नक्षत्र – एक विश्लेषण

चित्रा नक्षत्र

अब पुनः नक्षत्रों की वार्ता को ही आगे बढाते हैं | ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी और हस्त नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं चित्रा नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में | नक्षत्र मण्डल में चित्रा नक्षत्र चौदहवें क्रम पर आता है | वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा के अश्विनी नक्षत्र से रेवती नक्षत्र तक 27 नक्षत्रों की यात्रा काल में चित्रा नक्षत्र चौदहवाँ पड़ाव होता है | इस प्रकार नक्षत्र मण्डल में यह नक्षत्र चन्द्रमा की यात्रा का मध्य बिन्दु अथवा मध्य पड़ाव भी होता है – क्योंकि इसके पहले भी और इसके बाद में भी तेरह तेरह नक्षत्र होते हैं | तो आइये इसी नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में आज बात करते हैं…

चित्र से चित्रा शब्द बना है जिसका अर्थ होता है चित्र-विचित्र, चमकदार, स्पष्ट, स्वच्छ, आकर्षक, मनमोहक, मनोरम, विनोदी, सुहाना, किसी वस्तु पर पड़े हुए विविध प्रकार के धब्बे | और भी अर्थ हैं जैसे – चित्र की भाँति सुन्दर, अद्भुत, अतुलनीय, आकर्षक, आश्चर्यजनक इत्यादि | इन अर्थों को समझने के लिए एक विशेष तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है | वैदिक काल में जब नक्षत्रों का नामकरण किया गया था उस समय निश्चित रूप से चित्रकारों द्वारा बनाए गए चित्रों की ही प्रधानता थी | उस काल में जितने भी कुशल चित्रकार होते थे वे सम्भवतः उन लोगों के चित्र अधिक बनाया करते होंगे जो उन्हें बहुत सुन्दर अथवा आकर्षक लगा करते होंगे या समाज में – क़बीले में जिनका मान सम्मान होता होगा अथवा जो अपने स्थान पर किसी महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन होते होंगे – जिनका प्रभाव जन सामान्य पर पड़ता होगा | किसी भी कलाकार को अपने रचना कौशल के प्रदर्शन के लिए कोई न कोई तो प्रेरणा स्रोत चाहिए ही होता है | अस्तु, उन्हीं प्रभावशाली व्यक्तित्वों से से अन्य साधारण व्यक्तियों की ही भाँति चित्रकार भी प्रभावित होता होगा | या फिर किसी ऐसी वस्तु या परिस्थिति का चित्र बनाते होंगे जो स्वयं में अद्भत और आकर्षक होती होगी | और सम्भवतः इसी कारण से उस समय के उपलब्ध साहित्य में अत्यन्त सुन्दर व्यक्ति या वस्तु या परिस्थिति को भी चित्र – चित्र के समान अद्भुत – ही कहा जाने लगा | यही कारण था कि चित्रा शब्द सौन्दर्य, आश्चर्यजनक वस्तुओं तथा अद्भुत का पर्याय बन गया | और वैदिक ज्योतिषियों की ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति चित्रा नक्षत्र में जन्म लेगा उसमें ये समस्त गुण अवश्य ही विद्यमान होने चाहियें |

एक बड़े चमकीले पत्थर को भी चित्रा कहा जाता है | सम्भवतः ऐसा इसलिए भी क्योंकि इस नक्षत्र में चित्रा नाम का एक ही चमकीला तारा होता है और उसी के नाम पर इसका नाम भी चित्रा रखा गया है | अर्जुन की पत्नी तथा बभ्रुवाहन की माता का नाम भी चित्रा (चित्रांगदा) था | प्रायः देखा गया है कि इस नक्षत्र में जिन जातकों का जन्म होता है वे या तो आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न होते हैं, अथवा एक ही समय में बहुत से गुणों से युक्त तथा बहुत से विद्याओं और कलाओं में निपुण होते हैं | इन व्यक्तियों का व्यवहार भी बहुत उत्तम होता है | यह नक्षत्र चैत्र माह में आता है जो मार्च और अप्रेल के मध्य पड़ता है | इस नक्षत्र के अन्य नाम तथा भाव हैं त्वष्टा – रचनाधर्मिता – ब्रह्मा का एक नाम – चित्रा नक्षत्र के अधिपति तथा निर्माण एवं सृजन का देवता और देवों के प्रसिद्ध शिल्पकर्मी विश्वकर्मा जिन्होंने अनेकों लोकों और नगरों का निर्माण किया, तक्ष – घायल करना |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/25/constellation-nakshatras-19/

