नक्षत्र – एक विश्लेषण

दोनों आषाढ़

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं दोनों आषाढ़ – पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ – नक्षत्रों के नाम और उनके अर्थ के विषय में |

ढाक के वृक्ष की लकड़ी से बने एक दण्ड को आषाढ़ कहा जाता है, सन्यासी लोग इसे अपने हाथ में रखते हैं | दोनों आषाढ़ में प्रत्येक में दो दो तारे होते हैं | आषाढ़ माह में ये दोनों नक्षत्र आते हैं, जो जून और जुलाई के मध्य पड़ता है | “शेते विष्णुः सदाषाढे कार्तिके प्रतिबोध्यते |” मान्यता है कि आषाढ़ माह में भगवान् विष्णु शयन करने के लिए क्षीर सागर में प्रस्थान कर जाते हैं और फिर कार्तिक माह में देवोत्थान एकादशी को नींद से जागते हैं | इसीलिए आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी देवशयिनी एकादशी कहलाती है | इस अवधि में विवाह आदि संकार प्रायः नहीं किये जाते | मलयाचल – जिस पर चन्दन के वृक्ष होते हैं तथा मंगल को इस नाम से पुकारते हैं | जल, नीर, वैश्वेदेव, भी इसके अन्य नाम हैं | आषाढ़ शब्द का शाब्दिक अर्थ है पहले आने वाला अपराजित अथवा पहले आने वाला अजेय तथा इसी के अनुसार बहुत से Astrologers इस नक्षत्र को अजेय तथा अपराजित रहने के साथ सम्बद्ध करते हैं | उनकी मान्यता है कि इन नक्षत्रों के प्रबल प्रभाव वाले जातक अपने जीवन में कभी हार नहीं मानते और सफलता प्राप्त हो जाने तक संघर्ष करते रहते हैं |

वैदिक ज्योतिष के अनुसार हाथ के पंखे को आषाढ़ नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है जो अपने विभिन्न उपयोगों के माध्यम से विभिन्न प्रकार की विशेषताएँ प्रदर्शित करता है | हाथ के पंखे का उपयोग प्राचीन काल में गर्मी से शान्ति प्राप्त करने यानी ठण्डी हवा प्राप्त करने के लिए किया जाता था | आज भी बहुत से गाँवों में गर्मी में हाथ के पंखे का उपयोग किया जाता है | इसी के आधार पर ऐसी मान्यता बनी कि इन नक्षत्रों के जातक भी कठिन से कठिन समय में भी शान्त रहते हैं तथा बिना किसी उत्तेजना अथवा आवेग का प्रदर्शन किये समय तथा परिस्थितियों के अपने पक्ष में होने की प्रतीक्षा करने में सक्षम होते हैं | जिस प्रकार हाथ के पंखे को चलाने के लिए लगातार परिश्रम की आवश्यकता होती है उसी प्रकार ये जातक भी किसी कार्य को करने के लिए कठिन से कठिन परिश्रम करने की सामर्थ्य रखते हैं | पंखे का उपयोग मुँह छिपाने का लिए भी किया जाता है, इस प्रकार ऐसी भी मान्यता है कि जातक किसी भी रहस्य की सफलतापूर्वक छिपा सकते हैं | प्राचीन काल में एक प्रकार के हाथ के पंखे का प्रयोग अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए तथा उसे तेज करने के लिए भी किया जाता था | इसी प्रकार इस नक्षत्र के जातकों में भी इतनी अधिक ऊर्जा होती है कि वे बिना थके और धैर्य गँवाए बहुत समय तक कार्य कर सकते हैं | इनकी यही सामर्थ्य इन्हें लक्ष्य प्राप्ति में सहायता करती है | साथ ही अग्नि को हवा देना आक्रामकता का प्रतीक भी माना जाता है |

कुछ प्राचीन सभ्यताओं में सौन्दर्य तथा साज सज्जा के प्रदर्शन के लिए भी पंखे का उपयोग किया जाता था | इस प्रकार इन नक्षत्रों को सौन्दर्य के प्रदर्शन तथा भौतिक जीवन जीने की कला के लिए भी देखा जाता है |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

मूल

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं मूल नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में |

