बुध का वृषभ में गोचर

बुध का वृषभ में गोचर

शनिवार 18 मई यानी वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को रात्रि 11:35 के लगभग बव करण और परिघ योग में बुध मेष राशि से वृषभ राशि में प्रस्थान कर जाएगा | कल ही भगवान बुद्ध का जन्म दिवस बुद्ध पूर्णिमा भी है | साथ ही कल यानी बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ 1वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को ही महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई और इसी तिथि को बुद्ध का महानिर्वाण भी हुआ | इस कारण बौद्धधर्म के अनुनायियों के लिए बुद्ध पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है | इस वर्ष बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर देवगुरु बृहस्पति और आत्मा के कारक सूर्य का परस्पर सम-सप्तक योग भी बन रहा है, जो ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यन्त शुभ माना जाता है | तो सर्वप्रथम सभी को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ, इस आशा और विश्वास के साथ कि हम सभी बुद्ध के आदर्शों को अपने जीवन दर्शन में आत्मसात करने का प्रयास करें…

बुध इस समय कृत्तिका नक्षत्र पर है तथा अस्त है | यहाँ से 23 मई को बुध रोहिणी नक्षत्र और 29 मई को मृगशिरा नक्षत्र पर भ्रमण करता हुआ पहली जून को 24:17 (एक और दो जून की मध्यरात्रि में बारह बजकर सत्रह मिनट) के लगभग मिथुन राशि में प्रस्थान कर जाएगा | इस पूरी अवधि में बुध अस्त ही रहेगा | दो जून को मिथुन में पहुँचने के बाद रात्रि नौ बजे के लगभग बुधोदय होगा | अपनी स्वयं की एक राशि मिथुन से वृषभ राशि बारहवाँ भाव है तथा बुध की अपनी दूसरी राशि – जो कि बुध की उच्च तथा मूल त्रिकोण राशि भी है – से वृषभ राशि नवम भाव है | अतः सामान्य रूप से कह सकते हैं कि कन्या राशि के जातकों के लिए यह गोचर विशेष रूप से अनुकूल रह सकता है | इन्हीं सब तथ्यों के आधार पर आइये जानने का प्रयास करते हैं कि बुध के मकर राशि में गोचर के विभिन्न राशियों पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

किन्तु ध्यान रहे, ये परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु किसी योग्य और अनुभवी Astrologer के द्वारा उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |

मेष : आपके लिए तृतीयेश और षष्ठेश होकर बुध का गोचर आपके द्वितीय भाव में हो रहा है | आपकी सम्वाद शैली इस अवधि में प्रभावशाली रहेगी, किन्तु थोड़ा Diplomatic होने की आवश्यकता है | सत्य बोलें, किन्तु कड़वा न बोलें | कार्य की दृष्टि से तथा आर्थिक दृष्टि से आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | जो कार्य रुका हुआ था वह पुनः आगे बढ़ सकता है और उसके कारण आर्थिक स्थिति में भी दृढ़ता आएगी | भाई बहनों के साथ कुछ विवाद सम्भव है, किन्तु अपने बुद्धिबल से आप उस विवाद का स्वयं ही समाधान भी करने में सक्षम हो सकते हैं | किसी कोर्ट केस का परिणाम आपके पक्ष में आ सकता है |

वृषभ : आपका द्वितीयेश और पंचमेश होकर बुध का गोचर आपकी राशि में ही हो रहा है | आपके व्यवहार में उदारता, कोमलता एवं सौम्यता दिखाई देगी जिसका प्रभाव आपके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर निश्चित ही पड़ेगा | आपकी सम्वाद तथा लेखन शैली इस अवधि में प्रभावशाली रहेगी तथा इसके कारण आपको अर्थलाभ की भी सम्भावना है | अविवाहित हैं तो इस अवद्धि में जीवन साथी की खोज भी पूरी हो सकती है, किन्तु विवाह में अभी समय लग सकता है | सन्तान के लिए समय अनुकूल प्रतीत होता है |

