नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के तारकसमूह, देवता, स्वामी ग्रह, संज्ञा तथा विभिन्न राशियों में उनका प्रस्तार 

पिछले लेख में बात कर रहे थे कि 27 नक्षत्रों में प्रत्येक नक्षत्र में कितने तारे (Stars) होते हैं, प्रत्येक नक्षत्र के देवता (Deity) तथा स्वामी अथवा अधिपति ग्रह (Lordship) कौन हैं कौन हैं, प्रत्येक नक्षत्र को क्या संज्ञा दी गई है | नक्षत्रों की संज्ञा से उनकी प्रकृति का भी कुछ अनुमान हो जाता है | साथ ही यह भी बताने का प्रयास कर रहे थे कि विभिन्न राशियों में कितने अंशों तक किस नक्षत्र का प्रस्तार होता है | इस क्रम में अश्विनी नक्षत्र से लेकर आश्लेषा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज उससे आगे…

मघा : इस नक्षत्र में भी पाँच तारे होते हैं | इसका देवता भग को तथा स्वामी ग्रह सूर्य को माना जाता है | इसकी संज्ञा उग्र है और सिंह राशि के आरम्भ से लेकर 13°20’ अंशों तक इसका विस्तार होता है |

पूर्वा फाल्गुनी : इस नक्षत्र में दो तारे होते हैं | इसका देवता है अर्यमा तथा शुक्र इसका अधिपति ग्रह है | इसकी संज्ञा भी उग्र है और इसका प्रस्तार सिंह राशि में 13°20’ से लेकर 26°40’ अंशों तक होता है |

उत्तर फाल्गुनी : इस नक्षत्र में भी दो ही तारे होते हैं | इसका देवता रवि (सूर्य का ही एक रूप) को माना गया है तथा सूर्य को इसका स्वामित्व प्राप्त है | ध्रुव संज्ञक यह नक्षत्र सिंह राशि में 26°40’ से लेकर 30° अंशों तक तथा कन्या में शून्य से दस अंशों तक रहता है |

हस्त : पाँच तारों से युक्त इस नक्षत्र के देवता त्वष्टा को तथा अधिपति ग्रह चन्द्र को माना गया है | लघु प्रकृति के इस नक्षत्र का विस्तार कन्या राशि में दस अंशों से लेकर 23°20’ अंशों तक रहता है |

चित्रा : इस नक्षत्र में चित्रा नाम का केवल एक ही तारा होता है | इसका देवता वायु को माना गया है और मंगल को इसका स्वामित्व प्राप्त है | मृदु संज्ञा वाले इस नक्षत्र का प्रस्तार कन्या राशि में 23°20’ से लेकर 30° अंशों तक तथा तुला राशि में आरम्भ से लेकर 6°40’ अंशों तक रहता है |

स्वाति : इस नक्षत्र में भी एक ही तारा होता है | इन्द्राग्नि को इसका देवता तथा राहु को इसका अधिपति ग्रह माना गया है | इसकी संज्ञा चर है तथा तुला राशि में इसका विस्तार 6°40’ से लेकर बीस अंशों तक होता है |

विशाखा : इस नक्षत्र में चार तारे होते हैं | इसका देवता मित्र है तथा अधिपति ग्रह है गुरु | मृदुतीक्ष्ण संज्ञा वाला यह नक्षत्र तुला राशि में 6°40’ से लेकर 20°30’ अंशों तक रहता है और वृश्चिक राशि में आरम्भ से लेकर 3°20 अंशों तक रहता है |

अनुराधा : इस नक्षत्र में तीन तारे होते हैं | इसका देवता है इन्द्र तथा अधिपति ग्रह है शनि | मृदु संज्ञा वाला यह नक्षत्र वृश्चिक राशि में 3°20’ अंश से लेकर 16°40’ अंशों तक विस्तार पाता है |

ज्येष्ठा : इस नक्षत्र में भी तीन ही तारे होते हैं | नैऋति इसका देवता माना जाता है तथा बुध को इसका अधिपतित्व प्राप्त है | तीक्ष्ण संज्ञा वाले इस नक्षत्र का प्रस्तार वृश्चिक राशि में 16°40’ से लेकर अन्त तक यानी तीस अंशों तक रहता है |