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

फाल्गुनी और हस्त नक्षत्र

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों पर चर्चा के क्रम में अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा और मघा नक्षत्रों के नामों पर बात करने के पश्चात आज चर्चा करते हैं फाल्गुनी और हस्त नक्षत्रों के नामों की निष्पत्ति तथा इनके अर्थ के विषय में |

फाल्गुनी :-

नक्षत्र मण्डल में दोनों फाल्गुनी नक्षत्र ग्यारहवें और बारहवें क्रम में आते हैं | फाल्गुन माह में ये दोनों फाल्गुनी नक्षत्र आते हैं इसीलिए इस माह का नाम फाल्गुन पड़ा है | यह माह फरवरी और मार्च के मध्य आता है | इन्द्र का भी एक नाम फाल्गुनी है | दोनों फाल्गुनी – पूर्वा फाल्गुनी और उतर फाल्गुनी – नक्षत्रों में प्रत्येक में दो दो तारे होते हैं | वसन्त ऋतु भी इसी माह में आती है अतः उसे भी फाल्गुन अथवा लौकिक भाषा में फागुन या फाग कहा जाता है | इस नक्षत्र की व्युत्पत्ति फल्गु शब्द से हुई है, जिसके शाब्दिक अर्थ हैं रस और बल का अभाव, निरर्थक, लघु, क्षुद्र, बहुत थोड़ा इत्यादि | गूलर के वृक्ष को भी फल्गु कहा जाता है | अर्जुन का जन्म फाल्गुनी नक्षत्र में हुआ था इस कारण उन्हें भी फाल्गुनी ही कहा जाने लगा | गुरु का जन्म नक्षत्र भी फाल्गुनी होने के कारण गुरु अर्थात बृहस्पति को फाल्गुनीभव कहा जाता है | इन दोनों नक्षत्रों के अन्य नाम तथा उसके अर्थ हैं भग अर्थात भाग्य (Destiny), सौभाग्य (Good Fortune), सम्पन्नता, गरिमा, गुण, आदर्श आदि | प्रयास करने के अर्थ में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | लाल रंग के लिए भी फाल्गुनी शब्द का प्रयोग किया जाता है | एक नाम योनि भी है | झरने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है | पितृगणों के प्रमुख तथा द्वादश आदित्यों में से एक देवता “अर्यमा” के लिए भी भग शब्द का प्रयोग होता है |

पूर्वा फाल्गुनी

उत्तर फाल्गुनी

हस्त :-

यह नक्षत्र मण्डल का तेरहवाँ नक्षत्र है | हस्त अर्थात हाथ तथा हाथी की सूँड | इस नक्षत्र में पाँच तारे होते हैं | इसके अन्य नाम हैं रवि, कर, सूर्य | फरवरी और मार्च के महीनों में फाल्गुन माह में दोनों फाल्गुनी नक्षत्रों के बाद यह नक्षत्र आता है |

हस्त

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/20/constellation-nakshatras-18/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों पर चर्चा के क्रम में अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु तथा पुष्य नक्षत्रों के नामों पर बात करने के पश्चात अब चर्चा करते हैं आश्लेषा और मघा नक्षत्रों के नामों की निष्पत्ति तथा इनके अर्थ के विषय में |

