आषाढ़ गुप्त नवरात्र

कल आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ीय गुप्त नवरात्रों का भी आरम्भ हो रहा है | देश के लगभग सभी प्रान्तों में वर्ष में दो बार माँ भगवती की उपासना के लिए नौ दिनों तक नवरात्रों का अयोजन किया जाता है – एक चैत्र माह में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल नवमी तक – जिन्हें वासन्तिक अथवा साम्वत्सरिक नवरात्र कहा जाता है | दूसरे शरद ऋतु में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक चलते हैं – जिन्हें शारदीय नवरात्र कहा जाता है | किन्तु इनके अतिरिक्त भी वर्ष में दो बार नवरात्रों का आयोजन किया जाता है – आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ शुक्ल नवमी तक तथा माघ शुक्ल प्रतिपदा से माघ शुक्ल नवमी तक | इन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है – आषाढ़ीय गुप्त नवरात्र और माघ गुप्त नवरात्र | इन नवरात्रों में भी साम्वत्सरिक और शारदीय नवरात्रों की ही भाँति माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जाती है |

गुप्त नवरात्रों का तान्त्रिक उपासकों के लिए विशेष महत्त्व है | तान्त्रिक लोग इन दिनों विशेष सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए शुक्ल दशमी तक दश महाविद्याओं की गुप्त रूप से उपासना करते हैं | सम्भवतः इसीलिए इन्हें “गुप्त नवरात्र” कहा जाता है, और सम्भवतः इसीलिए इस समय पूजा अर्चना की इतनी धूम और चहल पहल नहीं होती | गुप्त नवरात्रों के विषय में विस्तृत विवरण तथा कथाएँ विशेष रूप से देवी भागवत महापुराण में उपलब्ध होती हैं |

इस वर्ष कल यानी 13 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से गुप्त नवरात्रों का आरम्भ हो रहा है और 21 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल नवमी को इनका समापन हो जाएगा | कल सूर्योदय काल से लेकर 08:17 तक आषाढ़ अमावस्या है और उसके बाद आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा आ जाएगी, जो अगले दिन यानी 14 जुलाई को सूर्योदय से पूर्व चार बजकर बत्तीस मिनट तक रहेगी | इस प्रकार प्रतिपदा का क्षय भी हो रहा है, किन्तु घट स्थापना कल ही होगी और इसके लिए शुभ मुहूर्त है सिंह लग्न में प्रातः 08:17 से 10:31 तक | यदि इस समय घट स्थापना नहीं की जा सकती है तो फिर अभिजित मुहूर्त में 11:59 से 12:54 के मध्य घट स्थापना कर लेनी चाहिए | पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें…

गुप्त नवरात्रों में माँ भगवती सभी की मनोकामना पूर्ण करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/12/aashaadha-gupta-navratri/

 

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केतु

राहु और केतु की कथा से सभी लोग परिचित हैं, अतः पुनरावृत्ति से कोई लाभ नहीं | यहाँ हम ज्योतिष के आधार पर केतु की बात कर रहे हैं | भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य और चन्द्रमा के परिक्रमा मार्गों को परस्पर काटते हुए दो बिन्दुओं के नाम हैं जो पृथिवी के सापेक्ष परस्पर एक दूसरे से विपरीत दिशा में 180 अंशों के कोण पर स्थित होते हैं | राहु की ही भाँति केतु भी कोई खगोलीय पिण्ड नहीं है, अपितु एक छाया ग्रह ही है | यह ग्रह आध्यात्मिकता, भावनाओं तथा अच्छे और बुरे कार्मिक प्रभावों का द्योतक भी है | यह व्यक्ति को आध्यात्म मार्ग में प्रवृत्त करने के लिए उसकी भौतिक सुख सुविधाओं का नाश तक करा सकता है | केतु तर्क, बुद्धि, ज्ञान, वैराग्य, कल्पना, अन्तर्दृष्टि, मर्मज्ञता, विक्षोभ और अन्य मानसिक गुणों का कारक है। सर्पदंश तथा अन्य किसी प्रकार के विष के प्रभाव से मुक्ति दिलाने वाला भी माना जाता है | केतु की दशा में में किसी लम्बी बीमारी से भी मुक्ति प्राप्त हो सकती है | केतु को सर्प का धड़ भी माना गया है और माना जाता है कि जैसे सर के बिना केवल धड़ को कुछ भी दिखाई नहीं दे सकता उसी प्रकार केतु की दशा भी लोगों को दिग्भ्रमित कर सकती है |

