वर्ष 2019 में पंचकों की सूची

वर्ष 2019 में प्रथम पंचक कल बुधवार 9 जनवरी दोपहर 1:16 से आरम्भ होकर सोमवार 14 जनवरी दोपहर 12:52 तक रहेंगे | आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं वर्ष 2019 में आने वाले पंचकों की एक तालिका | किन्तु तालिका प्रस्तुत करने से पूर्व आइये जानते हैं कि पंचक वास्तव में होते क्या हैं |

पंचकों का निर्णय Astrologers चन्द्रमा की स्थिति से करते हैं | घनिष्ठा से रेवती तक पाँच नक्षत्र पंचक समूह में आते हैं | अर्थात घनिष्ठा के तृतीय चरण से लेकर रेवती का अन्तिम चरण तक अर्थात धनिष्ठा का तृतीय चरण, शतभिषज, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती नक्षत्रों में जब चन्द्रमा होता है तब यह स्थिति नक्षत्र पंचक – पाँच विशिष्ट नक्षत्रों का समूह – कहलाती है | इनमें दो नक्षत्र – पूर्वा भाद्रपद और रेवती – सात्विक नक्षत्र हैं, तथा शेष तीन – शतभिषज धनिष्ठा और उत्तरभाद्रपद – तामसी नक्षत्र हैं | इन पाँचों नक्षत्रों में चन्द्रमा क्रमशः कुम्भ और मीन राशियों पर भ्रमण करता है | अर्थात चन्द्रमा के मेष राशि में आ जाने पर पंचक समाप्त हो जाते हैं | इस प्रकार वर्ष भर में कई बार पंचकों का समय आता है |

पंचकों को प्रायः किसी भी शुभ कार्य के लिए अशुभ माना गया है | इस अवधि में बच्चे का नामकरण तो नितान्त ही वर्जित है | ऐसी भी मान्यता है कि पंचक काल में शव का दाह संस्कार नहीं करना चाहिए अन्यथा परिवार के लिए शुभ नहीं होता |

पंचकों के अलग अलग वार के अनुसार अलग अलग फल होते हैं | जैसे सोमवार को यदि पंचकों का आरम्भ हो तो उन्हें राज पंचक कहा जाता है जो शुभ माना जाता है | इसका अर्थ यह हुआ कि इस अवधि में कोई शुभ कार्य भी किया जा सकता है | इसके अतिरिक्त कुछ पंचकों को रोग पंचक माना जाता है तो कुछ को चोर पंचक और कुछ को अग्नि पंचक | नाम से ही स्पष्ट है कि मान्यता के अनुसार इन पंचकों में रोग, आग लगने अथवा चोरी आदि का भय हो सकता है | जैसे धनिष्ठा नक्षत्र में कोई कार्य आरम्भ करने से अग्नि का भय हो सकता है, शतभिषज में क्लेश का भय, पूर्वाभाद्रपद रोगकारक, उत्तर भाद्रपद में दण्ड का भय तथा रेवती नक्षत्र में कोई कार्य आरम्भ करने पर धनहानि का भय माना जाता है |

इसके अतिरिक्त कुछ अन्य कार्यों की भी मनाही पंचकों के दौरान होती है – जैसे दक्षिण दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए | लेकिन आज के प्रतियोगिता के युग में यदि किसी व्यक्ति का नौकरी के लिए इन्टरव्यू उसी दिन हो और उसे दक्षिण दिशा की ही यात्रा करनी पड़ जाए तो वह कैसे इस नियम का पालन कर सकता है ? यदि पंचकों के भय से वह इन्टरव्यू देने नहीं जाएगा तो जो कार्य उसे मिलने की सम्भावना हो सकती थी वह कार्य उसके हाथ से निकल कर किसी और को मिल सकता है |

