अध्यात्मयुत सूक्ष्म मनोविज्ञान

कर्ममार्ग पर अग्रसर होने में ऐसा अनेक बार हो सकता है कि व्यक्ति कर्तव्य और अकर्तव्य का भेद बुला बैठे और संशयग्रस्त हो जाए | जब जब भी इस प्रकार के संशय की स्थिति आती है कि व्यक्ति को कर्म अकर्म का कोई ज्ञान नहीं रहता तब तब श्रीकृष्ण जैसे किसी मनश्चिकित्सक की आवश्यकता होती है |

रामचरितमानस में एक प्रसंग आता है कि जामवंत, हनुमान, अंगद आदि वानर सेना के साथ माता सीता का पता लगाने जाते हैं | बहुत समय व्यतीत हो जाता है किन्तु वे अपने कार्य में सफल नही हो पाते | सब सोचते हैं कि कार्य पूर्ण किये बिना यदि वापस गए तो सुग्रीव हमें जीवित नहीं छोड़ेंगे, और यदि यहाँ पड़े रहे तो वैसे ही भूख प्यास से हम सब मारे जाएँगे | क्या करें क्या न करें | वही किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति | तभी जटायु का भाई सम्पाति वहाँ आता है और बताता है कि माता सीता को रावण ने अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा हुआ है | मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, किन्तु तुम लोगों को राम का यह कार्य अवश्य करना चाहिये | वानर शत योजन सागर पार करके लंका जाने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे थे | जामवन्त को लगता था कि वे बूढ़े हो चुके हैं | अंगद और हनुमान भी सशंकित थे कि वे लोग सम्भवतः लंका नहीं जा पाएँगे | अपना बल ही वे भूल चुके थे | तब जामवन्त ने कहा :

“पवन तनय, बल पवन समाना, बुद्धि बिबेक बिग्यान निधाना |
कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होत तात तुम्ह पाहीं |
राम काज लगि तव अवतारा, सुनतहिं भयऊ पर्वताकारा ||” – किष्किन्धाकाण्ड

“हनुमान तुम चुप क्यों बैठे हो ? तुम्हारा बल तो पवन के समान है | बुद्धि, विवेक और विज्ञान के तुम निधान हो | संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जो तुम कर न सको | तुम्हारा तो जन्म ही भगवान के कार्य के लिये हुआ है |” इतना सुनकर हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण हुआ और बोले “यदि ऐसा है तो मैं अभी जाता हूँ और माता सीता को देखकर वापस आता हूँ | कार्य पूर्ण होने पर मुझे भी हर्ष होगा – जब लगि आवौं सीतहि देखी, होहहि काजु मोहि हरष विसेषी – सुन्दरकाण्ड…” और वे तुरंत पर्वताकार होकर लंका की ओर चल दिये | इस प्रकार हनुमान के संशय को जामवंत ने दूर किया |

अर्जुन के साथ भी यही स्थिति थी | उन्हें भी मोहवश अपने लक्ष्य का भान नहीं रहा था | वही उन्हें बताना था | इसीलिये उन्होंने कहा कि समस्त कामनाओं का त्याग करके कर्तव्य कर्म करो | ज्ञानी व्यक्ति का यही लक्षण है | अर्जुन ने फिर संशय किया कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर आप मुझे हिंसा जैसे क्रूर कर्म में क्यों लगाते हैं ? भगवान ने उत्तर दिया कि तुम्हारा कर्तव्य कर्म युद्ध ही है | तीनों लोकों में मेरा तो कोई कर्तव्य कर्म नहीं है, फिर भी मैं कर्म करता हूँ | यदि मैं ऐसा नहीं करूँगा तो लोक मर्यादा का उल्लंघन होगा |

संशय अभी ही दूर नहीं हुआ था | अतः बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होने की प्रक्रिया आरम्भ हुई | अर्थात् सूक्ष्म मनोविज्ञान | सर्वप्रथम अर्जुन को भगवान ने विराट स्वरूप के दर्शन कराए | युद्ध में मरने वाले लोगों का समूह दिखाया | ताकि अर्जुन सोचने को विवश हो जाएँ कि यह युद्ध तथा यह जनहानि अवश्यम्भावी है | अतः धर्म की रक्षा हेतु युद्ध के लिये तत्पर होना ही पड़ेगा | प्रश्न मात्र राज्य प्राप्ति का ही नहीं था | प्रश्न था कि कायरतापूर्वक अन्याय तथा अत्याचार होते देखते रहना क्या उचित है ? अर्जुन सोचने को विवश तो हुए, किन्तु ऊहापोह की स्थिति फिर भी बनी ही रही | अतः भगवान ने एक लीला रची |

भगवान ने सोचा अभी पूरा झटका नहीं लगा है | उधर एक दिन जब अर्जुन का रथ लेकर कहीं दूर गए हुए थे तो उनके पीछे कौरवों ने चक्रव्यूह का निर्माण कर दिया | उनकी योजना युधिष्ठिर को बन्दी बनाने की थी | क्योंकि अर्जुन के अतिरिक्त उनके किसी भाई अथवा उनकी सेना के किसी व्यक्ति को चक्रव्यूह का भेदन नहीं आता था | अर्जुन के सोलह वर्ष के पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदन तो आता था, किन्तु उससे बाहर निकलना नहीं आता था | कारण था कि अभिमन्यु जब सुभद्रा के गर्भ में थे तब अर्जुन ने सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन की विधि बताई थी, किन्तु सुनते सुनते सुभद्रा को नींद आ गई थी और उससे बाहर निकलने की विधि वे नहीं सुन पाई थीं | इसलिये अभिमन्यु बस चक्रव्यूह भेदना ही जानते थे | किन्तु उस समय उन्हें युद्ध में भेजने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था |

अभिमन्यु बड़ी वीरता से लड़े | उनका सारथि मारा गया | रथ टूट गया | सारे अस्त्र समाप्त हो गए तो उन्होंने टूटे हुए रथ के पहिये को ही अपना अस्त्र बना लिया | किन्तु अन्त में वह भी टूट गया और निहत्थे अभिमन्यु को कौरव सेना ने घेर कर मार डाला | सबसे बड़ी विडम्बना यह थी कि भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजन – जिन पर अर्जुन को अगाध श्रद्धा थी और जिन्हें वे धर्म तथा मर्यादा के रक्षक समझते थे तथा जिनके कारण ही वे युद्ध से विमुख हो रहे थे – चुपचाप ये सब अनाचार होते देखते रहे थे | अन्ततः अर्जुन का इन दोनों गुरुजनों पर से भी विश्वास उठ गया और वे युद्ध के लिये तत्पर हो गए और उन्होंने सूर्यास्त से पूर्व ही चक्रव्यूह का निर्माण करने वाले जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा कर ली और कृष्ण की सहायता से उसमें वे सफल भी हुए |

