Category Archives: धर्म और दर्शन

सूर्य ग्रहण

रविवार आषाढ़ कृष्ण अमावस्या को प्रातः दस बजकर बीस मिनट के लगभग सूर्य ग्रहण का आरम्भ होगा जो भारत के कुछ भागों में कंकणाकृति अर्थात वलयाकार दिखाई देगा तथा कुछ भागों में आंशिक रूप से दिखाई देगा और दिन में 1:49 के लगभग समाप्त हो जाएगा | बारह बजकर दो मिनट के लगभग ग्रहण का मध्यकाल होगा | ग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 28 मिनट 36 सेकेंड्स की है | ग्रहण का सूतक शनिवार 20 जून को रात्रि नौ बजकर बावन मिनट से आरम्भ होगा | किन्तु जो लोग बीमार हैं उनके लिए, बच्चों के लिए तथा गर्भवती महिलाओं के लिए 21 जून की प्रातः पाँच बजकर चौबीस मिनट यानी सूर्योदय काल से सूतक का आरम्भ माना जाएगा | यह ग्रहण मिथुन राशि पर है जहाँ सूर्य, चन्द्र और राहु के साथ बुध भी गोचर कर रहा है | सूर्य, चन्द्र और राहु मृगशिर नक्षत्र में हैं | साथ ही इस दिन से भगवान भास्कर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान आरम्भ कर देते हैं और दिन की अवधि धीरे धीरे कम होनी आरम्भ हो जाती है, इसीलिए इस दिन को ग्रीष्मकालीन सबसे बड़ा दिन भी माना जाता है | किन्तु ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार कर्क संक्रान्ति को सूर्यदेव का दक्षिण दिशा में प्रस्थान आरम्भ होता है जिसे निरयण दक्षिणायन कहा जाता है – जो 16 जुलाई को होगी |

ग्रहण के विषय में हम पूर्व में भी बहुत कुछ लिख चुके हैं | अतः पौराणिक कथाओं के विस्तार में नहीं जाएँगे | हमारे ज्योतिषियों की मान्यता है कि ग्रहण की अवधि में उपवास रखना चाहिए, बालों में कंघी आदि नहीं करनी चाहिए, गर्भवती महिलाओं को न तो बाहर निकलना चाहिए, न ही चाकू कैंची आदि से सम्बन्धित कोई कार्य करना चाहिए, अन्यथा गर्भस्थ शिशु पर ग्रहण का बुरा प्रभाव पड़ता है (यद्यपि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है) तथा ग्रहण समाप्ति पर स्नानादि से निवृत्त होकर दानादि कर्म करने चाहियें | साथ ही जिन राशियों के लिए ग्रहण का अशुभ प्रभाव हो उन्हें विशेष रूप से ग्रहण शान्ति के उपाय करने चाहियें | इसके अतिरिक्त ऐसा भी माना जाता है कि पितृ दोष निवारण के लिए, मन्त्र सिद्धि के लिए तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ग्रहण की अवधि बहुत उत्तम होती है |

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ये सब खगोलीय घटनाएँ हैं और खगोल वैज्ञानिकों की खोज के विषय हैं क्योंकि ग्रहण के आध्यात्मिक महत्त्व के साथ ही संसार भर के वैज्ञानिकों के लिए यह अवसर किसी उत्सव से कम नहीं होता जब वे सौर मण्डल में हो रहे परिवर्तनों का अध्ययन करते हैं | तो इस विषय पर हम नहीं जाएँगे | क्योंकि विज्ञान और आस्था में भेद होता है | हम यहाँ बात करते हैं हिन्दू धार्मिक मान्यताओं और आस्थाओं की | भारतीय हिन्दू मान्यताओं तथा भविष्य पुराण, नारद पुराण आदि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य और चन्द्र ग्रहण अत्यन्त अद्भुत ज्योतिषीय घटनाएँ हैं जिनका समूची प्रकृति पर तथा जन जीवन पर प्रभाव पड़ता है |

यदि व्यावहारिक रूप से देखें तो इसे इस प्रकार समझना चाहिए कि जिस प्रकार वर्षाकाल में जब सूर्य को मेघों का समूह ढक लेता है उस समय प्रायः बहुत से लोगों की भूख प्यास कम हो जाती है, पाचन क्रिया भी दुर्बल हो जाती है, शरीर में आलस्य की सी स्थिति हो जाती है | इसका कारण है कि सूर्य समस्त चराचर जगत की आत्मा है – परम ऊर्जा और चेतना का स्रोत है | बादलों से ढका होने के कारण सूर्य से प्राप्त वह ऊर्जा एवं चेतना जीवों तक नहीं पहुँच पाती और उनमें इस प्रकार के परिवर्तन आरम्भ हो जाते हैं | इसी प्रकार यद्यपि चाँद घटता बढ़ता रहता हैं, किन्तु जब बादलों के कारण आकाश में चन्द्रमा के दर्शन नहीं होते तब भी समूची प्रकृति पर भावनात्मक प्रभाव पड़ना आरम्भ हो जाता है | ग्रहण में भी यह स्थिति होती है |

सूर्य और चन्द्रमा के मध्य जब पृथिवी आ जाती है और चन्द्रमा पर पृथिवी की छाया पड़ने लगती है तो उसे चन्द्र ग्रहण कहा जाता है, और जब सूर्य तथा पृथिवी के मध्य चन्द्रमा आ जाता है तो सूर्य का बिम्ब चन्द्रमा के पीछे कुछ समय के लिए ढक जाता है – इसे सूर्य ग्रहण कहा जाता है | चन्द्र ग्रहण के समय चन्द्रमा की शीतल किरणें प्राणियों तक नहीं पहुँच पातीं | ज्योतिषीय सिद्धान्तों के अनुसार चन्द्रमा को मन का कारक माना गया है | अतः चन्द्रग्रहण का मन की स्थिति पर व्यापक प्रभाव माना जाता है | तथा सूर्य ग्रहण के समय सूर्य की किरणें पूर्णतः स्वच्छ रूप में प्राणियों तक नहीं पहुँच पातीं | जिसका मनुष्यों के पाचन क्षमता, उनकी कार्य क्षमता आदि पर व्यापक प्रभाव माना जाता है | यही कारण है ग्रहण की स्थिति में कुछ भी भोजन आदि तथा अन्य कार्यों के लिए मना किया जाता है | क्योंकि न तो इस अवधि में किया गया भोजन पचाने में हमारी पाचन प्रणाली सक्षम होती है और न ही इस अवधि में उतनी अधिक कुशलता से कोई कार्य सम्भव हो पाता है | आपने देखा भी होगा कि जब पूर्ण सूर्य ग्रहण होता है – जब दिन में रात्रि के जैसा अन्धकार छा जाता है – तो मनुष्यों पर ही इसका प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि सारी प्रकृति को रात का अनुभव होने लगता है और समूची प्रकृति मानो निद्रा देवी की गोद में समा जाती है – सारे पशु पक्षी तक अपने अपने घोसलों और दूसरे निवासों में छिप जाते हैं – क्योंकि उन्हें लगता है कि अब रात हो गई है और हमें सो जाना चाहिए | जब सारी प्रकृति ही ग्रहण के प्रति इतनी सम्वेदनशील है तो फिर मनुष्य तो स्वभावतः ही सम्वेदनशील होता है |

