Category Archives: नक्षत्र

सूर्य का मिथुन में गोचर

सूर्य का मिथुन में गोचर

आज सायं पाँच बजकर उन्तालीस मिनट के लगभग भगवान भास्कर अपने शत्रु गृह शुक्र की वृषभ राशि से निकल कर बुध की मिथुन राशि में प्रविष्ट हो जाएँगे, जहाँ उनके लिए विचित्र परिस्थिति बनी हुई है | एक ओर उनका मित्र ग्रह मंगल वहाँ गोचर कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर एक शत्रु ग्रह राहु का गोचर भी वहाँ चल रहा है | साथ ही शनि और केतु इन दो शत्रु ग्रहों की दृष्टियाँ भी मिथुन राशि पर हैं | मिथुन राशि सूर्य की अपनी राशि सिंह से एकादश और सूर्य की उच्च राशि मेष से तीसरे भाव में आती है | आत्मा का कारक सूर्य इस समय मृगशिर नक्षत्र पर हैं, तथा यहाँ से 22 जून को आर्द्रा, 6 जुलाई को पुनर्वसु नक्षत्रों पर भ्रमण करते हुए अन्त में 17 जुलाई को सूर्योदय से कुछ पूर्व 4:34 के लगभग कर्क राशि में प्रस्थान कर जाएँगे | सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश के समय गर करण और सिद्ध नक्षत्र होगा | पृथिवी तत्त्व युक्त मृगशिरा नक्षत्र का स्वामी मंगल सूर्य का मित्र ग्रह है तथा यह समानान्तर चलने वाला पित्त प्रकृति का धैर्यवान नक्षत्र है | आर्द्रा ऊर्ध्वमुखी तीक्ष्ण और वात प्रकृति का जल तत्त्व युक्त स्त्री नक्षत्र है तथा राहु इसका देवता है | पुनर्वसु सहनशील तथा रचनाधर्मिता युक्त समानान्तर चलने वाला वात प्रकृति का सात्विक चर पुरुष नक्षत्र है और इसका देवता है गुरु | इन्हीं समस्त तथ्यों के आधार पर जानने का प्रयास करते हैं कि मिथुन राशि में सूर्य के संक्रमण के जनसाधारण पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

किन्तु ध्यान रहे, ये परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु किसी योग्य Astrologer द्वारा उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन कराया जाना आवश्यक है |

मेष : आपका पंचमेश आपकी राशि से तीसरे भाव में प्रवेश करेगा | आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपके तथा आपके भाई बहनों के लिए कार्य में उन्नति के योग हैं | आर्थिक स्थिति में दृढ़ता के संकेत हैं | किसी घनिष्ठ मित्र अथवा भाई बहनों के सहयोग से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आप बहुत समय तक व्यस्त रहते हुए अर्थलाभ भी कर सकते हैं | किन्तु आलस्य का त्याग करके अधिक श्रम तथा प्रयास करने की आवश्यकता है | साथ ही भाई बहनों के साथ व्यर्थ के विवाद की सम्भावना को भी नकारा नहीं जा सकता | आपकी सन्तान की ओर से भी आपको शुभ समाचार प्राप्त हो सकते हैं |

वृषभ : आपकी राशि से चतुर्थेश का गोचर आपके द्वितीय भाव में हो रहा है | प्रॉपर्टी की खरीद फरोख्त में लाभ की आशा की जा सकती है | यदि आप अपने लिए नई प्रॉपर्टी खरीदना चाहते हैं तो आपका वह सपना भी पूर्ण हो सकता है | किन्तु सम्बन्धित Documents का भली भाँती निरीक्षण आवश्यक है | साथ ही आत्मविश्वास में वृद्धि के भी संकेत हैं | किन्तु माइग्रेन, ज्वर, पित्त आदि से सम्बन्धित समस्याएँ हो सकती हैं अतः गर्मी से बचने का प्रयास करें और अधिक मात्रा में पेय पदार्थों का सेवन करें |

मिथुन : आपकी राशि से तृतीयेश का गोचर आपकी लग्न में हो रहा है | भाई बहनों के साथ सम्बन्धों में प्रगाढ़ता के संकेत तो हैं किन्तु साथ ही किसी बात पर कोई विवाद भी उत्पन्न हो सकता है जिसके कारण आपको किसी प्रकार का मानसिक कष्ट भी हो सकता है | अतः किसी भी विवाद को बढ़ने न देने का प्रयास करना आपके हित में होगा | साथ ही यदि आपने अपने Temperament को नियन्त्रण में नहीं रखा तो वैवाहिक जीवन में भी तनाव उत्पन्न हो सकता है |

कर्क : आपके द्वितीयेश का गोचर आपके बारहवें भाव में हो रहा है | आपको कार्य के सिलसिले में विदेश यात्राएँ करनी पड़ सकती हैं | इन यात्राओं में एक ओर जहाँ अर्थलाभ की आशा की जा सकती है वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है – विशेष रूप से आँखों के इन्फेक्शन के प्रति सावधान रहें | खर्च में वृद्धि की भी सम्भावना है, अतः बजट बनाकर चलेंगे तो आपके लिए हित में रहेगा | पिता के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है |