ऐसी भी मान्यता है कि इस अवधि में किया कोई भी कार्य पाँचगुना फल देता है | इस स्थिति में तो इस अवधि में किये गए शुभ कार्यों का फल भी पाँच गुना प्राप्त होना चाहिए – केवल अशुभ कार्यों का ही फल पाँच गुणा क्यों हो ? सम्भवतः इसी विचार के चलते कुछ लोगों ने ऐसा विचार किया कि पंचक केवल अशुभ ही नहीं होते, शुभ भी हो सकते हैं | इसीलिए पंचकों में सगाई, विवाह आदि शुभ कार्य करना अच्छा माना जाता है | पंचक के अन्तर्गत आने वाले तीन नक्षत्र – पूर्वा भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती – में से कोई यदि रविवार को आए तो वह बहुत शुभ योग तथा कार्य में सफलता प्रदान करने वाला माना जाता है |

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हमारी ऐसी मान्यता है कि ज्योतिष के प्राचीन सूत्रों को – प्राचीन मान्यताओं को – आज की परिस्थितियों के अनुकूल उन पर शोध कार्य करके यदि संशोधित नहीं किया जाएगा तो उनका वास्तविक लाभ उठाने से हम वंचित रह सकते हैं | वैसे भी ज्योतिष के आधार पर कुण्डली का फल कथन करते समय भी देश-काल-व्यक्ति का ध्यान रखना आवश्यक होता है | तो फिर विशिष्ट शुभाशुभ कालों पर भी इन सब बातों पर विचार करना चाहिए | साथ ही हर बात का उपाय होता है | किसी भी प्रकार के अन्धविश्वास से भयभीत होने की अपेक्षा अपने कर्म पर बल देना चाहिए |

तो, अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए हम सभी का जीवन मंगलमय रहे और सब सुखी रहें… इसी भावना के साथ प्रस्तुत है वर्ष 2019 में आने वाले पंचकों की एक तालिका…

  • बुधवार 9 जनवरी दोपहर 1:16 से आरम्भ होकर सोमवार 14 जनवरी दोपहर 12:52 तक
  • मंगलवार 5 फरवरी सायं 35 से आरम्भ होकर रविवार 10 फरवरी सायं 7.37 तक
  • सोमवार 4 मार्च रात्रि 09 से आरम्भ होकर शनिवार 9 मार्च रात्रि 1.18 तक
  • सोमवार 1 अप्रैल प्रातः 21 से आरम्भ होकर शुक्रवार 5 अप्रैल तड़के 5.55 तक
  • रविवार 28 अप्रैल दोपहर 43 से आरम्भ होकर शुक्रवार 3 मई दोपहर 2.39 तक
  • शनिवार 25 मई रात्रि 43 से आरम्भ होकर गुरूवार 30 मई रात्रि 11.03 तक
  • शनिवार 22 जून प्रातः 39 से आरम्भ होकर गुरूवार 27 जून प्रातः 7.44 तक
  • शुक्रवार 19 जुलाई दोपहर 58 से आरम्भ होकर बुधवार 24 जुलाई दोपहर 3.42 तक
  • गुरूवार 15 अगस्त रात्रि 28 से आरम्भ होकर मंगलवार 20 अगस्त को सायं 6.41 तक
  • बुधवार 11 सितम्बर रात्रि 26 से आरम्भ होकर मंगलवार 17 सितंबर रात्रि 1.53 तक
  • बुधवार 9 अक्टूबर प्रातः 39 से आरम्भ होकर सोमवार 14 अक्टूबर प्रातः 10.21 तक
  • मंगलवार 5 नवम्बर सायं 47 से आरम्भ होकर रविवार 10 नवम्बर 5.17 तक
  • सोमवार 2 दिसम्बर रात्रि 57 से आरम्भ होकर शनिवार 7 दिसम्बर रात्रि 1.29 तक

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/01/08/panchak-in-the-year-2019/

 

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी महीनों का विभाजन और उनके वैदिक नाम:-

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम पहले बहुत कुछ लिख चुके हैं | अब आरम्भ करते हैं कि किस प्रकार हिन्दी महीनों का विभाजन नक्षत्रों के आधार पर हुआ तथा उन हिन्दी महीनों के वैदिक नाम क्या हैं |

