Category Archives: जेठ की तपती दोपहरी और वृक्षारोपण

विश्व पर्यावरण दिवस

आज “विश्व पर्यावरण दिवस” मनाया जा रहा है और सुबह से ही पर्यावरण की सुरक्षा तथा वृक्षारोपण के सम्बन्ध में Forwarded Messages विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर घूम रहे हैं | पर्यावरण की रक्षा के लिए कई कार्यक्रम सरकारी स्तर पर और गैर सरकारी संगठनों द्वारा किये जा रहे हैं और अनेक योजनाएँ भी चलाई जा रही हैं | किन्तु प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या हमें सब कुछ सरकार अथवा समाजसेवी संगठनों पर ही छोड़ देना चाहिये ? और क्या केवल एक दिन के लिए “विश्व पर्यावरण दिवस” की रस्म अदायगी करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेनी चाहिए ? साथ ही, क्या देश के हर नागरिक का कर्तव्य नहीं कि वृक्षों की देखभाल अपनी सन्तान के समान करें और वैसा ही स्नेह उन्हें दें ? ये वही भारत देश है जहाँ के निवासियों को गर्व था अपने देश के प्राकृतिक सौंदर्य पर | भारत की भूमि में जो प्राकृतिक सुषमा है उस पर भारतीय मनीषियों का आदिकाल से अनुराग रहा है | आलम्बन उद्दीपन, बिम्बग्रहण, उपदेशग्रहण, आलंकारिकता आदि के लिये सभी ने इसके पर्वत, सरिता, वन आदि की ओर दृष्टि उठाई है | इन सबसे न केवल वे आकर्षित होते थे, अपितु अपने जीवन रक्षक समझकर इनका सम्मान भी करते थे | वनों के वृक्षों से वे सन्तान के समान स्नेह करते थे | पुष्पों को देवताओं को अर्पण करते थे | वनस्पतियों से औषधि प्राप्त करके नीरोग रहने का प्रयत्न करते थे | क्या कारण है कि जिन वृक्षों को हमारे ऋषि मुनि, हमारे पूर्वज इतना स्नेह और सम्मान प्रदान करते थे उन्हीं पर अत्याचार किया जा रहा है ?

पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर विचार करते समय सबसे पहले सोचना है कि पर्यावरण की समस्या के कारण क्या हैं | प्रगतिशीलता के इस वैज्ञानिक युग में समय की माँग के साथ डीज़ल पैट्रोल इत्यादि से चलने वाले यातायात के साधन विकसित हुए हैं | मिलों कारखानों आदि में वृद्धि हुई है | एक के बाद एक गगनचुम्बी बहुमंज़िले भवन बनते जा रहे हैं | मिलों कारखानों आदि से उठता धुआँ वायुमण्डल में घुलता चला जाता है और पर्यावरण को अपना शिकार बना लेता है | हरियाली के अभाव तथा बहुमंज़िले भवनों के कारण स्वच्छ ताज़ी हवा न जाने कहाँ जाकर छिप जाती है | निरन्तर हो रही वनों की कटाई से यह समस्या दिन पर दिन गम्भीर होती जा रही है | अभी भी बहुत से गाँवों में लकड़ी पर भोजन पकाया जाता है | भवन निर्माण में भी लकड़ी की आवश्यकता होती है | इस सबके लिये वृक्षों का काटना युक्तियुक्त है | किन्तु जिस अनुपात में वृक्ष काटे जाएँ उसी अनुपात में लगाए भी तो जाने चाहियें |

लक्ष्य होना चाहिये कि हर घर में जितने बच्चे हों अथवा जितने सदस्य हों कम से कम उतने तो वृक्ष लगाए जाएँ | यदि हम संकल्प के साथ ऐसा कर पाए और जन साधारण में इस ओर जागरूकता में वृद्धि कर पाए तो पर्यावरण की समस्या से मुक्ति प्राप्त करना कोई कठिन कार्य नहीं… और इस प्रयास में समाज के हर वर्ग को – हर व्यक्ति को – शामिल होने की आवश्यकता है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/06/05/world-environment-day/

