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नवरात्र और कन्या पूजन

नवरात्र और कन्या पूजन

शारदीय नवरात्र हों या चैत्र नवरात्र – माँ भगवती को उनके नौ रूपों के साथ आमन्त्रित करके उन्हें स्थापित किया जाता है और फिर कन्या अथवा कुमारी पूजन के साथ उन्हें विदा किया जाता है | कन्या पूजन किये बिना नवरात्रों की पूजा अधूरी मानी जाती है | प्रायः अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन का विधान है | देवी भागवत महापुराण के अनुसार दो वर्ष से दस वर्ष की आयु की कन्याओं का पूजन किया जाना चाहिए | आज प्रातः नौ बजकर पावन मिनट से कल प्रातः दस बजकर पचपन मिनट तक अष्टमी तिथि रहेगी | उदय काल में अष्टमी तिथि कल होने के कारण अष्टमी पूजन कल किया जाएगा | इसके बाद सात अक्तूबर को दिन में बारह बजकर अड़तीस मिनट तक नवमी तिथि रहेगी, इस प्रकार नवमी का कन्या पूजन सात अक्तूबर को होगा | प्रस्तुत हैं कन्या पूजन के लिए कुछ मन्त्र…

दो वर्ष की आयु की कन्या – कुमारी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कौमार्यै नमः

जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरूपिणी |

पूजां गृहाण कौमारी, जगन्मातर्नमोSस्तुते ||

तीन वर्ष की आयु की कन्या – त्रिमूर्ति

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं त्रिमूर्तये नम:

त्रिपुरां त्रिपुराधारां त्रिवर्षां ज्ञानरूपिणीम् |

त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम् ||

चार वर्ष की कन्या – कल्याणी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कल्याण्यै नम:
कालात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम् |

कल्याणजननीं देवीं कल्याणीं पूजयाम्यहम् ||

पाँच वर्ष की कन्या – रोहिणी पूजन

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं रोहिण्यै नम:
अणिमादिगुणाधारां अकराद्यक्षरात्मिकाम् |

अनन्तशक्तिकां लक्ष्मीं रोहिणीं पूजयाम्यहम् ||
छह वर्ष की कन्या – कालिका  

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालिकायै नम:

कामाचारीं शुभां कान्तां कालचक्रस्वरूपिणीम् |

कामदां करुणोदारां कालिकां पूजयाम्यहम् ||

सात वर्ष की कन्या – चण्डिका

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं चण्डिकायै नम:

चण्डवीरां चण्डमायां चण्डमुण्डप्रभंजिनीम् |

पूजयामि सदा देवीं चण्डिकां चण्डविक्रमाम् ||

आठ वर्ष की कन्या – शाम्भवी

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं शाम्भवीं नम:

सदानन्दकरीं शान्तां सर्वदेवनमस्कृताम् |

सर्वभूतात्मिकां लक्ष्मीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम् ||

नौ वर्ष की कन्या – दुर्गा

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं दुर्गायै नम:

दुर्गमे दुस्तरे कार्ये भवदुःखविनाशिनीम् |

पूजयामि सदा भक्त्या दुर्गां दुर्गार्तिनाशिनीम् ||

दस वर्ष की कन्या – सुभद्रा

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं सुभद्रायै नम:

सुभद्राणि च भक्तानां कुरुते पूजिता सदा |

सुभद्रजननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम् ||

|| एतै: मन्त्रै: पुराणोक्तै: तां तां कन्यां समर्चयेत ||

इन नौ कन्याओं को नवदुर्गा की साक्षात प्रतिमूर्ति माना जाता है | इनकी मन्त्रों के द्वारा पूजा करके भोजन कराके उपहार दक्षिणा आदि देकर इन्हें विदा किया जाता है तभी नवरात्रों में देवी की उपासना पूर्ण मानी जाती है | साथ में एक बालक की पूजा भी की जाती है और उसे भैरव का स्वरूप माना जाता है, और इसके लिए मन्त्र है : “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ते नम:” |

