फ्रेण्डशिप डे

आज “फ्रेण्डशिप डे” है… यानी “मैत्री दिवस”… सभी मित्रों को हार्दिक बधाई भी और धन्यवाद भी साथ जुड़े रहने के लिए…

यों तो आज इस सोशल मीडिया की मेहरबानी से हर दिन ही “मैत्री दिवस” होता है – क्योंकि हर दिन मित्रों से वार्तालाप यानी “चैटिंग” होती रहती है… पर एक विशेष दिन को मित्रों के नाम कर देना वास्तव में सुखद अनुभूति है…

हमें याद है जब हम बच्चे थे उन दिनों बस स्कूल के मित्र स्कूल में मिल जाया करते थे और स्कूल की छुट्टी हुई तो सब अपने अपने घर | किसी का दूसरे के घर आना जाना भी कभी कभार ही हो पाता था | टेलीफोन की सुविधा भी उन दिनों कोई बहुत अच्छी नहीं थी | रिसीवर उठाने पर एक्सचेंज से कभी नींद में अलसाई हुई कुछ जमुहाई लेती सी किसी महिला की या कभी किसी पुरुष की एक कड़क सी आवाज़ आती थी “हाँ जी नम्बर बताइये किस पर बात करनी है…” फिर उन्हेई नम्बर बताया जाता था “जी 120 मिला दीजिये प्लीज़…” या फिर बच्चे अगर कभी उस आवाज़ को सुनकर खुन्दक में आ गए तो उसी की नक़ल करके रूखेपन से बोलते थे “120…” तब वो ऑपरेटर नम्बर मिलाकर बोलता था या बोलती थी “हाँ लीजिये बात कीजिए…” तब कहीं जाकर बात हो पाती थी | और वो भी आवश्यक नहीं था कि हर घर में टेलीफोन हो ही | मुश्किल से सौ के लगभग घरों में टेलीफोन होंगे उन दिनों – या हो सकता है और भी कम हों – क्योंकि हमारे सारे परिचितों के नम्बर दो अंकों में थे |

लेकिन फिर भी हम सब बच्चों की दोस्ती हर दिन बढ़ती ही जाती थी | उन दिनों सुबह का स्कूल हुआ तो स्कूल की छुट्टी के बाद घर आकर कपड़े बदल कर और लंच करके सो जाया करते थे कुछ देर के लिए – क्योंकि घर में हर किसी को नींद आ रही होती थी इसलिए बच्चों को भी सोने के लिए विवश किया जाता था | पर बच्चे तो बच्चे, कहाँ चुपचाप सो सकते हैं – वो भी भरी दुपहरी में | सो, बीच में सर उठाकर देखते कि पास में लेटी माँ चाची बुआ सो गई हैं या नहीं | वो लोग भी ऐसी ढीठ होती थीं कि आसानी से सोती नहीं थीं | उनकी नज़र हम बेचारे बच्चों पर ही रहती थी कि बाहर धूप में खेलने के लिए न निकलें और आराम से सो जाएँ | तो हमारे सर उठाते ही सर नीचे दबा दिया जाता था “सो जाओ चुप करके, वरना…” और हमारा सर फिर तकिये पर |

खैर, जैसे तैसे करके वो शुभ घड़ी भी आ जाती थी कि हमारे पास सो रही सारी महिलाएँ खर्राटे लेने लगती थीं – दोपहर तक के काम काज से थकी हुई जो होती थीं | बस  फिर क्या था, हम सब बच्चे अपने अपने सर उठाकर एक दूसरे को इशारा करते थे और धीरे से पलंग से उठकर दबे पाँव कमरे से निकल भागते थे | लेकिन बाहर निकल कर फिर अगले पहरे को देखना होता था – जहाँ घर के नौकर चाकर या बड़े भाई बन्धु सुस्ता रहे होते थे | अगर जाग रहे हैं तो उनकी चापलूसी करके भाग जाते थे बाहर चबूतरे पर | मुहल्ले पड़ोस के बच्चे भी इसी तरह भाग आते थे और फिर मचाते थे धमा चौकड़ी | हम सभी बच्चे आपस में बड़े अच्छे मित्र हुआ करते थे | साथ खेलना कूदना, लड़ना झगड़ना और फिर से एक हो जाना | घरवाले कभी बच्चों के बीच में नहीं पड़ते थे |

