शुभ प्रभात

आज हम सभी किसी न किसी बात से चिन्तित रहते हैं | किसी ने हमारी बात नहीं सुनी या हमें “तू” करके बोल दिया – हमें अपना अपमान लगने लगता है | रात दिन इस बात की चिन्ता सताती रहती है कि जो कुछ हमारे पास है – धन, सम्पत्ति, परिवार, मान-प्रतिष्ठा – कुछ भी – वो कोई छीन न ले या उसकी हानि न हो जाए | बीमारी का भय, मृत्यु का भय, किसी प्रकार के अभाव का भय, असफलता का भय – न जाने कितने प्रकार के भयों के साए में हम सब अपना जीवन व्यर्थ गँवा देते हैं | यदि हम उस परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर निष्काम भाव से अपने समत कर्म करते रहेंगे तो किसी प्रकार का भय हमें सताएगा ही नहीं और जीवन सरल तथा सुखी हो जाएगा |

भय

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क्षमावाणी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ

क्षमावाणी

सत्ता जो हो जाती है असत्य

नृत्य क्या है / जीवन जीने की एक कला

इसीलिए तो समूचा जीवन ही है एक नृत्य

मस्ती में भर / भूलकर सारा विषाद / मिलकर एक दूसरे के साथ

वैसे ही जैसे / किया नृत्य नटवर नागर ने

तो हुआ पूर्ण वो नृत्य / राधा के महारास के साथ

नटराज ने मचाया ताण्डव

तो शान्त किया हिमसुता ने / रचकर मधुर लास्य

रचाती रहती है नित नवीन नृत्य / ब्रहमाण्ड के रंगमंच पर / प्रकृति नटी

क्योंकि नृत्य है एक ऐसा राग / जो हो जाता है परिणत विराग में

क्योंकि नृत्य है एक ऐसी आग / जो हो जाती है परिणत आह्लाद में

इसीलिए करती हूँ मैं नृत्य / रचाती हूँ महारास / बनकर प्रकृतिरूपा

उठाती हूँ दोनों हाथों को आकाश की ओर

और हस्तक बना / भर लेती हूँ सारा आकाश अपने हाथों में

घूमती हूँ बिन्दु के सामान / लेती हूँ अनेको तिहाईयाँ / आवर्तन / गतें और परनें

लख कर मेरा मादक नृत्य / थिरक उठते हैं पाँव विराट के भी

झूम उठता है सकल जड़ चेतन / जब साथ में मेरे झूमता है विराट

बढ़ती जाती है गति / बढ़ते जाते हैं आवर्त / हर गत पर / हर भाव पर

नहीं टोकती कोई मुद्रा मुझे / नहीं करती कोई इशारा / रुक जाने का

और मैं नाचती जाती हूँ / घूमती जाती हूँ बिना रुके / बेदम तिहाइयों पर

उन्माद में भर घूमती घूमती / हो जाती हूँ एक / उस विशाल के साथ

हो जाती हूँ चेतनाशून्य / और खो जाती हूँ उस शून्य में

आनन्द के उस क्षण में / जी लेती हूँ सारा जीवन एक ही साथ

आनन्द के उस क्षण में / जब हो जाता है शिथिल मेरा मन

भूल जाती हूँ सारा ज्ञान / सारी उपलब्धियाँ

और कर देती हूँ समर्पित स्वयं को / उस असीम के लिए

हो जाती हूँ विलीन उसमें ही / सदा सदा के लिए

यही है सत्ता का सत्य / जो हो जाती है असत्य / जब मिल जाती है उस चरम सत्य में…

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दशलाक्षण पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ

मित्रों, आज १९ अगस्त से २६ अगस्त तक श्वेताम्बर जैन मतावलम्बियों का पर्यूषण पर्व आरम्भ हो चुका है | पर्यूषण के अन्तिम दिन यानी २६ अगस्त से दिगम्बरों के पर्यूषण पर्व अर्थात क्षमावाणी पर्व और दशलाक्षण पर्व का आरम्भ हो जाएगा जो ५ सितम्बर को सम्पन्न होगा | यों तो साल में तीन बार दशलाक्षण मनाया जाता है, लेकिन भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (अनन्त चतुर्दशी) तक मनाए जाने वाले पर्व का विशेष महत्त्व माना जाता है | इसका मुख्य कारण है इसमें आने वाला साम्वत्सरिक पर्व | यह साम्वत्सरिक पर्व पर्यूषण का ही नही वरन् समस्त जैन धर्म का प्राण है । इस दिन साम्वत्सरिक प्रतिक्रमण किया जाता है जिसके द्वारा वर्ष भर में किए गए पापों का प्रायश्चित्त करते हैं । साम्वत्सरिक प्रतिक्रमण के बीच में ही सभी ८४ लाख जीव योनी से क्षमा याचना की जाती है । नवरात्रों की ही भाँति पर्यूषण पर्व भी संयम और आत्मशुद्धि के पर्व हैं | इन पर्वों में त्याग, तप, उपवास, परिष्कार, संकल्प, स्वाध्याय और आराधना पर बल दिया जाता है |

भारत के अन्य दर्शनों की भाँति जैन दर्शन का भी अन्तिम लक्ष्य सत्यशोधन करके परमानन्द की उपलब्धि करना है | इसे ही तत्वज्ञान कहते हैं | धर्म चाहे कोई भी हो, यदि उसमें तत्वज्ञान नहीं होगा, तत्वज्ञों के द्वारा बताए गए व्यवहार आदि नहीं होंगे, तो ऐसा धर्म जड़ हो जड़ हो जाता और उसमें मानव मात्र की सत्य निष्ठा नहीं बन पाती | अतः धर्म और तत्वज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक हैं | धर्म का बीज जिजीविषा, सुख की अभिलाषा और दुःख के प्रतिकार में ही निहित है |

