आषाढ़ गुप्त नवरात्र

कल आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ीय गुप्त नवरात्रों का भी आरम्भ हो रहा है | देश के लगभग सभी प्रान्तों में वर्ष में दो बार माँ भगवती की उपासना के लिए नौ दिनों तक नवरात्रों का अयोजन किया जाता है – एक चैत्र माह में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल नवमी तक – जिन्हें वासन्तिक अथवा साम्वत्सरिक नवरात्र कहा जाता है | दूसरे शरद ऋतु में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक चलते हैं – जिन्हें शारदीय नवरात्र कहा जाता है | किन्तु इनके अतिरिक्त भी वर्ष में दो बार नवरात्रों का आयोजन किया जाता है – आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ शुक्ल नवमी तक तथा माघ शुक्ल प्रतिपदा से माघ शुक्ल नवमी तक | इन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है – आषाढ़ीय गुप्त नवरात्र और माघ गुप्त नवरात्र | इन नवरात्रों में भी साम्वत्सरिक और शारदीय नवरात्रों की ही भाँति माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जाती है |

गुप्त नवरात्रों का तान्त्रिक उपासकों के लिए विशेष महत्त्व है | तान्त्रिक लोग इन दिनों विशेष सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए शुक्ल दशमी तक दश महाविद्याओं की गुप्त रूप से उपासना करते हैं | सम्भवतः इसीलिए इन्हें “गुप्त नवरात्र” कहा जाता है, और सम्भवतः इसीलिए इस समय पूजा अर्चना की इतनी धूम और चहल पहल नहीं होती | गुप्त नवरात्रों के विषय में विस्तृत विवरण तथा कथाएँ विशेष रूप से देवी भागवत महापुराण में उपलब्ध होती हैं |

इस वर्ष कल यानी 13 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से गुप्त नवरात्रों का आरम्भ हो रहा है और 21 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल नवमी को इनका समापन हो जाएगा | कल सूर्योदय काल से लेकर 08:17 तक आषाढ़ अमावस्या है और उसके बाद आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा आ जाएगी, जो अगले दिन यानी 14 जुलाई को सूर्योदय से पूर्व चार बजकर बत्तीस मिनट तक रहेगी | इस प्रकार प्रतिपदा का क्षय भी हो रहा है, किन्तु घट स्थापना कल ही होगी और इसके लिए शुभ मुहूर्त है सिंह लग्न में प्रातः 08:17 से 10:31 तक | यदि इस समय घट स्थापना नहीं की जा सकती है तो फिर अभिजित मुहूर्त में 11:59 से 12:54 के मध्य घट स्थापना कर लेनी चाहिए | पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें…

गुप्त नवरात्रों में माँ भगवती सभी की मनोकामना पूर्ण करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/12/aashaadha-gupta-navratri/

 

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शुक्र का सिंह में गोचर

आज आषाढ़ कृष्ण सप्तमी को विष्टि करण और सौभाग्य योग में 26:25 (अर्द्धरात्र्योत्तर दो बजकर पच्चीस मिनट) के लगभग समस्त सांसारिक सुख, समृद्धि, विवाह, परिवार सुख, कला, शिल्प, सौन्दर्य, बौद्धिकता, राजनीति तथा समाज में मान प्रतिष्ठा में वृद्धि आदि के कारक शुक्र का अपने शत्रु ग्रह सूर्य की सिंह राशि में प्रस्थान होगा | इस प्रस्थान के समय शुक्र मघा नक्षत्र में होगा | यहाँ पाँच जुलाई को सिंह राशि में प्रविष्ट हो जाएगा | इस बीच 17 जुलाई  को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में तथा 29 जुलाई को उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में भ्रमण करता हुआ अन्त में एक अगस्त को 12:27 के लगभग कन्या राशि में प्रस्थान कर जाएगा | मघा नक्षत्र का स्वामी केतु है, पूर्वा फाल्गुनी का स्वामी स्वयं शुक्र ही है और उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र का स्वामी सूर्य है | आइये जानने का प्रयास करते हैं कि प्रत्येक राशि के लिए शुक्र के सिंह में गोचर के सम्भावित परिणाम क्या रह सकते हैं…

मेष : शुक्र आपका द्वितीयेश और सप्तमेश होकर आपके पंचम भाव में गोचर कर रहा है | पारिवारिक तथा आर्थिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | परिवार में माँगलिक आयोजनों की सम्भावना है | Romantically कहीं Involve हैं तो सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आने के साथ ही यह सम्बन्ध विवाह में भी परिणत हो सकता है | किन्तु यदि विवाहित हैं तो किसी भी बहस से बचने के लिए अपने Temperament को नियन्त्रित रखने की भी आवश्यकता है | आपकी सन्तान के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है |

वृषभ : आपका राश्यधिपति तथा षष्ठेश होकर शुक्र आपके चतुर्थ भाव में गोचर कर रहा है | उत्साह में वृद्धि का समय प्रतीत होता है | आप कोई नया वाहन अथवा घर खरीदने की योजना बना सकते हैं | घर को Renovate भी करा सकते हैं | किन्तु परिवार में किसी प्रकार के तनाव की भी समभावना है | महिलाओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

