गुरु का वृश्चिक में गोचर

वृश्चिक में गुरु के गोचर के धनु मिथुन राशि पर सम्भावित प्रभाव

देवगुरु बृहस्पति 11 अक्टूबर को अपने शत्रु ग्रह शुक्र की राशि तुला से निकल कर मित्र ग्रह मंगल की वृश्चिक राशि में प्रस्थान कर चुके हैं | लगभग एक वर्ष का गुरु का गोचर होता है | इस बार वृश्चिक राशि में गोचर के दौरान 29 मार्च 2019 को अपनी स्वयं की राशि धनु में प्रविष्ट हो जाएँगे कुछ समय के लिए, जहाँ से 10 अप्रेल 2019 से वक्री होते हुए 23 अप्रेल 2019 को पुनः वृश्चिक में वापस लौट आएँगे | धनु गुरु की अपनी राशि है | अब तक मेष राशि से लेकर वृश्चिक राशि तक के जातकों पर गुरु के इस गोचर के सम्भावित प्रभावों के विषय में बात कर चुके हैं, अब जानने का प्रयास करते हैं कि गुरु के इस गोचर के धनु राशि के जातकों पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

जैसा कि ऊपर लिखा, धनु की गुरु की अपनी राशि है | अर्थात आपके राश्यधिपति होकर गुरुदेव आपकी राशि से बारहवें भाव में गोचर कर रहे हैं | जहाँ से इनकी दृष्टियाँ आपके चतुर्थ भाव, छठे भाव तथा अष्टम को प्रभावित कर रही हैं | यदि आपका कार्य कहीं विदेश से सम्बन्धित है तो आपके लिए यह गोचर अत्यन्त भाग्यवर्धक प्रतीत होता है | आप अपना निवास भी बदलने की योजना बना सकते हैं | किसी दूसरे शहर में भी शिफ्ट हो सकते हैं | आपके माता पिता भी किसी अन्य स्थान पर शिफ्ट हो सकते हैं | अचानक ही किसी ऐसे स्थान से कार्य का प्रस्ताव प्राप्त हो सकता है जहाँ आप जाने नहीं चाहते | खर्चों में वृद्धि की सम्भावना प्रतीत होती है | आप कहीं भ्रमण के लिए भी जा सकते हैं और व्यर्थ की यात्राएँ भी करनी पड़ सकती हैं | साथ ही पैसे के लेन देन में सावधानी रखने की आवश्यकता है | परिवार में व्यर्थ के तनाव भी हो सकते हैं | किन्तु यदि आपने धैर्य और संयम से कम लिया तो किसी भी तनाव अथवा विवाद को सुलझाने में स्वयं ही सफल भी हो सकते हैं | परिवार के किसी सदस्य की ओर से किसी दुखद समाचार की प्राप्ति की सम्भावना भी है |

आपको अपने आत्मविश्वास में भी कमी का अनुभव हो सकता है | यदि नौकरी की खोज में हैं तो उसमें सम्भव है सफलता न प्राप्त हो, या फिर बहुत अधिक परिश्रम के बाद सफलता प्राप्त हो | स्पोर्ट्स से सम्बन्धित व्यक्तियों के लिए यात्राओं में वृद्धि की सम्भावना है | किन्तु इन यात्राओं एक दौरान आपको दुर्घटना आदि के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है |

अविवाहित हैं तो विवाह के लिए अभी अनुकूल समय नहीं प्रतीत होता | कहीं कोई प्रेम सम्बन्ध चल रहा है तो उसमें भी तनाव की सम्भावना है | वैवाहिक जीवन में भी किसी प्रकार का विवाद सम्भव है | अच्छा यही रहेगा कि आप संयम से काम लें |

स्वास्थ्य की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | बहुत अधिक तनाव से बचने के लिए ध्यान और प्राणायाम का अभ्यास अवश्य करें | अन्यथा मानसिक रूप से किसी डिप्रेशन आदि के शिकार भी हो सकते हैं |

अन्त में, उपरोक्त परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है | साथ ही, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/16/jupiter-transit-in-scorpio-for-sagittarius/

 

 