इस प्रकार धीरे धीरे अर्जुन के मन का संशय तथा परिजनों की मृत्यु का भय दूर करके उन्हें युद्ध के लिये कटिबद्ध किया गया | जयद्रथ वध के समान ही महाभारत युद्ध में अनेक बार कृष्ण ने छल का सहारा लिया | जैसे “अश्वत्थामा मृतः” के शोर से शत्रुसेना में भगदड़ मचवा दी | भीष्म के सामने शिखण्डी को खड़ा कर दिया – इत्यादि इत्यादि… कारण – रोग को दूर करने के लिये कभी कभी कड़वी दवा भी देनी पड़ती है | मनःचिकित्सक भी अनेक बार अपने रोगियों के साथ सम्मोहन आदि की क्रिया करते हैं | भगवान को भी अपने एक मरीज़ अर्जुन के मन का विभ्रम दूर करके उन्हें युद्ध के लिये प्रेरित करना था | अतः जब जब अर्जुन भ्रमित होते – उनके मन में कोई शंका उत्पन्न होती – भगवान कोई न कोई झटका उन्हें दे देते | यही कारण था की महाभारत के युद्ध में प्रायः अधिकाँश नियमों को उठाकर ताक पर रख दिया गया था | क्योंकि उस समय की परिस्थितियों के अनुसार किसी प्रकार भी उस धर्मयुद्ध में विजय प्राप्त करके समस्त व्यवस्था को सुनियोजित रूप देना ही अर्जुन का लक्ष्य था | उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अर्जुन को समत्व बुद्धि अपनानी थी | उसे शत्रु मित्र छोटे बड़े सबके लिये समान भाव रखते हुए युद्ध में प्रवृत्त होना था | तभी एक ओर जहाँ वह दुर्योधन तथा दुशासन आदि कौरवों से युद्ध कर सकता था वहीं भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों के साथ युद्ध करने में भी उसका संकोच समाप्त हो सकता था | इसीलिये कृष्ण ने उसे योग का उपदेश दिया | यही थी अन्तर्मुखी होने की प्रक्रिया – सूक्ष्म मनोविज्ञान, और इसी से समझ में आ सकता था जीवन का मूल्य |

“नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पम्प्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || – २/४०” मनश्चिकित्सक का प्रथम कर्तव्य है रोगी को यथार्थ का ज्ञान कराना | आरम्भ ही अभिक्रम है – इस कर्मयोगरूप मोक्षमार्ग में अभिक्रम का नाश नहीं होता तथा चिकित्सा आदि की भाँति इसमें प्रत्यवाय अर्थात् विपरीत फल नहीं है | इस कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मरण रूप महान संसार भय से रक्षा करता है |

ध्यानयोग का बहिरंग साधन कर्म है | अतः जब तक ध्यानयोग पर आरूढ़ होने में समर्थ नहीं हो जाते तब तक कर्तव्य कर्म अवश्य करते रहना चाहिये | जैसे जैसे ध्यानयोग के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती जाती है – मनुष्य के समस्त कर्म स्वतः ही समाप्त होते जाते हैं |

यद्यपि कर्म कूप तालाब आदि छोटे जलाशयों की भांति अल्प फल देने वाले होते हैं – तो भी ज्ञान निष्ठा का अधिकार मिलने से पूर्व कर्म ही करते रहना चाहिये |

साथ ही, न तो कर्मफल में तृष्णा होनी चाहिये और न ही “यदि कर्मफलं न इष्यते किं कर्मणा दुःखरूपेण |” भाव से कर्म में अनासक्ति ही होनी चाहिये | फलतृष्णा रहित पुरुषार्थ द्वारा कार्य किये जाने पर अन्तःकरण की शुद्धि होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है | अतः सिद्धि असिद्धि में समत्व भाव से कर्म करना चाहिये – समत्वं योग उच्यते |

सकाम कर्म करने वाले तो कृपण होते हैं | इसी कृपणता के कारण मनुष्य विक्षिप्त होता है, भयभीत होता है – यह सोचकर कि उसके किये गए कर्म का फल उसे मिलेगा भी अथवा नहीं, और मिलेगा तो कितने समय में मिलेगा, कैसा मिलेगा – आदि आदि… अर्थात् उसमें वणिकबुद्धि आ जाती है | जब बुद्धि इस मोहात्मक अविवेक का उल्लंघन कर जाती है तब वह बिल्कुल शुद्ध हो जाती है | समाधि में अर्थात् चित्त के समाधान द्वारा विक्षिप्त हुई बुद्धि अचल और दृढ़ हो जाती है – स्थिर हो जाती है | अतः यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धि की स्थिरता चाहने वाले को इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है | यही है अध्यात्मयुत मनोविज्ञान |

भारतीय जीवन दर्शन – भारतीय मनोविज्ञान – अध्यात्म पर ही आधारित है | भारतीय जन मानस में एक ही आस्था है “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” और इस प्रकार अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा अन्ततः मोक्षरूप परम पद को प्राप्त करना | इस लक्ष्य से थोड़ा सा भी च्युत होते ही मति विभ्रम हो जाता है | यही कारण था कि भगवान का विराट रूप देखकर जब अर्जुन भयभीत और भ्रमित हो गए तब भगवान ने उनसे यही कहा कि तू युद्ध करे या न करे, इन सबका अन्त तो अवश्यम्भावी है | फिर क्यों नहीं तू निमित्त मात्र होकर युद्ध करता ? मन:चिकित्सक का वास्तविक कार्य यही है – यथार्थ का ज्ञान कराना – मनुष्य को उसकी ज़मीन से जोड़ना |

इस प्रकार अर्जुन को यह जो अन्तर्मुखी बनाने की प्रक्रिया हुई यही है सूक्ष्म मनोविज्ञान | तदुपरान्त भगवान ने अर्जुन को आत्मस्वरूप के दर्शन कराए और धीरे धीरे ज्ञान का बीजारोपण किया | इस प्रकार उनके मन को परिवर्तित करके उन्हें त्याग और वैराग्य का मार्ग बताया | जिससे उनके मन के विभ्रम का, मोह का नाश हुआ और वे कर्तव्य कर्म में प्रस्तुत हुए | यह थी अध्यात्म के द्वारा अर्जुन की मनश्चिकित्सा | युद्ध के लिये कटिबद्ध अर्जुन ने स्वयं कहा “नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव || १८/७३” हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हुई | इसलिये मैं संशयरहित होकर स्थिरबुद्धि वाला हो गया हूँ और अब आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

