बिल्वपत्रं शिवार्पणम्

रात निशीथ काल में सभी शिवभक्तों ने भगवान शिव का अभिषेक किया आज दिन में भी मन्दिरों में भगवान शंकर के अभिषेक के लिए भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा था | Vedic Astrologers तथा पण्डितों के अनुसार इस अवसर पर गंगाजल, चन्दन, गाय का दूध और घी तथा मधुमिश्रित जल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है और बिल्वपत्रों से उनका शृंगार किया जाता है | बिल्ववृक्ष अर्थात बेल के वृक्ष को अमर वृक्ष, बिल्व फल को अमर फल तथा बिल्व पत्र को अमर पत्र की संज्ञा भी दी जाती है | औषधीय रूप में समूचा बिल्ववृक्ष विशेष महत्त्व रखता है तथा शीतलता प्रदान करने वाला माना जाता है | मान्यता है कि समुद्र मन्थन के समय जब भगवान महादेव ने हलाहल का पान कर लिया था उस समय गंगाजल, दूध, दूध, घी मधु तथा बिल्वपत्रों आदि के द्वारा उनका विष का ताप दूर करने का प्रयास किया गया था | बिल्वपत्र को समस्त प्रकार के तापों से मुक्ति प्रदान करने वाला माना जाता है |

एक बिल्वपत्र में तीन पत्तियाँ परस्पर जुड़ी हुई होती हैं और उन्हें भगवान शिव को समर्पित करते समय ध्यान रखना चाहिए कि पत्तियों में किसी प्रकार का कोई छिद्र आदि न हो तथा कोई पत्ती टूटी हुई न हो | बिल्वपत्र को उल्टा करके चढ़ाते हैं – अर्थात उसका चिकना भाग शिवलिंग पर रखते हैं | साथ ही बिल्वपत्र के साथ जलधारा भी निरन्तर प्रवाहित रहनी चाहिए – बिना जल के बिल्वपत्र अर्पित नहीं किये जाते | ऐसी भी मान्यता है कि यदि नूतन बिल्वपत्र न मिलें तो पहले से अर्पित किये गए बिल्वपत्रों को भी बार बार धोकर भोले बाबा को अर्पित किया जा सकता है…

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन: ।

शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित् ।।

धार्मिक मान्यता ऐसी भी है कि बिल्ववृक्ष की मूल में भगवान शंकर का वास होता है और जो बिल्व के मूल में लिंगरूपी महादेव की पूजा अर्चना करता है वह व्यक्ति पुण्य का भागी होता है…

बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम् ।

य: पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद् ॥

भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित करते समय “श्री बिल्वाष्टकम्” के निम्न मन्त्र का जाप किया जाता है…

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम् |

त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ||

तीन दल अर्थात पत्रों से युक्त, सत्व रज तम रूपी त्रिगुणस्वरूप, तीन काल और तीनों लोक रूपी तीन नेत्रों से युक्त, तीन आयुध स्वरूप तथा तीनों जन्मों के पापों का संहार करने वाला बिल्वपत्र हम शिव को समर्पित करते हैं |

हमारे द्वारा श्रद्धा भक्तिपूर्वक अर्पित किया गया बिल्वपत्र भगवान शिव स्वीकार करें, इसी कामना के साथ व्रत का पारायण करते हुए प्रस्तुत है “बिल्वाष्टकम्”…

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्

जन्मपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणम् |

त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्याच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः
शिवपूजां करिष्यामि बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ||

अखण्ड बिल्व पात्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे

शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो एक बिल्वं शिवार्पणम् |

शालिग्राम शिलामेकां विप्राणां जातु चार्पयेत्

सोमयज्ञ महापुण्यं एक बिल्वं शिवार्पणम् ||

दन्तिकोटि सहस्राणि वाजपेय शतानि च

कोटि कन्या महादानं एक बिल्वं शिवार्पणम् |

लक्ष्म्यास्तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्

बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि एक बिल्वं शिवार्पणम् ||

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्

अघोरपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणम् |

काशीक्षेत्रनिवासं च कालभैरव दर्शनम्

प्रयागमाधवं दृष्ट्वा एक बिल्वं शिवार्पणम् ||

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे

अग्रतः शिवरूपाय एक बिल्वं शिवार्पणम् |

बिल्वाष्टमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ

सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात् ||

ॐ नमः शिवाय…

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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं

