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नक्षत्र एक विश्लेषण

प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार जातक की चारित्रिक विशेषताएँ तथा उसका व्यक्तित्व

हम बात कर रहे हैं अश्विनी नक्षत्र के विषय में | इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है, बड़ी और चमकदार आँखें होती हैं और चौड़ा मस्तक होता है | स्वास्थ्य सामान्यतः अच्छा रहता है | साहित्य और अस्न्गीत में सी जातक की रूचि हो सकती है | शुद्ध हृदय इस जातक की वाणी मधुर होती है | यह जातक विद्वान्, स्थिर प्रकृति, अपने कार्यों में कुशल, विश्वसनीय तथा अपने परिवार में सम्मानित व्यक्ति होता है | आत्मसम्मान की भावना उसमें कूट कूट कर भरी होती है और जब दूसरे उसका सम्मान करते हैं तो उसे बहुत अच्छा लगता है | आर्थिक रूप से सम्भव हो मध्यम स्तर का हो, किन्तु दयालु तथा दानादि करने वाला होता है और धार्मिक प्रकृति का होता है | छोटी से छोटी बातों को बारीकी से देखना इसका स्वभाव होता है और दूसरों की छोटी से छोटी भूल की ओर इशारा करने में इसे संकोच नहीं होता | यह जातक आज्ञाकारी, सत्यवादी, अपने अधीनस्थ लोगों की तथा परिवार के लोगों की देखभाल करने वाला, अच्छे स्वभाव का, कार्य को समय पर पूर्ण करने वाला तथा वेद शास्त्रों का ज्ञाता भी हो सकता है |

यदि जातक की कुण्डली में यह नक्षत्र अशुभ प्रभाव में होगा तो जातक अहंकारी हो सकता है तथा अकारण ही घूमते रहने में इसकी रूचि हो सकती है | अशुभ प्रभाव में होने पर जातक दूसरों को धोखा भी दे सकता है तथा आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित भी रह सकता है | विवाहित व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध बनाना ऐसे जातक अक स्वभाव हो सकता है | गठिया बुखार, शरीर में दर्द अथवा स्मृतिहीनता जैसी समस्या से ग्रस्त हो सकता है |

इस नक्षत्र का प्रथम चरण “तस्करांश” कहलाता है, दूसरा चरण “भोग्यांश”, कहलाता है, तीसरा चरण “विलक्षणान्श” और चतुर्थ चरण “धर्मांश” कहलाता है | प्रथम तीन चरणों में उत्पन्न जातक प्रायः अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से होते हैं और साहसी, धनी, उत्तम भोजन करने वाले, पढ़े लिखे होते हैं किन्तु अकारण ही बेचैन रहते हैं और Restless होते हैं तथा सदा लड़ने को तत्पर रहते हैं | जीवन में समस्त सुखों का उपभोग करते हैं | Highly sexy हो सकते हैं और दूसरों के जीवन साथी के साथ इनके सम्बन्ध हो सकते हैं | चतुर्थ पाद में जन्म लेने वाले जातक प्रायः ईश्वरभक्त होते हैं और धनी तथा दयालु होते हैं |

अधोमुखी यह नक्षत्र तमोगुण प्रधान नक्षत्र है तथा नक्षत्र पुरुष की दाहिनी जँघा में इसका निवास माना गया है | वैदिक पञ्चांग के अनुसार यह नक्षत्र अश्विनी माह का प्रमुख नक्षत्र है – जो सितम्बर-अक्टूबर के मध्य आता है | मेष राशि में 13 डिग्री बीस मिनट तक इसका विस्तार होता है | इस नक्षत्र से सम्बन्धित वस्तुएँ हैं अश्व, उत्तम वस्त्राभूषण, वाहन तथा लोहे और स्टील से निर्मित अन्य वस्तुएँ |

औषधि ग्रहण करने के लिए तथा स्वास्थ्य में सुधार सम्बन्धी कार्य आरम्भ करने के लिए यह नक्षत्र अत्यन्त अनुकूल माना जाता है | इसके अतिरिक्त यात्रा आरम्भ करने के लिए, कृषिकर्म आरम्भ करने के लिए, बच्चे को प्रथम बार विद्यालय भेजने के लिए, गृहनिर्माण आरम्भ करने और गृहप्रवेश के लिए तथा अन्य भी सभी प्रकार के शुभ कार्यों का आरम्भ करने के लिए यह नक्षत्र शुभ माना जाता है | हाथी और घोड़ों की ख़रीद फ़रोख्त के लिए तथा नए वाहन में प्रथम बार यात्रा करने के लिए और नवीन वस्त्राभूषण धारण करने के लिए भी यह नक्षत्र अनुकूल माना गया है | किन्तु विवाह से सम्बन्धित कार्यों के लिए यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता |

यदि यह नक्षत्र अशुभ प्रभाव में हो तो उस अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए घोड़ों के सहित रथ दान करने का अथवा पितृ कर्म करने का सुझाव दिया जाता है | इस युग में रथ घोड़े आदि दान करना सम्भव नहीं अतः ज्योतिषी घोड़े सहित रथ की मूर्ति दान करने का सुझाव देते हैं |

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नक्षत्र एक विश्लेषण

प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार जातक की चारित्रिक विशेषताएँ तथा उसका व्यक्तित्व

पिछले अध्यायों में हम प्रत्येक नक्षत्र के नाम की व्युत्पत्ति और उसके अर्थ, नक्षत्रों के आधार वैदिक महीनों के विभाजन, नक्षत्रों के देवता, अधिपति ग्रह आदि विषयों पर चर्चा करने के साथ ही इस विषय पर भी प्रकाश डाल चुके हैं कि किस राशि में किस नक्षत्र का कितने अंशों तक प्रसार होता है | साथ ही नक्षत्रों के गुण (सत्व, रज, तमस), उनके लिंग, जाति अथवा वर्ण, नाड़ी, योनी, गण, वश्य तथा प्रत्येक नक्षत्र के तत्वों पर भी संक्षेप में चर्चा कर चुके हैं | अब इस अध्याय से इन्हीं समस्त विषयों पर विस्तार से बात करने का प्रयास करेंगे |

