Category Archives: नवरात्र

मंगल का तुला में गोचर

कल कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को दिन में दो बजकर चौबीस मिनट के लगभग मंगल चित्रा नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए तैतिल करण और सिद्ध योग में अपने शत्रु ग्रह बुध की राशि कन्या से निकल कर शुक्र की तुला राशि में प्रस्थान कर चुका है | यहाँ कुछ दिन वहाँ बुध और सूर्य का साथ भी रहेगा | तुला राशि में भ्रमण करते हुए मंगल बीस नवम्बर को स्वाति तथा दस दिसम्बर को विशाखा नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए अन्त में पच्चीस दिसम्बर को रात्रि 9:29 के लगभग अपनी स्वयं की वृश्चिक राशि में प्रस्थान कर जाएगा | तुला राशि मंगल की अपनी मेष राशि के लिए सप्तम भाव और वृश्चिक के लिए बारहवाँ भाव बनती है, तथा तुला राशि के लिए मंगल द्वितीयेश और सप्तमेश बनता है | तुला राशि में संचार करते हुए मंगल की दृष्टियाँ मकर, मेष तथा वृषभ राशियों पर रहेंगी | इन्हीं सब तथ्यों के आधार पर जानने का प्रयास करते हैं मंगल के तुला राशि में गोचर के विभिन्न राशियों के जातकों पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

किन्तु ध्यान रहे, किसी एक ही ग्रह के गोचर के आधार पर स्पष्ट फलादेश नहीं किया जा सकता | उसके लिए योग्य Astrologer द्वारा व्यक्ति की कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन आवश्यक है |

मेष : आपके राश्यधिपति और अष्टमेश का गोचर आपके सप्तम भाव में हो रहा है, जहाँ से आपके कार्य स्थान, लग्न तथा धन भाव पर मंगल की दृष्टियाँ हैं | आपके लिए तथा आपके जीवन साथी के लिए कार्य की दृष्टि से तथा आर्थिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | पार्टनरशिप में यदि कोई कार्य है तो उसमें किसी प्रकार का व्यवधान उपस्थित हो सकता है अतः इस ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है | किन्तु आप अपने व्यवहार तथा प्रयासों से सभी अवरोधों को दूर करने में समर्थ भी हो सकते हैं | आपको अपने तथा अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता होगी | यदि अविवाहित हैं तो जीवन साथी की खोज भी इस अवधि में पूर्ण हो सकती है | किन्तु साथ ही यदि अपनी वाणी पर नियन्त्रण नहीं रखा तो दाम्पत्य जीवन तथा प्रेम सम्बन्धों में तनाव भी उत्पन्न हो सकता है |

वृषभ : आपका सप्तमेश और द्वादशेश होकर मंगल का गोचर आपके छठे भाव में हो रहा है, जहाँ से आपके नवम भाव पर, बारहवें भाव पर तथा आपकी लग्न पर उसकी दृष्टियाँ हैं | किसी आवश्यक कार्य के लिए आपको विदेश यात्राएँ करनी पड़ सकती हैं | साथ ही इन यात्राओं में स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है | किन्तु आपके उत्साह में तथा निर्णायक क्षमता में वृद्धि के कारण आपके कार्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | कोई नवीन कार्य आपको प्राप्त हो सकता है, किन्तु सोच समझ कर ही आगे बढें | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसका परिणाम आपके पक्ष में आ सकता है | प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे लोगों के लिए तथा स्पोर्ट्स से जुड़े लोगों के लिए यह गोचर अनुकूल परिणाम देने वाला प्रतीत होता है |

मिथुन : षष्ठेश और एकादशेश होकर मंगल का गोचर आपके पंचम भाव में हो रहा है जहाँ से आपके अष्टम, एकादश और द्वादश भावों पर उसकी दृष्टियाँ हैं | आपके लिए उत्साह में वृद्धि के संकेत प्रतीत होते हैं | नौकरी में पदोन्नति की सम्भावना की जा सकती है | किसी अप्रत्याशित स्थान से प्रॉपर्टी अथवा अर्थलाभ की सम्भावना भी की जा सकती है | मित्रों का सहयोग प्राप्त रहेगा | आप इस अवधि में अपने कार्य से सम्बन्धित Advanve course के लिए भी प्रयास कर सकते हैं | आपकी सन्तान के लिए भी ये गोचर लाभदायक प्रतीत होता है | यदि आपकी सन्तान विवाह योग्य है तो उसके विवाह की भी सम्भावना इस अवधि में की जा सकती है | अविवाहित हैं तो इस अवधि में जीवन साथी की खोज भी पूर्ण हो सकती है | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

कर्क : आपके लिए पंचमेश और दशमेश होकर योगकारक बन जाता है तथा इसका गोचर आपके चतुर्थ भाव में हो रहा है | सप्तम, दशम तथा एकादश भावों पर इसकी दृष्टियाँ हैं | योगकारक होते हुए भी आपके लिए यह गोचर मिश्रित फल देने वाला प्रतीत होता है | कार्य में प्रगति तथा आर्थिक स्थिति में दृढ़ता के संकेत हैं | नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ ही किसी ऐसे स्थान पर आपका ट्रांसफर भी हो सकता है जहाँ आप पहले से जाना चाहते थे | यदि आपने अपने व्यवहार को नियन्त्रित नहीं रखा तो पारिवारिक स्तर पर वातावरण तनावपूर्ण रह सकता है अतः इस ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है | सहकर्मियों से तथा पार्टनर के साथ किसी प्रकार की बहस आपके हित में नहीं रहेगी | अविवाहित हैं तो इस अवधि में आपका विवाह सम्बन्ध भी कहीं निश्चित हो सकता है |