ज्योतिषीय दृष्टि से मिथुन राशि पर पड़ रहा यह सूर्य ग्रहण मिथुन राशि के लिए तो अनुकूल है ही नहीं – उन्हें अपने स्वास्थ्य के साथ साथ अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण रखने की आवश्यकता है तथा भाई बहनों के साथ व्यर्थ के विवाद से बचने की भी आवश्यकता है, क्योंकि सूर्य उनका तृतीयेश है | साथ ही कर्क राशि के लिए सूर्य द्वितीयेश होकर धन तथा वाणी का कारक है और उनकी राशि से बारहवें भाव में होने के कारण इस राशि के जातकों के लिए भी इस ग्रहण को अच्छा नहीं कहा जाएगा – उन्हें अपने स्वास्थ्य तथा दुर्घटना और व्यर्थ की धनहानि के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता होगी | वृश्चिक राशि के जातकों के लिए सूर्य दशमेश है तथा ग्रहण उनके अष्टम भाव में आ रहा है अतः उन्हें भी विशेष रूप से अपने स्वास्थ्य तथा कार्य स्थल पर गुप्त शत्रुओं की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता होगी | मीन राशि के जातकों के लिए सूर्य षष्ठेश है और इस समय उनके चतुर्थ भाव – परिवार तथा अन्य प्रकार की सुख सुविधाओं का भाव – में गोचर कर रहा है – उनके लिए भी इसे शुभ नहीं कहा जा सकता – पारिवारिक क्लेश न होने पाए इसका प्रयास करते रहने की आवश्यकता होगी |

किन्तु साथ ही हमारा अपना यह भी मानना है कि ग्रहण जैसी आकर्षक खगोलीय घटना से भयभीत होने की अपेक्षा इसके सौन्दर्य को निहार कर प्रकृति के इस सौन्दर्य की सराहना करने की आवश्यकता है… क्योंकि इन सब बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, केवल जन साधारण की अपनी मान्यताओं, निष्ठाओं तथा आस्थाओं पर निर्भर करता है…

बहरहाल, मान्यताएँ और निष्ठाएँ, आस्थाएँ जिस प्रकार की भी हों और विज्ञान के साथ उनका सम्बन्ध स्थापित हो या नहीं, हमारी तो यही कामना है कि सब लोग स्वस्थ तथा सुखी रहें, दीर्घायु हों ताकि भविष्य में भी इस प्रकार की भव्य खगोलीय घटनाओं के साक्षी बन सकें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2020/06/18/solar-eclipse/

 

 

संकष्टी चतुर्थी

संकष्टी चतुर्थी

आज माघ शुक्ल चतुर्थी तिथि है – विघ्न विनाशक गणपति की उपासना का पर्व जिसे लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी – आँचलिक बोली में संकट चतुर्थी – वक्रतुंडी चतुर्थी – तिलकुटा चौथ – कहा जाता है – का पावन पर्व है (सायं पाँच बजकर तैंतीस मिनट तक तृतीया है और उसके बाद चतुर्थी तिथि का आरम्भ हो रहा है जो कल दिन में दो बजकर पचास मिनट तक रहेगी) | तिथि के आरम्भ में बव करण और आयुष्मान योग होगा तथा सूर्य और चन्द्र क्रमशः उत्तराषाढ़ और मघा नक्षत्रों पर एक दूसरे से नवम-पञ्चम भावों में अत्यन्त शुभ स्थिति में रहेंगे | व्रत के पारायण के लिए दिल्ली में आज चन्द्रोदय आठ बजकर तैंतीस मिनट पर ही | साथ ही आज लोहड़ी का उल्लासमय पर्व भी है | अस्तु, सभी को संकष्टी चतुर्थी तथा लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएँ..

लगभग समूचे देश में विघ्नहर्ता सुखकर्ता भगवान् गणेश की उपासना का पर्व संकष्टी चतुर्थी बड़ी आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है | मान्यता है कि इसी दिन भगवान् शंकर ने अपने पुत्र गणेश के शरीर पर हाथी का सिर लगाया था और माता पार्वती अपने पुत्र को इसी रूप में पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो गई थीं | इस दिन स्थान स्थान पर गणपति की प्रतिमाओं की स्थापना करके नौ दिनों तक उनकी पूजा अर्चना की जाती है और दसवें दिन पूर्ण श्रद्धा भक्ति भाव से उन प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है |

इन कथाओं का यद्यपि कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि आस्था विज्ञान पर भारी होती है और आस्थापूर्वक की गई उपासना से वास्तव में मनुष्य में इतनी सामर्थ्य आ जाती है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में वह पूर्ण मनोयोग से तत्पर हो जाता है | यही कारण है कि समस्त ज्योतिषी भी जब किसी समस्या के निदान के लिए कोई उपाय बताते हैं तो आस्थापूर्वक मन्त्रजाप की सलाह अवश्य देते हैं |

संकष्टी चतुर्थी के दिन तिल गुड़ से गणपति की उपासना की जाती है | इसका कारण सम्भवतः यह रहा होगा कि कडकडाती ठण्ड में तिल और गुड़ का सेवन सर्दी से बचने का भी एक उपाय होता है | हर ऋतु में हर मौसम में हर प्रान्त में ईश्वरोपासना के समय वही वस्तु अर्पण की जाती है जो या तो उस मौसम और उस प्रान्त में सरलता से उपलब्ध होती है या उस मौसम में होने वाले रोगों के प्रकोप से बचाने में सहायक होती है | इसलिए तिल गुड़ से गणपति की उपासना का यही औचित्य प्रतीत होता है |

अस्तु! ऋद्धि सिद्धि दाता गणपति के प्रति आस्थापूर्वक नमन करते हुए प्रस्तुत हैं विघ्नविनाशक की अंगपूजा के सहित गणपतेरेकविंशतिनामस्तोत्रम् और मंगलम् | गणपति की अंगपूजा करके उनके इक्कीस नामों का स्मरण करना चाहिए | जल में दुग्ध, अक्षत, सिंदूर आदि मिलाकर दूर्वा से गणपति के सभी अंगों की क्रमशः पूजा का विधान इस प्रकार है…

अंगपूजा :