मिथुन : आपका पंचमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से तीसरे भाव में हो रहा है | आपके तथा आपकी सन्तान की विदेश यात्राओं में भी वृद्धि हो सकती है | आपकी सन्तान उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए यदि कलाकार है तो कला के प्रदर्शन के लिए बाहर जा सकती है | यदि आपका कोई भाई अथवा बहन कहीं दूसरे देश अथवा शहर में हैं तो वापस आ सकते हैं |

कर्क : आपका चतुर्थेश और एकादशेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से दूसरे भाव में हो रहा है | किसी महिला मित्र के माध्यम से आपको नवीन प्रोजेक्ट्स मिलने तथा अर्थलाभ की सम्भावना है | आपका व्यवसाय प्रॉपर्टी अथवा वाहन आदि की ख़रीद फ़रोख्त से सम्बन्धित है, अथवा आप कलाकार हैं तो आपके कार्य में उन्नति की सम्भावना है | नया घर अथवा नया वाहन भी खरीद सकते हैं | आपकी वाणी तथा व्यक्तित्व में निखार आने के साथ ही आपको किसी प्रकार का पुरूस्कार आदि भी प्राप्त हो सकता है |

सिंह : आपका तृतीयेश और दशमेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि में ही हो रहा है | यदि आप दस्कार हैं, कलाकार हैं अथवा सौन्दर्य प्रसाधनों से सम्बन्धित कोई कार्य आपका है, या मीडिया से किसी प्रकार सम्बद्ध हैं तो आपके कार्य की प्रशंसा के साथ ही आपको कुछ नए प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त होने की सम्भावना है | इन प्रोजेक्ट्स के कारण आप बहुत दीर्घ समय तक व्यस्त रह सकते हैं तथा अर्थ लाभ कर सकते हैं |

कन्या : आपका द्वितीयेश और भाग्येश होकर शुक्र आपकी राशि से बारहवें भाव में गोचर कर रहा है | आर्थिक रूप से स्थिति में दृढ़ता आने के साथ ही आपके लिए कार्य से सम्बन्धित लम्बी विदेश यात्राओं के योग भी प्रतीत होते हैं | आपको महिला मित्रों के माध्यम से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आप बहुत समय तक व्यस्त रह सकते हैं | साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि में वृद्धि हो सकती है |

तुला : लग्नेश और अष्टमेश होकर शुक्र आपकी राशि से लाभ स्थान में गोचर कर रहा है | कार्य क्षेत्र में अप्रत्याशित रूप से लाभ की सम्भावना है | आपको अचानक किसी ऐसे स्थान से कार्य का निमन्त्रण प्राप्त हो सकता है जिसके विषय में आपने कल्पना भी नहीं की होगी | यह प्रस्ताव आपके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है | किन्तु बॉस से किसी प्रकार का पंगा लेना आपके हित में नहीं रहेगा |

वृश्चिक : आपके लिए आपका सप्तमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपके दशम भाव में हो रहा है | कार्य से सम्बन्धित यात्राओं में वृद्धि के संकेत हैं | आप अपने जीवन साथी के साथ किसी धार्मिक स्थल की यात्रा के लिए भी जा सकते हैं | किन्तु जीवन साथी के स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है |

धनु : आपका षष्ठेश और एकादशेश आपकी राशि से नवम भाव में गोचर कर रहा है | यदि आपका कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसके अनुकूल दिशा में प्रगति की सम्भावना है | यदि आप किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो उसमें आपको सफलता प्राप्त हो सकती है | कार्य की दृष्टि से यह गोचर उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है |

मकर : आपका योगकारक आपकी राशि से अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | कार्य में किसी प्रकार का व्यवधान सम्भव है | कार्यस्थल में किसी प्रकार की विपरीत परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ सकता है | सन्तान के साथ किसी प्रकार की बहस सम्भव है अतः अपने Temperament को नियन्त्रण में रखना आवश्यक है | सन्तान के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है |

कुम्भ : आपका योगकारक शुक्र आपकी राशि से सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | परिवार में माँगलिक आयोजन जैसे किसी का विवाह आदि हो सकते हैं जिनके कारण परिवार में उत्सव का वातावरण बन सकता है | साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि बढ़ सकती है | कार्य से सम्बन्धित यात्राओं के भी संकेत हैं | अविवाहित हैं अथवा प्रेम सम्बन्ध चल रहा है तो वह विवाह में परिणत हो सकता है | विवाहित हैं तो जीवन साथी के साथ सम्बन्धों में अन्तरंगता में वृद्धि के संकेत हैं |

मीन : आपके लिए तृतीयेश और अष्टमेश होकर शुक्र का गोचर आपके छठे भाव में हो रहा है | छोटे भाई बहनों के कारण किसी प्रकार का विवाद सम्भव है | यदि इस विवाद को समय रहते नहीं सुलझाया गया तो बात कोर्ट तक भी पहुँच सकती है | साथ ही इसके कारण आपका तथा आपके भाई बहनों का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो सकता है |

किन्तु ध्यान रहे, ये समस्त फल सामान्य हैं | व्यक्ति विशेष की कुण्डली का व्यापक अध्ययन करके ही किसी निश्चित परिणाम पर पहुँचा जा सकता है | अतः कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन कराने के लिए किसी Vedic Astrologer के पास ही जाना उचित रहेगा |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/04/venus-transit-in-leo/

संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – बात चल रही है शिशु के जन्म से पूर्व के संस्कारों की | तो इसे ही आगे बढाते हैं…

एक बात स्पष्ट कर दें, कि इस लेख की लेखिका यानी कि हम कोई वैद्य या डॉक्टर नहीं हैं, लेकिन वैदिक साहित्य के अध्येता – Vedic Scholar – अवश्य हैं, और ज्योतिष के ही समान आयुर्वेद भी क्योंकि वैदिक साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग है और ज्योतिष तथा आयुर्वेद परस्पर सम्बद्ध भी हैं – इसलिए आयुर्वेद से सम्बन्धित ग्रन्थों के अध्ययन में भी थोड़ी बहुत रूचि रही है | साथ ही मेरे पति डॉ दिनेश शर्मा एक आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं तो उनके सान्निध्य में भी बहुत सी बातों पर चर्चा होती रहती है | और संस्कारों के आयोजनों के लिए ज्योतिष की गणनाओं के आधार पर मुहूर्त आवश्यक होते हैं | उन्हीं सब सूचनाओं के आधार पर कुछ लिखने का प्रयास कर रहे हैं |

स्वस्थ सुसंस्कृत युवक एवं युवती जब उचित आयु को प्राप्त हो जाएँ तो भली भाँति सोच विचार कर प्रसन्न मन तथा प्रेम-विश्वास से परिपूर्ण सन्तुष्ट हृदय के साथ उन्हें परिवार की वृद्धि हेतु गर्भाधान संस्कार करना चाहिए ऐसे वेदों में और वेदिकोत्तर साहित्य में प्रमाण उपलब्ध होते हैं | वैदिक संस्कृति के अनुसार विधिपूर्वक किया गया गर्भाधान संस्कार श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाववाली आत्मा को परिवार में आमन्त्रित करने के लिए धार्मिक और पवित्र यज्ञ के समान होता है | उस समय गर्भ के धारण तथा गर्भस्थ शिशु के शरीर की उचित वृद्धि और पोषण को ध्यान में रखते हुए आयुर्वेद के अनुसार पुरुष की न्यूनतम आयु 25 वर्ष तथा स्त्री की 16 वर्ष आवश्यक मानी जाती थी | जिस प्रकार अच्छे वृक्ष अथवा उत्तम कृषि के लिए उत्तम भूमि एवं बीज की आवश्यकता होती है उसी प्रकार उत्तम सन्तान के लिए माता पिता दोनों का मानसिक और शारीरिक रूप से परिपक्व होना आवश्यक था | साथ ही माता पिता दोनों के लिए ब्रह्मचर्य, उत्तम खान-पान व आहार विहार, स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन आदि नियमों का पालन करना भी आवश्यक था |

आयुर्वेद सम्बन्धी ग्रन्थों में इस विषय पर विशद वर्णन उपलब्ध होता है | ग्रन्थों में कहा गया है कि गर्भाधान की पुष्टि हो जाने के पश्चात पति-पत्नी शिशु के जन्म होने तक गर्भ को स्वस्थ रखने, पुष्ट रखने तथा उत्तम भावनाएँ और सम्वेदनाएँ गर्भस्थ शिशु तक प्रेषित करने के लिए स्वयं भी उसी प्रकार का आचरण करें तथा सन्तुलित और पौष्टिक भोजन ग्रहण करें | भोजन ऋतुओं के अनुकूल होना चाहिए | गर्भधारण के पश्चात 9 महीने तक ‘गर्भिणी परिचर्या’ तथा ‘सूतिका परिचर्या’ अर्थात गर्भिणी की देख भाल के नियमों का पालन करना भी आवश्यक है, क्योंकि इस अवस्था में लापरवाही से गर्भस्राव, गर्भपात अथवा रक्तस्राव जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं | गर्भस्थ शिशु अपनी इच्छाओ, भावनाओं तथा सम्वेदनाओं को माता के द्वारा प्रकट करता है, अतः उसकी इच्छाओं की पूर्ति और उसकी भावनाओं और सम्वेदनाओं का ध्यान रखना भी आवश्यक है अन्यथा शिशु में जन्मजात शारीरिक अथवा मानसिक विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं | यदि किसी महिला को बार बार गर्भपात होता है तो उसके लिए गर्भ को सुरक्षित रखने की औषधियों का भी वर्णन उपलब्ध होता है – जैसे ब्राम्ही, शतावरी, दूर्वा, पाटला इत्यादि | चिकित्सक – Gynaecologist – की देख रेख में इन औषधियों का उपयोग करना चाहिए |

इस प्रकार व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो गर्भाधान संस्कार आज के ही समान उस समय भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कार था | और हमारा मानना है कि आज भी यदि उन समस्त नियमों का पालन किया जाए तो गर्भ से सम्बन्धित बहुत सी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त हो सकती है |

