हिन्दी दिवस – एक औपचारिकता ?

पिछले चार पाँच दिनों से निमन्त्रण पत्र प्राप्त हो रहे थे | “हिन्दी दिवस” के उपलक्ष्य में कुछ सँस्थाओं द्वारा काव्य सन्ध्याओं का आयोजन किया गया तो कुछ ने परिचर्चाओं का आयोजन किया कि किस तरह अपनी “मातृभाषा” को युवा तथा जीवित रखा जाए… आदि विषयों पर… बड़ा अच्छा लगा ये सब देखकर कि अपनी “मातृभाषा” के लिए लोग इतने चिन्तित हैं… सोच रहे थे कि इतने लोग इतना कुछ लिख चुके हैं हिन्दी दिवस के सन्दर्भ में तो हम पुनरावृत्ति ना ही करें तो अच्छा होगा… पर लिखे बिना रहा नहीं गया…

आज तो हद ही हो गई जब सवेरे से “हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं” के इतने सारे सन्देश प्राप्त हुए जितने शायद हमारे जन्मदिन की शुभकामनाओं के भी नहीं मिलते होंगे | अच्छा भी लगा ये सब देखकर, पर फिर भी सोचने पर विवश हो गई कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है तो एक दिन ही हिन्दी के लिए समर्पित किसलिए ? एक दिन “हिन्दी दिवस” के उपलक्ष्य में गोष्ठियाँ होती हैं, हिन्दी को जीवित कैसे रखा जाए – आदि विषयों पर परिचर्चाओं का आयोजन किया जाता है – समाचार पत्रों और समाचार चैनल्स पर बड़ी बड़ी परिचर्चाओं में नामी गिरामी हस्तियाँ भाग लेती हैं – कुछ सुझावों का आदान प्रदान किया जाता है – कुछ योजनाएँ बनाई जाती हैं – और इस एक दिन की गहमा गहमी के बाद सब वापस ठण्डे बस्ते में चला जाता है और हमारे परिवारों के बच्चे बड़ी शान से अपनी माँओं से पूछते हैं “मम्मी उन्नीस मतलब कितना हुआ?”

और इसमें ग़लती उन बच्चों की नहीं है, आज की माताएँ भी बच्चे के जन्म लेते ही उसके साथ हिन्दी में वार्तालाप करने के स्थान पर उसे बोलना शुरू कर देती हैं “ओह, डोंट क्राई माई बेबी… ममा इज़ कमिंग… ओके, यू आर हंग्री, ममा विल फीड यू…” या बच्चे किसी के घर जाकर शोर मचाते हैं तो माताएँ उन पर चिल्लाती हुई बोलती हैं “शाउट मत करो… आंटी के उस रूम में एक घोस्ट है… आंटी वहाँ लॉक कर देंगी आपको…” जैसे उनका जन्म किसी अँग्रेज़ी बोलने वाले देश में हुआ हो ।

आज हममें से बहुतेरों की स्थिति ऐसी है कि हम सोचते हिन्दी या हिन्दुस्तानी में हैं लेकिन बोलते अंग्रेजी में हैं | क्या ये सब हास्यास्पद नहीं लगता ? क्या इस अंग्रेज़ियत की गुलामी वाली सोच को हमेशा को बदलने के लिए हर दिन “हिन्दी दिवस” नहीं होना चाहिए ?

माना आज अंग्रेज़ी विश्व स्तर पर जनसम्पर्क की भाषा है और आगे बढ़ना है – देश को विश्व स्तर पर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर रखना है – तो अंग्रेज़ी के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता | लेकिन जब हम अपनों के मध्य हैं – अपने परिवार में हैं – अपने सामान भाषा-भाषी मित्रों के बीच हैं – तब तो हमें हिन्दी बोलने-लिखने-पढ़ने में कोई शर्म नहीं आनी चाहिए – कोई हीनभावना हममें नहीं आनी चाहिए…

आप संसार के किसी भी देश में चले जाइए – हर देश में उनकी अपनी भाषा लिखी-पढ़ी-बोली जाती है | कारण, वे लोग अपनी ही भाषा में सोचते हैं तो निश्चित रूप से उसी भाषा में लिखने-पढ़ने-बोलने में सक्षम होंगे | और उन सबको अपनी अपनी भाषाओं को बोलने में गर्व का अनुभव होता है | उनके मन में कभी इस बात के लिए हीन भावना नहीं आती कि अंग्रेज़ी में बात नहीं करेंगे तो लोग क्या कहेंगे ?