हम यह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि प्रत्येक हिन्दी माह में दो दो नक्षत्र होते हैं | केवल आश्विन, भाद्रपद और फाल्गुन ही ऐसे महीने हैं जिनमें प्रत्येक में तीन तीन नक्षत्र आते हैं | यहाँ हम प्रत्येक हिन्दी माह का वैदिक नाम प्रस्तुत कर रहे हैं… आज चैत्र और वैशाख माह…

चैत्र : चैत्र माह में दो नक्षत्र आते हैं – चित्रा और स्वाति तथा चित्रा नक्षत्र प्रधान होने के कारण इस माह का नाम चैत्र चैत्र नवरात्रपड़ा | इस माह का वैदिक नाम है मधु – स्पष्ट रूप से सभी जानते हैं कि मधु शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है मीठा, sophisticated, pleasant, tasteful. पुष्पों के पराग को भी मधु कहा जाता है | शहद अर्थात Honey को भी मधु कहते हैं | एक प्रकार का सोमरस मधु कहलाता है | अमृत के लिए मधु शब्द का प्रयोग हमारे साहित्यकार प्रायः करते हैं | दूध के लिए मधु शब्द का प्रयोग होता है | इसके साथ ही एक राक्षस का नाम भी मधु था, माँ भगवती की सहायता से भगवान विष्णु ने जिसका वध किया था | इसीलिए भगवान विष्णु का एक नाम भी माधव है | भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने भी मधु नाम के एक राक्षस का वध किया था जो लवणासुर का पुत्र था | ऐसी भी मान्यता है कि वर्तमान मथुरा शहर का नाम मथुरा (मधुरा) उस दैत्य के नाम पर पड़ा जो मथुरा के चारों ओर प्रसारित मधु नामक वन में रहा करता था | माना जाता है कि जो व्यक्ति इस माह में दिन में एक समय भोजन ग्रहण करता है तथा अनुशासित और संयमित जीवन व्यतीत करता है उसे हर प्रकार की सुख समृद्धि प्राप्त होती है | चैत्र नवरात्रों में एक समय भोजन ग्रहण करने तथा व्रत आदि का अनुष्ठान करने के पीछे भी सम्भवतः यह भी एक लोकमान्यता रही होगी |

वैशाख : इस माह में भी दो नक्षत्र होते हैं – विशाखा और अनुराधा तथा विशाखा नक्षत्र प्रमुख होने के कारण इसका बैसाखीनाम वैशाख पड़ा | इसका वैदिक नाम है माधव | इस माह में वसन्त ऋतु भी आती है | क्योंकि यह माह चैत्र अर्थात मधु के बाद आता है इसलिए भी इसे माधव कहा जाता है | वसन्त ऋतु को प्रेम तथा सौन्दर्य के देवता कामदेव का परम मित्र माना जाता है | माधव अर्थात मधु के समान मधुर | नींबू के रंग – Lemon Colour – को भी माधव कहा जाता है | मधु दैत्य के पुत्र का नाम, भगवान कृष्ण का नाम, इन्द्र तथा परशुराम का भी नाम माधव उपलब्ध होता है | मधु से बनी सुरा को भी माधव कहा जाता है | चैत्र माह के ही समान इस माह के विषय में भी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस माह में अनुशासित और संयमित जीवन व्यतीत करता है वह सब प्रकार की सुख समृद्धि प्राप्त करता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/01/04/constellation-nakshatras-31/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

रेवती

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषज, पूर्वा भाद्रपद और उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा रेवती नक्षत्र के विषय में |