इस अध्याय से हमारा प्रयास होगा यह बताने का कि इन समस्त नक्षत्रों के देवताओं, अधिपति ग्रहों, गुणों, लिंग, नाड़ी, योनी, गण, वश्य, जाति तथा तत्वों आदि को यदि ध्यान में रखकर किसी कुण्डली का निरीक्षण परीक्षण किया जाए तो जातक विशेष की Personality और उसका गुण स्वभाव किस प्रकार का हो सकता है | क्योंकि जैसा कि सदा लिखते आए हैं कि किसी एक ही आधार पर किसी जातक के गुण स्वभाव तथा व्यक्तित्व का ज्ञान करना अर्थ का अनर्थ भी कर सकता है | इस प्रक्रिया में कुण्डली का समग्र अध्ययन करने की आवश्यकता होती है | साथ ही प्रत्येक नक्षत्र से सम्बन्धित पदार्थों और वस्तुओं के विषय में बात करेंगे | नक्षत्रों के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए Remedies पर चर्चा करेंगे कि किस नक्षत्र के लिए क्या उपाय किया जाना चाहिए | तो आज सबसे पहले प्रथम नक्षत्र अश्विनी को लेते हैं:

अश्विनी :

सदैव सेवाभ्युदितो विनीतः सत्यान्वितः प्राप्तसमस्तसम्पत् |

योषाविभूषात्मजभूरितोष: स्यादश्विनी जन्मनि मानवस्य ||

अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न जातक देखने में आकर्षक, भाग्यशाली, चतुर, आभूषणप्रिय, Opposite Sex के लोगों द्वारा प्रेम किया जाने वाला, बहादुर, बुद्धिमान तथा दृढ़ इच्छाशक्ति से युक्त होता है | वैज्ञानिक अथवा डॉक्टर हो सकता है | अपने Subordinates तथा सहकर्मियों के द्वारा सम्मान का पात्र हो सकता है तथा सरकारी तन्त्रों से उसे लाभ प्राप्त हो सकता है |

राशिचक्र के इस प्रथम नक्षत्र का अर्थ है अश्वारोही यानी घुड़सवार | पौराणिक कथाओं में अश्विनी का विवरण एक अप्सरा के रूप में उपलब्ध होता है | उसे विश्वकर्मा की पुत्री तथा सूर्य की पत्नी के रूप में जाना जाता है | ऐसे विवरण उपलब्ध होते हैं कि जब अश्विनी अपने पति का तेज सहन नहीं कर सकी तो उसने छाया (शनि की माता) को अपने पति की सेवा के लिए नियुक्त किया और अपनी पहचान छिपाने के लिए वन में जाकर अश्वि – घोड़ी – का रूप बनाकर रहने लगी | अश्विनी का दूसरा नाम संज्ञा भी है | जब छाया ने सूर्य को सारी बातें बताईं तो तो वे भी वन में चले गए और अश्व के रूप में अपनी पत्नी के साथ रहना आरम्भ कर दिया | यही अप्सरा अश्विनी दोनों अश्विनी कुमारों की माता मानी जाती है | ऐसी भी मान्यताएँ हैं कि सूर्य का वीर्य इतना बलशाली था कि माँ अश्विनी उसे अपने गर्भ में धारण नहीं कर सकीं और उन्होंने उसे अपने दोनों नासारन्ध्रों में धारण कर लिया (पौराणिक कथाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए) | जुडवाँ अश्विनी कुमार देवों के चिकित्सक माने जाते हैं |

इस नक्षत्र के अन्य नाम तथा अर्थ हैं नासत्य – जो सत्य न हो, दस्त्रा – असभ्य, आक्रामक, विनाशकारी, गधा, दो की संख्या, चोर, शीत ऋतु, अश्वियुक् – घुड़सवार, तुरग – वाजि – अश्व – हय आदि अश्व के पर्यायवाची |

इस नक्षत्र का प्रतीक है घोड़े का सर – क्योंकि इस नक्षत्र में तीन तारे अश्व के सर की आकृति बनाते हुए होते हैं | दोनों अश्विनी कुमार इस नक्षत्र के देवता हैं जिनकी प्रसिद्धि एक सैनिक, अश्वारोही तथा चिकित्सक के रूप में है | इस नक्षत्र का स्वामी है केतु तथा अधिपति ग्रह है मंगल | लघु संज्ञा वाला यह नक्षत्र वैश्य वर्ग, देव गण, आदि नाड़ी, अश्व योनि तथा चतुष्पद वश्य के अन्तर्गत आता है | पुरुष प्रकृति का यह नक्षत्र वायु तत्व प्रधान है तथा इसका वर्ण यानी रंग रक्त के समान लाल माना जाता है |

इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक अश्वारोही हो सकता है, अश्वों की देखभाल करने वाला हो सकता है, अश्वों की चोरी करने वाला हो सकता है अथवा अश्वों से सम्बन्धित व्यवसाय से उसे अर्थलाभ हो सकता है | वह एक सैनिक भी हो सकता है अथवा रोगों के निदान की अद्भुत सामर्थ्य से युक्त एक अच्छा चिकित्सक भी हो सकता है | वह सेना का कोई अधिकारी भी हो सकता है और कोई सेवक भी हो सकता है | कारागार में किसी पद पर उसकी नियुक्ति हो सकती है अथवा कोर्ट या पुलिस विभाग में कार्यरत हो सकता है | प्रायः ऐसा देखा गया है कि जिस जातक के ग्रह इस नक्षत्र में अनुकूल स्थिति में स्थित होते हैं वह एक सफल चिकित्सक होता है |

इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक ट्रांसपोर्ट अथवा Travel Agencies से सम्बन्धित किसी विभाग में भी कार्यरत हो सकता है | किसी आधिकारिक पद पर आसीन हो सकता है | कन्या और कुम्भ लग्नों के लिए इन राशियों से तीसरे भाव का स्वामी तथा भाई बहनों (Siblings) का कारक मंगल यदि इस नक्षत्र में विद्यमान हो तो जातक के जुड़वाँ भाई बहन हो सकते हैं | यदि पितृकारक या सूर्य अथवा गुरु अथवा नवमेश या दशमेश इस नक्षत्र में विद्यमान हो तो जातक के पिता के Twin Siblings हो सकते हैं |