जीवन को प्रगतिशील और उल्लासमय बनाए रखने के लिये तथा पारस्परिक संगठन और सहयोग को जीवित रखने के लिये ही उत्सवों और पर्वों का आयोजन किया जाता है | ये उत्सव केवल सामजिक सहयोग को ही बढ़ावा नहीं देते वरन् साथ साथ धार्मिक परम्परा को भी जीवित रखते हैं | और इस प्रकार मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक व्यवहार भी शनैः शनैः अभ्यास में आता जाता है | इस प्रकार जैन सम्प्रदाय का पर्यूषण और दशलाक्षण पर्व एक ऐसा ही सामाजिक पर्व है जो मनुष्य को मनुष्य के साथ मनुष्य के रूप में जोड़कर उसमें सम्यक् चारित्र्य और सम्यक् दृष्टि का विकास करता है | शास्त्र से धर्म की देह का अर्थात धर्म के बाह्य रूप का निर्माण होता है | यही कारण है कि किसी भी सम्प्रदाय के व्रतोत्सव आदि के विधान शास्त्रानुमोदित होते हैं, क्योंकि धर्म की देह अर्थात धर्म के बाह्य स्वरूप का निर्माण शास्त्रों से ही होता है | शास्त्रोक्त विधि विधानों का अनुसरण करते हुए व्यक्ति के चरित्र में सत्य, धर्म, शान्ति, प्रेम, निस्वार्थ भाव, उदारता और विनय विवेक आदि सद्गुणों का विकास होता है | यही सद्गुण धर्म की आत्मा कहलाते हैं |

सत्य की प्राप्ति के लिये बेचैनी और विवेकी स्वभाव इन दो तत्वों पर आधारित जीवन व्यवहार ही पारमार्थिक धर्म है | जैन सम्प्रदाय का पर्यूषण पर्व ऐसे ही पारमार्थिक धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है | जैन धर्म के अन्तिम तीर्थंकर महावीर के आचार विचार का सीधा और स्पष्ट प्रतिबिम्ब मुख्यतया आचारांगसूत्र में देखने को मिलता है | उसमें जो कुछ कहा गया है उस सबमें साध्य, समता या सम पर ही पूर्णतया भार दिया गया है | सम्यग्दृष्टिमूलक और सम्यग्दृष्टिपोषक जो जो आचार विचार हैं वे सब सामयिक रूप से जैन परम्परा में पाए जाते हैं | गृहस्थ और त्यागी सभी के लिये ६ आवश्यक कर्म बताए गए हैं | जिनमें मुख्य सामाइय है | त्यागी हो या गृहस्थ, वह जब भी अपने अपने अधिकार के अनुसार धार्मिक जीवन को स्वीकार करता है उसे यह प्रतिज्ञा करनी पड़ती है “करोमि भन्ते सामाइयम् |” जिसका अर्थ है कि मैं समता अर्थात समभाव की प्रतिज्ञा करता हूँ | मैं पापव्यापार अथवा सावद्ययोग का यथाशक्ति त्याग करता हूँ | साम्यदृष्टि जैन परम्परा के आचार विचार दोनों ही में है | और समस्त आचार विचार का केन्द्र है अहिंसा | जैन धर्म में अहिंसा को इतना व्यापक बना दिया गया है कि मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट पतंग आदि जीवित प्राणी ही नहीं वरन वनस्पति, पार्थिव जलीय आदि सूक्ष्मातिसूक्ष्म जन्तुओं तक की हिंसा से आत्मौपम्य की भावना द्वारा निवृत्त होने को कहा गया है | आत्मौपम्य की भावना – अर्थात समस्त प्राणियों की आत्मा को अपनी आत्मा मानना |

जैन पर्व कुछ एक दिवसीय होते हैं और कुछ बहुदिवसीय | लम्बे त्यौहारों में विशेष जैन पर्वों की ६ अट्ठाइयाँ हैं | उनमें जैसा कि ऊपर बताया, पर्यूषण पर्व की अट्ठाई सर्वश्रेष्ठ समझी जाती है | इनके अतिरिक्त तीन अट्ठाइयाँ चातुर्मास की तथा दो औली की होती हैं | पर्यूषण पर्व के दौरान यत्र तत्र जैन समाज में धार्मिक वातावरण दिखाई देता है | सभी निवृत्ति और अवकाशप्राप्ति का प्रयत्न करते हैं | खान पान एवम् अन्य भोगों पर अँकुश रखते हैं | शास्त्र श्रवण और आत्म चिन्तन करते हैं | तपस्वियों, त्यागियों और धार्मिक बन्धुओं की भक्ति करते हैं | जीवों को अभयदान देने का प्रयत्न करते हैं | और सबके साथ सच्ची मैत्री साधने की भावना रखते हैं | इस पर्व को दशलाक्षणी पर्व भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें दश लक्षणों का पालन कहा जाता है | ये दश लक्षण हैं: विनम्रता, माया का नाश, निर्मलता, आत्मसत्य का ज्ञान – और यह तभी सम्भव है जब व्यक्ति मितभाषी और स्थिर मन वाला हो, संयम, तप, त्याग, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य तथा क्षमायाचना | श्वेताम्बर सम्प्रदाय में यह पर्व आठ दिन का होता है, और उसके अन्तिम दिन यानी भाद्रपद शुक्ल पंचमी से दिगम्बरों के पर्यूषण का आरम्भ हो जाता है जो दस दिनों तक चलता है और भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को सम्पन्न होता है | इन दिनों भगवान महावीर की कथाओं का श्रवण किया जाता है | अपनी कठोर साधना के द्वारा भगवान महावीर ने जिन सत्यों का अनुभव किया था वे प्रमुख रूप से तीन हैं : दूसरे के कष्ट को अपना कष्ट समझना, समाज के हित के लिए अपनी सुख सुविधाओं का पूर्ण रूप से बलिदान कर देना ताकि परिग्रह लोकोपकार की भावना में परिणत हो जाए, इस प्रकार सतत जागृति की अवस्था प्राप्त होती है, जिसके द्वारा मनुष्य अतम निरीक्षण कर सकता है – ताकि उसके आत्मपुरुषार्थ में किसी प्रकार की कमी न आने पाए |