हमारी अपनी मान्यता है कि सभी बच्चे भैरव अर्थात ईश्वर का स्वरूप होते हैं और सभी बच्चियाँ माँ भगवती का स्वरूप होती हैं, क्योंकि बच्चों में किसी भी प्रकार के छल कपट आदि का सर्वथा अभाव होता है | यही कारण है कि “जब कोई शिशु भोली आँखों मुझको लखता, वह सकल चराचर का साथी लगता मुझको |”

अतः कन्या पूजन के दिन जितने अधिक से अधिक बच्चों को भोजन कराया जा सके उतना ही पुण्य लाभ होगा | साथ ही कन्या पूजन तभी सार्थक होगा जब संसार की हर कन्या शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक-सामाजिक-आर्थिक हर स्तर पर पूर्णतः स्वस्थ और सशक्त होगी और उसे पूर्ण सम्मान प्राप्त होगा |

कन्या पूजन के साथ हर्षोल्लासपूर्वक अगले नवरात्रों में आने का निमन्त्रण देते हुए माँ भगवती को विदा करें, इस कामना के साथ कि माँ भगवती अपने सभी रूपों में जगत का कल्याण करें…

यातु देवी त्वां पूजामादाय मामकीयम् |

इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/05/navaraatri-and-kanya-pujan/

 

अष्टमं महागौरी

अष्टमं महागौरी

नवदुर्गा – अष्टम नवरात्र – देवी के महागौरी रूप की उपासना

या श्री: स्वयं सुकृतीनाम् भवनेषु अलक्ष्मी:, पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि: |

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा, तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ||

देवी का आठवाँ रूप है महागौरी का | माना जाता है कि महान तपस्या करके इन्होने अत्यन्त गौरवर्ण प्राप्त किया था | ऐसी मान्यता है कि दक्ष के यज्ञ में सती के आत्मदाह के बाद जब पार्वती के रूप में उन्होंने जन्म लिया तब नारद के कहे अनुसार उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया जिसके कारण पार्वती का रंग काला और शरीर क्षीण हो गया | तब शिव ने पार्वती को गंगाजल से स्नान कराया जिसके कारण इनका वर्ण अत्यन्त गौर हो गया और इन्हें महागौरी कहा जाने लगा |

इस रूप में भी चार हाथ हैं और माना जाता है इस रूप में ये एक बैल अथवा श्वेत हाथी पर सवार रहती हैं | इनके वस्त्राभूषण श्वेत हैं और ये वृषभ पर सवार हैं – श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना – श्वेत वस्त्राभूषण धारण करने के कारण भी इन्हें महागौरी भी कहा जाता है और श्वेताम्बरी भी कहा जाता है | इनके दो हाथों में त्रिशूल और डमरू हैं तथा दो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं | यह देवी अत्यन्त सात्विक रूप है | वृषभ पर सवार होने के कारण इनका एक नाम वृषारूढ़ा भी है | अत्यन्त गौर वर्ण होने के कारण इनकी उपमा कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमा से भी दी जाती है |

माँ गौरी की उपासना का मन्त्र है:

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि: | महागौरी शुभं दधान्महादेवप्रमोददा ||

इसके अतिरिक्त श्रीं क्लीं ह्रीं वरदायै नमः” इस बीज मन्त्र के जाप के साथ भी देवी के इस रूप की उपासना की जा सकती है |

इसके अतिरिक्त कात्यायनी देवी की ही भाँति महागौरी की उपासना भी विवाह की बाधाओं को दूर करके योग्य जीवन साथी के चुनाव में सहायता करती है | महागौरी की उपासना से व्यक्ति को मिलन विकारों से मुक्ति प्राप्त होती है | माना जाता है कि सीता जी ने भी भगवान् राम को वर प्राप्त करने के लिए महागौरी की उपासना की थी |