……क्रमशः

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/06/26/samskaras-4/

निर्जला एकादशी

आज समस्त हिन्दू धर्मावलम्बी निर्जला एकादशी के व्रत का पालन कर रहे हैं | बारह हिन्दी मासों में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की कुल मिलाकर चौबीस एकादशी आती हैं | अधिक मास होने पर इनकी सनखया छब्बीस भी हो जाती है – जैसे इस वर्ष हो गई है | हिन्दू सम्प्रदाय में एकादशी व्रत का बहुत महत्त्व माना गया है | इनमें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है | इस उपवास में जल भी ग्रहण न करने का संकल्प लिया जाता है इसीलिए इसे निर्जला एकादशी कहते हैं | पद्मपुराण में प्रसंग आता है कि महर्षि वेदव्यास ने हब पाँचों पाण्डवों को चतुर्विध पुरुषार्थ – धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष – का फल देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो भीम ने कहा “पितामह, आप पक्ष में एक बार भोजन त्यागने की बात कहते हैं, किन्तु मैं तो एक दिन क्या, एक समय भी भोजन किये बिना नहीं रह सकता | मेरे उदर में स्थित “वृकाग्नि” को शान्त रखने के लिए मुझे दिन में कई बार भोजन करना पड़ता है | तो मैं भला ये व्रत कैसे कर पाऊँगा ? और यदि यह व्रत नहीं करूँगा तो इसके पुण्य से वंचित रह जाऊँगा |”

पितामह महाबुद्धे कथयामि तवाग्रतः, एकभक्ते न शक्नोमि उपवासे कुतः प्रभो

वृको हि नाम यो वह्नि: स सदा जठरे मम, अतिबेलं यदाSश्नामि तदा समुपशाम्यति

नैकं शक्नोम्यहं कर्तुमुपवासं महामुने || – पद्मपुराण उत्तरखण्ड 52 / 16-18

तब मुनि वेदव्यास ने भीम का मनोबल बढाते हुए उन्हें समझाया कि “हे कुन्तीपुत्र ! धर्म की यही विशेषता होती है कि वह केवल सबका धारण ही नहीं करता अपितु व्रत-उपवास के नियमों को सबके द्वारा सरलता से पालन करने योग्य भी बनाता है | तुम केवल एक ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जब सूर्य वृषभ अथवा मिथुन राशिगत हो उस समय की एकादशी का व्रत पालन करो और वह भी निर्जल | केवल इसी व्रत के पालन से तुम्हें समस्त एकादशी के व्रत का फल प्राप्त हो जाएगा |”

वृषस्थे मिथुनस्थे वा यदा चैकादाशी भवेत्, ज्येष्ठमासे प्रयत्नेन सोपोष्योदकवर्जिता  – पद्मपुराण 52 / 20

इसी कारण से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है | इसी अध्याय में आगे कहा गया है –

ज्येष्ठे मासि तु वै भीम ! या शुक्लैकादशी शुभा

निर्जला समुपोष्यात्र जल्कुम्भान्सशर्कारान् |

प्रदाय विप्रमुखेभ्यो मोदते विष्णुसन्निधौ

ततः कुम्भा: प्रदातव्या ब्राह्मणानां च भक्तित: || – पद्मपुराण 52 / 61,62

अर्थात निर्जला एकादशी के दिन जल और शर्करा से युक्त घट का दान करने से भगवान् विष्णु का सान्निध्य प्राप्त होता है | इस तथा इसी प्रकार के अन्य पौराणिक उपाख्यानों के कारण हिन्दू समाज में मान्यता आज तक भी विद्यमान है कि यदि हम “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करते हुए निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करेंगे और गऊ, वस्त्र, छत्र, फल, मीठा शरबत तथा कलश आदि का दान करेंगे तो हमें भगवान् विष्णु का सान्निध्य प्राप्त होगा | हर गली मोहल्ले के चोराहे पर, घरों के दरवाजों पर, सोसायटीज़ के गेट्स पर आज के दिन लोग तरह तरह के शर्बतों से भरे बर्तन रख कर या तरबूज़ आदि लेकर बैठे मिल जाएँगे और हर राहगीर की प्यास बुझाते मिल जाएँगे |

जेठ की तपती दोपहर

ज्येष्ठ माह की तपती दोपहरी में शीतल तथा शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुएँ दान करना वास्तव में एक स्वस्थ प्रथा है | लेकिन क्या इसका पालन केवल एक ही दिन होना चाहिए – वह भी इस भावना से कि ऐसा करके हमें पुण्य प्राप्त होगा ? अपने आस पास में देखती सुनती हूँ कि अपने घरों में काम कर रही बाई या हमारे ही निवास का प्रबन्ध करने के लिए भवन निर्माण में लगे मज़दूर जब गर्मी से बेहाल हो जाते हैं तो उन्हें ठण्डे मीठे फल खिलाना या रूहआफ्ज़ा पिलाना तो दूर की बात है, उनके पानी माँगने पर उन्हें बोल दिया जाता है कि ठण्डा पानी तो नहीं है भाई, नलके से सादा ही पानी ले लो |

क्या ही अच्छा ही यदि ये समस्त कार्य हम धर्म के भय या मोक्ष अथवा ईश्वरप्राप्ति के लालच से न करके मानवता के नाते करें… क्योंकि हर जीव ईश्वर का ही तो प्रतिरूप है… जब भी ऐसा हो जाएगा तो “निर्जला एकादशी” केवल एक दिन का पर्व भर बनकर नहीं रह जाएगी… हर दिन हर दीन हीन को गर्मी से राहत दिलाने के लिए शीतल पेय दान के रूप में उपलब्ध हो सकेगा…