मिथुन : आपके लिए बुध लग्नेश और चतुर्थेश होकर योगकारक है तथा आपकी राशि से बारहवें भाव में गोचर कर रहा है | एक ओर जहाँ आपके अपने लिए और परिवार के लिए स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ हो सकती हैं वहीं दूसरी ओर इस अवधि में आप विदेश यात्रा के लिए भी जा सकते हैं अथवा अपना निवास बदलने की योजना बना सकते हैं | किसी कारणवश मानसिक तनाव हो सकता है | योग और प्राणायाम को अपनी दिनचर्या का अंग बना लेंगे तो इस समस्या से बच सकते हैं |

कर्क : कर्क राशि के लिए तृतीयेश और द्वादशेश होकर बुध का गोचर आपके लाभ स्थान में हो रहा है | आपके लिए यह गोचर अत्यन्त अनुकूल प्रतीत होता है | यदि आपका व्यवसाय किसी रूप में विदेश से सम्बद्ध है तब तो आपके लिए विशेष रूप से लाभ की सम्भावना है | भाई बहनों का सहयोग भी अपने कार्य में आपको प्राप्त रहने की सम्भावना है | मित्रों के साथ आमोद प्रमोद में भी समय व्यतीत हो सकता है | कार्य के सिलसिले में आपको दूर पास की यात्राएँ भी करनी पड़ सकती हैं, किन्तु इन यात्राओं के दौरान आपको अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा |

सिंह : आपके लिए बुध द्वितीयेश और एकादशेश होकर आपके दशम भाव में गोचर कर रहा है | आपके लिए विशेष रूप से भाग्योदय का समय प्रतीत होता है | व्यवसाय में प्रगति, नौकरी में पदोन्नति तथा अर्थ और यश प्राप्ति के संकेत हैं | साथ ही यदि आप कोई नया कार्य आरम्भ करना चाहते हैं तो उसके लिए भी अनुकूल समय प्रतीत होता है | धार्मिक तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि बढ़ सकती है | अपनी आकाँक्षाओं की पूर्ति में आपको अपने पिता का सहयोग भी प्राप्त होता रहेगा |

कन्या : आपके लिए आपका लग्नेश तथा दशमेश होकर बुध योगकारक ग्रह है तथा भाग्य स्थान में गोचर कर रहा है | आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के योग हैं | समाज में आपका मान-सम्मान तथा प्रभाव में वृद्धि की सम्भावना है | साथ ही कार्य की दृष्टि से भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | नौकरी में हैं तो आप वर्तमान नौकरी छोडकर कोई अन्य नौकरी भी कर सकते हैं | अपना स्वयं का व्यवसाय है तो कार्य के सिलसिले में लम्बी विदेश यात्राओं के भी योग बन रहे हैं जहाँ आप बहुत समय तक व्यस्त रह सकते हैं |

तुला : आपके लिए बुध भाग्येश तथा द्वादशेश है तथा आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | अचानक ही धन हानि की सम्भावना है | या हो सकता है कि आप कोई रहस्य जानने के प्रयास में अपने व्यक्तिगत अथवा व्यावसायिक जीवन को स्वयं ही कोई हानि पहुँचा लें | अतः सावधान रहने की आवश्यकता है | रहस्य को रहस्य ही रहने दें | विदेश यात्राओं के योग हैं किन्तु ये यात्राएँ सम्भव है आशा के अनुकूल न सिद्ध हों, अतः इन्हें कुछ समय के लिए स्थगित करना ही हित में रहेगा | स्वास्थ्य के प्रति भी सावधान रहने की आवश्यकता है |

वृश्चिक : आपके लिए बुध अष्टमेश और एकादशेश है तथा आपके सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | यदि पार्टनरशिप में कोई कार्य कर रहे हैं तो लाभ की सम्भावना है | किन्तु आपके स्वभाव में नकारात्मकता आपके व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक जीवन पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है | साथ ही किसी ग़लतफ़हमी के कारण जीवन साथी के साथ सम्बन्धों में भी तनाव उत्पन्न हो सकता है | अच्छा यही रहेगा कि कार्य से अवकाश लेकर कुछ समय के लिए कहीं भ्रमण के लिए चले जाएँ | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है |