जो Astrologers नवदुर्गा को नवग्रहों के साथ सम्बद्ध करते हैं उनका मानना है कि राहु के दुष्प्रभाव के शमन के लिए महागौरी की उपासना की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होगा |

महागौरी के रूप में माँ भगवती सभी का कल्याण करें और सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम् |

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम

पूर्णन्दुनिभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम् |

वराभीतिकरां त्रिशूलडमरूधरां महागौरी भजेम् ||

पट्टाम्बरपरिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम् |

मंजीरहारकेयूरकिंकिणीरत्नकुण्डलमण्डिताम् ||

प्रफुल्लवदनां पल्ल्वाधरां कातंकपोलां त्रैलोक्य मोहनम् |

कमनीया लावण्यां मृणालचन्दनगन्धलिप्ताम् ||

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकटहन्त्री त्वंहि धनैश्वर्यप्रदायनीम् |

ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

सुखशान्तिदात्री धनधान्यप्रदीयनीम् |

डमरूवाद्यप्रिया आद्या महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रयहारिणीम् |

वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम् ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/05/ashtamam-mahagauri/

 

शारदीय नवरात्र

शारदीय नवरात्र – सप्तम नवरात्र – देवी के कालरात्रि रूप की उपासना

त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं समरमूर्धनि तेSपि हत्वा ।

नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तमस्माकमुन्मदसुरारि भवन्न्मस्ते ।।

नवदुर्गा में देवी का सातवाँ रूप कालरात्रि है | दश महाविद्याओं में सबसे प्रथम नाम कालरात्रि का ही आता है तथा तान्त्रिक विधि से इनकी उपासना की जाती है | कालरात्रि – सबका अन्त करने वाले काल की भी रात्रि अर्थात् विनाशिका – जो किसी भी बुराई के लिए रात्रि अर्थात मृत्यु के सामान हो – ऐसी देवी | इस रूप में इनके चार हाथ हैं और ये गधे पर सवार दिखाई देती हैं | इनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और पाश दिखाई देते हैं | एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है | इस रूप में इनका वर्ण श्याम है तथा ये प्रतिकार अथवा क्रोध की मुद्रा में दिखाई देती हैं | श्यामवर्णा होने के कारण भी इन्हें कालरात्रि कहा जाता है | इस मुद्रा में इनका भाव अत्यन्त कठोर तथा उत्तेजित दिखाई देता है | देवी का यह आक्रामक तथा नकारात्मक रूप है |

कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता |

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ||

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा |

वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयन्करि ||

दैत्यों के बढ़ते आतंक को देख देवी का मुख क्रोध से काला पड़ गया था और अत्यन्त भयानक मुद्रा हो गई थी | देवी के इसी रूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है |

ततः कोपं चकारोच्चै: अम्बिका तानरीन् प्रति, कोपेन चास्या वदनमसीवर्णमभूत्तदा ||

दैत्य शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था । इससे चिंतित होकर सभी देवतागण शिव जी के पास गए । शिव जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने की प्रार्थना की । शिव जी की बात मानकर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया तथा शुम्भ-निशुम्भ का वध कर दिया । लेकिन जैसे ही देवी रक्तबीज का वध करने को उद्यत हुईं तो उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न होते चले गए । इसे देख देवी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया, जिसने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया ।

क्लीं ऐं श्रीं कालिकायै नमः” कालरात्रि का बीज मन्त्र है और इस मन्त्र के जाप के द्वारा इनकी उपासना करने से ये प्रसन्न होती हैं |

इनकी पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें शुभंकारी भी कहते हैं । यह रूप इस कटु सत्य का द्योतक भी है कि जीवन सदा आह्लादमय और सकारात्मक ही नहीं होता | जीवन का एक दूसरा पक्ष भी होता है जो दुष्टतापूर्ण, निन्दनीय, अन्धकारमय अथवा नकारात्मक भी हो सकता है | आज जिस तरह से रक्तबीज की भाँति अनगिनत आतंकी उत्पन्न होते जा रहे हैं उनके विनाश के लिए तो कालरात्रि के ही रूप की आवश्यकता है | क्योंकि दुष्ट का संहार दुष्टता से ही किया जा सकता है |