सिंह : आपका चतुर्थेश और नवमेश होकर आपका योगकारक बनता हुआ मंगल का गोचर आपके तृतीय भाव में हो रहा है | जहाँ से आपके छठे भाव, नवम भाव और कर्मस्थान पर इसकी दृष्टियाँ हैं | यह गोचर उत्साहवर्द्धक तथा कार्य की दृष्टि से और आर्थिक दृष्टि से भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आपका स्वयं का व्यवसाय तो उसमें लाभ की सम्भावना है | नौकरी में हैं तो अचानक ही पदोन्नति के साथ अर्थलाभ की भी सम्भावना है | किन्तु साथ ही आपके छोटे भाई बहनों के साथ अथवा कार्यस्थल पर विरोध के स्वर भी मुखर हो सकते हैं | धार्मिक गतिविधियों में रुचि में वृद्धि की भी सम्भावना | आप सपरिवार किसी तीर्थस्थान की यात्रा के लिए भी जा सकते हैं | पॉलिटिक्स में जो लोग हैं उनके लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है |

कन्या : आपका तृतीयेश और अष्टमेश होकर मंगल का गोचर आपके द्वितीय भाव में हो रहा है, जहाँ से आपके पञ्चम, अष्टम और नवम भावों पर मंगल की दृष्टियाँ रहेंगी | आपके लिए अचानक ही नौकरी में पदोन्नति तथा मान सम्मान में वृद्धि के संकेत प्रतीत होते हैं | अपना स्वयं का व्यवसाय है तो उसमें उन्नति तथा आर्थिक लाभ की सम्भावना भी की जा सकती है | किन्तु साथ ही गुप्त विरोधियों की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | सम्बन्धों में मधुरता बनाए रखने के लिए वाणी पर तथा स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने के लिए खान पान पर ध्यान रखने की आवश्यकता है | हाँ आपकी प्रभावशाली वाणी का लाभ आपको अपने कार्य में अवश्य प्राप्त हो सकता है | किसी वसीयत के माध्यम से आपको लाभ की सम्भावना है | आपकी सन्तान के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | धार्मिक तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में वृद्धि की सम्भावना की जा सकती है |

तुला : आपका द्वितीयेश और सप्तमेश होकर मंगल का गोचर आपकी लग्न में ही हो रहा है और आपके चतुर्थ, सप्तम और अष्टम भावों को देख रहा है | परिवार में किसी नवीन सदस्य के आगमन की सम्भावना है अथवा किसी बच्चे का जन्म भी इस अवधि में हो सकता है | आप कोई नया घर बेचकर उसमें शिफ्ट कर सकते हैं | प्रॉपर्टी के व्यवसाय से सम्बद्ध लोगों के लिए, डॉक्टर्स तथा मीडिया से सम्बद्ध लोगों के लिए और पॉलिटिक्स के क्षेत्र से सम्बद्ध लोगों के लिए यह गोचर विशेष रूप से अनुकूल प्रतीत होता है | विवाह के लिए भी समय अनुकूल प्रतीत होता है | विवाहित हैं तो दाम्पत्य जीवन में प्रगाढ़ता के संकेत प्रतीत होते हैं | आप सपत्नीक कहीं घूमने जाने का कार्यक्रम भी बना सकते हैं | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | स्वभाव में चिडचिडापन आ सकता है अतः योग ध्यान का अभ्यास आपके लिए आवश्यक है |

वृश्चिक : आपका लग्नेश और षष्ठेश होकर मंगल का गोचर आपके बारहवें भाव में हो रहा है जहाँ से आपके तीसरे, छठे तथा सातवें भावों पर मंगल की दृष्टि है | आपके लिए यह गोचर अधिक अनुकूल नहीं प्रतीत होता | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की विशेष रूप से आवश्यकता है | इस अवधि में आप सपरिवार कहीं घूमने जाने का कार्यक्रम भी बना सकते हैं | यात्राओं के दौरान किसी प्रकार की दुर्घटना अथवा चोरी आदि के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है | आपके छोटे भाई बहनों के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है, किन्तु उनके साथ आपके सम्बन्धों में कुछ तनाव भी उत्पन्न हो सकता है | जीवन साथी तथा सन्तान के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की विशेष रूप से आवश्यकता है |

धनु : आपकी राशि के लिए पंचमेश तथा द्वादशेश होकर मंगल का गोचर आपके लाभ स्थान में हो रहा है तथा वहाँ से दूसरे, पाँचवें और छठे भावों पर उसकी दृष्टियाँ हैं | यह गोचर आपके स्वयं के लिए तथा आपकी सन्तान के लिए अनुकूल प्रतीत होता है तथा उसकी ओर से कोई शुभ समाचार इस अवधि में प्राप्त हो सकता है | किन्तु सन्तान के साथ बहस सम्बन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है | आर्थिक स्थिति में दृढ़ता की सम्भावना की जा सकती है | किसी घनिष्ठ मित्र के माध्यम से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त हो सकते हैं | किन्तु ऐसे मित्रों तथा सम्बन्धियों को पहचान कर उनसे दूरी बनाने की आवश्यकता होगी जो आपसे ईर्ष्या रखते हैं | नौकरी की खोज में हैं तो उसमें भी सफलता प्राप्त हो सकती है | विद्यार्थियों के लिए यह समय अत्यन्त अनुकूल प्रतीत होता है | स्वास्थ्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | किसी पुरानी बीमारी से मुक्ति भी इस अवधि में सम्भव है |