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में गर्भाधान संस्कार का ही महत्त्व है | क्योंकि गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तान की उत्पत्ति है | अतः उत्तम सन्तान की कामना करने वाले माता पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन दोनों को पवित्र तथा स्वस्थ रखने के लिए यह संस्कार किया जाता था |

गर्भः संधार्यते येन कर्मणा तद्गर्भाधानमित्यनुगतार्थं कर्मनामधेयम् | – पूर्वमीमांसा 1/4/2

निषिक्तो यत्प्रयोगेण गर्भः सन्धार्यते स्त्रिया | तद्गर्भलम्भनं नाम कर्म प्रोक्तं मनीषिभ: || – शौनक

वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् | कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च || – मनु

गर्भः सन्धार्यते येन कर्मणा तद् गर्भाधानमित्यनुगतार्थं कर्मनामधेयम् | – जैमिनी

सभी के भाव स्पष्ट हैं – जिस संस्कार कर्म के द्वारा स्त्रियाँ गर्भ धारण करती हैं वह गर्भाधान संस्कार (Garbhaadhaan Sanskaar) कहलाता है |

गर्भाधान और इसके बाद किये जाने वाले पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण आदि संस्कार केवलमात्र धार्मिक अनुष्ठान – Rituals – भर ही नहीं हैं | इनका आध्यात्मिक महत्त्व है | इन समस्त संस्कारों का उद्देश्य यही था कि गर्भ में भी और जन्म के बाद भी शिशु स्वस्थ तथा प्रसन्नचित्त रहे तथा धीरे धीरे इस समस्त सृष्टि से उसका सम्बन्ध प्रगाढ़ हो सके | गर्भ धारण करने के बाद अनेक प्रकार के प्राकृतिक दोषों के आक्रमण होते रहने की सम्भावना होती है, जिनसे बचने के लिए यह संस्कार किया जाता है | इसके करने से गर्भ सुरक्षित रहता है तथा सुयोग्य सन्तान उत्पन्न होती है | चिकित्सा शास्त्र भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि गर्भाधान के समय पति-पत्नी के मन के जो भाव होंगे उनका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य पड़ेगा |

यही कारण है कि पति पत्नी दोनों को यह सिखाया जाता था कि विवाह के बाद सबसे पहले वे यह विचार करें कि उन्हें कब सन्तान उत्पन्न करनी है और किस प्रकार की सन्तान की उनकी कामना है | साथ ही अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें और उसके लिए जो भी आवश्यक उपाय करने हों वे करें | उसके बाद गर्भाधान का विचार करें | अर्थात गर्भाधान से पूर्व माता पिता दोनों को शारीरिक और मानसिक रुप से स्वयं को तैयार करना आवश्यक है, क्योंकि आने वाली सन्तान उनकी ही आत्मा का प्रतिरुप होती है | इसीलिए तो पुत्र को आत्मज और पुत्री को आत्मजा कहा जाता है |

किसी भी व्यक्ति को अपना तन और मन दोनों स्वस्थ तथा प्रसन्न रखने के लिए सबसे पहले उत्तम और पौष्टिक भोजन ग्रहण करना होगा | माता जैसा भोजन करेगी उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य पड़ेगा | साथ ही उचित व्यायाम भी शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है | उसके बाद घर का वातावरण आनन्दमय होगा तो मन स्वतः प्रसन्नता से आन्दोलित रहेगा | इसके अतिरिक्त माता पिता की मानसिक परिपक्वता के लिए उत्तम साहित्य का अध्ययन, मन को प्रसन्न करने वाला तथा ज्ञानवर्द्धक वार्तालाप और श्रेष्ठ लोगों का साहचर्य भी आवश्यक है | इतना सब कुछ हो जाएगा तो उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य ही पड़ेगा तथा माता पिता स्वयं ही अपने जन्म लेने वाले शिशु के लिए अच्छे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं | महाभारत को यदि इतिहास ग्रन्थ मानते हैं तो अभिमन्यु का उदाहरण सबको ज्ञात ही है |

क्रमशः…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/06/22/samskaras-3/

सूर्य का मिथुन में गोचर

नमस्कार मित्रों ! लगभग एक सप्ताह के अवकाश के बाद आज फिर से उपस्थित हूँ | इस मध्य 13 जून को पुरुषोत्तम मास की भी समाप्ति हो गई और कल शुक्रवार 15 जून ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया को लगभग 11:37 पर भगवान् भास्कर भी कौलव करण और वृद्धि योग में मिथुन राशि तथा मृगशिर नक्षत्र में प्रविष्ट हो गए |