धनु : आपके लिए सप्तमेश और दशमेश होकर बुध योगकारक हो जाता है तथा आपकी राशि से छठे भाव में गोचर कर रहा है | अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य का विशेष रूप से ध्यान रखने की आवश्यकता है | साथ ही जीवन साथी के साथ किसी प्रकार का तनाव भी इस अवधि में सम्भव है | कार्य क्षेत्र में आपका प्रदर्शन अच्छा रहेगा जिसके फलस्वरूप नौकरी में पदोन्नति अथवा अपना व्यवसाय है तो उसमें भी प्रगति की सम्भावना है | सामाजिक गतिविधियों में वृद्धि के साथ ही मान सम्मान में भी वृद्धि की सम्भावना है | किसी कोर्ट केस का परिणाम आपके पक्ष में आ सकता है |

मकर : बुध आपका षष्ठेश और भाग्येश है तथा आपकी राशि से पञ्चम भाव में गोचर कर रहा है | उत्साह तथा आत्मविश्वास में वृद्धि के संकेत हैं | आप जो भी निर्णय इस अवधि में लेंगे सोच विचार कर ही लेंगे जिसके कारण आपके कार्य भी समय पर पूर्ण होने की सम्भावना है | आप उच्च शिक्षा के लिए अथवा कोई नया कोर्स करने के लिए किसी अन्य स्थान पर जा सकते हैं | आपकी सन्तान के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | प्रेम सम्बन्धों में भी सुधार की सम्भावना है | धार्मिक कार्यों में भी आपकी रूचि बढ़ सकती है |

कुम्भ :  आपका पंचमेश और अष्टमेश होकर बुध आपकी राशि से चतुर्थ भाव में गोचर कर रहा है | आपको अचानक ही किसी ऐसे स्थान से लाभ हो सकता है अथवा नौकरी का निमन्त्रण प्राप्त हो सकता है जहाँ के विषय में आप आशा छोड़ चुके होंगे | किन्तु परिवार में किसी प्रकार का विवाद भी सम्भव है | साथ ही आपको अपनी माता जी तथा सन्तान के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है | स्वयं भी ड्राइविंग में सावधान रहने की आवश्यकता है | प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी जो लोग कर रहे हैं उन्हें कठिन परिश्रम की आवश्यकता है |

मीन : आपके लिए चतुर्थेश और सप्तमेश होकर बुध आपका योगकारक बन जाता है तथा आपके तृतीय भाव में गोचर कर रहा है | एक ओर जहाँ आपके छोटे भाई बहनों के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है वहीं दूसरी ओर आपके जीवन साथी के लिए भी यह गोचर भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आप स्वयं भी कोई नया घर खरीदने की योजना बना सकते हैं | आपको अपने परिवारजनों का तथा मित्रों का सहयोग प्राप्त होता रहेगा |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें इसी कामना के साथ एक बार पुनः सबको बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/05/17/mercury-transit-in-taurus/

 