हम सब प्रायः अपनी तुलना किसी अन्य से करने लगते हैं | किन्तु कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते | कोई भी दो वस्तुएँ एक जैसी नहीं हो सकतीं | किन्हीं भी दो व्यक्तियों के गुण एक जैसे नहीं हो सकते | कोई व्यक्ति किसी एक कार्य में कुशल हो सकता है तो दूसरा किसी अन्य कार्य में कुशल हो सकता है | और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम सभी अपने आप में एक पूर्ण व्यक्तित्व हैं |

ईशावास्योपनिषद् का मन्त्र है “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||” यह मन्त्र वास्तव में इसी सत्य की ओर इंगित करता है कि प्रत्येक्क वस्तु और प्रत्येक जीव स्वयं में पूर्ण होता है | “पूर्णमदः पूर्णमिदं” – वह परब्रह्म भी पूर्ण है और यह कार्यब्रह्म भी पूर्ण है | “पूर्णात् पूर्णमुदच्यते” – क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण आत्मा से ही उत्पन्न हुआ है |

अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या दो पूर्ण भी एक साथ रह सकते हैं ? बिल्कुल रह सकते हैं, क्योंकि एक पूर्ण दूसरे पूर्ण का ही तो विस्तार है – केवल उसका स्वरूप भिन्न है | “पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते” – पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी वहाँ पूर्ण ही शेष रहता है |

ईशावास्योपनिषद् का यह मन्त्र हमें देश काल की सीमाओं से अनन्त बनाते हुए हमारी पूर्णता से हमारा साक्षात्कार कराता है | इस प्रकार तत्वतः तो सृष्टि की प्रत्येक संरचना अपने आपमें पूर्ण होती है और प्रत्येक घटक किसी महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट प्रयोजन के लिए ही निर्मित होता है |

समस्त ब्रह्माण्ड अपने आपमें पूर्ण हैं | ब्रह्माण्डों में व्याप्त समस्त वायु अग्नि जल आदि तत्व, समस्त रूप रस गन्ध आदि अपने आपमें पूर्ण हैं | समस्त काल, समस्त दिशाएँ – कुछ भी अपूर्ण नहीं है – हो ही नहीं सकता – पूर्ण है समस्त विराट् अपने आपमें | इस प्रकार हम सब उस विराट के सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर कण होते हुए भी स्वयं में पूर्ण हैं, क्योंकि पूर्ण का अंश हैं | पूर्णता का बोध वास्तव में अद्वितीय होता है और उसका कोई विकल्प भी नहीं होता | और यदि विकल्प खोज भी लिया जाए तो वह भी निश्चित रूप से पूर्ण ही होगा | हम सभी पूर्ण के भीतर भी हैं और हमारे भीतर ही पूर्ण है | क्योंकि हम सभी पूर्ण हैं – क्योंकि हम सभी एक ही पूर्ण का विविध रूपों में विस्तार हैं – अतः स्वयं में हम सभी महान हैं |

जब हम सभी स्वयं में पूर्ण व्यक्तित्व हैं तो किसी की किसी अन्य से तुलना कैसी ? आज महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर हम सभी संकल्प लें कि अपनी अपनी “पूर्णता को पूर्ण” रखते हुए, अपने अपने स्वभाव और योग्यता के अनुसार कर्म करते हुए, अपने अपने लक्ष्य के प्रति अग्रसर रहें और ईशोपनिषद के इस कथन का निरन्तर स्मरण करते रहें…

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||

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ॐ नमः शिवाय

सर्वदेवात्मको रुद्रः सर्वे देवा: शिवात्मका: |

रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दन: ||

यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशनः |

ब्रह्मविष्णुमयो रूद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्त् ||

रूद्र ही ब्रह्मा भी है, रूद्र ही विष्णु भी है

सभी देवता रूद्र के ही अंश हैं

सब कुछ रूद्र से ही उत्पन्न है

रूद्र स्वम्भू है

 