आश्लेषा

आश्लेषा

श्लिष् में आ उपसर्ग लगाकर आश्लेषा शब्द की निष्पत्ति हुई है | इस नक्षत्र में पाँच तारे होते हैं | आश्लिष् शब्द का अर्थ है किसी को आलिंगन में बाँधना अथवा किसी की परिक्रमा करना | किसी से सम्पर्क स्थापित करने के अर्थ में भी आश्लिष शब्द का प्रयोग किया जाता है | इसके अतिरिक्त यह केतु का जन्म नक्षत्र भी है | इसीलिए केतु का एक नाम आश्लेषज भी है | सर्प के जितने भी नामा अथवा पर्याय हैं वे सभी आश्लेषा के भी पर्याय है – जैसे सर्प, उरग, भुजंग, अहि – ये सभी सर्प के पर्याय होने के कारण आश्लेषा के भी पर्याय हैं | घुमक्कड़ व्यक्ति को भी आश्लिष् कहा जाता है | वृत्तासुर का भी एक नाम आश्लिष् उपलब्ध होता है | एक विषैली वनस्पति भी आश्लिष् कहलाती है – सम्भवतः विषैली होने के कारण ही इसे आश्लिष कहा जाता होगा – क्योंकि आश्लिष सर्प का पर्याय है और सर्प विषैला होता है | किसी को धोखा देने के अर्थ में भी इस शब्द का प्रयोग करते हैं | किसी वस्तु का भोग करने तथा आनन्द करने के लिया भी आश्लिष शब्द का प्रयोग किया जाता है | इसके अतिरिक्त कष्ट उठाने के लिए अथवा अनुभव करने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है | क़ीमती, वैभवपूर्ण, धनवान, नृपसदृश, राजा, किसी गाँव अथवा क़बीले का मुखिया भी आश्लिष् या आश्लेष कहलाते हैं | यह नक्षत्र जनवरी फरवरी के मध्य माघ माह में आता है |

मघा

मघा

आश्लेषा की ही भाँति मघा नक्षत्र में भी पाँच तारे होते हैं | मघा का शाब्दिक अर्थ होता है समस्त प्रकार की सुख सुविधाएँ, पुरूस्कार, उपहार, समस्त प्रकार की धन सम्पदा इत्यादि | एक प्रकार की औषधीय वनस्पति तथा एक पुष्प भी मघा कहलाता है | मघा को शुक्र का जन्म नक्षत्र माना जाता है | इसी कारण से शुक्र का एक नाम मघाभव भी है | आश्लेषा की ही भाँति यह नक्षत्र भी जनवरी-फरवरी के मध्य माघ माह में आता है | इस नक्षत्र का अन्य नाम है प्रीति | साथ ही माता पिता तथा दादा, परदादा आदि के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/15/constellation-nakshatras-17/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

पुष्य

मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों पर चर्चा के क्रम में अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा तथा पुनर्वसु नक्षत्रों के नामों पर बात करने के पश्चात अब चर्चा करते हैं पुष्य नक्षत्र के नाम का अर्थ क्या है और इसकी निष्पत्ति किस प्रकार हुई है |

पुष् धातु से पुष्य शब्द की निष्पत्ति हुई है | इसका अर्थ होता है देखभाल करना, बढ़ाना, पोषित करना, प्रशंसा करना, संतुष्ट करना, पालन पोषण करना, ऊर्जा व शक्ति प्रदान करना आदि | ऋग्वेद में पुष्य का नाम तिष्य प्राप्त होता है – जिसका अर्थ भी शुभ, सुन्दर, आकर्षक तथा सुख सम्पदा देने वाला माना जाता है | कहने का अभिप्राय है कि इस नक्षत्र को अत्यन्त शुभ और कल्याणकारी माना जाता है | साथ ही तिष्य शब्द को कलियुग का एक पर्यायवाची भी माना जाता है |

इस नक्षत्र का प्रतीक चिह्न गाय का थन माना जाता है | जिस प्रकार गौ का दूध अमृत के समान पोषण करता है तथा शरीर और मन को प्रसन्नता पहुँचाता है उसी प्रकार पुष्य नक्षत्र भी पोषण करने के साथ साथ प्रसन्नता भी प्रदान करने वाला माना जाता है | इसके अतिरिक्त गाय में सभी देवताओं का निवास माना जाता है | साथ ही गाय के ही सामान इसमें मातृत्व के भी सभी गुण जैसे उत्पादन क्षमता, संरक्षण और सम्वर्धन आदि माने जाते हैं | सौभाग्य के लिए भी पुष्य शब्द का प्रयोग किया जाता है |

इस नक्षत्र में तीन तारे एक त्रिकोण के आकार में होते हैं तथा यहाँ पुनर्वसु नक्षत्र की ही भाँति पौष माह में दिसम्बर और जनवरी के मध्य आता है | पुष्य को प्रगति का प्रतीक भी माना जाता है और इसके तीन तारों को प्रगतिशील रथ के चक्र के रूप में भी देखा जाता है | देवगुरु बृहस्पति के जितने भी नाम हैं वे सब इस नक्षत्र के प्रयुक्त होते हैं, जैसे: गुरु, जीव, देवपुरोहित इत्यादि | गुरूवार को यदि चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में होता है तो उस दिन गुरु-पुष्यामृत योग बनता है जो अत्यन्त शुभ माना जाता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/14/constellation-nakshatras-16/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