सिंह : आपके राश्यधिपति का आपके लाभ स्थान में गोचर कर रहा है, वास्तव में आपके कार्य तथा आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छे संकेत प्रतीत होते हैं | नवीन प्रोजेक्ट्स आपको प्राप्त हो सकते हैं जो लम्बे समय तक आपको व्यस्त रखते हुए धनलाभ कराने में सक्षम होंगे | साथ ही नौकरी में प्रमोशन, मान सम्मान में वृद्धि तथा व्यवसाय में उन्नति के भी संकेत हैं | कोई नया कार्य भी आप इस अवधि में आरम्भ कर सकते हैं | परिवार, मित्रों, बड़े भाई, पिता तथा अधिकारियों का सहयोग भी प्राप्त रहेगा | आपकी सन्तान के लिए भी अनुकूल समय प्रतीत होता है |

कन्या : आपका द्वादशेश आपके कर्म स्थान में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से कार्य की दृष्टि से समय अत्यन्त उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है | यदि आपके कार्य का सम्बन्ध विदेशों से है तब तो आपके लिए विशेष रूप से उत्साहवर्द्धक समय प्रतीत होता है | साथ ही कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | विदेश में निवास कर रहे आपके मित्रों की ओर से आपको सहयोग प्राप्त हो सकता है | किन्तु अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता होगी |

तुला : आपका एकादशेश आपके भाग्य स्थान में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से भाग्योन्नति का समय प्रतीत होता है | सुख समृद्धि में वृद्धि के संकेत हैं | जिन जातकों का कार्य विदेश से किसी प्रकार सम्बद्ध है उनके लिए विशेष रूप से भाग्यवर्द्धक समय प्रतीत होता है | विदेश यात्राओं में वृद्धि के भी संकेत हैं | अतः अवसर का लाभ उठाने की आवश्यकता है | यदि स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई समस्या चल रही है तो उससे भी मुक्ति इस अवधि में सम्भव है |

वृश्चिक : आपकी राशि से दशमेश आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | आर्थिक दृष्टि से तो समय अनुकूल है किन्तु स्वास्थ्य की दृष्टि से समय उतना अनुकूल नहीं प्रतीत होता | गुप्त शत्रुओं के प्रति भी सावधान रहने की आवश्यकता है | स्वास्थ्य समस्याओं तथा विरोधियों के कारण आप अपने मनोबल में भी कमी का अनुभव कर सकते हैं |

धनु : आपका भाग्येश आपके सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | आपके तथा आपके जीवन साथी के लिए कार्य की दृष्टि से समय अनुकूल प्रतीत होता है | कार्य में उन्नति के संकेत हैं | जो लोग पॉलिटिक्स से जुड़े हैं उनके लिए भी समय उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है | किन्तु दाम्पत्य जीवन तथा प्रेम सम्बन्धों के लिए समय अनुकूल नहीं प्रतीत होता | आपके जीवन साथी अथवा प्रेमी / प्रेमिका के उग्र स्वभाव के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है | अपने व्यवहार को सन्तुलित रखने के लिए प्राणायाम और ध्यान का सहारा लीजिये |

मकर : आपका अष्टमेश छठे भाव में गोचर कर रहा है | एक ओर विदेश यात्राओं के योग हैं तो वहीं दूसरी ओर कार्य की दृष्टि से समय भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आप इस समय अपने प्रतियोगियों को परास्त करने में सक्षम हैं इसलिए अवसर का लाभ उठाकर अपने लक्ष्य के प्रति अग्रसर होना ही उचित रहेगा | स्वास्थ्य की दृष्टि से भी समय अनुकूल प्रतीत होता है | किसी पुरानी बीमारी के भी इस अवधि में ठीक हो जाने की सम्भावना है |

कुम्भ : आपका सप्तमेश आपकी राशि से पंचम भाव में गोचर कर रहा है | आपके लिए सूर्य का यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | व्यावसायिक रूप से आपके कार्य में तथा मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं | पॉलिटिक्स से सम्बद्ध लोगों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपकी सन्तान के लिए विशेष रूप से यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आपकी सन्तान उच्च शिक्षा के लिए विदेश भी जा सकती है और यदि नौकरी की तलाश में है तो वह भी पूर्ण हो सकती है | अविवाहित हैं तो इस अवधि में जीवन साथी की खोज भी पूर्ण हो सकती है |

मीन : षष्ठेश का चतुर्थ भाव में गोचर है | आप अथवा आपका जीवन साथी यदि नया वाहन अथवा घर खरीदना चाहते हैं तो अभी उस विचार को स्थगित करना ही उचित रहेगा | साथ ही परिवार में किसी प्रकार का मनमुटाव भी हो सकता है अतः सावधान रहने की आवश्यकता है | किन्तु नौकरी में पदोन्नति के संकेत हैं | पॉलिटिक्स में हैं तो आपको कोई पद भी प्राप्त हो सकता है | मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं | यदि किसी प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा है तो वह आपके पक्ष में आ सकता है | परिवार में किसी बच्चे का जन्म भी हो सकता है |

अन्त में जैसा सदा लिखते हैं, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के तत्व

विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय पारम्परिक रूप से अष्टकूट गुणों का मिलान करने की प्रक्रिया में नाड़ी, योनि और गणों के साथ ही नक्षत्रों के वश्य का मिलान भी किया जाता है | पाँच वश्यों के अतिरिक्त समस्त 27 नक्षत्र चार तत्वों में भी विभाजित होते हैं | जिनमें से पाँचों वश्य तथा वायु तत्व के विषय में अपने पिछले लेख में संक्षेप में लिखा था | आज शेष तत्वों के विषय में…