सच्चा सुख और सच्ची शान्ति प्राप्त करने के लिये एकमात्र उपाय यही है कि व्यक्ति अपनी जीवन प्रवृत्ति का सूक्ष्मता से अवलोकन करे और कभी भी किसी के साथ अनजाने में भी कोई छोटी सी भी भूल हो गई हो तो उसके लिए हृदय से क्षमा याचना करे और दूसरे को उसकी पहाड़ सी भूल के लिए भी क्षमादान दे |

क्षमादान और क्षमायाचना के इस महापर्व में सभी जैन मतावलम्बी संकल्प लेते हैं “खम्मामि सव्व जीवेषु – सब जीवों से मैं क्षमायाचना करता हूँ, सव्वे जीवा खमन्तु मे – सारे जीव मुझे क्षमा करें, मित्त्ति मे सव्व भू ए सू – सभी जीवों के साथ मेरा मैत्री का भाव रहे, वैरं मज्झणम् केण इ – किसी के साथ मेरा वैर न रहे |” आत्मिक शुद्धि का मूल मन्त्र इसी प्रकार का क्षमाभाव है | मन को स्वच्छ उदार और विवेकी बनाकर समाज के संगठन की दिशा में इससे बड़ा और क्या प्रयत्न हो सकता है |

अस्तु, क्षमायाचना के साथ आप सभी को क्षमावाणी और दशलाक्षणी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

पर्यूषण

 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ

आज और कल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन और उल्लासपूर्ण पर्व देश भर में बड़ी धूम धाम से मनाया जाएगा | सभी को श्री कृष्ण के जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ |

वास्तव में श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व इतना भव्य है कि न केवल भारतीय इतिहास के लिये, वरन विश्व के इतिहास के लिये भी अलौकिक एवम् आकर्षक है और सदा रहेगा | उन्होंने विश्व के मानव मात्र के कल्याण के लिये अपने जन्म से लेकर निर्वाण पर्यन्त अपनी सरस एवं मोहक लीलाओं तथा परम पावन उपदेशों से अन्तः एवं बाह्य दृष्टि द्वारा जो अमूल्य शिक्षण दिया था वह किसी वाणी अथवा लेखनी की वर्णनीय शक्ति एवं मन की कल्पना की सीमा में नहीं आ सकता |

श्री कृष्ण षोडश कला सम्पन्न पूर्णावतार होने के कारण “कृष्णस्तु भगवान स्वयम्” हैं | उनका चरित्र ऐसा है कि हर कोई उनकी ओर खिंचा चला जाता है । एक ओर वे मनोचिकित्सक बनकर अर्जुन को गीताज्ञान देकर धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित करते हुए उपदेशक की भूमिका में दिखाई देते हैं तो दूसरी ओर एक आदर्श राजनीतिज्ञ के रूप में भी दिखाई देते हैं जब पाण्डवों के दूत बनकर दुर्योधन की सभा में जाते हैं | गोपियों और सभी सखाओं के लिए उनके बंसी बजैया बालसखा, संगीतज्ञ और एक ऐसे प्रेमी हैं जो कभी माखन चुराकर मैया यशोदा से अपने कान खिंचवाता है – मूसल से बंधता है, तो कभी ग्वाल बालों की गेंद यमुना में फेंक देता है और खेल खेल में कालिया नाग का मर्दन करके तथा जनसाधारण को यह शिक्षा देता है कि स्वार्थपरता, निर्दयता आदि ऐसे दोष हैं जो जीवन रूपी यमुना के निर्मल जल को विषाक्त कर देते हैं | जब तक सात्विक बुद्धि से इन विकारों का मर्दन नहीं किया जाएगा तब तक जीवन सरिता की सरसता एवं शुद्धता असम्भव रहेगी | कभी गोपियों के वस्त्र हरण कर उन्हें शालीनता और सदाचार की शिक्षा देने वाला सद्गुरु बनता है तो कभी गोपियों संग रास रचाता है | कभी सुदामा का आदर्श मित्र बनकर उनके तंदुल खाकर बदले में राज पाट दे देता है | ये घटना सामन्तवादी मनोवृत्ति का भी पूर्ण रूप से विरोध करते हुए ऐसी प्रवृत्ति का उपहास करती है | साथ ही सुदामा जैसे लोग जो परिग्रह और अभाव में अन्तर भुला बैठते हैं उनके लिए एक सीख भी है कि दोनों में सन्तुलन स्थापित करने की आवश्यकता है | परिग्रह मत करो पर अभावग्रस्त भी मत रहो | व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है इसलिए उसके लिए व्यावहारिक होना अत्यन्त आवश्यक है |

