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पर्यूषण पर्व – दशलाक्षण पर्व

मित्रों ! भाद्रपद कृष्ण द्वादशी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तक चलने वाला श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय का अष्टदिवसीय पर्यूषण पर्व कल संपन्न हुआ है और आज यानी भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी से दिगंबर जैन सम्प्रदाय के दशदिवसीय पर्यूषण पर्व अर्थात क्षमावाणी पर्व और दशलाक्षण पर्व का आरम्भ हो चुका है जो बारह सितम्बर को अनंतचतुर्दशी के साथ संपन्न होगा | यों तो साल में तीन बार दशलाक्षण मनाया जाता है, लेकिन भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (अनन्त चतुर्दशी) तक मनाए जाने वाले पर्व का विशेष महत्त्व माना जाता है | इसका मुख्य कारण है इसमें आने वाला साम्वत्सरिक पर्व | यह साम्वत्सरिक पर्व पर्यूषण का ही नही वरन् समस्त जैन धर्म का प्राण है | इस दिन साम्वत्सरिक प्रतिक्रमण किया जाता है जिसके द्वारा वर्ष भर में किए गए पापों का प्रायश्चित्त करते हैं | साम्वत्सरिक प्रतिक्रमण के बीच में ही सभी चौरासी लाख जीव योनि से क्षमा याचना की जाती है | नवरात्रों की ही भाँति पर्यूषण पर्व भी संयम और आत्मशुद्धि के पर्व हैं | इन पर्वों में त्याग, तप, उपवास, परिष्कार, संकल्प, स्वाध्याय और आराधना पर बल दिया जाता है |

भारत के अन्य दर्शनों की भाँति जैन दर्शन का भी अन्तिम लक्ष्य सत्यशोधन करके परमानन्द की उपलब्धि करना है | इसे ही तत्वज्ञान कहते हैं | धर्म चाहे कोई भी हो, यदि उसमें तत्वज्ञान नहीं होगा, तत्वज्ञों के द्वारा बताए गए व्यवहार आदि नहीं होंगे, तो ऐसा धर्म जड़ हो जड़ हो जाता और उसमें मानव मात्र की सत्य निष्ठा नहीं बन पाती | अतः धर्म और तत्वज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक हैं | धर्म का बीज जिजीविषा, सुख की अभिलाषा और दुःख के प्रतिकार में ही निहित है |

जीवन को प्रगतिशील और उल्लासमय बनाए रखने के लिये तथा पारस्परिक संगठन और सहयोग को जीवित रखने के लिये ही उत्सवों और पर्वों का आयोजन किया जाता है | ये उत्सव केवल सामजिक सहयोग को ही बढ़ावा नहीं देते वरन् साथ साथ धार्मिक परम्परा को भी जीवित रखते हैं | और इस प्रकार मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक व्यवहार भी शनैः शनैः अभ्यास में आता जाता है | इस प्रकार जैन सम्प्रदाय का पर्यूषण और दशलाक्षण पर्व एक ऐसा ही सामाजिक पर्व है जो मनुष्य को मनुष्य के साथ मनुष्य के रूप में जोड़कर उसमें सम्यक् चारित्र्य और सम्यक् दृष्टि का विकास करता है | शास्त्र से धर्म की देह का अर्थात धर्म के बाह्य रूप का निर्माण होता है | यही कारण है कि किसी भी सम्प्रदाय के व्रतोत्सव आदि के विधान शास्त्रानुमोदित होते हैं, क्योंकि धर्म की देह अर्थात धर्म के बाह्य स्वरूप का निर्माण शास्त्रों से ही होता है | शास्त्रोक्त विधि विधानों का अनुसरण करते हुए व्यक्ति के चरित्र में सत्य, धर्म, शान्ति, प्रेम, निस्वार्थ भाव, उदारता और विनय विवेक आदि सद्गुणों का विकास होता है | यही सद्गुण धर्म की आत्मा कहलाते हैं |

सत्य की प्राप्ति के लिये बेचैनी और विवेकी स्वभाव इन दो तत्वों पर आधारित जीवन व्यवहार ही पारमार्थिक धर्म है | जैन सम्प्रदाय का पर्यूषण पर्व ऐसे ही पारमार्थिक धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है |