रेवती नक्षत्र में 32 तारे होते हैं | भारतीय वैदिक ज्योतिष  की गणनाओं के लिये महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से रेवती को 27वां तथा अन्तिम नक्षत्र माना जाता है | साथ ही इसी नक्षत्र के साथ पंचकों की भी समाप्ति हो जाती है | रेवती का शाब्दिक अर्थ है धनवान अथवा धनी और इसी के अनुसार Astrologers इस नक्षत्र को धन सम्पदा की प्राप्ति तथा सुखमय जीवन के साथ जोड़ कर देखते हैं | पानी में तैरती हुई एक मछली को रेवती नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में माना जाता है | कुछ लोग मानते हैं कि मछली का जल में तैरना उस आत्मा का प्रतीक है तो भवसागर में अनेकों तूफ़ानों को झेलते हुए निरन्तर आगे बढ़ने का तथा मोक्ष का मार्ग ढूँढ़ रही है | इस मान्यता के पीछे सम्भवतः एक कारण यह भी हो सकता है कि रेवती नक्षत्र का सम्बन्ध मीन राशि से है, और मीन राशि राशि चक्र की अन्तिम राशि होने के कारण मृत्यु के पश्चात के जीवन तथा मोक्ष की यात्रा की प्रतीक भी मानी जाती है | साथ ही एक मान्यता यह भी है कि जिस प्रकार मछली जल में ही प्रसन्न रहती है तथा उसके चारों अथाह जल रहता है उसी प्रकार रेवती नक्षत्र के जातक इस संसार में सदा सुखी रहते हैं और समस्त प्रकार की सुख सुविधाओं का उपभोग करते हैं |

रेवती नक्षत्र के सम्बन्ध में श्रीमद्देवीभागवत में एक प्रसंग उपलब्ध होता है कि ऋत्वाक मुनि का पुत्र रेवती नक्षत्र के अन्तिम चरण में हुआ था – जिसे ज्योतिषी गण्डान्त मानते हैं | गण्डान्त में जन्म होने के कारण वह अत्यन्त दुराचारी बन गया था | ऋषि ने इसका सारा दोष रेवती नक्षत्र को दिया और उसे अपने श्राप से नक्षत्र मण्डल से नीचे गिरा दिया | जिस पर्वत पर रेवती का पतन हुआ उसे ऋत्विक अथवा रेवतक पर्वत कहा जाने लगा तथा उस पर्वत का सौन्दर्य कई गुना बढ़ गया | जिससे प्रभावित होकर प्रमुच मुनि ने अपनी रूपवती दत्तक पुत्री का नाम भी रेवती रख दिया | उसके विवाहयोग्य होने पर स्वयंभुव मनु के वंशज राजा दुर्दम ने उसके साथ विवाह की इच्छा प्रकट की तब रेवती ने कहा कि ठीक है, मैं विवाह के लिए तैयार हूँ, लेकिन अपने नाम वाले रेवती नक्षत्र में ही मैं विवाह संस्कार कराना चाहती हूँ | मुनि प्रमुच जानते थे कि रेवती को तो अब नक्षत्र मण्डल में कोई स्थान प्राप्त है नहीं तो उस नक्षत्र में विवाह कैसे सम्पन्न हो सकता है ? तब रेवती ने अपने पिता से कहा कि यदि एक ऋषि ने अपने क्रोधवश अकारण ही रेवती को पदच्युत कर दिया तो आप भी उतने ही महान ऋषि हैं, आप क्या उसे फिर से उसका स्थान नहीं दिला सकते ? तब प्रमुच ऋषि ने रेवती को फिर से सोममार्ग में उसका स्थान वापस दिलाया | इस प्रकार रेवती नक्षत्र इस बात का भी प्रतीक माना जाता है कि यदि किसी कारण वश किसी व्यक्ति का सब कुछ नष्ट हो भी जाए तो भी वह गुरु कृपा से सब कुछ पुनः प्राप्त कर सकता है |

रेवती का देवता पूषा को माना जाता है और पूषा आत्मा, प्रकाश तथा जीवनी शक्ति के कारक सूर्य का ही एक नाम है | साथ ही पूषा समृद्धि का देवता भी माना जाता है | सूर्य संचार प्रणाली के भी द्योतक माना जाता है | इस प्रकार ज्योतिषियों की यह मान्यता भी दृढ़ हो जाती है कि जो व्यक्ति रेवती नक्षत्र के प्रभाव में होते हैं वे धनवान, उदार तथा आधुनिक समय में मीडिया आदि से सम्बन्धित किसी कार्य में संलग्न हो सकते हैं |

भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम की पत्नी का नाम रेवती था | गाय के लिए तथा नींबू के वृक्ष के लिए भी रेवती शब्द का प्रयोग किया जाता है | माना जाता है कि शनि की उत्पत्ति भी रेवती के गर्भ से हुई थी और इसीलिए शनि का एक नाम “रेवतीभव” भी है | स्पष्ट करना, प्रदर्शन करना, चमकना, आनन्दोत्सव मनाना तथा सौन्दर्य आदि के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | अन्य नाम हैं अन्त्य – क्योंकि नक्षत्र मण्डल का अन्तिम नक्षत्र होता है | उदार पीड़ा के निवारण के लिए किसी विशेष वृक्ष की मूल का उपयोग किया जाता है – उसे भी रेवती कहा जाता है | आरोह अर्थात ऊपर चढ़ने के क्रम में सबसे अन्तिम संख्या के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | अगस्त सितम्बर के महीनों में यह नक्षत्र आता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/12/06/constellation-nakshatras-30/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

शतभिषज

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण और धनिष्ठा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा शतभिषज नक्षत्र के विषय में |

“पंचक” के पाँच नक्षत्रों के समूह का दूसरा नक्षत्र तथा नक्षत्र मण्डल का चौबीसवाँ नक्षत्र है शतभिषज | इस नक्षत्र में सौ तारों का समावेश होता है इसलिए इसका नाम शतभिषज है | इसका एक नाम शत्तारक भी है – जिसका भी शाब्दिक अर्थ यही है – सौ तारों का एक समूह | बहुत से Astrologers का मानना है कि इस नक्षत्र का सम्बन्ध रोग अथवा चिकित्सा से है | जो सत्य ही प्रतीत होता है | क्योंकि शत अर्थात सौ प्रकार की भिषज यानी औषधियाँ | सौ का अर्थ यहाँ सौ की गिनती से नहीं लिया जाना चाहिए अपितु अनेक प्रकार की औषधियों से लिया जाना चाहिए | विभेत्यस्मात् रोगः इति भिषजः – जिससे रोग डरें वह भिषज – अर्थात डॉक्टर वैद्य आदि | अन्य अर्थ हैं इलाज़ करना, भगवान् विष्णु, वरुण देव, समुद्र के देवता अथवा दक्षिण दिशा के स्वामी, आकाश, जल आदि | यह नक्षत्र जुलाई और अगस्त के मध्य श्रावण माह में पड़ता है | एक गोलाकार रिक्त स्थान इस नक्षत्र का प्रतीक माना जाता है | रिक्त गोल की विशेषताएँ होती हैं कि इस गोलाकार वृत्त की सीमाओं के भीतर इतना स्थान होता है कि इसमें चाहे जितना भी समाया जा सकता है | किन्तु जो वस्तुएँ इसके भीतर समाई जाएँगी उन्हें भी यह वृत्त सीमित कर देता है | इसका अभिप्राय यही है कि इस नक्षत्र के जातकों में हर किसी को अपना बना लेने की सामर्थ्य होती है | साथ ही सीमाएँ सुरक्षा की भी द्योतक होती हैं | जिसका अर्थ हुआ कि इस नक्षत्र का जातक एक अधिकारी के रूप में सीमाओं का निर्धारण भी कर सकता है तथा रक्षा करने में समर्थ होता है – फिर चाहे वह रक्षा एक चिकित्सक के रूप में किसी रोग से हो अथवा एक सेनानी के रूप में किसी शत्रु से अथवा परिवार या समाज या राष्ट्र के प्रभावशाली मुखिया के रूप में अपने परिवार, समाज अथवा राष्ट्र की विपरीत परिस्थितियों में रक्षा का प्रश्न हो – इस नक्षत्र का जातक सदैव तत्पर रहता है |