और दूर क्यों जाएँ ? हमारे अपने देश में ही बंगाली अपनी भाषा में बात करते हैं तो दक्षिण भारतीय अपनी अपनी भाषाओं में धाराप्रवाह वार्तालाप करते हैं | फिर हिन्दीभाषी क्षेत्रों के लोगों के मन में हिन्दी को लेकर हीन भावना क्यों है ?

“वसुधैव कुटुम्बकम्” का नारा देकर संसार की समस्त संस्कृतियों को अपनी संस्कृति के साथ मिला लेने की सामर्थ्य रखने वाले हमारे देश की मातृभाषा तो वास्तव में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की मिसाल है | न जाने कितनी भाषाओं को, न जाने कितनी क्षेत्रीय बोलियों को हिन्दी ने आत्मसात् किया हुआ है | जिस भाषा का “हृदय” इतना विशाल है उसी भाषा के प्रति इतनी उदासीनता तथा उसमें वार्तालाप करने में इतनी हीनभावना किसलिए ? कहीं “हिन्दी दवस” के आयोजन मात्र औपचारिकता भर ही तो नहीं हैं ? विचारणीय प्रश्न है…

हिन्दी दिवस

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शुभ प्रभात

आज हम सभी किसी न किसी बात से चिन्तित रहते हैं | किसी ने हमारी बात नहीं सुनी या हमें “तू” करके बोल दिया – हमें अपना अपमान लगने लगता है | रात दिन इस बात की चिन्ता सताती रहती है कि जो कुछ हमारे पास है – धन, सम्पत्ति, परिवार, मान-प्रतिष्ठा – कुछ भी – वो कोई छीन न ले या उसकी हानि न हो जाए | बीमारी का भय, मृत्यु का भय, किसी प्रकार के अभाव का भय, असफलता का भय – न जाने कितने प्रकार के भयों के साए में हम सब अपना जीवन व्यर्थ गँवा देते हैं | यदि हम उस परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर निष्काम भाव से अपने समत कर्म करते रहेंगे तो किसी प्रकार का भय हमें सताएगा ही नहीं और जीवन सरल तथा सुखी हो जाएगा |

भय

क्षमावाणी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ

क्षमावाणी

शुभ प्रभात – शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन के जन्म दिवस “शिक्षक दिवस” की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ |

हम कोई भी कार्य करते हैं तो हमसे यही कहा जाता है कि परिश्रम करोगे तो फल अच्छा मिलेगा और कार्य में सफलता भी प्राप्त होगी | सही बात है | बिना परिश्रम के कुछ भी प्राप्त नहीं होता | सामने भोजन की थाली रखी है, लेकिन जब तक हम हाथ बढ़ाकर भोजन थाल में से उठाकर मुँह तक ले जाने का श्रम नहीं करेंगे तब तक हमें भूखा ही रहना पड़ेगा | इसलिए परिश्रम की तो नितान्त आवश्यकता है | किन्तु परिश्रम किस प्रकार का हो |

हर व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है और उसके लिए प्रयास भी करता है | लेकिन जब यह प्रयास – यह परिश्रम उचित दिशा में नहीं किया जाएगा तब तक सफलता प्राप्त होने में सन्देह ही रहेगा | और यह उचित दिशा दिखाते हैं हमारे शिक्षक – हमारे गुरुजन | सबसे पहली गुरु होती है हमारी माता | उसके बाद पिता | और फिर हमारे शिक्षक | इन समस्त गुरुओं का स्थान तो ईश्वर से भी ऊँचा बताया गया है | तभी तो कबीर ने कहा है: गुरु गोबिन्द दौऊ खड़े, काके लागूँ पाँय, बलिहारी गुरु आपने जिन गोबिन्द दियो मिलाए |

तो, हमारे शिक्षक – हमारे गुरुजन – मानसिक, सामाजिक, आध्यात्मिक हर दिशा में हमारा मार्गदर्शन करते हैं और उसी मागदर्शन से हमारी इच्छाशक्ति दृढ़ होती है, तथा किसी भी स्वप्न को साकार करने के लिए – किसी भी कार्य में सफलता के लिए “योग्य गुरु” द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन की ही आवश्यकता होती है |

ऐसे सदगुरुओं को नमन के साथ एक बार पुनः सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ |

दृढ़ इच्छाशक्ति

सत्ता जो हो जाती है असत्य

नृत्य क्या है / जीवन जीने की एक कला

इसीलिए तो समूचा जीवन ही है एक नृत्य

मस्ती में भर / भूलकर सारा विषाद / मिलकर एक दूसरे के साथ

वैसे ही जैसे / किया नृत्य नटवर नागर ने

तो हुआ पूर्ण वो नृत्य / राधा के महारास के साथ

नटराज ने मचाया ताण्डव

तो शान्त किया हिमसुता ने / रचकर मधुर लास्य

रचाती रहती है नित नवीन नृत्य / ब्रहमाण्ड के रंगमंच पर / प्रकृति नटी

क्योंकि नृत्य है एक ऐसा राग / जो हो जाता है परिणत विराग में

क्योंकि नृत्य है एक ऐसी आग / जो हो जाती है परिणत आह्लाद में

इसीलिए करती हूँ मैं नृत्य / रचाती हूँ महारास / बनकर प्रकृतिरूपा

उठाती हूँ दोनों हाथों को आकाश की ओर

और हस्तक बना / भर लेती हूँ सारा आकाश अपने हाथों में

घूमती हूँ बिन्दु के सामान / लेती हूँ अनेको तिहाईयाँ / आवर्तन / गतें और परनें

लख कर मेरा मादक नृत्य / थिरक उठते हैं पाँव विराट के भी

झूम उठता है सकल जड़ चेतन / जब साथ में मेरे झूमता है विराट

बढ़ती जाती है गति / बढ़ते जाते हैं आवर्त / हर गत पर / हर भाव पर

नहीं टोकती कोई मुद्रा मुझे / नहीं करती कोई इशारा / रुक जाने का

और मैं नाचती जाती हूँ / घूमती जाती हूँ बिना रुके / बेदम तिहाइयों पर

उन्माद में भर घूमती घूमती / हो जाती हूँ एक / उस विशाल के साथ

हो जाती हूँ चेतनाशून्य / और खो जाती हूँ उस शून्य में

आनन्द के उस क्षण में / जी लेती हूँ सारा जीवन एक ही साथ

आनन्द के उस क्षण में / जब हो जाता है शिथिल मेरा मन

भूल जाती हूँ सारा ज्ञान / सारी उपलब्धियाँ

और कर देती हूँ समर्पित स्वयं को / उस असीम के लिए

हो जाती हूँ विलीन उसमें ही / सदा सदा के लिए

यही है सत्ता का सत्य / जो हो जाती है असत्य / जब मिल जाती है उस चरम सत्य में…

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दशलाक्षण पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ

मित्रों, आज १९ अगस्त से २६ अगस्त तक श्वेताम्बर जैन मतावलम्बियों का पर्यूषण पर्व आरम्भ हो चुका है | पर्यूषण के अन्तिम दिन यानी २६ अगस्त से दिगम्बरों के पर्यूषण पर्व अर्थात क्षमावाणी पर्व और दशलाक्षण पर्व का आरम्भ हो जाएगा जो ५ सितम्बर को सम्पन्न होगा | यों तो साल में तीन बार दशलाक्षण मनाया जाता है, लेकिन भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (अनन्त चतुर्दशी) तक मनाए जाने वाले पर्व का विशेष महत्त्व माना जाता है | इसका मुख्य कारण है इसमें आने वाला साम्वत्सरिक पर्व | यह साम्वत्सरिक पर्व पर्यूषण का ही नही वरन् समस्त जैन धर्म का प्राण है । इस दिन साम्वत्सरिक प्रतिक्रमण किया जाता है जिसके द्वारा वर्ष भर में किए गए पापों का प्रायश्चित्त करते हैं । साम्वत्सरिक प्रतिक्रमण के बीच में ही सभी ८४ लाख जीव योनी से क्षमा याचना की जाती है । नवरात्रों की ही भाँति पर्यूषण पर्व भी संयम और आत्मशुद्धि के पर्व हैं | इन पर्वों में त्याग, तप, उपवास, परिष्कार, संकल्प, स्वाध्याय और आराधना पर बल दिया जाता है |

भारत के अन्य दर्शनों की भाँति जैन दर्शन का भी अन्तिम लक्ष्य सत्यशोधन करके परमानन्द की उपलब्धि करना है | इसे ही तत्वज्ञान कहते हैं | धर्म चाहे कोई भी हो, यदि उसमें तत्वज्ञान नहीं होगा, तत्वज्ञों के द्वारा बताए गए व्यवहार आदि नहीं होंगे, तो ऐसा धर्म जड़ हो जड़ हो जाता और उसमें मानव मात्र की सत्य निष्ठा नहीं बन पाती | अतः धर्म और तत्वज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक हैं | धर्म का बीज जिजीविषा, सुख की अभिलाषा और दुःख के प्रतिकार में ही निहित है |