जैन पर्व कुछ एक दिवसीय होते हैं और कुछ बहुदिवसीय | लम्बे त्यौहारों में विशेष जैन पर्वों की छह अट्ठाइयाँ हैं | उनमें जैसा कि ऊपर बताया, पर्यूषण पर्व की अट्ठाई सर्वश्रेष्ठ समझी जाती है | इनके अतिरिक्त तीन अट्ठाइयाँ चातुर्मास की तथा दो औली की होती हैं | पर्यूषण पर्व के दौरान यत्र तत्र जैन समाज में धार्मिक वातावरण दिखाई देता है | सभी निवृत्ति और अवकाशप्राप्ति का प्रयत्न करते हैं | खान पान एवम् अन्य भोगों पर अँकुश रखते हैं | शास्त्र श्रवण और आत्म चिन्तन करते हैं | तपस्वियों, त्यागियों और धार्मिक बन्धुओं की भक्ति करते हैं | जीवों को अभयदान देने का प्रयत्न करते हैं | और सबके साथ सच्ची मैत्री साधने की भावना रखते हैं | इस पर्व को दशलाक्षणी पर्व भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें दश लक्षणों का पालन कहा जाता है | ये दश लक्षण हैं: विनम्रता, माया का नाश, निर्मलता, आत्मसत्य का ज्ञान – और यह तभी सम्भव है जब व्यक्ति मितभाषी और स्थिर मन वाला हो, संयम, तप, त्याग, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य तथा क्षमायाचना | श्वेताम्बर सम्प्रदाय में यह पर्व आठ दिन का होता है, और उसके अन्तिम दिन यानी भाद्रपद शुक्ल पंचमी से दिगम्बरों के पर्यूषण का आरम्भ हो जाता है जो दस दिनों तक चलता है और भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को सम्पन्न होता है | इन दिनों भगवान महावीर की कथाओं का श्रवण किया जाता है | अपनी कठोर साधना के द्वारा भगवान महावीर ने जिन सत्यों का अनुभव किया था वे प्रमुख रूप से तीन हैं : दूसरे के कष्ट को अपना कष्ट समझना, समाज के हित के लिए अपनी सुख सुविधाओं का पूर्ण रूप से बलिदान कर देना ताकि परिग्रह लोकोपकार की भावना में परिणत हो जाए, इस प्रकार सतत जागृति की अवस्था प्राप्त होती है, जिसके द्वारा मनुष्य अतम निरीक्षण कर सकता है – ताकि उसके आत्मपुरुषार्थ में किसी प्रकार की कमी न आने पाए |

क्षमादान और क्षमायाचना का संकल्प इस पर्व का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है | “खम्मामि सव्व जीवेषु – सब जीवों से मैं क्षमायाचना करता हूँ, सव्वे जीवा खमन्तु मे – सारे जीव मुझे क्षमा करें, मित्त्ति मे सव्व भू ए सू – सभी जीवों के साथ मेरा मैत्री का भाव रहे, वैरं मज्झणम् केण इ – किसी के साथ मेरा वैर न रहे |” आत्मिक शुद्धि का मूल मन्त्र इसी प्रकार का क्षमाभाव है | मन को स्वच्छ उदार और विवेकी बनाकर समाज के संगठन की दिशा में इससे बड़ा और क्या प्रयत्न हो सकता है |

किन्तु यह भी सत्य है कि केवल पर्यूषण, दशलाक्षण अथवा क्षमावाणी पर्व मनाने भर से ही इन पर्वों का गहनतम उद्देश्य पूर्ण नहीं हो जाता | उत्सव और व्रत उपवास आदि तो भौतिक क्रियाएँ हैं | इन पर्वों का मूल उद्देश्य – इनकी मूल भावना तो बहुत ऊँची है | क्या ही अच्छा हो कि क्षमावाणी पर्व को राष्ट्रीय क्षमावाणी पर्व के रूप में मनाया जाए, ऐसा करने से जन साधारण में आत्मौपम्य की भावना (सबकी आत्मा समान है) का स्वतः ही विकास होगा – और जब आत्मौपम्य की भावना उत्पन्न हो जाएगी तो सम्यग्दृष्टि भी स्वतः ही विकसित होगी और तब समस्त प्रकार के वैर भाव का भी स्वतः ही नाश होकर प्रेम और सद्भावना का विकास होगा |

अस्तु, सभी को पर्यूषण, क्षमावाणी और दशलाक्षणी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

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