श्री कृष्ण एक ऐसे क्रान्तिकारी भी हैं जो अन्याय के विरुद्ध सुदर्शन चक्र उठाने में भी नहीं चूकते | कृष्ण के रूप में एक ऐसा युगप्रवर्तक दिखाई देता है जो निरर्थक रीति रिवाज़ों के विरोध में खड़ा होकर इन्द्र की पूजा को रोककर इन्द्र को क्रुद्ध कर देता है लेकिन वहीं गवर्धन पर्वत के नीचे सबको इकट्ठा करके अपने आस पास की प्रकृति का, बुजुर्गों का, पशुधन का सम्मान करने की शिक्षा भी देता है | साथ ही यह भी बताता है कि व्यक्ति का परम धर्म जनसेवा है – एक राजा अथवा कबीले का मुखिया भी वास्तव में जनसेवक ही होता है | साथ ही जो भक्ति मार्ग की दिशा में भी संसार को समझाता है कि केवल दम्भ प्रदर्शन के लिये किया गया कर्मकाण्ड और वेदपाठ केवल आत्मप्रवंचना है तथा ममता और निरभिमानता ही जीवन का सार है |

कहने का अर्थ यह कि कृष्ण के चरित्र में एक आदर्श पुत्र, आदर्श सखा, आदर्श प्रेमी और पति, आदर्श मित्र, निष्पक्ष और निष्कपट व्यवहार करने वाले उत्कृष्ट राजनीतिक कुशलता वाले एक आदर्श राजनीतिज्ञ, आदर्श योद्धा, आदर्श क्रान्तिकारी, उच्च कोटि के संगीतज्ञ इत्यादि वे सभी गुण दीख पड़ते हैं जो उन्हें पूर्ण पुरुष बनाते हैं | वास्तव में श्री कृष्ण षोडश कलासम्पन्न युगप्रवर्तक पूर्णपुरुष थे |

संसार के जिस जिस सम्बन्ध और जिस जिस स्तर पर जो जो व्यवहार हुआ करते हैं उन सबकी दृष्टि से और देश, काल, पात्र, अवस्था, अधिकार आदि भेदों से व्यक्ति के जितने भिन्न भिन्न धर्म अथवा कर्तव्य हुआ करते हैं उन सबमें कृष्ण ने अपने विचार, व्यवहार और आचरण से एक सद्गुरु की भांति पथ प्रदर्शन किया है | कर्तव्य चाहे माता पिता के प्रति रहा हो, चाहे गुरु-ब्राह्मण के प्रति, चाहे बड़े भाई के प्रति अथवा गौ माता और अपने भक्तों के प्रति रहा हो, चाहे शत्रु से व्यवहार हो अथवा मित्र से, चाहे शिष्य और शरणागत हो – सर्वत्र ही धर्म का उच्चतम स्वरूप और कर्तव्यपालन का सार्वभौम आदर्श उनके आचरण में प्रकट होता है | आज जो गो माता की रक्षा के लिए आन्दोलन प्रकाश में आए हैं देखा जाए तो कृष्ण के समय में ही गोरक्षा की नींव डल गई थी |

श्री कृष्ण जन्म भी कोई साधारण घटना नहीं थी | श्रीकृष्ण ने नगर के कारागार में जन्म लिया और गाँव में खेलते हुए उनका बचपन व्यतीत हुआ । इस प्रकार श्रीकृष्ण का चरित्र गाँव व नगर की संस्कृति को जोड़ता है | कोई भी साधारण मानव श्रीकृष्ण की तरह समाज की प्रत्येक स्थिति को छूकर, सबका प्रिय होकर राष्ट्रोद्धारक बन सकता है । कंस के वीर राक्षसों को पल में मारने वाला अपने प्रिय ग्वालों से पिट जाता है । खेल में हार जाता है । यही है दिव्य प्रेम की स्थापना का उदाहरण ।

श्रीकृष्ण को सहस्ररमणीप्रिय और रसिक आदि भी कहा जाता है | लेकिन ऐसा कहते समय हम यह भूल जाते हैं कि भौमासुर के विनाश के पश्चात् उसके द्वारा बन्दी बनाई गई सोलह हज़ार स्त्रियों को कृष्ण यदि स्वीकार न करते तो समाज तो उन्हें स्वीकार करता ही नहीं | उनके साथ विवाह के लिए कोई आगे नहीं आता | उन्हें कुलटा मान लिया जाता और उनका तिरस्कार करते हुए उन पर अत्याचार भी किये जाते | उनके सम्मान की रक्षा के लिए ही श्रीकृष्ण ने यह आदर्श स्थापित किया | रासलीला का भी यही मर्म है | भाव, ताल, नृत्य, छन्द, गीत, रूपक एवं लीलाभिनय से युक्त यह रास – जिसमें रस का उद्भव मन से होता है तथा जो पूर्ण रूप से अलौकिक और आध्यात्मिक है | समस्त ब्रह्माण्ड में जो विराट नृत्य चल रहा है प्रकृति और पुरूष (परमात्मा) का, श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य उस विराट नृत्य की ही तो एक झलक है । उस रास में किसी प्रकार की काम भावना नहीं है | कृष्ण पुरूष तत्व है और गोपिकाएँ प्रकृति तत्व । इस प्रकार कृष्ण और गोपियों का नृत्य प्रकृति और पुरूष का महानृत्य है । विराट प्रकृति और विराट पुरूष का महारास है यह | तभी तो प्रत्येक गोपी यही अनुभव करती है कि कृष्ण उसी के साथ नृत्यलीन हैं । रासलीला में कृष्ण तथा गोपियों का प्रेम अपने उस चरम उत्कर्ष बिंदु पर पहुँचता है जहाँ किसी भी प्रकार की शारीरिक अथवा मानसिक गोपनीयता अथवा रहस्य का आवरण नहीं रहता |