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बुद्ध पूर्णिमा

“स्त्री तब तक “चरित्रहीन” नहीं हो सकती, जब तक पुरुष “चरित्रहीन” न हो | आज हम जो कुछ भी हैं वो हमारी आज तक की सोच का परिणाम है | इसलिए अपनी सोच ऐसी बनानी चाहिए ताकि क्रोध न आए | क्योंकि हमें अपने क्रोध के लिए दण्ड नहीं मिलता, अपितु क्रोध के कारण दण्ड मिलता है | क्रोध एक ऐसा जलता हुआ कोयला है जो दूसरों पर फेंकेंगे तो पहले हमारा हाथ ही जलाएगा | यही कारण है कि हम कितने भी युद्धों में विजय प्राप्त कर लें, जब तक हम स्वयं को वश में नहीं कर सकते तब तक हम विजयी नहीं कहला सकते | इसलिए सर्वप्रथम तो अपने शब्दों पर ध्यान देना चाहिए | भले ही कम बोलें, लेकिन ऐसी वाणी बोलें जिससे प्रेम और शान्ति का सुगन्धित समीर प्रवाहित हो | हम कितनी भी आध्यात्म की बातें पढ़ लें या उन पर चर्चा कर लें, कितने भी मन्त्रों का जाप कर लें, लेकिन जब तक हम उनमें निहित गूढ़ भावनाओं को अपने जीवन का अंग नहीं बनाएँगे तब तक सब व्यर्थ है | इस सबके साथ ही हमें अपने अतीत के स्मरण और भविष्य की चिन्ताओं को भुलाकर अपना वर्तमान सुखद बनाने का प्रयास करना चाहिए | क्योंकि संसार दुखों का घर है, दुख का कारण वासनाएँ हैं, वासनाओं को मारने से दुख दूर होते हैं, वासनाओं को मारने के लिए मानव को अष्टमार्ग अपनाना चाहिये, अष्टमार्ग अर्थात – शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि”…

इस प्रकार की जीवनोपयोगी और व्यावहारिक शिक्षाएँ देने वाले भगवान बुद्ध का आज वैशाख पूर्णिमा को जन्मदिवस (जो सिद्धार्थ गौतम के रूप में था) भी है, बुद्धत्व प्राप्ति (जिस दिन दीर्घ तपश्चर्या के बाद सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बने) का दिन भी है और महानिर्वाण (मोक्ष) दिवस भी है | यों कल प्रातः सूर्योदय के बाद 6:38 पर पूर्णिमा तिथि का आगमन हो चुका है, इसलिए उपवास की पूर्णिमा कल थी, किन्तु उदया तिथि होने के कारण बुद्ध पूर्णिमा का पर्व आज मनाया जा रहा है | सर्वप्रथम बुद्ध पूर्णिमा की सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ | बुद्ध न केवल बौद्ध सम्प्रदाय के ही प्रवर्तक हैं अपितु भगवान विष्णु के नवम अवतार के रूप में भी भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना की जाती है |

अब हम बुद्ध के उपरोक्त कथन पर बात करते हैं | व्यक्ति के आत्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास के लिए बुद्ध ने शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि के अष्टमार्ग के साथ साथ पाँच बातें और कही हैं कि मनसा वाचा कर्मणा अहिंसा का पालन करना चाहिए, जब तक कोई अपनी वस्तु प्रेम और सम्मान के साथ हमें न दे तब तक उससे पूछे बिना वह वस्तु नहीं लेनी चाहिए, किसी भी प्रकार के दुराचार अथवा व्यभिचार से बचना चाहिए, असत्य सम्भाषण नहीं करना चाहिए और मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए |

इन उपदेशों के पीछे भावना यही थी कि व्यक्ति को एक ऐसा मार्ग दिखा सकें जिस पर चलकर वह सांसारिक कर्तव्य करते हुए आत्मोत्थान के मार्ग पर अग्रसर होकर मोक्ष अर्थात पूर्ण ज्ञान की स्थिति को प्राप्त हो जाए | व्यक्ति को स्वयं ही उसके देश-काल-परिस्थिति का पूर्ण सत्यता और ईमानदारी से आकलन करके यह निश्चित करना होगा कि क्या उसके लिए उचित है और क्या अनुचित | किन्तु इतना अवश्य है कि बुद्ध के उपदेशों की आत्मा को यदि मानवमात्र ने आत्मसात कर लिया तो हर प्रकार के छल, कपट, युद्ध आदि से संसार को मुक्ति प्राप्त हो सकेगी और शान्त तथा आनन्दित हुआ मानव अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा – अध्यात्म मार्ग अर्थात स्वयं अपने भीतर झाँकने का मार्ग – स्वयं अपनी आत्मा से साक्षात्कार करने का मार्ग | और समस्त भारतीय दर्शनों की मूलभूत भावना यही है |