मूल : इस नक्षत्र में 11 तारे एक मूल यानी वृक्ष की जड़ के रूप में विद्यमान होते हैं | इसका देवता है जल तथा अधिपति ग्रह है केतु | इसकी संज्ञा है तीक्ष्ण तथा धनु राशि में आरम्भ से लेकर 13°20’ अंशों तक इसका प्रस्तार होता है |

पूर्वाषाढ़ : इसमें चार तारे होते हैं | इसके देवता हैं विश्वेदेव तथा अधिपति ग्रह है शुक्र | इसकी संज्ञा है उग्र तथा यह धनु राशि में 13°20’ से 26°40’ तक विद्यमान रहता है |

उत्तराषाढ़ : इसमें भी चार तारे होते हैं | ब्रह्मा इसके देवता हैं तथा सूर्य इसका अधिपति ग्रह है | ध्रुव संज्ञा वाला यह नक्षत्र धनु राशि में 26°40’ अंशों से लेकर राशि के अन्त तक और उसके बाद मकर राशि के आरम्भ से लेकर दस अंशों तक रहता है |

श्रवण : इसमें तीन तारे होते हैं | विष्णु इसके देवता हैं तथा चन्द्रमा इसका अधिपति ग्रह है | चर संज्ञक यह नक्षत्र मकर राशि में दस अंशों से लेकर 23°20’ अंशों तक विस्तार पाता है |

धनिष्ठा : इस नक्षत्र में चार तारे होते हैं | वसु इसके देवता तथा मंगल इसका अधिपति ग्रह है | इसकी संज्ञा भी चर है तथा मकर राशि में 23°20’ अंशों से लेकर राशि के अन्त तक और कुम्भ राशि में आरम्भ से लेकर 6°40’ अंशों तक वियमान रहता है |

शतभिषज : नाम से ही स्पष्ट है – इस नक्षत्र में सबसे अधिक सौ तारे विद्यमान होते हैं | वरुण को इसका देवता माना गया है तथा राहु को इसका स्वामित्व प्राप्त है | इसकी संज्ञा भी चर है और कुम्भ राशि में इसका प्रस्तार 6°40’ अंश से लेकर बीस अंशों तक रहता है |

पूर्वा भाद्रपद : इस नक्षत्र में दो तारे होते हैं | अजापद को इसका देवता माना जाता है तथा गुरु इसका स्वामी ग्रह माना जाता है | इसकी संज्ञा उग्र है तथा इसका प्रस्तार कुम्भ राशि में बीस अंशों से लेकर राशि के अन्त तक और मीन राशि में उसके आरम्भ से लेकर 3°20’ अंशों तक रहता है |

उत्तर भाद्रपद : इस नक्षत्र में पाँच तारे होते हैं | अहिर्बुन्ध्य इसका देवता है और शनि इसका स्वामी ग्रह है | इसकी संज्ञा है ध्रुव तथा मीन राशि में इसका विस्तार 3°20’ अंश से लेकर 16°40’ अंशों तक रहता है |

रेवती : बतीस तारों के समूह से युक्त इस नक्षत्र का देवता पूषा को माना गया है तथा बुध को इसका स्वामित्व प्राप्त है | इसकी संज्ञा है मृदु और मीन राशि में 16°40’ अंशों से लेकर राशि के अन्त तक यह विद्यमान रहता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/02/13/constellation-nakshatras-38/

Advertisements

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के तारकसमूह, देवता, स्वामी ग्रह, संज्ञा तथा विभिन्न राशियों में उनका प्रस्तार 

नक्षत्रों का विश्लेषण करते हुए अभी तक हमने सभी 27 नक्षत्रों के आरम्भिक रूप और गुण पर बात की | इस विषय पर बात की कि सभी बारह हिन्दी महीनों में 27 नक्षत्रों का विभाजन किस प्रकार हुआ तथा हिन्दी महीनों के वैदिक नामों पर बात की | जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि हिन्दी महीनों के नाम तो नक्षत्रों के नाम पर ही रखे गए हैं, किन्तु उनके वैदिक नाम किसी नक्षत्र के आधार पर नहीं रखे गए अपितु उन वैदिक नामों के भी गहन अर्थ हैं, जिन पर हम बाद में चर्चा करेंगे | हम उन नामों के आधार पर उस नक्षत्र की विशेषताओं को अवश्य समझ सकते हैं | अब आगे बढ़ते हुए इस विषय पर बात करते हैं कि 27 नक्षत्रों में प्रत्येक नक्षत्र में कितने तारे (Stars) होते हैं, प्रत्येक नक्षत्र के देवता (Deity) तथा स्वामी अथवा अधिपति ग्रह (Lordship) कौन हैं कौन हैं, प्रत्येक नक्षत्र को क्या संज्ञा दी गई है | नक्षत्रों की संज्ञा से उनकी प्रकृति का भी कुछ अनुमान हो जाता है | साथ ही यह भी बताएँगे कि विभिन्न राशियों में कितने अंशों तक किस नक्षत्र का प्रस्तार होता है |

