महावीर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ

महावीर जयन्ती

आज चैत्र शुक्ल त्रयोदशी है – भगवान् महावीर स्वामी की जयन्ती का पावन पर्व | सभी को महावीर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…

सभी जानते हैं कि महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें और अन्तिम तीर्थंकर थे | तीर्थं करोति स तीर्थंकर: – अर्थात जो अपनी साधना के माध्यम से स्वयं संसार सागर से पार लगाने वाले तीर्थों का निर्माण करें वह तीर्थंकर | तीर्थंकर वे साधक होते हैं जिन्होंने अपने क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा इत्यादि समस्त भावों पर विजय प्राप्त कर ली हो और अपने मन के भीतर के तीर्थ में निवास कर लिया हो – और यही स्थिति कैवल्य ज्ञान की स्थिति कहलाती है |  जैन धर्म में भी तीर्थंकर – अरिहन्त – जिनेन्द्र – उन चौबीस साधकों के लिए प्रयुक्त होता है जिन्होंने स्वयं तप के माध्यम से कैवल्यज्ञान प्राप्त किया |

आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद तीर्थंकर का कर्तव्य होता है कि वे अन्यों को भी आत्मज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करने का प्रयास करें | इसी क्रम में प्रथम तीर्थंकर हुए आचार्य ऋषभदेव और अन्तिम अर्थात चौबीसवें तीर्थंकर हुए भगवान् महावीर – जिनका समय ईसा से 599-527 वर्ष पूर्व माना जाता है | णवकार मन्त्र में सभी तीर्थंकरों को नमन किया गया है “ॐ णमो अरियन्ताणं” | समस्त जैन आगम अरिहन्तों द्वारा ही भाषित हुए हैं |

जैन दर्शन का सामान्य अभिमत है कि संसार की समस्त वस्तुओं में उत्पाद्य-व्यय-ध्रौव्य सतत् वर्तमान हैं | अर्थात् जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट भी होगा और उसकी स्थिति भी रहेगी | प्रत्येक वस्तु में नित्य और अनित्य दोनों की ही सत्ता भी सदैव ही रहती है | इस जगत का निर्माता कोई ईश्वर नहीं है | प्राकृतिक तत्वों के निश्चित नियमों के अनुसार सृष्टि का निर्माण स्वाभाविक रूप से होता रहता है और स्वाभाविक रूप से ही वस्तु के पर्यायों का परिवर्तन होता रहता है | अतः प्रत्येक वस्तु अनन्तधर्मात्मक है और संसार की समस्त वस्तुएँ सदसदात्मक हैं | यह संसार शाश्वत और नित्य है क्योंकि पदार्थों का अर्थात वायु, जल, अग्नि, आकाश और पृथिवी का मूलतः विनाश नहीं होता अपितु उनका रूप परिवर्तित होता रहता है | मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि मनुष्य “त्रिरत्न” के अनुशीलन और अभ्यास के द्वारा अपने पूर्वजन्म के कर्मफल का नाश करे तथा इस जन्म में किसी प्रकार भी कर्मफल संग्रहीत न करे | ये त्रिरत्न हैं : सम्यक् श्रद्धा अर्थात् सत् में विश्वास, सम्यक् ज्ञान अर्थात सद्रूप का शंकाविहीन और वास्तविक ज्ञान, तथा सम्यक् आचरण अर्थात बाह्य जगत के विषयों के प्रति सम सुख-दुःख भाव से उदासीनता | इसके साथ ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्चरित्र तथा सम्यग्चिन्तन की भावना पर भी बल दिया गया है | भारत के अन्य दर्शनों की ही भाँति जैन दर्शन का भी अन्तिम लक्ष्य निर्वाण प्राप्ति ही है | भगवान् महावीर ने जैन दर्शन की इस दृष्टि के द्वारा समाज को निर्वाण प्राप्ति का मार्ग दिखाने का प्रयास निरन्तर किया | और अन्त में – समस्त संसार यदि सम्यग्दर्शन, सम्यग्चरित्र तथा सम्यग्चिन्तन की भावना को अंगीकार कर ले तो बहुत सी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त हो सकती है – क्योंकि इस स्थिति में समता का भाव विकसित होगा और फिर किसी भी प्रकार की ऊँच नीच अथवा किसी भी प्रकार के ईर्ष्या द्वेष क्रोध घृणा इत्यादि के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जाएगा | इस प्रकार की उदात्त भावनाओं का प्रसार करने वाले भगवान महावीर को निम्न पंक्तियों के साथ शत शत नमन…

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार

तुम्हारी कर्म श्रृंखला देव सकल मानवता का श्रृंगार ||

तुमने दे दी हर प्राणी को जीवन जीने की अभिलाषा

ममता के स्वर में समझा दी मानव के मन की परिभाषा |

बन गीत और संगीत जगत को हर्ष दिया तुमने अपार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