भगवान श्रीकृष्ण की यही लीलाएँ सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रप्रियता का प्रेरक मानदण्ड हैं । यही कारण है कि श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अनूठा, अपूर्व और अनुपमेय है । श्रीकृष्ण अतीत के होते हुए भी वर्तमान की शिक्षा और भविष्य की अमूल्य धरोहर हैं । उनका व्यक्तित्व इतना विराट है कि उसे पूर्ण रूप से समझ पाना वास्तव में कठिन कार्य है । वे अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों व ऊँचाइयों पर जाकर भी न तो गम्भीर ही दिखाई देते हैं और न ही उदासीन दीख पड़ते हैं, अपितु पूर्ण रूप से जीवनी शक्ति से भरपूर व्यक्तित्व हैं | श्रीकृष्ण के चरित्र में नृत्य है, गीत है, प्रीति है, समर्पण है, हास्य है, रास है, और है आवश्यकता पड़ने पर युद्ध को भी स्वीकार कर लेने की मानसिकता । धर्म व सत्य की रक्षा के लिए महायुद्ध का उद्घोष है । एक हाथ में बाँसुरी और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर महा-इतिहास रचने वाला कोई अन्य व्यक्तित्व नहीं हुआ संसार के इतिहास में । उनका व्यक्तित्त्व एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसने जीवन के प्रत्येक पल को, प्रत्येक पदार्थ को, प्रत्येक घटना को समग्रता के साथ स्वीकार किया – कभी आधे अधूरे मन से कुछ नहीं किया | प्रेम किया तो पूर्ण रूप से स्वयं को उसमें डुबो दिया, फिर मित्रता भी की तो उसके प्रति भी पूर्ण निष्ठावान रहे | जब युद्ध स्वीकार किया तो उसमें भी पूर्ण स्वीकृति का भाव रहा |

इस प्रकार कृष्ण एक ऐसा विराट स्वरूप हैं कि किसी को उनका बालरूप पसन्द आता है तो कोई उन्हें आराध्य के रूप में देखता है तो कोई सखा के रूप में | किसी को उनका मोर मुकुट और पीताम्बरधारी, यमुना के तट पर कदम्ब वृक्ष के नीचे वंशी बजाता हुआ प्राणप्रिया राधा के साथ प्रेम रचाता प्रेमी का रूप भाता है तो कोई उनके महाभारत के पराक्रमी और रणनीति के ज्ञाता योद्धा के रूप की सराहना करता है और उन्हें युगपुरुष मानता है | वास्तव में श्रीकृष्ण पूर्ण पुरूष हैं । वास्तव में श्रीकृष्ण प्रेममय, दयामय, दृढ़व्रती, धर्मात्मा, नीतिज्ञ, समाजवादी दार्शनिक, विचारक, राजनीतिज्ञ, लोकहितैषी, न्यायवान, क्षमावान, निर्भय, निरहंकार, तपस्वी एवं निष्काम कर्मयोगी थे, और लौकिक मानवी शक्ति से कार्य करते हुए भी अलौकिक चरित्र के महामानव थे… युगप्रवर्तक पूर्ण पुरुष थे…