उदाहरण के लिए बुद्ध ने कायिक, वाचिक, मानसिक किसी भी प्रकार की हिंसा को अनुचित माना है | लेकिन जो लोग सेना में हैं – देश की सुरक्षा के लिए जो कृतसंकल्प हैं – आततायियों को नष्ट करने का उत्तरदायित्व जिनके कन्धों पर है – उनके लिए उस प्रकार की हिंसा ही उचित और कर्तव्य कर्म है, यदि वे पूर्ण रूप से अहिंसा का मार्ग अपना लेंगे तो न केवल वे कायर कहलाएँगे, बल्कि देश की सुरक्षा भी नहीं कर पाएँगे |

बुद्ध ने दुराचार और व्यभिचार से बचने की बात कही | आज जिस प्रकार से महिलाओं – यहाँ तक कि छोटी बच्चियों – के साथ दुराचार और व्यभिचार की दिल दहला देने वाली घटनाएँ सामने आ रही हैं – यदि अपने घरों में ही हम परिवार का केन्द्र बिन्दु – समाज की आधी आबादी – नारी शक्ति का सम्मान करना सीख जाएँ तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है | यहाँ बुद्ध की एक कथा का उदाहरण प्रस्तुत है कि एक बार भ्रमण करते हुए बुद्ध एक गाँव में पहुँचे तो वहाँ एक स्त्री उनसे मिलने के लिए आई और बोली “आप देखने में तो राजकुमार लगते हैं लेकिन वस्त्र आपने सन्यासियों के पहने हैं | इसका कारण ?”

बुद्ध ने उत्तर दिया “हमारा यह युवा और आकर्षक शरीर क्यों बीमार और वृद्ध होकर अन्त में काल के गाल में समा जाता है इसी प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए मैंने सन्यास लिया है…” स्त्री उनकी बातों से प्रभावित हुई और उन्हें अपने घर भोजन के लिए निमन्त्रित किया | ग्रामवासियों को जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने बुद्ध से कहा कि वे उस स्त्री के घर भोजन के लिए न जाएँ क्योंकि वह चरित्रहीन है | बुद्ध ने जब प्रमाण माँगा तो गाँव के मुखिया ने कहा “मैं शपथ लेकर कहता हूँ यह स्त्री चरित्रहीन है…” बुद्ध ने मुखिया का एक हाथ पकड़ लिया और उसे ताली बजाने को कहा | मुखिया ने कहा “मैं एक हाथ से ताली कैसे बजा सकता हूँ ?” तब बुद्ध ने कहा “अगर तुम एक हाथ से ताली नहीं बजा सकते तो फिर यह स्त्री अकेली कैसे चरित्रहीन हो सकती है | किसी भी स्त्री को चरित्रहीन बनाने के लिए पुरुष उत्तरदायी है | यदि पुरुष चरित्रवान होगा तो भला स्त्री कैसे चरित्रहीन हो सकती है ?” यही बात यदि हम अपने घर के बच्चों को संस्कार के रूप में सिखाना आरम्भ कर दें तो महिलाओं के प्रति अत्याचार जैसी भयावह स्थिति से बहुत सीमा तक मुक्ति प्राप्त हो सकती है |

बुद्ध ने मदाक पदार्थों से बचने की बात कही – तो क्या केवल नशीली वस्तुओं का सेवन ही मादक पदार्थों का सेवन है ? दूसरों की चुगली करना, आत्मतुष्टि के लिए दूसरों के कार्यों में विघ्न डालना इत्यादि ऐसी अनेकों बातें हैं कि जिनकी लत पड़ जाए तो कठिनाई से छूटती है – इस प्रकार के नशों का भी त्याग करने के लिए बुद्ध प्रेरणा देते हैं | हम सभी दोनों “कल” की चिन्ता करते रहते हैं और “आज” को लगभग भुला ही देते हैं | बीते “कल” का कुछ किया नहीं जा सकता, अतः हमें उसे भुलाकर “आज” पर गर्व करना सीखना होगा… विश्वास कीजिए, आने वाला “कल” स्वतः ही अनुकूल हो जाएगा…