शेष आगे…

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नक्षत्र एक विश्लेषण

27 नक्षत्रों की नक्षत्र पुरुष के शरीर से उत्पत्ति और निवास

तथा उनके रंग, गुण, वर्ण और लिंग

भारतीय वैदिक ज्योतिषी विष्णु पुराण की उस मान्यता का अनुमोदन करते हैं जिसके अनुसार नक्षत्रों की उत्पत्ति नक्षत्र पुरुष अर्थात काल पुरुष से हुई है | नक्षत्र पुरुष को स्वयं भगवान् विष्णु का अवतार माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि क्योंकि सभी 27 नक्षत्र भगवान विष्णु के शरीर के किसी न किसी अंग से उत्पन्न हुए हैं इसलिए भगवान विष्णु ने नक्षत्रों को स्वयं ही अपने शरीर में निवास करने की आज्ञा भी दे दी थी | साथ ही प्रत्येक नक्षत्र का एक विशेष रंग होता है, एक विशेष गुण होता है, प्रत्येक नक्षत्र की एक जाति अथवा वर्ण होता है तथा प्रत्येक नक्षत्र पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक लिंगों में से किसी एक लिंग का भी होता है | जो निम्नवत है:

अश्विनी : इस नक्षत्र का रंग रक्त के समान लाल होता है | इसका निवास नक्षत्र पुरुष की सीधी जाँघ में होता है | गुण इसका तमस है | पुरुष प्रकृति का यह नक्षत्र वैश्य वर्ग के अन्तर्गत आता है |

भरणी : इसका रंग भी रक्त के समान लाल माना गया है तथा इसका निवास नक्षत्र पुरुष के सर में माना गया है | रजस गुणसम्पन्न यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का चाण्डाल वर्ग का नक्षत्र माना जाता है |

कृत्तिका : श्वेत वर्ण के इस नक्षत्र का भी गुण रजस ही होता है तथा इसका निवास नक्षत्र पुरुष की पीठ में माना गया है | ब्राह्मण वर्ग का यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का माना जाता है |

रोहिणी : इस नक्षत्र का निवास बायीं जँघा में माना गया है | वर्ण इसका भी श्वेत ही होता है | रजस गुण वाला यह नक्षत्र वैश्य वर्ग के अन्तर्गत माना जाता है तथा इसे स्त्री प्रकृति का माना जाता है |

मृगशिर : इसका निवास नक्षत्र पुरुष के नेत्रों में मन गया है तथा इसका रंग धुँधला सफ़ेद यानी Gray माना जाता है | तमस गुण वाला यह नक्षत्र नपुंसक प्रकृति का सेवक वर्ग के अन्तर्गत आता है |

आर्द्रा : इस नक्षत्र का निवास नक्षत्र पुरुष के बालों में माना जाता है | हरितवर्णी यह नक्षत्र भी तामस गुण का होता है तथा स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग के अन्तर्गत आता है |

पुनर्वसु : इसका निवास काल पुरुष की अँगुलियों में माना जाता है तथा इसका रंग सीसे यानी Lead के जैसा माना जाता है | सात्विक गुणसम्पन्न यह नक्षत्र वैश्य वर्ग का पुरुष प्रकृति का नक्षत्र माना जाता है |

पुष्य : इस नक्षत्र का निवास नक्षत्र पुरुष के मुख में माना जाता है | श्याम वर्ण का यह नक्षत्र तमस गुण से युक्त पुरुष प्रकृति का तथा क्षत्रिय वर्ग के अन्तर्गत आता है |

आश्लेषा : नक्षत्र पुरुष के नाखूनों में निवास करने वाले इस नक्षत्र का भी श्यामवर्ण ही माना जाता है | सात्विक गुणसम्पन्न स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग के अन्तर्गत आता है |

मघा : नक्षत्र पुरुष की नासिका में इसका निवास माना जाता है तथा इसका रंग दूधिया माना जाता है | तमस वृत्ति का यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का माना जाता है तथा यह वैश्य वर्ण के अन्तर्गत आता है |

पूर्वा फाल्गुनी : इसका निवास नक्षत्र पुरुष के निम्नांगों यानी Anus में माना जाता है | हल्के भूरे रंग का यह नक्षत्र रजस गुण से युक्त स्त्री प्रकृति का माना जाता है तथा ब्राह्मण वर्ग में आता है |

उत्तर फाल्गुनी : इसका निवास भी नक्षत्र पुरुष के निम्नांगों में ही माना जाता है | गहरा भूरा इसका रंग माना जाता है | रजस गुण वाला यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का क्षत्रिय वर्ग का नक्षत्र माना जाता है |

हस्त : नाम के अनुरूप ही इसका वास नक्षत्र पुरुष के दोनों हाथों में माना जाता है | हरितवर्णी यह नक्षत्र रजस गुण से युक्त पुरुष प्रकृति का वैश्य नक्षत्र माना जाता है |

चित्रा : नक्षत्र पुरुष के मस्तक में इसका वास माना जाता है | चमकीला नीला रंग इसका माना जाता है | तमस गुण वाला यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का होता है तथा सेवक वर्ग के अन्तर्गत माना जाता है |

स्वाति : इसका वास नक्षत्र पुरुष के दाँतों में माना जाता है तथा यह तमोगुण प्रधान चमकीले नीले रंग का नक्षत्र होता है | स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग में आता है |

विशाखा : सुनहरे वर्ण वाले इस नक्षत्र का वास नक्षत्र पुरुष की दोनों भुजाओं में होता है | सात्विक गुणसम्पन्न स्त्री प्रकृति यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग में आता है |

अनुराधा : नक्षत्र पुरुष के वक्ष में निवास करने वाले तमोगुणी इस नक्षत्र का लाली लिए हुए भूरा रंग होता है | पुरुष प्रकृति यह नक्षत्र वैश्य वर्ग में आता है |