तुमको पाकर रानी त्रिशला के संग धरती माँ धन्य हुई

विन्ध्याचल पर्वत से कण कण में करुणाभा फिर व्याप्त हुई |

तुमसे साँसों को राह मिली, जग में अगाध भर दिया प्यार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

तुम श्रम के साधक कर्म विजेता आत्मतत्व के ज्ञानी तुम

सम्यक दर्शन, सम्यक चरित्र और अनेकान्त के साधक तुम |

सुख दुःख में डग ना डिगें कभी, समता का तुमने दिया सार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/04/17/mahavir-jayanti/

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चैत्र ओली नवपद आराधना

चैत्र ओली नवपद आराधना

कल यानी शुक्रवार 12 अप्रेल को चैत्र शुक्ल सप्तमी है | कल से ही जैन सम्प्रदाय के अनुयायी नवदिवसीय चैत्र ओली नवपद आराधना का आरम्भ करेंगे जो चैत्र शुक्ल पूर्णिमा यानी 19 तारीख तक चलेगी | नवदिवसीय होते हुए भी किसी तिथि की वृद्धि अथवा क्षय हो जाने कारण इन नौ दिनों में एक दिन कम अथवा अधिक भी हो सकता है | जैसे इस बार नौ दिन की उपासना न होकर आठ दिन ही यह पर्व चलेगा | समस्त जैन पर्व सूर्य और चन्द्रमा की स्थितियों के आधार पर निश्चित किये जाते हैं | सप्तमी तिथि का आरम्भ यद्यपि आज दोपहर दो बजकर तैतालीस मिनट के लगभग होगा, किन्तु उदया तिथि कल होने के कारण कल से ही नवपद आराधना आरम्भ होगी | नौ दिनों में अलग अलग पदों की आराधना की जाती है | जैन दर्शन के अनुसार अनुसार नवपद ओली आराधना आत्मकल्याण का सर्वोत्कृष्ट साधन है | वर्ष में दो बार मुख्य रूप से ओली नवपद आराधना की जाती है – चैत्र शुक्ल सप्तमी से आरम्भ करके चैत्र शुक्ल पूर्णिमा तक, तथा आश्विन शुक्ल सप्तमी से आरम्भ करके आश्विन शुक्ल पूर्णिमा तक |

प्रथम दिवस ॐ ह्री नमो अरिहंताणं के साथ श्री अरिहन्त पद की आराधना की जाती है | दूसरे दिन ॐ ह्रीं नमो सिद्धाणं के साथ श्री सिद्ध पद की आराधना, तीसरे दिन ॐ ह्रीं नमो आयरियाणं के साथ श्री आचार्य पद की आराधना, चतुर्थ दिवस ॐ ह्रीं नमो उवज्झायाणं के साथ श्री उपाध्याय पद की आराधना, पञ्चम दिवस ॐ ह्री नमो लोए सव्वसाहूणं के साथ श्री साधु पद की आराधना, छठे दिन ॐ ह्रीं नमो दंसणस्स के साथ सम्यग् दर्शन पद की आराधना, सप्तम दिवस ॐ ह्रीं नमो नाणस्स के साथ सम्यग् ज्ञान पद की आराधना, अष्टम दिवस ॐ ह्रीं नमो चारित्तस्स के साथ सम्यग् चरित्र पद की आराधना तथा नवं यानी अन्तिम दिन ॐ ह्रीं नमो तवस्स के साथ सम्यग्तप पद की आराधना का विधान है | इस प्रकार णमोंकार मन्त्र के प्रत्येक पद के द्वारा समस्त अरिहन्त गणों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्याय गणों तथा समस्त साधुपदों की आराधना के मार्ग पर चलते हुए जैन दर्शन के प्रमुख अंगों – सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यग्चरित्र का पालन करते हुए सम्यग्तप को साधने का प्रयास किया जाता है |

इस वर्ष आरम्भ के तीन दिन यानी सप्तमी, अष्टमी और नवमी को उन्हीं पदों की आराधना होगी जो कि ऊपर निर्दिष्ट हैं – अरिहन्त पद, सिद्ध पद और आचार्य पद | किन्तु एकादशी तिथि का क्षय है | अतः चतुर्थ पद यानी उपाध्याय पद और पञ्चम यानी साधु पद की आराधना एक ही दिन होगी – सोमवार 15 अप्रेल को | शेष चारों पदों की आराधना क्रमशः 16, 17, 18 और 19 अप्रेल को ही की जाएगी |

वास्तव में यदि देखा जाए तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र तथा सम्यग्तप का अनुसरण करके बहुत सी सामाजिक समस्याओं से मुक्ति प्राप्त हो सकती है तथा विश्वबन्धुत्व की भावना के विकास में सहायता प्राप्त हो सकती है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/04/11/chaitra-oli-navapada-aaradhana/