मानव शरीर में केतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है | कुछ Vedic Astrologer इसे नपुंसक ग्रह मानते हैं तो कुछ नर | इसका स्वभाव मंगल की भाँति उग्र माना जाता है तथा मंगल के क्षेत्र में जो कुछ भी आता है उन्हीं सबका प्रतिनिधित्व केतु भी करता है और “कुजवत केतु:” अर्थात कुज यानी मंगल के समान फल देता है | अश्विनी, मघा तथा मूल इन तीन नक्षत्रों का आधिपतित्व केतु को प्राप्त है | यह जातक की जन्मकिन्दाली में राहु के साथ मिलकर कालसर्प योग भी बनाता है | यदि किसी भाव में केतु स्वग्रही ग्रह के साथ स्थित हो तो उस भाव, उस ग्रह तथा उसके साथ स्थित अन्य ग्रहों के शुभाशुभत्व में वृद्धिकारक होता है | साथ ही यदि द्वादश भाव में केतु स्थित हो तो अपनी दशा में यह मोक्षकारक भी माना गया है | इसकी दशा सात वर्ष की होती है तथा राहु की ही भाँति इसकी विपरीत गति होती है और एक राशि से दूसरी राशि में जाने के लिए इसे 18 माह का समय लगता है |

केतु को प्रसन्न करने तथा उसके अशुभत्व को कम करने के लिए प्रायः Vedic Astrologer कुछ मन्त्रों के जाप का सुझाव देते हैं, जिनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं…

वैदिक मन्त्र : ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे सुमुषद्भिरजायथा:

पौराणिक मन्त्र : पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्, रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्

तन्त्रोक्त मन्त्र : ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम: अथवा – ॐ ह्रीं केतवे नम:

बीज मन्त्र : ॐ कें केतवे नमः

गायत्री मन्त्र : ॐ धूम्रवर्णाय विद्महे कपोतवाहनाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात्

अथवा – ॐ अत्रवाय विद्महे कपोतवाहनाय धीमहि तन्नो केतु प्रचोदयात्

महाघोर केतु सभी का मंगल करे…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/31/ketu/

 

महागौरी – सिद्धिदात्री

आज प्रातः दस बजकर छह मिनट तक सप्तमी तिथि थी और उसके पश्चात अष्टमी तिथि का आगमन हुआ | सूर्योदय में सप्तमी होने के कारण आज सप्तम नवरात्र की यानी भगवती कालरात्रि की उपासना का दिन है | आज प्रातः दस बजकर सात मिनट से कल सूर्योदय में आठ बजकर तीन मिनट तक अर्थात लगभग पौने दो घंटे चैत्र शुक्ल अष्टमी रहेगी और उसके बाद नवमी का आगमन हो जाएगा | परसों यानी 26 मार्च को सूर्योदय से कुछ पूर्व 05:54 पर नवमी समाप्त होकर दशमी तिथि आ जाएगी | इस प्रकार नवमी को सूर्योदय उपलब्ध न होने के कारण नवमी का ह्रास हो गया है और कल ही अष्टम तथा नवम दोनों नवरात्र की पूजा होगी | लेकिन जो लोग आज कन्या करना चाहते हैं वे आज भी प्रातः दस बजकर छह मिनट के बाद यह कार्य कर सकते हैं |

महागौरीति चाष्टमम्

या श्री: स्वयं सुकृतीनाम् भवनेषु अलक्ष्मी:, पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि: |

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा, तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ||

देवी का आठवाँ रूप है महागौरी का | माना जाता है कि महान तपस्या करके इन्होने अत्यन्त गौरवर्ण प्राप्त किया था | ऐसी मान्यता है कि दक्ष के यज्ञ में सती के आत्मदाह के बाद जब पार्वती के रूप में उन्होंने जन्म लिया तब नारद के कहे अनुसार उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया जिसके कारण पार्वती का रंग काला और शरीर क्षीण हो गया | तब शिव ने पार्वती को गंगाजल से स्नान कराया जिसके कारण इनका वर्ण अत्यन्त गौर हो गया और इन्हें महागौरी कहा जाने लगा |