मकर : आपके चतुर्थेश और एकादशेश का गोचर आपके दशम भाव में हो रहा है तथा वहाँ से आपकी लग्न को और चतुर्थ तथा पञ्चम भावों को देख रहा है | आपके लिए उत्साह में वृद्धि के साथ ही कार्य में उन्नति के संकेत भी हैं | नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ ही आय में वृद्धि के भी संकेत हैं | किसी पुरूस्कार आदि की प्राप्ति की सम्भावना भी इस अवधि में की जा सकती है | अधिकारियों तथा सहकर्मियों का सहयोग आपको उपलब्ध रहेगा | अपना स्वयं का व्यवसाय है तो उसमें भी आप वृद्धि कर सकते हैं अथवा कोई नई ब्रांच खोल सकते हैं | आपकी सन्तान की ओर से कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है | आप स्वयं भी उच्च शिक्षा के लिए प्रयास कर सकते हैं | माता जी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की विशेष रूप से आवश्यकता है | परिवार में कार्यस्थल पर किसी भी बहस से बचने का प्रयास आवश्यक है |

कुम्भ : आपके लिए आपके तृतीयेश और दशमेश का गोचर आपके भाग्य स्थान में हो रहा है | जहाँ से आपके बारहवें, तीसरे और चौथे भावों पर उसकी दृष्टियाँ हैं | आपके लिए यह गोचर मिश्रित फल देने वाला कहा जा सकता है | यदि आपका कार्य विदेश से सम्बन्ध रखता है तो आपके लिए विदेश यात्राओं में वृद्धि के साथ ही कार्य में प्रगति के भी संकेत प्रतीत होते हैं | किन्तु यात्राओं में तथा पारिवारिक समस्याओं पर धन व्यय होने के साथ ही परिवार में तनावपूर्ण स्थिति के भी संकेत प्रतीत होते हैं | विशेष रूप से छोटे भाई बहनों तथा माता जी के साथ सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न हो सकता है | ऐसी स्थिति में अपने व्यवहार की शान्ति बनाए रखना ही सर्वोत्तम उपाय है | माता जी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की विशेष रूप से आवश्यकता है | घर को Renovate कराने में पैसा खर्च हो सकता है | परिवार में किसी नए सदस्य का आगमन भी सम्भव है | आध्यात्मिक तथा धार्मिक गतिविधियों में वृद्धि की भी सम्भावना है |

मीन : आपके लिए आपका द्वितीयेश और भाग्येश होकर मंगल का गोचर आपकी राशि से अष्टम भाव में हो रहा है | जहाँ से आपके लाभ स्थान, द्वितीय भाव तथा तीसरे भाव पर मंगल की दृष्टियाँ हैं | आपको अचानक ही किसी ऐसे स्रोत से आर्थिक लाभ की सम्भावना है जहाँ की आपने कल्पना भी नहीं की होगी | किसी वसीयत के माध्यम से आपको प्रॉपर्टी का लाभ भी हो सकता है | आपके छोटे भाई बहनों के लिए भी लाभ की सम्भावना इस अवधि में की जा सकती है | सम्भव है आपको किसी कार्य में आरम्भ में व्यवधान का भी अनुभव हो | किन्तु वह व्यवधान अधिक समय नहीं रहेगा और आपका कार्य पुनः आगे बढ़ सकता है | आपकी वाणी इस अवधि में अत्यन्त प्रभावपूर्ण रहेगी और आपके कार्य में आपको उसका लाभ भी प्राप्त होगा | हाँ, सम्बन्धों में मधुरता बनाए रखने के लिए वाणी पर तथा स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने के लिए खान पान पर संयम रखने की आवश्यकता है |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/10/mars-transit-in-libra/

 

 

विजयादशमी और अपराजिता देवी

विजयादशमी और अपराजिता देवी

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

ॐ सर्वविजयेश्वरी विद्महे शक्तिः धीमहि अपराजितायै प्रचोदयात

आज तक समस्त हिन्दू समाज माँ भगवती के नौ रूपों – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी सिद्धिदात्री की उपासना में व्यस्त था | कल विजया दशमी का पर्व है | सर्वप्रथम सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ – अपराजिता देवी हम सभी के भीतर की बुराइयों को नष्ट करके उन पर अच्छाइयों को विजयी बनाएँ यही कामना है…

विजया दशमी धार्मिक पर्व होने के साथ साथ एक प्रकार का लोकोत्सव भी है | हिन्दू घरों में अपराजिता देवी की पूजा के बाद बहनें अपने भाइयों के कानों मैं नौरते रखती हैं | प्राचीन काल में यात्रा पर जाते समय अथवा किसी युद्ध पर जाते समय अपराजिता देवी की पूजा का विधान था | विजया दशमी के दिन भद्रा रहित काल में रावणदहन की लीला भी आयोजित की जाती है | भगवान राम ने नारद मुनि के कहने पर आश्विन शुक्ल पक्ष के नवरात्रों में अपने भाई लक्ष्मण के साथ नौ दिनों तक देवी के नौ रूपों की पूजा अर्चना करने के उपरान्त दशमी तिथि को अपने अनुष्ठान का समापन अपराजिता देवी की पूजा के साथ किया था और उसके पश्चात युद्ध के लिए प्रस्थान किया था तथा युद्ध में दुष्ट रावण का वध करके विजय प्राप्त की थी | इसीलिए आश्विन शुक्ल नवमी को विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है |

अपराजिता – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है – यह देवी का ऐसा रूप है जो अपराजित है – अर्थात् जिसकी कभी पराजय न हो सके – जो सदा विजयी रहे – जिसे कभी जीता न जा सके | इसीलिए नौ दिनों तक देवी के विविध रूपों की पूजा अर्चना करने के बाद विजयादशमी यानी दशम नवरात्र को अपराजिता देवी की पूजा अर्चना के साथ नवरात्रों का पारायण होता है | वास्तव में अपराजिता माँ भगवती का ऐसा रूप है जिसमें उनके समस्त रूप और उनके गुण समाहित हैं और इस प्रकार यह रूप समन्वयन का – एकजुटता का – भी प्रतिनिधित्व करता है | जीवन में सब प्रकार के संघर्षों पर विजय प्राप्त करने हेतु देवी अपराजिता की पूजा की जाती है | मान्यता है कि देवी अपराजिता अधर्म का आचरण करने वालों का विनाश करके धर्म की रक्षा करती हैं | यही कारण है कि इस दिन शस्त्र पूजा का भी विधान है |