 

महाशिवरात्रि – शिवाष्टकस्तोत्रम्

ॐ नमः शिवाय

शंकराचार्येण विरचितं शिवाष्टक स्तोत्रम्

सभी को महाशिवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

भगवान् शिव की महिमा का गान करने के लिए बहुत से स्तोत्र उपलब्ध होते हैं, जैसे शिवाष्टकं, लिंगाष्टकं, रुद्राष्टकं, बिल्वाष्टकम् इत्यादि इत्यादि… शिवरात्रि के पावन पर्व पर प्रस्तुत है इन्हीं में से एक – जिसका पाठ बहुत से लोग करते होंगे – शिवाष्टकं – जिसके रचयिता हैं आदि शंकराचार्य…

तस्मै नम: परमकारणकारणाय, दीप्तोज्ज्वलज्ज्वलित पिङ्गललोचनाय |

नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय, ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नम: शिवाय ||

जो समस्त कारणों के भी कारण हैं, दीप्त ज्योति के समान उज्जवल पिंगल नेत्र जिनके हैं, जो सर्प के हार और कुण्डलादि से विभूषित हैं तथा जो ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णु को भी वर देने में समर्थ हैं ऐसे भगवान शिव को हम नमन करते हैं |

श्रीमत्प्रसन्नशशिपन्नगभूषणाय, शैलेन्द्रजावदनचुम्बितलोचनाय |

कैलासमन्दरमहेन्द्रनिकेतनाय, लोकत्रयार्तिहरणाय नम: शिवाय ||

निर्मल चन्द्रमा तथा सर्प ही जिनके आभूषण है, शैलेन्द्रजा (हिमसुता) पार्वती जिनके नेत्रों का चुम्बन करती हैं, कैलाश और महेन्द्र पर्वत जिनका आवास हैं ऐसे भगवान शिव को हम नमन करते हैं |

पद्मावदातमणिकुण्डलगोवृषाय, कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय |

भस्मानुषक्तविकचोत्पलमल्लिकाय, नीलाब्जकण्ठसदृशाय नम: शिवाय ||

स्वच्छ पद्मरागमणि के कुण्डलों से किरणों की वर्षा करने वाले , अगरु और बहुत से चन्दन से चर्चित भस्म एवं प्रफुल्लित कमल और जुही से सुशोभित नीलकमल सदृश कण्ठ वाले भगवान शँकर को मेरा नमस्कार है ।
लम्बत्सपिङ्गल जटा मुकुटोत्कटाय, दंष्ट्राकरालविकटोत्कटभैरवाय |

व्याघ्राजिनाम्बरधराय मनोहराय, त्रिलोकनाथनमिताय नम: शिवाय ||

पिंगल वर्ण की लम्बी लटकती जटाएँ और मुकुट जो धारण करते हैं, तीक्ष्ण दाँतों के कारण जो विकट प्रतीत होते हैं, व्याघ्राजिन जिन्होंने धारण किया हुआ है, इतने पर भी जो मनोहर हैं ऐसे त्रिलोकी के नाथ भगवान शिव को हम नमन करते हैं |

दक्षप्रजापतिमहाखनाशनाय, क्षिप्रं महात्रिपुरदानवघातनाय |

ब्रह्मोर्जितोर्ध्वगक्रोटिनिकृंतनाय, योगाय योगनमिताय नम: शिवाय ||

दक्षप्रजापति के महायज्ञ का जिन्होंने विध्वंस किया, जिन्होंने त्रिपुरासुर का वध किया, ब्रह्मा के दर्पयुक्त ऊर्ध्व मुख को जिन्होंने काट दिया (प्राणीमात्र के दर्प को नष्ट करने वाले), योग स्वरूप तथा योग से नमित भगवान शिव को हम नमन करते हैं |
संसारसृष्टिघटनापरिवर्तनाय, रक्ष: पिशाचगणसिद्धसमाकुलाय |

सिद्धोरगग्रहगणेन्द्रनिषेविताय, शार्दूलचर्मवसनाय नम: शिवाय ||

प्रत्येक कल्प में संसार की संरचना को परिवर्तित करने की क्षमता रखने वाले, राक्षस, पिशाच, सर्प, सिद्ध गणों तथा इन्द्रादि से सेवित, व्याघ्रचर्म को धारण करने वाले भगवान शिव को हम नमन करते हैं |

भस्माङ्गरागकृतरूपमनोहराय, सौम्यावदातवनमाश्रितमाश्रिताय |

गौरीकटाक्षनयनार्धनिरीक्षणाय, गोक्षीरधारधवलाय नम: शिवाय ||

भस्मरूपी अंगराग धारण करने वाले, मनोहर रूप वाले, अत्यन्त शान्त तथा सुन्दर वनों के आश्रितों के आश्रित, माता पार्वती को कटाक्ष से निहारने वाले तथा गौदुग्ध के समान धवल भगवान शिव को हम नमन करते हैं |