अग्नि तत्व : अग्नि अर्थात वह तत्व जिसमें दाहकता हो – जलाने की सामर्थ्य हो, तेज हो, ताप हो | अग्नि देव सब कुछ भस्म कर देने की सामर्थ्य रखने के साथ ही प्रकाश का कारण भी होते हैं | समस्त ब्रह्माण्ड उन्हीं के तेज से प्रकाशित होता है | साथ ही गतिशीलता में भी अग्नि तत्व से सहायता प्राप्त होती है | अग्नि शुद्धीकरण का कारक भी है – जो कुछ भी अशुद्ध है अथवा अशुभ है उसे जला डालता है और शेष रह जाता है केवल शुद्धता और शुभत्व का प्रकाश | यह प्रतिभा का भी संकेत करता है | भूख तथा पाचन क्रिया भी इसी तत्व के द्वारा नियन्त्रित होती है |

इन्द्र तत्व : इन्द्र शब्द प्रतिनिधित्व करता है बादलों का और मिट्टी कीचड़ आदि का | पञ्चमहाभूतों में से आकाश और पृथिवी दोनों इन्द्र तत्व के अन्तर्गत आते हैं | इन्द्र को देवताओं, मेघों और वर्षा का राजा भी कहा जाता है | सर्वश्रेष्ठ के लिए भी इन्द्र शब्द का प्रयोग होता है | इन्द्र को ईर्ष्यालु प्रवृत्ति का माना जाता है | इस प्रकार के पौराणिक आख्यान उपलब्ध होते हैं कि जब भी इन्द्र को पता चलता था कि कोई व्यक्ति अथवा ऋषि अपने मोक्ष के लिए तपस्या कर रहा है तो इन्द्र को भय सताने लगता था कि तपस्या के द्वारा उस व्यक्ति में और अधिक शक्तियाँ आ जाएँगी तो उसे स्वर्ग में प्रवेश मिल जाएगा और तब वह इन्द्र को परास्त करके उसके साम्राज्य पर अधिकार कर लेगा | इसीलिए प्रायः वह दूसरों की तपस्या भंग करने के प्रयास में व्यस्त रहता था | अपनी प्रजा के वह पूर्ण स्नेह तथा समर्पण के भाव से ध्यान रखता था | निर्धन तथा ज़रूरतमन्दों के लिए इन्द्र को पिटा, भाई तथा सहायक के रूप में देखा जाता है | स्वर्ग में इन्द्र का साम्राज्य है, अमरावती इसकी राजधानी है, इसके उद्यान का नाम नन्दन वन है, ऐरावत हाथी तथा उच्चैश्रवा अश्व इसके वाहन माने जाते हैं | इन्द्रधनुष इन्द्र का धनुष है तथा पर्जन्य (मेघ) इन्द्र की तलवार है |

वेदों तथा पौराणिक ग्रन्थों में इन्द्र से सम्बन्धित अनेक आख्यान उपलब्ध होते हैं | जिनमें प्रमुख हैं कि इन्द्र दो अश्वों के द्वारा खींचे जाने वाले चमकीले सुनहरे रथ पर सवार होते हैं, उनके सबस प्रिय अस्त्र आकाश में दमकने वाली बिजली तथा पाश – इन्द्रजाल हैं – जो युद्धों में विजय दिलाने तथा अन्धकार और सूखे के दानवों को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त होते हैं | इसीलिए इन्द्र को पर्यावरण का देवता भी माना जाता है | मरुद्गण अर्थात वायु इनके मुख्य सहायक हैं | इनका प्रिय भोजन है सोमरस | इन्हें कश्यप और अदिति का पुत्र भी कहा जाता है |

वरुण तत्व : वरुण को जल का देवता माना जाता है | यह बारह आदित्यों (कश्यप और अदिति के बारह पुत्र) में से एक माने जाते हैं तथा समुद्र तथा पश्चिम दिशा का स्वामी – प्रतीचीं वरुण: पति: (महाभारत) – माने जाते हैं और प्रायः मित्र – एक आदित्य –  के साथ ही रहते हैं | इनका अस्त्र पाश माना जाता है | समस्त ब्रह्माण्ड, समस्त देवों तथा मनुष्य का स्वामी भी इन्हें माना जाता है – त्वं विश्वेसां वरुणासि राजा, ये च देवा: ये च मर्ता: (ऋग्वेद 2/27/10)

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/06/06/constellation-nakshatras-45/

 

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के वश्य और तत्व

विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय पारम्परिक रूप से अष्टकूट गुणों का मिलान करने की प्रक्रिया में नाड़ी, योनि और गणों के साथ ही नक्षत्रों के वश्य का मिलान भी किया जाता है |

नक्षत्रों के वश्य : प्रत्येक नक्षत्र किसी मनुष्य अथवा किसी अन्य जीव को Dominate करता है – अर्थात उस पर अपना प्रभाव रखता है – इसी को वश्य कहा जाता है | इन वश्यों के माध्यम से जातक की कुछ मित्रता अथवा वैर आदि चारित्रिक विशेषताओं का भी ज्ञान हो जाता है | एक वश्य की दूसरे वश्य के साथ मित्रता भी हो सकती है और परस्पर वैर भी हो सकता है | एक वश्य दूसरे वश्य का भोजन भी हो सकता है और भक्षक भी | Astrologers के अनुसार अपने वश्य से Strong वश्य के साथ किसी प्रकार की भी Partnership नहीं करनी चाहिए अन्यथा वह व्यक्ति सदा उस दुर्बल वश्य वाले व्यक्ति को दबाता रहेगा | किन्तु अपने इतने वर्षों के अनुभवों के कारण हमारी मान्यता है कि अपने से Strong व्यक्ति के साथ Partnership करके आवश्यक नहीं कि दोनों के मध्य शत्रुता का ही व्यवहार रहे, ऐसा भी तो सम्भव है कि उस व्यक्ति से जीवन में सहायता भी प्राप्त हो | इसीलिए कुण्डली मिलान करते समय अष्टकूट गुणों का मिलान करते समय सभी सूत्रों के आधार पर अत्यन्त सावधानीपूर्वक दोनों कुण्डलियों का एक साथ अध्ययन आवश्यक है – अन्यथा अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगेगी | वश्य पाँच होते हैं – मानव (अर्थ स्पष्ट है), चतुष्पद (चार पैरों वाला पशु), जलचर (जल के भीतर रहने वाला अथवा तैरने वाला जीव), वनचर (वनों में भ्रमण करने वाला व्यक्ति अथवा जीव) तथा कीट (कीड़ा) |