मिथुन राशि सूर्य की अपनी राशि सिंह से एकादश और सूर्य की उच्च राशि मेष से तीसरे भाव में आती है | यहाँ से 16 जुलाई को 22:27 के लगभग सूर्यदेव कर्क राशि में प्रस्थान कर जाएँगे | अपनी इस यात्रा के दौरान सूर्य 22 जून को आर्द्रा नक्षत्र में तथा 6 जुलाई को पुनर्वसु में गोचर करेंगे | मृगशिर पृथिवी तत्त्व युक्त मृगशिरा नक्षत्र का स्वामी मंगल सूर्य का मित्र ग्रह है तथा यह समानान्तर चलने वाला पित्त प्रकृति का धैर्यवान नक्षत्र है | आर्द्रा ऊर्ध्वमुखी तीक्ष्ण और वात प्रकृति का जल तत्त्व युक्त स्त्री नक्षत्र है तथा राहु इसका देवता है | पुनर्वसु सहनशील तथा रचनाधर्मिता युक्त समानान्तर चलने वाला वात प्रकृति का सात्विक चर पुरुष नक्षत्र है और इसका देवता है गुरु | सूर्य आत्मा का कारक ग्रह है | इसका तत्व है अग्नि, वर्ण क्षत्रिय, लाल रंग का प्रतीक, पूर्व दिशा का स्वामी तथा स्वाभाविक दाहकत्व लिए हुए एक क्रूर ग्रह माना जाता है | चन्द्र, मंगल और गुरु सूर्य के मित्र ग्रह, शुक्र, शनि, राहु और केतु शत्रु ग्रह तथा बुध को सूर्य का सम ग्रह माना जाता है |

इन्हीं समस्त तथ्यों के आधार पर जानने का पयास करते हैं कि मिथुन राशि में सूर्य के संक्रमण के जनसाधारण पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

मेष : आपका पंचमेश आपकी राशि से तीसरे भाव में प्रवेश करेगा | आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपके तथा आपके भाई बहनों के लिए कार्य में उन्नति के योग हैं | आर्थिक स्थिति में दृढ़ता के संकेत हैं | नवीन प्रोजेक्ट्स प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आप बहुत समय तक व्यस्त रहते हुए अर्थलाभ भी कर सकते हैं | भाई बहनों का सहयोग भी आपको प्राप्त रहेगा | साथ ही आपकी सन्तान की ओर से भी आपको शुभ समाचार प्राप्त हो सकते हैं |

वृषभ : आपकी राशि से चतुर्थेश का गोचर आपके द्वितीय भाव में हो रहा है | प्रॉपर्टी की खरीद फरोख्त में लाभ की आशा की जा सकती है | यदि आप अपने लिए नई प्रॉपर्टी खरीदना चाहते हैं तो आपका वह सपना भी पूर्ण हो सकता है | साथ ही आत्मविश्वास में वृद्धि के भी संकेत हैं | किन्तु माइग्रेन, ज्वर, पित्त आदि से सम्बन्धित समस्याएँ हो सकती हैं अतः गर्मी से बचने का प्रयास करें और अधिक मात्रा में पेय पदार्थों का सेवन करें |

मिथुन : आपकी राशि से तृतीयेश का गोचर आपकी लग्न में हो रहा है | भाई बहनों के साथ सम्बन्धों में प्रगाढ़ता के संकेत तो हैं किन्तु साथ ही किसी बात पर कोई विवाद भी उत्पन्न हो सकता है जिसके कारण आपको किसी प्रकार का मानसिक कष्ट भी हो सकता है | अतः किसी भी विवाद को बढ़ने न देने का प्रयास करना आपके हित में होगा |

कर्क : आपको कार्य के सिलसिले में विदेश यात्राएँ करनी पड़ सकती हैं | इन यात्राओं में एक ओर जहाँ अर्थलाभ की आशा की जा सकती है वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है – विशेष रूप से आँखों के इन्फेक्शन के प्रति सावधान रहें | पिता के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है |

सिंह : आपके राश्यधिपति का आपके लाभ स्थान में गोचर कर रहा है, वास्तव में आपके कार्य तथा आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छे संकेत प्रतीत होते हैं | नवीन प्रोजेक्ट्स आपको प्राप्त हो सकते हैं जो लम्बे समय तक आपको व्यस्त रखते हुए धनलाभ कराने में सक्षम होंगे | साथ ही नौकरी में प्रमोशन, मान सम्मान में वृद्धि तथा व्यवसाय में उन्नति के भी संकेत हैं | कोई नया कार्य भी आप इस अवधि में आरम्भ कर सकते हैं | परिवार, मित्रों, बड़े भाई, पिता तथा अधिकारियों का सहयोग भी प्राप्त रहेगा | आपकी सन्तान के लिए भी अनुकूल समय प्रतीत होता है |

कन्या : आपका द्वादशेश आपके कर्म स्थान में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से कार्य की दृष्टि से समय अत्यन्त उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है | यदि आपके कार्य का सम्बन्ध विदेशों से है तब तो आपके लिए विशेष रूप से उत्साहवर्द्धक समय प्रतीत होता है | साथ ही कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | विदेश में निवास कर रहे आपके मित्रों की ओर से आपको सहयोग प्राप्त हो सकता है |

तुला : आपका एकादशेश आपके भाग्य स्थान में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से भाग्योन्नति का समय प्रतीत होता है | सुख समृद्धि में वृद्धि के संकेत हैं | जिन जातकों का कार्य विदेश से किसी प्रकार सम्बद्ध है उनके लिए विशेष रूप से भाग्यवर्द्धक समय प्रतीत होता है | विदेश यात्राओं में वृद्धि के भी संकेत हैं | अतः अवसर का लाभ उठाने की आवश्यकता है | यदि स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई समस्या चल रही है तो उससे भी मुक्ति इस अवधि में सम्भव है |