ये तो पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि राशिचक्र यानी Zodiac के पूरे 360 अंशों को बारह राशियों में विभाजित करने पर प्रत्येक राशि में 30 अंश आते हैं तथा पूरे चौबीस घण्टों में बारह राशियों का क्रम से उदय होता है | जब 27 नक्षत्रों को इन बारह राशियों अथवा 360 अंशों में विभाजित किया जाता है तो प्रत्येक नक्षत्र की अवधि 13°20’ अंशों की होती है | इसी आधार प्रस्तुत है 27 नक्षत्रों का बारह राशियों में वर्गीकरण…

अश्विनी : इस नक्षत्र में तीन तारे होते हैं | इसका देवता अश्विनी कुमारों को माना जाता है तथा इसका अधिपति ग्रह है केतु | इस नक्षत्र की संज्ञा लघु है और इसका प्रस्तार मेष राशि के आरम्भ से लेकर 13°20’ तक होता है |

भरणी : इस नक्षत्र में भी अश्विनी नक्षत्र की ही भाँति तीन तारे होते हैं | इसका देवता यम को माना गया है तथा शुक्र इसका अधिपति ग्रह है | इसकी संज्ञा उग्र है तथा मेष राशि में इसका विस्तार 13°20’ अंशों से लेकर 26°40’ अंशों तक होता है |

कृत्तिका : इस नक्षत्र में छह तारों का समावेश होता है | इसका देवता अग्नि को माना गया है तथा सूर्य को इसका आधिपतित्व दिया गया है | मृदुतीक्ष्ण प्रकृति का यह नक्षत्र मेष राशि में 26°40’ से लेकर 30 डिग्री तक तथा वृषभ राशि में शून्य डिग्री से लेकर 10’ तक विद्यमान रहता है |

रोहिणी : पाँच तारे मिलकर रोहिणी नक्षत्र बनाते हैं | इसका देवता ब्रह्मा को तथा अधिपति ग्रह चन्द्रमा को माना गया है | ध्रुव प्रकृति का यह नक्षत्र वृषभ राशि में 10° से लेकर 23°20’ अंशों तक विद्यमान रहता है |

मृगशिर : तीन तारों का समूह मृगशिर नक्षत्र में होता है | इसका देवता चन्द्रमा को माना गया है तथा इसका अधिपति ग्रह है मंगल | इसकी संज्ञा है मृदु तथा वृषभ राशि में इसका प्रस्तार 23°20’ से 30° अंशों तक और मिथुन राशि में शून्य से 6°40’ तक होता है |

आर्द्रा : इस नक्षत्र में केवल एक ही तारा होता है | इसका देवता शिव को मान अगया है तथा इसका अधिपति ग्रह है राहु | तीक्ष्ण प्रकृति के इस नक्षत्र का प्रस्तार मिथुन राशि में 6°40’ से लेकर 20° अंशों तक होता है |

पुनर्वसु : इस नक्षत्र में चार तारे होते हैं तथा इसका देवता अदिति और अधिपति ग्रह गुरु को माना जाता है | चर संज्ञक यह नक्षत्र मिथुन राशि में 20’ से 30’ अंश तक रहता है तथा कर्क राशि में शून्य डिग्री से लेकर 3°20’ अंशों तक इसका प्रस्तार होता है |

पुष्य : चार तारों से युक्त इस नक्षत्र के देवत्व बृहस्पति को तथा अधिपतित्व शनि को प्राप्त है | लघु संज्ञा वाले इस नक्षत्र का विस्तार कर्क राशि में 3°20’ से लेकर 16°40’ तक रहता है |

आश्लेषा : इस नक्षत्र में पाँच तारे मिलकर सर्प के जैसी आकृति बनाते हैं | इसका देवता है सर्प तथा इसका अधिपति ग्रह है बुध | यह नक्षत्र तीक्ष्ण संज्ञक होता है और इसका विस्तार कर्क राशि में 16°40’ से 30° अंशों तक होता है |

शेष अगले लेख में…..