सम्भवतः इनके रूप के कारण ही दुर्गा के नौ रूपों को नवग्रहों का प्रतीक मानने वाले कुछ Astrologer ऐसा मानते हैं कि भगवती का यह रूप शनि का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही शनि की ही भाँति प्रसन्न हो जाएँ तो “शुभंकरी” भी हो जाती हैं | व्यवसाय में उन्नति तथा आर्थिक समस्याओं के लिए सम्भवतः इसीलिए कालरात्रि की उपासना का सुझाव कुछ ज्योतिषी देते हैं | और सम्भवतः यही कारण है कि शनि की उपासना कालरात्रि की उपासना के रूप में भी की जा सकती है…

माँ भगवती देवी कालरात्रि के इस रूप में हम सबके जीवन से नकारात्मकता और अज्ञान के अन्धकार का नाश करके सकारात्मकता और ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित करें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/15/shardiya-navaratra-6/

 

शारदीय नवरात्र

शारदीय नवरात्र – पञ्चम नवरात्र – देवी के स्कन्दमाता रूप की उपासना

सौम्या सौम्यतराशेष सौम्येभ्यस्त्वति सुन्दरी,

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी |

पञ्चम स्कन्दमातेति – देवी का पञ्चम स्वरूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है और नवरात्र के पाँचवें दिन माँ दुर्गा के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। कुमार कार्तिकेय को ही “भगवान स्कन्द” के नाम से जाना जाता है । स्कन्दमाता की चार भुजाएँ हैं जिनमें से दो हाथों में कमल का पुष्प धारण किये हुए हैं, एक भुजा ऊपर की ओर उठी हुई है जिससे वह भक्तों को आशीर्वाद देती हैं तथा एक हाथ से उन्होंने गोद में बैठे अपने पुत्र स्कन्द को पकड़ा हुआ है । इनका वाहन सिंह है । देवी का यह ममतामय रूप है | कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति भी माना जाता है । शिव-पार्वती का विवाह ही कुमार कार्तिकेय अर्थात स्कन्द के जन्म के निमित्त हुआ था जिससे कि यह पराक्रमशाली कुमार तारकासुर जैसे राक्षस का संहार कर सके | छान्दोग्यश्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, और उन स्कन्द की माता होने के कारण ये स्कन्दमाता कहलाती हैं | इसीलिये यह रूप एक उदार और स्नेहशील माता का रूप है |

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः |

जब धरती पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ता है माता अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का नाश करने निकल पड़ती हैं । युद्ध के लिए निकलना है लेकिन पुत्र के प्रति अगाध स्नेह भी है, माँ के कर्तव्य का भी निर्वाह करना है, साथ ही युद्ध में प्रवृत माँ की गोद में जब पुत्र होगा तो उसे बचपन से ही संस्कार मिलेंगे कि आततायियों का वध किस प्रकार किया जाता है – क्योंकि सन्तान को प्रथम संस्कार तो माँ से ही प्राप्त होते हैं – इन सभी तथ्यों को दर्शाता देवी का यह रूप है |

निम्न मन्त्र के जाप के साथ माँ स्कन्दमाता की अर्चना का विधान है:

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया,

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी

इसके अतिरिक्त ऐं ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नमः” माँ स्कन्दमाता के इस बीज मन्त्र का भी जाप किया जा सकता है |