इस रूप में भी चार हाथ हैं और माना जाता है इस रूप में ये एक बैल अथवा श्वेत हाथी पर सवार रहती हैं | इनके वस्त्राभूषण श्वेत हैं और ये वृषभ पर सवार हैं – श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना – शेत वस्त्राभूषण धारण करने के कारण भी इन्हें महागौरी भी कहा जाता है और शेताम्बरी भी कहा जाता है | इनके दो हाथों में त्रिशूल और डमरू हैं तथा दो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं | यह देवी अत्यन्त सात्विक रूप है | वृषभ पर सवार होने के कारण इनका एक नाम वृषारूढ़ा भी है | अत्यन्त गौर वर्ण होने के कारण इनकी उपमा कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमा से भी दी जाती है |

माँ गौरी की उपासना का मन्त्र है:

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि: | महागौरी शुभं दधान्महादेवप्रमोददा ||

इसके अतिरिक्त श्रीं क्लीं ह्रीं वरदायै नमः” इस बीज मन्त्र के जाप के साथ भी देवी के इस रूप की उपासना की जा सकती है |

इसके अतिरिक्त कात्यायनी देवी की ही भाँति महागौरी की उपासना भी विवाह की बाधाओं को दूर करके योग्य जीवन साथी के चुनाव में सहायता करती है | महागौरी की उपासना से व्यक्ति को मिलन विकारों से मुक्ति प्राप्त होती है | माना जाता है कि सीता जी ने भी भगवान् राम को वर प्राप्त करने के लिए महागौरी की उपासना की थी |

जो ज्योतिषी नवदुर्गा को नवग्रहों के साथ सम्बद्ध करते हैं उनका मानना है कि राहु के दुष्प्रभाव के शमन के लिए महागौरी की उपासना की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होगा |

नवमं सिद्धिदात्री

देवी का अन्तिम और नवम् रूप है सिद्धिदात्री का | यों तो देवी के समस्त रूप ही सिद्धिदायक हैं – यदि पूर्ण भक्ति भाव और निष्ठा पूर्वक उपासना की जाए | किन्तु जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है – सिद्धि अर्थात् सफलता – मोक्षप्रदायिनी देवी – समस्त कार्यों में सिद्धि देने वाला तथा समस्त प्रकार के ताप और गुणों से मुक्ति दिलाने वाला रूप है यह | नवरात्रों के नवम दिन जो व्यक्ति शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करता है उसे सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है तथा सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता और ब्रह्माण्ड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है |

इस रूप में चार हाथों वाली देवी कमलपुष्प पर विराजमान दिखाई देती हैं | हाथों में कमलपुष्प, गदा, चक्र और पुस्तक लिये हुए हैं | माँ सरस्वती का रूप है यह | इस रूप में देवी अज्ञान का निवारण करके ज्ञान का दान देती हैं ताकि मनुष्य को उस परमतत्व परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त हो सके | अपने इस रूप में देवी सिद्धों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों तथा देवताओं से घिरी रहती हैं तथा समस्त देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध आदि इच्छित सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए माँ सिद्धिदात्री की ही शरण में जाते हैं |

देवी पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवी की शक्तियों और महिमा का वर्णन प्राप्त होता है | इसके अतिरिक्त मार्कंडेय पुराण में भी इन शक्तियों और इनकी महिमाओं का वर्णन है | भगवान शिव ने सृष्टि के आदि में निराकार पराशक्ति की उपासना की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियाँ प्राप्त हुईं | ऐसा भी माना जाता है कि शिव का आधा शरीर नर का और आधा नारी का भी इन्हीं की कृपा से प्राप्त हुआ था और वे अर्धनारीश्वर कहलाए | यद्यपि अर्धनारीश्वर का वास्तविक सार तो यही है कि समस्त जगत प्रकृति-पुरुषात्मक है – दोनों का सामान रूप से योग है |

इनकी उपासना के लिए नवार्ण मन्त्र के जाप की प्रथा है | साथ ही एक और मन्त्र से भी माँ सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है, जो इस प्रकार है:

सिद्धगन्धर्वयक्षाघै: असुरै: अमरैरपि, सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी |

इसके अतिरक्त सिद्धिदात्री का बीज मन्त्र है ह्रीं क्लीं ऐं सिद्ध्यै नमः” इस मन्त्र का जाप करके भी देवी की उपासना की जा सकती है |

इस रूप की अर्चना करके जो सिद्धि प्राप्त होती है वह इस तथ्य का ज्ञान कराती है कि जो कुछ भी प्राप्य है और जिसकी खोज की जानी चाहिए वह अन्तिम सत्य वही परम तत्व है जिसे परब्रह्म अथवा आत्मतत्व के नाम से जाना जाता है |

माँ सिद्धिदात्री केतु को दिशा और ऊर्जा प्रदान करने वाली मानी जाती हैं इसलिए मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में केतु से सम्बन्धित कोई विकार हो तो इनकी उपासना से वह विकार दूर हो सकता है |

महागौरी और सिद्धिदात्री दोनों ही रूपों में माँ भगवती सभी की रक्षा करते हुए सबको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता तथा हर प्रकार की ऋद्धि सिद्धि प्रदान करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/03/24/mahaagauri-siddhidaatri/

 

षष्ठं कात्यायनी तथा

विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेषु वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या |

ममत्वगर्तेSतिमहान्धकारे, विभ्रामत्येतदतीव विश्वम् ||

देवी का छठा रूप कात्यायनी देवी का माना जाता है | इस रूप में भी इनके चार हाथ माने जाते हैं और माना जाता है कि इस रूप में भी ये शेर पर सवार हैं | इनके तीन हाथों में तलवार, ढाल और कमलपुष्प हैं तथा स्कन्दमाता की ही भाँति एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है |

एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितं, पातु नः सर्वभीतेभ्यः कात्यायनी नमोSस्तु ते

उपरोक्त मन्त्र के जाप द्वारा देवी कात्यायनी की उपासना की जाती है | देवासुर संग्राम में देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये – महिषासुर जैसे दानवों का संहार करने के लिए – देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुईं और महर्षि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया, इसीलिये “कात्यायनी” नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई | इस प्रकार देवी का यह रूप पुत्री रूप है | यह रूप निश्छल पवित्र प्रेम का प्रतीक है | किन्तु साथ ही यदि कहीं कुछ भी अनुचित होता दिखाई देगा तो ये कभी भी भयंकर क्रोध में भी आ सकती हैं |

ऐसा भी माना जाता है कि जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आती है वे:

ॐ कात्यायिनी महामाये, सर्वयोगिन्यधीश्वरी

नन्दगोपसुतं देवी पतिं में कुरु, ते नमः ||

मन्त्र से कात्यायनी देवी की उपासना करें तो उन्हें उत्तम वर की प्राप्ति होती है | इसके अतिरिक्त ऐं क्लीं श्रीं त्रिनेत्रायै नमः” माँ कात्यायनी का यह बीज मन्त्र है और इनकी उपासना के लिए इस बीज मन्त्र का जाप भी किया जा सकता है |

माना जाता है कि भगवती का यह रूप बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करता है | देवगुरु बृहस्पति को सौभाग्य कारक तथा विद्या, ज्ञान-विज्ञान और धार्मिक आस्थाओं का कारक भी माना जाता है | अतः बृहस्पति को प्रसन्न करने के लिए कात्यायनी देवी की पूजा अर्चना की जानी चाहिए |

कात्यायनी देवी के रूप में माँ भगवती सभी की रक्षा करें और सभी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/03/22/katyayani/

 

स्कन्दमाता

सौम्या सौम्यतराशेष सौम्येभ्यस्त्वति सुन्दरी, परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।