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गुरु का वृश्चिक में गोचर

वृश्चिक में गुरु के गोचर का वृश्चिक राशि पर सम्भावित प्रभाव

सभी जानते हैं कि 11 अक्टूबर को देवगुरु बृहस्पति अपने शत्रु ग्रह शुक्र की राशि तुला से निकल कर मित्र ग्रह मंगल की वृश्चिक राशि में प्रस्थान कर चुके हैं | वृश्चिक राशि में गोचर करते हुए गुरु वृश्चिक राशि को तो प्रभावित करेगा ही, साथ ही गुरु की दृष्टियाँ वृश्चिक राशि से पञ्चम भाव यानी स्वयं अपनी राशि मीन पर, वृश्चिक से सप्तम भाव यानी वृषभ राशि और वृश्चिक राशि से भाग्य स्थान यानी कर्क राशि पर रहेंगी | इस प्रकार गुरु अपने इस गोचर में वृश्चिक, मीन, वृषभ तथा कर्क राशियों को प्रभावित करेगा | निश्चित रूप से इन राशियों के लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक रहने की सम्भावना की जा सकती है |

उपरोक्त समस्त तथ्यों के आधार पर अब तक हम मेष राशि से तुला राशि के जातकों पर इस गोचर के सम्भावित प्रभावों की बात कर चुके हैं | अब जानने का प्रयास करते हैं कि स्वयं वृश्चिक राशि के जातकों पर इस गोचर के क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

आपके लिए द्वितीयेश और पंचमेश होकर गुरु का गोचर आपकी राशि पर ही हो रहा है, जहाँ से उसकी दृष्टियाँ आपके पंचम, सप्तम और नवम भावों पर आ रही हैं | आर्थिक तथा कार्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपके कार्य में उन्नति के संकेत हैं | आर्थिक स्थिति में भी दृढ़ता के संकेत हैं | यदि पूर्व में आपको कुछ समस्याओं का सामना करना भी पडा है तो कोई बात नहीं, अब परिस्थितियाँ आपके अनुकूल होती प्रतीत होती हैं | आपकी आय में वृद्धि के संकेत हैं | यदि आप किसी नौकरी में हैं तो आपको अपने उच्च अधिकारियों का सहयोग प्राप्त रहेगा जिनके कारण आपके सभी कार्य सरलतापूर्वक पूर्ण होते रहने की सम्भावना प्रतीत होती है | साथ ही पदोन्नति के अवसर भी उपलब्ध हो सकते हैं | परिवार में तथा कार्यक्षेत्र में वातावरण अनुकूल रहने की सम्भावना है | आपकी वक्तव्यता इस अवधि में बहुत उत्तम रहेगी जिसका लाभ भी आपको प्राप्त होगा | साथ ही लेखन के द्वारा भी आपको यश और धन प्राप्त होने की सम्भावना है | इसके अतिरिक्त प्रॉपर्टी से सम्बन्धित व्यवसाय जिन लोगों का है अथवा जो लोग ज्योतिष आदि विद्याओं के जानकार हैं अथवा जिनका व्यवसाय किसी प्रकार से वाहन आदि से सम्बन्ध रखता है तो उनके लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपकी रूचि इस समय धर्म और आध्यात्म की ओर भी प्रवृत्त हो सकती है |

परिवार में किसी नए सदस्य का आगमन हो सकता है | किसी बच्चे का जन्म भी इस अवधि में सम्भव है | आपकी सन्तान के लिए भी यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | साथ ही आपकी सन्तान का भी विवाह इस गोचर के मध्य सम्भव है | आप स्वयं भी यदि अविवाहित हैं तो आपका विवाह भी इस अवधि में हो सकता है | यदि किसी के साथ Romantically Involve हैं तो वह सम्बन्ध भी विवाह में परिणत हो सकता है | विवाहित हैं तो दाम्पत्य जीवन में माधुर्य बना रहने की सम्भावना है |

स्वास्थ्य का जहाँ तक प्रश्न है, तो लीवर अथवा पेट से सम्बन्धित कोई समस्या इस अवधि में हो सकती है | अनियन्त्रित खान पान के कारण मोटापा भी बढ़ने की सम्भावना है | अपने खान पर ध्यान रखेंगे और व्यायाम को अपनी दिनचर्या का आवश्यक अंग बना लेंगे तो बहुत सी समस्याओं से बचे रह सकते हैं |

अन्त में, उपरोक्त परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु किसी योग्य Astrologer से उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन कराना आवश्यक है | साथ ही, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/15/jupiter-transit-in-scorpio-for-scorpio/

 