उधर, एक दो घन्टे सोने के बाद महिलाओं की आँख खुल जाती थी | जागती तो नींद पूरी होने पर ही थीं पर दोष हमारे सर मढ़ा जाता था “क्या बात है… कितना शोर मचाते हो भर दुपहरी… न सोते हो न सोने देते हो… नींद भी पूरी नहीं होने दी तुम सबके शोर ने… चलो अब भीतर आकर हाथ मुँह साफ़ करो, नहाओ और नाश्ता करके पढ़ाई लेकर बैठो…” और इस तरह हम बच्चों की आज़ादी का हो जाता था ख़ात्मा… मुँह बनाते हम सब फिर घर के भीतर…

दिन का स्कूल होता था तो शाम शाम चार बजे तक छुट्टी होती थी | सर्दियों में दिन भी छोटे ही होते हैं तो शाम से ही धुंधलका छा जाता था | ऐसे में घर आकर फिर बाहर जाने का तो प्रश्न ही नहीं था | घर पहुँचकर कुछ देर घर में ही खेल कूद करके फिर पढ़ने बैठा दिया जाता था |बहुत हुआ तो घर में ही बेडमिन्टन खेल लिया, कैरम लेकर बैठ गए | बहुत छुटपन में तो दोस्तों के साथ मिलकर गुड़िया गुड्डे का ब्याह भी रचाया था | लेकिन अपने घर पर ही | वहीं सारे मित्र आ जाया करते थे |

कहने का अभिप्राय ये कि स्कूल के दोस्तों से घर वापस आने के बाद फिर मिलना नहीं होता था | हाँ किसी को कोई काम पूछना है तो वो लोग घर आ जाते थे और साथ बैठकर पढ़ाई करते समय कुछ गप्पें भी हो जाया करती थीं | हाँ हमारे घर के सामने सुल्लढ़ रहा करते थे उनका चबूतरा कच्चा था तो वहाँ कुछ देर के लिए कंचा गोली या गिल्ली डंडा खेलने के लिए जाने की इज़ाज़त घरवालों ने दी हुई थी | मुहल्ले के लड़के लड़कियों के साथ वहाँ धमा चौकड़ी हर रोज़ मचा करती थी | बड़ा मज़ा आया करता था | बीच बीच में कभी कभार सुल्लढ़ चाचा को हमारे शोर से गुस्सा भी आ जाया करता था और चबूतरे पर आकर मीठी झिड़की भी दे दिया करते थे, पर हम बच्चे कहाँ सुनने वाले थे |

कॉलेज गए तो उस समय तक टेलीफोन की सुविधाएँ पहले से कुछ बेहतर हो गई थीं और काफ़ी घरों में फोन लग गए थे | तो कॉलेज से आने के बाद कभी कभार फोन पर बात हो जाया करती थी मित्रगणों से | या फिर साथ बैठकर नोट्स बनाने हैं तो किसी एक के घर पहुँच जाया करते थे | पर क्योंकि अब “कुछ बड़े” हो गए थे तो मित्रों के साथ कभी कभार घूमने फिरने या सिनेमा देखने की छूट भी मिल गई थी | पर वो सब भी कभी हफ़्ता दस दिन में ही नम्बर आता था | कॉलेज के कैन्टीन में तो माहौल ऐसा रहता था जैसे देश की सारी समस्याओं को हल करने का जिम्मा हम लोगों का ही था | या फिर देश की बातें नहीं तो साहित्यकारों या संगीतकारों पर बहस | कभी कभी बड़ा गरमा भी जाता था माहौल – मसलन मुँशी प्रेमचन्द वाले दोस्तोयव्स्की वालों से भिड़ जाते थे या फिर शेक्सपियर वाले कालिदास वालों से… रफ़ी साहब वाले मन्ना डे वालों से या फिर कुमार गन्धर्व वाले पण्डित भीमसेन जोशी वालों से… वगैरा वगैरा… पर उसका भी एक अलग ही आनन्द था…