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/02/02/constellation-nakshatras-37/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी महीनों का विभाजन और उनके वैदिक नाम:-

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम पहले बहुत कुछ लिख चुके हैं | अब हम चर्चा कर रहे हैं कि किस प्रकार हिन्दी महीनों का विभाजन नक्षत्रों के आधार पर हुआ तथा उन हिन्दी महीनों के वैदिक नाम क्या हैं | इस क्रम में चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मृगशिर और पौष माह के विषय में पूर्व में लिख चुके हैं, आज माघ और फाल्गुन माह…

माघ : इस माह में दो नक्षत्र – आश्लेषा और मघा उदय होते हैं, जिनमें मघा नक्षत्र प्रमुख होता है | इसीलिए इसका नाम “माघ” पड़ा | इसका वैदिक नाम है “तपस” जिसका शाब्दिक अर्थ है तपस्या करना, साधना करना अथवा किसी कार्य में कुशलता प्राप्त करने के लिए उसका अभ्यास करना | गर्मी के लिए, तपने के लिए, तेज के लिए, जलाने के लिए, अग्नि के लिए और सूर्य के लिए भी तपस तथा माघ शब्दों का प्रयोग प्रचुरता से किया जाता है | वसन्त ऋतु का आरम्भ भी माघ माह की शुक्ल पञ्चमी – जिसे हम वसन्त पञ्चमी के नाम से जानते हैं – से माना जाता है |

इस माह में “कल्पवास” का विशेष महत्त्व माना जाता है | संगम के तट पर निवास करने को कल्पवास कहा जाता है | वेदों में यज्ञ यागादि को कल्प की संज्ञा दी गई है | अर्थात इस माह में संगम के तट पर वास करके साधक के द्वारा यज्ञ यागादि का साधन करना साधकों के लिए बहुत श्रेष्ठ माना जाता है | यह कल्पवास पौष शुक्ल एकादशी से आरम्भ होकर माघ शुक्ल द्वादशी तक चलता है | कहा जाता है कि माघ मास में जो व्यक्ति तीन बार प्रयाग में संगम में स्नान करता है उसे इतना पुण्य प्राप्त होता है जितना दस सहस्र अश्वमेध से भी प्राप्त नहीं होता : “प्रयागे माघमासे तुत्र्यहं स्नानस्य यद्रवेत् | दशाश्वमेघसहस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि ||”

फाल्गुन : दोनों फाल्गुनी और हस्त नक्षत्रों का उदय इस माह में होने के कारण इसका नाम फाल्गुन पड़ा – जिसे आँचलिक बोलियों में फागुन भी कहा जाता है | नाम से ही स्पष्ट है कि इस माह की पूर्णिमा को दोनों फाल्गुन नक्षत्र में से किसी एक नक्षत्र विद्यमान होता है | इसका वैदिक नाम है “तपस्या” अर्थात जो तपस के बाद आए | तपस्या शब्द के भी शाब्दिक अर्थ वही हैं जो तपस के हैं – तप करना, साधना करना, अभ्यास करना, गर्म करना, जलाना, गर्मी से जो उत्पन्न हो इत्यादि |

वैदिक पञ्चांग के अनुसार चैत्र माह से आरम्भ होने वाले सम्वत्सर यानी वर्ष का अन्तिम बारहवाँ मास फाल्गुन मास है | इस पूरे मास भर वसन्त ऋतु विद्यमान रहती है – न अधिक सर्दी होती है न ही अधिक गर्मी – बड़ा सुहावना मौसम इस समय रहता है | इसीलिए इस माह में अनेक पर्व मनाए जाते हैं – जिनमें प्रमुख है होली और महा शिवरात्रि |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/02/01/constellation-nakshatras-36/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी महीनों का विभाजन और उनके वैदिक नाम:-

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम पहले बहुत कुछ लिख चुके हैं | अब हम चर्चा कर रहे हैं कि किस प्रकार हिन्दी महीनों का विभाजन नक्षत्रों के आधार पर हुआ तथा उन हिन्दी महीनों के वैदिक नाम क्या हैं | इस क्रम में चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह के विषय में पूर्व में लिख चुके हैं, आज मृगशिर और पौष माह…