आओ भरकर रख दें पानी

जेठ की गर्मी, तपा महीना, अंग अंग से बहे पसीना |

घाम घमकता, ताप धधकता, मुश्किल कैसा हुआ है जीना ||

ताप कृत्तिका से लेकर अब चढ़ा रोहिणी पर है सूरज |

आग उगलता, नहीं पिघलता, सबका मुश्किल हुआ है जीना ||

कोल्ड ड्रिंक का बोल है बाला, ठण्डाई का खेल निराला |

भल्ले दही नहीं, गोल गप्पों का ठण्डा पानी पीना ||

ताल तलैया सूख चुकी हैं, हरियाली हम काट चुके हैं |

गोरैया अब नहीं फुदकती, भूल चुकी है खाना पीना ||

आँगन में अब पेड़ लगाएँ, लगे हुए जो, उन्हें बचाएँ |

गोरैया को पास बुलाएँ, देकर उसको ठण्डा पानी ||

तेज़ है गर्मी, पेड़ तले अब आओ भरकर रख दें पानी |

प्यासे पंछी की हमकों है मिल जुल कर अब प्यास बुझानी ||

गोरैया को पास बुलाएँ 2

 

 

जेठ की तपती दोपहरी और वृक्षारोपण

जेठ की तपती दुपहरी में हमारी उम्र के बहुत से लोगों को याद आता होगा अपने गाँव के घर का चबूतरा और उसके बीचों बीच सर ऊँचा किये खड़ा नीम का पेड़ | किसी के घर में खड़े जामुन-आम-अमरूद के पेड़ मुस्कुराते रहते होंगे | तो किसी के घर के बाहर बरगद और पीपल के वृक्ष आग उगलती दोपहरी से राहत दिलाने शीतल हवा घर के भीतर पहुँचाते होंगे | और तुलसी गुलाब तो हर घर के आँगन में सुगन्धित हवा लुटाते ही रहते होंगे | पर आज वो ये सब केवल कल का सपना भर बनकर रह गया है | आज हम पण्डितों तथा Vedic Astrologers द्वारा निर्दिष्ट तुलसी विवाह, वट-पीपल के वृक्ष की पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी करते हैं, किन्तु इस सबके मूल में निहित महान और उदात्त भावना पर विचार नहीं करते |

मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए प्रकृति पर निर्भर है यह सत्य है | किन्तु सभ्यता की अन्धी दौड़, शहरीकरण के दबाव, बढती जनसँख्या और आधुनिकीकरण की उत्कट लालसा ने सबसे अधिक प्रहार प्रकृति पर ही किया है | फिर चाहे वह नदियों का दोहन हो अथवा जंगलों की कटाई | अज जिस तरह तेज़ी से जंगल काट काट कर रातों रात पहाड़ों को नंगा करते हुए हम कंक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं उसके सामने क्या हम अपने लिए विनाश का द्वार नहीं खोल रहे ? हम वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए एक पल को भी नहीं सोचते कि इसी तरह चलता रहा तो एक दिन हम बस घरों के भीतर एयरकंडीशनर की नकली हवा और सूर्य के प्रकाश का भ्रम देते दूधिया बल्वों की चमक पर ही आश्रित होकर रह जाएँगे जिसके फलस्वरूप अनेक रोगों का शिकार होकर अपने विनाश को ही आमन्त्रित करेंगे |

मनुष्य को अनादि काल से ही अपने दिन प्रतिदिन के कार्यों में लकड़ी की आवश्यकता रही है | लोग उस समय सादा व शान्त जीवन जीने के आदी थे | जनसँख्या सीमित होने के कारण लोगों के निवास की समस्या भी उस समय नहीं थी | इस प्रकार किसी भी रूप में पर्यावरण प्रदूषण से भी लोग परिचित नहीं थे | फिर भी उस समय का जनसमाज वृक्षारोपण के प्रति तथा उनके पालन के प्रति इतना जागरूक और सचेत था कि वृक्षों के साथ उसने भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे | यही कारण था कि भीष्म ने मुनि पुलस्त्य से प्रश्न किया था कि “पादपानां विधिं ब्रह्मन्यथावद्विस्तराद्वद | विधिना येन कर्तव्यं पादपारोपणम् बुधै ||” अर्थात हे ब्रह्मन् ! मुझे वह विधि बताइये जिससे विधिवत वृक्षारोपण किया जा सके | – पद्मपुराण २८-१