वृत्त का अर्थ पूर्णता अथवा समाप्ति भी हो सकता है – क्योंकि एक वृत्त हर ओर से पूर्ण ही प्रतीत होता है | इस प्रकार यह भी माना जा सकता है कि इस नक्षत्र के जातकों में आत्मविश्वास के साथ ही पूर्णता अथवा सन्तुष्टि का भाव भी प्रबल रूप हो सकता है | साथ ही कार्य को समय पर पूर्ण करने में भी ऐसे जातक सक्षम हो सकते हैं | इसके अतिरिक्त वृत्त अपनी सीमाओं में रहता है – जिसका यह भी अर्थ निकाला जा सकता है कि इस नक्षत्र के जातक अन्तर्मुखी प्रवृत्ति के हो सकते हैं |

इस नक्षत्र में सौ तारे एक वृत्त के रूप में समाहित हैं जो इस बात का भी प्रतीक हैं कि इस नक्षत्र का जातक अपने मन के भीतर बहुत से ऐसे तथ्यों को अथवा रहस्यों को छिपा रखने में समर्थ होता है जिनके विषय में किसी को कुछ भी भान न हो | साथ ही इसका यह भी तात्पर्य है कि इस नक्षत्र का जातक बहुत सा ज्ञान अपने मस्तिष्क में समाए हुए है | बहुआयामी व्यक्तित्व का भी धनी ऐसा व्यक्ति हो सकता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/11/23/constellation-nakshatras-28/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

धनिष्ठा

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ और श्रवण नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा धनिष्ठा नक्षत्र के विषय में | सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि धनिष्ठा में जब कुम्भ राशि आरम्भ होती है तब से लेकर रेवती नक्षत्र तक – यानी धनिष्ठा के अन्तिम दो पाद तथा शतभिषज, दोनों भाद्रपद और रेवती नक्षत्रों के चारों पाद पंचक – पाँच नक्षत्रों का समूह – कहलाते हैं | पंचकों के विषय में विस्तार से पहले ही लिखा जा चुका है, आज नक्षत्रों की चर्चा |

नाम से ही स्पष्ट है – धनवान व्यक्ति के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है | इस नक्षत्र में चार तारे होते हैं | इस नक्षत्र के अन्य नाम हैं वसु – जिसका अर्थ है धन धान्य आदि | इसी कारण से कुछ Astrologer इस नक्षत्र को जातक के अत्यन्त धनवान होने का प्रतीक भी मानते हैं तथा अत्यन्त लाभकारी नक्षत्र मानते हैं | धनिष्ठा नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक के विषय में माना जाता है कि वह जातक सुख समृद्धि तथा मान प्रतिष्ठा से युक्त होता है तथा उसका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है |

इसके अतिरिक्त मधुर, शुष्क, उत्तम, जल समुद्री नमक आदि के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है | एक औषधीय जड़ी भी धनिष्ठा कहलाती है | आठ देवताओं के एक समूह को भी धनिष्ठ कहा जाता है और इसीलिए सम्भवतः आठ की संख्या के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाने लगा | अप:, ध्रुव, धारा, अनिल, सोम, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास ये आठ वसु वसु श्रेष्ठता, सुरक्षा, धन धान्य तथा ऐसी ही अन्य श्रेष्ठ वस्तुओं के पर्यायवाची हैं | यही कारण है कि धनिष्ठा नक्षत्र इन आठ वसुओं की विशेषताओं का भी द्योतक है तथा इसमें उत्पन्न जातक व्यवहारकुशल हो सकता है, ऊर्जावान, दृढ़ स्वभाव, प्रसन्नचित्त, अनुशासनप्रिय तथा लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित्त हो सकता है |

ढोल अथवा मृदंगम को इसका प्रतीक माना जाता है | इसके आधार पर इस नक्षत्र की संगीत विद्या का प्रतीक भी माना जाता है | अर्थात जो जातक इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आते हैं वे धनवान होने के साथ ही सुरुचिसम्पन्न तथा संगीत प्रेमी भी हो सकते हैं |

श्रवण नक्षत्र की ही भाँति यह नक्षत्र भी जुलाई और अगस्त के मध्य श्रावण माह में पड़ता है |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

श्रवण

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा श्रवण नक्षत्र के नाम और उनके अर्थ के विषय में |