ज्येष्ठा : दूधिया रंग वाले इस नक्षत्र का वास नक्षत्र पुरुष की गर्दन में माना गया है | सात्विक गुणसम्पन्न यह नक्षत्र स्त्री ओरकृति का माना जाता है तथा सेवक वर्ग के अन्तर्गत आता है |

मूल : भूरे-पीले रंग का यह नक्षत्र काल पुरुष के पैरों में निवास करता है | तमोगुणयुक्त यह नक्षत्र नपुंसक वृत्ति का माना जाता है तथा चाण्डाल वर्ग में आता है |

पूर्वाषाढ़ :काले रंग के इस नक्षत्र का निवास स्थान नक्षत्र पुरुष के उरुभाग को माना गया है | रजस गुण युक्त तथा स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र ब्राहमण वर्ग में आता है |

उत्तराषाढ़ : इसक अवर्ण भी काला होता है तथा इसका भी निवास स्थान नक्षत्र पुरुष के उरुभाग में माना जाता है | रजोगुण युक्त स्त्री प्रकृति यह नक्षत्र क्षत्रिय वर्ग में माना जाता है |

श्रवण : हलके नीले रंग के इस नक्षत्र का वास नाम के अनुरूप ही नक्षत्र पुरुष के दोनों कानों में माना गया है | रजोगुण प्रधान यह नक्षत्र पुरुष प्रकृति का है तथा चाण्डाल वर्ग में आता है |

धनिष्ठा : स्लेटी रंग के इस बक्षात्र का निवास स्थान काल पुरुष की कमर को माना जाता है | तमोगुण युक्त यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का है तथा सेवक वर्ग में आता है |

शतभिषज : नीर जैसा यह नक्षत्र नकला पुरुष के होठों में निवास करता है | यह तमोगुण से युक्त माना जाता है | नपुंसक वृत्ति का यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग में आता है |

पूर्वा भाद्रपद : इस नक्षत्र का वर्ण है स्लेटी तथा यह नक्षत्र पुरुष के वक्षस्थल में निवास करता है | सात्विकगुणसम्पन्न यह नक्षत्र पुरुष प्रकृति का ब्राह्मण वर्ग का नक्षत्र माना जाता है |

उत्तर भाद्रपद : इसका वर्ण बैंगनी माना गया है तथा इसका निवास स्थान कल पुरुष का वक्षस्थल माना जाता है | तमोगुण युक्त यह नक्षत्र पुरुष प्रकृति का क्षत्रिय वर्ग का नक्षत्र माना जाता है |

रेवती : इस नक्षत्र का रंग होता है भूरा तथा यह नक्षत्र पुरुष की कोख में निवास करता है | सात्विक गुण सम्पन्न स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र वैश्य वर्ग में आता है |

अन्त में पुनः यही कहेंगे कि किसी जातक के गुण स्वभाव आदि का ज्योतिषीय आधार पर निर्णय करते समय केवल इन्हीं तथ्यों के आधार पर निर्णय करेंगे तो अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है | इसके लिए आवश्यकता है किसी योग्य और अनुभवी Astrologer द्वारा जन्म कुण्डली का गहन अध्ययन कराया जाए |

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नक्षत्र एक विश्लेषण

नक्षत्रों के गुण

हमने अपने पिछले अध्यायों में नक्षत्रों की नाड़ी, योनि, गण, वश्य और तत्वों के विषय में बात की | नक्षत्रों का विभाजन तीन गुणों – सत्व, रजस और तमस – के आधार पर भी किया जाता है | इन तीनों ही गुणों की आध्यात्मिक तथा दार्शनिक दृष्टि से चर्चा तो इतनी विषद हो जाती है कि जिसका कभी अन्त ही सम्भव नहीं | आज के अध्याय में हम इन गुणों के आधार पर नक्षत्रों के वर्गीकरण के विषय में बात करेंगे |

सभी जानते हैं कि समूची प्रकृति में सत्व, रजस और तमस ये तीनों ही गुण पाए जाते हैं | सृष्टि की रचना प्रक्रिया, सृष्टि का पालन पोषण संवर्धन तथा सृष्टि का संहार आदि जितनी भी प्रत्यक्ष क्रियाएँ हैं वे इन तीन गुणों के माध्यम से ही संचालित होती हैं – इसीलिए प्रकृति को त्रिगुणात्मिका कहा जाता है | जब समूची प्रकृति इन त्रिगुणों से मुक्त नहीं हो सकती तो फिर साधारण मानव की तो बात ही क्या है | ज्योतिष शास्त्र की मान्यता है कि क्योंकि प्रत्येक मनुष्य किसी नक्षत्र में जन्म लेता है तो उस नक्षत्र में जो भी गुण इन तीनों गुणों में से होगा उसका प्रभाव मनुष्य पर निश्चित रूप से पड़ेगा तथा उसी के अनुसार उसका गुण और स्वभाव भी विकसित होगा | यहाँ तक कि इन गुणों के ही कारण कई बार अशुभ नक्षत्रों के भी शुभ फल देखे जा सकते हैं और कई बार शुभ नक्षत्रों के भी अशुभ परिणाम दृष्टिगत होते हैं | वास्तव में ये त्रिगुण मनुष्य के स्वभाव अथवा चरित्र की तीन परतें यानी Layers हैं, समय समय पर कभी कोई गुण प्रधान हो जाता है तो कभी कोई, किन्तु मूल स्वभाव कभी नहीं बदलता |