जो Astrologer दुर्गा के नौ रूपों को नवग्रहों से सम्बद्ध करके देखते हैं उनकी मान्यता है कि भगवती का यह रूप बुध का प्रतिनिधित्व करता है तथा व्यक्ति के Horoscope में तीसरे और छठे भाव का आधिपत्य इनके पास है | इसीलिए माना जाता है कि तीसरे और छठे भाव से सम्बन्धित कोई भी समस्या हो – जैसे भिया बहनों के साथ किसी प्रकार की समस्या हो अथवा किसी प्रकार का कोर्ट केस इत्यादि हो तो उनके लिए तथा बुध की अनुकूलता के लिए या उसके प्रतिकूल प्रभाव की शान्ति के लिए स्कन्दमाता की पूजा अर्चना की जानी चाहिए | ऐसा भी मानते हैं कि अपनी सन्तान के सौभाग्य के लिए माताओं को स्कन्दमाता की उपासना करनी चाहिए |

मान्यताएँ जो भी हों, हमारी यही कामना है कि देवी भगवती माँ स्कन्दमाता के रूप में अपनी समस्त सन्तानों की रक्षा करें और सबके लिए शुभदायिनी हों…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/10/12/shardiya-navaratra-4/

 

नवरात्रों में घट स्थापना

आज पितृविसर्जनी अमावस्या है, सभी ने अपने पितृगणों को सम्मानपूर्वक विदा किया है | और अब कल से समस्त हिन्दू सम्प्रदाय में घर घर में माँ भगवती की पूजा अर्चना का दशदिवसीय उत्सव शारदीय नवरात्र के रूप में आरम्भ हो जाएगा | सर्वप्रथम सभी को शारदीय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ…

भारतीय वैदिक परम्परा के अनुसार किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को करते समय सर्वप्रथम कलश स्थापित करके वरुण देवता का आह्वाहन किया जाता है | आश्विन और चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा को घटस्थापना के साथ माँ दुर्गा की पूजा अर्चना आरम्भ हो जाती है | घट स्थापना के मुहूर्त पर विचार करते समय कुछ विशेष बातों पर ध्यान रखना आवश्यक होता है | सर्वप्रथम तो अमायुक्त प्रतिपदा – अर्थात सूर्योदय के समय यदि कुछ पलों के लिए भी अमावस्या तिथि हो तो उस प्रतिपदा में घट स्थापना शुभ नहीं मानी जाती | इसी प्रकार चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में घटस्थापना अशुभ मानी जाती है | माना जाता है कि चित्रा नक्षत्र में यदि घट स्थापना की जाए तो धननाश और वैधृति योग में हो तो सन्तान के लिए अशुभ हो सकता है | साथ ही देवी का आह्वाहन, स्थापन, नित्य प्रति की पूजा अर्चना तथा विसर्जन आदि समस्त कार्य प्रातःकाल में ही शुभ माने जाते हैं | किन्तु यदि प्रतिपदा को सारे दिन ही चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग रहें या प्रतिपदा तिथि कुछ ही समय के लिए हो तो आरम्भ के तीन अंश त्याग कर चतुर्थ अंश में घटस्थापना का कार्य आरम्भ करना चाहिए | जैसे इस वर्ष शारदीय नवरात्रों में यों तो 9 अक्टूबर को प्रातः सवा नौ बजे के लगभग प्रतिपदा तिथि का आगमन हो जाएगा, किन्तु अमायुक्त प्रतिपदा होने के कारण नौ तारीख़ को घट स्थापना नहीं की जा सकती | दस अक्टूबर बुधवार को ही घट स्थापना की जाएगी | इस दिन प्रातः सात बजकर चौबीस मिनट तक ही प्रतिपदा तिथि रहेगी और उस समय चित्रा नक्षत्र तथा वैधृति योग भी रहेगा, किन्तु प्रतिपदा का अन्तिम अंश होगा इसलिए इसी मुहूर्त में घट स्थापना की जाएगी |