मृगशिर : इस माह में मृगशिर और आर्द्रा नक्षत्र आते हैं, किन्तु इस माह की पूर्णिमा मृगशिर नक्षत्र से युक्त होती है इसलिए इस माह का नाम मृगशिर पड़ा | इसका वैदिक नाम है “सह” जिसका शाब्दिक अर्थ होता है एक साथ (Together)- एक साथ रहना – एक साथ चलना – इस शब्द को एकता का प्रतीक भी माना जा सकता है | इसके अतिरिक्त वर्तमान के लिए तथा किसी को भेंट इत्यादि देने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है | स्वस्थ रहना, सहन करना, सन्तुष्ट रहना, प्रसन्न रहना और प्रसन्न करना, स्थाई, कष्ट प्राप्त करना, धैर्य रखना, शक्ति, साहस, किसी के द्वारा अनुगमन किया जाना, विजय प्राप्त करना आदि अर्थों में भी साहित्यकार इस शब्द का प्रयोग करते रहे हैं | भगवान् शिव का एक नाम मृगशिर भी है | नवम्बर और दिसम्बर की कड़ाके की ठण्ड इसी माह में पड़ती है इस प्रकार धैर्य तथा सहनशीलता आदि अर्थों में इस शब्द का प्रयोग उपयुक्त ही प्रतीत होता है | श्रीमद्भागवत में स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा है “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्” अर्थात् समस्त महिनों में मार्गशीर्ष मेरा ही स्वरूप है मासानां मार्गशीर्षोऽहम् ऋतूनां कुसुमाकरः” – श्रीमद्भगवद्गीता 10/35

पौष : इस माह में पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्रों का उदय होता है, किन्तु इस महा की पूर्णिमा को पुष्य नक्षत्र होने के कारण इसका नाम पौष पड़ा | इसका वैदिक नाम है “सहस्य” – क्योंकि यह माह सह माह के बाद आता है | सहस्य का एक अर्थ वर्षा ऋतु भी होता है और इसी कारण से सर्दियों की वर्षा की ऋतु भी इस माह को कहा जाता है | “सह” माह के समान ही इस शब्द के भी अर्थ सहनशीलता, शक्ति, तेज, विजय आदि होते हैं | साथ ही जल के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है |

मान्यता है कि भग नाम के सूर्य की इस माह में उपासना करने से समस्त प्रकार के सौभाग्य की प्राप्ति होती है | इस माह में हेमन्त ऋतु होने के कारण ठण्ड का प्रकोप भी अधिक होता है, सम्भवतः इसीलिए इस माह में सूर्योपासना पर बल दिया जाता रहा है | इसी कारण से इस माह में रात को स्थान स्थान पर जन साधारण आग जलाकर हाथ सेंकते दिखाई दे जाते हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/01/30/constellation-nakshatras-35/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी महीनों का विभाजन और उनके वैदिक नाम:-

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम पहले बहुत कुछ लिख चुके हैं | अब हम चर्चा कर रहे हैं कि किस प्रकार हिन्दी महीनों का विभाजन नक्षत्रों के आधार पर हुआ तथा उन हिन्दी महीनों के वैदिक नाम क्या हैं | इस क्रम में चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद माह के विषय में पूर्व में लिख चुके हैं, आज आश्विन और कार्तिक माह…

आश्विन : इस माह में तीन नक्षत्र आते हैं – रेवती, अश्विनी और भरणी, किन्तु अश्विनी नक्षत्र प्रमुखता से होने के कारण इसका नाम आश्विन हुआ | अर्थात, इस माह में चन्द्रमा सबसे अधिक अश्विनी नक्षत्र के निकट भ्रमण करता है | शरद पूर्णिमाइसका वैदिक नाम है “इष”, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है इच्छा करना – इश धातु से ही इच्छा शब्द की निष्पत्ति हुई है | किसी वस्तु को खोजने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | किसी का पक्ष लेना, किसी बात का निर्णय करना, कोई निश्चय करना, चयन करना आदि अर्थों में इस शब्द का प्रयोग वैदिक और वेदिकोत्तर साहित्य में होता रहा है | बलिष्ठ, द्रुत गति से चलना, भोजन करना आदि के लिए यह शब्द प्रयुक्त होता है | किसी को Comfort पहुँचाने के लिए, किसी वस्तु में वृद्धि के लिए, आकाश से बरसते मन को प्रसन्न करते वर्षा के पानी के लिए तथा कोमल वस्तुओं के लिए इस शब्द का अनेकों रूपों में प्रयोग होता आया है | मन को जो आनन्दित करे ऐसा माह माना जाता है, सम्भवतः इसी कारण इसी माह में नवरात्र भी आरम्भ हो जाते हैं तथा विजया दशमी के साथ ही बहुत से अन्य पर्व इस माह में मनाए जाते हैं | किसी भी प्रकार के शुभ कार्यों के लिए यह माह उत्तम माना जाता है |