जीवन को प्रगतिशील और उल्लासमय बनाए रखने के लिये तथा पारस्परिक संगठन और सहयोग को जीवित रखने के लिये ही उत्सवों और पर्वों का आयोजन किया जाता है | ये उत्सव केवल सामजिक सहयोग को ही बढ़ावा नहीं देते वरन् साथ साथ धार्मिक परम्परा को भी जीवित रखते हैं | और इस प्रकार मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक व्यवहार भी शनैः शनैः अभ्यास में आता जाता है | इस प्रकार जैन सम्प्रदाय का पर्यूषण और दशलाक्षण पर्व एक ऐसा ही सामाजिक पर्व है जो मनुष्य को मनुष्य के साथ मनुष्य के रूप में जोड़कर उसमें सम्यक् चारित्र्य और सम्यक् दृष्टि का विकास करता है | शास्त्र से धर्म की देह का अर्थात धर्म के बाह्य रूप का निर्माण होता है | यही कारण है कि किसी भी सम्प्रदाय के व्रतोत्सव आदि के विधान शास्त्रानुमोदित होते हैं, क्योंकि धर्म की देह अर्थात धर्म के बाह्य स्वरूप का निर्माण शास्त्रों से ही होता है | शास्त्रोक्त विधि विधानों का अनुसरण करते हुए व्यक्ति के चरित्र में सत्य, धर्म, शान्ति, प्रेम, निस्वार्थ भाव, उदारता और विनय विवेक आदि सद्गुणों का विकास होता है | यही सद्गुण धर्म की आत्मा कहलाते हैं |

सत्य की प्राप्ति के लिये बेचैनी और विवेकी स्वभाव इन दो तत्वों पर आधारित जीवन व्यवहार ही पारमार्थिक धर्म है | जैन सम्प्रदाय का पर्यूषण पर्व ऐसे ही पारमार्थिक धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है | जैन धर्म के अन्तिम तीर्थंकर महावीर के आचार विचार का सीधा और स्पष्ट प्रतिबिम्ब मुख्यतया आचारांगसूत्र में देखने को मिलता है | उसमें जो कुछ कहा गया है उस सबमें साध्य, समता या सम पर ही पूर्णतया भार दिया गया है | सम्यग्दृष्टिमूलक और सम्यग्दृष्टिपोषक जो जो आचार विचार हैं वे सब सामयिक रूप से जैन परम्परा में पाए जाते हैं | गृहस्थ और त्यागी सभी के लिये ६ आवश्यक कर्म बताए गए हैं | जिनमें मुख्य सामाइय है | त्यागी हो या गृहस्थ, वह जब भी अपने अपने अधिकार के अनुसार धार्मिक जीवन को स्वीकार करता है उसे यह प्रतिज्ञा करनी पड़ती है “करोमि भन्ते सामाइयम् |” जिसका अर्थ है कि मैं समता अर्थात समभाव की प्रतिज्ञा करता हूँ | मैं पापव्यापार अथवा सावद्ययोग का यथाशक्ति त्याग करता हूँ | साम्यदृष्टि जैन परम्परा के आचार विचार दोनों ही में है | और समस्त आचार विचार का केन्द्र है अहिंसा | जैन धर्म में अहिंसा को इतना व्यापक बना दिया गया है कि मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट पतंग आदि जीवित प्राणी ही नहीं वरन वनस्पति, पार्थिव जलीय आदि सूक्ष्मातिसूक्ष्म जन्तुओं तक की हिंसा से आत्मौपम्य की भावना द्वारा निवृत्त होने को कहा गया है | आत्मौपम्य की भावना – अर्थात समस्त प्राणियों की आत्मा को अपनी आत्मा मानना |