नक्षत्रों के तत्व : सभी 27 नक्षत्रों का चार तत्त्वों के आधार पर भी विभाजन किया जाता है | ये चार तत्व हैं – वायु (the air), अग्नि (the fire), इन्द्र (the cloud and the mud), और वरुण (the water) | इन तत्त्वों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव और प्रकृति के विषय में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त हो सकती है तथा उसकी बीमारी आदि के समय उसके उपचार में सहायता प्राप्त हो सकती है | जैसे यदि किसी व्यक्ति का जन्म वायु तत्व के नक्षत्र में हुआ है तो सम्भव है उसे वायु तत्व से समबन्धित कोई समस्या हो | और इस प्रकार उसके रोग के उपचार को अनुकूल दिशा प्राप्त हो सकती है | अतः इन तत्वों की प्रकृति का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है |

वायु तत्व – वायु अर्थात हवा | सभी पदार्थों में वायु एक प्रमुख तथा दु:साध्य तत्व है | यह अग्नि की लपटों को और अधिक भड़का सकती है | उड़ाने की सामर्थ्य इसमें होती है | यह भारहीन भी हो सकती है तथा भाररहित भी हो सकती है | वातावरण में अस्थिरता उत्पन्न करने वाले हर प्रकार के आँधी तूफ़ान चक्रवात आदि का कारण भी यह वायु ही होता है | इसका मुख्य अस्त्र है आँधी – Windstorm – पौराणिक आख्यानों के अनुसार जो दानवों को दण्ड देने के लिए प्रयुक्त होता है | यह तूफ़ान खड़े करता है तथा बड़े बड़े मज़बूत क़िलों को भी ढहाने में समर्थ होता है | यह फ़सलों को उपजाऊ बनाने वाली वर्षा पृथिवी पर बरसाने में इन्द्र की सहायता भी करता है | पाँच प्रकार की वायु मनुष्य की आन्तरिक शारीरिक व्यवस्था को सन्तुलित बनाए रखने में सहायता करता है | ये पाँच वायु हैं – पान, अपान, व्यान, उदान और समान |

इनमें से पान वायु जीवन का प्रमुख कारण है | इसे ही स्वास्थ्य विज्ञान की भाषा में Distilled Breathing कहा जाता है | यह शरीर की श्वास प्रणाली को भी सन्तुलित तथा नियन्त्रित करता है | शरीर के फेफड़ों में इसका निवास होता है |

अपान वायु शरीर में निचले भाग की ओर प्रवाहित होता है तथा शरीर के निचले गुदा मार्ग यानी Anus से बाहर निकलता है |

तीसरा वायु यानी व्यान वायु पूरे शरीर में फैला रहता है – व्यानः सर्वशरीरग:, और इस प्रकार मन मस्तिष्क, माँसपेशियों, जोड़ों इत्यादि शरीर के प्रत्येक अंग को प्रभावित कर सकता है |

वायु का चतुर्थ प्रकार है उदान वायु | जिसे ऊपर की ओर साँस लेने का कारण भी माना जाता है | यह कंठ से ऊपर की ओर उठकर सर की ओर प्रस्थान करता है |

अन्तिम तथा पञ्चम प्रकार वायु का है समान वायु | यह नाभि के भीतर निवास करता है तथा पाचन प्रक्रिया को स्वस्थ बनाए रखने के लिए यह वायु अत्यन्त आवश्यक भूमिका का निर्वाह करता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/06/04/constellation-nakshatras-44/

 

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के गण

पिछले अध्याय में हमने नक्षत्रों की योनियों पर चर्चा की थी | विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय पारम्परिक रूप से अष्टकूट गुणों का मिलान करने की प्रक्रिया में नाड़ी और योनि के साथ ही नक्षत्रों के गणों का मिलान भी किया जाता है | इस विषय पर विस्तार से चर्चा “विवाह प्रकरण” में करेंगे | अभी बात करते हैं 27 नक्षत्रों को किस प्रकार तीन गणों में विभक्त किया गया है |

सामान्य रूप से समूह के लिए, संख्याओं के लिए (गण से ही गणित शब्द बना है), वर्ग विशेष के लिए गण शब्द का प्रयोग किया जाता है | सभी 27 नक्षत्र तीन गणों के अन्तर्गत आते हैं – ये तीन गण हैं – देव, मनुष्य और राक्षस | इन गणों के माध्यम से भी जातक के गुण स्वभाव का कुछ भान हो जाता है | अर्थात नक्षत्रों के गुण, धर्म, प्रकृति के आधार पर 27 नक्षत्रों का तीन समूहों में विभाजन किया गया है और सारे 27 नक्षत्रों में प्रत्येक गण में नौ नौ नक्षत्र आते हैं |