नवरात्र में जौ की खेती

घट स्थापना करते समय जो मन्त्र बोले जाते हैं उनका संक्षेप में अभिप्राय यही है कि घट में समस्त ज्ञान विज्ञान का, समस्त ऐश्वर्य का तथा समस्त ब्रह्माण्डों का समन्वित स्वरूप विद्यमान है | किसी भी अनुष्ठान के समय घट स्थापना के द्वारा ब्रहमाण्ड में उपस्थित शक्तियों का आह्वाहन करके उन्हें जागृत किया जाता है ताकि साधक को अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त हो और उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण हों | साथ ही घट स्वयं में पूर्ण है | सागर का जल घट में डालें या घट को सागर में डालें – हर स्थिति में वह पूर्ण ही होता है तथा ईशोपनिषद की पूर्णता की धारणा का अनुमोदन करता प्रतीत होता है “पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते” | इसी भावना को जीवित रखने के लिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के समय घटस्थापना का विधान सम्भवतः रहा होगा |

नवरात्रों में भी इसी प्रकार घट स्थापना का विधान है | घट स्थापना के समय एक पात्र में जौ की खेती का भी विधान है | अपने परिवार की परम्परा के अनुसार कुछ लोग मिट्टी के पात्र में जौ बोते हैं तो कुछ लोग – जिनके घरों में कच्ची ज़मीन उपलब्ध है – ज़मीन में भी जौ की खेती करते हैं | किन्हीं परिवारों में केवल आश्विन नवरात्रों में जौ बोए जाते हैं तो कहीं कहीं आश्विन और चैत्र दोनों नवरात्रों में जौ बोने की प्रथा है | इन नौ दिनों में जौ बढ़ जाते हैं और उनमें से अँकुर फूट कर उनके नौरते बन जाते हैं जिनके द्वारा विसर्जन के दिन देवी की पूजा की जाती है | कुछ क्षेत्रों में बहनें अपने भाइयों के कानों में और पुरोहित यजमानों के कानों में आशीर्वाद स्वरूप नौरते रखते हैं | इसके अतिरिक्त कुछ जगहों पर शस्त्र पूजा करने वाले अपने शस्त्रों का पूजन भी नौरतों से करते है | कुछ संगीत के क्षेत्र से सम्बन्ध रखने वाले कलाकार अपने वाद्य यन्त्रों की तथा अध्ययन अध्यापन के क्षेत्र से सम्बद्ध लोग अपने शास्त्रों की पूजा भी विजय दशमी को नौरतों से करते हैं |

वास्तव में नवरात्रों में जौ बोना आशा, सुख समृद्धि तथा देवी की कृपा का प्रतीक माना जाता है | ऐसी भी मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहली फसल जो उपलब्ध हुई वह जौ की फसल थी | इसीलिए इसे पूर्ण फसल भी कहा जाता है | यज्ञ आदि के समय देवी देवताओं को जौ अर्पित किये जाते हैं | एक कारण यह भी प्रतीत होता है कि अन्न को ब्रह्म कहा गया है और उस अन्न रूपी ब्रह्म का सम्मान करने के उद्देश्य से भी सम्भवतः इस परम्परा का आरम्भ हो सकता है | आज न जाने कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें दो समय भोजन भी भरपेट नहीं मिल पाता | और दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपनी प्लेट में इतना भोजन रख लेते हैं कि उनसे खाए नहीं बन पाता और वो भोजन कूड़े के डिब्बे में फेंक दिया जाता है | यदि हम अन्न रूपी ब्रह्म का सम्मान करना सीख जाएँ तो इस प्रकार भोजन फेंकने की नौबत न आए और बहुत से भूखे व्यक्तियों को भोजन उपलब्ध हो जाए | जौ बोने की परम्परा को यदि हम इस रूप में देखें तो सोचिये प्राणिमात्र का कितना भला हो जाएगा |

अस्तु! इन नवरात्रों में हम अन्न ब्रह्म का सम्मान करने की भावना से जौ की खेती अपने घरों में स्थापित करें… हमारी भावनाएँ उदात्त होंगी तो खेती भी फलेगी फूलेगी और कोई व्यक्ति  रात को भूखा नहीं सो सकेगा… साथ ही जल का सम्मान करने की भावना से घट स्थापित करें…

नवरात्रों की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ… माँ भवानी सभी का मंगल करें…

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