देवी अपराजिता सिंह पर सवार मानी जाती हैं और इनके अनेक हाथों में अनेक प्रकार के अस्त्र होते हैं जो इस तथ्य का अनुमोदन करते हैं कि किसी प्रकार की भी बुरी शक्तियाँ, किसी प्रकार का भी अनाचार, किसी प्रकार का भी अज्ञान का माँ अपराजिता नाश करने में सक्षम हैं | यद्यपि अपराजिता देवी की अर्चना से सम्बन्धित विधि विधान विस्तार में तो तन्त्र ग्रन्थों में उपलब्ध होते है – जो निश्चित रूप से देवी के उग्र भाव की उपासना की विधि है | लेकिन देवी के स्नेहशील रूप की उपासना के मन्त्र देवी पुराण और दुर्गा सप्तशती में उपलब्ध होते हैं जिनमें अपराजिता देवी के स्नेहशील मातृ रूप को भली भाँति दर्शाया गया है |

ऐसा भी माना जाता है कि देवी अपराजिता शमी वृक्ष में निवास करती हैं और इसीलिए इस दिन शमी वृक्ष की पूजा का भी विधान है |

अपने इस रूप में देवी समस्त प्रकार की नकारात्मकताओं और कठिनाइयों का विनाश करती हैं क्योंकि यही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं |

गहराई से देखा जाए तो यह पर्व शक्ति और शक्तिमान के समन्वय का पर्व है । नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की अपराजिता देवीउपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है | नवदुर्गा के सम्मिलित स्वरूप अपराजिता देवी की कृपा से उसके मार्ग के समस्त कंटक दूर हो जाते हैं और उसके प्रत्येक प्रयास में उसे सफलता प्राप्त होती है । इसीलिए क्षत्रिय अपने शस्त्रों की पूजा करते हैं,  अध्ययन अध्यापन में लगे लोग अपनी शास्त्रों की पूजा करते हैं, कलाकार अपने वाद्य यन्त्रों की पूजा करते हैं – यानी हर कोई अपने अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्ति की कामना से माँ अपराजिता देवी की पूजा अर्चना करने के साथ ही अपने उपयोग में आने वाली वस्तुओं की भी पूजा अर्चना करते हैं |

आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये ।

स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये ||

मम क्षेमारोग्यादिसिद्ध्‌यर्थं यात्रायां विजयसिद्ध्‌यर्थं |

गणपतिमातृकामार्गदेवतापराजिताशमीपूजनानि करिष्ये ।|

यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न हो इसके लिए भी यात्रा प्रारम्भ करते समय निम्न स्तुति के साथ अपराजिता देवी की उपासना की जाती है:

शृणुध्वं मुनय: सर्वे सर्वकामार्थसिद्धिदाम् ।

असिद्धसाधिनीं देवीं वैष्णवीमपराजिताम् ।।

नीलोत्पलदलश्यामां भुजङ्गाभरणोज्ज्वलाम् ।

बालेन्दुमौलिसदृशीं नयनत्रितयान्विताम् ।।

पीनोत्तुङ्गस्तनीं साध्वीं बद्धद्मासनां शिवाम् ।

अजितां चिन्येद्देवीं वैष्णवीमपराजिताम् ।।

अपराजिता देवी प्रत्येक व्यक्ति के मन में प्राणी मात्र के प्रति समता की – दया और करुणा की – एकता की – भावना का विकास करते हुए हम सबके जीवन में ऊर्जा का संचार करती हुई सभी को जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाती हुई समस्त प्रकार की नकारात्मकताओं और अज्ञान रूपी शत्रुओं का नाश करें, इसी कामना के साथ सभी को विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/07/vijaya-dashami-and-goddess-aparajita/

 

नवमं सिद्धिदात्री

नवमं सिद्धिदात्री

नवदुर्गा – नवम नवरात्र – देवी के सिद्धिदात्री तथा अन्नपूर्णा रूपों की उपासना

कल चैत्र शुक्ल नवमी तिथि है – चैत्र शुक्ल नवरात्र का नवम तथा अन्तिम नवरात्र – देवी के सिद्धिदात्री रूप की उपासना – दुर्गा विसर्जन | यों तो देवी के समस्त रूप ही सिद्धिदायक हैं – यदि पूर्ण भक्ति भाव और निष्ठा पूर्वक उपासना की जाए | किन्तु जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है – सिद्धि अर्थात् सफलता प्रदान करने वाली – मोक्षप्रदायिनी देवी – समस्त कार्यों में सिद्धि देने वाला तथा समस्त प्रकार के ताप और गुणों से मुक्ति दिलाने वाला रूप है यह | नवरात्रों के नवम दिन जो व्यक्ति शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करता है उसे सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है तथा सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता और ब्रह्माण्ड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है |

इस रूप में चार हाथों वाली देवी कमलपुष्प पर विराजमान दिखाई देती हैं | हाथों में कमलपुष्प, गदा, चक्र और पुस्तक लिये हुए हैं | माँ सरस्वती का रूप है यह | इस रूप में देवी अज्ञान का निवारण करके ज्ञान का दान देती हैं ताकि मनुष्य को उस परमतत्व परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त हो सके | अपने इस रूप में देवी सिद्धों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों तथा देवताओं से घिरी रहती हैं तथा समस्त देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध आदि इच्छित सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए माँ सिद्धिदात्री की ही शरण में जाते हैं |