सम्भवतः कुछ लोगों का विचार हो कि निष्काम कर्मयोग तो सन्यासियों के लिये होता है, गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिये, सामाजिक जीवन जीने वालों के लिये तो यह निष्काम कर्मयोग सम्भवतः उन्हें कर्म ही न करने दे | किन्तु यदि ऐसा होता तब तो अर्जुन – जो कि मोहवश क्षात्रधर्म से विमुख होकर गाण्डीव छोड़कर बैठ गए थे – गीता का उपदेश सुनकर सब कुछ छोड़ छाड़ कर सन्यासी हो जाते | किन्तु ऐसा नहीं हुआ | अपितु इस उपदेश को सुनकर ही उन्होंने आजीवन गृहस्थ रहकर अपने कर्तव्य का पालन किया | जब इस प्रकार आध्यात्म मार्ग से मन का विभ्रम दूर करके, उसे स्थिर करके कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त किया जा सकता है, तो भला क्यों नहीं किसी भी बड़े से बड़े अपराधी का ह्रदय परिवर्तन नहीं किया जा सकता इस प्रकार अध्यात्म परक मन:चिकित्सा के द्वारा ? यहाँ तक कि सम्पूर्ण समाज का ह्रदय परिवर्तन किया जा सकता है | और फिर तब किसी भी प्रकार के सामाजिक भय से, धर्म के भय से, लोक मर्यादा के भय से, जाति के भय से, मान प्रतिष्ठा के भय से, अथवा अन्य किसी भी प्रकार के मानसिक विकार से व्यक्ति को, समाज को मुक्ति प्राप्त हो सकती है और अनेक प्रकार के अपराधों को होने से रोका जा सकता है | इस प्रकार की अध्यात्मपरक मन:चिकित्सा का मार्ग कठिन अवश्य है, लंबा भी है, किन्तु इसके परिणाम भी उतने ही दूरगामी हैं |

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अध्यात्म गुरु और मनोचिकित्सक

अक्सर लोग ध्यान और वैराग्य के अभ्यास द्वारा मन का निग्रह करके ईश्वर प्राप्ति की बात करते हैं | यह प्रक्रिया अध्यात्म की प्रक्रिया है | इस प्रक्रिया के लिए गुरु के बताए मार्ग का अनुसरण करना होता है | मन को ध्यानावस्थित करना वास्तव में एक कठिन प्रक्रिया है – क्योंकि मन गतिमान होता है – चंचल होता है – बहुत शीघ्र ही मोहग्रस्त हो जाता है – अनेकों वासनाएँ और इच्छाएँ मन को जकड़े रखती हैं – और इन सबके कारण कर्तव्य अकर्तव्य का बोध ही व्यक्ति को नहीं रहता तो ध्यान की प्रक्रिया तो फिर इसके बहुत बाद में आरम्भ होती है | यही कारण है कि अध्यात्म गुरु को मनोचिकित्सक की भूमिका का भी निर्वाह करना पड़ जाता है अपने प्रशिक्षु के मन को व्यवस्थित करके उसे सही दिशा निर्देश देने के लिए | यहाँ प्रश्न किया जा सकता है कि क्या क्या सम्बन्ध है आपस में अध्यात्म और मनोविज्ञान का जो गुरु को मनोचिकित्सक का कार्य भी करना पड़ जाता है ? क्या अध्यात्म के द्वारा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा सम्भव है ? किन परिस्थितियों में मनुष्य भ्रमित हो सकता है ? तो, सबसे पहले विचार करते हैं कि मनुष्य भ्रमित कब होता है ?

भय व आतंक के वातावरण में मनुष्य अपने लक्ष्य से भटक जाता है, उसे कर्तव्य अकर्तव्य का भान नहीं रहता, और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में कई बार वह ग़लत निर्णय ले बैठता है | यह भय किसी भी बात का हो सकता है | अक्सर सुनने में आता है कि प्रेम करने वाले नवविवाहितों को “ऑनर किलिंग” के नाम पर मौत के घाट उतार दिया गया तो कहीं कुछ विकृत मानसिकता वाले युवकों ने निर्भया जैसा वीभत्स काण्ड कर डाला | कहीं किसी पुत्र ने सम्पत्ति विवाद के चलते अपने माता पिता को ही मौत की नींद सुला दिया | कहीं विवाहेतर सम्बन्धों के कारण पति अथवा पत्नी ने अपने जीवन साथी की ही जान ले ली |

किन्तु इस प्रकार के मनोविकार व्यक्ति में अकारण या अनायास ही नहीं आते | कहीं इनका कारण होता है बच्चों का अनुचित रूप से पालन पोषण – जिसके कारण उन्हें न परिवार का भय रहता है और न समाज का और न ही किसी प्रकार के दण्ड का | होता है तो केवल मिथ्या अहंकार अथवा लोभ अथवा मात्र मन की विकृति | इसके अतिरिक्त कुछ घटनाएँ कहीं समाज के भय के कारण होती हैं तो कहीं कारण होता है धर्म का भय | कई बार कहीं बिना किसी भय के भी केवल झूठे अहंकार के कारण भी ऐसी स्थिति हो जाती है | कहीं किसी अन्य कारण से भी लोग अनुचित कर्म कर जाते हैं | जैसे एक बार एक घटना का पता चला कि एक दादा ने अपनी ही चार पाँच बरस की पोती को अपनी हवस का शिकार बना डाला, आदि आदि… ऐसी पाशविकताएँ क्या स्वस्थ मनोवृत्ति वाले लोग कर सकते हैं ?

वास्तव में ऐसे लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हैं | किसी न किसी प्रकार की कुंठा से ग्रस्त हैं ये लोग | कहीं कोई एथलीट खेल में प्रथम आने के लिये नशीली दवाओं का सेवन करता पकड़ा जाता है | यह प्रतिष्ठा का भय है | धर्म का भय, लोक मर्यादा का भय, जाति अथवा समाज का भय, मान प्रतिष्ठा का भय – किसी प्रकार का भी भय मनुष्य को विक्षिप्त कर सकता है | और इन सबसे भी बढ़कर होता है मृत्यु का भय | हम अपने रास्ते यातायात के नियमों के अनुकूल गाड़ी चला रहे हैं कि अचानक ऐसा होता है कि किसी दूसरी कार का ड्राइवर बिना आगे पीछे दाएँ बाएँ देखे गाड़ी सड़क पर ले आता है | उस समय दो ही बातें हो सकती हैं – यदि हममें समझदारी है, साहस है, तो हम सफ़ाई से अपनी गाड़ी एक ओर को बचाकर निकाल ले जाने का प्रयास करेंगे | इतने पर भी यदि दुर्घटना घट जाती है तो उसमें हमारा कोई दोष नहीं होगा | किन्तु यदि हममें साहस का अभाव है और हम आशंकित अथवा भयभीत हो जाते हैं तो हमारी गाड़ी किसी दूसरी गाड़ी से अवश्य ही टकराएगी और हम अपने साथ साथ दूसरी गाड़ी के ड्राइवर को भी दुर्घटना का शिकार बना देंगे |

