके अतिरिक्त कुछ जगहों पर शस्त्र पूजा करने वाले अपने शस्त्रों का पूजन भी नौरतों से करते है | कुछ संगीत के क्षेत्र से सम्बन्ध रखने वाले कलाकार अपने वाद्य यन्त्रों की तथा अध्ययन अध्यापन के क्षेत्र से सम्बद्ध लोग अपने शास्त्रों की पूजा भी विजय दशमी को नौरतों से करते हैं |

वास्तव में नवरात्रों में जौ बोना आशा, सुख समृद्धि तथा देवी की कृपा का प्रतीक माना जाता है | ऐसी भी मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहली फसल जो उपलब्ध हुई वह जौ की फसल थी | इसीलिए इसे पूर्ण फसल भी कहा जाता है | यज्ञ आदि के समय देवी देवताओं को जौ अर्पित किये जाते हैं | एक कारण यह भी प्रतीत होता है कि अन्न को ब्रह्म कहा गया है और उस अन्न रूपी ब्रह्म का सम्मान करने के उद्देश्य से भी सम्भवतः इस परम्परा का आरम्भ हो सकता है | आज न जाने कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें दो समय भोजन भी भरपेट नहीं मिल पाता | और दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपनी प्लेट में इतना भोजन रख लेते हैं कि उनसे खाए नहीं बन पाता और वो भोजन कूड़े के डिब्बे में फेंक दिया जाता है | यदि हम अन्न रूपी ब्रह्म का सम्मान करना सीख जाएँ तो इस प्रकार भोजन फेंकने की नौबत न आए और बहुत से भूखे व्यक्तियों को भोजन उपलब्ध हो जाए | जौ बोने की परम्परा को यदि हम इस रूप में देखें तो सोचिये प्राणिमात्र का कितना भला हो जाएगा |

अस्तु ! इन नवरात्रों में हम अन्न ब्रह्म का सम्मान करने की भावना से जौ की खेती अपने घरों में स्थापित करें… हमारी भावनाएँ उदात्त होंगी तो खेती भी फलेगी फूलेगी और कोई व्यक्ति  रात को भूखा नहीं सो सकेगा… साथ ही जल का सम्मान करने की भावना से घट स्थापित करें…

नवरात्रों की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ… माँ भवानी सभी का मंगल करें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/09/25/ghat-sthapna-in-navratri/

साम्वत्सरिक नवरात्र 2019

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके, शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोSस्तु ते |

शनिवार 6 अप्रेल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से परिधावी नामक विक्रम सम्वत 2076 आरम्भ होने जा रहा है | चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही विकारी नामक शक सम्वत 1941 भी आरम्भ हो रहा है | शुक्रवार पाँच अप्रेल को अपराह्न दो बजकर इक्कीस मिनट के लगभग प्रतिपदा तिथि का आगमन होगा | किन्तु सूर्योदय में प्रतिपदा तिथि नहीं होने के कारण घट स्थापना शनिवार को की जाएगी | शनिवार को सूर्योदय प्रातः छह बजकर छह मिनट पर है | इस समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों मीन राशि और रेवती नक्षत्र पर होने के कारण बहुत शुभ योग बना रहे हैं | साथ ही इस समय बव करण और वैद्धृति योग होगा | अस्तु, सर्वप्रथम सभी को नव सम्वत्सर, गुडी पर्व और उगडी या युगादि की हार्दिक शुभकामनाएँ |

