देवी प्रपन्नार्ति हरे प्रसीद

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणी, त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ||

माँ भगवती की इसी प्रार्थना के साथ सर्वप्रथम तो सभी को कल से आरम्भ हो रहे नव सम्वत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ…

आंध्रप्रदेश में युगादि अथवा उगडि तिथि कहकर इस सत्य की उद्घोषणा की जाती है कि भारतीय नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा से ही आरम्भ होता है, न कि पहली जनवरी से । आज से लगभग २०७४ वर्ष पूर्व अर्थात ईसा से ५७ वर्ष पूर्व मालवा के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था और उस विजय को अमर बनाने के लिये विक्रम सम्वत का प्रवर्तन किया था । भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध हैं । उन्होंने भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था । राजा विक्रमादित्य की विशाल सेना से विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे । ज्ञान-विज्ञान, कला, संस्कृति को विक्रमादित्य ने बहुत प्रोत्साहन दिया था | धन्वन्तरी जैसे महान वैद्य, वाराहमिहिर जैसे प्रकाण्ड ज्योतिषी, तथा कालिदास जैसे महान कवि उनकी सभा के नवरत्नों में थे |

यह अत्यन्त प्राचीन सम्वत गणित की दृष्टि से भी अत्यन्त सुगम है, क्योंकि इस सम्वत के अनुसार तिथि अंश दिनमान आदि सभी की गणना सूर्य-चन्द्र की गति पर आधारित हैं, और इस प्रकार यह पूर्ण रूप से वैज्ञानिक भी है | प्राचीन काल में नवीन सम्वत चलाने की विधि थी कि जिस नरेश को भी अपना संवत चलाना होता था उसे सम्वत आरम्भ करने से एक दिन पूर्व उन सब प्रजाजनों का ऋण अपनी ओर से चुका देना होता था जिन्होंने कभी भी किसी से भी किसी प्रकार का ऋण ले रखा हो, और ऐसा राजा लोग प्रायः अपनी विजय के उपलक्ष्य में करते थे | महाराज विक्रमादित्य ने पहले शकों को पराजित किया और फिर देश के सम्पूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस व्यक्ति का रहा हो, स्वयं देकर अपने नाम से इस सम्वत का आरम्भ किया था, जो सम्राट पृथिवीराज के शासन काल तक चला | आज भले ही ईसवी सन का बोलबाला जीवन के हर क्षेत्र में हो, किन्तु भारतीय संस्कृति की पहचान यह विक्रम सम्वत ही है और विवाह मुंडन गृह प्रवेश जैसे समस्त शुभ कार्यों तथा श्राद्ध तर्पण आदि सामाजिक कार्यों का अनुष्ठान इसी सम्वत की भारतीय पंचांग पद्धति के अनुसार ही किया जाता है |

इस वर्ष विक्रम सम्वत २०७४ – जिसे “हेमलम्बी” नाम से जाना गया है – जो धन सम्पदा को देने वाला माना जाता है – का शुभारम्भ कल अर्थात २८ मार्च २०१७ को चैत्र मास शुक्ल प्रतिपदा को प्रातः ८  बजकर २८ मिनट पर हो रहा है | चन्द्रमा उत्तर भाद्रपद नक्षत्र में है | करण है किन्स्तुघ्न और योग है ब्रह्म | पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण आरम्भ किया था, इसलिये भी इस तिथि को नव सम्वत्सर के रूप में मनाया जाता है | भारत में वसन्त ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिये भी उत्साहवर्द्धक है क्योंकि इस ऋतु में प्रकृति में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं तथा चारों ओर हरियाली छाई रहती है और प्रकृति नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा अपना नूतन श्रृंगार करती है, तथा ऐसी भी मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को दिन-रात का मान समान रहता है | राशि चक्र के अनुसार भी सूर्य इस ऋतु में राशि चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रविष्ट होता है | यही कारण है भारतवर्ष में नववर्ष का स्वागत करने के लिये पूजा अर्चना की जाती है तथा सृष्टि के रचेता ब्रह्मा जी से प्रार्थना की जाती है कि यह वर्ष सबके लिये कल्याणकारी हो | और इसीलिये चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को कलश स्थापना कर नौ दिन के लिये माँ दुर्गा के तीन महत्वपूर्ण रूपों – दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती – सहित नवदुर्गा की पूजा अर्चना का आरम्भ होता है | नौवें दिन यानी नवमी को यज्ञ इत्यादि करके माँ भगवती से सभी के लिये सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है । इन नौ दिनों तक बहुत से लोग व्रत उपवास आदि भी करते हैं | इस प्रकार भारतीय संस्कृति और जीवन का विक्रमी संवत्सर से गहन सम्बन्ध है |