सत्त्व गुण : सत – जिसका अर्थ होता है मूलभूत घटक – Essence – से सत्व शब्द बना है | यानी किसी व्यक्ति का जो स्वाभाविक चरित्र होता है वह सत्व गुण के अन्तर्गत आता है | सत्व अर्थात जिसकी सत्ता हो, जो विद्यमान हो, जिसका भाव हो अथवा जो सत्य हो | सत्य क्या होता है ? प्रत्यक्ष को सत्य की संज्ञा दी जाती है | इसके अतिरिक्त सम्पूर्णता, समग्रता, प्रकृति, मनुष्य के जन्मजात गुण – जो अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी, जीवन, आत्मा, इच्छा शक्ति, श्वास, जीवनी शक्ति, समानता, चेतना, मन, इन्द्रिय, धन सम्पत्ति, अच्छाई, वास्तविकता, निश्चितता, साहस और बल आदि अर्थों में सत्व शब्द का ग्रहण किया जाता है | देवताओं को सत्व गुणों से युक्त माना जाता है | नक्षत्रों में पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपद, आश्लेषा, ज्येष्ठा एवं रेवती ये छ: नक्षत्र सत्व गुण सम्पन्न नक्षत्र कहलाते हैं |

रजस गुण : रजस अर्थात राजाओं के समान – अर्थात मानवमात्र में जो राजाओं के सामान विशेषताएँ होती हैं वे रजस गुण के अन्तर्गत आती हैं | रज – जिसका शाब्दिक अर्थ होता है धूल – से रजस बना है | इस प्रकार किसी भी प्रकार का Powder भी रज ही कहलाता है | इत्र, Perfumes, सूर्य की किरण का एक कण, कोई भी छोटा सा कण यानी Small Particle, बादल, वर्षा, खेती के लिए जोती जा चुकी भूमि, इदासी, अन्धकार, Passion, अभिलाषा, उत्साह, मनोभाव, सभी भौतिक पदार्थों के वे मौलिक गुण अथवा अवयव जिनके कारण समस्त जगत के समस्त प्राणी क्रियाशील रहते हैं | सभी मनुष्यों में यह गुण विद्यमान होता है | लक्ष्य प्राप्ति के लिए इस गुण का होना अत्यन्त आवश्यक है | समस्त प्रकृति में जगत की उत्पत्ति का मूल कारक रज – जिसे Menstrual Discharge कहा जाता है – का प्रतिनिधित्व भी यही गुण करता है | इसके अभाव में संसार की उत्पत्ति ही सम्भव नहीं | कृत्तिका, उत्तर फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, रोहिणी, हस्त, श्रवण, भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ ये नौ नक्षत्र रजस गुण के अन्तर्गत आते है |

तमस : तमस अर्थात अन्धकार | इसका सबसे बड़ा प्रतीक है कायिक, वाचिक अथवा मानसिक किसी भी प्रकार की क्रूरता | मानसिक अन्धकार यानी अज्ञानता क एलिए इस शब्द का प्रयोग प्रायः किया जाता है | इसके अतिरिक्त किसी को धोखा देना, किसी प्रकार का भ्रम की स्थिति होना, दुःख और कष्ट, किसी प्रकार की व्याधि अर्थात रोग, विचारों में स्पष्टता का अभाव, किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति, भय, क्रोध, किसी प्रकार का दुष्कर्म, घुटन अथवा Uneasiness का अनुभव होना आदि अर्थों में तमस शब्द का प्रयोग किया जाता है | इच्छाओं के आधीन होने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग करते हैं | लोकाचार में राक्षसों को तमस वृत्ति का माना जाता है | अश्विनी, मघा, मूल, आर्द्रा, स्वाति, शतभिषज, मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा, पुष्य, अनुराधा और उत्तर भाद्रपद नक्षत्र इस गुण का प्रतिनिधित्व करते हैं |

किसी व्यक्ति के गुण और स्वभाव के विषय में ज्योतिषीय दृष्टिकोण से केवल इन गुणों के ही आधार पर फलकथन उचित नहीं होगा | नक्षत्रों के अन्य अवयवों को भी समग्र रूप से ध्यान में रखकर कुछ कहा जाना चाहिए |

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सूर्य का मिथुन में गोचर

सूर्य का मिथुन में गोचर

आज सायं पाँच बजकर उन्तालीस मिनट के लगभग भगवान भास्कर अपने शत्रु गृह शुक्र की वृषभ राशि से निकल कर बुध की मिथुन राशि में प्रविष्ट हो जाएँगे, जहाँ उनके लिए विचित्र परिस्थिति बनी हुई है | एक ओर उनका मित्र ग्रह मंगल वहाँ गोचर कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर एक शत्रु ग्रह राहु का गोचर भी वहाँ चल रहा है | साथ ही शनि और केतु इन दो शत्रु ग्रहों की दृष्टियाँ भी मिथुन राशि पर हैं | मिथुन राशि सूर्य की अपनी राशि सिंह से एकादश और सूर्य की उच्च राशि मेष से तीसरे भाव में आती है | आत्मा का कारक सूर्य इस समय मृगशिर नक्षत्र पर हैं, तथा यहाँ से 22 जून को आर्द्रा, 6 जुलाई को पुनर्वसु नक्षत्रों पर भ्रमण करते हुए अन्त में 17 जुलाई को सूर्योदय से कुछ पूर्व 4:34 के लगभग कर्क राशि में प्रस्थान कर जाएँगे | सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश के समय गर करण और सिद्ध नक्षत्र होगा | पृथिवी तत्त्व युक्त मृगशिरा नक्षत्र का स्वामी मंगल सूर्य का मित्र ग्रह है तथा यह समानान्तर चलने वाला पित्त प्रकृति का धैर्यवान नक्षत्र है | आर्द्रा ऊर्ध्वमुखी तीक्ष्ण और वात प्रकृति का जल तत्त्व युक्त स्त्री नक्षत्र है तथा राहु इसका देवता है | पुनर्वसु सहनशील तथा रचनाधर्मिता युक्त समानान्तर चलने वाला वात प्रकृति का सात्विक चर पुरुष नक्षत्र है और इसका देवता है गुरु | इन्हीं समस्त तथ्यों के आधार पर जानने का प्रयास करते हैं कि मिथुन राशि में सूर्य के संक्रमण के जनसाधारण पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

किन्तु ध्यान रहे, ये परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु किसी योग्य Astrologer द्वारा उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन कराया जाना आवश्यक है |