देव गण : सर्वविदित है कि स्वर्ग में देवताओं का राज्य माना जाता है | ऊर्ध्व लोक स्वर्ग लोक कहलाते हैं | देव वास्तव में हैं क्या ? “सुन्दरो दान शीलश्च मतिमान् सरल: सदा | अल्पभोगी महाप्राज्ञतरो देवगणे भवेत् ||” अर्थात जो व्यक्ति धर्म (कर्तव्य कर्म) का पालन करता है, दान (दूसरों की सहायता) करता है, बुद्धिमान है, सरलचित्त (दूसरों के प्रति दया और करुणा का भाव रखने वाला) है, अल्पभोगी अर्थात कम में भी सन्तुष्ट हो जाता है, बहुत अधिक विद्वान् है वह व्यक्ति देवगण के अन्तर्गत आता है | ऐसे व्यक्ति सदा सत्य का आचरण करते हैं | किसी को कष्ट नहीं पहुँचा सकते | अश्विनी, मृगशिरा, पुर्नवसु, पुष्‍य, हस्‍त, स्‍वाति, अनुराधा, श्रवण तथा रेवती नक्षत्र नक्षत्र देवगण के अन्तर्गत आते हैं | वास्तव में तो स्वर्ग लोक तथा उसमें निवास करने वाले देव और कोई नहीं बल्कि साधारण मानव ही हैं | सत्कर्म करने वाले मनुष्य देव कहलाने के अधिकारी होते हैं और इसी पृथिवी के जिस भी भाग में ऐसे सदाचारी मनुष्य निवास करते हैं वह भाग स्वयं ही स्वर्ग कहलाने लगता है |

मनुष्य गण : ब्रह्माण्ड के मध्य लोक पृथिवी अथवा मनुष्य लोक अथवा भूर्लोक कहलाता है | मानवमात्र का निवास स्थल भू लोक ही है | मनुष्यों में भावनाओं की प्रधानता होती है | उनके जीवन की अपनी समस्याएँ होती हैं और उनके समाधान भी होते हैं, उनके अपने उत्तरदायित्व तथा अधिकार होते हैं | अपने सुख और दुःख होते हैं | इस प्रकार मानव मात्र सुख दुःख, समस्याओं तथा उत्तरदायित्वों आदि के बन्धनों में बंधा होता है | यही कारण है कि समस्याओं से त्रस्त होता है तथा आनन्द के क्षणों में झूम उठता है | “मानी धनी विशालाक्षो लक्ष्यवेधी धनुर्धर: | गौर: पौरजन: ग्राही जायते मानवे गणे ||” मान करने वाला अर्थात आत्मसम्मान से युक्त, धनवान, विशाल नेत्र वाला, लक्ष्य का वेध करने वाला अर्था अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करने वाला, धनुर्विद्या में कुशल अर्थात लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित्त, गौरवर्ण, पुर अर्थात नगरवासियों के मध्य निवास करने वाला मनुष्य का गुण और स्वभाव होता है | भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, दोनों फाल्गुनी, दोनों आषाढ़ तथा दोनों भाद्रपद ये नौ नक्षत्र इस गण के अन्तर्गत आते हैं |

राक्षस गण : ब्रह्माण्ड का सबसे अधोभाग पाताल अथवा अधोलोक कहलाता है | अधम शब्द की निष्पत्ति अध: से ही हुई है | माना जाता है कि इन अधम लोकों में राक्षसों का वास होता है | “उन्मादी भीषणाकार: सर्वदा कलहप्रिय: | पुरुषो दुस्सहं ब्रूते प्रमेही राक्षसे गणे ||” उन्मादी अर्थात बहुत शीघ्र उत्तेजित हो जाने वाला, भीषण आकार वाला, सदा क्लेश करने वाला, दुःसह (जिसकी उपस्थिति अन्य व्यक्तियों के लिए असहनीय हो) तथा प्रायः प्रमेह नामक रोग से पीड़ित रहना इस गण में उत्पन्न जातकों की प्रकृति होती है | अश्लेषा, विशाखा, कृत्तिका, चित्रा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषज नक्षत्र इस गण के अन्तर्गत रखे गए हैं |

विशेष ; इसका अर्थ यह कदापि नहीं हो गया कि देवताओं में राक्षसों अथवा मानवों के गुण नहीं हो सकते या मानवों में शेष दोनों के गुण नहीं हो सकते या राक्षसों में देवों और मनुष्यों के गुण नहीं हो सकते | यदि कोई देवतुल्य व्यक्ति भी अनुचित कर्म करेगा तो उसे राक्षसों से भी अधिक निम्नस्तर का माना जाएगा तथा जिस स्थान पर उसका निवास होगा वह स्थान निश्चित रूप से नरकतुल्य कहलाएगा | इसी प्रकार यदि कोई राक्षस गण का व्यक्ति सदाचार का पालन करता है तो वह देवों के ही समान सम्मान का अधिकारी है तथा जहाँ वह निवास करता है वह स्थान निश्चित रूप से स्वर्ग के समान आनन्दपूर्ण हो जाता है | इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य में ये तीनों ही गुण विद्यमान रहते हैं | इस प्रकार केवल गणों के आधार पर किसी जातक के रूप गुण स्वभाव का निश्चय नहीं किया जा सकता | किसी व्यक्ति की कुण्डली का निरीक्षण करते समय विस्तार के साथ ज्योतिष के अन्य सूत्रों के आधार भी उसका अध्ययन किया जाना चाहिए और तब ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए | Blind Prediction अर्थ का अनर्थ भी कर सकती है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/06/01/constellation-nakshatras-43/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों की योनियाँ