कभी कभी कुछ मन्दबुद्धि लोग सत्ता, धन या पद के दम्भ में भी लक्ष्यच्युत होकर उल्टे सीधे काम कर बैठते हैं | क्योंकि हमारे दम्भ पर, अहंकार पर, भय पर, क्रोध पर, मोह पर, लोभ पर हमारा नियन्त्रण नहीं है | दम्भ, अहंकार, क्रोध, मोह, लोभ, आतंक अथवा भय से ग्रस्त होकर किसी भी प्रकार का अनुचित कार्य कर बैठना ही भ्रम की अवस्था होती है | क्योंकि मोहवश, क्रोधवश, लोभवश अथवा अहंकारवश मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है, भ्रमित हो जाता है | अतः इस भ्रम से मुक्ति पाने के लिये मन से मृत्यु का तथा अन्य किसी भी प्रकार का भय दूर करके, व्यर्थ के मोह, लोभ, क्रोध अथवा अहंकार से मुक्त होकर लक्ष्यप्राप्ति की ओर अग्रसर होना आवश्यक है | ज्ञानी पुरुष के साथ यह स्थिति नहीं आती, क्योंकि उसे पूर्ण सत्य अर्थात जीवन के अन्तिम सत्य का ज्ञान हो जाता है | जिसे यह ज्ञान नहीं होता उसे ही दिशा निर्देश की आवश्यकता होती है |

यही कार्य श्रीकृष्ण ने किया | अर्जुन ने जब दोनों सेनाओं में अपने ही प्रियजनों को आमने सामने खड़े देखा तो उनकी मृत्यु से भयाक्रान्त हो श्री कृष्ण की शरण पहुँचे “शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” तब भगवान ने सर्वप्रथम उनके मन से मृत्यु का भय दूर किया | मृत्यु को अवश्यम्भावी, देह को असत् तथा आत्मा को सत् बताते हुए अर्जुन को लोकमर्यादानुसार धर्ममार्ग पर चलते हुए लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग बताया | उनका लक्ष्य उन्हें बताया | थोड़ी फटकार देते हुए उनसे कहा कि जब तू अशोच्य के विषय में शोक करता है तो फिर बुद्धिमानों की भाँति बातें करने का नाटक क्यों करता है ? तू तो मुझे बिल्कुल उन्मत्त जान पड़ता है जो मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्पर भावों को एक साथ दिखा रहा है | जबकि वास्तवकिता तो यह है कि आत्मज्ञानी न तो मृत वस्तुओं के विषय में शोक करता है और न ही जीवित वस्तुओं के विषय में कुछ सोचता है | जिस प्रकार शरीर की कौमार, यौवन और जरा ये तीन अवस्थाएँ होती हैं उसी प्रकार एक चौथी अवस्था भी होती है – देहान्तर प्राप्ति की अवस्था | जिस प्रकार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करने पर आत्मा न तो मरती है और न ही पुनः उत्पन्न होती है, उसी प्रकार एक देह की समाप्ति पर आत्मा नष्ट नहीं हो जाती और न ही दूसरी देह में प्रवेश करने पर उसकी पुनरुत्पत्ति ही होती है : “अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत !” २/१३ स्वप्न व माया के शरीर की भांति ये सब शरीर अन्तवन्त हैं | जबकि आत्मा नित्य और निर्विकार है | अतः आत्मा को नित्य और निर्विकार मानकर तू युद्ध कर |

अर्जुन को अभी भी संशय था कि भीष्म और द्रोण जैसे गुरुजनों के साथ युद्ध करना धर्मविरुद्ध होगा | इस संशय को दूर करने के लिये ही कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि आत्मा अकर्ता है | और जब आत्मा अकर्ता है तो उसके मरने, मारने, जलने, गलने जैसी क्रियाएँ हो ही नहीं सकतीं | ये सब तो स्थूल शरीर के धर्म हैं | और यदि आत्मा को लोकप्रसिद्धि के अनुसार अनेक शरीरों की उत्पत्ति और विनाश के साथ साथ उत्पन्न और नष्ट होता हुआ मान भी लें तो भी इस विषय में शोक करना उचित नहीं, क्योंकि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मर चुका है उसका पुनर्जन्म निश्चित है | अतः युद्ध करना धर्मसंगत है | और क्षत्रिय का तो धर्म ही युद्ध करना है | यदि तू युद्ध किये बिना ही पीछे हट गया तो तिरस्कार और दया का पात्र होगा | युद्ध करते करते यदि वीरगति को प्राप्त हुआ तो स्वर्ग में जाएगा और सौभाग्य से यदि जीत गया तो पृथिवी का भोग करेगा | वैसे भी तेरा अधिकार कर्म करने में है न कि कर्मफल में | इस प्रकार अर्जुन के मन से मृत्यु का भय दूर करने के लिये आत्मा के विषय में बताकर उसके मन में ज्ञान का बीजारोपण किया कृष्ण ने | क्योंकि डाक्टर या वैद्य का एक कर्तव्य यह भी है कि यदि मरीज़ के मन में उसकी बीमारी को लेकर किसी प्रकार का भ्रम है तो उस भ्रम को दूर करने के लिये वह मरीज़ को हर बात की सही सही जानकारी दे | और यही कार्य भगवान ने किया |

इस प्रकार यही सिद्ध होता है कि अध्यात्म के मार्ग पर चलते हुए कर्मरत रहने वाला व्यक्ति भी जब किसी कारणवश मोहग्रस्त अथवा भ्रमित हो जाता है तो उसके अध्यात्म गुरु को मनोचिकित्सक की भूमिका का भी निर्वाह करना पड़ जाता है |

GUru JI & Ma

 