भीष्म के इस प्रश्न के उत्तर में पुलस्त्य ने वृक्षारोपण तथा उनकी देखभाल की समस्त विधि बताई थी | उसके अनुसार जिस प्रकार हिन्दू मान्यता के अन्तर्गत व्यक्ति के विविध संस्कार किये जाते हैं जन्म से पूर्व से लेकर अन्तिम यात्रा तक उसी प्रकार वृक्ष के भी किये जाते थे | बीज बोने के समय गर्भाधान संस्कार की ही भाँति धार्मिक अनुष्ठान किये जाते थे | जैसे जैसे बीज अँकुरित होता जाता था, उस पर पत्तियाँ फूल फल आदि आते जाते थे – हर अवसर पर कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान किया जाता था | किसी वृक्ष की पत्तियाँ कब तोडनी हैं, किस प्रकार तोडनी हैं इस सबका पूरा एक विधान होता था | उस समय तो औषधि के निमित्त भी वृक्षों की ओर ही देखा जाता था – तो उस सबके लिए भी पूरा विधान था कि किस वृक्ष का कौन सा अंग किस रोग में काम आता है और किस प्रकार उसे तोडना चाहिए तथा तोड़ने से पूर्व किस प्रकार धार्मिक अनुष्ठान आदि के द्वारा वृक्ष से आज्ञा लेनी चाहिए | साथ ही यह भी आवश्यक था कि एक व्यक्ति जितने वृक्ष काटेगा उसके दुगुने वृक्ष लगाएगा भी और उनकी देखभाल भी करेगा |

सम्भवतः विधि विधान पूर्वक वृक्षारोपण तथा नियमित वृक्षार्चन आज की व्यस्त जीवन शैली को देखते हुए हास्यास्पद प्रतीत हो – किन्तु सामयिक अवश्य है | वृक्षों का विधिपूर्वक आरोपण करना, सन्तान के समान उन्हें संस्कारित करना तथा देवताओं के समान प्रतिदिन उनकी अर्चना का विधान कोरे अन्धविश्वास के कारण ही नहीं बनाया गया था – अपितु उसका उद्देश्य था जनसाधारण के हृदयों में वृक्षों के प्रति स्नेह व श्रद्धा की भावना जागृत करना | ये समस्त तुलसी विवाह, वट-पीपल आदि के वृक्ष की पूजा आदि भी इसी प्रक्रिया के ही अंग थे | स्वाभाविक है कि जिन वृक्षों को आरोपित करते समय सन्तान के समान माँगलिक संस्कार किये गए हों, देवताओं के समान जिन वृक्षों की नियमपूर्वक श्रद्धाभाव से उपासना की जाती हो उन्हें अपने किसी भी स्वार्थ के लिये मनुष्य आघात कैसे पहुँचा सकता है ? वेदी व मण्डल बनाने का उद्देश्य भी सम्भवतः यही था कि लोग आसानी से वृक्षों तक पहुँच न सकें | उस समय वनों की सुरक्षा तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता किसी दण्ड अथवा जुर्माने के भय से नहीं थी – अपितु वृक्षों के प्रति स्वाभाविक वात्सल्य ए़वं श्रद्धा के कारण थी |

दैनिक जीवन में लकड़ी की आवश्यकता से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता और इसके लिए वृक्षों की कटाई भी आवश्याक है | किन्तु, उपरोक्त समस्त पौराणिक तथ्यों में से कुछ भी यदि हम स्वीकार कर लें तो वृक्षों की कटाई के बाद भी वृक्षों का अभाव और उस अभाव से होने वाले दुष्परिणामों से हम स्वयं को, अपनी आने वाली कई पीढ़ियों को और प्रकृति को बचा सकते हैं…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/21/our-green-angels/