एक बार पुनः श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

जन्माष्टमी

चित्रों की अदला बदली

जीवन क्या है

मात्र चित्रों की एक अदला बदली…

किसी अनदेखे चित्रकार द्वारा बनाया गया एक अद्भुत चित्र…

जिसे देकर एक रूप / उकेर दी हैं हाव भाव और मुद्राएँ

और भर दिए हैं विविध रंग / उमंगों और उत्साहों के

सुखों और दुखों के / रागों और विरागों के

कर्तव्य और अकर्तव्य के / प्रेम और घृणा के

अनेकों पूर्ण अपूर्ण इच्छाओं-आकाँक्षाओं-महत्त्वाकांक्षाओं के

किसी अदेखी, लेकिन स्वप्न सी स्पष्ट एक कूची से…

कूची, जो बनी है सम्बन्धों, अधिकारों और कर्तव्यों के मेल से…

और फिर परिवार, समाज, राष्ट्र, काल के फ्रेम में जड़कर

टांग दिया है संसार के रंगमंच पर / बनाकर आकर्षण का केन्द्रबिन्दु…

एक ऐसा चित्र / समय के साथ साथ धुँधले पड़ जाते हैं

जिसके समस्त हाव भाव / सारी मुद्राएँ…

धीरे धीरे फीके पड़ जाते हैं जिसके सारे रंग…

लुप्त हो जाता है सारा आकर्षण उस चित्र का…

और तब / परिवार, समाज, राष्ट्र, काल के फ्रेम से निकाल कर

फेंक दिया जाता है मिलने को धूल में

और जड़ दिया जाता है एक अन्य नवीन चित्र उसी फ्रेम में

उसी अनदेखे चित्रकार द्वारा / जो कहलाता है अनादि और अनन्त

जो फूला नहीं समाता / अपने हर नए चित्र को देखकर

जो हो जाता है मुग्ध / अपनी हर नवीन रचना पर

तभी तो बना देता है उसे आकर्षण का केन्द्रबिन्दु

और टांग देता है संसार के रंगमंच पर…

लेकिन फिर कुछ ही समय पश्चात / छा जाती है उदासीनता उस चित्रकार पर

हो जाता है विरक्त अपनी ही उस अद्भुत कृति से…

तभी तो पुराना पड़ते ही अपने चित्र के

निकाल फेंकता है उसे उस ख़ूबसूरत से फ्रेम से

और जड़ देता है वहाँ बनाकर एक दूसरा नवीन चित्र

जिसमें बनाता है नवीन हाव भाव और मुद्राएँ

और भरता है रंग / जो होते हैं पहले से भी नए और खिले खिले

उमंगों और उत्साहों के / सुखों और दुखों के / रागों और विरागों के

कर्तव्य और अकर्तव्य के / प्रेम और घृणा के

अनेकों पूर्ण अपूर्ण इच्छाओं-आकाँक्षाओं-महत्त्वाकांक्षाओं के

सम्बन्धों, अधिकारों और कर्तव्यों की कूची से…

इस तरह जीवन्त जीवन / होकरके सारहीन / रंगहीन

बार बार मिला दिया जाता है मिट्टी में

अपने ही चित्रकार के हाथों / रचने को एक नवीन रचना…

चलता रहता है यही क्रम / निरन्तर / अनवरत / अविरत

बीतते जाते हैं पल-छिन / दिन-मास / वर्ष-युग-कल्प

चित्रों की इसी अदला बदली में…

क्योंकि होते हुए भी असार / यही है सत्य जीवन का

शाश्वत और चिरन्तन…

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अध्यात्मयुत सूक्ष्म मनोविज्ञान

कर्ममार्ग पर अग्रसर होने में ऐसा अनेक बार हो सकता है कि व्यक्ति कर्तव्य और अकर्तव्य का भेद बुला बैठे और संशयग्रस्त हो जाए | जब जब भी इस प्रकार के संशय की स्थिति आती है कि व्यक्ति को कर्म अकर्म का कोई ज्ञान नहीं रहता तब तब श्रीकृष्ण जैसे किसी मनश्चिकित्सक की आवश्यकता होती है |

रामचरितमानस में एक प्रसंग आता है कि जामवंत, हनुमान, अंगद आदि वानर सेना के साथ माता सीता का पता लगाने जाते हैं | बहुत समय व्यतीत हो जाता है किन्तु वे अपने कार्य में सफल नही हो पाते | सब सोचते हैं कि कार्य पूर्ण किये बिना यदि वापस गए तो सुग्रीव हमें जीवित नहीं छोड़ेंगे, और यदि यहाँ पड़े रहे तो वैसे ही भूख प्यास से हम सब मारे जाएँगे | क्या करें क्या न करें | वही किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति | तभी जटायु का भाई सम्पाति वहाँ आता है और बताता है कि माता सीता को रावण ने अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा हुआ है | मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, किन्तु तुम लोगों को राम का यह कार्य अवश्य करना चाहिये | वानर शत योजन सागर पार करके लंका जाने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे थे | जामवन्त को लगता था कि वे बूढ़े हो चुके हैं | अंगद और हनुमान भी सशंकित थे कि वे लोग सम्भवतः लंका नहीं जा पाएँगे | अपना बल ही वे भूल चुके थे | तब जामवन्त ने कहा :

“पवन तनय, बल पवन समाना, बुद्धि बिबेक बिग्यान निधाना |
कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होत तात तुम्ह पाहीं |
राम काज लगि तव अवतारा, सुनतहिं भयऊ पर्वताकारा ||” – किष्किन्धाकाण्ड

“हनुमान तुम चुप क्यों बैठे हो ? तुम्हारा बल तो पवन के समान है | बुद्धि, विवेक और विज्ञान के तुम निधान हो | संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जो तुम कर न सको | तुम्हारा तो जन्म ही भगवान के कार्य के लिये हुआ है |” इतना सुनकर हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण हुआ और बोले “यदि ऐसा है तो मैं अभी जाता हूँ और माता सीता को देखकर वापस आता हूँ | कार्य पूर्ण होने पर मुझे भी हर्ष होगा – जब लगि आवौं सीतहि देखी, होहहि काजु मोहि हरष विसेषी – सुन्दरकाण्ड…” और वे तुरंत पर्वताकार होकर लंका की ओर चल दिये | इस प्रकार हनुमान के संशय को जामवंत ने दूर किया |

अर्जुन के साथ भी यही स्थिति थी | उन्हें भी मोहवश अपने लक्ष्य का भान नहीं रहा था | वही उन्हें बताना था | इसीलिये उन्होंने कहा कि समस्त कामनाओं का त्याग करके कर्तव्य कर्म करो | ज्ञानी व्यक्ति का यही लक्षण है | अर्जुन ने फिर संशय किया कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर आप मुझे हिंसा जैसे क्रूर कर्म में क्यों लगाते हैं ? भगवान ने उत्तर दिया कि तुम्हारा कर्तव्य कर्म युद्ध ही है | तीनों लोकों में मेरा तो कोई कर्तव्य कर्म नहीं है, फिर भी मैं कर्म करता हूँ | यदि मैं ऐसा नहीं करूँगा तो लोक मर्यादा का उल्लंघन होगा |

संशय अभी ही दूर नहीं हुआ था | अतः बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होने की प्रक्रिया आरम्भ हुई | अर्थात् सूक्ष्म मनोविज्ञान | सर्वप्रथम अर्जुन को भगवान ने विराट स्वरूप के दर्शन कराए | युद्ध में मरने वाले लोगों का समूह दिखाया | ताकि अर्जुन सोचने को विवश हो जाएँ कि यह युद्ध तथा यह जनहानि अवश्यम्भावी है | अतः धर्म की रक्षा हेतु युद्ध के लिये तत्पर होना ही पड़ेगा | प्रश्न मात्र राज्य प्राप्ति का ही नहीं था | प्रश्न था कि कायरतापूर्वक अन्याय तथा अत्याचार होते देखते रहना क्या उचित है ? अर्जुन सोचने को विवश तो हुए, किन्तु ऊहापोह की स्थिति फिर भी बनी ही रही | अतः भगवान ने एक लीला रची |