आदित्य सोम वरुणानिलसेविताय, यज्ञाग्निहोत्रवरधूमनिकेतनाय |

ऋक्सामवेदमुनिभि: स्तुतिसंयुताय, गोपाय गोपनमिताय नम: शिवाय ||

सूर्य, चन्द्र, वरुण, पवन जिनकी सेवा करते हैं, यज्ञ तथा अग्निहोत्र के धूम में जो निवास करते हैं, ऋक्सामादि वेद तथा समस्त मुनिजन जिनकी संस्तुति करते हैं, गौओं के जो पालनकर्ता हैं ऐसे भगवान शिव को हम नमन करते हैं |

शिवाष्टकमिदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ |
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ||

आदि गुरु शंकराचार्य जी कहते हैं कि इस शिवाष्टक स्तोत्र का भगवान् शंकर का अपने मन में ध्यान करते हुए (शिव सन्निधौ) जो व्यक्ति पठन करता है शिव को प्राप्त करते हुए (शिव की भक्ति को प्राप्त करते हुए) शिवलोक (कल्याण) को प्राप्त होता है |

इसी शिवाष्टक स्तोत्र के साथ सभी को एक बार पुनः महाशिवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/03/04/om-namah-shivay/

 

मकर संक्रान्ति

ॐ घृणि: सूर्य आदित्य नम: ॐ

आज रात्रि सात बजकर पावन मिनट के लगभग भगवान भास्कर गुरुदेव की धनु राशि से निकल कर महाराज शनि की मकर राशि में गमन करेंगे और इसके साथ उत्तर दिशा की ओर उनका प्रस्थान आरम्भ हो जाएगा | और कल यानी 15 जनवरी – मकर संक्रान्ति को सूर्य के मकर राशि में संक्रमण का पर्व मनाया जाएगा | पुण्यकाल कल प्रातः सूर्योदय के समय यानी सात बजकर पन्द्रह मिनट से आरम्भ होकर सूर्यास्त यानी सायं पाँच बजकर पैतालीस मिनट तक रहेगा | साथ ही इस वर्ष मकर संक्रान्ति से ही प्रयागराज में अर्द्धकुम्भ का मेला भी आरम्भ होने जा रहा है | संक्रान्ति शब्द का अर्थ है संक्रमण करना – प्रस्थान करना | इस प्रकार किसी भी ग्रह का एक राशि से दूसरी राशि पर गोचर अथवा संक्रमण संक्रान्ति ही होता है | किन्तु सूर्य का संक्रमण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है | नवग्रहों में सूर्य को राजा माना जाता है तथा सप्ताह के दिन रविवार का स्वामी रवि अर्थात सूर्य को ही माना जाता है | सूर्य का शाब्दिक अर्थ है सबका प्रेरक, सबको प्रकाश देने वाला, सबका प्रवर्तक होने के कारण सबका कल्याण करने वाला | यजुर्वेद में सूर्य को “चक्षो सूर्योSजायत” कहकर सूर्य को ईश्वर का नेत्र माना गया है | सूर्य केवल स्थूल प्रकाश का ही संचार नहीं करता, अपितु सूक्ष्म अदृश्य चेतना का भी संचार करता है | यही कारण है कि सूर्योदय के साथ ही समस्त जड़ चेतन जगत में चेतनात्मक हलचल बढ़ जाती है | इसीलिए ऋग्वेद में आदित्यमण्डल के मध्य में स्थित सूर्य को सबका प्रेरक, अन्तर्यामी तथा परमात्मस्वरूप माना गया है – सूर्यो आत्मा जगतस्य…”

वेद उपनिषद आदि में सूर्य के महत्त्व के सम्बन्ध में अनेकों उक्तियाँ उपलब्ध होती हैं | जैसे सूर्योपनिषद का एक मन्त्र है “आदित्यात् ज्योतिर्जायते | आदित्याद्देवा जायन्ते | आदित्याद्वेदा जायन्ते | असावादित्यो ब्रह्म |” अर्थात आदित्य से प्रकाश उत्पन्न होता है, आदित्य से ही समस्त देवता उत्पन्न हुए हैं, आदित्य ही वेदों का भी कारक है और इस प्रकार आदित्य ही ब्रह्म है | अथर्ववेद के अनुसार “संध्यानो देवः सविता साविशदमृतानि |” अर्थात् सविता देव में अमृत तत्वों का भण्डार निहित है | तथा “तेजोमयोSमृतमयः पुरुषः |” अर्थात् यह परम पुरुष सविता तेज का भण्डार और अमृतमय है | इत्यादि इत्यादि