पञ्चम स्कन्दमातेति – देवी का पञ्चम स्वरूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है और नवरात्र के पाँचवें दिन माँ दुर्गा के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। कुमार कार्तिकेय को ही “भगवान स्कन्द” के नाम से जाना जाता है । स्कन्दमाता की चार भुजाएँ हैं जिनमें से दो हाथों में कमल का पुष्प धारण किये हुए हैं, एक भुजा ऊपर की ओर उठी हुई है जिससे वह भक्तों को आशीर्वाद देती हैं तथा एक हाथ से उन्होंने गोद में बैठे अपने पुत्र स्कन्द को पकड़ा हुआ है । इनका वाहन सिंह है । देवी का यह ममतामय रूप है | कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति भी माना जाता है । शिव-पार्वती का विवाह ही कुमार कार्तिकेय अर्थात स्कन्द के जन्म के निमित्त हुआ था जिससे कि यह पराक्रमशाली कुमार तारकासुर जैसे राक्षस का संहार कर सके | छान्दोग्यश्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, और उन स्कन्द की माता होने के कारण ये स्कन्दमाता कहलाती हैं | इसीलिये यह रूप एक उदार और स्नेहशील माता का रूप है |

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः |

जब धरती पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ता है माता अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का नाश करने निकल पड़ती हैं । युद्ध के लिए निकलना है लेकिन पुत्र के प्रति अगाध स्नेह भी है, माँ के कर्तव्य का भी निर्वाह करना है, साथ ही युद्ध में प्रवृत माँ की गोद में जब पुत्र होगा तो उसे बचपन से ही संस्कार मिलेंगे कि आततायियों का वध किस प्रकार किया जाता है – क्योंकि सन्तान को प्रथम संस्कार तो माँ से ही प्राप्त होते हैं – इन सभी तथ्यों को दर्शाता देवी का यह रूप है |

निम्न मन्त्र के जाप के साथ माँ स्कन्दमाता की अर्चना का विधान है:

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया, शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी

इसके अतिरिक्त ऐं ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नमः” माँ स्कन्दमाता के इस बीज मन्त्र का भी जाप किया जा सकता है |

माना जाता है कि भगवती का यह रूप बुध का प्रतिनिधित्व करता है | अतः बुध की अनुकूलता के लिए या उसके प्रतिकूल प्रभाव की शान्ति के लिए स्कन्दमाता की पूजा अर्चना की जानी चाहिए | ऐसा भी मानते हैं कि अपनी सन्तान के सौभाग्य के लिए माताओं को स्कन्दमाता की उपासना करनी चाहिए |

मान्यताएँ जो भी हों, हमारी यही कामना है कि देवी भगवती माँ स्कन्दमाता के रूप में अपनी समस्त सन्तानों की रक्षा करें और सबके लिए शुभदायिनी हों…

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दश महाविद्या

आज प्रयास करते हैं दश महावियाओं के रूप गुणादि के विषय में समझने का…

इन महाविद्याओं में सर्वप्रथम नाम आता है “काल (मृत्यु) का भी भक्षण करने में समर्थ, घोर भयानक स्वरूप वाली साक्षात योगमाया भगवान विष्णु के अन्तः करण की शक्ति” माँ काली का | देवासुर संग्राम में जब देवताओं ने देवी भगवती की उपासना की तो पार्वती के शरीर से महाकाली ही उत्पन्न हुई थीं तथा इनका वर्ण काला था | इनका रूप विकराल है तथा अनेक प्रकार के उपद्रवों में ये ही भगवान विष्णु की सहायता करती हैं | असाध्य रोगों से मुक्ति, दुष्टात्माओं या क्रूर ग्रहों की शान्ति, अकाल मृत्यु से बचाव तथा वाक्सिद्धि के लिए इनकी उपासना की जाती है | इनकी आराधना के लिए मन्त्र है “ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा: |”

द्वितीय महाविद्या भगवती तारा, ब्रह्माण्ड में उत्कृष्ट तथा सर्व ज्ञान से समृद्ध हैं, तथा घोर संकट से मुक्त करने वाली और जन्म-मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करने वाली महाशक्ति के रूप में जानी जाती हैं | यह देवी प्रकाश बिन्दु के रूप में आकाश में तारे के सामान विद्यमान हैं | इसी विध्वंसक शक्ति के द्वारा भगवान राम ने रावण का वध किया था | इनकी उपासना पूर्ण रूप से तान्त्रिक उपासना है तथा बौद्ध सम्प्रदाय में भी इनकी उपासना की जाती है | तारा देवी की उपासना के लिए मन्त्र है “ॐ ह्रीं स्त्रीं हूँ फट |”