नक्षत्र मण्डल में श्रवण नक्षत्र बाईसवाँ नक्षत्र है | श्रु धातु से श्रवण शब्द की निष्पत्ति हुई है | श्रु का अर्थ होता है सुनना – श्रवण करना | सुनकर कुछ सीखने के लिए भी श्रवण शब्द का प्रयोग किया जाता है | किसी त्रिकोण के किनारों को भी श्रवण कहा जाता है | श्रवण यानी कान, श्रौत सूत्र ये सब श्रु धातु से ही प्रतिपादित हैं | वैभव, प्रसिद्धि आदि के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | इस नक्षत्र में तीन तारे होते हैं | जुलाई और अगस्त में श्रावण मास में यह नक्षत्र उदित होता है इसीलिए इस माह को श्रावण मास कहा जाता है | इसके अन्य नाम हैं गोविन्द, विष्णु, श्रुति, श्राविष्ठ | कुछ स्थानों पर बुध को भी श्रवण कहा गया है |

Astrologers कान को भी श्रवण नक्षत्र का चिह्न मानते हैं | इस कारण से कान के माध्यम से प्रदर्शित होने वाली सारी विशेषताएँ इस नक्षत्र के जातकों में हो सकती हैं – जैसे सुनना अथवा सुन कर सीखना | उपनिषद काल में गुरु के समीप बैठकर तथा गुरुमुख से श्रवण करके ही समस्त विद्याएँ प्राप्त की जाती थीं | और न केवल विद्या प्राप्त की जाती थी, बल्कि उसे इस प्रकार स्मरण भी रखा जाता था कि दूसरे लोगों तक उस ज्ञान का प्रचार प्रसार किया जा सके – दूसरे लोगों को भी वह विद्या सिखाई जा सके | इस प्रकार सुनने के साथ साथ ज्ञान को संगृहीत और सुरक्षित रखने के अर्थ में भी श्रवण शब्द का उपयोग किया जाता है |

इस नक्षत्र का अधिपति भगवान विष्णु को माना जाता है | इस प्रकार भगबान विष्णु से सम्बन्धित विशेषताओं का भी द्योतक ये नक्षत्र हो जाता है, जैसे – चतुराई, संयम, कुशल प्रबन्धक तथा समय के अनुसार उचित निर्णय लेने की क्षमता आदि | कुछ लोग सरस्वती को इस नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी मानते हैं | इस प्रकार सरस्वती की विशेषताओं, जैसे – ज्ञान प्रदान करना तथा ज्ञानार्जन करना, संगीत में रूचि, कुशल वक्तव्यता आदि का भान भी इस नक्षत्र से होता है | इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक वाक्चातुर्य के माध्यम से सफलता प्राप्त कर सकते हैं |

मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार की कथा से तो सभी परिचित हैं – श्रवण कुमार अपने दिव्यचक्षु माता पिता को काँवर में बैठाकर यात्रा कराने के लिए जा रहे थे | मार्ग में माता पिता को प्यास रखी और वे काँवर को एक ओर रखकर पास के सरोवर से जल लेने के लिए चले गए | महाराज दशरथ शिकार के लिए उसी स्थान पर आए हुए थे | श्रवण ने सरोवर में से जल लेने के लिए जैसे ही घड़ा उसमें डाला उसकी ध्वनि को किसी पशु की ध्वनि समझकर दशरथ ने तीर चला दिया जिसने श्रवण कुमार के हृदय को बींध दिया | चीत्कार सुनकर दशरथ दौड़े हुए गए तो बहुत अपनी करनी पर बहुत पछताए, पर होनी तो हो चुकी थी | कहा जाता है कि श्रवण कुमार के दृष्टिहीन माता पिता के श्राप के ही कारण राम जब वन में थे उस समय दशरथ ने पुत्र राम के विरह में तड़प तड़प कर प्राण त्याग दिए | इस प्रकार सदाचार, सभ्यता, विनम्रता, कर्तव्यपरायणता तथा मातृ पितृ भक्ति आदि विशेषताएँ भी इस नक्षत्र से स्पष्ट होती हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/11/15/constellation-nakshatras-26/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