भगवान शिव हम सभी के कष्टों को दूर कर सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करें… इसी कामना के साथ महाशिवरात्रि की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

 

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चन्द्र स्तुति

आज खग्रास चन्द्रग्रहण है – एक ऐसी भव्य खगोलीय घटना के साक्षी आज भारत सहित संसार के बहुत से देश बनेंगे जिसे वैज्ञानिकों ने Super Blue Blood Moon नाम दिया है | और साथ ही कहा जा रहा है कि ऐसी आकर्षक खगोलीय घटना अब बहुत वर्षों तक देखने को नहीं मिलेगी | इसलिए इस घटना से भयग्रस्त होने की अथवा किसी प्रकार के वहम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है | फिर भी, ग्रहण के समय आप दो कार्य कर सकते हैं – या तो राहु की शान्ति के लिए राहु के बीज मन्त्र “ॐ रां राहवे नमः” का जाप कर सकते हैं | अथवा “महामृत्युंजयस्तोत्र” का पाठ कर सकते हैं, जो इस प्रकार है:

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् |

उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ||

चन्द्रमा आज कर्क राशि में संचार कर रहा है जो उसकी अपनी राशि है | और जब कोई अपने ही घर में होता है तो उसे किसी प्रकार कष्ट पहुँचाने का प्रयास कोई सरलता से नहीं कर सकता | क्योंकि अपने घर से बढ़कर सुरक्षा और कहाँ हो सकती है ? साथ ही पुष्य नक्षत्र में है – जिसका अर्थ है पुष्टि प्रदान करना | ग्रहण की समाप्ति पर चन्द्रमा आश्लेषा नक्षत्र में होगा – वह भी एक अच्छा नक्षत्र है | तो फिर भय किस बात का ? फिर भी चन्द्रदेव को और अधिक बलिष्ठ करने के लिए चन्द्रस्तुति का पाठ किया जा सकता है, जो नीचे प्रस्तुत है…

|| अथ चन्द्रस्य स्तुति: ||

क्षीरोदार्णवसम्भूत आत्रेयगोत्रसमुद्भव: |
गृहाणार्ध्यं शशांकेदं रोहिण्यसहितो मम ।।

ॐ श्री चन्द्रमसे नमः

अस्य श्री चन्द्र कवच स्तॊत्र महा मंत्रस्य, गौतम ऋषि:, अनुष्टुप छंद:, श्री चन्द्रो दॆवता | चन्द्र: प्रीत्यर्थॆ जपॆ विनियॊग: ॥

कवचं

समं चतुर्भुजं वंदॆ कॆयूर मकुटॊज्वलम्‌ ।

वासुदॆवस्य नयनं शंकरस्य च भूषणम्‌ ॥

ऎवं ध्यात्वा जपॆन्नित्यं शशिन: कवचं शुभम्‌ ।

शशि: पातु शिरॊ दॆशं फालं पातु कलानिधि ॥

चक्षुषि: चन्द्रमा: पातु श्रुती पातु निशापति: ।

प्राणं कृपाकर: पातु मुखं कुमुदबान्धव: ॥

पातु कण्ठं च मॆ सॊम: स्कन्धे जैवातृकस्तथा ।

करौ सुधाकर: पातु वक्ष: पातु निशाकर: ।|

हृदयं पातु मॆ चन्द्रो नाभिं शंकरभूषण: ।

मध्यं पातु सुरश्रॆष्ट: कटिं पातु सुधाकर: ।|

ऊरू तारापति: पातु मृगांकॊ जानुनी सदा ।

अभ्दिज: पातु मॆ जंघॆ पातु पादौ विधु: सदा |।

सर्वाण्यन्यानि चांगानि पातु चन्द्रोSखिलं वपु: ।

ऎतद्धिकवचं दिव्यं भुक्ति मुक्ति प्रदायकम्‌ ।|

य: पठॆच्छृणुयाद्वापि सर्वत्र विजयी भवॆत ।|

रोहिणीशः सुधामूर्ति: सुधागात्रो सुधाशन: |

विषमस्थानसंभूतां पीडां दहतु मे विधु: ||

सबीज वैदिक मंत्र:—

ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ इमं देवाSसपत्नम् सुबद्धम्महते क्षत्राय महते जयैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्दियस्येन्द्रियाय | इमममुष्य: पुत्रमस्यैव्विशSएव वोSमी राजा सोमोSस्माकम्ब्राह्मणानां राजा | ॐ स्व: भुव: भू: ॐ स: श्रौं श्रीं श्रां ॐ सोमाय नमः ॐ

|| इति श्री चन्द्रकवचं सम्पूर्णं ||

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The Happiness of The Mind – मन की प्रसन्नता