कार्तिक : इस महा में दो नक्षत्र होते हैं – कृत्तिका और रोहिणी | किन्तु कृत्तिका नक्षत्र की प्रमुखता इस माह में रहती दीपदानहै – अर्थात चन्द्रमा इस माह में सबसे अधिक कृत्तिका नक्षत्र पर भ्रमण करता है – इसलिये इसका नाम कार्तिक पड़ा | इसका वैदिक नाम है “अर्ज” जो एक धातु है और जिसका अर्थ होता प्राप्त करना – to get, to earn | इसके अतिरिक्त किसी वस्तु को कहीं भेजने – Dispatch करने के लिए, हटाने – Remove करने के लिए, किसी की रक्षा करने के लिए, सुरक्षित रखने के लिए, किसी पर अधिकार प्राप्त करने के लिए, किसी को आकर्षित करने के लिए, कार्य करने अथवा किसी वस्तु का निर्माण करने के लिए, किसी को आज्ञा देने के लिए भी अर्ज शब्द का प्रयोग होता है | ऐसी मान्यता है कि इस माह में गंगा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करना भाग्यवर्द्धक होता है | वास्तव में अश्विन माह से ग्रीष्म कुछ शान्त होने लगती है जो कार्तिक मास आने तक बहुत आनन्ददायक शरद ऋतु में परिवर्तित हो जाती है | ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं से शान्ति प्रदान करने वाली शरद पूर्णिमा के अगले दिन से आरम्भ होने वाले कार्तिक माह की पूर्णिमा – जिसे कार्तिकी पूर्णिमा और देव दिवाली भी कहा जाता है – को तो गंगा स्नान का बहुत ही महत्त्व माना जाता है | कार्तिक अमावस्या यानी दीपावली तो समस्त चराचर प्रकृति को उल्लसित करने वाला पर्व होता ही है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/01/28/constellation-nakshatras-34/

 

 

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी महीनों का विभाजन और उनके वैदिक नाम:-

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम पहले बहुत कुछ लिख चुके हैं | अब हम चर्चा कर रहे हैं कि किस प्रकार हिन्दी महीनों का विभाजन नक्षत्रों के आधार पर हुआ तथा उन हिन्दी महीनों के वैदिक नाम क्या हैं | इस क्रम में चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ माह के विषय में पूर्व में लिख चुके हैं, आज श्रावण और भाद्रपद माह…

श्रावण : इस माह में भी श्रवण और धनिष्ठा ये दो नक्षत्र होते हैं, तथा श्रवण नक्षत्र मुख्य नक्षत्र होने के कारण इसका रक्षा बन्धननाम श्रावण हुआ | इस महीने का वैदिक नाम है नभस | नभस शब्द का अर्थ होता है आकाश, भाप, कोहरा, बादल आदि | किसी को मारना, किसी को चोट पहुँचाना अथवा किसी का वध करना आदि अर्थों में भी नभस शब्द का प्रयोग किया जाता है | इसके अतिरिक्त वर्षा ऋतु को नभस अथवा श्रावण ऋतु कहा जाता है | क्योंकि इस माह में आकाश यानी नभस से गिरती वर्षा की फुहारें समस्त प्रकृति को चिलचिलाती गर्मी से राहत प्रदान करती हैं इसीलिए भी इस माह का नाम नभस पड़ा होगा | रक्षा बन्धन का पावन पर्व इसी माह में आता है अतः उसे भी श्रावणी कहा जाता है | किसी प्रकार की गन्ध तथा कमल की जड़ में जो तन्तु – रेशा – Fiber पाया जाता है उसे भी नभस कहा जाता है | इसे मासोत्तम मास भी कहा जाता है |