मेष : आपका पंचमेश आपकी राशि से तीसरे भाव में प्रवेश करेगा | आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपके तथा आपके भाई बहनों के लिए कार्य में उन्नति के योग हैं | आर्थिक स्थिति में दृढ़ता के संकेत हैं | किसी घनिष्ठ मित्र अथवा भाई बहनों के सहयोग से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आप बहुत समय तक व्यस्त रहते हुए अर्थलाभ भी कर सकते हैं | किन्तु आलस्य का त्याग करके अधिक श्रम तथा प्रयास करने की आवश्यकता है | साथ ही भाई बहनों के साथ व्यर्थ के विवाद की सम्भावना को भी नकारा नहीं जा सकता | आपकी सन्तान की ओर से भी आपको शुभ समाचार प्राप्त हो सकते हैं |

वृषभ : आपकी राशि से चतुर्थेश का गोचर आपके द्वितीय भाव में हो रहा है | प्रॉपर्टी की खरीद फरोख्त में लाभ की आशा की जा सकती है | यदि आप अपने लिए नई प्रॉपर्टी खरीदना चाहते हैं तो आपका वह सपना भी पूर्ण हो सकता है | किन्तु सम्बन्धित Documents का भली भाँती निरीक्षण आवश्यक है | साथ ही आत्मविश्वास में वृद्धि के भी संकेत हैं | किन्तु माइग्रेन, ज्वर, पित्त आदि से सम्बन्धित समस्याएँ हो सकती हैं अतः गर्मी से बचने का प्रयास करें और अधिक मात्रा में पेय पदार्थों का सेवन करें |

मिथुन : आपकी राशि से तृतीयेश का गोचर आपकी लग्न में हो रहा है | भाई बहनों के साथ सम्बन्धों में प्रगाढ़ता के संकेत तो हैं किन्तु साथ ही किसी बात पर कोई विवाद भी उत्पन्न हो सकता है जिसके कारण आपको किसी प्रकार का मानसिक कष्ट भी हो सकता है | अतः किसी भी विवाद को बढ़ने न देने का प्रयास करना आपके हित में होगा | साथ ही यदि आपने अपने Temperament को नियन्त्रण में नहीं रखा तो वैवाहिक जीवन में भी तनाव उत्पन्न हो सकता है |

कर्क : आपके द्वितीयेश का गोचर आपके बारहवें भाव में हो रहा है | आपको कार्य के सिलसिले में विदेश यात्राएँ करनी पड़ सकती हैं | इन यात्राओं में एक ओर जहाँ अर्थलाभ की आशा की जा सकती है वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है – विशेष रूप से आँखों के इन्फेक्शन के प्रति सावधान रहें | खर्च में वृद्धि की भी सम्भावना है, अतः बजट बनाकर चलेंगे तो आपके लिए हित में रहेगा | पिता के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है |

सिंह : आपके राश्यधिपति का आपके लाभ स्थान में गोचर कर रहा है, वास्तव में आपके कार्य तथा आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छे संकेत प्रतीत होते हैं | नवीन प्रोजेक्ट्स आपको प्राप्त हो सकते हैं जो लम्बे समय तक आपको व्यस्त रखते हुए धनलाभ कराने में सक्षम होंगे | साथ ही नौकरी में प्रमोशन, मान सम्मान में वृद्धि तथा व्यवसाय में उन्नति के भी संकेत हैं | कोई नया कार्य भी आप इस अवधि में आरम्भ कर सकते हैं | परिवार, मित्रों, बड़े भाई, पिता तथा अधिकारियों का सहयोग भी प्राप्त रहेगा | आपकी सन्तान के लिए भी अनुकूल समय प्रतीत होता है |

कन्या : आपका द्वादशेश आपके कर्म स्थान में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से कार्य की दृष्टि से समय अत्यन्त उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है | यदि आपके कार्य का सम्बन्ध विदेशों से है तब तो आपके लिए विशेष रूप से उत्साहवर्द्धक समय प्रतीत होता है | साथ ही कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | विदेश में निवास कर रहे आपके मित्रों की ओर से आपको सहयोग प्राप्त हो सकता है | किन्तु अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता होगी |

तुला : आपका एकादशेश आपके भाग्य स्थान में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से भाग्योन्नति का समय प्रतीत होता है | सुख समृद्धि में वृद्धि के संकेत हैं | जिन जातकों का कार्य विदेश से किसी प्रकार सम्बद्ध है उनके लिए विशेष रूप से भाग्यवर्द्धक समय प्रतीत होता है | विदेश यात्राओं में वृद्धि के भी संकेत हैं | अतः अवसर का लाभ उठाने की आवश्यकता है | यदि स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई समस्या चल रही है तो उससे भी मुक्ति इस अवधि में सम्भव है |

वृश्चिक : आपकी राशि से दशमेश आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | आर्थिक दृष्टि से तो समय अनुकूल है किन्तु स्वास्थ्य की दृष्टि से समय उतना अनुकूल नहीं प्रतीत होता | गुप्त शत्रुओं के प्रति भी सावधान रहने की आवश्यकता है | स्वास्थ्य समस्याओं तथा विरोधियों के कारण आप अपने मनोबल में भी कमी का अनुभव कर सकते हैं |

धनु : आपका भाग्येश आपके सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | आपके तथा आपके जीवन साथी के लिए कार्य की दृष्टि से समय अनुकूल प्रतीत होता है | कार्य में उन्नति के संकेत हैं | जो लोग पॉलिटिक्स से जुड़े हैं उनके लिए भी समय उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है | किन्तु दाम्पत्य जीवन तथा प्रेम सम्बन्धों के लिए समय अनुकूल नहीं प्रतीत होता | आपके जीवन साथी अथवा प्रेमी / प्रेमिका के उग्र स्वभाव के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है | अपने व्यवहार को सन्तुलित रखने के लिए प्राणायाम और ध्यान का सहारा लीजिये |

मकर : आपका अष्टमेश छठे भाव में गोचर कर रहा है | एक ओर विदेश यात्राओं के योग हैं तो वहीं दूसरी ओर कार्य की दृष्टि से समय भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आप इस समय अपने प्रतियोगियों को परास्त करने में सक्षम हैं इसलिए अवसर का लाभ उठाकर अपने लक्ष्य के प्रति अग्रसर होना ही उचित रहेगा | स्वास्थ्य की दृष्टि से भी समय अनुकूल प्रतीत होता है | किसी पुरानी बीमारी के भी इस अवधि में ठीक हो जाने की सम्भावना है |