पुनर्वसु

आज फिर नक्षत्र-चर्चा | मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों पर चर्चा के क्रम में अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर और आर्द्रा नक्षत्रों के बाद अब चर्चा करते हैं पुनर्वसु नक्षत्र के नाम का अर्थ क्या है और इसकी निष्पत्ति किस प्रकार हुई है |

नक्षत्र मण्डल के सप्तम नक्षत्र पुनर्वसु का शाब्दिक अर्थ है ऐसी सम्पत्ति जो निरन्तर आती रहे – निरन्तर प्राप्त होती रहे – एक के बाद एक सफलता व्यक्ति को जीवन में प्राप्त होती रहे | वसुओं को उप देवताओं के समान माना जाता है तथा वसु अपने आप में शुभता, उदारता, धन तथा सौभाग्य जैसी विशेषताओं के स्वामी होते है | पुनर्वसु नक्षत्र आर्द्रा नक्षत्र के बाद आता है तथा आर्द्रा नक्षत्र में जातक का स्वभाव भी उग्र हो सकता है जिसके कारण उसकी धन के प्रति अनिच्छा भी हो सकती है अथवा धन का अभाव भी हो सकता है | इसी कमी को पूरा करने के लिए पुनर्वसु नक्षत्र का आगमन होता है जो इसके नाम के अर्थ को सार्थक करता है।

पुनर्वसु नक्षत्र का आगमन सौभाग्य का सूचक माना जाता है तथा इस प्रकार पुनर्वसु शब्द का अर्थ पुन: सौभाग्यशाली हो जाना सार्थक हो जाता है | और सौभाग्यशाली होने से अभिप्राय केवल आर्थिक स्तर पर सौभाग्यशाली होना ही नहीं होता, अपितु जीवन के हर क्षेत्र में सौभाग्यशाली होने से – जीवन के हर क्षेत्र में सफल होने से इसका अभिप्राय होता है | भगवान् विष्णु और शिव का भी एक नाम पुनर्वसु है | इसमें दो या चार तारे होते हैं | इस नक्षत्र के अन्य नाम हैं : अदिति (स्वतन्त्र, असीम, नि:सीम, समग्र, प्रसन्न, पवित्र और पृथिवी) | अदिति दक्ष की प्रिय पुत्री भी थीं जिनका विवाह काश्यप ऋषि के साथ हुआ था | द्वादश आदित्य कश्यप और अदिति के ही पुत्र माने जाते हैं (अदितेः अपत्यं पुमान् आदित्यः) | ऋग्वेद के अनुसार अदिति निरन्तर शिशुओं तथा पशु सम्पत्ति पर अपनी कृपा की वर्षा करती हुई उनकी रक्षा करती रहती है तथा क्षमा की देवी है (अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स-पिता स-पुत्रः | विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ||) |

यह नक्षत्र दिसम्बर और जनवरी में पौष माह में आता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/12/constellation-nakshatras-15/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

मृगशिरा

मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों पर चर्चा के क्रम में अश्विनी, भरणी, कृत्तिका और रोहिणी नक्षत्रों के बाद अब चर्चा करते हैं मृगशिर और आर्द्रा नक्षत्रों की |

मृगशिरा

नक्षत्रमण्डल में मृगशिर पञ्चम पंचम है | मृगशिरा का शाब्दिक अर्थ है हिरण का सिर | या किसी भी पशु का सिर – मृग अर्थात पशु | इस नक्षत्र में तीन तारे एक मृग के सिर के आकार में होते हैं | सम्भवतः इसीलिए मृगशिर नक्षत्र के जातकों का शरीर अपेक्षाकृत विशाल होता है | जिस हिन्दी माह में यह नक्षत्र पड़ता है उस माह का नाम भी मृगशिर ही है | खैर नामक एक विशिष्ट वृक्ष की शाखाएँ मृग के शिर के समान होने के कारण उसे मृगशिर कहा जाता है |