ॐ गणेशाय नमः – पादौ पूजयामि

ॐ विघ्नराजाय नमः – जानुनी पूजयामि

ॐ आखुवाहनाय नमः – उरु: पूजयामि

ॐ हेरम्बाय नमः – कटि पूजयामि

ॐ कामरीसूनुवे नमः – नाभिं पूजयामि

ॐ लम्बोदराय नमः – उदरं पूजयामि

ॐ गौरीसुताय नमः – स्तनौ पूजयामि

ॐ गणनाथाय नमः – हृदयं पूजयामि

ॐ स्थूलकंठाय नमः – कण्ठं पूजयामि

ॐ पाशहस्ताय नमः – स्कन्धौ पूजयामि

ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय नमः – हस्तान् पूजयामि

ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः – वक्त्रं पूजयामि

ॐ विघ्नहर्ताय नमः – ललाटं पूजयामि

ॐ सर्वेश्वराय नमः – शिर: पूजयामि

ॐ गणाधिपतये नमः – सर्वांगाणि पूजयामि

गणपतेरेकविंशतिनामस्तोत्रम्

ॐ सुमुखाय नमः ॐ गणाधीशाय नमः ॐ उमा पुत्राय नमः

ॐ गजमुखाय नमः ॐ लम्बोदराय नमः ॐ हर सूनवे नमः

ॐ शूर्पकर्णाय नमः ॐ वक्रतुण्डाय नमः ॐ गुहाग्रजाय नमः

ॐ एकदन्ताय नमः ॐ हेरम्बराय नमः ॐ चतुर्होत्रै नमः

ॐ सर्वेश्वराय नमः ॐ विकटाय नमः ॐ हेमतुण्डाय नमः

ॐ विनायकाय नमः ॐ कपिलाय नमः ॐ वटवे नमः

ॐ भाल चन्द्राय नमः ॐ सुराग्रजाय नमः ॐ सिद्धि विनायकाय नमः

मंगलम्

स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपंकजस्मरणम् |

वासरमणिरिव तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ||

सुमुखश्‍चैकदन्तश्‍च कपिलो गजकर्णकः |

लम्बोदरश्‍च विकटो विघ्ननाशी: विनायकः ||

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः |

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ||

विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा |

संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ||

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् |

प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ||

व्यासं वसिष्‍ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् |

पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ||

व्यासाय विष्‍णुरूपाय व्यासरूपाय विष्‍णवे |

नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्‍ठाय नमो नमः ||

अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः |

अभाललोचनः शम्भुर्भगवान् बादरायणः ||

सभी का जीवन मंगलमय रहे और सभी आस्थापूर्वक लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में अग्रसर रहें, इसी कामना के साथ सभी को संकष्टी चतुर्थी और लोहड़ी की एक बार पुनः हार्दिक शुभकामनाएँ…

Happy Lohri

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धार्मिक आस्था का मूल आध्यात्म

धार्मिक आस्था का मूल अध्यात्म

सामान्य रूप से भारत में छः दर्शन प्रचलित हैं | इनमें एक वर्ग उन दर्शनों का है जो नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं | इनमें प्रमुख है चार्वाक सिद्धान्त | यह दर्शन केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है | ईश्वर की सत्ता नहीं मानता और शरीर को ही प्रमुख मानता है | आत्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करता | बौद्ध दर्शन प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण मानता है | विश्व के सभी पदार्थों को क्षणिक मानता है | यह भाव जगत के अन्तः स्वरूप और दृश्य स्वरूप दोनों को सत्य मानता है और यह भी स्वीकार करता है कि जगत की बाह्य और अन्तः सत्ता दोनों स्वतन्त्र हैं | जैन दर्शन कर्मवाद को प्रमुखता देता है, जगत को अनादि मानता है | सत् को उत्पत्ति और विनाश से रहित स्वीकार करता है | सम्यक् दर्शन, सम्यक् चरित्र और सम्यक् ज्ञान ही मोक्ष के साधन माने जाते हैं | ईश्वर की सत्ता और वेद की प्रामाणिकता को जैन और बौद्ध दोनों ही दर्शन स्वीकार नहीं करते |

दूसरा वर्ग आस्तिक दर्शनों का है | आस्तिक दर्शन ईश्वर की सत्ता स्वीकार करते हैं और वेद को प्रमाण मानते हैं | इनमें सर्वप्रथम वैशेषिक दर्शन है | यह ईश्वर और जीव को नित्य तत्व मानता है और वेद को ईश्वरीय वाणी स्वीकार करता है | न्याय दर्शन प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द को प्रमाण मानता है | शरीर और आत्मा को पृथक मानता है | वेद की प्रामाणिकता तथा ईश्वर के कर्तृत्व को स्वीकार करता है | सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष दो तत्वों को स्वीकार करता है | प्रकृति अचेतन है और पुरुष चेतन | प्रकृति और पुरुष के विवेक से निर्लिप्त स्वरूप का ज्ञान हो जाना ही मोक्ष का हेतु है | वेदों की प्रामाणिकता सांख्य को स्वीकार है | योग दर्शन सांख्य का ही सहयोगी दर्शन है | मीमाँसा कर्मकाण्ड का दर्शन है | इसका उद्देश्य ही शास्त्रों पर प्रबल निष्ठा उत्पन्न करके अधर्म की निवृत्ति तथा धर्म की प्रवृत्ति करना है | इन सबके अतिरिक्त द्वैतवाद और अद्वैतवाद आदि मान्यताएँ भी हैं | ये सब वैष्णव दर्शन कहे जाते हैं | शैव और वैष्णव दोनों दर्शन सविशेष ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं |

ये सभी दर्शन एकत्व में अनेकत्व और अनेकत्व में एकत्व का बोध कराते हैं | उपनिषदों और पुराणों के द्वारा वेदार्थ का विस्तार करके आचार्यों ने धर्म के व्यावहारिक एवं व्यापक रूप को व्यक्त करने का प्रयास किया है, और यही धार्मिक आस्था भारतीय जन मानस में व्याप्त है | आज हमारे समाज के मानस में पुराणों द्वारा प्रतिपादित आस्था व्याप्त है | हमारे जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जिस पर धार्मिकता का प्रभाव न हो | जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सोलह संस्कारों से सभी परिचित हैं | हमारे जन्म के समय गाए जाने वाले सोहर, विवाह के अवसर के घोड़ी बन्ने, पर्वों और उत्सवों पर गए जाने वाले गीत सभी में धार्मिक आस्था झलकती है | नृत्य, लोक गाथाएँ, लोक संगीत सभी पूर्णतः धार्मिकता से ओत प्रोत हैं | भारत के किसी भी प्रान्त के निवासी – चाहे वे आदिवासी हों या जनजातियाँ हों – सभी के मनों में धार्मिक आस्था समान रूप से विद्यमान है | देव पूजा, श्राद्ध, पितृ पूजा सभी को स्वीकार्य है | चाहे कश्मीर के अमरनाथ हों या गुजरात के रंगनाथ, उदयपुर के द्वारकाधीश हों, कच्छ के सोमनाथ हों अथवा मध्यप्रदेश के महाकाल, तमिल के तिरुपति बाला जी हों या केरल के गुरुवयूर हों अथवा तमिलनाडु के पद्मनाभ, उड़ीसा के जगन्नाथ, बिहार के वैद्यनाथ, बंगाल की महाकाली, नेपाल के पशुपतिनाथ हों अथवा काशी के विश्वनाथ, अयोध्या के राम हों या मथुरा के कृष्ण – सभी में सारे ही भारतवासियों की पूर्ण आस्था है | बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार और रामेश्वर सभी हम सबके लिये दिव्य तीर्थ हैं | शिव, विष्णु, दुर्गा, सरस्वती, सूर्य, गायत्री सभी के उपास्य हैं | सन्ध्या उपासना और ब्रह्म विद्या में सभी की आस्था है | शिष्टाचार, अभिवादन और आशीर्वाद सर्वत्र एक ही रूप में स्वीकृत है | हमारे व्रतोत्सव होली दिवाली विजयदशमी जन्माष्टमी शिवरात्रि दुर्गा पूजा गणेश पूजा सभी हमारे धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं | स्वर्ग नरक देवलोक प्रेतलोक आदि की मान्यताएँ सिद्ध करती हैं कि इस धार्मिक आस्था के कारण ही भारत एक है, अखण्ड है | गौ की महत्ता और मातृ भूमि के प्रति स्वर्ग से भी बढ़कर आदर हमारी धार्मिक आस्था के आधार हैं | आदि शंकराचार्य, निम्बकाचार्य, बल्लभाचार्य, रामानन्द, चैतन्य, रामदास, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, कबीर, नानक, सूर, तुलसी, मीरा तथा गार्गी मैत्रेयी जैसी विदुषियों आदि द्वारा स्थापित की हुई धार्मिक आस्था – जो पूर्ण रूप से भारत के समृद्ध दर्शन का प्रतिनिधित्व करती है – ही आज भारतीय जन मानस में व्याप्त है और सदा व्याप्त रहेगी | आज जो संघर्ष और विघटनकारी स्थितियाँ हैं वे केवल धार्मिक आस्था के अभाव के कारण ही हैं | यदि हम अपने इन धार्मिक आदर्शों का पालन करना आरम्भ कर दें तो वर्तमान की बहुत सी समस्याओं का समाधान हो सकता है | लेकिन इतना भी ध्यान अवश्य रहे कि धार्मिक आस्था किसी प्रकार के सतही रीति रिवाज़ों के साथ धन और पद का फूहड़ प्रदर्शन नहीं होती अपितु पूर्ण रूप से अध्यात्मपरक होती है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/12/03/spirituality-is-the-base-of-religious-beliefs/

ध्यान के आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान में बैठने के लिए आसन (Posture) :

बहुत सारे आसन हैं जिनमें आपकी रीढ़ सीढ़ी रहती है और आप आराम से सुविधाजनक स्थिति में अपनी टाँगों को किसी प्रकार से तोड़े मरोड़े बिना बैठे रह सकते हैं | वास्तव में ध्यान में हाथों अथवा पैरों पर ध्यान देने की अपेक्षा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आपकी रीढ़ सीधी हो | और इस आसन में बैठने के लिए सबसे सरल आसन है

मैत्री आसन :मैत्री आसन

इस आसन में आप किसी कुर्सी अथवा बेंच पर बैठ सकते हैं | आपके पैर फर्श पर सीधे रखे हों अथवा बेंच के ऊपर सुखासन में हों | इस आसन का प्रयोग कोई भी कर सकता है | यहाँ तक कि जिनके शरीर में लचीलापन नहीं होता अथवा जिन्हें भूमि पर बैठने में कठिनाई होती है वे लोग भी इस आसन में आराम से बैठ सकते हैं | इस आसन में बैठने से ध्यान के समय आपको किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नहीं होगा |

सुखासन : यदि आपके शरीर में लचीलापन है तो आप एक वैकल्पिक आसन – सुखासन – में बैठना चाहेंगे | इसमें आप दोनों टाँगों को एक दूसरे के आर पार मोड़कर बैठते हैं | अर्थात एक पैर दूसरे पैर के घुटने के नीचे ज़मीन पर टिका होता है और दूसरे पैर का घुटना उस पैर पर आराम से रखा होता है | एक मोटे तह किये हुए कम्बल पर बैठिये जिससे आपके घुटनों और टखनों पर अधिक दबाव न पड़ने पाए | आपके ध्यान का आसन अर्थात जिस आसन या स्थान पर आप बैठे हैं वह स्थिर हो, किन्तु न तो अधिक कठोर हो और न ही हिलने डुलने वाला हो | यह आसन अधिक ऊँचा भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे आपके शरीर की स्थिति में व्यवधान उत्पन्न होगा |

यदि आपकी टाँगों में लचीलापन नहीं है अथवा जाँघ की माँसपेशियों में तनाव है तो आप देखेंगे कि आपके घुटने सुखासनज़मीन पर टिक नहीं पाते | इस स्थिति में कूल्हों के नीचे एक और कुशन अथवा तह किया हुआ एक और कम्बल लगा सकते हैं जिससे आपको बैठने में सहायता मिलेगी | आसन में बैठने से पहले यदि शरीर को खिंचाव देने वाले सरल से अभ्यास (Stretch Exercises) कर लिए जाएँ तो शरीर में लचीलापन बढाने में सहायता मिलती है जिससे आप और अधिक सुविधापूर्वक ध्यान के लिए बैठ सकते हैं | जिस भी आसन का आप चयन करें उसका नियमित रूप से अभ्यास कीजिए और उसे जल्दी जल्दी बदलने का प्रयास मत कीजिए | यदि आप नियमित रूप से एक ही आसन में बैठने का अभ्यास करते हैं तो हीरे धीरे वह आसन आपके लिए स्थिर और अधिक सुविधाजनक हो जाएगा |

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गीता – कर्मयोग – कर्म की तीन संज्ञाएँ

गीता के जीवन-दर्शन के अनुसार मनुष्य बहुत महान है और असीम शक्ति का भण्डार है | वास्तव में गीता एक ऐसा पवित्र ग्रंथ है जो मनुष्य को सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है | मृत्यु के संभावित भय को दूर कर हमें कर्तव्यपरायण होने की शिक्षा देता है | मनुष्य को बताता है कि बिना फल की चिन्ता के किया गया कर्म सर्वश्रेष्ठ होता है | कर्म की सविस्तार चर्चा करते हुए गीता में कहा गया है “कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं न विकर्मण:, अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: |” (4/17) – कर्म की गति गहन है | “करमन की गति न्यारी |”

कर्म, अकर्म और विकर्म का परिपाक करके ही विचार करना चाहिये | याज्ञवल्क्य तथा अन्य स्मृतिकारों ने तो मानवता के पतन का करण ही यह बताया है कि यदि मनुष्य विधि नियम रूप से प्रतिपादित कर्मों का त्याग तथा निषिद्ध कर्मों की उपादेयता अर्थात इन्द्रियों को अनुशासित सीमा के अतिरिक्त प्रवाहित होने देगा तो मानवता का पतन निश्चित है “विहितस्यानुष्ठानात् निन्दितस्य च सेवनात् अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणाम् नरः पतनमृच्छति |”