देवी पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवी की शक्तियों और महिमा का वर्णन प्राप्त होता है | इसके अतिरिक्त मार्कंडेय पुराण में भी इन शक्तियों और इनकी महिमाओं का वर्णन है | भगवान शिव ने सृष्टि के आदि में निराकार पराशक्ति की उपासना की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियाँ प्राप्त हुईं | ऐसा भी माना जाता है कि शिव का आधा शरीर नर का और आधा नारी का भी इन्हीं की कृपा से प्राप्त हुआ था और वे अर्धनारीश्वर कहलाए | यद्यपि अर्धनारीश्वर का वास्तविक सार तो यही है कि समस्त जगत प्रकृति-पुरुषात्मक है – दोनों का सामान रूप से योग है |

इनकी उपासना के लिए नवार्ण मन्त्र के जाप की प्रथा है | साथ ही एक और मन्त्र से भी माँ सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है, जो इस प्रकार है:

सिद्धगन्धर्वयक्षाघै: असुरै: अमरैरपि, सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी |

इसके अतिरक्त सिद्धिदात्री का बीज मन्त्र है “ह्रीं क्लीं ऐं सिद्ध्यै नमः” इस मन्त्र का जाप करके भी देवी की उपासना की जा सकती है |

इस रूप की अर्चना करके जो सिद्धि प्राप्त होती है वह इस तथ्य का ज्ञान कराती है कि जो कुछ भी प्राप्य है और जिसकी खोज की जानी चाहिए वह अन्तिम सत्य वही परम तत्व है जिसे परब्रह्म अथवा आत्मतत्व के नाम से जाना जाता है |

माँ सिद्धिदात्री केतु को दिशा और ऊर्जा प्रदान करने वाली मानी जाती हैं इसलिए जो Astrologer देवी के नौ रूपों को नवग्रहों का प्रतीक मानते हैं उनकी ऐसी भी मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में केतु से सम्बन्धित कोई विकार हो तो इनकी उपासना से वह विकार दूर हो सकता है |

चैत्र शुक्ल नवमी को भगवती के अन्नपूर्णा रूप की उपासना भी की जाती है | माँ अन्नपूर्णा को धन वैभव तथा अन्नपूर्णासुख शान्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है | पौराणिक ग्रन्थों में माँ अन्नपूर्णा के सम्बन्ध में अनेक आख्यान उपलब्ध होते हैं | जैसे लंका पर चढ़ाई से पूर्व भगवान राम ने अपनी सेना की क्षुधा शान्त करने के लिए माँ अन्नपूर्णा की उपासना की थी | कई स्थानों पर ऐसे प्रसंग भी उपलब्ध होते हैं कि काशी में जब अन्न की भारी कमी आ गई तो भगवान शंकर ने अन्नपूर्णा देवी – जो की माता पार्वती का ही एक नाम है – से भिक्षा ग्रहण करके काशीवासियों की क्षुधा शान्त की थी |

मान्यताएँ तथा कथाएँ अनेकों हो सकती हैं, किन्तु जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है – अन्नपूर्णा देवी धन सम्पदा की देवी हैं और अन्न से बड़ा धन और कोई हो ही नहीं सकता | निम्न मन्त्र से देवी अन्नपूर्णा की उपासना की जा सकती है:

“ॐ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरः प्राणवल्लभे |

ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वती ||

सिद्धिदात्री और अन्नपूर्णा दोनों ही रूपों में माँ भगवती सभी की रक्षा करते हुए सबको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता तथा हर प्रकार की ऋद्धि सिद्धि प्रदान करें तथा सबके भण्डार धन धान्य से परिपूर्ण रखें…

ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृतशेखराम् |

कमलस्थितां चतुर्भुजां सिद्धीदात्रीं यशस्वनीम् ||

स्वर्णवर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम् |

शखचक्रगदापदमधरां सिद्धीदात्रीं भजेम् ||

पट्टाम्बरपरिधानां मृदुहास्या नानालंकारभूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणिरत्नकुण्डलमण्डिताम् ||

प्रफुल्लवदनां पल्लवाधरां कान्तकपोला पीनपयोधराम् |

कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ||

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो |

स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोSस्तुते ||

पट्टाम्बरपरिधानां नानालंकारभूषिताम् |

नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोSस्तुते ||

परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा |

परमशक्ति परमभक्ति सिद्धिदात्री नमोSस्तुते ||

विश्वकर्त्री विश्वभर्त्री विश्वहर्त्री विश्वप्रीता |

विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोSस्तुते ||

भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी |

भवसागरतारिणी सिद्धिदात्री नमोSस्तुते ||

धर्मार्थकामप्रदायिनी महामोहविनाशिनी |

मोक्षदायिनी सिद्धिदायिनी सिद्धिदात्री नमोSस्तुते ||

अन्त में, किसी भी कार्य में सिद्धि अर्थात सफलता प्राप्त करने के लिए प्रयास स्वयं ही करना पड़ता है – चाहे कोई भौतिक लक्ष्य हो अथवा आध्यात्मिक – बिना प्रयास के कोई कार्य सिद्ध नहीं होता | माता सिद्धिदात्री भी उन्हीं के कार्य सिद्ध करती हैं जो स्वयं प्रयास करते हैं… और प्रयास करने पर ही माँ अन्नपूर्णा अन्न के भण्डार भरने में हमारी सहायता करती हैं… कहने का तात्पर्य यही है कि ईश्वर भी उसी की सहायता करता है जो कर्म में तत्पर होता है… अस्तु  हम सभी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहें ताकि माता सिद्धिदात्री और देवी अन्नपूर्णा हमारे समस्त प्रयासों की सिद्धि में सहायक हो यही कामना है…