जैन पर्व कुछ एक दिवसीय होते हैं और कुछ बहुदिवसीय | लम्बे त्यौहारों में विशेष जैन पर्वों की ६ अट्ठाइयाँ हैं | उनमें जैसा कि ऊपर बताया, पर्यूषण पर्व की अट्ठाई सर्वश्रेष्ठ समझी जाती है | इनके अतिरिक्त तीन अट्ठाइयाँ चातुर्मास की तथा दो औली की होती हैं | पर्यूषण पर्व के दौरान यत्र तत्र जैन समाज में धार्मिक वातावरण दिखाई देता है | सभी निवृत्ति और अवकाशप्राप्ति का प्रयत्न करते हैं | खान पान एवम् अन्य भोगों पर अँकुश रखते हैं | शास्त्र श्रवण और आत्म चिन्तन करते हैं | तपस्वियों, त्यागियों और धार्मिक बन्धुओं की भक्ति करते हैं | जीवों को अभयदान देने का प्रयत्न करते हैं | और सबके साथ सच्ची मैत्री साधने की भावना रखते हैं | इस पर्व को दशलाक्षणी पर्व भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें दश लक्षणों का पालन कहा जाता है | ये दश लक्षण हैं: विनम्रता, माया का नाश, निर्मलता, आत्मसत्य का ज्ञान – और यह तभी सम्भव है जब व्यक्ति मितभाषी और स्थिर मन वाला हो, संयम, तप, त्याग, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य तथा क्षमायाचना | श्वेताम्बर सम्प्रदाय में यह पर्व आठ दिन का होता है, और उसके अन्तिम दिन यानी भाद्रपद शुक्ल पंचमी से दिगम्बरों के पर्यूषण का आरम्भ हो जाता है जो दस दिनों तक चलता है और भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को सम्पन्न होता है | इन दिनों भगवान महावीर की कथाओं का श्रवण किया जाता है | अपनी कठोर साधना के द्वारा भगवान महावीर ने जिन सत्यों का अनुभव किया था वे प्रमुख रूप से तीन हैं : दूसरे के कष्ट को अपना कष्ट समझना, समाज के हित के लिए अपनी सुख सुविधाओं का पूर्ण रूप से बलिदान कर देना ताकि परिग्रह लोकोपकार की भावना में परिणत हो जाए, इस प्रकार सतत जागृति की अवस्था प्राप्त होती है, जिसके द्वारा मनुष्य अतम निरीक्षण कर सकता है – ताकि उसके आत्मपुरुषार्थ में किसी प्रकार की कमी न आने पाए |

सच्चा सुख और सच्ची शान्ति प्राप्त करने के लिये एकमात्र उपाय यही है कि व्यक्ति अपनी जीवन प्रवृत्ति का सूक्ष्मता से अवलोकन करे और कभी भी किसी के साथ अनजाने में भी कोई छोटी सी भी भूल हो गई हो तो उसके लिए हृदय से क्षमा याचना करे और दूसरे को उसकी पहाड़ सी भूल के लिए भी क्षमादान दे |

क्षमादान और क्षमायाचना के इस महापर्व में सभी जैन मतावलम्बी संकल्प लेते हैं “खम्मामि सव्व जीवेषु – सब जीवों से मैं क्षमायाचना करता हूँ, सव्वे जीवा खमन्तु मे – सारे जीव मुझे क्षमा करें, मित्त्ति मे सव्व भू ए सू – सभी जीवों के साथ मेरा मैत्री का भाव रहे, वैरं मज्झणम् केण इ – किसी के साथ मेरा वैर न रहे |” आत्मिक शुद्धि का मूल मन्त्र इसी प्रकार का क्षमाभाव है | मन को स्वच्छ उदार और विवेकी बनाकर समाज के संगठन की दिशा में इससे बड़ा और क्या प्रयत्न हो सकता है |

अस्तु, क्षमायाचना के साथ आप सभी को क्षमावाणी और दशलाक्षणी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

पर्यूषण

 

शुभ प्रभात

सरल और सुखी जीवन के लिए आवश्यक है हम अकारण ही प्रसन्न रहना सीख जाएँ, सदा व्यस्त रहने का प्रयास करें, भयहीन रहें, स्वयं पर और स्वयं की योग्यताओं पर विश्वास रखते हुए बड़े स्वप्न देखें और अपनी कल्पनाओं को – अपने स्वप्नों को – सत्य करने के लिए प्रयासरत रहें, अपनी भावनाओं को खुलकर अभिव्यक्त करना सीखें, हर जड़ चेतन के साथ निस्वार्थ भाव से प्रेम का व्यवहार करें, सहृदय और क्षमाशील बनें, और इन सबसे भी बढ़कर वर्तमान में जीना सीखें | और ये सब हमें सिखा सकता है एक छोटा बच्चा |

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हम शान्त और प्रसन्न भाव से अपने ही भीतर के बच्चे के साथ क्रीड़ा आरम्भ कर दें तो न केवल शान्ति और प्रसन्नता के साथ सरलता से जीवनयापन कर सकते हैं अपितु जीवन में बहुत महान कार्य भी कर सकते हैं | क्योंकि हम अपने भीतर के बच्चे को भूल जाते हैं इसीलिए दुखी और अशान्त रहते हैं | तो आइये अपने भीतर के इस सोए हुए बालक को जगाएँ और उससे शिक्षा लेकर आगे बढें… जीवन सरल हो जाएगा…

बच्चा