एक बार पुनः भारतीय जन मानस की आस्था नव सम्वत्सर की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ… माँ भवानी सभी के जीवन से समस्त विघ्न बाधाओं को दूर भगा सबके जीवन को हर प्रकार के सुख – वैभव – धन – सम्पदा – स्वास्थ्य आदि से परिपूर्ण कर दें, इसी प्रार्थना के साथ सभी के लिए आज के मंगलमय दिवस की शुभकामनाएँ…

देवी प्रपन्नार्ति हरे प्रसीद, प्रसीद मातर्जगतोSखिलस्य |

प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं, त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ||

अपराजिता देवी और विजयादशमी

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत् ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

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कल विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा | कल सभी के लिए बहुत व्यस्तताओं भरा दिन होगा – किसी के घर अपराजिता देवी की पूजा अर्चना की जाएगी, तो किसी के घर भाइयों के कानों में नौरते रखकर उनके सफल और सुखी जीवन की कामना की जाएगी, कहीं रामलीला की समाप्ति और भगवान राम की विजय के उपलक्ष्य में रावणदहन की लीला सम्पन्न की जाएगी तो कहीं देवी की प्रतिमा विसर्जन का कार्यक्रम होगा | इसलिए सोचा क्यों न आज ही सभी मित्रों को विजयादशमी का शुभकामना सन्देश प्रेषित किया जाए | तो मित्रों एक दिन पूर्व ही से सभी को इस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ |

सामान्य रूप से इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए मनाया जाता है | आज ही के दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था और इसी जीत के उपलक्ष्य में विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है | लेकिन इस पर्व का एक महत्त्व और भी है – आज ही अपराजिता देवी की पूजा अर्चना भी की जाती है | जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है – यह रूप देवी का ऐसा रूप है जो अपराजिता है – अर्थात् जिसकी कभी पराजय न हो सके – जो सदा विजयी रहे – जिसे कभी जीता न जा सके | इसीलिए नौ दिनों तक देवी के विविध रूपों की पूजा अर्चना करने के बाद विजयादशमी यानी दशम् नवरात्र को अपराजिता देवी की पूजा अर्चना के साथ नवरात्रों का पारायण होता है | जीवन में सब प्रकार के संघर्षों पर विजय प्राप्त करने हेतु देवी अपराजिता की पूजा की जाती है | मान्यता है कि देवी अपराजिता अधर्म का आचरण करने वालों का विनाश करके धर्म की रक्षा करती हैं | यही कारण है कि इस दिन शस्त्र पूजा का भी विधान है |

देवी अपराजिता सिंह पर सवार मानी जाती हैं और इनके अनेक हाथों में अनेक प्रकार के अस्त्र होते हैं जो इस तथ्य का अनुमोदन करते हैं कि किसी प्रकार की भी बुरी शक्तियाँ, किसी प्रकार का भी अनाचार, किसी प्रकार का भी अज्ञान का माँ अपराजिता नाश करने में सक्षम हैं | यद्यपि अपराजिता देवी की अर्चना से सम्बन्धित विधि विधान विस्तार में तो तन्त्र ग्रन्थों में उपलब्ध होते है – जो निश्चित रूप से देवी के उग्र भाव की उपासना की विधि है | लेकिन देवी के स्नेहशील रूप की उपासना के मन्त्र देवी पुराण और दुर्गा सप्तशती में उपलब्ध होते हैं जिनमें अपराजिता देवी के स्नेहशील मातृ रूप को भली भाँति दर्शाया गया है |

ऐसा भी माना जाता ही कि देवी अपराजिता शमी वृक्ष में निवास करती हैं और इसीलिए कुछ स्थानों पर लोग विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष की भी पूजा का भी विधान है |