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नवरात्र और कन्या पूजन

नवरात्र और कन्या पूजन

शारदीय नवरात्र हों या चैत्र नवरात्र – माँ भगवती को उनके नौ रूपों के साथ आमन्त्रित करके उन्हें स्थापित किया जाता है और फिर कन्या अथवा कुमारी पूजन के साथ उन्हें विदा किया जाता है | कन्या पूजन किये बिना नवरात्रों की पूजा अधूरी मानी जाती है | प्रायः अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन का विधान है | देवी भागवत महापुराण के अनुसार दो वर्ष से दस वर्ष की आयु की कन्याओं का पूजन किया जाना चाहिए | आज प्रातः नौ बजकर पावन मिनट से कल प्रातः दस बजकर पचपन मिनट तक अष्टमी तिथि रहेगी | उदय काल में अष्टमी तिथि कल होने के कारण अष्टमी पूजन कल किया जाएगा | इसके बाद सात अक्तूबर को दिन में बारह बजकर अड़तीस मिनट तक नवमी तिथि रहेगी, इस प्रकार नवमी का कन्या पूजन सात अक्तूबर को होगा | प्रस्तुत हैं कन्या पूजन के लिए कुछ मन्त्र…

दो वर्ष की आयु की कन्या – कुमारी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कौमार्यै नमः

जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरूपिणी |

पूजां गृहाण कौमारी, जगन्मातर्नमोSस्तुते ||

तीन वर्ष की आयु की कन्या – त्रिमूर्ति

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं त्रिमूर्तये नम:

त्रिपुरां त्रिपुराधारां त्रिवर्षां ज्ञानरूपिणीम् |

त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम् ||

चार वर्ष की कन्या – कल्याणी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कल्याण्यै नम:
कालात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम् |

कल्याणजननीं देवीं कल्याणीं पूजयाम्यहम् ||

पाँच वर्ष की कन्या – रोहिणी पूजन

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं रोहिण्यै नम:
अणिमादिगुणाधारां अकराद्यक्षरात्मिकाम् |

अनन्तशक्तिकां लक्ष्मीं रोहिणीं पूजयाम्यहम् ||
छह वर्ष की कन्या – कालिका  

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालिकायै नम:

कामाचारीं शुभां कान्तां कालचक्रस्वरूपिणीम् |

कामदां करुणोदारां कालिकां पूजयाम्यहम् ||

सात वर्ष की कन्या – चण्डिका

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं चण्डिकायै नम:

चण्डवीरां चण्डमायां चण्डमुण्डप्रभंजिनीम् |

पूजयामि सदा देवीं चण्डिकां चण्डविक्रमाम् ||

आठ वर्ष की कन्या – शाम्भवी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं शाम्भवीं नम:

सदानन्दकरीं शान्तां सर्वदेवनमस्कृताम् |

सर्वभूतात्मिकां लक्ष्मीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम् ||

नौ वर्ष की कन्या – दुर्गा

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं दुर्गायै नम:

दुर्गमे दुस्तरे कार्ये भवदुःखविनाशिनीम् |

पूजयामि सदा भक्त्या दुर्गां दुर्गार्तिनाशिनीम् ||

दस वर्ष की कन्या – सुभद्रा

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं सुभद्रायै नम:

सुभद्राणि च भक्तानां कुरुते पूजिता सदा |

सुभद्रजननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम् ||

|| एतै: मन्त्रै: पुराणोक्तै: तां तां कन्यां समर्चयेत ||

इन नौ कन्याओं को नवदुर्गा की साक्षात प्रतिमूर्ति माना जाता है | इनकी मन्त्रों के द्वारा पूजा करके भोजन कराके उपहार दक्षिणा आदि देकर इन्हें विदा किया जाता है तभी नवरात्रों में देवी की उपासना पूर्ण मानी जाती है | साथ में एक बालक की पूजा भी की जाती है और उसे भैरव का स्वरूप माना जाता है, और इसके लिए मन्त्र है : “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ते नम:” |

हमारी अपनी मान्यता है कि सभी बच्चे भैरव अर्थात ईश्वर का स्वरूप होते हैं और सभी बच्चियाँ माँ भगवती का स्वरूप होती हैं, क्योंकि बच्चों में किसी भी प्रकार के छल कपट आदि का सर्वथा अभाव होता है | यही कारण है कि “जब कोई शिशु भोली आँखों मुझको लखता, वह सकल चराचर का साथी लगता मुझको |”

अतः कन्या पूजन के दिन जितने अधिक से अधिक बच्चों को भोजन कराया जा सके उतना ही पुण्य लाभ होगा | साथ ही कन्या पूजन तभी सार्थक होगा जब संसार की हर कन्या शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक-सामाजिक-आर्थिक हर स्तर पर पूर्णतः स्वस्थ और सशक्त होगी और उसे पूर्ण सम्मान प्राप्त होगा |

कन्या पूजन के साथ हर्षोल्लासपूर्वक अगले नवरात्रों में आने का निमन्त्रण देते हुए माँ भगवती को विदा करें, इस कामना के साथ कि माँ भगवती अपने सभी रूपों में जगत का कल्याण करें…

यातु देवी त्वां पूजामादाय मामकीयम् |

इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/05/navaraatri-and-kanya-pujan/

 

अष्टमं महागौरी

अष्टमं महागौरी

नवदुर्गा – अष्टम नवरात्र – देवी के महागौरी रूप की उपासना

या श्री: स्वयं सुकृतीनाम् भवनेषु अलक्ष्मी:, पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि: |

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा, तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ||