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि कौन से कर्म कर्तव्य हैं और कौन से अकर्तव्य ? तथा मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है अथवा परतन्त्र ? और क्या भोग के बिना कर्मों का नाश और मुक्ति सम्भव है ? यद्यपि कर्म के रहस्य को समझने में बुद्धिमान पुरुषों की बुद्धि भी चकरा जाती है “किं कर्म किमकर्मेति कवयोSप्यत्र मोहिता: |” तथापि गीता में इसका अत्यन्त युक्तियुक्त वर्णन उपलब्ध होता है | गीता का तृतीय अध्याय तो कर्मयोग के नाम से ही जाना जाता है, किन्तु अन्य अनेकों स्थानों पर भी कर्म की चर्चा आई है, जो भक्तिमिश्रित है |

कर्म की तीन संज्ञाएँ बताई गई हैं – कर्म, अकर्म और विकर्म | इनमें पहली संज्ञा है कर्म | मन वाणी और शरीर से होने वाली विधिसंगत उत्तम क्रिया ही कर्म है | किन्तु ऐसी क्रिया भी कर्ता के भावों की भिन्नता के कारण अकर्म या विकर्म बन जाती है | जैसे फल की इच्छा से शुद्ध भावनापूर्वक जो यज्ञ तप दान सेवा आदि विधिसंगत उत्तम कर्म किया जाता है वह कर्म होता है | किन्तु यदि उन्हीं विधेय कर्मों के फल की कामना के रूप में अशुद्ध भावना है तो वह कर्म विधेय होते हुए भी उसमें तमोगुण आ जाने के कारण विकर्म बन जाता है “मूढ़ग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः, परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् |” (17/19)

इसी प्रकार आसक्तिरहित भगवदर्पण बुद्धि से अपना कर्तव्य समझ कर जो कर्म किया जाता है, कर्तापन के अभिमान से रहित होकर जो कर्म किया जाता है वह अकर्म हो जाता है “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्, यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् | शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:, सन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ||” (9/27,28) इस प्रकार के भावार्थयुक्त अनेकों कथन गीता में यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं |

दूसरे प्रकार के कर्म विकर्म कहलाते हैं | ये कर्म निषिद्ध होने के कारण दुःखदायी होते हैं | ये कर्म निन्दित होते हुए भी यदि शुद्ध फल की कामना से किये जाएँ तो कर्म बन जाते हैं “जातस्य हि ध्रुवोर्मृत्यु: ध्रुवं जन्म मृतस्य च, तस्मादपरिहार्येSर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि |” (2/27) जैसे कि हिंसा निषिद्ध कर्म है, किन्तु लोककल्याणार्थ यदि किसी आतंकी का वध करना पड़ जाए तो उसमें लोककल्याण की शुद्ध भावना निहित होने के कारण वह विकर्म भी कर्म की श्रेणी में आ जाता है | इसी प्रकार आसक्ति और अहंकार से रहित होकर शुद्ध भाव से किये गए विकर्म भी अकर्म हो जाते हैं “सुखसु:खे समं कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ, ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि |” (2/38) तथा “यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते, हत्वापि सा इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते |” (18/17)

कर्मों की तीसरी संज्ञा है अकर्म | जो कर्म या कर्मत्याग किसी फल की उत्पत्ति का कारण न हो वह अकर्म हो जाता है “प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्, आत्मान्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते || दु:खेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्प्रह:, वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते || यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्, नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||” (2/55-57)

कर्ता के भावानुसार कर्म और विकर्म की भाँति अकर्म भी कर्म या विकर्म हो जाता है | यदि किसी व्यक्ति को कर्म त्यागने के पश्चात यह अभिमान आ जाए कि उसने तो कर्मों का त्याग किया है तो यह “त्यागरूप” कर्म हो जाएगा | इसी प्रकार स्वार्थ के कारण या दूसरों को ठगने के लिये कर्मत्याग विकर्म हो जाता है | “कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्, इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ||” (3/6) तथा “नियतस्य तु सन्यास: कर्मणो नोपपद्यते, मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तिते | दु:खमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन, स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ||” (18/7,8)

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करवाचौथ – करक चतुर्थी

करवाचौथ व्रत

हम सभी परिचित हैं कि भारत के उत्तरी और पश्चिमी अंचलों में कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को करवाचौथ व्रत अथवा करक चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है | इस वर्ष गुरुवार 17 अक्तूबर को पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना से महिलाएँ करवाचौथ के व्रत का पालन करेंगी | करवाचौथ के व्रत का पारायण उस समय किया जाता है जब चन्द्रदर्शन के समय चतुर्थी तिथि रहे | इसीलिए यदि प्रातःकाल से चतुर्थी तिथि नहीं भी हो तो प्रायः तृतीया में व्रत रखकर तृतीया-चतुर्थी के सन्धिकाल – प्रदोष काल – में पूजा अर्चना का विधान है | कुछ स्थानों पर निशीथ काल – मध्य रात्रि – में भी करवा चौथ की पूजा अर्चना की जाती है | इस अवसर पर अन्य देवी देवताओं के साथ शिव परिवार की पूजा अर्चना की जाती है | इस वर्ष सौभाग्य से 17 तारीख को प्रातः 6:48 से लेकर 18 तारीख को 7:29 तक चतुर्थी तिथि ही रहेगी | भारत के विभिन्न भागों में 17 तारीख को रात्रि 7:41 से 8:19 के मध्य चन्द्रमा का उदय होने की सम्भावना | दिल्ली में आठ बजकर सोलह मिनट पर चन्दोदय होगा | पूजा का मुहूर्त सायंकाल 5:50 से 6:59 तक है |

ऐसी मान्यता है कि सती ने अपने पति शिव के अपमान का बदला लेने के लिए अपने पिता दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने हेतु उनके यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया था | उसके बाद वे महाराज हिमालय की पुत्री के रूप में उनकी पत्नी मैना के गर्भ से पार्वती के रूप में उत्पन्न हुईं | उस समय भगवान शंकर को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए बहुत से अन्य उपवासों के साथ इस व्रत का भी पालन किया था | अतः यह व्रत और इसकी पूजा शिव-पार्वती को समर्पित होती है |

करवाचौथ एक आँचलिक पर्व है और उन अंचलों में इसके सम्बन्ध में बहुत सी कथाएँ प्रचलित हैं, व्रत के दौरान जिनका श्रवण सौभाग्यवती महिलाएँ करती हैं | उन सबमें महाभारत की एक कथा हमें विशेष रूप से आकर्षित करती है | इसके अनुसार अर्जुन शक्तिशाली अस्त्र प्राप्त करने के उद्देश्य से पर्वतों में तपस्या करने चले गए और बहुत समय तक वापस नहीं लौटे | द्रौपदी इस बात से बहुत चिन्तित थीं | तब भगवान कृष्ण ने उन्हें पार्वती के व्रत की कथा सुनाकर कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी थी |