भगवान ने सोचा अभी पूरा झटका नहीं लगा है | उधर एक दिन जब अर्जुन का रथ लेकर कहीं दूर गए हुए थे तो उनके पीछे कौरवों ने चक्रव्यूह का निर्माण कर दिया | उनकी योजना युधिष्ठिर को बन्दी बनाने की थी | क्योंकि अर्जुन के अतिरिक्त उनके किसी भाई अथवा उनकी सेना के किसी व्यक्ति को चक्रव्यूह का भेदन नहीं आता था | अर्जुन के सोलह वर्ष के पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदन तो आता था, किन्तु उससे बाहर निकलना नहीं आता था | कारण था कि अभिमन्यु जब सुभद्रा के गर्भ में थे तब अर्जुन ने सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन की विधि बताई थी, किन्तु सुनते सुनते सुभद्रा को नींद आ गई थी और उससे बाहर निकलने की विधि वे नहीं सुन पाई थीं | इसलिये अभिमन्यु बस चक्रव्यूह भेदना ही जानते थे | किन्तु उस समय उन्हें युद्ध में भेजने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था |

अभिमन्यु बड़ी वीरता से लड़े | उनका सारथि मारा गया | रथ टूट गया | सारे अस्त्र समाप्त हो गए तो उन्होंने टूटे हुए रथ के पहिये को ही अपना अस्त्र बना लिया | किन्तु अन्त में वह भी टूट गया और निहत्थे अभिमन्यु को कौरव सेना ने घेर कर मार डाला | सबसे बड़ी विडम्बना यह थी कि भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजन – जिन पर अर्जुन को अगाध श्रद्धा थी और जिन्हें वे धर्म तथा मर्यादा के रक्षक समझते थे तथा जिनके कारण ही वे युद्ध से विमुख हो रहे थे – चुपचाप ये सब अनाचार होते देखते रहे थे | अन्ततः अर्जुन का इन दोनों गुरुजनों पर से भी विश्वास उठ गया और वे युद्ध के लिये तत्पर हो गए और उन्होंने सूर्यास्त से पूर्व ही चक्रव्यूह का निर्माण करने वाले जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा कर ली और कृष्ण की सहायता से उसमें वे सफल भी हुए |

इस प्रकार धीरे धीरे अर्जुन के मन का संशय तथा परिजनों की मृत्यु का भय दूर करके उन्हें युद्ध के लिये कटिबद्ध किया गया | जयद्रथ वध के समान ही महाभारत युद्ध में अनेक बार कृष्ण ने छल का सहारा लिया | जैसे “अश्वत्थामा मृतः” के शोर से शत्रुसेना में भगदड़ मचवा दी | भीष्म के सामने शिखण्डी को खड़ा कर दिया – इत्यादि इत्यादि… कारण – रोग को दूर करने के लिये कभी कभी कड़वी दवा भी देनी पड़ती है | मनःचिकित्सक भी अनेक बार अपने रोगियों के साथ सम्मोहन आदि की क्रिया करते हैं | भगवान को भी अपने एक मरीज़ अर्जुन के मन का विभ्रम दूर करके उन्हें युद्ध के लिये प्रेरित करना था | अतः जब जब अर्जुन भ्रमित होते – उनके मन में कोई शंका उत्पन्न होती – भगवान कोई न कोई झटका उन्हें दे देते | यही कारण था की महाभारत के युद्ध में प्रायः अधिकाँश नियमों को उठाकर ताक पर रख दिया गया था | क्योंकि उस समय की परिस्थितियों के अनुसार किसी प्रकार भी उस धर्मयुद्ध में विजय प्राप्त करके समस्त व्यवस्था को सुनियोजित रूप देना ही अर्जुन का लक्ष्य था | उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अर्जुन को समत्व बुद्धि अपनानी थी | उसे शत्रु मित्र छोटे बड़े सबके लिये समान भाव रखते हुए युद्ध में प्रवृत्त होना था | तभी एक ओर जहाँ वह दुर्योधन तथा दुशासन आदि कौरवों से युद्ध कर सकता था वहीं भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों के साथ युद्ध करने में भी उसका संकोच समाप्त हो सकता था | इसीलिये कृष्ण ने उसे योग का उपदेश दिया | यही थी अन्तर्मुखी होने की प्रक्रिया – सूक्ष्म मनोविज्ञान, और इसी से समझ में आ सकता था जीवन का मूल्य |

“नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पम्प्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || – २/४०” मनश्चिकित्सक का प्रथम कर्तव्य है रोगी को यथार्थ का ज्ञान कराना | आरम्भ ही अभिक्रम है – इस कर्मयोगरूप मोक्षमार्ग में अभिक्रम का नाश नहीं होता तथा चिकित्सा आदि की भाँति इसमें प्रत्यवाय अर्थात् विपरीत फल नहीं है | इस कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मरण रूप महान संसार भय से रक्षा करता है |