अर्जुन विक्षिप्त थे – मूढ़ नहीं

इतने विशाल संसार में हर पल कहीं न कहीं आँधी, तूफ़ान, बाढ़, भूकम्प, हिमस्खलन, अग्निकाण्ड आदि न जाने कितने प्रकार के विध्वंस होते रहते हैं | हर पल अनुभव होते रहने वाले उत्पत्ति-विनाश, जय-पराजय, हानि-लाभ, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख जितने भी द्वन्द्व हैं उन सबसे हमारा नित्य परिचय है | यदि निरपेक्ष भाव से विचार किया जाए तो दुःख के बिना सुख, एक पक्ष की पराजय के बिना दूसरे पक्ष की जीत, एक की हानि के बिना दूसरे का लाभ हो ही नहीं सकता | ये समस्त द्वन्द्व, ये समस्त युद्ध हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं | किन्तु जब इस युद्ध की विकराल नग्न मूर्ति हमारे समक्ष प्रकट होती है और उसके अनिच्छित अनिष्टकारक परिणाम उन स्वजनों को खा डालना चाहते हैं जिन्हें हम अत्यधिक सम्मान करते हैं, जिन्हें हम सबसे अधिक प्यार करते हैं, जिन पर हमें अगाध श्रद्धा होती है, तब हमारा हृदय भय से, वेदना से, दुःख से व्याकुल हो उठता है | उस समय हमारी कर्तव्य बुद्धि, हमारी धीरता और स्थिरता नष्ट हो जाती है और हमारी विचार शक्ति मोहग्रस्त हो शून्य हो जाती है | यही हमारी कायरता का परिचायक है |

यही स्थिति कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन की हुई थी | न जाने कितने योद्धा अर्जुन के प्रचण्ड रण कौशल के समस्त परास्त हो चुके थे | उनकी अब तक की विजय पताका के नीचे न जाने कितने परम्परागत, सामाजिक व साम्प्रदायिक मूल्य दबे पड़े थे | न जाने कितने कुलों का विध्वंस करके उनके विजय मन्दिर की नींव उठी थी | पर विजयोन्मत्त अर्जुन के हृदय में कभी ऐसी गम्भीर वेदना, ऐसी चुभन, ऐसी टीस नहीं उत्पन्न हुई थी | इस सबके लिये उनके पास अवकाश ही नहीं था | फिर आज यह वेदना क्यों थी ? आज यह भय क्यों था ? इस क्षोभ का, इस अपराधबोध का कारण क्या था ? इस सबका कारण थे उनके अपने स्वजन | आज तक के युद्धों में जिन कुलों का, जिन परम्पराओं का, जिन सम्प्रदायों का, जिन सामाजिक मूल्यों का विध्वंस हुआ था उससे अर्जुन का कोई व्यक्तिगत सम्बन्ध अथवा कोई नाता नहीं था | वे उनके अपने नहीं थे – पराए थे | उन्हें तो बस उन पर विजय प्राप्त करनी थी – जो उन्होंने की भी थी | लेकिन अब जो युद्ध वे करने जा रहे थे वह युद्ध उनके अपने परिजनों के साथ था | अपने बन्धु बान्धवों के साथ था | उन्हें उन भीष्म पितामह के साथ युद्ध करना था जिनकी गोद में वे खेल कूद कर बड़े हुए थे | उन्हें उन आचार्य द्रोण से युद्ध करना था जिनकी शिक्षा और कृपा से वे संसार के सबसे महान धनुर्धर बने थे | उन महाराज धृतराष्ट्र और महारानी गान्धारी की सन्तानों को पराजित करना था जो उनके स्वर्गवासी पिता के सहोदर थे | उस युद्ध में दोनों ही पक्षों में उनके आत्मीय स्वजन थे | यही कारण था कि आज उन्होंने गम्भीरतापूर्वक इस भयावह स्थिति पर विचार किया था कि विजय चाहे किसी भी पक्ष की हो, हारने वाला पक्ष भी तो उनके आत्मीयों का ही होगा | युद्ध में मरने वाले भी तो उनके अपने ही होंगे | इस युद्ध में लोप तो उनके अपने ही कुल, धर्म और जाति का होगा | जिस स्वधर्म – क्षात्र धर्म – का वे चिरकाल से पूर्ण निष्ठा से पालन करते आ रहे थे वही उन्हें आज अधर्म लगने लगा था | वे किंकर्तव्यविमूढ़ और धर्मसम्मूढ़चेता होकर भयानक यन्त्रणा का अनुभव कर रहे थे | एक विमोहित चित्त वाले के लिये स्व और पर में कितना अन्तर होता है |

ईश्वर की माया से भ्रमित मनुष्य यह भूल जाता है कि युद्ध तो प्रत्येक क्षण उसके साथ है | उसके स्वयं के विचारों में ही निरन्तर युद्ध चलता रहता है | तब फिर वह बाहर के युद्धों से स्वयं को कैसे अलग कर सकता है ? युद्ध की भीषणता और अनिष्टकारी परिणामों का अनुभव होते हुए भी युद्ध से पूर्ण रूप से विलग नहीं हुआ जा सकता | अतः आदर्श का अनुसरण करते हुए चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिये, समाज में शान्ति स्थापना के लिये, उत्तरोत्तर विकास के लिये तथा आध्यात्मिक सभ्यता के विकास के लिये युद्ध आवश्यक हो जाता है | जैसे जैसे मनुष्य का हृदय शुद्ध होता जाता है, उसकी बुद्धि भी उतनी ही विकसित होती जाती है | तब उसमें कामना, वासना, तृष्णा, अहंकार सब नष्ट होकर युद्ध के प्रति स्वतः ही वैराग्य उत्पन्न हो जाता है | किन्तु तब उसके मन में एक नए युद्ध का सूत्रपात होता है – कर्मप्रवृत्ति के साथ सन्यास प्रवृत्ति का युद्ध, और युद्ध प्रवृत्ति के साथ त्याग की प्रवृत्ति का युद्ध | युगों युगों से संसार में विचारशील पुरुषों के साथ ऐसा ही होता आया है | इस प्रकार किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ये विचारशील पुरुष अन्ततोगत्वा भगवान की ही शरण जाते हैं, और इस प्रकार उनका भ्रम दूर होकर उन्हें दिशाज्ञान मिलता है |

अर्जुन के साथ भी यही हुआ था | अपने स्वजनों के, आत्मीयों के, अपने कुल के, अपनी परम्पराओं मान्यताओं व मूल्यों के विध्वंस की कल्पनामात्र से ही वे रोमांचित हो गए, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए – युद्ध करते हैं तो नाश है, नहीं करते हैं तो आत्मसत्ता लुप्त होती है – एक ओर कुआँ दूसरी ओर खाई | क्या करें क्या न करें ? “हे कृष्ण इन युयुत्सु स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं, मुख सूखा जाता है, मेरे शरीर में कम्प तथा रोमांच होता है, हाथ से गाण्डीवं गिरा जाता है, त्वचा में जलन होती है, तथा मन भ्रमित होने के कारण खड़ा रहने में भी असमर्थता का अनुभव कर रहा हूँ | यदि ये लोग भी मुझ पर आक्रमण करें तो भी, अथवा तीन लोक के राज्य के लिये भी मैं इन्हें मारना अथवा इनके साथ युद्ध नहीं करना चाहता, फिर क्या मैं इस पृथिवी के लिये इनसे युद्ध करूँगा?” (गीता १/२८-३५) अर्जुन जानते थे कि उनके वे स्वजन आततायी थे, लोभी थे, कुल के नाशक तथा मित्र विरोधी थे, किन्तु फिर भी वे उन्हें मारना नहीं चाहते थे | धनुष छोड़कर बैठ जाते हैं | और अन्त में किंकर्तव्यविमूढ़ हो कृष्ण की शरण जाते हैं “कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ़चेत:, यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे, शिष्यस्तेsहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” (२/७) – कायरता रूपी दोष से उपहत स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि मेरे लिये क्या कल्याणप्रद है | मैं आपका शिष्य आपकी शरण में हूँ, कृपया मेरा मार्गदर्शन करें | और तब मुस्कुराते हुए श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं “अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे, गतासूनगतासूँश्च नानुशोचन्ति पंडिता: |” (२/११) – बातें तो तू विद्वानों जैसी करता है और शोक उनके विषय में करता है जिनके विषय में नहीं करना चाहिये | जबकि ज्ञानी पुरुष जीवित अथवा मृत किसी विषय में भी शोच नहीं करते |