पिछले लेख में हमने नक्षत्रों की नाड़ियों पर बात की थी | सारे 27 नक्षत्र आद्या, मध्या और अन्त्या इन तीन नाड़ियों में विभक्त होते हैं और प्रत्येक नाड़ी में नौ नक्षत्र होते हैं | नाड़ियों के साथ साथ योनियों में भी नक्षत्रों का वर्गीकरण होता है | प्रत्येक नक्षत्र एक विशेष योनि से सम्बन्ध रखता है अथवा एक विशेष योनि का प्रतिनिधित्व करता है | योनि शब्द का चिर परिचत अर्थ है गर्भाशय, उत्पत्ति का कारक तथा जन्म का वास्तविक स्थान | इसके अतिरिक्त किसी वर्ग विशेष या मनुष्यों की किसी विशिष्ट प्रजाति के लिए भी योनि शब्द का प्रयोग होता है | विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय अष्टकूट गुणों का मिलान करते हुए नाड़ी दोष की ही भाँती योनि भी मिलाकर देखी जाती हैं | वर वधू दोनों की योनि या तो एक होनी चाहियें या फिर एक दूसरे के लिए अनुकूल होनी चाहियें | इसका कारण यह है कि योनि से मनुष्य के स्वभाव का भी कुछ भान हो जाता है | इसलिए माना जाता है कि अनुकूल या एक ही योनि रहने पर दोनों पक्षों के मध्य अनुकूलता बनी रह सकती है, वहीं यदि एक दूसरे से शत्रु योनि होगी तो परस्पर क्लेश रह सकता है | इस सबके पीछे मान्यता यही है कि संसार का प्रत्येक जीव किसी न किसी योनि से सम्बन्ध रखता है | किन्तु इस सबके विषय में विस्तार से चर्चा “विवाह” प्रकरण में करेंगे | अभी तो नक्षत्रों का योनियों में वर्गीकरण…

जैसा कि ऊपर लिख चुके हैं, ज्योतिषीय गणना के आधार पर 14 योनियों में अभिजित सहित 28 नक्षत्रों को विभाजित किया गया है, जो निम्नवत है:

अश्व योनि : अश्व अर्थात घोड़ा | भगवान सूर्य के रथ में साथ घोड़े लगे होने के कारण अश्व शब्द सात के अंक का भी पर्यायवाची माना जाता है | अश्विनी और शतभिषज नक्षत्र इस योनि के अन्तर्गत आते हैं |

गज योनि : गज अर्थात हाथी | किसी वस्तु की लम्बाई की माप | आठ के अंक का भी पर्यायवाची गज को माना जाता है | साथ ही एक राक्षस का नाम भी गज है जिसका वध भगवान शिव ने किया था | इस योनि के अन्तर्गत भरणी और रेवती नक्षत्र आते हैं |

मेष योनि : मेष अर्थात भेड़ | इस योनि के अन्तर्गत पुष्य और कृत्तिका नक्षत्रों को रखा गया है |

सर्प योनि : सर्प अर्थात साँप, धीरे धीरे सरकने वाला, बहता हुआ, आगे बढ़ता हुआ, लहराता हुआ, टेढ़ा मेढ़ा बलखाता हुआ आदि अर्थों में सर्प शब्द का प्रयोग होता है | वृक्ष को भी सर्प कहा जाता है | प्राचीन काल की एक जनजाति भी सर्प कहलाती थी | रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र इस योनि के अन्तर्गत आते हैं |

श्वान योनि : कुत्ते को श्वान कहा जाता है | मूल और आर्द्रा नक्षत्र इस योनि का प्रतिनिधित्व करते हैं |

मार्जार योनि : मार्जार अर्थात बिल्ली | आश्लेषा और पुनर्वसु नक्षत्र इस योनि में आते हैं |

मूषक योनि : मूषक – चूहा | चोर के लिए भी मूषक शब्द का प्रयोग किया जाता है | इस योनि के अन्तर्गत मघा और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र आते हैं |

गौ योनि : गौ – गाय | गौ शब्द के अर्थ बहुत विस्तृत हैं | समस्त पशुओं के लिए भी गौ शब्द का प्रयोग किया जाता है | आकाश में चमकते तारकदल को भी गौ कहा जाता है | इसके अतिरिक्त आकाश, इन्द्र का विद्युत्पाश, आकाश में चमकती बिजली, प्रकाश की किरण, हीरा पत्थर, स्वर्गलोक, बाण आदि के लिए भी गौ शब्द का प्रयोग किया जाता है | वाणी और शब्दों को भी गौ कहते हैं | माता के लिए गौ शब्द का प्रयोग सर्वविदित ही है | दिक्सूचक यन्त्र यानी Compass के लिए भी गौ कहा जाता है | जल तथा आँखों के लिए भी यह शब्द प्रयुक्त होता है | उत्तर फाल्गुनी और उत्तर भाद्रपद नक्षत्र इस योनि में रखे गए हैं |

महिष योनि : महिष अर्थात भैंस या भैंसा | महिष यानी भैंसे को धर्म तथा सन्तुलन के प्रतीक यमराज का वाहन भी माना जाता है | अत्यन्त धनाढ्य नरेश – जो कि बहुत से नरेशों का स्वामी हो – को भी महिष कहा जाता है | महिष एक आदरसूचक शब्द भी है जो किसी भी अपने से बड़े व्यक्ति अथवा सम्माननीय व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है | एक राक्षस का नाम भी महिष था जिसका संहार माँ दुर्गा ने किया था | महिष योनि में स्वाति और हस्त नक्षत्रों को रखा गया है |