अपने इस रूप में देवी समस्त प्रकार की नकारात्मकता और कठिनाइयों का विनाश करती हैं क्योंकि यही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं |

व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह पर्व शक्ति और शक्ति के समन्वय का पर्व । नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है | नवदुर्गा के सम्मिलित स्वरूप अपराजिता देवी की कृपा से उसके मार्ग के समस्त कंटक दूर हो जाते हैं और उसके प्रत्येक प्रयास में उसे सफलता प्राप्त होती है । इसीलिए क्षत्रिय अपने अस्त्रों की पूजा करते हैं, अध्ययन अध्यापन में लगे लोग अपनी शास्त्रों की पूजा करते हैं, कलाकार अपने वाद्ययन्त्रों की पूजा करते हैं – यानी हर कोई अपने अपने क्षेत्र में सफलताप्राप्ति की कामना से माँ अपराजिता देवी की पूजा अर्चना करने के साथ ही अपने उपयोग में आने वाली वस्तुओं की भी पूजा अर्चना करते हैं |

आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये ।

स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये ||

मम क्षेमारोग्यादिसिद्ध्‌यर्थं यात्रायां विजयसिद्ध्‌यर्थं |

गणपतिमातृकामार्गदेवतापराजिताशमीपूजनानि करिष्ये ।|

अपराजिता देवी हम सबको जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाती हुई समस्त प्रकार की नकारात्मकता और अज्ञान रूपी शत्रुओं का नाश करें इसी भावना के साथ सभी को विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

 

नवमं सिद्धिदात्री

या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।

श्रद्धा सतां कुलजन प्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ।।

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देवी का अन्तिम और नवं रूप है सिद्धिदात्री का | जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है – सिद्धि अर्थात् मोक्षप्रदायिनी देवी – समस्त कार्यों में सिद्धि देने वाला तथा समस्त प्रकार के ताप और गुणों से मुक्ति दिलाने वाला रूप है यह | इस रूप में चार हाथों वाली देवी कमलपुष्प पर विराजमान दिखाई देती हैं | हाथों में कमलपुष्प, गदा, चक्र और पुस्तक लिये हुए हैं | माँ सरस्वती का रूप है यह | इस रूप में देवी अज्ञान का निवारण करके ज्ञान का दान देती हैं ताकि मनुष्य को उस परमतत्व परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त हो सके – परमात्मतत्व से व्यक्ति का परिचय हो सके | अपने इस रूप में देवी सिद्धों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों तथा देवताओं से घिरी रहती हैं | इस रूप की अर्चना करके जो सिद्धि प्राप्त होती है वह इस तथ्य का ज्ञान कराती है कि जो कुछ भी है वह अन्तिम सत्य वही परम तत्व है जिसे परब्रह्म अथवा आत्मतत्व के नाम से जाना जाता है | पुराणों के अनुसार देवी सिद्धिदात्री के पास अणिमा, महिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, गरिमा, लघिमा, ईशित्व और वशित्व यह आठ सिद्धियां हैं । देवी पुराण के अनुसार सिद्धिदात्री की उपासना करने का बाद ही भगवान् शिव को सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी | उनका आधा शरीर नर और आधा शरीर नारी का इन्हीं की कृपा से प्राप्त हुआ था । इसलिए शिव जी विश्व में अर्द्धनारीश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए थे । माना जाता है कि देवी सिद्धिदात्री की आराधना करने से लौकिक व परलौकिक शक्तियों की प्राप्ति होती है । माँ सिद्धिदात्री की उपासना के लिए निम्न मन्त्र का जाप किया जाता है:

सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि । सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥

इस प्रकार नवरात्रों के नौ दिनों में पूर्ण भक्तिभाव से देवी के इन रूपों की क्रमशः पूजा अर्चना की जाती है | मनोनुकूल फलप्राप्ति की कामना से देवी की अर्चना की जाती है | ये समस्त रूप सम्मिलित भाव से इस तथ्य का भी समर्थन करते हैं कि शक्ति सर्वाद्या है | उसका प्रभाव महान है | उसकी माया बड़ी कठोर तथा अगम्य है तथा उसका महात्मय अकथनीय है | और इन समस्त रूपों का सम्मिलित रूप है वह प्रकृति अथवा योगशक्ति है जो समस्त चराचर जगत का उद्गम है तथा जिसके द्वारा भगवान समस्त जगत को धारण किये हुए हैं |