भारतीय वैदिक परम्परा के अनुसार किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को करते समय सर्वप्रथम कलश स्थापित करके वरुण देवता का आह्वाहन किया जाता है | घट स्थापना करते समय जो मन्त्र बोले जाते हैं उनका संक्षेप में अभिप्राय यही है कि घट में समस्त ज्ञान विज्ञान का, समस्त ऐश्वर्य का तथा समस्त ब्रह्माण्डों का समन्वित स्वरूप विद्यमान है | किसी भी अनुष्ठान के समय घट स्थापना के द्वारा ब्रहमाण्ड में उपस्थित शक्तियों का आह्वाहन करके उन्हें जागृत किया जाता है ताकि साधक को अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त हो और उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण हों | साथ ही घट स्वयं में पूर्ण है | सागर का जल घट में डालें या घट को सागर में डालें – हर स्थिति में वह पूर्ण ही होता है तथा ईशोपनिषद की पूर्णता की धारणा का अनुमोदन करता प्रतीत होता है “पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते” | इसी भावना को जीवित रखने के लिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के समय घटस्थापना का विधान सम्भवतः रहा होगा | नवरात्रों का पर्व भी उन्हीं में से एक है |

पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण आरम्भ किया था, इसलिये भी इस तिथि को नव सम्वत्सर के रूप में मनाया जाता है | भारत में वसन्त ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिये भी उत्साहवर्द्धक है क्योंकि इस ऋतु में प्रकृति में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं तथा चारों ओर हरियाली छाई रहती है और प्रकृति नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा अपना नूतन श्रृंगार करती है | ऐसी भी मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को दिन-रात का मान समान रहता है | राशि चक्र के अनुसार भी सूर्य इस ऋतु में राशि चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रविष्ट होता है | यही कारण है भारतवर्ष में नववर्ष का स्वागत करने के लिये पूजा अर्चना की जाती है तथा सृष्टि के रचेता ब्रह्मा जी से प्रार्थना की जाती है कि यह वर्ष सबके लिये कल्याणकारी हो |

“प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् |

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनी तथा सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ||

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता:, उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ||

नवरात्रों के दौरान मनोनुकूल फलप्राप्ति की कामना से देवी के नौ रूपों की अर्चना की जाती है | ये समस्त रूप सम्मिलित भाव से इस तथ्य का भी समर्थन करते हैं कि शक्ति सर्वाद्या है | उसका प्रभाव महान है | उसकी माया बड़ी कठोर तथा अगम्य है तथा उसका महात्मय अकथनीय है | और इन समस्त रूपों का सम्मिलित रूप है वह प्रकृति अथवा योगशक्ति जो समस्त चराचर जगत का उद्गम है तथा जिसके द्वारा भगवान समस्त जगत को धारण किये हुए हैं |

वासन्तिक या साम्वत्सरिक नवरात्र को राम नवरात्र भी कहा जाता है और नवमी को रामनवमी के नाम से जाना जाता है क्योंकि रामनवमी को भगवान राम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है |

यत्र नार्यन्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता – जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवताओं का निवास होता है – की मान्यता का पोषक है भारतीय दर्शन – इस कारण भी माँ भगवती की उपासना का विशेष महत्त्व हो जाता है | भारत में सदा से नारी को शक्तिरूपा माना जाता रहा है | उसे न केवल पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने का अधिकार है, न केवल पुरुष की हर गतिविधि में सम्मिलित होने का अधिकार है, वरन् पुरुष के समान ही स्वतन्त्रता पर भी उसका उतना ही अधिकार है | नारी वे समस्त कार्य कर सकती है जिन पर पुरुष अपना एकाधिकार समझता है | माँ भगवती द्वारा महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज इत्यादि दानवों का संहार इसी बात का प्रमाण हैं | यहाँ तक कि मधु कैटभ का वध भी भगवान विष्णु ने शक्ति के ही आश्रय से किया था |