गुरु का वृश्चिक में गोचर

वृश्चिक में गुरु के गोचर का मिथुन राशि पर सम्भावित प्रभाव

जैसा सभी जानते हैं, देवगुरु बृहस्पति 11 अक्टूबर को रात्रि 8:39 के लगभग अपने शत्रु ग्रह शुक्र की राशि तुला से निकल कर मित्र ग्रह मंगल की वृश्चिक राशि में प्रस्थान करेंगे | 10 अप्रेल 2019 को 22:05 के लगभग गुरु का वक्री होना आरम्भ होगा और वक्री होते हुए 23 अप्रेल की रात को पुनः वृश्चिक राशि में लौट आएँगे | 11 अगस्त को 19:42 के लगभग गुरु मार्गी हो जाएँगे और इसी अवस्था में पाँच नवम्बर तक भ्रमण करते हुए अन्त में पाँच नवम्बर को प्रातः सूर्योदय से पूर्व 05:16 के लगभग पुनः अपनी स्वयं की धनु राशि में प्रविष्ट हो जाएँगे | इस विषय में विस्तार से आरम्भ में ही लिखा जा चुका है | आज जानने का प्रयास करते हैं कि मिथुन राशि के जातकों के लिए इस गोचर के क्या सम्भावित परिणाम हो सकते हैं…

मिथुन राशि से सप्तमेश और दशमेश होकर गुरु का गोचर इस राशि से छठे भाव में हो रहा है | जहाँ से गुरु की दृष्टियाँ आपके कर्म स्थान, बारहवें भाव तथा धन स्थान पर आ रही हैं | एक ओर जहाँ आपके उत्साह में वृद्धि के संकेत हैं वहीं आपकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार की सम्भावना है | किन्तु साथ ही अनावश्यक बातों पर पैसा भी अधिक खर्च हो सकता है | आप और आपके जीवन साथी दोनों के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | यदि आप पार्टनरशिप में कार्य कर रहे हैं अथवा आरम्भ करना चाहते हैं तो आपके लिए अनुकूल समय प्रतीत होता है | नौकरी में हैं तो भी आपके लिए पदोन्नति के अवसर प्रतीत होते हैं | किसी नई नौकरी की खोज में हैं तो वहाँ भी सफलता प्राप्त होने की समभावना है | किन्तु परिश्रम अधिक करना पड़ सकता है | साथ ही विरोधियों की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है |

यदि आपका कार्य विदेश से सम्बन्धित है तो विदेश यात्राओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | इन यात्राओं के दौरान आपको कुछ समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है | किसी प्रकार का विवाद यदि किसी के साथ चल रहा हो तो उसे समय रहते आपसी बातचीत से सुलझाने का प्रयास करें अन्यथा कोर्ट केस भी हो सकता है जो लम्बे समय तक आपको परेशान कर सकता है | जीवन साथी के साथ यदि किसी प्रकार का मन मुटाव है तो उसे भी शान्ति के साथ सुलझाने का प्रयास कीजिए |

विद्यार्थियों के लिए तथा प्रतियोगी परिक्षा की तैयारी में लगे लोगों के लिए यह गोचर अनुकूल फल देने वाला हो सकता है | जो लोग पॉलिटिक्स से सम्बन्ध रखते हैं उनके लिए भी भाग्यवर्द्धक समय प्रतीत होता है | किन्तु विरोधियों से सावधान रहने की आवश्यकता है | उनके कारण आपके सम्मान को किसी प्रकार की ठेस भी पहुँच सकती है |

स्वास्थ्य की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है – विशेष रूप से विदेश यात्राओं के दौरान | साथ ही खान पान पर संयम रखने की भी आवश्यकता है |

अन्त में, उपरोक्त परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |

साथ ही, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

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श्री बृहस्पति स्तोत्रम्

भारतीय वैदक ज्योतिष – Indian Vedic Astrology – के अनुसार देवगुरु बृहस्पति यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में उत्तम स्थिति में हैं तो जातक को ज्ञानवान, लब्धप्रतिष्ठ, उत्तम सन्तान तथा जीवन साथी से युक्त तथा अपने ज्ञान के बल पर जीविकोपार्जन करने वाला बनाते हैं | साथ ही प्रायः देखा गया है कि गुरु की स्थिति जातक की कुण्डली में यदि अनुकूल हो तो उसकी दशा अन्तर्दशा में समस्त कामनाओं की पूर्ति भी होने की सम्भावना रहती है | किन्तु वही गुरु यदि अशुभ स्थिति या प्रभाव में हो तो जातक दरिद्र, क्रोधी तथा दुर्बुद्धि भी हो सकता है | गुरुदेव सदा प्रसन्न रहें इस कामना से प्रायः Vedic Astrologer कुछ मन्त्रों के जाप का विधान बताते हैं | जिनमें गुरु स्तोत्र भी आते हैं | प्रस्तुत हैं गुरु स्तोत्र के दो रूप, जातक अपनी सुविधानुसार किसी भी स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं…