मूल का शाब्दिक अर्थ है जड़ अथवा किसी वस्तु का उद्गम स्थान या किसी व्यक्ति के वंश का उद्गम, आरम्भ, मुख्य स्रोत अथवा वास्तविक कारण | किन्हीं वस्तुओं को परस्पर जोड़ने वाले किनारों को भी मूल कहा जाता है | आधार को भी मूल कहा जाता है | किसी राज्य की राजधानी भी मूल कहलाती है | नाभि अथवा जननेन्द्रिय के ऊपर का रहस्यमय वृत्त भी मूल कहलाता है | इस नक्षत्र में ग्यारह तारे होते हैं | इसका अन्य नाम है निर्यति – बाहर निकलना, प्रस्थान करना | राक्षसों तथा दुष्टात्माओं के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | नन्द के एक मन्त्री का नाम भी यही था | रक्षक के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | अस्रप – रक्तपायी एक राक्षस का नाम भी मूल था | यह नक्षत्र भी ज्येष्ठ माह में मई और जून के मध्य आता है |

मूल का शाब्दिक अर्थ है केन्द्रीय बिन्दु, सबसे भीतरी बिन्दु अथवा किसी पेड़ पौधे की जड़ और इस के अनुसार मूल नक्षत्र को सीधा तथा स्पष्ट, विषय की जड़ तक पहुँचने की क्षमता रखना तथा ऐसी ही अन्य विशेषताओं के देखा जा सकता है | वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक साथ बंधी हुई कुछ पौधों की जड़ों को मूल नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा इस प्रतीक चिन्ह से भी विभिन्न Astrologer विभिन्न प्रकार के अर्थ निकालते हैं | जिनमें एक अर्थ यह भी निकाला जाता है कि मूल नक्षत्र के जातकों में समस्त परिवार तथा समाज को एक साथ बाँध रखने की सामर्थ्य होती है | कुछ विद्वानों की मान्यता है कि जिस प्रकार वृक्ष की जड़ अर्थात मूल भूगर्भा होती है अतः उसके विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार मूल नक्षत्र भी बहुत से रहस्यों, गुप्त विद्याओं तथा अदृश्य शक्तियों का प्रतीक होता है | साथ ही किसी भी रहस्य को गुप्त रखने में सक्षम होते हैं तथा रहस्य विद्याओं के ज्ञाता भी होते हैं | कुछ का मानना है कि जिस प्रकार वृक्ष का मूल वृक्ष को किसी भी परिस्थिति में दृढ़ खड़े रहने की सामर्थ्य प्रदान करता है कुछ उसी प्रकार का स्वभाव मूल नक्षत्र के जातकों का भी होता है |

कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि मूल नक्षत्र के जातकों की प्रवृत्ति होती है किसी भी विषय की जड़ तक पहुँचना इसलिए वे शोध कार्यों में निष्णात होते हैं | साथ ही सीधा स्पष्ट स्वभाव होने के कारण ये जातक स्पष्टवादी होते हैं – भले ही उनका कथन किसी को उचित न लगे | जैसे वृक्ष की जड़ को इस बात की कोई चिन्ता नहीं होती कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है उसी प्रकार ये जातक भी इस बात पर कोई ध्यान नहीं देते की उनके साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है | जिस प्रकार वृक्ष को काट देने के पश्चात भी वह अपनी जड़ों के माध्यम से अपने शरीर और शक्ति को पुन: प्राप्त कर लेने में सक्षम होता है उसी प्रकार मूल नक्षत्र के जातक भी भी अपनी खोई हुई शक्ति तथा आधिपत्य पुन: प्राप्त कर लेने की क्षमता रखते हैं |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

ज्येष्ठा

दीपावली के सारे पर्व सम्पन्न हो चुके | अब पुनः लौटते हैं अपनी नक्षत्र-वार्ता पर | ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा और अनुराधा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं ज्येष्ठा नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में |