या फिर होली पर एक साथ मिलकर एक दूसरे पर रंग डालना, हुल्लड़ मचाना, दिवाली पर पटाखे फुलझड़ी छुड़ाना और ऐसे ही कई छोटे बड़े तीज त्यौहारों पर ख़ूब मस्ती हुआ करती थी | स्कूल कॉलेज से पिकनिक पर भी जाना हुआ करता था |

फिर जब काम से लग गए तब तो पूरी तरह उसी में खो गए थे | वहीं साथ के लोगों से थोड़ी बहुत गप्पबाज़ी हो जाया करती थी | बहुत ज़्यादा दोस्तों के साथ घूमना फिरना गप्पें लगाना उन दिनों चलन में नहीं था | जीवन बहुत सादा था – सुविधाएँ सीमित थीं – जितना हो सकता था हो जाता था | हालाँकि पुराने कुछ मित्रों से आज भी मित्रता यथावत है – पर कोई कहीं है तो कोई कहीं – हर कोई अपनी अपनी घर गिरस्ती में उलझा हुआ है – तो उतना मिलना निश्चित रूप से नहीं हो पाता है | लेकिन सोशल मीडिया ने बहुत सहायता की है उन सबके साथ सम्पर्क बनाए रखने में – साथ ही नए मित्र बनाने में | तो आज के लिहाज़ से देखा जाए तो ये “फ्रेण्डशिप डे” वास्तव में एक बहुत मायने रखता है | उस समय कुछ दूसरी तरह का समाज और व्यस्तताएँ थीं पर “फ्रेण्डशिप डे” जैसा कुछ नहीं था – जो सारे मित्र मिलकर मना लिया करते या अपने घरों में बैठे ही किसी एक विशेष दिन एक दूसरे को “विश” कर दिया करते | आज वो समय और सुविधाएँ हैं कि घर बैठे मोबाइल या लैपटॉप पर अंगुलियाँ घुमाकर मित्रों को शुभकामना सन्देश भेजे जा सकें तो क्यों न मित्रों को इसके लिए और उनकी सुख समृद्धि के लिए शुभकामनाएँ दी जाएँ… पर सीमित सुविधाओं और उस समय की पारिवारिक और सामाजिक परिस्थियों के चलते भी जितने मित्र बने और पीछे छूट गए वे वास्तव में आज भी याद आते हैं, और मन अपनी ही एक पुरानी रचना दोहराने लगता है “काश के बचपन एक बार फिर अपना रंग दिखा जाता…”

बचपन के वे सारे साथी कोई मुझे लौटा जाता, कहाँ और कैसे हैं, इतना कोई मुझे बतला जाता ||

वो कंचे की गोली और वो गिल्ली पर डंडे की मार, सुल्लड़ के कच्चे चबूतरे पर होती थी जीत या हार |

शोर मचाते, सुल्लड़ आके मीठी झाड़ पिला जाता ||

कभी खींचना बाल, कभी टंगड़ी दे मुझे गिरा देना, और मेरा अंकल से कहकर मार उसे पिटवा देना |

ना जाने क्यों, यह सबही तो मुझको आज रुला जाता ||

वो मेरी नन्ही सी गुड़िया और सुनील का प्यारा गुड्डा, धूम धाम से उनका फिर वह ब्याह रचाना ढोल बजाना |

इसी तरह हर रोज़ नया कोई गुल देखो खिलता जाता ||

घर में धमा चौकड़ी, बदले में माँ की मीठी झिड़की, आज तलक भी सारी बातें मुझको नई नई लगतीं |

काश कि बचपन एक बार फिर अपना रंग दिखा जाता ||

Swas & Friends

 

 

 

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