यह प्रथम स्तोत्र “मन्त्रमहार्णव” से उद्धृत है…

पीताम्बर: पीतवपु: किरीटी, चतुर्भुजो देवगुरु: प्रशान्त: |
दधाति दण्डं च कमण्डलुं च, तथाक्षसूत्रं वरदोsस्तु मह्यम् ||
नम: सुरेन्द्रवन्द्याय देवाचार्याय ते नम: |
नमस्त्वनन्तसामर्थ्यं देवासिद्धान्तपारग: ||
सदानन्द नमस्तेSस्तु नम: पीडाहराय च |
नमो वाचस्पते तुभ्यं नमस्ते पीतवाससे ||
नमोSद्वितीयरूपाय लम्बकूर्चाय ते नम: |
नम: प्रहृष्टनेत्राय विप्राणां पतये नम: ||

नमो भार्गवशिष्याय विपन्नहितकारक: |
नमस्ते सुरसैन्याय विपन्नत्राणहेतवे ||
विषमस्थस्तथा नृणां सर्वकष्टप्रणाशनम् |
प्रत्यहं तु पठेद्यो वै तस्य कामफलप्रदम् ||

|| इति मन्त्रमहार्णवे बृहस्पतिस्तोत्रम् ||

 

निम्नलिखित स्तोत्र स्कन्दपुराण से उद्धृत है…

|| अथ श्री बृहस्पतिस्तोत्रम् ||

अस्य श्री बृहस्पतिस्तोत्रस्य गृत्समद ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, बृहस्पतिर्देवता, बृहस्पति प्रीत्यर्थं जपे विनियोग:

गुरुर्बृहस्पतिर्जीव: सुराचार्यो विदां वरः |

वागीशो धिषणो दीर्घश्मश्रुः पीताम्बरो युवा ||

सुधादृष्टिर्ग्रहाधीशो ग्रहपीडापहारकः |

दयाकरः सौम्यमूर्तिः सुरार्च्यः कुड्मलद्युतिः ||

लोकपूज्यो लोकगुरुः नीतिज्ञो नीतिकारकः |

तारापतिश्चाङ्गिरसो वेदवेद्यः पितामहः ||

भक्त्या बृहस्पतिं स्मृत्वा नामान्येतानि यः पठेत् |

अरोगी बलवान् श्रीमान् पुत्रवान् स भवेन्नरः ||

जीवेत् वर्षशतं मर्त्यः पापं नश्यति नश्यति |

यः पूजयेत् गुरुदिने पीतगन्धाक्षताम्बरैः ||

पुष्पदीपोपहारैश्च पूजयित्वा बृहस्पतिम् |

ब्रह्मणान् भोजयित्वा च पीडाशान्तिर्भवेत् गुरोः ||

|| इति श्री स्कन्दपुराणे बृहस्पतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||

देवगुरु बृहस्पति सभी को सद्बुद्धि प्रदान कर ज्ञान विज्ञान में पारंगत करते हुए समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/07/shree-brihaspati-stotram/

 

श्री गुरुकवचम्

ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः

हिन्दू धर्म के नवग्रहों में देवगुरु बृहस्पति की उपासना ज्ञान और बुद्धि के साथ-साथ भाग्य वृद्धि, विवाह और सन्तान का सुख प्राप्त करने के लिए भी की जाती है | भारतीय ज्योतिष शास्त्रों तथा Vedic Astrologers के अनुसार किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु यदि अच्छी अस्थिति में हों – उच्च का हो, केन्द्र अथवा मूल त्रिकोण में हो, वर्गोत्तम हो इत्यादि इत्यादि… तो वह व्यक्ति ज्ञानवान बनता है तथा अपने ज्ञान के बल पर ही उसे मान प्रतिष्ठा, धन, पुरूस्कार आदि की उपलब्धि जीवन में होती रहती है तथा उसे अच्छी और सुयोग्य सन्तान का सुख प्राप्त होता है | किन्तु यदि वही गुरु विपरीत स्थिति में हो या विपरीत प्रभाव में हो तो जातक को मानसिक कष्ट के साथ ही अनेक बाधाओं का सामना भी करना पड़ सकता है | विवाह तथा सन्तान प्राप्ति में भी बाधा का सामना करना पड़ सकता है | सन्तान की ओर से कष्ट हो सकता है | वह व्यक्ति अत्यन्त क्रोधी या चिडचिडा हो सकता है तथा अनेक प्रकार के दुर्गुण भी उसमें हो सकते हैं |