मन की प्रसन्नता किसी पद, प्रतिष्ठा अथवा सम्मान पर निर्भर नहीं करती | यह नर्भर करती है इस बात पर कि जो लोग हमारे साथ हैं उनके साथ हमारे सम्बन्ध कैसे हैं, उनके साथ हमारा व्यवहार कैसा है |

दूसरों के साथ मधुर सम्बन्ध बनाए रखने की सबसे पहली आवश्यकता है इस बात की कि उनकी बात को ध्यानपूर्वक सुनकर उनके विचारों और भावनाओं को समझने का प्रयास किया जाए | और दूसरों के विचारों तथा भावनाओं को समझने के लिए आवश्यक है कि सबसे पहले अपने विचारों तथा भावनाओं को सन्तुलित, संयमित और सकारात्मक बनाने का प्रयास किया जाए – अपने मन से भय, क्रोध, घृणा जैसे नकारात्मक विचारों को निकाल फेंका जाए और पहले ही से किसी के लिए नकारात्मक सोच बनाकर न बैठा जाए | यदि नकारात्मक विचार मन में होंगे तो सारे संसार में हमें नकारात्मक ही देखाई देगी |

दूसरों को हम वैसा ही समझते हैं जैसे हमारे विचार अथवा हमारी भावनाएँ होती हैं | हमारे विचार सकारात्मक होंगे तो हमारे मन में आनन्द की सरिता नितन्तर प्रवाहमान रहेगी और समूचा संसार हमें प्रेममय दिखाई देने लगेगा, क्योंकि समूची प्रकृति ही प्रेममयी है… आनन्दमयी है… हमारा मन और जीवन शैली बच्चों जैसी सरल होगी तो दूसरों के साथ हमारे सम्बन्धों में भी सरलता की मिठास घुली रहेगी…

हम सब सरल, सकारात्मक, प्रेममय और आनन्दमय जीवन व्यतीत करें, इसी भाव के साथ शुभकामना कि सभी का आज का दिन मंगलमय हो…

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गणतन्त्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ

अल्पानामपि वस्तूनां संहति: कार्यसाधिका

तॄणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिन:।। हितोपदेश 1/35

छोटी छोटी वस्तुओं को भी यदि एक स्थान पर एकत्र किया जाए तो उनके द्वारा बड़े से बड़े कार्य भी किये जा सकते हैं | उसी प्रकार जैसे घास के छोटे छोटे तिनकों से बनाई गई डोर से एक मत्त हाथो को भी बाँधा जा सकता है |

वास्तव में एकता में बड़ी शक्ति है ऐसा हम सभी जानते हैं | तो क्यों न आज गणतन्त्र दिवस के शुभावसर पर हम सभी मनसा वाचा कर्मणा एक हो जाने का संकल्प लें ?

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम सब एक जैसे ही कार्य करें, एक जैसी ही बोली बोलें या एक जैसे ही विचार रखें | निश्चित रूप से ऐसा तो सम्भव ही नहीं है | प्रत्येक व्यक्ति की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यावसायिक आदि विभिन्न परिस्थितियों की आवश्यकताओं के अनुसार हर व्यक्ति मनसा वाचा कर्मणा एक दूसरे से अलग ही होगा | हर कोई एक ही बोली नहीं बोल सकता, हर व्यक्ति की सोच अलग होगी, हर व्यक्ति का कर्म अलग होगा |