ध्यानयोग का बहिरंग साधन कर्म है | अतः जब तक ध्यानयोग पर आरूढ़ होने में समर्थ नहीं हो जाते तब तक कर्तव्य कर्म अवश्य करते रहना चाहिये | जैसे जैसे ध्यानयोग के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती जाती है – मनुष्य के समस्त कर्म स्वतः ही समाप्त होते जाते हैं |

यद्यपि कर्म कूप तालाब आदि छोटे जलाशयों की भांति अल्प फल देने वाले होते हैं – तो भी ज्ञान निष्ठा का अधिकार मिलने से पूर्व कर्म ही करते रहना चाहिये |

साथ ही, न तो कर्मफल में तृष्णा होनी चाहिये और न ही “यदि कर्मफलं न इष्यते किं कर्मणा दुःखरूपेण |” भाव से कर्म में अनासक्ति ही होनी चाहिये | फलतृष्णा रहित पुरुषार्थ द्वारा कार्य किये जाने पर अन्तःकरण की शुद्धि होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है | अतः सिद्धि असिद्धि में समत्व भाव से कर्म करना चाहिये – समत्वं योग उच्यते |

सकाम कर्म करने वाले तो कृपण होते हैं | इसी कृपणता के कारण मनुष्य विक्षिप्त होता है, भयभीत होता है – यह सोचकर कि उसके किये गए कर्म का फल उसे मिलेगा भी अथवा नहीं, और मिलेगा तो कितने समय में मिलेगा, कैसा मिलेगा – आदि आदि… अर्थात् उसमें वणिकबुद्धि आ जाती है | जब बुद्धि इस मोहात्मक अविवेक का उल्लंघन कर जाती है तब वह बिल्कुल शुद्ध हो जाती है | समाधि में अर्थात् चित्त के समाधान द्वारा विक्षिप्त हुई बुद्धि अचल और दृढ़ हो जाती है – स्थिर हो जाती है | अतः यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धि की स्थिरता चाहने वाले को इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है | यही है अध्यात्मयुत मनोविज्ञान |

भारतीय जीवन दर्शन – भारतीय मनोविज्ञान – अध्यात्म पर ही आधारित है | भारतीय जन मानस में एक ही आस्था है “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” और इस प्रकार अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा अन्ततः मोक्षरूप परम पद को प्राप्त करना | इस लक्ष्य से थोड़ा सा भी च्युत होते ही मति विभ्रम हो जाता है | यही कारण था कि भगवान का विराट रूप देखकर जब अर्जुन भयभीत और भ्रमित हो गए तब भगवान ने उनसे यही कहा कि तू युद्ध करे या न करे, इन सबका अन्त तो अवश्यम्भावी है | फिर क्यों नहीं तू निमित्त मात्र होकर युद्ध करता ? मन:चिकित्सक का वास्तविक कार्य यही है – यथार्थ का ज्ञान कराना – मनुष्य को उसकी ज़मीन से जोड़ना |

इस प्रकार अर्जुन को यह जो अन्तर्मुखी बनाने की प्रक्रिया हुई यही है सूक्ष्म मनोविज्ञान | तदुपरान्त भगवान ने अर्जुन को आत्मस्वरूप के दर्शन कराए और धीरे धीरे ज्ञान का बीजारोपण किया | इस प्रकार उनके मन को परिवर्तित करके उन्हें त्याग और वैराग्य का मार्ग बताया | जिससे उनके मन के विभ्रम का, मोह का नाश हुआ और वे कर्तव्य कर्म में प्रस्तुत हुए | यह थी अध्यात्म के द्वारा अर्जुन की मनश्चिकित्सा | युद्ध के लिये कटिबद्ध अर्जुन ने स्वयं कहा “नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव || १८/७३” हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हुई | इसलिये मैं संशयरहित होकर स्थिरबुद्धि वाला हो गया हूँ और अब आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

सम्भवतः कुछ लोगों का विचार हो कि निष्काम कर्मयोग तो सन्यासियों के लिये होता है, गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिये, सामाजिक जीवन जीने वालों के लिये तो यह निष्काम कर्मयोग सम्भवतः उन्हें कर्म ही न करने दे | किन्तु यदि ऐसा होता तब तो अर्जुन – जो कि मोहवश क्षात्रधर्म से विमुख होकर गाण्डीव छोड़कर बैठ गए थे – गीता का उपदेश सुनकर सब कुछ छोड़ छाड़ कर सन्यासी हो जाते | किन्तु ऐसा नहीं हुआ | अपितु इस उपदेश को सुनकर ही उन्होंने आजीवन गृहस्थ रहकर अपने कर्तव्य का पालन किया | जब इस प्रकार आध्यात्म मार्ग से मन का विभ्रम दूर करके, उसे स्थिर करके कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त किया जा सकता है, तो भला क्यों नहीं किसी भी बड़े से बड़े अपराधी का ह्रदय परिवर्तन नहीं किया जा सकता इस प्रकार अध्यात्म परक मन:चिकित्सा के द्वारा ? यहाँ तक कि सम्पूर्ण समाज का ह्रदय परिवर्तन किया जा सकता है | और फिर तब किसी भी प्रकार के सामाजिक भय से, धर्म के भय से, लोक मर्यादा के भय से, जाति के भय से, मान प्रतिष्ठा के भय से, अथवा अन्य किसी भी प्रकार के मानसिक विकार से व्यक्ति को, समाज को मुक्ति प्राप्त हो सकती है और अनेक प्रकार के अपराधों को होने से रोका जा सकता है | इस प्रकार की अध्यात्मपरक मन:चिकित्सा का मार्ग कठिन अवश्य है, लंबा भी है, किन्तु इसके परिणाम भी उतने ही दूरगामी हैं |

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