गुरु के अशुभ प्रभाव को दूर करके गुरुदेव को शान्त करने तथा बली बनाने के लिए अनेक मन्त्रों के जाप की सलाह दी जाती है, उन्हीं में से एक है “बृहस्पति कवच”, जिसका एक सरल प्रकार यहाँ प्रस्तुत है…

कवच आरम्भ करने से पूर्व गुरु गायत्री का 108 बार जप करें –
“ॐ अंगिरोजाताय विद्महे, वाचस्पते धीमहि, तन्नो गुरु: प्रचोदयात ||”

इसके बाद विनियोगपूर्वक बृहस्पति कवच का पाठ अथवा श्रवण करें:-

|| अथ श्री बृहस्पति कवचं (गुरु कवचं) ||

|| श्री गणॆशाय नम: ||

अस्य श्री बृहस्पतिकवचमहामन्त्रस्य ईश्वर ऋषि:, अनुष्टुप छन्द: बृहस्पतिर्दॆवता, गं बीजं, श्रीं शक्ति:, क्लीं कीलकम्‌, बृहस्पति प्रसाद सिद्ध्यर्थॆ जपॆ विनियॊग: ||

अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् |
अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ||
बृहस्पति: शिर: पातु ललाटं पातु में गुरु: |
कर्णौ सुरुगुरु: पातु नेत्रे मेंSभीष्टदायक: ||
जिह्वां पातु सुराचायो नासां में वेदपारग: |
मुखं मे पातु सर्वज्ञो कण्ठं मे देवता शुभप्रद: ||
भुजौ आङ्गिरस: पातु करौ पातु शुभप्रद: |
स्तनौ मे पातु वागीश: कुक्षिं मे शुभलक्षण: ||
नाभिं देवगुरु: पातु मध्यं पातु सुखप्रद: |
कटिं पातु जगदवन्द्य: ऊरू मे पातु वाक्पति: ||
जानु जङ्गे सुराचायो पादौ विश्वात्मकस्तथा |
अन्यानि यानि चाङ्गानि रक्षेन् मे सर्वतो गुरु: ||
इत्येतत् कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर: |
सर्वान् कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ||

|| इति श्री ब्रह्मयामलोक्तम्‌ बृहस्पति कवचं सम्पूर्णम् ||

देवगुरु बृहस्पति सभी के ज्ञान का विस्तार करते हुए सभी को समस्त सुख समृद्धि प्रदान करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/05/shree-guru-kavacham/

 

 

 

 

देवगुरु बृहस्पति

नवग्रहों की बात करते समय देवगुरु बृहस्पति की चर्चा की जाए तो हिन्दू धर्म के नवग्रहों में देवगुरु बृहस्पति की उपासना ज्ञान, विज्ञान, बुद्धि, धर्म और आध्यात्म के साथ-साथ भाग्य वृद्धि, विवाह तथा सन्तान सुख की प्राप्ति के लिए की जाती है | किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु पिता का कारक भी होता है और किसी कन्या की कुण्डली में पति के लिए भी गुरु को देखा जाता है | गुरु या शुक्र में से कोई एक अथवा दोनों ही यदि अस्त हों तो उस स्थिति में प्रायः विवाह की अनुमति Vedic Astrologer नहीं देते | साथ ही माना जाता है कि यदि किसी व्यक्ति का गुरु बली हो तो वह व्यक्ति विद्वान् होता है तथा उसे अपने ज्ञान के ही कारण यश और धन की प्राप्ति होती है | प्रायः देखा जाता है कि यदि किसी के घर में बहुत अधिक धर्म ग्रन्थ रखे हों तो देखते के साथ ही लोग बोल देते हैं कि इस व्यक्ति का बृहस्पति प्रबल होगा | जैसा कि ऊपर ही लिखा है, इन्हें देवगुरु की उपाधि से विभूषित किया गया है अतः इन्हें “गुरु” भी सम्बोधित किया जाता है | ये शील और धर्म के अवतार माने जाते हैं | नवग्रहों के समूह का नायक माने जाने के कारण इन्हें गणपति भी कहा जाता है | ज्ञान और वाणी के देवता गुरु ने “बार्हस्पत्य सूत्र” की रचना भी की थी | इनका वर्ण पीला है तथा इनके हाथों में दण्ड, कमण्डल और जपमाला शोभायमान रहते हैं | दैत्यगुरु शुक्राचार्य के ये कट्टर विरोधी हैं | इस विषय में भी एक पौराणिक कथा उपलब्ध होती है कि अंगिरस मुनि से भार्गव शुक्र और बृहस्पति दोनों एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे | अंगिरस अपने पुत्र बृहस्पति पर अधिक ध्यान देते थे और शुक्र के साथ भेद भाव करते थे | इस बात से खिन्न होकर शुक्र ने अंगिरस से शिक्षा लेनी बन्द कर दी और तभी से शुक्र और बृहस्पति में शत्रुता का भाव हो गया और शुक्र ने दैत्यों का साथ देना आरम्भ कर दिया |