कुम्भ : आपका सप्तमेश आपकी राशि से पंचम भाव में गोचर कर रहा है | आपके लिए सूर्य का यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | व्यावसायिक रूप से आपके कार्य में तथा मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं | पॉलिटिक्स से सम्बद्ध लोगों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपकी सन्तान के लिए विशेष रूप से यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आपकी सन्तान उच्च शिक्षा के लिए विदेश भी जा सकती है और यदि नौकरी की तलाश में है तो वह भी पूर्ण हो सकती है | अविवाहित हैं तो इस अवधि में जीवन साथी की खोज भी पूर्ण हो सकती है |

मीन : षष्ठेश का चतुर्थ भाव में गोचर है | आप अथवा आपका जीवन साथी यदि नया वाहन अथवा घर खरीदना चाहते हैं तो अभी उस विचार को स्थगित करना ही उचित रहेगा | साथ ही परिवार में किसी प्रकार का मनमुटाव भी हो सकता है अतः सावधान रहने की आवश्यकता है | किन्तु नौकरी में पदोन्नति के संकेत हैं | पॉलिटिक्स में हैं तो आपको कोई पद भी प्राप्त हो सकता है | मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं | यदि किसी प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा है तो वह आपके पक्ष में आ सकता है | परिवार में किसी बच्चे का जन्म भी हो सकता है |

अन्त में जैसा सदा लिखते हैं, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के तत्व

विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय पारम्परिक रूप से अष्टकूट गुणों का मिलान करने की प्रक्रिया में नाड़ी, योनि और गणों के साथ ही नक्षत्रों के वश्य का मिलान भी किया जाता है | पाँच वश्यों के अतिरिक्त समस्त 27 नक्षत्र चार तत्वों में भी विभाजित होते हैं | जिनमें से पाँचों वश्य तथा वायु तत्व के विषय में अपने पिछले लेख में संक्षेप में लिखा था | आज शेष तत्वों के विषय में…

अग्नि तत्व : अग्नि अर्थात वह तत्व जिसमें दाहकता हो – जलाने की सामर्थ्य हो, तेज हो, ताप हो | अग्नि देव सब कुछ भस्म कर देने की सामर्थ्य रखने के साथ ही प्रकाश का कारण भी होते हैं | समस्त ब्रह्माण्ड उन्हीं के तेज से प्रकाशित होता है | साथ ही गतिशीलता में भी अग्नि तत्व से सहायता प्राप्त होती है | अग्नि शुद्धीकरण का कारक भी है – जो कुछ भी अशुद्ध है अथवा अशुभ है उसे जला डालता है और शेष रह जाता है केवल शुद्धता और शुभत्व का प्रकाश | यह प्रतिभा का भी संकेत करता है | भूख तथा पाचन क्रिया भी इसी तत्व के द्वारा नियन्त्रित होती है |

इन्द्र तत्व : इन्द्र शब्द प्रतिनिधित्व करता है बादलों का और मिट्टी कीचड़ आदि का | पञ्चमहाभूतों में से आकाश और पृथिवी दोनों इन्द्र तत्व के अन्तर्गत आते हैं | इन्द्र को देवताओं, मेघों और वर्षा का राजा भी कहा जाता है | सर्वश्रेष्ठ के लिए भी इन्द्र शब्द का प्रयोग होता है | इन्द्र को ईर्ष्यालु प्रवृत्ति का माना जाता है | इस प्रकार के पौराणिक आख्यान उपलब्ध होते हैं कि जब भी इन्द्र को पता चलता था कि कोई व्यक्ति अथवा ऋषि अपने मोक्ष के लिए तपस्या कर रहा है तो इन्द्र को भय सताने लगता था कि तपस्या के द्वारा उस व्यक्ति में और अधिक शक्तियाँ आ जाएँगी तो उसे स्वर्ग में प्रवेश मिल जाएगा और तब वह इन्द्र को परास्त करके उसके साम्राज्य पर अधिकार कर लेगा | इसीलिए प्रायः वह दूसरों की तपस्या भंग करने के प्रयास में व्यस्त रहता था | अपनी प्रजा के वह पूर्ण स्नेह तथा समर्पण के भाव से ध्यान रखता था | निर्धन तथा ज़रूरतमन्दों के लिए इन्द्र को पिटा, भाई तथा सहायक के रूप में देखा जाता है | स्वर्ग में इन्द्र का साम्राज्य है, अमरावती इसकी राजधानी है, इसके उद्यान का नाम नन्दन वन है, ऐरावत हाथी तथा उच्चैश्रवा अश्व इसके वाहन माने जाते हैं | इन्द्रधनुष इन्द्र का धनुष है तथा पर्जन्य (मेघ) इन्द्र की तलवार है |

वेदों तथा पौराणिक ग्रन्थों में इन्द्र से सम्बन्धित अनेक आख्यान उपलब्ध होते हैं | जिनमें प्रमुख हैं कि इन्द्र दो अश्वों के द्वारा खींचे जाने वाले चमकीले सुनहरे रथ पर सवार होते हैं, उनके सबस प्रिय अस्त्र आकाश में दमकने वाली बिजली तथा पाश – इन्द्रजाल हैं – जो युद्धों में विजय दिलाने तथा अन्धकार और सूखे के दानवों को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त होते हैं | इसीलिए इन्द्र को पर्यावरण का देवता भी माना जाता है | मरुद्गण अर्थात वायु इनके मुख्य सहायक हैं | इनका प्रिय भोजन है सोमरस | इन्हें कश्यप और अदिति का पुत्र भी कहा जाता है |