अब यहाँ पुनः एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि कृष्ण के लिये तो अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही समान थे, फिर उन्होंने यह पक्षपात क्यों किया कि दुर्योधन के साथ तो अपनी सेना भेज दी और स्वयम् अर्जुन के रथ का सारथि बनकर उनका मार्गदर्शन किया ? अपने दिव्य गीता ज्ञान से उनके मन का विभ्रम दूर किया ? इस प्रश्न के उत्तर के लिये हमें विस्तार में जाना होगा |

संसार में कोई भी कार्य अहेतुक नहीं होता | प्रत्येक कार्य का कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होता है | संसार में प्रत्येक प्राणी का जन्म भी किसी विशेष प्रयोजन से ही होता है | जब तक उसका वह प्रयोजन पूर्ण नहीं हो जाता उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता | भले ही उस प्रयोजन को पूर्ण करने के लिये, उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उसे कितनी ही बार इस जन्म मरण के चक्र में भ्रमण करना पड़े | यह भी सत्य है कि जगत में सुख दुःख दोनों का समान अस्तित्व है | जब तक दोनों की ही अनुभूति नहीं हो जाती तब तक कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता | किन्तु मनुष्य मात्र सुख की ही अभिलाषा करता है | इसका कारण है तत्वज्ञान के अभाव में, यथार्थज्ञान के अभाव में, सत्यज्ञान के अभाव में उसका भ्रमित हो जाना | इसी तत्वचिन्तन के लिये, सत्य की शोध के लिये हमारे ऋषि मुनियों ने घोर तपस्या की | मानव का समस्त आध्यात्मिक प्रयास आत्मा परमात्मा आदि इन्द्रियातीत तत्वों का सन्देहरहित स्पष्ट और अविचलित शोध करने का ही रहा | पर यह बोध हठात् ही नहीं हो जाता | इसके तीन सोपान होते हैं – श्रवण अर्थात किसी तत्ववेत्ता आचार्य के उपदेशों का श्रवण, मनन अर्थात उन उपदेशों का चिंतन और निदिध्यासन अर्थात मनन की परिपक्व अवस्था “आगमेनानुमानेंन ध्यानाभ्यासरसेन च, त्रिधा प्रकल्पयन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् |” (योगसूत्र)

हम सब ही किसी न किसी स्तर पर असामान्य मनोवृत्ति रखते हैं | ईश्वर की महाशक्ति त्रिगुणमयी माया हमें आवृत्त कर देती है | बुद्धि पर माया का आवरण आ जाता है और हम सत्य-असत्य नित्य-अनित्य आदि का भेद नहीं जान पाते | यह असामान्यता भी दो प्रकार की होती है – एक वे जो स्वयं को महाज्ञानी, महाबाली समझते हैं और इसी अभिमान के मद में चूर हो अनाधिकार चेष्टा भी कर जाते हैं | तामसी वृत्ति की प्रधानता होने के कारण कर्तव्य कर्मों से ध्यान हटाकर निषिद्ध कर्मों की ओर आकृष्ट होते हैं | (गीता ३/२७, ९/१२, १६/४) पाखण्ड, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान इन आसुरी सम्पदा को प्राप्त हुए लोगों के लक्षण हैं | ऐसे मूर्ख लोग जगत का नाश ही करते हैं | ऐसे मूढ़ तामसी मनोवृत्ति वाले पुरुष ईश्वर को प्राप्त न होकर अधोगति को प्राप्त होते हैं | (गीता १६/२०) दुर्योधन इसी श्रेणी में आते हैं |

दूसरी ओर सत्वगुण में स्थित हुए पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को प्राप्त होते हैं | रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य अर्थात मनुष्यलोक में ही रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं | किन्तु तमोगुण में कार्यरूप निद्रा प्रमाद और आलस्यादि में स्थित हुए तामस पुरुष अधोगति को प्राप्त होते हैं | (गीता १४/१७,१८) अर्जुन इस श्रेणी में आते हैं |

अर्जुन के इसी सत्व-रज गुण प्रकृति के कारण कृष्ण ने उन्हें गीताज्ञान देना उचित समझा | क्योंकि  केवल तमस से घिरा होने के कारण दुर्योधन मूढ़मति हो रहा था जबकि अर्जुन भ्रमित अवश्य थे लेकिन तमसबुद्धि नहीं थे… विक्षिप्त थे किन्तु मूढ़ नहीं थे…