तो, देश काल और परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति को अपने लिए उचित-अनुचित का निर्धारण करना चाहिए | हाँ, इतना प्रयास अवश्य करना चाहिए कि हमारे कर्म ऐसे हों कि जिन्हें करने के बाद हमारे मन में किसी प्रकार के अपराध बोध अथवा पश्चात्ताप की भावना न आने पाए | क्योंकि यदि हमारे मन में किसी बात के लिए अपराध बोध आ गया या किसी प्रकार के पश्चात्ताप की भावना आ गई तो हमें स्वयं से ही घृणा होने लगेगी और तब हम किस प्रकार सुखी रह सकते हैं ? स्वयं को दुखी करना भी एक प्रकार की हिंसा ही तो है | जो व्यक्ति स्वयं ही दुखी होगा वह दूसरे लोगों को सुख किस प्रकार पहुँचा सकता है ? जबकि बुद्ध के इन उपदेशों का मूलभूत उद्देश्य ही है मानव मात्र की प्रसन्नता – मानव मात्र का सुख…

अस्तु, बुद्धम् शरणम् गच्छामि, धम्मम् शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि ।।

बुद्ध अर्थात् अपनी चैतन्य आत्मा की साक्षी में रहते हुए, धर्म अर्थात अपने यथोचित कर्तव्यों का पालन करते हुए, संघ अर्थात समुदाय – समाज – देश – विश्व – समस्त ब्रह्माण्ड – इस समस्त चराचर जगत के प्रति उत्तरदायी रहकर सभी के हितों की चिन्ता करते हुए – सभी के प्रति समभाव रखते हुए – करुणा का भाव रखते हुए और बुद्ध के दिखाए मार्ग पर चलते हुए हम सभी सुखी रहें, शान्तचित्त रहें, सबके प्रति हमारा प्रेमभाव बना रहे, इसी भावना के साथ सभी को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/04/30/buddha-purnima/

 

 

 

शुभ प्रभात – बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ

“आज हम जो कुछ भी हैं वो हमारी आज तक की सोच का परिणाम है | इसलिए अपनी सोच ऐसी बनानी चाहिए ताकि क्रोध न आए | क्योंकि हमें अपने क्रोध के लिए दण्ड नहीं मिलता, अपितु क्रोध के कारण दण्ड मिलता है | क्योंकि क्रोध तो एक ऐसा जलता हुआ कोयला है जो दूसरों पर फेंकेंगे तो पहले हमारा हाथ ही जलाएगा | यही कारण है कि हम कितने भी युद्धों में विजय प्राप्त कर लें, जब तक हम स्वयं को वश में नहीं कर सकते तब तक हम विजयी नहीं कहला सकते | इसलिए सर्वप्रथम तो अपने शब्दों पर ध्यान देना चाहिए | भले ही कम बोलें, लेकिन ऐसी वाणी बोलें जिससे प्रेम और शान्ति का सुगन्धित समीर प्रवाहित हो | साथ ही अहंकार, सन्देह और शक़ से व्यक्तिगत सम्बन्धों को आघात पहुँचता है | हम आध्यात्मिकता की कितनी भी बातें पढ़ लें या उन पर चर्चा कर लें, कितने भी मन्त्रों का जाप कर लें, लेकिन जब तक हम उनमें निहित गूढ़ भावनाओं को अपने जीवन का अंग नहीं बनाएँगे तब तक सब व्यर्थ है | इस सबके साथ ही हमें अपने अतीत के स्मरण और भविष्य की चिन्ताओं को भुलाकर अपना वर्तमान सुखद बनाने का प्रयास करना चाहिए | क्योंकि संसार दुखों का घर है, दुख का कारण वासनाएँ हैं, वासनाओं को मारने से दुख दूर होते हैं, वासनाओं को मारने के लिए मानव को अष्टमार्ग अपनाना चाहिये, अष्टमार्ग अर्थात – शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि” – इस प्रकार की जीवनोपयोगी और व्यावहारिक शिक्षाएँ देने वाले भगवान बुद्ध के जन्मदिवस (जो सिद्धार्थ गौतम के रूप में था), बुद्धत्व प्राप्ति (जिस दिन गीर्घ तपश्चर्या के बाद गौतम बुद्ध बने, और इस प्रकार बुद्धत्व प्राप्ति गौतम बुद्ध का नया जन्म था), और महानिर्वाण (मोक्ष) दिवस के रूप में मनाए जाने वाले पर्व बुद्ध पूर्णिमा की सभी को बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ | बुद्ध न केवल बौद्ध सम्प्रदाय के ही प्रवर्तक हैं अपितु भगवान विष्णु के नवम अवतार के रूप में भी भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना की जाती है |