भाद्रपद : इस माह में शतभिषज तथा दोनों भाद्रपद – पूर्वा भाद्रपद और उत्तर भाद्रपद – आते हैं तथा प्रमुखता दोनों श्री कृष्ण जन्माष्टमीभाद्रपद नक्षत्रों की रहती है इसलिए इसका नाम भाद्रपद पड़ा | इसका वैदिक नाम है नभस्य – जो नभस अर्थात श्रावण माह के पश्चात आए | नभस्य का अर्थ है नभ अर्थात आकाश से जो सम्बन्धित हो | वाष्प, कोहरा, मेघ आदि जिन अर्थों में नभस शब्द का प्रयोग किया जाता है उन्हों अर्थों में नभस्य शब्द का भी प्रयोग किया जाता है | श्रावण और भाद्रपद दोनों माह वर्षा के माह होते हैं | वर्षा का सम्बन्ध आकाश से होता है, वाष्प और मेघों से होता है | यही कारण है इन दोनों ही महीनों के नामों से – चाहे वह श्रावण हो या नभस, अथवा भाद्रपद हो या नभस्य – वर्षा तथा नभ अर्था आकाश, वाष्प और मेघ का स्वतः ही आभास हो जाता है | यह भी कहा जा सकता है कि ग्रीष्मकालीन वर्षा की रुत – श्रावण और भाद्रपद – जिसमें नभ से रिमझिम कर बरसता हुआ पानी गर्मी से बेहाल प्रकृति की प्यास बुझाता हुआ उसे तृप्त करता है – नभस और नभस्य कहलाती है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/01/24/constellation-nakshatras-33/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी महीनों का विभाजन और उनके वैदिक नाम:-

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम पहले बहुत कुछ लिख चुके हैं | अब हम चर्चा कर रहे हैं कि किस प्रकार हिन्दी महीनों का विभाजन नक्षत्रों के आधार पर हुआ तथा उन हिन्दी महीनों के वैदिक नाम क्या हैं | इस क्रम में चैत्र और वैशाख माह के विषय में पूर्व में लिख चुके हैं, आज ज्येष्ठ और आषाढ़ माह…

ज्येष्ठ : इस नक्षत्र में ज्येष्ठ और मूल नामक दो नक्षत्र आते हैं, तथा जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है – ज्येष्ठ नक्षत्र प्रमुख नक्षत्र होने के कारण इस माह का नाम ज्येष्ठ माह हुआ | इसका वैदिक नाम है शुक्र | शुक्र दैत्याचार्य थे तथा देवासुर संग्राम में जो दैत्य मारे गए थे उन्हें शुक्राचार्य ने फिर से जीवन प्रदान किया था जिसके कारण समस्त देवगण उनके विरोधी हो गए थे और आचार्य शुक्र ने भी दैत्यों के पक्ष में देवों का विरोध करने की प्रतिज्ञा ली थी | अग्नि का दूसरा नाम भी शुक्र है – सम्भवतः ज्येष्ठ माह की अग्नि के समान चिलचिलाती धूप और गर्मी के कारण भी इस माह का नाम शुक्र रखा गया होगा | ज्येष्ठ माह का आरम्भ ही तब होता है जब गर्मी अपने शिखर पर होती है और इसीलिए इस माह में जल का महत्त्व बढ़ जाता है | जिसका प्रतीक है इस माह में मनाया जाने वाला गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी के पर्व | किसी भी वस्तु का सत्व भी शुक्र कहलाता है | इसके अतिरिक्त वीर्य – Sperm, चमकदार वस्तु, श्वेत रंग, शुद्ध, स्त्री और पुरुष की ऊर्जा, जल तथा अस्थियों की मज्जा – Bone-Marrow के लिए भी शुक्र शब्द का प्रयोग होता है |

आषाढ़ : पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ यानी दोनों आषाढ़ इस माह में उदित होते हैं | इसका वैदिक नाम है शुचि – जिसका अर्थ होता है पवित्र, स्वच्छ, मधुर, मनमोहक, आकर्षक, श्वेत | ग्रीष्म ऋतु को भी शुचि कहा जाता है | ज्येष्ठ माह की गर्मी से कुछ राहत प्राप्त होने के संकेत इस माह में देखाई देने लगते हैं | श्रृंगार रस के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि का भी एक पर्यायवाची शुचि है | निष्ठावान, सत्यवादी, प्रतापी, गुणवान, निष्कलंक तथा भोले स्वभाव वाले व्यक्ति के लिए भी शुचि शब्द का प्रयोग किया जाता है | योगिनी एकादशी, देवशयनी एकादशी और गुरु पूर्णिमा जैसे पर्व इसी माह में आते हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/01/22/constellation-nakshatras-32/