ज्येष्ठ – जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है – बड़ा, किसी क़बीले का अथवा परिवार का मुखिया – सबसे बड़ा सदस्य | गंगा नदी के लिए भी ज्येष्ठा शब्द का प्रयोग किया जाता है | छिपकली को भी ज्येष्ठा कहा जाता है | यह नक्षत्र ज्येष्ठ माह में आता है मई और जून के मध्य पड़ता है | इस नक्षत्र में तीन तारे होते हैं | मध्यमा अँगुली को भी ज्येष्ठा कहा जाता है | देवी लक्ष्मी की बड़ी बहिन भी ज्येष्ठा कहलाती है | पौराणिक सन्दर्भों में दुर्भाग्य की कारक देवी भी ज्येष्ठा कहलाती है | इन्द्र के जितने भी नाम हैं जैसे शक्र, पुरन्दर आदि वे सब नाम भी इस नक्षत्र के लिए प्रयुक्त होते हैं | ज्येष्ठा के आगमन के साथ ही नौ नक्षत्रों की मघा नक्षत्र से आरम्भ हुई श्रृंखला का अन्त हो जाता है | ज्येष्ठा का अर्थ है सबसे बड़ा तथा इसी इसी कारण से बड़ा, परिपक्व, सुनियोजित आदि अर्थों में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | बहुत से Astrologers की ऐसी भी मान्यता है कि जातक पर यदि ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रबल प्रभाव हो तो वह समय से पूर्व ही मानसिक रूप से परिपक्व हो जाता है और शारीरिक रूप से भी अपनी अवस्था से बड़ा दिखाई देने लगता है | पारलौकिक तथा परा विज्ञान से सम्बन्धित ज्ञान के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है |

प्रभुतासम्पन्न व्यक्ति के लिए ज्येष्ठ शब्द का प्रयोग किया जाता है | छाते को भी ज्येष्ठा नक्षत्र का चिह्न माना जाता है | छाते का प्रयोग धूप वर्षा आदि से बचाव के लिए भी क्या जाता है तथा राजा महाराजा भी अपने प्रभुत्व के प्रदर्शन के लिए छत्र का प्रयोग करते थे | इस प्रकार ज्येष्ठा नक्षत्र को रक्षा, सुरक्षा, परिपक्वता, पारलौकिक तथा प्रभुता आदि के साथ भी जोड़ा जा सकता है | ज्येष्ठा नक्षत्र का अधिपति देवराज इन्द्र को माना जाता है – यह भी इस तथ्य का द्योतक है कि प्रभुत्व के अर्थ में इस नक्षत्र की और देखा जाता है |

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नक्षत्र एक विश्लेषण

अनुराधा नक्षत्र

नक्षत्रों की वार्ता को ही और आगे बढाते हैं | ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति और विशाखा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं अनुराधा नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में |

अनु अर्थात पीछे, राधा अर्थात पीछे आने वाला – जो पीछे आए वह अनुराधा | इसके अतिरिक्त विशाखा नक्षत्र का भी एक नाम राधा है और अनुराधा नक्षत्र विशाखा नक्षत्र के पीछे आता है – इस प्रकार राधा अर्थात विशाखा नक्षत्र का जो अनुसरण करे वह अनुराधा | राधा शब्द का प्रयोग सफलता, आनन्द, ऐश्वर्य तथा सौभाग्य आदि अर्थों में भी किया जाता है | इस प्रकार अनुराधा का प्रयोग भी इन्हीं अर्थो को और अधिक महत्त्वपूर्ण बना देता है – एक के पीछे एक प्राप्त होती रहने वाली सफलताएँ, अतुलित ऐश्वर्य, अपरिमित आनन्द तथा अखण्ड सौभाग्य इत्यादि अर्थों में अनुराधा शब्द का प्रयोग किया जाता है |

इस नक्षत्र में चार तारे होते हैं और यह नक्षत्र भी विशाखा की ही भाँति अनुराधा भी वैशाख माह में आता है जो अप्रेल और मई के मध्य पड़ता है | इस नक्षत्र का दूसरा नाम है मित्र | तपस्वियों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला दण्ड इस नक्षत्र का प्रतीक चिह्न है | यह दण्ड देखने में साधारण दण्ड के समान ही दिखाई देता है, किन्तु नहीं भूलना चाहिए कि इस दण्ड में उन तपस्वियों की जीवन भर की साधना-तपस्या का बल छिपा होता है – समस्त सिद्धियाँ जो उन्होंने तपस्या के माध्यम से प्राप्त की हैं वे सब इस दण्ड में विद्यमान होती | किन्तु एक सन्यासी अथवा साधक कभी भी इस दण्ड का प्रयोग अपनी स्वयं की इच्छापूर्ति अथवा स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं करता, अपितु लोकहित के लिए करता है | इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में जो व्यक्ति सफल रहा है, जो अतुलित ऐश्वर्यशाली है अथ्वाजो अपरिमित आनन्द से युक्त है वह व्यक्ति भी कभी स्वार्थी नहीं हो सकता – अपितु उसके सान्निध्य से जन साधारण का भी हित ही सम्भव है | इस प्रकार हैं | यह दण्ड प्रतीक है विवेक का, बुद्धि का, संरक्षण का तथा शक्ति के सदुपयोग का |