व्यक्ति के आत्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास के लिए बुद्ध ने शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि  के अष्टमार्ग के साथ साथ पाँच बातें और कही हैं:

  • व्यक्ति को मनसा वाचा कर्मणा किसी भी जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए |
  • किसी दूसरे की कोई भी वस्तु उस व्यक्ति से बिना पूछे लेने का अधिकार किसी को नहीं है – जो वस्तु कोई अपने आप प्रेम और सम्मान से दे बस उसी वस्तु को सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए |
  • किसी भी प्रकार के दुराचार अथवा व्यभिचार से बचना चाहिए |
  • असत्य सम्भाषण उचित नहीं है |
  • मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए |

लेकिन इन पाँचों उपदेशों का यह अर्थ कदापि नहीं समझना चाहिए कि बुद्ध अपनी किसी परम्परा या अपने विचारों को व्यक्ति पर थोपना चाहते हैं | सदा से ही हमारे धर्म प्रवर्तक – चाहे वो किसी भी सम्प्रदाय से हों – व्यक्ति को एक ऐसा मार्ग दिखाना चाहते रहे हैं कि व्यक्ति का हर स्तर पर उत्थान हो सके, और अपने सांसारिक कर्तव्य कर्म करते हुए आत्मोत्थान के मार्ग पर अग्रसर होकर मोक्ष अर्थात पूर्ण ज्ञान की स्थिति को प्राप्त हो जाए | बुद्ध के भी इन समस्त उपदेशों का मर्म समझकर “क्या उचित है और क्या अनुचित” ये सब व्यक्ति को स्वयं अपने देश-काल-परिस्थिति के अनुसार पूर्ण सत्यता और ईमानदारी के साथ नियत करना होगा | हाँ, इतना अवश्य है कि बुद्ध के उपदेशों की आत्मा को यदि मानवमात्र ने आत्मसात कर लिया तो हर प्रकार के छल, कपट, युद्ध आदि से संसार को मुक्ति प्राप्त हो सकेगी और शान्त तथा आनन्दित हुआ मानव अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा – अध्यात्म मार्ग अर्थात स्वयं अपने भीतर झाँकने का मार्ग – स्वयं अपनी आत्मा से साक्षात्कार करने का मार्ग | और समस्त भारतीय दर्शनों की मूलभूत भावना यही है |

उदाहरण के लिए बुद्ध ने कायिक, वाचिक, मानसिक किसी भी प्रकार की हिंसा को अनुचित माना है | लेकिन जो लोग सेना में हैं – देश की सुरक्षा के लिए जो कृतसंकल्प हैं – आततायियों को नष्ट करने का उत्तरदायित्व जिनके कन्धों पर है – उनके लिए उस प्रकार की हिंसा ही उचित और कर्तव्य कर्म है, यदि वे पूर्ण रूप से अहिंसा का मार्ग अपना लेंगे तो न केवल वे कायर कहलाएँगे, बल्कि देश की सुरक्षा भी नहीं कर पाएँगे |