करवाचौथ का पालन उत्तर भारत में प्रायः सभी विवाहित हिन्दू महिलाएँ चिर सौभाग्य की कामना से करती हैं और करवाचौथजिसमें पार्वती तथा गणेश की पूजा का विधान है | इस व्रत को पार्वती की तपस्या का प्रतीक भी माना जाता है | कुछ स्थानों पर उन लड़कियों से भी यह व्रत कराया जाता है जो विवाह योग्य होती हैं अथवा जिनका विवाह तय हो चुका है | यह व्रत पारिवारिक परम्पराओं तथा स्थानीय रीति रिवाज़ के अनुसार किया जाता है | व्रत की कहानियाँ भी अलग अलग हैं | लेकिन कहानी कोई भी हो, एक बात हर कहानी में समान है कि बहन को व्रत में भूखा प्यासा देख भाइयों ने नकली चाँद दिखाकर बहन को व्रत का पारायण करा दिया, जिसके फलस्वरूप उसके पति के साथ अशुभ घटना घट गई |

कथा एक लोक कथा ही है | किन्तु इस लोक कथा में इस विशेष दुर्घटना का चित्र खींचकर एक बात पर विशेष रूप से बल दिया गया है कि जिस दिन व्यक्ति नियम संयम और धैर्य का पालन करना छोड़ देगा उसी दिन से उसके कार्यों में बाधा पड़नी आरम्भ हो जाएगी | नियमों का धैर्य के साथ पालन करते हुए यदि कार्यरत रहे तो समय अनुकूल बना रह सकता है |

हम सभी नियम संयम की डोर को मज़बूती से थामे हुए सोच विचार कर हर कार्य करते हुए आगे बढ़ते रहें, इसी कामना के साथ सभी महिलाओं को करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/15/karvachauth-vrat/

 

नवरात्र और कन्या पूजन

नवरात्र और कन्या पूजन

शारदीय नवरात्र हों या चैत्र नवरात्र – माँ भगवती को उनके नौ रूपों के साथ आमन्त्रित करके उन्हें स्थापित किया जाता है और फिर कन्या अथवा कुमारी पूजन के साथ उन्हें विदा किया जाता है | कन्या पूजन किये बिना नवरात्रों की पूजा अधूरी मानी जाती है | प्रायः अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन का विधान है | देवी भागवत महापुराण के अनुसार दो वर्ष से दस वर्ष की आयु की कन्याओं का पूजन किया जाना चाहिए | आज प्रातः नौ बजकर पावन मिनट से कल प्रातः दस बजकर पचपन मिनट तक अष्टमी तिथि रहेगी | उदय काल में अष्टमी तिथि कल होने के कारण अष्टमी पूजन कल किया जाएगा | इसके बाद सात अक्तूबर को दिन में बारह बजकर अड़तीस मिनट तक नवमी तिथि रहेगी, इस प्रकार नवमी का कन्या पूजन सात अक्तूबर को होगा | प्रस्तुत हैं कन्या पूजन के लिए कुछ मन्त्र…

दो वर्ष की आयु की कन्या – कुमारी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कौमार्यै नमः

जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरूपिणी |

पूजां गृहाण कौमारी, जगन्मातर्नमोSस्तुते ||

तीन वर्ष की आयु की कन्या – त्रिमूर्ति

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं त्रिमूर्तये नम:

त्रिपुरां त्रिपुराधारां त्रिवर्षां ज्ञानरूपिणीम् |

त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम् ||

चार वर्ष की कन्या – कल्याणी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कल्याण्यै नम:
कालात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम् |

कल्याणजननीं देवीं कल्याणीं पूजयाम्यहम् ||

पाँच वर्ष की कन्या – रोहिणी पूजन

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं रोहिण्यै नम:
अणिमादिगुणाधारां अकराद्यक्षरात्मिकाम् |

अनन्तशक्तिकां लक्ष्मीं रोहिणीं पूजयाम्यहम् ||
छह वर्ष की कन्या – कालिका  

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालिकायै नम:

कामाचारीं शुभां कान्तां कालचक्रस्वरूपिणीम् |

कामदां करुणोदारां कालिकां पूजयाम्यहम् ||

सात वर्ष की कन्या – चण्डिका

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं चण्डिकायै नम:

चण्डवीरां चण्डमायां चण्डमुण्डप्रभंजिनीम् |

पूजयामि सदा देवीं चण्डिकां चण्डविक्रमाम् ||

आठ वर्ष की कन्या – शाम्भवी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं शाम्भवीं नम:

सदानन्दकरीं शान्तां सर्वदेवनमस्कृताम् |

सर्वभूतात्मिकां लक्ष्मीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम् ||

नौ वर्ष की कन्या – दुर्गा

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं दुर्गायै नम:

दुर्गमे दुस्तरे कार्ये भवदुःखविनाशिनीम् |

पूजयामि सदा भक्त्या दुर्गां दुर्गार्तिनाशिनीम् ||

दस वर्ष की कन्या – सुभद्रा

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं सुभद्रायै नम:

सुभद्राणि च भक्तानां कुरुते पूजिता सदा |

सुभद्रजननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम् ||

|| एतै: मन्त्रै: पुराणोक्तै: तां तां कन्यां समर्चयेत ||

इन नौ कन्याओं को नवदुर्गा की साक्षात प्रतिमूर्ति माना जाता है | इनकी मन्त्रों के द्वारा पूजा करके भोजन कराके उपहार दक्षिणा आदि देकर इन्हें विदा किया जाता है तभी नवरात्रों में देवी की उपासना पूर्ण मानी जाती है | साथ में एक बालक की पूजा भी की जाती है और उसे भैरव का स्वरूप माना जाता है, और इसके लिए मन्त्र है : “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ते नम:” |

हमारी अपनी मान्यता है कि सभी बच्चे भैरव अर्थात ईश्वर का स्वरूप होते हैं और सभी बच्चियाँ माँ भगवती का स्वरूप होती हैं, क्योंकि बच्चों में किसी भी प्रकार के छल कपट आदि का सर्वथा अभाव होता है | यही कारण है कि “जब कोई शिशु भोली आँखों मुझको लखता, वह सकल चराचर का साथी लगता मुझको |”

अतः कन्या पूजन के दिन जितने अधिक से अधिक बच्चों को भोजन कराया जा सके उतना ही पुण्य लाभ होगा | साथ ही कन्या पूजन तभी सार्थक होगा जब संसार की हर कन्या शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक-सामाजिक-आर्थिक हर स्तर पर पूर्णतः स्वस्थ और सशक्त होगी और उसे पूर्ण सम्मान प्राप्त होगा |

कन्या पूजन के साथ हर्षोल्लासपूर्वक अगले नवरात्रों में आने का निमन्त्रण देते हुए माँ भगवती को विदा करें, इस कामना के साथ कि माँ भगवती अपने सभी रूपों में जगत का कल्याण करें…

यातु देवी त्वां पूजामादाय मामकीयम् |

इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/05/navaraatri-and-kanya-pujan/

 

अष्टमं महागौरी

अष्टमं महागौरी

नवदुर्गा – अष्टम नवरात्र – देवी के महागौरी रूप की उपासना

या श्री: स्वयं सुकृतीनाम् भवनेषु अलक्ष्मी:, पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि: |

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा, तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ||