व्याघ्र : व्याघ्र यानी सिंह | आदरसूचक शब्द भी है व्याघ्र, जो सर्वोत्तम अथवा सबसे अधिक सम्माननीय व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है | परिवार अथवा समाज अथवा राष्ट्र का मुखिया भी व्याघ्र कहलाता है | लाल रंग का अरण्डी का पौधा यानी Castor Oil Plant भी व्याघ्र कहलाता है | विशाखा और चित्रा नक्षत्र इस योनि में आते हैं |

मृग योनि : सामान्य रूप से किसी भी पशु के लिए मृग शब्द का प्रयोह किया जाता है, किन्तु विशेष रूप से हिरण को मृग कहा जाता है | जंगली जानवर और चन्द्रमा पर दीख पड़ने वाले काले धब्बे के लिए भी मृग शब्द का प्रयोग किया जाता है | अनुसरण करना, प्रयास करना, खोज करना, शिकार करना, परीक्षण करना आदि अर्थों में भी मृग शब्द का बहुतायत से प्रयोग किया जाता है | एक विशेष प्रकार के हाथी को भी मृग कहा जाता है | व्यक्तियों का एक विशिष्ट वर्ग तथा एक प्राचीनकालीन जनजाति भी मृग कहलाती है | ज्येष्ठा और अनुराधा नक्षत्र इस योनि के अन्तर्गत आते हैं |

वानर योनि : नाम से ही स्पष्ट है – बन्दर | बन्दरों से सम्बन्धित समस्त प्रजातियाँ जैसे भालू, Chimpanzee, रीछ आदि भी वानर ही कहलाते हैं | रक्त-श्वेत पुष्पों से युक्त लोध्र वृक्ष को भी वनार की संज्ञा दी जाती है | पूर्वाषाढ़ और श्रवण नक्षत्रों को इस योनि के अन्तर्गत रखा गया है |

नकुल योनि : नकुल यानी नेवला | पुत्र के लिए तथा छोटे व्यक्ति या भाई के लिए भी नकुल शब्द का प्रयोग किया जाता है | इस योनि के अन्तर्गत आने वाले नक्षत्रों के नाम हैं उत्तराषाढ़ और अभिजित |

सिंह योनि : सर्वविदित अर्थ है – शेर | हिंसा शब्द से सिंह शब्द निरूपित हुआ है – जिसका अर्थ ही है किसी को मारना | इसके अतिरिक्त सबसे उत्तम वस्तु या व्यक्ति आदि के लिए तथा समाज के विशिष्ट रूप से सम्मानित वर्ग के लिए भी सिंह शब्द का प्रयोग होता है | पूर्वा भाद्रपद और धनिष्ठा नक्षत्र इस योनि में आते हैं |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों की नाड़ियाँ

पिछले लेख में हमने बात की प्रत्येक नक्षत्र की संज्ञाओं और उनके आधार पर जातक के अनुमानित कर्तव्य कर्मों की | नक्षत्रों का विभाजन नाड़ी, योनि और तत्वों के आधार पर किया गया है | तो आज “नाड़ियों” पर संक्षिप्त चर्चा…

प्रत्येक नक्षत्र की अपनी एक नाड़ी होती है – या यों कह सकते हैं कि प्रत्येक नक्षत्र एक विशेष नाड़ी के अन्तर्गत आता है | ये नाड़ियाँ वास्तव में मानव शरीर के विशिष्ट प्रकार की प्रकृति यानी Constitution का प्रतिनिधित्व करती हैं | इन नाड़ियों का अध्ययन करके यह समझने का प्रयास किया जाता है कि जिस जातक की कुण्डली का हम निरीक्षण कर रहे हैं उस जातक की प्रकृति कफप्रधान यानी Phlegmatic है, या पित्त यानी Bile प्रधान है या वात यानी Air प्रधान है | जो लोग Medical Astrology करते हैं उनके लिए विशेष रूप से इन नाड़ियों का ज्ञान होना आवश्यक है क्योंकि इनके द्वारा रोगी की प्रकृति को समझकर उसके अनुसार उसके रोग का उपचार करने में सहायता प्राप्त होती है |

समय का एक भाग भी नाड़ी कहलाता है | भाचक्र की मध्य की खगोलीय रेखा यानी Celestial Equator भी नाड़ी कहलाती है | इसके अतिरिक्त गुलिका तथा सूर्य की किरण को भी नाड़ी कहा जाता है | मनुष्य के शरीर की नब्ज़ भी नाड़ी कहलाती है – जिसे हाथ से पकड़कर वैद्य रोगी के रोग की पहचान करता है | विवाह के समय दो व्यक्तियों की कुण्डली का मिलान करते हुए यदि नाड़ी दोष पाया जाता है तो या तो ज्योतिषी वहाँ विवाह की सलाह ही नहीं देते, और यदि देते भी हैं तो उसके लिए कुछ उपचार आदि भी बताते हैं | माना जाता है कि नाड़ी दोष में यदि विवाह कर दिया जाए – अर्थात दो व्यक्तियों की एक नाड़ी होने पर यदि विवाह कर दिया जाए – तो सन्तान के लिए हानिकारक होता है | किन्तु आज जब Medical Science इतनी तरक्क़ी कर चुकी है तो ऐसे में इन दोषों का कोई महत्त्व हमारे विचार से नहीं रह जाता | फिर भी इस विषय पर विस्तार से चर्चा “विवाह” प्रकरण में…

नाड़ी मुख्यतया तीन होती हैं, जिनमें 27 नक्षत्रों का विभाजन किया गया है | अर्थात प्रत्येक नाड़ी के अन्तर्गत नौ नक्षत्र आते हैं | जो निम्नवत हैं –