छान्दोग्योपनिषद् में सूर्य को प्रणव माना गया है | ब्रह्मवैवर्तपुराण में सूर्य को परमात्मा कहा गया है | गायत्री मन्त्र में तो है ही भगवान् सविता की महिमा का वर्णन – सूर्य का एक नाम सविता भी है – सविता सर्वस्य प्रसविता – सबकी सृष्टि करने वाला – यही त्रिदेव के रूप में जगत की रचना, पालन तथा संहार का कारण है | आत्मा का कारक, प्राणों का कारक, जीवनी शक्ति का – ऊर्जा का कारक सूर्य ही माना जाता है | यही कारण है कि सूर्य की संक्रान्ति का सबसे अधिक महत्त्व माना जाता है | सूर्योपासना से न केवल ऊर्जा, प्रकाश, आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य आदि की उपलब्धि होती है बल्कि एक साधक के लिए साधना का मार्ग भी प्रशस्त होता है |

सूर्य को एक राशि से दूसरी राशि पर जाने में पूरा एक वर्ष का समय लगता है – और यही अवधि सौर मास कहलाती है | वर्ष भर में कुल बारह संक्रान्तियाँ होती हैं | आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, उडीसा, पंजाब और गुजरात में संक्रान्ति के दिन ही मास का आरम्भ होता है | जबकि बंगाल और असम में संक्रान्ति के दिन महीने का अन्त माना जाता है | यों तो सूर्य की प्रत्येक संक्रान्ति महत्त्वपूर्ण होती है, किन्तु मेष, कर्क, धनु और मकर की संक्रान्तियाँ विशेष महत्त्व की मानी जाती हैं | इनमें भी मकर और कर्क की संक्रान्तियाँ विशिष्ट महत्त्व रखती हैं – क्योंकि इन दोनों ही संक्रान्तियों में ऋतु परिवर्तन होता है | कर्क की संक्रान्ति से सूर्य का दक्षिण की ओर गमन आरम्भ माना जाता है जिसे दक्षिणायन कहा जाता है और मकर संक्रान्ति से सूर्य का उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान आरम्भ हो जाता है – जिसे उत्तरायण कहा जाता है | मकर संक्रान्ति से शीत का प्रकोप धीरे धीरे कम होना आरम्भ हो जाता है और जन साधारण तथा समूची प्रकृति सूर्य से ऊर्जा प्राप्त कर उल्लसित हो नृत्य करना आरम्भ कर देती है | पृथिवी को सूर्य का प्रकाश अधिक मात्रा में मिलना आरम्भ हो जाता है जिसके कारण दिन की अवधि भी बढ़ जाती है और शीत के कारण आलस्य को प्राप्त हुई समूची प्रकृति पुनः कर्मरत हो जाती है | इसलिए इस पर्व को अन्धकार से प्रकाश की ओर गमन करने का पर्व तथा प्रगति का पर्व भी कहा जाता है |

अस्तु, सभी को मकर संक्रान्ति, पोंगल, लोहड़ी तथा माघ बिहू की शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है वर्ष 2019 के लिए बारह संक्रान्तियों की सूची…सूर्य संक्रान्ति

मंगलवार, 15 जनवरी       मकर संक्रान्ति       सूर्य का मकर राशि में गोचर

बुधवार, 13 फरवरी         कुम्भ संक्रान्ति      सूर्य का कुम्भ राशि में गोचर

शुक्रवार, 15 मार्च          मीन संक्रान्ति       सूर्य का मीन राशि में गोचर

रविवार, 14 अप्रेल          मेष संक्रान्ति        सूर्य का मेष राशि में गोचर

बुधवार, 15 मई           वृषभ संक्रान्ति       सूर्य का वृषभ राशि में गोचर

शनिवार, 15 जून          मिथुन संक्रान्ति      सूर्य का मिथुन राशि में गोचर

मंगलवार, 16 जुलाई        कर्क संक्रान्ति       सूर्य का कर्क राशि में गोचर

शनिवार, 17 अगस्त        सिंह संक्रान्ति       सूर्य का सिंह राशि में गोचर

मंगलवार, 17 सितम्बर     कन्या संक्रान्ति      सूर्य का कन्या राशि में गोचर

शुक्रवार, 18 अक्टूबर       तुला संक्रान्ति       सूर्य का तुला राशि में गोचर

रविवार, 17 नवम्बर        वृश्चिक संक्रान्ति     सूर्य का वृश्चिक राशि में गोचर

सोमवार, 16 दिसम्बर       धनु संक्रान्ति        सूर्य का धनु राशि में गोचर

भगवान भास्कर का प्रत्येक राशि में संक्रमण समस्त चराचर प्रकृति को ऊर्जा प्रदान करते हुए जन साधारण के जीवन को ज्ञान, सुख-समृद्धि, उल्लास तथा स्नेह की ऊर्जा से परिपूर्ण करे…

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शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ

आश्विन मास की पूर्णिमा, जिसे शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है और जिसके साथ ही आरम्भ हो जाती है पन्द्रह दिनों बाद आने वाले दीपोत्सव की चहल पहल | इसके अतिरिक्त देश के अलग अलग भागों में कोजागरी पूर्णिमा, नवान्न पूर्णिमा, कुमुद्वती तथा कुमार पूर्णिमा के नाम से भी इस पर्व को जाना जाता है | आज ही के दिन महर्षि वाल्मीकि का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है | सभी को शरद पूर्णिमा तथा वाल्मीकि जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ इस आशा के साथ कि हम सभी का जीवन शरद पूर्णिमा के चाँद जैसा प्रफुल्लित रहे…

यों हिन्दू मान्यता के अनुसार हर माह की पूर्णिमा महत्त्वपूर्ण होती हैं | लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्त्व इस मान्यता के कारण और अधिक बढ़ जाता है कि आज के दिन चन्द्रमा पृथिवी के इतने अधिक निकट होता है कि उसकी किरणों के सारे जीवन रक्षक पौष्टिक तत्व पृथिवीवासियों को उपलब्ध हो जाते हैं | एक ओर तो वर्षा ऋतु बीत जाती है | मेघराज भी अपनी टोली के साथ इन्द्रलोक को वापस लौट जाते हैं | उनके साथ ही उनकी प्रेयसि नृत्यांगना दामिनी भी अपने बरखा की बूँदों के वाद्ययन्त्रों तथा घुँघरूओं को झनकाती फिर से वापस लौटने का वादा कर अपने महल की ओर प्रस्थान कर जाती हैं | शरद ऋतु के स्वागत में धवल चन्द्रिका की शीतल प्रकाश गंगा में डुबकी लगाकर चन्द्रकिरणों की अठखेलियों से रोमांचित हुआ आकाश पूर्ण रूप से स्वच्छ और विशाल दिखाई देने लगता है | निश्चित रूप से आज की रात चन्द्रदेव अपनी समस्त पौष्टिकता अपनी किरणों के माध्यम से समस्त जड़ चेतन पर लुटाने को तत्पर रहते हैं | इसीलिए आज की रात अधिकाँश लोग घरों के आँगन में या कहीं भी खुले स्थान में रात बिताना अधिक पसन्द करते हैं – ताकि चन्द्रमा की उन पौष्टिक किरणों में अच्छी तरह स्नान करके स्वयं को पुनः ऊर्जावान अनुभव कर सकें |

इसीलिए तो ऐसी लोकमान्यताएँ हैं कि आज के दिन चन्द्रमा को एकटक कुछ देर के लिए निहारते रहने से नेत्रज्योति में वृद्धि होती है | हमारी आयु के लोगों को अपना बचपन भी याद अवश्य होगा जब हममें से अधिकाँश घरों में माताएँ हम सबके हाथों में सुई धागा पकड़ा कर आँगन में चन्दा की रौशनी में बैठा दिया करती थीं सुई में धागा डालने के लिए और हमसे कहा जाता था कि आज के दिन चाँद की रौशनी में सुई में धागा डालोगे तो आँखों की रौशनी अच्छी बनी रहेगी | और वास्तव में इतना स्पष्ट और आँखों के रास्ते मन में उतर कर समूचे व्यक्तित्व को आह्लाद की सरिता में स्नान कराके रोमांचित कर देने वाला प्रकाश शरद पूर्णिमा के उजले चाँद का होता था कि अन्य किसी भी प्रकाश की आवश्यकता ही नहीं होती थी | बड़े आराम से चाँद के शीतल प्रकाश की चादर में लिपटे सुई में धागा डाल देते थे और काफ़ी समय तक यही खेल चलता रहता था – जब तक कि माँ की मीठी झिडकियाँ कानों में सुनाई देनी आरम्भ नहीं हो जाती थीं “अरे अब चलकर सो जाओ | मैंने खेल करने को नहीं कहा था, बस एक बार धागा डालना था और बस – पर तुम लोगों को तो हर काम में खेल चाहिए | चलो सोने के लिए जाओ – सुबह उठकर पढ़ाई नहीं करनी क्या ?” उत्सव की रुत में पढ़ाई का नाम सुनकर वैसे ही बच्चों को खुन्दक आ जाती थी – सो बेमन से जाकर लेट जाते थे अपने अपने बिस्तरों पर – आँखों में शीतल चाँदनी लुटाते उस धवल मनोहारी शरद के पूर्ण चन्द्र की छवि को बसाए |