देवी का आठवाँ रूप है महागौरी का | माना जाता है कि महान तपस्या करके इन्होने अत्यन्त गौरवर्ण प्राप्त किया था | ऐसी मान्यता है कि दक्ष के यज्ञ में सती के आत्मदाह के बाद जब पार्वती के रूप में उन्होंने जन्म लिया तब नारद के कहे अनुसार उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया जिसके कारण पार्वती का रंग काला और शरीर क्षीण हो गया | तब शिव ने पार्वती को गंगाजल से स्नान कराया जिसके कारण इनका वर्ण अत्यन्त गौर हो गया और इन्हें महागौरी कहा जाने लगा |

इस रूप में भी चार हाथ हैं और माना जाता है इस रूप में ये एक बैल अथवा श्वेत हाथी पर सवार रहती हैं | इनके वस्त्राभूषण श्वेत हैं और ये वृषभ पर सवार हैं – श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना – श्वेत वस्त्राभूषण धारण करने के कारण भी इन्हें महागौरी भी कहा जाता है और श्वेताम्बरी भी कहा जाता है | इनके दो हाथों में त्रिशूल और डमरू हैं तथा दो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं | यह देवी अत्यन्त सात्विक रूप है | वृषभ पर सवार होने के कारण इनका एक नाम वृषारूढ़ा भी है | अत्यन्त गौर वर्ण होने के कारण इनकी उपमा कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमा से भी दी जाती है |

माँ गौरी की उपासना का मन्त्र है:

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि: | महागौरी शुभं दधान्महादेवप्रमोददा ||

इसके अतिरिक्त श्रीं क्लीं ह्रीं वरदायै नमः” इस बीज मन्त्र के जाप के साथ भी देवी के इस रूप की उपासना की जा सकती है |

इसके अतिरिक्त कात्यायनी देवी की ही भाँति महागौरी की उपासना भी विवाह की बाधाओं को दूर करके योग्य जीवन साथी के चुनाव में सहायता करती है | महागौरी की उपासना से व्यक्ति को मिलन विकारों से मुक्ति प्राप्त होती है | माना जाता है कि सीता जी ने भी भगवान् राम को वर प्राप्त करने के लिए महागौरी की उपासना की थी |

जो Astrologers नवदुर्गा को नवग्रहों के साथ सम्बद्ध करते हैं उनका मानना है कि राहु के दुष्प्रभाव के शमन के लिए महागौरी की उपासना की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होगा |

महागौरी के रूप में माँ भगवती सभी का कल्याण करें और सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम् |

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम

पूर्णन्दुनिभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम् |

वराभीतिकरां त्रिशूलडमरूधरां महागौरी भजेम् ||

पट्टाम्बरपरिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणीरत्नकुण्डलमण्डिताम् ||

प्रफुल्लवदनां पल्ल्वाधरां कातंकपोलां त्रैलोक्य मोहनम् |

कमनीया लावण्यां मृणालचन्दनगन्धलिप्ताम् ||

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकटहन्त्री त्वंहि धनैश्वर्यप्रदायनीम् |

ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

सुखशान्तिदात्री धनधान्यप्रदीयनीम् |

डमरूवाद्यप्रिया आद्या महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रयहारिणीम् |

वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

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सप्तमं कालरात्रि

सप्तम कालरात्रि

नवदुर्गा – सप्तम नवरात्र – देवी के कालरात्रि रूप की उपासना

त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं समरमूर्धनि तेSपि हत्वा ।

नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तमस्माकमुन्मदसुरारि भवन्न्मस्ते ।।

देवी का सातवाँ रूप कालरात्रि है | सबका अन्त करने वाले काल की भी रात्रि अर्थात् विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि है | इस रूप में इनके चार हाथ हैं और ये गधे पर सवार दिखाई देती हैं | इनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और पाश दिखाई देते हैं | एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | इस रूप में इनका वर्ण श्याम है तथा ये प्रतिकार अथवा क्रोध की मुद्रा में दिखाई देती हैं | श्यामवर्णा होने के कारण भी इन्हें कालरात्रि कहा जाता है | इस मुद्रा में इनका भाव अत्यन्त कठोर तथा उत्तेजित दिखाई देता है | देवी का यह आक्रामक तथा नकारात्मक रूप है |

कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ||

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी ।।

दैत्यों के बढ़ते आतंक को देख देवी का मुख क्रोध से काला पड़ गया था और अत्यन्त भयानक मुद्रा हो गई थी | देवी के इसी रूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है |

ततः कोपं चकारोच्चै: अम्बिका तानरीन् प्रति, कोपेन चास्या वदनमसीवर्णमभूत्तदा ||

दैत्य शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था । इससे चिंतित होकर सभी देवतागण शिव जी के पास गए । शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने की प्रार्थना की । शिव जी की बात मानकर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया तथा शुम्भ-निशुम्भ का वध कर दिया । लेकिन जैसे ही देवी रक्तबीज का वध करने को उद्यत हुईं तो उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न होते चले गए । इसे देख देवी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया, जिसने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया ।

क्लीं ऐं श्रीं कालिकायै नमः” कालरात्रि का बीज मन्त्र है और इस मन्त्र के जाप के द्वारा इनकी उपासना करने से ये प्रसन्न होती हैं |

इनकी पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें शुभंकारी भी कहते हैं । यह रूप इस कटु सत्य का द्योतक भी है कि जीवन सदा आह्लादमय और सकारात्मक ही नहीं होता | जीवन का एक दूसरा पक्ष भी होता है जो दुष्टतापूर्ण, निन्दनीय, अन्धकारमय अथवा नकारात्मक भी हो सकता है | आज जिस तरह से रक्तबीज की भाँति अनगिनत आतंकी उत्पन्न होते जा रहे हैं उनके विनाश के लिए तो कालरात्रि के ही रूप की आवश्यकता है | क्योंकि दुष्ट का संहार दुष्टता से ही किया जा सकता है |

सम्भवतः इनके रूप के कारण ही कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि भगवती का यह रूप शनि का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही शनि की ही भाँति प्रसन्न हो जाएँ तो “शुभंकरी” हो जाती हैं, अतः शनि की उपासना कालरात्रि की उपासना के रूप में भी की जा सकती है…

माँ भगवती देवी कालरात्रि के इस रूप में हम सबके जीवन से नकारात्मकता और अज्ञान के अन्धकार का नाश करके सकारात्मकता और ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित करें…