आद्या नाड़ी – शरीर की वात प्रकृति या वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करती है | वात दोष से सम्बन्धित समस्याओं जैसे गठिया, आमवात, स्नायुतन्त्र से सम्बन्धित समस्या इत्यादि का ज्ञान इस नाड़ी से होता है | अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठ, मूल, शतभिषज और उत्तर भाद्रपद नक्षत्र आद्या नाड़ी के अन्तर्गत आते हैं |

मध्या नाड़ी – पित्त प्रकृति अर्थात शरीर में अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करती है तथा पित्त दोष से सम्बन्धित समस्याओं का ज्ञान इस नाड़ी से होता है | भरणी, मृगशिर, पुष्य, पूर्वा फाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़, धनिष्ठा तथा उत्तर भाद्रपद नक्षत्र इस नाड़ी के अन्तर्गत आते हैं |

अन्त्या नाड़ी – यह नाड़ी मनुष्य के शरीर में कफ और जल तत्व का प्रतिनिधित्व करती है | कृत्तिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़, श्रावण और रेवती नक्षत्र अन्त्या नाड़ी के अन्तर्गत आते हैं |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों की संज्ञा के अनुसार कर्तव्य कर्म

पिछले लेखों में बात कर रहे थे कि 27 नक्षत्रों में प्रत्येक नक्षत्र में कितने तारे (Stars) होते हैं, प्रत्येक नक्षत्र के देवता (Deity) तथा स्वामी अथवा अधिपति ग्रह (Lordship) कौन हैं, प्रत्येक नक्षत्र को क्या संज्ञा दी गई है | नक्षत्रों की संज्ञा से उनकी प्रकृति का भी कुछ अनुमान हो जाता है | साथ ही यह भी बताने का प्रयास कर रहे थे कि विभिन्न राशियों में कितने अंशों तक किस नक्षत्र का प्रस्तार होता है | उसे ही और सरल बनाते हुए नक्षत्रों के देवताओं के विषय में बताया गया | साथ ही चर्चा की थी नक्षत्रों की संज्ञा की | नक्षत्रों की संज्ञा के आधार भी कुछ आभास जातक के रूप गुण स्वभाव का हो सकता है | साथ ही नक्षत्रों की संज्ञा के अनुसार ही कर्म करने की भी सलाह ज्योतिषी देते हैं | जैसे:

जिन नक्षत्रों की संज्ञा ध्रुव हो उनमें वे कार्य करने चाहियें जिनमें स्थायित्व हो – क्योंकि ध्रुव का अर्थ ही है स्थाई – स्थिर – दृढ़ – अविचल | ये कार्य हैं अभिषेक करना, किसी उत्पात से शान्ति का प्रयास करना, बीज बोना अथवा वृक्षारोपण करना, किसी नगर अथवा भवन आदि की नींव रखना, कोई धार्मिक कृत्य करना करना इत्यादि इत्यादि |

लघु संज्ञा वाले नक्षत्रों में शास्त्रारम्भ, ललित कलाओं की शिक्षा आरम्भ करना, यात्रा के लिए प्रस्थान करना, रोग मुक्ति के लिए औषधि का प्रयोग करना, वस्तुओं का क्रय विक्रय, आभूषण खरीदना, शिल्प कर्म आदि करना उचित माना जाता है |

जिन नक्षत्रों की संज्ञा मृदु हो उनमें मित्रता जैसा मधुर कार्य करना चाहिए | किसी भी प्रकार का ऐसा कार्य जिसमें कोमलता का – मृदुता का भाव हो तथा मांगलिक कार्य मृदु संज्ञा वाले नक्षत्रों में करने चाहियें |

उग्र संज्ञा वाले नक्षत्रों में इनके स्वभाव के अनुसार ही उग्र स्वभाव वाले कार्य करने चाहियें | जैसे: शस्त्रों का प्रयोग तथा उसका अभ्यास करना | तान्त्रिक क्रियाएँ जो लोग करते हैं उनके लिए भी ये नक्षत्र अनुकूल माने जाते हैं | युद्ध आरम्भ करने के लिए इन नक्षत्रों को उपयुक्त माना जाता है | किसी प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करने के लिए भी इस नक्षत्र को उपयुक्त माना जाता है |

तीक्ष्ण संज्ञा वाले नक्षत्रों को प्रायः उन लोगों के लिए अनुकूल माना जाता है जो किसी प्रकार के मन्त्र के प्रयोग में सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं या किसी प्रकार के विघ्न बाधा आदि से मुक्ति का प्रयास करना चाहते हैं | इसके अतिरिक्त न्यायालय में या किसी इंटरव्यू आदि के लिए प्रार्थना पत्र देने के लिए भी ये नक्षत्र उपयुक्त माने जाते हैं | कहीं पैसा इन्वेस्ट करना हो तो उसके लिए भी ये नक्षत्र अनुकूल माने जाते हैं |

मृदुतीक्ष्ण – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है – मृदु और तीक्ष्ण दोनों प्रकार के कार्यों के लिए ये नक्षत्र अनुकूल माने जाते हैं | जैसे किसी भी प्रकार का ऐसा कार्य जिसमें कोमलता का – मृदुता का भाव हो तथा मांगलिक कार्य, मन्त्र सिद्धि के लिए प्रयास करना, इंटरव्यू या कोर्ट में कोई प्रार्थना पत्र देना इत्यादि |

चर नक्षत्रों को प्रायः सभी प्रकार के कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है | किन्तु यात्रा आदि के लिए ये नक्षत्र विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं |

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