देवी का आठवाँ रूप है महागौरी का | माना जाता है कि महान तपस्या करके इन्होने अत्यन्त गौरवर्ण प्राप्त किया था | ऐसी मान्यता है कि दक्ष के यज्ञ में सती के आत्मदाह के बाद जब पार्वती के रूप में उन्होंने जन्म लिया तब नारद के कहे अनुसार उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया जिसके कारण पार्वती का रंग काला और शरीर क्षीण हो गया | तब शिव ने पार्वती को गंगाजल से स्नान कराया जिसके कारण इनका वर्ण अत्यन्त गौर हो गया और इन्हें महागौरी कहा जाने लगा |

इस रूप में भी चार हाथ हैं और माना जाता है इस रूप में ये एक बैल अथवा श्वेत हाथी पर सवार रहती हैं | इनके वस्त्राभूषण श्वेत हैं और ये वृषभ पर सवार हैं – श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना – श्वेत वस्त्राभूषण धारण करने के कारण भी इन्हें महागौरी भी कहा जाता है और श्वेताम्बरी भी कहा जाता है | इनके दो हाथों में त्रिशूल और डमरू हैं तथा दो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं | यह देवी अत्यन्त सात्विक रूप है | वृषभ पर सवार होने के कारण इनका एक नाम वृषारूढ़ा भी है | अत्यन्त गौर वर्ण होने के कारण इनकी उपमा कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमा से भी दी जाती है |

माँ गौरी की उपासना का मन्त्र है:

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि: | महागौरी शुभं दधान्महादेवप्रमोददा ||

इसके अतिरिक्त श्रीं क्लीं ह्रीं वरदायै नमः” इस बीज मन्त्र के जाप के साथ भी देवी के इस रूप की उपासना की जा सकती है |

इसके अतिरिक्त कात्यायनी देवी की ही भाँति महागौरी की उपासना भी विवाह की बाधाओं को दूर करके योग्य जीवन साथी के चुनाव में सहायता करती है | महागौरी की उपासना से व्यक्ति को मिलन विकारों से मुक्ति प्राप्त होती है | माना जाता है कि सीता जी ने भी भगवान् राम को वर प्राप्त करने के लिए महागौरी की उपासना की थी |

जो Astrologers नवदुर्गा को नवग्रहों के साथ सम्बद्ध करते हैं उनका मानना है कि राहु के दुष्प्रभाव के शमन के लिए महागौरी की उपासना की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होगा |

महागौरी के रूप में माँ भगवती सभी का कल्याण करें और सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम् |

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम

पूर्णन्दुनिभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम् |

वराभीतिकरां त्रिशूलडमरूधरां महागौरी भजेम् ||

पट्टाम्बरपरिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणीरत्नकुण्डलमण्डिताम् ||

प्रफुल्लवदनां पल्ल्वाधरां कातंकपोलां त्रैलोक्य मोहनम् |

कमनीया लावण्यां मृणालचन्दनगन्धलिप्ताम् ||

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकटहन्त्री त्वंहि धनैश्वर्यप्रदायनीम् |

ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

सुखशान्तिदात्री धनधान्यप्रदीयनीम् |

डमरूवाद्यप्रिया आद्या महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रयहारिणीम् |

वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/05/ashtamam-mahagauri/

 

सप्तमं कालरात्रि

सप्तम कालरात्रि

नवदुर्गा – सप्तम नवरात्र – देवी के कालरात्रि रूप की उपासना

त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं समरमूर्धनि तेSपि हत्वा ।

नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तमस्माकमुन्मदसुरारि भवन्न्मस्ते ।।

देवी का सातवाँ रूप कालरात्रि है | सबका अन्त करने वाले काल की भी रात्रि अर्थात् विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि है | इस रूप में इनके चार हाथ हैं और ये गधे पर सवार दिखाई देती हैं | इनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और पाश दिखाई देते हैं | एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | इस रूप में इनका वर्ण श्याम है तथा ये प्रतिकार अथवा क्रोध की मुद्रा में दिखाई देती हैं | श्यामवर्णा होने के कारण भी इन्हें कालरात्रि कहा जाता है | इस मुद्रा में इनका भाव अत्यन्त कठोर तथा उत्तेजित दिखाई देता है | देवी का यह आक्रामक तथा नकारात्मक रूप है |

कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ||

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी ।।

दैत्यों के बढ़ते आतंक को देख देवी का मुख क्रोध से काला पड़ गया था और अत्यन्त भयानक मुद्रा हो गई थी | देवी के इसी रूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है |

ततः कोपं चकारोच्चै: अम्बिका तानरीन् प्रति, कोपेन चास्या वदनमसीवर्णमभूत्तदा ||

दैत्य शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था । इससे चिंतित होकर सभी देवतागण शिव जी के पास गए । शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने की प्रार्थना की । शिव जी की बात मानकर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया तथा शुम्भ-निशुम्भ का वध कर दिया । लेकिन जैसे ही देवी रक्तबीज का वध करने को उद्यत हुईं तो उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न होते चले गए । इसे देख देवी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया, जिसने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया ।

क्लीं ऐं श्रीं कालिकायै नमः” कालरात्रि का बीज मन्त्र है और इस मन्त्र के जाप के द्वारा इनकी उपासना करने से ये प्रसन्न होती हैं |

इनकी पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें शुभंकारी भी कहते हैं । यह रूप इस कटु सत्य का द्योतक भी है कि जीवन सदा आह्लादमय और सकारात्मक ही नहीं होता | जीवन का एक दूसरा पक्ष भी होता है जो दुष्टतापूर्ण, निन्दनीय, अन्धकारमय अथवा नकारात्मक भी हो सकता है | आज जिस तरह से रक्तबीज की भाँति अनगिनत आतंकी उत्पन्न होते जा रहे हैं उनके विनाश के लिए तो कालरात्रि के ही रूप की आवश्यकता है | क्योंकि दुष्ट का संहार दुष्टता से ही किया जा सकता है |