प्रातः दैनिक कर्मों से निवृत्त होने के बाद घर भर को दूध में भीगे चोले (पोहा) प्रसाद के रूप में नाश्ते में दिए जाते थे | रात को माँ दूध में चोले भिगाकर बाहर आँगन में चाँद की चाँदनी के नीचे छींके पर लटका दिया करती थीं | प्रायः हर घर में ऐसा होता था | माना जाता था कि आज रात की चाँद की किरणों के समस्त पौष्टिक तत्व इन चोलों में घुल मिल जाएँगे | और वास्तव में सुबह जब हम उन्हें खाते थे तो इतने शीतल और अमृततुल्य स्वाद से युक्त होते थे कि खाते खाते भान ही नहीं रहता था कितने खा लिए | इन सभी मान्यताओं में सम्भव है कहीं न कहीं कुछ न कुछ वैज्ञानिक तथ्य अवश्य रहा होगा |

ये तो थी शरद पूर्णिमा के पर्व से जुड़े कुछ ख़ूबसूरत से लोक रिवाज़ों की बात, जो आज  अचानक स्मरण हो आई | आज जब प्रकृति में हमने इतना अधिक प्रदूषण भर दिया है तो शरद के उस खिले खिले चाँद के तो दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं – ऐसे में ये रीति रिवाज़ भी निरर्थक से ही हो गए हैं |

बहरहाल, एक बार पुनः मुख्य विषय पर | कृष्ण भक्तों के लिए शरद पूर्णिमा की रात्रि का कितना अधिक और विशेष महत्त्व है ये सभी जानते हैं | आज रात को ही भगवान कृष्ण अपनी महाशक्ति राधा के सहित समस्त गोपियों के साथ महारास रचाते हैं | कितना आकर्षक दृश्य रहा होगा जब हर गोपी को उसके प्यारे कन्हाई अपने साथ नृत्य करते जान पड़े होंगे | लेकिन ये रास केवल एक युग का ही रास नहीं है, अनन्त युगों से चला आ रहा है और युगों युगों तक चलता रहेगा |

जो लोग कृष्ण को केवल रास रचैया भर मानते हैं वास्तव में वे लोग रास के अर्थ तथा मर्म को ही भली भाँति नहीं समझ पाए हैं | कृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य करना कोई साधारण घटना नहीं है | भाव, ताल, नृत्य, छन्द, गीत, रूपक एवं लीलाभिनय से युक्त यह रास – जिसमें रस का उद्भव मन से होता है तथा जो पूर्ण रूप से अलौकिक और आध्यात्मिक है – वैष्णव परम्पराओं से लेकर जैन परम्पराओं तक समस्त चिन्तन परम्पराओं में ज्ञान का आलोक लेकर आया | समस्त ब्रह्माण्ड में जो विराट नृत्य चल रहा है प्रकृति और पुरूष (परमात्मा) का, श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य उस विराट नृत्य की ही तो एक झलक है । उस रास में किसी प्रकार की काम भावना नहीं है | कृष्ण पुरूष तत्व है और गोपिकाएँ प्रकृति तत्व । इस प्रकार कृष्ण और गोपियों का नृत्य प्रकृति और पुरूष का महानृत्य है । विराट प्रकृति और विराट पुरूष का महारास है यह | तभी तो प्रत्येक गोपी यही अनुभव करती है कि कृष्ण उसी के साथ नृत्यलीन हैं । सांसारिक दृष्टि से यह रासनृत्य मनोरंजन मात्र हो सकता है, किन्तु यह नृत्य पूर्ण रूप से पारमार्थिक नृत्य है | इस महारास के द्वारा यही सिखाने का प्रयास श्री कृष्ण का रहा कि प्रेम न तो वासना है न ही किसी का एकाधिकार, वरन प्रेम का कालुष्यरहित सामूहिक विकास आवश्यक है, और प्रेमियों के मध्य किसी प्रकार का आवरण – किसी प्रकार का रहस्य नहीं रहता – वहाँ होती है केवल विचारों की – भावों की – स्पष्टता और समर्पण | रासलीला कृष्ण तथा गोपियों के प्रेम का वह चरम उत्कर्ष बिन्दु है जहाँ किसी भी प्रकार की शारीरिक अथवा मानसिक गोपनीयता अथवा रहस्य का आवरण नहीं है | राग योग की इस दशा में बृहदारण्यक का यह कथन सत्य सिद्ध होता है “जैसे पुरुष को अपने आलिंगनकाल में बाहर भीतर की कोई सुधि नहीं रहती उसी प्रकार जब उपासक प्राज्ञ द्वारा आलिंगित होता है तब वह अपनी सुध बुध खो बैठता है |”

तो विराट प्रकृति और विराट पुरूष के महारास के साक्षी और प्रतीक तथा अपनी ज्योति किरणों द्वारा समस्त चराचर को नवजीवन का सुधापान कराते शरद पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्र को नमन करते हुए सभी को शरद पूर्णिमा के उल्लासमय अमृतमय पर्व की एक बार पुनः हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2017/10/05/sharad-purnima/

विजयादशमी दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ

शुभ विजयादशमी

त्रातारो देवता अधिवोचता नो, मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः

वयं सोमस्य विश्वह प्रयासः, सुवीरा सो विद्भम आ वदेम ||

ऋग्वेद 8/48/14

हे देवगण हे रक्षकों, आशीष दो हमको सदा

हों जल्पना से रहित हम, आलस्य को त्यागें सदा |

हम सब ही हों सोमप्रिय, स्फूर्ति तन मन में रहे

और नायक भी हमारे धर्महित बोलें सदा ||

नव कल्पना, नव ज्योत्स्ना, नव शक्ति, नव आराधना

आनन्द नव, जगजननि कर दे पूरी हर नव कामना ||

पाएँ विजय, पाएँ अभय, पाएँ हृदय सदय सदा

हों एक, मन में हो सदा सद्भाव और सत्कामना ||

अपने सहित सभी को विजय पर्व के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ… अपराजिता देवी सभी को प्रत्येक प्रयास में विजयी बनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/19/happy-vijaya-dashami/

 

 

 

विजयादशमी

विजया दशमी – अपराजिता देवी की आराधना

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

कल विजयादशमी का उल्लासमय पर्व है – सर्वप्रथम सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

सामान्य रूप से इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए मनाया जाता है | आज ही के दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था और इसी जीत के उपलक्ष्य में विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है | लेकिन इस पर्व का एक महत्त्व और भी है – आज ही अपराजिता देवी की पूजा अर्चना भी की जाती है | जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है – यह रूप देवी का ऐसा रूप है जो अपराजिता है – अर्थात् जिसकी कभी पराजय न हो सके – जो सदा विजयी रहे – जिसे कभी जीता न जा सके | इसीलिए नौ दिनों तक देवी के विविध रूपों की पूजा अर्चना करने के बाद विजयादशमी यानी दशम् नवरात्र को अपराजिता देवी की पूजा अर्चना के साथ नवरात्रों का पारायण होता है | जीवन में सब प्रकार के संघर्षों पर विजय प्राप्त करने हेतु देवी अपराजिता की पूजा की जाती है | मान्यता है कि देवी अपराजिता अधर्म का आचरण करने वालों का विनाश करके धर्म की रक्षा करती हैं | यही कारण है कि इस दिन शस्त्र पूजा का भी विधान है |

देवी अपराजिता सिंह पर सवार मानी जाती हैं और इनके अनेक हाथों में अनेक प्रकार के अस्त्र होते हैं जो इस तथ्य का अनुमोदन करते हैं कि किसी प्रकार की भी बुरी शक्तियाँ, किसी प्रकार का भी अनाचार, किसी प्रकार का भी अज्ञान का माँ अपराजिता नाश करने में सक्षम हैं | यद्यपि अपराजिता देवी की अर्चना से सम्बन्धित विधि विधान विस्तार में तो तन्त्र ग्रन्थों में उपलब्ध होते है – जो निश्चित रूप से देवी के उग्र भाव की उपासना की विधि है | लेकिन देवी के स्नेहशील रूप की उपासना के मन्त्र देवी पुराण और दुर्गा सप्तशती में उपलब्ध होते हैं जिनमें अपराजिता देवी के स्नेहशील मातृ रूप को भली भाँति दर्शाया गया है |

ऐसा भी माना जाता ही कि देवी अपराजिता शमी वृक्ष में निवास करती हैं और इसीलिए कुछ स्थानों पर लोग विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष की भी पूजा का भी विधान है |

अपने इस रूप में देवी समस्त प्रकार की नकारात्मकता और कठिनाइयों का विनाश करती हैं क्योंकि यही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं |

व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह पर्व शक्ति और शक्ति के समन्वय का पर्व है | नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है | नवदुर्गा के सम्मिलित स्वरूप अपराजिता देवी की कृपा से उसके मार्ग के समस्त कंटक दूर हो जाते हैं और उसके प्रत्येक प्रयास में उसे सफलता प्राप्त होती है । इसीलिए क्षत्रिय अपने अस्त्रों की पूजा करते हैं, अध्ययन अध्यापन में लगे लोग अपनी शास्त्रों की पूजा करते हैं, कलाकार अपने वाद्ययन्त्रों की पूजा करते हैं – यानी हर कोई अपने अपने क्षेत्र में सफलताप्राप्ति की कामना से माँ अपराजिता देवी की पूजा अर्चना करने के साथ ही अपने उपयोग में आने वाली वस्तुओं की भी पूजा अर्चना करते हैं |

आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये ।

स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये ||

मम क्षेमारोग्यादिसिद्ध्‌यर्थं यात्रायां विजयसिद्ध्‌यर्थं |

गणपतिमातृकामार्गदेवतापराजिताशमीपूजनानि करिष्ये ।|

अपराजिता देवी हम सबको जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाती हुई समस्त प्रकार की नकारात्मकता और अज्ञान रूपी शत्रुओं का नाश करें इसी भावना के साथ सभी को विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/18/vijaya-dashami/