बुद्ध ने दुराचार और व्यभिचार से बचने की बात कही | आज जिस प्रकार से महिलाओं के साथ दुराचार और व्यभिचार की घटनाएँ सामने आ रही हैं – यदि अपने घरों में ही हम परिवार का केन्द्र बिन्दु – समाज की आधी आबादी – नारी शक्ति का सम्मान करना सीख जाएँ तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है | बुद्ध ने मदाक पदार्थों से बचने की बात कही – तो क्या केवल नशीली वस्तुओं का सेवन ही मादक पदार्थों का सेवन है ? दूसरों की चुगली करना, दूसरों के कार्यों में विघ्न डालना, आत्मतुष्टि के लिए अकारण ही दूसरों पर सन्देह करना, दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करना, अकारण ही क्रोध करना – ऐसी अनेक बातें हैं जिनकी लत पड़ जाए तो कठिनाई से छूटती है – इस प्रकार के नशों का भी त्याग करने के लिए बुद्ध प्रेरणा देते हैं | हम सभी दोनों “कल” की चिन्ता करते रहते हैं और “आज” को लगभग भुला ही देते हैं – और बीते कल को भुलाने की तथा आने वाले कल को उत्तम बनाने की चेष्टा में अनेकों बार जाने अनजाने असत्य भाषण कर बैठते हैं – जो निश्चित रूप से अनुचित है | हाँ, यदि हमारे असत्य भाषण से कुछ अच्छा परिणाम प्राप्त होने वाला हो तो बात अलग है |

तो, देश काल और परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति को अपने लिए उचित-अनुचित का निर्धारण करना चाहिए | हाँ, इतना प्रयास अवश्य करना चाहिए कि हमारे कर्म ऐसे हों कि जिन्हें करने के बाद हमारे मन में किसी प्रकार के अपराध बोध अथवा पश्चात्ताप की भावना न आने पाए | क्योंकि यदि हमारे मन में किसी बात के लिए अपराध बोध आ गया या किसी प्रकार के पश्चात्ताप की भावना आ गई तो हमें स्वयं से ही घृणा होने लगेगी और तब हम किस प्रकार सुखी रह सकते हैं ? स्वयं को दुखी करना भी एक प्रकार की हिंसा ही तो है | जो व्यक्ति स्वयं ही दुखी होगा वह दूसरे लोगों को सुख किस प्रकार पहुँचा सकता है ? जबकि बुद्ध के इन उपदेशों का मूलभूत उद्देश्य ही है मानव मात्र की प्रसन्नता – मानव मात्र का सुख…

युग के महान अवतार भगवान बुद्ध की महान शिक्षाओं को ध्यान में रखकर हम सब अपनी अपनी उन्नति के मार्ग पर इस प्रकार आगे बढ़ते जाएँ कि हमारे साथ दूसरों की भी उन्नति हो – इसी कामना के साथ एक बार फिर सभी को बुद्ध जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…

 

 

शुभ प्रभात – बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ

 

बुद्धम् शरणम् गच्छामि, धम्मम् शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि ।।

बुद्ध अर्थात् अपनी चैतन्य आत्मा की साक्षी में रहते हुए, धर्म अर्थात अपने यथोचित कर्तव्यों का पालन करते हुए, संघ अर्थात समुदाय – समाज – देश – विश्व – समस्त ब्रह्माण्ड – इस समस्त चराचर जगत के प्रति उत्तरदायी रहकर सभी के हितों की चिन्ता करते हुए – सभी के प्रति समभाव रखते हुए – करुणा का भाव रखते हुए और बुद्ध के दिखाए मार्ग पर चलते हुए हम सभी सुखी रहें, शान्तचित्त रहें, सबके प्रति हमारा प्रेमभाव बना रहे, इसी भावना के साथ सभी को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