सम्भवतः इनके रूप के कारण ही कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि भगवती का यह रूप शनि का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही शनि की ही भाँति प्रसन्न हो जाएँ तो “शुभंकरी” हो जाती हैं, अतः शनि की उपासना कालरात्रि की उपासना के रूप में भी की जा सकती है…

माँ भगवती देवी कालरात्रि के इस रूप में हम सबके जीवन से नकारात्मकता और अज्ञान के अन्धकार का नाश करके सकारात्मकता और ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित करें…

ध्यान

करालवदनां घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम् |

कालरात्रिं करालिकां दिव्यां विद्युतमालाविभूषिताम ||

दिव्यं लौहवज्रखड्गवामोघोर्ध्वकराम्बुजाम् |

अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम ||

महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा |

घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम् ||

सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम् |

एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृद्धिदाम् ||

स्तोत्र पाठ

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती |

कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता ||

कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी |

कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी ||

क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी |

कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/04/saptamam-kaalratri/

 

 

षष्ठं कात्यायनी

षष्ठं कात्यायनी

नवदुर्गा – छठा नवरात्र – देवी के कात्यायनी रूप की उपासना

विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेषु वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या |

ममत्वगर्तेSतिमहान्धकारे, विभ्रामत्येतदतीव विश्वम् ||

षष्ठी तिथि – छठा नवरात्र – समर्पित है कात्यायनी देवी की उपासना के निमित्त | देवी के इस रूप में भी इनके चार हाथ माने जाते हैं और माना जाता है कि इस रूप में भी ये शेर पर सवार हैं | इनके तीन हाथों में तलवार, ढाल और कमलपुष्प हैं तथा स्कन्दमाता की ही भाँति एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | इनके चार हाथों को चतुर्विध पुरुषार्थ के रूप में भी देखा जाता है और इसीलिए ऐसा माना जाता है कि इनकी उपासना से चारों पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – की सिद्धि होती है |

यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में सर्प्रथम उनका उल्लेख उपलब्ध होता है | देवासुर संग्राम में देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये – महिषासुर जैसे दानवों का संहार करने के लिए – देवी कत ऋषि के पुत्र महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुईं और महर्षि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया | इसीलिये “कात्यायनी” नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई | इस प्रकार देवी का यह रूप पुत्री रूप है | यह रूप निश्छल पवित्र प्रेम का प्रतीक है | किन्तु साथ ही यदि कहीं कुछ भी अनुचित होता दिखाई देगा तो ये कभी भी भयंकर क्रोध में भी आ सकती हैं | स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं और बाद में पार्वती द्वारा प्रदत्त सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया था | पाणिनि पर पतंजलि के भाष्य में इन्हें शक्ति का आदि रूप बताया गया है | देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराणों में इनका माहात्म्य विस्तार से उपलब्ध होता है |

“एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितं, पातु नः सर्वभीतेभ्यः कात्यायनी नमोSस्तु ते |” मन्त्र के जाप द्वारा देवी कात्यायनी की उपासना की जाती है | इसके अतिरिक्त चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना | कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ||” मन्त्र के द्वारा भी इनकी उपासना की जाती है | ऐसा भी माना जाता है कि जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आती है वे यदि “ॐ कात्यायिनी महामाये, सर्वयोगिन्यधीश्वरी | नन्दगोपसुतं देवी पतिं में कुरु, ते नमः || मन्त्र से कात्यायनी देवी की उपासना करें तो उन्हें उत्तम वर की प्राप्ति होती है | इसके अतिरिक्त ऐं क्लीं श्रीं त्रिनेत्रायै नमः” माँ कात्यायनी का यह बीज मन्त्र है और इनकी उपासना के लिए इस बीज मन्त्र का जाप भी किया जा सकता है | नवार्ण मन्त्र के द्वारा भी कात्यायनी देवी की उपासना की जाती है |

जो Astrologer दुर्गा के नौ रूपों को नवग्रहों से सम्बद्ध मानते हैं उनकी मान्यता है कि भगवती का यह रूप बृहस्पति का तथा व्यक्ति के Horoscope में नवम और द्वादश भाव का प्रतिनिधित्व करता है | देवगुरु बृहस्पति को सौभाग्य कारक तथा विद्या, ज्ञान-विज्ञान और धार्मिक आस्थाओं का कारक भी माना जाता है | नवम भाव धर्म तथा सौभाग्य का भाव तथा द्वादश भाव मोक्ष तथा व्यय आदि का भाव भी माना जाता है | अतः नवम और द्वादश भावों से सम्बन्धित दोष दूर करने के लिए तथा बृहस्पति को प्रसन्न करने के लिए कात्यायनी देवी की पूजा अर्चना का सुझाव ज्योतिषी देते हैं |

कात्यायनी देवी के रूप में माँ भगवती सभी की रक्षा करें और सभी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

मूल मंत्र

चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना |

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ||

ध्यान

वन्दे वांछितमनोरथार्थ चन्द्रार्घकृतशेखराम् |

सिंहारूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम् ||

स्वर्णाज्ञाचक्रस्थितां षष्टाम् दुर्गां त्रिनेत्राम् |

वराभीतकरां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि ||

पट्टाम्बरपरिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणिरत्नकुण्डलमण्डिताम् ||

प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कांतकपोला तुंगकुचाम् |

कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषितनिम्ननाभिम ||

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलाम् |

स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोSस्तुते ||

पट्टाम्बरपरिधानां नानालंकारभूषिताम् |

सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोSस्तुते ||

परमानन्दमयी देवि परब्रह्म परमात्मा |

परमशक्ति परमभक्ति कात्यायनसुते नमोSस्तुते ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/03/shashtham-katyayani/