वृश्चिक : आपकी राशि से दशमेश आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | आर्थिक दृष्टि से तो समय अनुकूल है किन्तु स्वास्थ्य की दृष्टि से समय उतना अनुकूल नहीं प्रतीत होता | गुप्त शत्रुओं के प्रति भी सावधान रहने की आवश्यकता है | स्वास्थ्य समस्याओं तथा विरोधियों के कारण आप अपने मनोबल में भी कमी का अनुभव कर सकते हैं |

धनु : आपका भाग्येश आपके सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | आपके तथा आपके जीवन साथी के लिए कार्य की दृष्टि से समय अनुकूल प्रतीत होता है | कार्य में उन्नति के संकेत हैं | जो लोग पॉलिटिक्स से जुड़े हैं उनके लिए भी समय उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है | किन्तु दाम्पत्य जीवन तथा प्रेम सम्बन्धों के लिए समय अनुकूल नहीं प्रतीत होता | आपके जीवन साथी अथवा प्रेमी / प्रेमिका के उग्र स्वभाव के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है | अपने व्यवहार को सन्तुलित रखने के लिए प्राणायाम और ध्यान का सहारा लीजिये |

मकर : आपका अष्टमेश छठे भाव में गोचर कर रहा है | एक ओर विदेश यात्राओं के योग हैं तो वहीं दूसरी ओर कार्य की दृष्टि से समय भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आप इस समय अपने प्रतियोगियों को परास्त करने में सक्षम हैं इसलिए अवसर का लाभ उठाकर अपने लक्ष्य के प्रति अग्रसर होना ही उचित रहेगा | स्वास्थ्य की दृष्टि से भी समय अनुकूल प्रतीत होता है | किसी पुरानी बीमारी के भी इस अवधि में ठीक हो जाने की सम्भावना है |

कुम्भ : आपके लिए सूर्य का यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | व्यावसायिक रूप से आपके कार्य में तथा मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं | पॉलिटिक्स से सम्बद्ध लोगों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपकी सन्तान के लिए विशेष रूप से यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आपकी सन्तान उच्च शिक्षा के लिए विदेश भी जा सकती है और यदि नौकरी की तलाश में है तो वह भी पूर्ण हो सकती है |

मीन : षष्ठेश का चतुर्थ भाव में गोचर है | आप अथवा आपका जीवन साथी यदि नया वाहन अथवा घर खरीदना चाहते हैं तो अभी उस विचार को स्थगित करना ही उचित रहेगा | साथ ही परिवार में किसी प्रकार का मनमुटाव भी हो सकता है अतः सावधान रहने की आवश्यकता है | किन्तु नौकरी में पदोन्नति के संकेत हैं | पॉलिटिक्स में हैं तो आपको कोई पद भी प्राप्त हो सकता है | मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं | यदि किसी प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा है तो वह आपके पक्ष में आ सकता है | परिवार में किसी बच्चे का जन्म भी हो सकता है |

अन्त में, उपरोक्त परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |

साथ ही, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/06/16/sun-transit-gemini/

बुध का मिथुन में गोचर

बुध को सामान्यतः एक सौम्य ग्रह माना जाता है | मिथुन तथा कन्या राशियों और आश्लेषा, ज्येष्ठा तथा रेवती नक्षत्रों का अधिपतित्व इसे प्राप्त है | कन्या राशि बुध की उच्च राशि है तथा मीन में यह नीच का हो जाता है | सूर्य, शुक्र और राहु के साथ इसकी मित्रता तथा चन्द्रमा के साथ इसकी शत्रुता है और शनि, मंगल, गुरु और केतु के साथ यह तटस्थ भाव में रहता है | दस जून को प्रातः 7:33 के लगभग बुध का मिथुन राशि में प्रवेश होगा | वहाँ से 25 जून को 18:05 के लगभग कर्क राशि में प्रविष्ट हो जाएगा | तो, जानने का प्रयास करते हैं बुध के मिथुन राशि में गोचर के विभिन्न राशियों पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

मेष – आपके लिए तृतीयेश और षष्ठेश होकर बुध का गोचर आपके तृतीय भाव में अपनी ही राशि में हो रहा है | सम्भावना कुछ ऐसी प्रतीत होती है कि आवश्यकता होने पर आर्थिक रूप से भाई बहनों का सहयोग प्राप्त हो सकता है | यद्यपि कुछ विवाद भी सम्भव है, किन्तु अन्त में परिणाम आपके पक्ष में ही होगा |

वृष – आपका द्वितीयेश और पंचमेश होकर बुध का गोचर आपके दूसरे भाव में ही हो रहा है | आर्थिक दृष्टि से अनुकूलता होने के साथ ही आपकी वक्तव्यता तथा आपके लेखन में निखार इस अवधि में आ सकता है जिसके कारण आपसे लोग प्रभावित भी होंगे | आपके व्यवहार में उदारता, कोमलता एवं सौम्यता दिखाई देगी जिसका प्रभाव आपके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर निश्चित ही पड़ेगा | सन्तान के लिए भी समय अनुकूल प्रतीत होता है |

मिथुन – आपके लिए बुध योगकारक होकर अपनी ही राशि में लग्न में गोचर कर रहा है | परिवार में मंगलकार्यों का आयोजन हो सकता है | परिवार में परस्पर सौहार्द का वातावरण रहेगा और समय आमोद प्रमोद में व्यतीत होगा | सामाजिक गतिविधियों में भी वृद्धि की सम्भावना है | परिवारजनों का सहयोग अआप्को अपने कार्य में उपलब्ध होता रहेगा |