तृतीय महाविद्या हैं तीनों लोकों में सर्वाधिक सुन्दर तथा मनोरम, सोलह वर्षीय चिर यौवना त्रिपुरसुन्दरी | त्रिपुरसुन्दरी का अर्थ ही है वह नारी जो तीनों लोकों में सबसे अधिक सुन्दर हो | ये समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली तथा श्री कुल की अधिष्ठात्री देवी स्वभाव से सौम्य हैं | षोडश कलाओं से युक्त होने के कारण इन्हें षोडशी भी कहा जाता है | चिरयौवन तथा कलाओं की प्राप्ति के लिए इनकी उपासना का विधान है | यह देवी का अत्यन्त मनोहारी रूप है तथा इनकी उपासना के लिए मन्त्र है “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुन्दरीयै नमः |”

चतुर्थ महाविद्या हैं भुवनेश्वरी | जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है – तीनों लोकों अधिष्ठात्री तथा पोषण करने वाली | पाँचों तत्व – आकाश, वायु, पृथिवी, अग्नि और जल – इन्हीं से निर्मित हैं | ये साक्षात प्रकृति रूपा हैं तथा इन्हें मूल प्रकृति के नाम से भी जाना जाता है | जब दुर्गम दैत्य के अत्याचारों से त्रस्त होकर भूखे प्यासे देवता व मनुष्य देवी की शरण में गए तो इन्होने शाक मूल फल देकर उनकी क्षुधा को शान्त किया था और इसीलिए इनका नाम शाकम्भरी पड़ा | इनकी उपासना के लिए मन्त्र है “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः |”

महाविद्याओं में पाँचवाँ स्थान पर अवस्थित महाविद्या छिन्नमस्ता हैं, इनके इस रूप को समस्त कामनाओं के नाश का प्रतीक माना जाता है | छिन्ना यस्या मस्ता इति छिन्नमस्ता – जिसका मस्तक छिन्न है | इन्होने अपने ही छिन्न मस्तक को अपने हाथों में उठाया हुआ है | ये सत-रज-तम – तीनों गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं | इनके हाथ में इनका छिन्न मस्तक वास्तव में वे छिन्न कामनाएँ ही हैं जो मनुष्य को पथभ्रष्ट करती हैं | इनकी साधना के लिए “श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाहा” मन्त्र का जाप किया जाता है |

छठी महाविद्या हैं त्रिपुर-भैरवी | देवी का यह रूप अत्यन्त उग्र तथा भयंकर है | वास्तव में भगवान् शिव की विध्वंसक प्रवृत्ति की ही प्रतीक हैं | अर्थात ये संसार से समस्त प्रकार के पापों का विनाश करने के लिए सदा तत्पर रहती हैं | “ॐ ह्रीं भैरवी क्लौ ह्रीं स्वाहा:” मन्त्र के द्वारा इनकी उपासना की जाती है |

दस महाविद्याओं में सातवें स्थान धूमावती आती हैं | इन्हें दुर्भाग्य, दारिद्रय तथा अस्वास्थ्य और क्लेश की देवी माना जाता है | ये देवी धुएँ के रूप में हैं तथा दरिद्रों के घरों में विद्यमान रहती हैं और इसीलिए इन्हें अलक्ष्मी भी कहा जाता है | यद्यपि इन्हें लक्ष्मी की बहन माना जाता है किन्तु ये उनसे बिल्कुल विपरीत हैं | इन्हें समस्त प्रकार के जादू टोने आदि से मुक्ति दिलाने वाला भी माना जाता है | इनकी सिद्धि के लिए “ॐ धूँ धूँ धूमावती देव्यै स्वाहा:” मन्त्र का जाप किया जाता है |

अष्टम महाविद्या का नाम है बगलामुखी, जिनका पीत वर्ण से सम्बन्ध माना जाता है और इसीलिए ये पीताम्बरा के नाम से भी प्रसिद्ध हैं | इन्हें स्तम्भन कर्म की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है | इस रूप को समस्त प्रकार की प्राकृतिक आपदा, शत्रु भय अदि हर प्रकार के कष्ट से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है | इनकी सिद्धि के लिए “ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:” मन्त्र का जाप करने का विधान है |