माँ सिद्धिदात्री हम सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करें तथा हम सबको अपने प्रयासों में सिद्धि प्रदान करें, इसी भावना के साथ नवम् नवरात्र की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

महागौरीति चाष्टमम्

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोsस्तुते ।।

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आज अष्टमी तिथि है, आठवाँ नवरात्र | आज महागौरी की पूजा अर्चना सबने की है | देवी का आठवाँ रूप है महागौरी का | माना जाता है कि महान तपस्या करके इन्होने अत्यन्त गौरवर्ण प्राप्त किया था | इस रूप में भी चार हाथ हैं और माना जाता है इस रूप में ये एक बैल अथवा श्वेत हाथी पर सवार रहती हैं | दो हाथों में त्रिशूल और डमरू हैं | दो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं | यह रूप अत्यन्त सात्विक रूप है और माता पार्वती का उस समय का रूप माना जाता है जब उन्होंने हिमपुत्री के रूप में शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिये घोर तपस्या की थी |

श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दघान्महादेवप्रमोददा॥

 

सप्तमं कालरात्रीति

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त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं समरमूर्धनि तेSपि हत्वा ।

नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तमस्माकमुन्मदसुरारि भवन्न्मस्ते ।।

देवी का सातवाँ रूप कालरात्रि का रूप माना जाता है | सबका अन्त करने वाले काल की भी रात्रि अर्थात् विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि है | इस रूप में इनके चार हाथ हैं और ये गधे पर सवार दिखाई देती हैं | इनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और पाश दिखाई देते हैं | एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | इस रूप में इनका वर्ण श्याम है तथा ये प्रतिकार अथवा क्रोध की मुद्रा में दिखाई देती हैं | श्यामवर्णा होने के कारण भी इन्हें कालरात्रि कहा जाता है | इस मुद्रा में इनका भाव अत्यन्त कठोर तथा उत्तेजित दिखाई देता है | देवी का यह आक्रामक तथा नकारात्मक रूप है | दैत्यों के बढ़ते आतंक को देख देवी का मुख क्रोध से काला पड़ गया था और अत्यन्त भयानक मुद्रा हो गई थी | देवी के इसी रूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है |

ततः कोपं चकारोच्चै: अम्बिका तानरीन् प्रति, कोपेन चास्या वदनमसीवर्णमभूत्तदा ||

दैत्य शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था । इससे चिंतित होकर सभी देवतागण शिव जी के पास गए । शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने की प्रार्थना की । शिव जी की बात मानकर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया तथा शुम्भ-निशुम्भ का वध कर दिया । लेकिन जैसे ही देवी रक्तबीज का वध करने को उद्यत हुईं तो उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न होते चले गए । इसे देख देवी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया, जिसने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया ।

इनकी पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें ‘शुभंकारी’ भी कहते हैं । यह रूप इस कटु सत्य का द्योतक भी है कि जीवन सदा आह्लादमय और सकारात्मक ही नहीं होता | जीवन का एक दूसरा पक्ष भी होता है जो दुष्टतापूर्ण, निन्दनीय, अन्धकारमय अथवा नकारात्मक भी हो सकता है | आज जिस तरह से रक्तबीज की भाँति अनगिनत आतंकी उत्पन्न होते जा रहे हैं उनके विनाश के लिए तो कालरात्रि के ही रूप की आवश्यकता है | क्योंकि दुष्ट का संहार दुष्टता से ही किया जा सकता है |

कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ||

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी ।।

देवी कालरात्रि हम सबके जीवन से नकारात्मकता और अज्ञान के अन्धकार का नाश करके सकारात्मकता और ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित करें इसी भावना के साथ आज सप्तम नवरात्र की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