वास्तव में तो समस्त प्रकृति ही नारीरूपा है और अपने रहस्यमय तथा विस्मित करते रहने वाले अस्तित्व से पल पल इसी बात का अहसास कराती रहती है कि नारी शक्तिरूपा है, स्नेहरूपा है, ज्ञानरूपा है तथा लक्ष्मीरूपा है – उसकी इन समस्त शक्तियों को नकारने की नहीं – अपितु उनके सामने श्रद्धापूर्वक नतमस्तक होने की तथा प्रेमपूर्वक अपने हृदय में स्थान देने की आवश्यकता है | नवरात्रों में होने वाली माँ भवानी की उपासना इसी बात का प्रमाण है कि नारी के साथ – शक्ति के साथ – प्रकृति के साथ – सम्मान और प्रेम का व्यवहार किया जाएगा तथा उन्हें किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं पहुँचाया जाएगा तो उसी में सबका कल्याण निहित है… इसी भावना से कलश स्थापना करते हुए हम सभी माँ भगवती की अर्चना करें… सभी को साम्वत्सरिक नवरात्र या वासन्तिक नवरात्र और हिन्दू नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ… माँ दुर्गा सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

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नवरात्रों में घट स्थापना

आज पितृविसर्जनी अमावस्या है, सभी ने अपने पितृगणों को सम्मानपूर्वक विदा किया है | और अब कल से समस्त हिन्दू सम्प्रदाय में घर घर में माँ भगवती की पूजा अर्चना का दशदिवसीय उत्सव शारदीय नवरात्र के रूप में आरम्भ हो जाएगा | सर्वप्रथम सभी को शारदीय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ…

भारतीय वैदिक परम्परा के अनुसार किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को करते समय सर्वप्रथम कलश स्थापित करके वरुण देवता का आह्वाहन किया जाता है | आश्विन और चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा को घटस्थापना के साथ माँ दुर्गा की पूजा अर्चना आरम्भ हो जाती है | घट स्थापना के मुहूर्त पर विचार करते समय कुछ विशेष बातों पर ध्यान रखना आवश्यक होता है | सर्वप्रथम तो अमायुक्त प्रतिपदा – अर्थात सूर्योदय के समय यदि कुछ पलों के लिए भी अमावस्या तिथि हो तो उस प्रतिपदा में घट स्थापना शुभ नहीं मानी जाती | इसी प्रकार चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में घटस्थापना अशुभ मानी जाती है | माना जाता है कि चित्रा नक्षत्र में यदि घट स्थापना की जाए तो धननाश और वैधृति योग में हो तो सन्तान के लिए अशुभ हो सकता है | साथ ही देवी का आह्वाहन, स्थापन, नित्य प्रति की पूजा अर्चना तथा विसर्जन आदि समस्त कार्य प्रातःकाल में ही शुभ माने जाते हैं | किन्तु यदि प्रतिपदा को सारे दिन ही चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग रहें या प्रतिपदा तिथि कुछ ही समय के लिए हो तो आरम्भ के तीन अंश त्याग कर चतुर्थ अंश में घटस्थापना का कार्य आरम्भ करना चाहिए | जैसे इस वर्ष शारदीय नवरात्रों में यों तो 9 अक्टूबर को प्रातः सवा नौ बजे के लगभग प्रतिपदा तिथि का आगमन हो जाएगा, किन्तु अमायुक्त प्रतिपदा होने के कारण नौ तारीख़ को घट स्थापना नहीं की जा सकती | दस अक्टूबर बुधवार को ही घट स्थापना की जाएगी | इस दिन प्रातः सात बजकर चौबीस मिनट तक ही प्रतिपदा तिथि रहेगी और उस समय चित्रा नक्षत्र तथा वैधृति योग भी रहेगा, किन्तु प्रतिपदा का अन्तिम अंश होगा इसलिए इसी मुहूर्त में घट स्थापना की जाएगी |