मनसा वाचा कर्मणा एक होने का अर्थ है कि हम चाहे अपनी परिस्थितियों के अनुसार जो भी कुछ करें, पर मन वचन और कर्म से किसी अन्य को किसी प्रकार की हानि पहुँचाने का जाने अनजाने प्रयास न करें | और जब आवश्यकता हो तो पूरी दृढ़ता के साथ एक दूसरे को सहयोग दें |

मनसा वाचा कर्मणा एक सूत्र में गुँथने का अर्थ है कि हम अपनी व्यक्तिगत समस्याओं और आवश्यकताओं के साथ साथ सामूहिक समस्याओं और आवश्यकताओं पर भी ध्यान दें… जैसे बच्चों और महिलाओं का सशक्तीकरण यानी Empowerment… और बच्चों तथा महिलाओं का स्वास्थ्य यानी Good Health… यदि इन दोनों विषयों के लिए हम सामूहिक प्रयास करते हैं तो हम मनसा वाचा कर्मणा एकता की डोरी में ही गुँथे हुए हैं…

सर शान से उठाए लहराता तिरंगा भी यही तो सन्देश देता है कि कितनी भी विविधताएँ हो, कितने भी वैचारिक मतभेद हों, किन्तु अन्ततोगत्त्वा राष्ट्रध्वज के केन्द्र में चक्रस्वरूप सबके विचारों का केन्द्र देश ही होता है… अर्थात अपने अपने कार्य करते हुए, अपनी अपनी सोच के साथ, अपनी अपनी भाषा का सम्मान करते हुए साथ मिलकर आगे बढ़ते जाना… ऐसी स्थिति में न विचार बाधा बनेंगे, न भाषा, न वर्ण, न वेश, और न ही कर्म… ऐसे देश को निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होने से कोई रोक नहीं सकता…

एकता की इसी भावना के साथ सभी को गणतन्त्र दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/01/26/happy-republic-day-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6/

 

ऋतु वसन्त अब चहक उठी

आज वसन्त पञ्चमी का वासन्ती पर्व है और हम सब माँ वाणी का अभिनन्दन करेंगे | माँ वाणी – सरस्वती – विद्या की – ज्ञान की देवी हैं | ज्ञान का अर्थ है शक्ति प्राप्त करना, सम्मान प्राप्त करना | ज्ञानार्जन करके व्यक्ति न केवल भौतिक जीवन में प्रगति कर सकता है अपितु मोक्ष की ओर भी अग्रसर हो सकता है | पुराणों में कहा गया है “सा विद्या या विमुक्तये” (विष्णु पुराण 1/19/41) अर्थात ज्ञान वही होता है जो व्यक्ति को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करे | मोक्ष का अर्थ शरीर से मुक्ति नहीं है | मोक्ष का अर्थ है समस्त प्रकार के भयों से मुक्ति, समस्त प्रकार के सन्देहों से मुक्ति, समस्त प्रकार के अज्ञान – कुरीतियों – दुर्भावनाओं से मुक्ति – ताकि व्यक्ति के समक्ष उसका लक्ष्य स्पष्ट हो सके और उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग स्पष्ट हो सके | हम सब ज्ञान प्राप्त करके भय तथा सन्देहों से मुक्त होकर अपना लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढ़ सकें इसी कामना के साथ सभी को वसन्त पञ्चमी और सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ…

अभी पिछले दिनों कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी | वसन्त के आगमन के साथ ही सर्दी में भी कुछ कमी सी है | और ऐसे सुहाने मौसम में ऋतुराज वसन्त के स्वागत में प्रकृति के कण कण को उल्लसित करता हुआ वसन्त पञ्चमी का अर्थात मधुऋतु का मधुमय पर्व…

कितना विचित्र संयोग है कि इस दिन एक ओर जहाँ ज्ञान विज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती को श्रद्धा सुमन समर्पित किये जाते हैं वहीं दूसरी ओर प्रेम के देवता कामदेव और उनकी पत्नी रति को भी स्नेह सुमनों के हार से आभूषित किया जाता है |

कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् और ऋतुसंहार तथा बाणभट्ट के कादम्बरी और हर्ष चरित जैसे अमर ग्रन्थों में वसन्त ऋतु का तथा प्रेम के इस मधुर पर्व का इतना सुरुचिपूर्ण वर्णन उपलब्ध होता है कि जहाँ या तो प्रेमीजन जीवन भर साथ रहने का संकल्प लेते देखाई देते हैं या फिर बिरहीजन अपने प्रिय के शीघ्र मिलन की कामना करते दिखाई देते हैं | संस्कृत ग्रन्थों में तो वसन्तोत्सव को मदनोत्सव ही कहा गया है जबकि वसन्त के श्रंगार टेसू के पुष्पों से सजे वसन्त की मादकता देखकर तथा होली की मस्ती और फाग के गीतों की धुन पर हर मन मचल उठता था | इस मदनोत्सव में नर नारी एकत्र होकर चुन चुन कर पीले पुष्पों के हार बनाकर एक दूसरे को पहनाते और एक दूसरे पर अबीर कुमकुम की बौछार करते हुए वसन्त की मादकता में डूबकर कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा करते थे | यह पर्व Valentine’s Day की तरह केवल एक दिन के लिए ही प्रेमीजनों के दिलों की धड़कने बढ़ाकर शान्त नहीं हो जाता था, अपितु वसन्त पञ्चमी से लेकर होली तक सारा समय प्रेम के लिए समर्पित होता था | आज भी बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और उत्तराँचल सहित देश के अनेक अंचलों में पीतवस्त्रों और पीतपुष्पों में सजे नर-नारी बाल-वृद्ध एक साथ मिलकर माँ वाणी के वन्दन के साथ साथ प्रेम के इस देवता की भी उल्लासपूर्वक अर्चना करते हैं |

इस सबके पीछे कारण यही है कि इस समय प्रकृति में बहुत बड़े परिवर्तन होते हैं | सर्दियों की विदाई हो जाती है… प्रकृति स्वयं अपने समस्त बन्धन खोलकर – अपनी समस्त सीमाएँ तोड़कर – प्रेम के मद में ऐसी मस्त हो जाती है कि मानो ऋतुराज को रिझाने के लिए ही वासन्ती परिधान धारण कर नव प्रस्फुटित कलिकाओं से स्वयं को सुसज्जित कर लेती है… जिनका अनछुआ नवयौवन लख चारों ओर मंडराते भँवरे गुन गुन करते वसन्त का राग आलापने लगते हैं… और प्रकृति की इस रंग बिरंगी छटा को देखकर मगन हुई कोयल भी कुहू कुहू का गान सुनाती हर जड़ चेतन को प्रेम का नृत्य रचाने को विवश कर देती है… इसीलिए तो वसन्त को ऋतुओं का राजा कहा जाता है…

और संयोग देखिए कि आज ही के दिन नूतन काव्य वधू का अपने गीतों के माध्यम से नूतन शृंगार रचने वाले प्रकृति नटी के चतुर चितेरे महाप्राण निराला का जन्मदिवस भी धूम धाम से मनाया जाता है…

तो, वसन्त के मनमोहक संगीत के साथ सभी मित्रों को सरस्वती पूजन, निराला जयन्ती तथा प्रेम के मधुमय वासन्ती पर्व वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ… इस आशा और विश्वास के साथ कि हम सब ज्ञान प्राप्त करके समस्त भयों तथा सन्देहों से मोक्ष प्राप्त कर अपना लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढ़ सकें… ताकि अपने लक्ष्य को प्राप्त करके उन्मुक्त भाव से प्रेम का राग आलाप सकें…

संग फूलों की बरात लिए लो ऋतु वसन्त अब चहक उठी ||

कोयल की तान सुरीली सी, भँवरे की गुँजन रसभीनी

सुनकर वासन्ती वसन धरे, दुलहिन सी धरती लचक उठी |

धरती का लख कर नवयौवन, लो झूम उठा हर चरन चरन

हर कूल कगार कछारों पर है मधुर रागिनी झनक उठी ||

ऋतु ने नूतन शृंगार किया, प्राणों में भर अनुराग दिया

सुख की पीली सरसों फूली, फिर नई उमंगें थिरक उठीं |

पर्वत टीले वन और उपवन हैं झूम रहे मलयानिल से

लो झूम झूम कर मलय पवन घर द्वार द्वार पर महक उठी ||

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