कर्क – कर्क राशि के लिए तृतीयेश और द्वादशेश होकर बुध का गोचर आपके बारहवें भाव में ही हो रहा है | भाई बहनों का सहयोग भी अपने कार्य में आपको प्राप्त रहने की सम्भावना है | कार्य के सिलसिले में आपको तथा आपके भाई बहनों को दूर पास की यात्राएँ भी करनी पड़ सकती हैं, किन्तु इन यात्राओं के दौरान आपको अपने तथा अपने भाई बहनों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा |

सिंह – आपके लिए बुध द्वितीयेश और एकादशेश होकर आपके एकादश में ही गोचर कर रहा है | आपके लिए विशेष रूप से भाग्योदय का समय प्रतीत होता है | व्यवसाय में प्रगति, नौकरी में पदोन्नति तथा अर्थ और यश प्राप्ति के संकेत हैं | साथ ही यदि आप कोई नया कार्य आरम्भ करना चाहते हैं तो उसके लिए भी अनुकूल समय प्रतीत होता है | बड़े भाई का सहयोग आपको प्राप्त रह सकता है |

कन्या – आपके लिए आपका लग्नेश तथा दशमेश होकर बुध योगकारक ग्रह है तथा दशम स्थान में गोचर कर रहा है | आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के योग हैं | समाज में आपका मान-सम्मान तथा प्रभाव में वृद्धि की सम्भावना है | साथ ही कार्य की दृष्टि से भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपको नवीन प्रोजेक्ट्स प्राप्त होते रह सकते हैं और आप लम्बे समय तक उनमें व्यस्त रह सकते हैं तथा उनके माध्यम से धनलाभ कर सकते हैं |

तुला – आपके लिए बुध भाग्येश तथा द्वादशेश भाग्य स्थान में ही गोचर कर रहा है | लम्बी विदेश यात्राओं के संकेत प्रतीत होते हैं | साथ ही यदि आपका कार्य किसी रूप में विदेशों से सम्बन्धित है तो उसमें उन्नति की भी सम्भावनाएँ हैं | इसके अतिरिक्त धर्म तथा आध्यात्मिकता की ओर आपकी रूचि बढ़ सकती है | आप किसी धार्मिक संस्था अथवा अस्पताल आदि के लिए धन दान भी करने की योजना बना सकते हैं |

वृश्चिक – आपके लिए बुध अष्टमेश और एकादशेश है तथा आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | कहीं से आकस्मिक लाभ की सम्भावना है | व्यावसायिक रूप्प से भी अप्रत्याशित सफलता की सम्भावना है | किन्तु आपके स्वभाव में नकारात्मकता आपके व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक जीवन पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है | साथ ही स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है |

धनु – आपके लिए सप्तमेश और दशमेश होकर बुध योगकारक हो जाता है तथा आपकी राशि से सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | आप तथा आपके जीवन साथी के लिए व्यावसायिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | पार्टनरशिप में कोई कार्य कर रहे हैं तो उसमें भी उन्नति की सम्भावना है | नौकरी में हैं तो पदोन्नति की भी सम्भावना है | लेखकों तथा बुद्धिजीवियों और मीडियाकर्मियों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है |

मकर – बुध आपका षष्ठेश और भाग्येश है तथा आपकी राशि से छठे भाव में गोचर कर रहा है | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसमें अनुकूल परिणाम की सम्भावना की जा सकती है | साथ ही बहुत समय से चली आ रही जोड़ों और माँसपेशियों में दर्द के इलाज़ का भी पता इस अवधि में लग सकता है | प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे लोगों के लिए समय अनुकूल फल देने वाला प्रतीत होता है किन्तु उन्हें परिश्रम अधिक करना पड़ेगा |

कुम्भ –  आपका पंचमेश और अष्टमेश होकर बुध आपकी राशि से पंचम भाव में गोचर कर रहा है | किसी प्रकार की अप्रत्याशित घटना की सम्भावना की जा सकती है | आपकी सन्तान तथा विद्यार्थियों के लिए यह गोचर विशेष रूप से अनुकूल प्रतीत होता है | किन्तु इसके साथ ही सन्तान के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है | साथ ही सन्तान के साथ किसी प्रकार की बहस से बचने का भी प्रयास आवश्यक है |

मीन – आपके लिए चतुर्थेश और सप्तमेश होकर बुध आपका योगकारक बन जाता है तथा आपके चतुर्थ भाव में ही गोचर कर रहा है | आपके तथा आपके जीवन साथी के लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आप कोई नया घर खरीदने की योजना बना सकते हैं | आपको अपने परिवारजनों का तथा मित्रों का सहयोग प्राप्त होता रहेगा तथा परिवार में सौहार्द का वातावरण रहने की सम्भावना है ||

ये समस्त फल सामान्य हैं | व्यक्ति विशेष की कुण्डली का व्यापक अध्ययन करके ही किसी निश्चित परिणाम पर पहुँचा जा सकता है | अतः कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन कराने के लिए किसी Vedic Astrologer के पास ही जाना उचित रहेगा |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

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