नवरात्र में जौ की खेती

घट स्थापना करते समय जो मन्त्र बोले जाते हैं उनका संक्षेप में अभिप्राय यही है कि घट में समस्त ज्ञान विज्ञान का, समस्त ऐश्वर्य का तथा समस्त ब्रह्माण्डों का समन्वित स्वरूप विद्यमान है | किसी भी अनुष्ठान के समय घट स्थापना के द्वारा ब्रहमाण्ड में उपस्थित शक्तियों का आह्वाहन करके उन्हें जागृत किया जाता है ताकि साधक को अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त हो और उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण हों | साथ ही घट स्वयं में पूर्ण है | सागर का जल घट में डालें या घट को सागर में डालें – हर स्थिति में वह पूर्ण ही होता है तथा ईशोपनिषद की पूर्णता की धारणा का अनुमोदन करता प्रतीत होता है “पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते” | इसी भावना को जीवित रखने के लिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के समय घटस्थापना का विधान सम्भवतः रहा होगा |

नवरात्रों में भी इसी प्रकार घट स्थापना का विधान है | घट स्थापना के समय एक पात्र में जौ की खेती का भी विधान है | अपने परिवार की परम्परा के अनुसार कुछ लोग मिट्टी के पात्र में जौ बोते हैं तो कुछ लोग – जिनके घरों में कच्ची ज़मीन उपलब्ध है – ज़मीन में भी जौ की खेती करते हैं | किन्हीं परिवारों में केवल आश्विन नवरात्रों में जौ बोए जाते हैं तो कहीं कहीं आश्विन और चैत्र दोनों नवरात्रों में जौ बोने की प्रथा है | इन नौ दिनों में जौ बढ़ जाते हैं और उनमें से अँकुर फूट कर उनके नौरते बन जाते हैं जिनके द्वारा विसर्जन के दिन देवी की पूजा की जाती है | कुछ क्षेत्रों में बहनें अपने भाइयों के कानों में और पुरोहित यजमानों के कानों में आशीर्वाद स्वरूप नौरते रखते हैं | इसके अतिरिक्त कुछ जगहों पर शस्त्र पूजा करने वाले अपने शस्त्रों का पूजन भी नौरतों से करते है | कुछ संगीत के क्षेत्र से सम्बन्ध रखने वाले कलाकार अपने वाद्य यन्त्रों की तथा अध्ययन अध्यापन के क्षेत्र से सम्बद्ध लोग अपने शास्त्रों की पूजा भी विजय दशमी को नौरतों से करते हैं |

वास्तव में नवरात्रों में जौ बोना आशा, सुख समृद्धि तथा देवी की कृपा का प्रतीक माना जाता है | ऐसी भी मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहली फसल जो उपलब्ध हुई वह जौ की फसल थी | इसीलिए इसे पूर्ण फसल भी कहा जाता है | यज्ञ आदि के समय देवी देवताओं को जौ अर्पित किये जाते हैं | एक कारण यह भी प्रतीत होता है कि अन्न को ब्रह्म कहा गया है और उस अन्न रूपी ब्रह्म का सम्मान करने के उद्देश्य से भी सम्भवतः इस परम्परा का आरम्भ हो सकता है | आज न जाने कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें दो समय भोजन भी भरपेट नहीं मिल पाता | और दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपनी प्लेट में इतना भोजन रख लेते हैं कि उनसे खाए नहीं बन पाता और वो भोजन कूड़े के डिब्बे में फेंक दिया जाता है | यदि हम अन्न रूपी ब्रह्म का सम्मान करना सीख जाएँ तो इस प्रकार भोजन फेंकने की नौबत न आए और बहुत से भूखे व्यक्तियों को भोजन उपलब्ध हो जाए | जौ बोने की परम्परा को यदि हम इस रूप में देखें तो सोचिये प्राणिमात्र का कितना भला हो जाएगा |

अस्तु! इन नवरात्रों में हम अन्न ब्रह्म का सम्मान करने की भावना से जौ की खेती अपने घरों में स्थापित करें… हमारी भावनाएँ उदात्त होंगी तो खेती भी फलेगी फूलेगी और कोई व्यक्ति  रात को भूखा नहीं सो सकेगा… साथ ही जल का सम्मान करने की भावना से घट स्थापित करें…

नवरात्रों की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ… माँ भवानी सभी का मंगल करें…

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