नवम महाविद्या का नाम है मातंगी, जिन्हें तन्त्र विद्या में पारंगत “तान्त्रिक-सरस्वती” भी कहा जाता है | इन्हें संगीत तथा ललित कलाओं में महारथ प्राप्त है | माना जाता है कि ये मतंग मुनि की पुत्री थीं | अपनी पुत्री की देवी के रूप में मतंग मुनि ने उपासना की थी “मतंगमुनिपूजिता या सा मातंगी” | ऐसी भी मान्यता है कि मतंग मुनि से भी पूर्व भगवान् विष्णु ने इनकी उपासना की थी | बौद्ध धर्म में मातागिरी नाम से इनकी उपासना की जाती है | “ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी ह्रीं स्वाहा:” मन्त्र के द्वारा इनकी उपासना का विधान है |

दशम महाविद्या हैं कमल के समान दिव्य एवं मनोहर स्वरूप से सम्पन्न, पवित्रता तथा स्वच्छता की प्रतीक भगवान् विष्णु की अर्द्धांगिनी देवी कमला | इनका यह रूप समस्त प्रकार की सुख समृद्धि और सौभाग्य को देने वाला माना जाता है | इनको प्रसन्न करने के लिए “ॐ हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:” मन्त्र से इनकी उपासना की जाती है |

इन सभी महाविद्याओं को दो कुलों में विभाजित किया गया है – काली कुल और श्री कुल | काली कुल में महाकाली, तारा, छिन्नमस्ता तथा भुवनेश्वरी आती हैं तथा ये सभी उग्र स्वभाव की हैं | त्रिपुरसुन्दरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला श्रीकुल की देवियाँ हैं तथा स्वभाव से सौम्य हैं | गृहस्थ लोगों को तान्त्रिक उपासना नहीं करनी चाहिए | क्योंकि तनिक सी भी चूक घातक हो सकती है | किन्तु वे लोग यदि चाहें तो महाविद्याओं के सौम्य रूपों का जाप कर सकते हैं |

दशमहाविद्याएँ सभी की रक्षा करें तथा समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

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कूष्माण्डेति चतुर्थकम्

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः |

कल चतुर्थ नवरात्र है – चतुर्थी तिथि – माँ भगवती के कूष्माण्डा रूप की उपासना का दिन | इस दिन कूष्माण्डा देवी की पूजा अर्चना इस दिन की जाती है | यह सृष्टि की आदिस्वरूपा आदिशक्ति है | इसका निवास सूर्यमण्डल के भीतरी भाग में माना जाता है | अतः इनके शरीर की कान्ति भी सूर्य के ही सामान दैदीप्यमान और भास्वर है |

कुत्सितः ऊष्मा कूष्मा – त्रिविधतापयुतः संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः स कूष्माण्डा – अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है वे देवी कूष्माण्डा कहलाती हैं | इस रूप में देवी के आठ हाथ माने जाते हैं | इनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, सुरापात्र, चक्र, जपमाला और गदा दिखाई देते हैं | यह रूप देवी का आह्लादकारी रूप है और माना जाता है कि जब कूष्माण्डा देवी आह्लादित होती हैं तो समस्त प्रकार के दुःख और कष्ट के अन्धकार दूर हो जाते हैं | क्योंकि यह रूप कष्ट से आह्लाद की ओर ले जाने वाला रूप है, अर्थात् विनाश से नवनिर्माण की ओर ले जाने वाल रूप, अतः यही रूप सृष्टि के आरम्भ अथवा पुनर्निर्माण की ओर ले जाने वाला रूप माना जाता है |

माना जाता है कि भगवती का यह रूप सूर्य के सामान तेजवान तथा प्रकाशवान है और सम्भवतः इसीलिए ऐसी भी मान्यता है कि सूर्य से सम्बन्धित दोषों के निवारण हेतु कूष्माण्डा देवी की उपासना करनी चाहिए | कूष्माण्डा देवी की उपासना के लिए मन्त्र है:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ।

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ।।

इसके अतिरिक्त ऐं ह्रीं देव्यै नमः” कूष्माण्डा देवी के इस बीज मन्त्र के जाप के साथ भी देवी के इस रूप की उपासना की जा सकती है |

समस्त देवताओं ने जिनकी उपासना की वे देवी कूष्माण्डा के रूप में सबके सारे कष्ट दूर कर हम सबका शुभ करें…

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