ध्यान

करालवदनां घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम् |

कालरात्रिं करालिकां दिव्यां विद्युतमालाविभूषिताम ||

दिव्यं लौहवज्रखड्गवामोघोर्ध्वकराम्बुजाम् |

अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम ||

महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा |

घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम् ||

सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम् |

एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृद्धिदाम् ||

स्तोत्र पाठ

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती |

कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता ||

कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी |

कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी ||

क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी |

कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा ||

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गुरु की आवश्यकता किसलिए

गुरु की आवश्यकता क्यों

अज्ञान्तिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः

मैं आजकल अपने ब्लॉग पर अपने योग गुरु हिमालयन योग परम्परा के स्वामी वेदभारती जी की पुस्तक “Meditation and it’s practices” का हिन्दी अनुवाद – जो स्वयं स्वामी जी ने मुझ पर कृपा करके मुझसे कराया था – की श्रृंखला पोस्ट कर रही हूँ | लोग पढ़ते हैं और कई बार कुछ विचित्र किन्तु तर्कसंगत प्रश्न भी पूछ बैठते हैं | इसी क्रम में अभी कुछ इन पूर्व एक मित्र ने मुझसे पूछा “पूर्णिमा जी, गुरु मन्त्र क्या होता है और इसकी क्या आवश्यकता होती ही… हम तो इन साधु सन्यासियों में बिल्कुल विश्वास नहीं करते…” उनका प्रश्न और उनका विचार एकदम तर्कसंगत था | लेकिन “साधु सन्यासियों” और “गुरु” में वास्तव में बहुत अन्तर होता है – ऐसी मेरी मान्यता है |

हम सभी को जीवन में आगे बढ़ने के लिए किसी न किसी के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है – यदि ऐसा न होता तो क्यों भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बनकर उन्हें गीता का उपदेश देते | चाहे व्यावहारिक जीवन हो, व्यवसाय हो, धर्म का मार्ग हो या अध्यात्म का – गुरु की आवश्यकता पग पग पर अनुभव होती है | कहते है माँ सन्तान की सर्वप्रथम गुरु होती है | जो सत्य भी है | माँ के गर्भ में पलते हुए ही शिशु को माता के संस्कारों, भावनाओं और व्यवहार के माध्यम से बहुत से संस्कारों का, भावनाओं का ज्ञान होता जाता है और गर्भ से बाहर आकर जब वह व्यवहार करता है तो उसमें उसकी माता के लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं | और यदि माता के गर्भ के दौरान पिता का भी अधिक साहचर्य प्राप्त होता है तब तो सोने पे सुहागा वाली स्थिति हो जाती है – माता पिता दोनों के व्यवहार, ज्ञान, भावनाओं और संस्कारों का लाभ शिशु को गर्भ में ही हो जाता है । अभिमन्यु की कथा सर्वविदित ही है | और अब तो विज्ञान ने भी इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है | इसीलिए माता पिता और सगे सम्बन्धियों को महिला की गर्भावस्था के समय में उचित नैतिक तथा हर्षोल्लासपूर्ण व्यवहार करने तथा वैसा ही वातावरण बनाए रखने की सलाह दी जाती है |

इस प्रकार माता सबसे प्रथम गुरु होती है और उसके बाद पिता तथा बाद में परिवार के अन्य सदस्य बालक के गुरु प्रथम गुरु जननी जनक युगलकी भूमिका में आते हैं | बालक का चरित्र तथा मान्यताओं का निर्माण वास्तव में गर्भ से ही आरम्भ हो जाता है | ये तो शिक्षा का एक पक्ष हुआ – जो जीवित रहने के लिए, समाज में विचरण करने के लिए, सामाजिक धार्मिक व्यवहार और व्यवसाय की दिशा प्रकाशित करता है |

शिक्षा का दूसरा और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष है व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास | इस प्रक्रिया में निश्चित रूप से एक योग्य और अनुभवी गुरु की आवश्यकता होती है | हम कह सकते हैं कि अपने गुरु हम स्वयं हैं – हमारी अन्तरात्मा – उसे हमारे विषय में सब कुछ ज्ञात है इसलिए वही हमारी सबसे उपयुक्त मार्गदर्शक हो सकती है | बिल्कुल हो सकती है, किन्तु इसके लिए आत्मा को इस योग्य बनाने की आवश्यकता होती है | और जब वह इस योग्य हो जाती है तो वही परमात्मा कहलाती है | और जिस दिन परमात्मा के साथ – हमारी अपनी आत्मा के साथ हमारा साक्षात्कार हो गया वही स्थिति परम ज्ञान की, समाधि की, मोक्ष की, निर्वाण की स्थिति कहलाती है | किन्तु आत्मा को इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए एक लम्बी यात्रा करनी पड़ती है | इस यात्रा में सफलता प्राप्त करने के लिए निश्चित रूप से एक योग्य गुरु की आवश्यकता होती है |

अभी हमारी आत्मा हमारे शरीर के साथ लिप्त है समस्त प्रकार की सांसारिक गतिविधियों में | इस सबसे निर्लिप्त कैसे हुआ जाए कि लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग सरल हो जाए ? कैसे मात्र द्रष्टा बनकर समस्त कर्म किये जाएँ ? यही कार्य तो कठिन है | जब तक हमारी अन्तरात्मा स्वयं इस दिशा में जागृत नहीं होगी तब तक वह हमारा मार्गदर्शन भी कैसे कर सकेगी ? और यहीं आवश्यकता अनुभव होती है ध्यान के अभ्यास की | ध्यान का अभ्यास भी बड़ा कठिन कार्य है | क्योंकि अश्व की गति से भी अधिक चंचल मन कभी स्थिर हो ही नहीं पाता | इसके लिए या तो कोई बाह्य वास्तु ग्रहण की जाए – जैसे किसी अपने इष्ट देवता के चित्र को स्थिर भाव से निहारते रहे | लेकिन इससे अपने भीतर कैसे उतरा जाएगा ? यह तो बाह्य क्रिया हो गई | इसी कारण से मन्त्र का सुझाव ध्यान के साधकों को दिया जाता है | इसी मन्त्र को प्रदान करने के लिए एक अनुभवी और योग्य गुरु की आवश्यकता होती है – जो हमारी चित्तवृत्ति और अध्यात्म मार्ग में प्रवृत्त होने की हमारी इच्छाशक्ति को ध्यान में रखते हुए हमें अनुकूल मन्त्र का ज्ञान करा सके – हमारा सारथि बनकर हमें उचित मार्ग पर अग्रसर कर सके |

यहाँ यह भी समझ लेना आवश्यक है कि गुरु के द्वारा मन्त्र प्रदान किया जाना कोई धार्मिक अथवा सामाजिक क्रिया या आयोजन नहीं होता, और न ही किसी प्रकार का कोई बाह्य आडम्बर होता है | अतः योग्य गुरु का चयन भी स्वयं ही सावधानीपूर्वक करना होता है – जिसमें किसी भी प्रकार का कोई लालच आदि न हो | यों आजकल तो गुरुओं की बाढ़ सी आई हुई है जो अपने आपको “स्प्रिचुअल गुरु” कहलाने में बहुत गर्व का अनुभव करते हैं | ऐसे गुरुओं से बचने की आवश्यकता है | क्योंकि वास्तव में जो गुरु होगा उसका उद्देश्य कभी भी अपना प्रचार प्रसार नहीं होगा | प्रचार प्रसार की आवश्यकता धर्म के लिए हो सकती है, किन्तु अध्यात्म के लिए नहीं – क्योंकि अध्यात्म की यात्रा तो होती ही अपने भीतर से आरम्भ है…

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