दोनों आषाढ़

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं दोनों आषाढ़ – पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ – नक्षत्रों के नाम और उनके अर्थ के विषय में |

ढाक के वृक्ष की लकड़ी से बने एक दण्ड को आषाढ़ कहा जाता है, सन्यासी लोग इसे अपने हाथ में रखते हैं | दोनों आषाढ़ में प्रत्येक में दो दो तारे होते हैं | आषाढ़ माह में ये दोनों नक्षत्र आते हैं, जो जून और जुलाई के मध्य पड़ता है | “शेते विष्णुः सदाषाढे कार्तिके प्रतिबोध्यते |” मान्यता है कि आषाढ़ माह में भगवान् विष्णु शयन करने के लिए क्षीर सागर में प्रस्थान कर जाते हैं और फिर कार्तिक माह में देवोत्थान एकादशी को नींद से जागते हैं | इसीलिए आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी देवशयिनी एकादशी कहलाती है | इस अवधि में विवाह आदि संकार प्रायः नहीं किये जाते | मलयाचल – जिस पर चन्दन के वृक्ष होते हैं तथा मंगल को इस नाम से पुकारते हैं | जल, नीर, वैश्वेदेव, भी इसके अन्य नाम हैं | आषाढ़ शब्द का शाब्दिक अर्थ है पहले आने वाला अपराजित अथवा पहले आने वाला अजेय तथा इसी के अनुसार बहुत से Astrologers इस नक्षत्र को अजेय तथा अपराजित रहने के साथ सम्बद्ध करते हैं | उनकी मान्यता है कि इन नक्षत्रों के प्रबल प्रभाव वाले जातक अपने जीवन में कभी हार नहीं मानते और सफलता प्राप्त हो जाने तक संघर्ष करते रहते हैं |

वैदिक ज्योतिष के अनुसार हाथ के पंखे को आषाढ़ नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है जो अपने विभिन्न उपयोगों के माध्यम से विभिन्न प्रकार की विशेषताएँ प्रदर्शित करता है | हाथ के पंखे का उपयोग प्राचीन काल में गर्मी से शान्ति प्राप्त करने यानी ठण्डी हवा प्राप्त करने के लिए किया जाता था | आज भी बहुत से गाँवों में गर्मी में हाथ के पंखे का उपयोग किया जाता है | इसी के आधार पर ऐसी मान्यता बनी कि इन नक्षत्रों के जातक भी कठिन से कठिन समय में भी शान्त रहते हैं तथा बिना किसी उत्तेजना अथवा आवेग का प्रदर्शन किये समय तथा परिस्थितियों के अपने पक्ष में होने की प्रतीक्षा करने में सक्षम होते हैं | जिस प्रकार हाथ के पंखे को चलाने के लिए लगातार परिश्रम की आवश्यकता होती है उसी प्रकार ये जातक भी किसी कार्य को करने के लिए कठिन से कठिन परिश्रम करने की सामर्थ्य रखते हैं | पंखे का उपयोग मुँह छिपाने का लिए भी किया जाता है, इस प्रकार ऐसी भी मान्यता है कि जातक किसी भी रहस्य की सफलतापूर्वक छिपा सकते हैं | प्राचीन काल में एक प्रकार के हाथ के पंखे का प्रयोग अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए तथा उसे तेज करने के लिए भी किया जाता था | इसी प्रकार इस नक्षत्र के जातकों में भी इतनी अधिक ऊर्जा होती है कि वे बिना थके और धैर्य गँवाए बहुत समय तक कार्य कर सकते हैं | इनकी यही सामर्थ्य इन्हें लक्ष्य प्राप्ति में सहायता करती है | साथ ही अग्नि को हवा देना आक्रामकता का प्रतीक भी माना जाता है |

कुछ प्राचीन सभ्यताओं में सौन्दर्य तथा साज सज्जा के प्रदर्शन के लिए भी पंखे का उपयोग किया जाता था | इस प्रकार इन नक्षत्रों को सौन्दर्य के प्रदर्शन तथा भौतिक जीवन जीने की कला के लिए भी देखा जाता है |

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