शुभ प्रभात – बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ

“आज हम जो कुछ भी हैं वो हमारी आज तक की सोच का परिणाम है | इसलिए अपनी सोच ऐसी बनानी चाहिए ताकि क्रोध न आए | क्योंकि हमें अपने क्रोध के लिए दण्ड नहीं मिलता, अपितु क्रोध के कारण दण्ड मिलता है | क्योंकि क्रोध तो एक ऐसा जलता हुआ कोयला है जो दूसरों पर फेंकेंगे तो पहले हमारा हाथ ही जलाएगा | यही कारण है कि हम कितने भी युद्धों में विजय प्राप्त कर लें, जब तक हम स्वयं को वश में नहीं कर सकते तब तक हम विजयी नहीं कहला सकते | इसलिए सर्वप्रथम तो अपने शब्दों पर ध्यान देना चाहिए | भले ही कम बोलें, लेकिन ऐसी वाणी बोलें जिससे प्रेम और शान्ति का सुगन्धित समीर प्रवाहित हो | साथ ही अहंकार, सन्देह और शक़ से व्यक्तिगत सम्बन्धों को आघात पहुँचता है | हम आध्यात्मिकता की कितनी भी बातें पढ़ लें या उन पर चर्चा कर लें, कितने भी मन्त्रों का जाप कर लें, लेकिन जब तक हम उनमें निहित गूढ़ भावनाओं को अपने जीवन का अंग नहीं बनाएँगे तब तक सब व्यर्थ है | इस सबके साथ ही हमें अपने अतीत के स्मरण और भविष्य की चिन्ताओं को भुलाकर अपना वर्तमान सुखद बनाने का प्रयास करना चाहिए | क्योंकि संसार दुखों का घर है, दुख का कारण वासनाएँ हैं, वासनाओं को मारने से दुख दूर होते हैं, वासनाओं को मारने के लिए मानव को अष्टमार्ग अपनाना चाहिये, अष्टमार्ग अर्थात – शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि” – इस प्रकार की जीवनोपयोगी और व्यावहारिक शिक्षाएँ देने वाले भगवान बुद्ध के जन्मदिवस (जो सिद्धार्थ गौतम के रूप में था), बुद्धत्व प्राप्ति (जिस दिन गीर्घ तपश्चर्या के बाद गौतम बुद्ध बने, और इस प्रकार बुद्धत्व प्राप्ति गौतम बुद्ध का नया जन्म था), और महानिर्वाण (मोक्ष) दिवस के रूप में मनाए जाने वाले पर्व बुद्ध पूर्णिमा की सभी को बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ | बुद्ध न केवल बौद्ध सम्प्रदाय के ही प्रवर्तक हैं अपितु भगवान विष्णु के नवम अवतार के रूप में भी भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना की जाती है |

व्यक्ति के आत्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास के लिए बुद्ध ने शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि  के अष्टमार्ग के साथ साथ पाँच बातें और कही हैं:

  • व्यक्ति को मनसा वाचा कर्मणा किसी भी जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए |
  • किसी दूसरे की कोई भी वस्तु उस व्यक्ति से बिना पूछे लेने का अधिकार किसी को नहीं है – जो वस्तु कोई अपने आप प्रेम और सम्मान से दे बस उसी वस्तु को सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए |
  • किसी भी प्रकार के दुराचार अथवा व्यभिचार से बचना चाहिए |
  • असत्य सम्भाषण उचित नहीं है |
  • मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए |

लेकिन इन पाँचों उपदेशों का यह अर्थ कदापि नहीं समझना चाहिए कि बुद्ध अपनी किसी परम्परा या अपने विचारों को व्यक्ति पर थोपना चाहते हैं | सदा से ही हमारे धर्म प्रवर्तक – चाहे वो किसी भी सम्प्रदाय से हों – व्यक्ति को एक ऐसा मार्ग दिखाना चाहते रहे हैं कि व्यक्ति का हर स्तर पर उत्थान हो सके, और अपने सांसारिक कर्तव्य कर्म करते हुए आत्मोत्थान के मार्ग पर अग्रसर होकर मोक्ष अर्थात पूर्ण ज्ञान की स्थिति को प्राप्त हो जाए | बुद्ध के भी इन समस्त उपदेशों का मर्म समझकर “क्या उचित है और क्या अनुचित” ये सब व्यक्ति को स्वयं अपने देश-काल-परिस्थिति के अनुसार पूर्ण सत्यता और ईमानदारी के साथ नियत करना होगा | हाँ, इतना अवश्य है कि बुद्ध के उपदेशों की आत्मा को यदि मानवमात्र ने आत्मसात कर लिया तो हर प्रकार के छल, कपट, युद्ध आदि से संसार को मुक्ति प्राप्त हो सकेगी और शान्त तथा आनन्दित हुआ मानव अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा – अध्यात्म मार्ग अर्थात स्वयं अपने भीतर झाँकने का मार्ग – स्वयं अपनी आत्मा से साक्षात्कार करने का मार्ग | और समस्त भारतीय दर्शनों की मूलभूत भावना यही है |

उदाहरण के लिए बुद्ध ने कायिक, वाचिक, मानसिक किसी भी प्रकार की हिंसा को अनुचित माना है | लेकिन जो लोग सेना में हैं – देश की सुरक्षा के लिए जो कृतसंकल्प हैं – आततायियों को नष्ट करने का उत्तरदायित्व जिनके कन्धों पर है – उनके लिए उस प्रकार की हिंसा ही उचित और कर्तव्य कर्म है, यदि वे पूर्ण रूप से अहिंसा का मार्ग अपना लेंगे तो न केवल वे कायर कहलाएँगे, बल्कि देश की सुरक्षा भी नहीं कर पाएँगे |

बुद्ध ने दुराचार और व्यभिचार से बचने की बात कही | आज जिस प्रकार से महिलाओं के साथ दुराचार और व्यभिचार की घटनाएँ सामने आ रही हैं – यदि अपने घरों में ही हम परिवार का केन्द्र बिन्दु – समाज की आधी आबादी – नारी शक्ति का सम्मान करना सीख जाएँ तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है | बुद्ध ने मदाक पदार्थों से बचने की बात कही – तो क्या केवल नशीली वस्तुओं का सेवन ही मादक पदार्थों का सेवन है ? दूसरों की चुगली करना, दूसरों के कार्यों में विघ्न डालना, आत्मतुष्टि के लिए अकारण ही दूसरों पर सन्देह करना, दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करना, अकारण ही क्रोध करना – ऐसी अनेक बातें हैं जिनकी लत पड़ जाए तो कठिनाई से छूटती है – इस प्रकार के नशों का भी त्याग करने के लिए बुद्ध प्रेरणा देते हैं | हम सभी दोनों “कल” की चिन्ता करते रहते हैं और “आज” को लगभग भुला ही देते हैं – और बीते कल को भुलाने की तथा आने वाले कल को उत्तम बनाने की चेष्टा में अनेकों बार जाने अनजाने असत्य भाषण कर बैठते हैं – जो निश्चित रूप से अनुचित है | हाँ, यदि हमारे असत्य भाषण से कुछ अच्छा परिणाम प्राप्त होने वाला हो तो बात अलग है |

तो, देश काल और परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति को अपने लिए उचित-अनुचित का निर्धारण करना चाहिए | हाँ, इतना प्रयास अवश्य करना चाहिए कि हमारे कर्म ऐसे हों कि जिन्हें करने के बाद हमारे मन में किसी प्रकार के अपराध बोध अथवा पश्चात्ताप की भावना न आने पाए | क्योंकि यदि हमारे मन में किसी बात के लिए अपराध बोध आ गया या किसी प्रकार के पश्चात्ताप की भावना आ गई तो हमें स्वयं से ही घृणा होने लगेगी और तब हम किस प्रकार सुखी रह सकते हैं ? स्वयं को दुखी करना भी एक प्रकार की हिंसा ही तो है | जो व्यक्ति स्वयं ही दुखी होगा वह दूसरे लोगों को सुख किस प्रकार पहुँचा सकता है ? जबकि बुद्ध के इन उपदेशों का मूलभूत उद्देश्य ही है मानव मात्र की प्रसन्नता – मानव मात्र का सुख…