मृगशिर नक्षत्र के नाम पर आधारित मृगशिर माह नवम्बर और दिसम्बर माह के दौरान आता है | इस नक्षत्र के अन्य नाम हैं – शशभृत, शशि, शशांक, मृगांक, विधु, हिमाँशु, सुधाँशु इत्यादि (सभी चन्द्रमा के पर्यायवाची)) | इसी से इस नक्षत्र की शीतलता का अनुमान लगाया जा सकता है |

आर्द्रा

नक्षत्र मण्डल का छठा नक्षत्र है आर्द्रा |

आर्द्रा

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है – आर्द्र अर्थात गीला | नम, मुलायम, दयालु, उदार, प्रेम करने योग्य | इस नक्षत्र में केवल एक तारा होता है | यह केतु का पर्यायवाची भी है | इसे भाग्य की देवी भी कहा जाता है | माना जाता है कि भगवान् भास्कर जब आर्द्रा नक्षत्र पर होते हैं तब पृथिवी रजस्वला होती है | इस नक्षत्र के अन्य नाम हैं : रूद्र, शिव, त्रिनेत्र (सभी भगवान् शिव के नाम) | यही कारण है कि रूद्र से सम्बन्धित समस्त क्लेश, दुःख और अत्याचार या उत्पीड़िन, क्रोध, भयंकरता या कोलाहल का डरावनापन इत्यादि सबके लिए आर्द्रा का ग्रहण किया जाता है | यह नक्षत्र भी नवम्बर – दिसम्बर अर्थात मृगशिर माह में ही आता है |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

रोहिणी

सभी 27 नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति के क्रम में अब तक हमने अश्विनी, भरणी और कृत्तिका नक्षत्रों के नामों पर बात की | इसी क्रम में आज बात करते हैं रोहिणी नक्षत्र की | रोहिणी की निष्पत्ति रूह् धातु से हुई है जिसका अर्थ है उत्पन्न करना, वृद्धि करना, ऊपर चढ़ना, आगे बढ़ना, उन्नति करना आदि | इसके अतिरिक्त लम्बे बालों वाली स्त्री के लिए भी रोहिणी शब्द का प्रयोग होता है | दक्ष प्रजापति की पुत्री का नाम भी रोहिणी है, जिसका विवाह चन्द्रमा के साथ हुआ था और जो चन्द्रमा की सबसे अधिक प्रिय पत्नी है – “उपरागान्ते शशिनः समुपागता रोहिणी योगम्” |

इसके अतिरिक्त श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम की माता तथा महाराज वसुदेव की एक पत्नी का नाम भी रोहिणी था | प्रथम बार रजस्वला हुई युवा कन्या को भी रोहिणी कहा जाता है “नववर्षा च रोहिणी” | सम्भव है इसीलिए रोहिणी नक्षत्र की वर्षा को भी उत्तम माना जाता है | संगीत में एक विशेष श्रुति अथवा मूर्च्छना को भी रोहिणी नाम दिया गया है | आकाश में जो बिजली चकती है उसे भी रोहिणी कहा जाता है | समस्त दुष्कर्मों को नियन्त्रित करने के लिए हाथ में लगाम लिए प्रजेश नामक देवता का भी एक नाम रोहिणी है | इसे प्राजापत्य – वह शक्ति जो रचना करती है – भी कहा जाता है |

बुध को चन्द्र और रोहिणी की सन्तान माना जाता है | माना जाता है कि रोहिणी वास्तव में देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा थीं | चन्द्रमा तारा पर आसक्त थे इसलिए उसका अपहरण करके अपने साथ ले गए | जब बृहस्पति को इस बात का पता चला तो उन्होंने चन्द्रमा से अपनी पत्नी वापस माँगी लेकिन चन्द्रमा ने मना कर दिया | जिसके परिणामस्वरूप दोनों में युद्ध हुआ | इस युद्ध में चन्द्रमा विजयी हुए और उन्होंने तारा अर्थात रोहिणी के साथ रहना आरम्भ कर दिया | कुछ समय बाद दोनों के एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसे बुध नाम दिया गया जो चन्द्रमा का उत्तराधिकारी घोषित हुआ |

इस नक्षत्र में पाँच तारे एक गाड़ी के आकार में होते हैं और यह अक्टूबर तथा नवम्बर के मध्य पड़ता है | इस नक्षत्र के अन्य नाम हैं धातृ – रचना करने वाला अथवा धारण करने वाला, द्रुहिन् – द्रोह करना, वृद्धि…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/06/constellation-nakshatras-13/