अनुराधा शब्द कमल पुष्प के लिए भी प्रयुक्त होता रहा है | कमल ज्ञान विज्ञान की देवी माँ सरस्वती का आसन होता है | इस प्रकार अनुराधा का एक भाव ज्ञान विज्ञान,, प्रकाश तथा धवलता का भी सूचक बन जाता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/25/constellation-nakshatras-22/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

विशाखा नक्षत्र

नक्षत्रों के विषय में बात आरम्भ की थी लेकिन बीच में कोई पर्व आदि आ जाने से वार्ता मध्य में छूट जाती है | अब पुनः नक्षत्रों की वार्ता को ही और आगे बढाते हैं | ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा और स्वाति नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं विशाखा नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में |

विशिष्टा शाखा प्रकारों यस्य इति विशाखा – एक ऐसा वृक्ष जिसकी अनेक प्रकार की अद्भुत शाखाएँ – Branches ­– हों | नक्षत्र मण्डल के इस सोलहवें नक्षत्र में दो तारे होते हैं | माना जाता है कि भगवान् शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म भी इसी नक्षत्र में हुआ था और इसीलिए कार्तिकेय को विशाख भी कहा जाता है | यह नक्षत्र वैशाख माह में आता है जो अप्रेल और मई के मध्य पड़ता है | इस नक्षत्र के अन्य नाम और भाव हैं – राधा, शक्राग्नि, इन्द्राग्नि इत्यादि | किसी को प्रसन्न करने के अर्थ में, अनुकूलता प्राप्त करने के अर्थ में, उप्बलाब्धि के लिए, किसी कार्य की तैयारी के लिए, किसी के कल्याण के लिए, दयालुता, सम्पन्नता, सन्तुष्टि आदि अर्थों में इस शब्द का प्रयोग होता है | इसके अतिरिक्त किसी वस्तु को नष्ट करने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है |

भारतीय वैदिक ज्योतिष ग्रन्थों के अनुसार जिन जातकों का जन्म विशाखा नक्षत्र में होता है उनके समक्ष सदा ही दो विकल्प खुले रहते हैं | एक विकल्प उचित होता है दूसरा अनुचित | उचित अनुचित का चयन उसकी स्वयं की बुद्धि पर निर्भर करता है | प्रायः विवाह आदि माँगलिक कार्यों के लिए सजाया जाने वाला तोरण (द्वार) इस नक्षत्र का प्रतीक माना जाता है | इसीलिए ऐसी भी मान्यता है कि जिस प्रकार मांगलिक कार्यों के इन तोरणों की सज्जा मांगलिक आयोजन करने वाले व्यक्ति की आर्थिक सामर्थ्य तथा उसकी कलाप्रियता का प्रदर्शन और अन्य अनेक प्रकार की उपलब्धियों के प्रदर्शन के लिए होती है उसी प्रकार इस नक्षत्र के जातक भी प्रदर्शन में विशवास रखते हैं | उन्हें यदि थोड़ी सी भी कोई उपलब्धि हो जाए तो वे अन्य जातकों की बड़ी से बड़ी उपलब्धियों की भी अपेक्षा बहुत बढ़ चढ़ कर उसका प्रदर्शन करते हैं | किन्तु यह प्रदर्शन उनकी प्रसन्नता का प्रदर्शन होता है, अपने अहं के प्रदर्शन के लिए वे ऐसा नहीं करते | इस प्रकार विशाखा शब्द का प्रयोग प्रसन्नता, उपलब्धि, सौन्दर्य तथा किसी भी नवीन आरम्भ के प्रदर्शन के अर्थ में भी किया जाता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/24/constellation-nakshatras-21/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