वरुण तत्व : वरुण को जल का देवता माना जाता है | यह बारह आदित्यों (कश्यप और अदिति के बारह पुत्र) में से एक माने जाते हैं तथा समुद्र तथा पश्चिम दिशा का स्वामी – प्रतीचीं वरुण: पति: (महाभारत) – माने जाते हैं और प्रायः मित्र – एक आदित्य –  के साथ ही रहते हैं | इनका अस्त्र पाश माना जाता है | समस्त ब्रह्माण्ड, समस्त देवों तथा मनुष्य का स्वामी भी इन्हें माना जाता है – त्वं विश्वेसां वरुणासि राजा, ये च देवा: ये च मर्ता: (ऋग्वेद 2/27/10)

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के वश्य और तत्व

विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय पारम्परिक रूप से अष्टकूट गुणों का मिलान करने की प्रक्रिया में नाड़ी, योनि और गणों के साथ ही नक्षत्रों के वश्य का मिलान भी किया जाता है |

नक्षत्रों के वश्य : प्रत्येक नक्षत्र किसी मनुष्य अथवा किसी अन्य जीव को Dominate करता है – अर्थात उस पर अपना प्रभाव रखता है – इसी को वश्य कहा जाता है | इन वश्यों के माध्यम से जातक की कुछ मित्रता अथवा वैर आदि चारित्रिक विशेषताओं का भी ज्ञान हो जाता है | एक वश्य की दूसरे वश्य के साथ मित्रता भी हो सकती है और परस्पर वैर भी हो सकता है | एक वश्य दूसरे वश्य का भोजन भी हो सकता है और भक्षक भी | Astrologers के अनुसार अपने वश्य से Strong वश्य के साथ किसी प्रकार की भी Partnership नहीं करनी चाहिए अन्यथा वह व्यक्ति सदा उस दुर्बल वश्य वाले व्यक्ति को दबाता रहेगा | किन्तु अपने इतने वर्षों के अनुभवों के कारण हमारी मान्यता है कि अपने से Strong व्यक्ति के साथ Partnership करके आवश्यक नहीं कि दोनों के मध्य शत्रुता का ही व्यवहार रहे, ऐसा भी तो सम्भव है कि उस व्यक्ति से जीवन में सहायता भी प्राप्त हो | इसीलिए कुण्डली मिलान करते समय अष्टकूट गुणों का मिलान करते समय सभी सूत्रों के आधार पर अत्यन्त सावधानीपूर्वक दोनों कुण्डलियों का एक साथ अध्ययन आवश्यक है – अन्यथा अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगेगी | वश्य पाँच होते हैं – मानव (अर्थ स्पष्ट है), चतुष्पद (चार पैरों वाला पशु), जलचर (जल के भीतर रहने वाला अथवा तैरने वाला जीव), वनचर (वनों में भ्रमण करने वाला व्यक्ति अथवा जीव) तथा कीट (कीड़ा) |

नक्षत्रों के तत्व : सभी 27 नक्षत्रों का चार तत्त्वों के आधार पर भी विभाजन किया जाता है | ये चार तत्व हैं – वायु (the air), अग्नि (the fire), इन्द्र (the cloud and the mud), और वरुण (the water) | इन तत्त्वों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव और प्रकृति के विषय में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त हो सकती है तथा उसकी बीमारी आदि के समय उसके उपचार में सहायता प्राप्त हो सकती है | जैसे यदि किसी व्यक्ति का जन्म वायु तत्व के नक्षत्र में हुआ है तो सम्भव है उसे वायु तत्व से समबन्धित कोई समस्या हो | और इस प्रकार उसके रोग के उपचार को अनुकूल दिशा प्राप्त हो सकती है | अतः इन तत्वों की प्रकृति का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है |

वायु तत्व – वायु अर्थात हवा | सभी पदार्थों में वायु एक प्रमुख तथा दु:साध्य तत्व है | यह अग्नि की लपटों को और अधिक भड़का सकती है | उड़ाने की सामर्थ्य इसमें होती है | यह भारहीन भी हो सकती है तथा भाररहित भी हो सकती है | वातावरण में अस्थिरता उत्पन्न करने वाले हर प्रकार के आँधी तूफ़ान चक्रवात आदि का कारण भी यह वायु ही होता है | इसका मुख्य अस्त्र है आँधी – Windstorm – पौराणिक आख्यानों के अनुसार जो दानवों को दण्ड देने के लिए प्रयुक्त होता है | यह तूफ़ान खड़े करता है तथा बड़े बड़े मज़बूत क़िलों को भी ढहाने में समर्थ होता है | यह फ़सलों को उपजाऊ बनाने वाली वर्षा पृथिवी पर बरसाने में इन्द्र की सहायता भी करता है | पाँच प्रकार की वायु मनुष्य की आन्तरिक शारीरिक व्यवस्था को सन्तुलित बनाए रखने में सहायता करता है | ये पाँच वायु हैं – पान, अपान, व्यान, उदान और समान |

इनमें से पान वायु जीवन का प्रमुख कारण है | इसे ही स्वास्थ्य विज्ञान की भाषा में Distilled Breathing कहा जाता है | यह शरीर की श्वास प्रणाली को भी सन्तुलित तथा नियन्त्रित करता है | शरीर के फेफड़ों में इसका निवास होता है |

अपान वायु शरीर में निचले भाग की ओर प्रवाहित होता है तथा शरीर के निचले गुदा मार्ग यानी Anus से बाहर निकलता है |

तीसरा वायु यानी व्यान वायु पूरे शरीर में फैला रहता है – व्यानः सर्वशरीरग:, और इस प्रकार मन मस्तिष्क, माँसपेशियों, जोड़ों इत्यादि शरीर के प्रत्येक अंग को प्रभावित कर सकता है |

वायु का चतुर्थ प्रकार है उदान वायु | जिसे ऊपर की ओर साँस लेने का कारण भी माना जाता है | यह कंठ से ऊपर की ओर उठकर सर की ओर प्रस्थान करता है |

अन्तिम तथा पञ्चम प्रकार वायु का है समान वायु | यह नाभि के भीतर निवास करता है तथा पाचन प्रक्रिया को स्वस्थ बनाए रखने के लिए यह वायु अत्यन्त आवश्यक भूमिका का निर्वाह करता है |

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