युग के महान अवतार भगवान बुद्ध की महान शिक्षाओं को ध्यान में रखकर हम सब अपनी अपनी उन्नति के मार्ग पर इस प्रकार आगे बढ़ते जाएँ कि हमारे साथ दूसरों की भी उन्नति हो – इसी कामना के साथ एक बार फिर सभी को बुद्ध जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…

 

 

शुभ प्रभात – अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएँ

अक्षय तृतीया – ॐ जमदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात ।

भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम जी की जयन्ती

अक्षय तृतीया – जिस दिन जैनियों के आदि तीर्थंकर ऋषभदेव ने अपने एक वर्ष के उपवास का पारायण किया था और जिसके उपलक्ष्य में आज भी भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा का अभिषेक किया जाता है

अक्षय तृतीया – जिस दिन वेदव्यास ने आदि महाकाव्य महाभारत की रचना आरम्भ की थी

अक्षय तृतीया – जिस दिन बद्रीनाथ और केदारनाथ के कपाट खुल जाते हैं और यात्रा का आरम्भ हो जाता है

अक्षय तृतीया – मान्यता है कि भारतीय काल गणना के सिद्धान्त से अक्षय तृतीया के दिन ही त्रेता युग का आरम्भ हुआ था और इसीलिए भी इस तिथि को सर्वार्थसिद्ध तिथि माना जाता है – युगादि तिथि

अक्षय तृतीया – और सबसे बड़ी बात ये कि अक्षय अर्थात जिसका कभी क्षय – नाश – न हो, इसीलिए इस दिन किसी भी नवीन कार्य का आरम्भ शुभ माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि इस दिन आरम्भ किया गाया कार्य सदा शुभ फलदायी होगा तथा कभी नष्ट नहीं होगा

अक्षय तृतीया – ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात

श्री लक्ष्मी-गणेश की उपासना के पर्व इस अक्षय तृतीया की सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ

हम सभी के जीवन में अखण्ड सुख समृद्धि बनी रहे तथा हर कार्य में सफलता प्राप्त हो 

इसी कामना के साथ सभी को आज का शुभ प्रभात

प्रकाश का मार्ग

ढूँढती फिरी / कहीं तो दीख पड़े एक किरण प्रकाश की

नहीं दिखाई दी कहीं भी / तो कहा किसी ने / बाहर नहीं है कुछ भी

क्य प्राप्त करोगी बाहर की रिक्तता से ?

सब कुछ तो है तुम्हारे भीतर / एक अलग संसार |

मैंने बन्द किये अपने नेत्र, झाँकने को अपने भीतर

वहाँ था केवल अन्धकार, भय, चिन्ता |

तब मैंने खटखटाए द्वार महापुरुषों के / शरण ली गुरुओं की

जिन्होंने दिया मुझे एक मन्त्र / जाप करने को / दीक्षा के रूप में

ताकि दूर हों समस्त भय, चिन्ताएँ

छिन्न हो समस्त अन्धकार

और दीख पड़े एक किरण प्रकाश की |

मैं करती रही जाप निरन्तर अनवरत

बाँध कर चारों ओर / दसों दिशाओं में / दिग्बन्ध

करती रही पूर्ण समस्त प्रक्रियाओं को / स्थिति और न्यासों की

जो बताये गए थे उन्हीं ज्ञानी महापुरुषों द्वारा

जाप और अनुष्ठानों की निर्विघ्न सम्पन्नता के लिए

पर कुछ नहीं घटा / मेरा भय, चिन्ताएँ, अन्धकार / कुछ भी नहीं |

तब मान कर सलाह किसी अन्य की 

चाट डाले सारे वेद पुराण उपनिषद

श्रवण किये सभी अवधूतों / सन्यासियों / धर्मपुरुषों के उपदेश

जिनसे मिला ज्ञान आध्यात्मिकता का |

पर यह क्या ?

इस ज्ञान ने तो कर दिया मुझे और भी भ्रमित |

तब पूछा किसी अन्य ने

क्य जीवन में तुमने कभी प्रयास किया है / तजने का अपने अहंकार को ?

क्या तुमने कभी प्रयास किया है / तजने का अपने समस्त ज्ञान को ?

क्या तुमने कभी प्रयास किया है / निस्वार्थ प्रेम का ?

क्य तुम्हारे जीवन में कभी रहा है / आडम्बर और स्वार्थ रहित प्रेम ?

ये समस्त अहंकार / ज्ञान / जप / दिखाते हैं मार्ग बाहर का |

प्रकाश पाना है / तो पैठना होगा अपने ही भीतर के विशाल सरोवर में

उतरना होगा अधिक / और अधिक गहराई में |

बिन प्रेम कैसे पाओगे प्रकाश अपने भीतर का ?

कैसे दूर होंगे तुम्हारे भय और चिन्ताएँ ?

केवल मन्त्र से ? अथवा ज्ञान से ?

अथवा दीक्षा लेकर किसी तथाकथित गुरु से ?

नहीं, पहले उत्पन्न करो प्रेम अपने भीतर

वही है सबसे बड़ा मन्त्र – महामन्त्र |

वही है सबसे बड़ा ज्ञान – महाज्ञान |

और अपने बन्द नेत्रों से मैंने अनुभव किया

एक अदृश्य किन्तु स्नेहिल स्पर्श / अपने मस्तक पर |

अब मैं देख सकती थी प्रकाश / गहन प्रकाश / अपने भीतर

और उस प्रकाश में वह मार्ग / जो लेता है चरम सत्य की ओर

बिना किसी भय के / बिना किसी चिन्ता के…

हे महावीर शत नमन तुम्हें

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार

है कर्म श्रृंखला देव तुम्हारी इस सारे जग का श्रृंगार ||

तुमने दे दी हर प्राणी को जीवन जीने की अभिलाषा

ममता के स्वर में समझा दी मानव के मन की परिभाषा |

बन गीत और संगीत जगत को हर्ष दिया तुमने अपार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

तुमको पाकर रानी त्रिशला के संग धरती माँ धन्य हुई

और विन्ध्याचल पर्वत से जग में करुणाभा फिर व्याप्त हुई |

तुमसे साँसों को राह मिली, जग में अगाध भर दिया प्यार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

तुम श्रम के साधक कर्म विजेता आत्मतत्व के ज्ञानी तुम

सम्यक दर्शन, सम्यक चरित्र और अनेकान्त के साधक तुम |

सुख दुःख में डग ना डिगें कभी, समता का तुमने दिया सार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

भगवान महावीर