स्वाति नक्षत्र

नक्षत्रों की वार्ता को ही और आगे बढाते हैं | ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त और चित्रा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं स्वाति नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में |

यह नक्षत्र एक अत्यन्त ही शुभ नक्षत्र माना जाता है | नक्षत्र मण्डल में स्वाति नक्षत्र पन्द्रहवाँ नक्षत्र है | चित्रा नक्षत्र की ही भाँति इस नक्षत्र में भी स्वाति नाम का एक ही तारा होता है जिसके नाम पर इस नक्षत्र का नाम पड़ा है | सूर्य की पत्नी का नाम भी स्वाति है | तलवार के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है | लोकमान्यता है कि सीपी के मुख में जब स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूँदें पड़ती हैं तो वे मोती बन जाती हैं और यही मोती असली मोती होता है जो निश्चित रूप से बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होता है | कहने का अभिप्राय यह है कि असली मोती बनाया नहीं जा सकता अपितु स्वतः उत्पन्न होता है और अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही विकसित भी होता है | इसी प्रकार मूँगा भी स्वतः उत्पन्न वृक्ष से प्राप्त एक फल है – अर्थात इस वृक्ष की उत्पत्ति या प्रजनन स्वतः ही होता है तथा इसका विकास भी स्वतः ही होता है – न इसे किसी प्रकार बनाया जा सकता है न ही इसके विकास में किसी प्रकार की खाद पानी आदि से सहायता की जा सकती है | जिस आकार में भी और जितना अधिक एक मूँगे को अथवा मोती को बढ़ना होगा वह उतना ही बढ़ेगा | इस प्रकार स्वाति शब्द प्रजनन क्षमता तथा विकास और आत्म निर्भरता का भी द्योतक है |

चातक पक्षी के विषय में कहा जाता है कि वह वर्ष भर स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूँदों की प्रतीक्षा में धैर्यपूर्वक आकाश की ओर ताकता रहता है और स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूँदों का पान करके ही अपनी प्यास बुझाता है और सन्तुष्टि का अनुभव करता है | इस प्रकार स्वाति शब्द धैर्य और सन्तुष्टि का भी पर्याय बन जाता है | हमारे कवियों ने उपमान के रूप में इस कथा के बड़े ही सुन्दर प्रयोग किये हैं | स्वेनैव अतति या सा स्वाति – स्वभाव से भ्रमणशील, स्वतन्त्र अथवा स्वच्छन्द आचरण करने वाला | इस नक्षत्र के अन्य नाम तथा भाव हैं वायु | यह नक्षत्र भी चित्रा नक्षत्र की ही भाँति चैत्र माह में आता है जो मार्च और अप्रेल के मध्य पड़ता है |

संस्कृत ग्रन्थों में स्वाति शब्द को स्वतन्त्रता, कोमलता तथा तलवार आदि के लिए भी प्रयुक्त किया गया है | इन्हीं समस्त अर्थों से स्वाति नक्षत्र की विशेषताओं का भी कुछ भान हो जाता है | इसके अतिरिक्त हवा में झूलते हुए छोटे से पौधे को स्वाति नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है | छोटा सा पौधा बच्चों की भाँति मुलायम होता है – स्निग्ध होता है – और सम्भवतः इसीलिए स्वाति शब्द का प्रयोग कोमलता तथा स्निग्धता के पर्याय के रूप में भी किया जाता रहा है | साथ ही एक सत्य और इस नाम के साथ प्रतिध्वनित होता है – वह यह कि यदि वायु का वेग तेज़ हो तो इस नन्हे से पौधे को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए बहुत अधिक प्रयास करना पड़ता है | पवन के थपेड़े उसे इधर से उधर झुलाते रहते हैं किन्तु यह नन्हा सा पौधा अपनी पूरी शक्ति के साथ उस वायु वेग से संघर्ष करता है और अपना अस्तित्व बचाए रखने का प्रयास करता है | इस प्रकार स्वाति शब्द का प्रयोग संघर्ष तथा क्षमता के अर्थ में भी किया जाता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/27/constellation-nakshatras-20/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