षष्ठं कात्यायनी

एतत्ते वदनं सौम्यम् लोचनत्रय भूषितम् ।

पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायिनी नमोsस्तुते ।।

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देवी का छठा रूप कात्यायनी देवी का माना जाता है | इस रूप में भी इनके चार हाथ माने जाते हैं और माना जाता है कि इस रूप में भी ये शेर पर सवार हैं | इनके तीन हाथों में तलवार, ढाल और कमलपुष्प हैं तथा स्कन्दमाता की ही भांति एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुईं और महर्षि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया, इसीलिये “कात्यायनी” नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई | इस प्रकार देवी का यह रूप पुत्री रूप है | यह रूप निश्छल पवित्र प्रेम का प्रतीक है, किन्तु कुछ भी अनुचित होता देखकर कभी भी भयंकर क्रोध में आ सकती हैं |

एक कथा के अनुसार एक वन में कत नाम के एक महर्षि थे उनका एक पुत्र था जिसका नाम कात्य रखा गया । इसके पश्चात कात्य गोत्र में महर्षि कात्यायन ने जन्म लिया । उनकी कोई सन्तान नहीं थी । मां भगवती को पुत्री के रूप में पाने की इच्छा रखते हुए उन्होंने कठोर तपस्या की । महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें पुत्री का वरदान दिया । कुछ समय बीतने के बाद राक्षस महिषासुर का अत्याचार अत्यधिक बढ़ गया । तब त्रिदेवों के तेज से एक कन्या ने जन्म लिया जिसने महिषासुर का वध किया | कात्यायन गोत्र में जन्म लेने के कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ गया । सरलता से अपने भक्तों की इच्छा पूरी करने वाली माँ कात्यायनी की उपासना का मन्त्र है:

चंद्र हासोज्जवलकरा शार्दूलवरवाहना |

कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानवघातिनि ||

विवाह की कामना करने वाली कन्याओं के लिए भी कात्यायनी देवी की पूजा अर्चना का विशेष महत्त्व माना गया है और उसके लिए मन्त्र के जाप का विधान है:

कात्यायनी महामाये सर्वयोगीश्वधीश्वरी

नंदगोपसुतं देवी पतिं में कुरु ते नमः

 

पंचमं स्कन्दमातेति

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सौम्या सौम्यतराशेष सौम्येभ्यस्त्वति सुन्दरी ।

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।।

देवी का पंचम स्वरूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है और नवरात्र के पांचवे दिन माँ दुर्गा के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। कुमार कार्तिकेय को ही “भगवान स्कन्द” के नाम से जाना जाता है । स्कन्दमाता की चार भुजाएं हैं जिनमें से अपने दो हाथों में कमल का पुष्प धारण किये हुए हैं । उनकी एक भुजा ऊपर की ओर उठी हुई है जिससे वह भक्तों को आशीर्वाद देती हैं तथा एक हाथ से उन्होंने गोद में बैठे अपने पुत्र स्कन्द को पकड़ा हुआ है । इनका वाहन सिंह है । देवी का यह ममत्वरूप है | कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति भी माना जाता है तथा माता को अपने पुत्र स्कन्द से अत्यधिक प्रेम है । शिव-पार्वती का विवाह ही कुमार कार्तिकेय अर्थात स्कन्द के जन्म के निमित्त हुआ था जिससे कि यह पराक्रमशाली कुमार तारकासुर जैसे राक्षस का संहार कर सके | छान्दोग्यश्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, और उन स्कन्द की माता होने के कारण ये स्कन्दमाता कहलाती हैं | इसीलिये यह रूप एक उदार और स्नेहशील माता का रूप है |

जब धरती पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ता है माता अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का नाश करने निकल पड़ती हैं । युद्ध के लिए निकलना है लेकिन पुत्र के प्रति अगाध स्नेह भी है, साथ ही युद्ध में प्रवृत माँ की गोद में जब पुत्र होगा तो उसे बचपन से ही संस्कार मिलेंगे कि आततायियों का वध किस प्रकार किया जाता है – इन सभी तथ्यों को दर्शाता देवी का यह रूप है |

निम्न मन्त्र के जाप के साथ माँ स्कन्दमाता की अर्चना का विधान है:

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥

माँ स्कन्दमाता अपनी समस्त सन्तानों की रक्षा करें और सबके लिए शुभदायी हों…