ऋग्वेद के अनुसार बृहस्पति को अंगिरस मुनि और उनकी पत्नी स्मृति का पुत्र माना गया है | माना जाता है कि इन्होने प्रभास तीर्थ के निकट भगवान् शिव की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और देवगुरु की पदवी तथा नवग्रह मण्डल में स्थान प्राप्त किया |

धनु और मीन दो राशियों तथा पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद नक्षत्रों का स्वामित्व गुरु के पास है | कर्क इनकी उच्च राशि तथा मकर निम्न राशि है | सूर्य, चन्द्रमा और मंगल के साथ इनकी मित्रता है, बुध तथा शुक्र शत्रु ग्रह हैं और शनि के साथ ये तटस्थ भाव में रहते हैं | इनका तत्व आकाश है तथा ये पूर्व और उत्तर दिशा तथा शीत ऋतु के स्वामी माने जाते हैं | क्योंकि इनका तत्व आकाश है अतः जिस व्यक्ति की कुण्डली में गुरु अच्छी स्थिति में होगा उस व्यक्ति के जीवन में निरन्तर प्रगति और विस्तार की सम्भावना रहती है | इन जातकों का व्यवसाय मुख्य रूप से अध्ययन-अध्यापन, लेखन, खगोल तथा ज्योतिष विद्या से सम्बन्धित ज्ञान, गणित तथा बैंक आदि से सम्बन्धित कार्य, वक़ालत अथवा फाइनेंस कम्पनी से सम्बन्धित कार्य माना जाता है | पवित्र अथवा धार्मिक स्थल, बुद्धि और ज्ञान, वेद वेदान्त और तर्क शास्त्र का ज्ञान, बड़े भाई तथा पुत्र पौत्र आदि का प्रतिनिधित्व गुरु के पास है | साथ ही जिनका गुरु प्रभावशाली होता है वे लोग कुछ भारी शरीर के होते हैं | यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु अच्छी स्थिति में नहीं अथवा पीड़ित है तो उसे मधुमेह तथा पेट से सम्बन्धित रोगों की सम्भावना रहती है | सोलह वर्ष की गुरुदेव की दशा होती है तथा ये एक राशि में पूरे एक वर्ष तक भ्रमण करते हैं, किन्तु कभी कभी वक्री, मार्गी अथवा अतिचारी होने की स्थिति में एक राशि में एक या दो माह अधिक भी रुक जाते हैं |

गुरु को बली बनाने अथवा उन्हें प्रसन्न करने के लिए Vedic Astrologer बहुत से मन्त्रों का जाप का सुझाव देते हैं | उन्हीं में से प्रस्तुत हैं कुछ मन्त्र… आप अपनी सुविधानुसार किसी भी एक मन्त्र का जाप कर सकते हैं…

वैदिक मन्त्र : ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु

यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्

पौराणिक मन्त्र :

ॐ देवानां च ऋषीणां गुरुं कांचनसन्निभम्

बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्

तन्त्रोक्त मन्त्र : ॐ ऎं क्रीं बृहस्पतये नम: अथवा ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम: अथवा  ॐ श्रीं श्रीं गुरवे नम:

बीज मन्त्र : ॐ बृं बृहस्पतये नम:

गायत्री मन्त्र : ॐ अंगिरोजाताय विद्महे वाचस्पते धीमहि तन्नो गुरु प्रचोदयात्

अथवा ॐ आंगिरसाय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि तन्नो जीव:प्रचोदयात्

देवगुरु बृहस्पति सभी के ज्ञान का विस्तार करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/04/deva-guru-brihaspati/