चित्रा नक्षत्र

अब पुनः नक्षत्रों की वार्ता को ही आगे बढाते हैं | ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी और हस्त नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं चित्रा नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में | नक्षत्र मण्डल में चित्रा नक्षत्र चौदहवें क्रम पर आता है | वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा के अश्विनी नक्षत्र से रेवती नक्षत्र तक 27 नक्षत्रों की यात्रा काल में चित्रा नक्षत्र चौदहवाँ पड़ाव होता है | इस प्रकार नक्षत्र मण्डल में यह नक्षत्र चन्द्रमा की यात्रा का मध्य बिन्दु अथवा मध्य पड़ाव भी होता है – क्योंकि इसके पहले भी और इसके बाद में भी तेरह तेरह नक्षत्र होते हैं | तो आइये इसी नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में आज बात करते हैं…

चित्र से चित्रा शब्द बना है जिसका अर्थ होता है चित्र-विचित्र, चमकदार, स्पष्ट, स्वच्छ, आकर्षक, मनमोहक, मनोरम, विनोदी, सुहाना, किसी वस्तु पर पड़े हुए विविध प्रकार के धब्बे | और भी अर्थ हैं जैसे – चित्र की भाँति सुन्दर, अद्भुत, अतुलनीय, आकर्षक, आश्चर्यजनक इत्यादि | इन अर्थों को समझने के लिए एक विशेष तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है | वैदिक काल में जब नक्षत्रों का नामकरण किया गया था उस समय निश्चित रूप से चित्रकारों द्वारा बनाए गए चित्रों की ही प्रधानता थी | उस काल में जितने भी कुशल चित्रकार होते थे वे सम्भवतः उन लोगों के चित्र अधिक बनाया करते होंगे जो उन्हें बहुत सुन्दर अथवा आकर्षक लगा करते होंगे या समाज में – क़बीले में जिनका मान सम्मान होता होगा अथवा जो अपने स्थान पर किसी महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन होते होंगे – जिनका प्रभाव जन सामान्य पर पड़ता होगा | किसी भी कलाकार को अपने रचना कौशल के प्रदर्शन के लिए कोई न कोई तो प्रेरणा स्रोत चाहिए ही होता है | अस्तु, उन्हीं प्रभावशाली व्यक्तित्वों से से अन्य साधारण व्यक्तियों की ही भाँति चित्रकार भी प्रभावित होता होगा | या फिर किसी ऐसी वस्तु या परिस्थिति का चित्र बनाते होंगे जो स्वयं में अद्भत और आकर्षक होती होगी | और सम्भवतः इसी कारण से उस समय के उपलब्ध साहित्य में अत्यन्त सुन्दर व्यक्ति या वस्तु या परिस्थिति को भी चित्र – चित्र के समान अद्भुत – ही कहा जाने लगा | यही कारण था कि चित्रा शब्द सौन्दर्य, आश्चर्यजनक वस्तुओं तथा अद्भुत का पर्याय बन गया | और वैदिक ज्योतिषियों की ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति चित्रा नक्षत्र में जन्म लेगा उसमें ये समस्त गुण अवश्य ही विद्यमान होने चाहियें |

एक बड़े चमकीले पत्थर को भी चित्रा कहा जाता है | सम्भवतः ऐसा इसलिए भी क्योंकि इस नक्षत्र में चित्रा नाम का एक ही चमकीला तारा होता है और उसी के नाम पर इसका नाम भी चित्रा रखा गया है | अर्जुन की पत्नी तथा बभ्रुवाहन की माता का नाम भी चित्रा (चित्रांगदा) था | प्रायः देखा गया है कि इस नक्षत्र में जिन जातकों का जन्म होता है वे या तो आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न होते हैं, अथवा एक ही समय में बहुत से गुणों से युक्त तथा बहुत से विद्याओं और कलाओं में निपुण होते हैं | इन व्यक्तियों का व्यवहार भी बहुत उत्तम होता है | यह नक्षत्र चैत्र माह में आता है जो मार्च और अप्रेल के मध्य पड़ता है | इस नक्षत्र के अन्य नाम तथा भाव हैं त्वष्टा – रचनाधर्मिता – ब्रह्मा का एक नाम – चित्रा नक्षत्र के अधिपति तथा निर्माण एवं सृजन का देवता और देवों के प्रसिद्ध शिल्पकर्मी विश्वकर्मा जिन्होंने अनेकों लोकों और नगरों का निर्माण किया, तक्ष – घायल करना |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/25/constellation-nakshatras-19/