Category Archives: मुहूर्त विचार

नक्षत्र – एक विश्लेषण

रेवती

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषज, पूर्वा भाद्रपद और उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा रेवती नक्षत्र के विषय में |

रेवती नक्षत्र में 32 तारे होते हैं | भारतीय वैदिक ज्योतिष  की गणनाओं के लिये महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से रेवती को 27वां तथा अन्तिम नक्षत्र माना जाता है | साथ ही इसी नक्षत्र के साथ पंचकों की भी समाप्ति हो जाती है | रेवती का शाब्दिक अर्थ है धनवान अथवा धनी और इसी के अनुसार Astrologers इस नक्षत्र को धन सम्पदा की प्राप्ति तथा सुखमय जीवन के साथ जोड़ कर देखते हैं | पानी में तैरती हुई एक मछली को रेवती नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह के रूप में माना जाता है | कुछ लोग मानते हैं कि मछली का जल में तैरना उस आत्मा का प्रतीक है तो भवसागर में अनेकों तूफ़ानों को झेलते हुए निरन्तर आगे बढ़ने का तथा मोक्ष का मार्ग ढूँढ़ रही है | इस मान्यता के पीछे सम्भवतः एक कारण यह भी हो सकता है कि रेवती नक्षत्र का सम्बन्ध मीन राशि से है, और मीन राशि राशि चक्र की अन्तिम राशि होने के कारण मृत्यु के पश्चात के जीवन तथा मोक्ष की यात्रा की प्रतीक भी मानी जाती है | साथ ही एक मान्यता यह भी है कि जिस प्रकार मछली जल में ही प्रसन्न रहती है तथा उसके चारों अथाह जल रहता है उसी प्रकार रेवती नक्षत्र के जातक इस संसार में सदा सुखी रहते हैं और समस्त प्रकार की सुख सुविधाओं का उपभोग करते हैं |

रेवती नक्षत्र के सम्बन्ध में श्रीमद्देवीभागवत में एक प्रसंग उपलब्ध होता है कि ऋत्वाक मुनि का पुत्र रेवती नक्षत्र के अन्तिम चरण में हुआ था – जिसे ज्योतिषी गण्डान्त मानते हैं | गण्डान्त में जन्म होने के कारण वह अत्यन्त दुराचारी बन गया था | ऋषि ने इसका सारा दोष रेवती नक्षत्र को दिया और उसे अपने श्राप से नक्षत्र मण्डल से नीचे गिरा दिया | जिस पर्वत पर रेवती का पतन हुआ उसे ऋत्विक अथवा रेवतक पर्वत कहा जाने लगा तथा उस पर्वत का सौन्दर्य कई गुना बढ़ गया | जिससे प्रभावित होकर प्रमुच मुनि ने अपनी रूपवती दत्तक पुत्री का नाम भी रेवती रख दिया | उसके विवाहयोग्य होने पर स्वयंभुव मनु के वंशज राजा दुर्दम ने उसके साथ विवाह की इच्छा प्रकट की तब रेवती ने कहा कि ठीक है, मैं विवाह के लिए तैयार हूँ, लेकिन अपने नाम वाले रेवती नक्षत्र में ही मैं विवाह संस्कार कराना चाहती हूँ | मुनि प्रमुच जानते थे कि रेवती को तो अब नक्षत्र मण्डल में कोई स्थान प्राप्त है नहीं तो उस नक्षत्र में विवाह कैसे सम्पन्न हो सकता है ? तब रेवती ने अपने पिता से कहा कि यदि एक ऋषि ने अपने क्रोधवश अकारण ही रेवती को पदच्युत कर दिया तो आप भी उतने ही महान ऋषि हैं, आप क्या उसे फिर से उसका स्थान नहीं दिला सकते ? तब प्रमुच ऋषि ने रेवती को फिर से सोममार्ग में उसका स्थान वापस दिलाया | इस प्रकार रेवती नक्षत्र इस बात का भी प्रतीक माना जाता है कि यदि किसी कारण वश किसी व्यक्ति का सब कुछ नष्ट हो भी जाए तो भी वह गुरु कृपा से सब कुछ पुनः प्राप्त कर सकता है |

रेवती का देवता पूषा को माना जाता है और पूषा आत्मा, प्रकाश तथा जीवनी शक्ति के कारक सूर्य का ही एक नाम है | साथ ही पूषा समृद्धि का देवता भी माना जाता है | सूर्य संचार प्रणाली के भी द्योतक माना जाता है | इस प्रकार ज्योतिषियों की यह मान्यता भी दृढ़ हो जाती है कि जो व्यक्ति रेवती नक्षत्र के प्रभाव में होते हैं वे धनवान, उदार तथा आधुनिक समय में मीडिया आदि से सम्बन्धित किसी कार्य में संलग्न हो सकते हैं |

भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम की पत्नी का नाम रेवती था | गाय के लिए तथा नींबू के वृक्ष के लिए भी रेवती शब्द का प्रयोग किया जाता है | माना जाता है कि शनि की उत्पत्ति भी रेवती के गर्भ से हुई थी और इसीलिए शनि का एक नाम “रेवतीभव” भी है | स्पष्ट करना, प्रदर्शन करना, चमकना, आनन्दोत्सव मनाना तथा सौन्दर्य आदि के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | अन्य नाम हैं अन्त्य – क्योंकि नक्षत्र मण्डल का अन्तिम नक्षत्र होता है | उदार पीड़ा के निवारण के लिए किसी विशेष वृक्ष की मूल का उपयोग किया जाता है – उसे भी रेवती कहा जाता है | आरोह अर्थात ऊपर चढ़ने के क्रम में सबसे अन्तिम संख्या के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | अगस्त सितम्बर के महीनों में यह नक्षत्र आता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/12/06/constellation-nakshatras-30/

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

शतभिषज

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण और धनिष्ठा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा शतभिषज नक्षत्र के विषय में |

“पंचक” के पाँच नक्षत्रों के समूह का दूसरा नक्षत्र तथा नक्षत्र मण्डल का चौबीसवाँ नक्षत्र है शतभिषज | इस नक्षत्र में सौ तारों का समावेश होता है इसलिए इसका नाम शतभिषज है | इसका एक नाम शत्तारक भी है – जिसका भी शाब्दिक अर्थ यही है – सौ तारों का एक समूह | बहुत से Astrologers का मानना है कि इस नक्षत्र का सम्बन्ध रोग अथवा चिकित्सा से है | जो सत्य ही प्रतीत होता है | क्योंकि शत अर्थात सौ प्रकार की भिषज यानी औषधियाँ | सौ का अर्थ यहाँ सौ की गिनती से नहीं लिया जाना चाहिए अपितु अनेक प्रकार की औषधियों से लिया जाना चाहिए | विभेत्यस्मात् रोगः इति भिषजः – जिससे रोग डरें वह भिषज – अर्थात डॉक्टर वैद्य आदि | अन्य अर्थ हैं इलाज़ करना, भगवान् विष्णु, वरुण देव, समुद्र के देवता अथवा दक्षिण दिशा के स्वामी, आकाश, जल आदि | यह नक्षत्र जुलाई और अगस्त के मध्य श्रावण माह में पड़ता है | एक गोलाकार रिक्त स्थान इस नक्षत्र का प्रतीक माना जाता है | रिक्त गोल की विशेषताएँ होती हैं कि इस गोलाकार वृत्त की सीमाओं के भीतर इतना स्थान होता है कि इसमें चाहे जितना भी समाया जा सकता है | किन्तु जो वस्तुएँ इसके भीतर समाई जाएँगी उन्हें भी यह वृत्त सीमित कर देता है | इसका अभिप्राय यही है कि इस नक्षत्र के जातकों में हर किसी को अपना बना लेने की सामर्थ्य होती है | साथ ही सीमाएँ सुरक्षा की भी द्योतक होती हैं | जिसका अर्थ हुआ कि इस नक्षत्र का जातक एक अधिकारी के रूप में सीमाओं का निर्धारण भी कर सकता है तथा रक्षा करने में समर्थ होता है – फिर चाहे वह रक्षा एक चिकित्सक के रूप में किसी रोग से हो अथवा एक सेनानी के रूप में किसी शत्रु से अथवा परिवार या समाज या राष्ट्र के प्रभावशाली मुखिया के रूप में अपने परिवार, समाज अथवा राष्ट्र की विपरीत परिस्थितियों में रक्षा का प्रश्न हो – इस नक्षत्र का जातक सदैव तत्पर रहता है |

वृत्त का अर्थ पूर्णता अथवा समाप्ति भी हो सकता है – क्योंकि एक वृत्त हर ओर से पूर्ण ही प्रतीत होता है | इस प्रकार यह भी माना जा सकता है कि इस नक्षत्र के जातकों में आत्मविश्वास के साथ ही पूर्णता अथवा सन्तुष्टि का भाव भी प्रबल रूप हो सकता है | साथ ही कार्य को समय पर पूर्ण करने में भी ऐसे जातक सक्षम हो सकते हैं | इसके अतिरिक्त वृत्त अपनी सीमाओं में रहता है – जिसका यह भी अर्थ निकाला जा सकता है कि इस नक्षत्र के जातक अन्तर्मुखी प्रवृत्ति के हो सकते हैं |

इस नक्षत्र में सौ तारे एक वृत्त के रूप में समाहित हैं जो इस बात का भी प्रतीक हैं कि इस नक्षत्र का जातक अपने मन के भीतर बहुत से ऐसे तथ्यों को अथवा रहस्यों को छिपा रखने में समर्थ होता है जिनके विषय में किसी को कुछ भी भान न हो | साथ ही इसका यह भी तात्पर्य है कि इस नक्षत्र का जातक बहुत सा ज्ञान अपने मस्तिष्क में समाए हुए है | बहुआयामी व्यक्तित्व का भी धनी ऐसा व्यक्ति हो सकता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/11/23/constellation-nakshatras-28/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

मूल

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं मूल नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में |

मूल का शाब्दिक अर्थ है जड़ अथवा किसी वस्तु का उद्गम स्थान या किसी व्यक्ति के वंश का उद्गम, आरम्भ, मुख्य स्रोत अथवा वास्तविक कारण | किन्हीं वस्तुओं को परस्पर जोड़ने वाले किनारों को भी मूल कहा जाता है | आधार को भी मूल कहा जाता है | किसी राज्य की राजधानी भी मूल कहलाती है | नाभि अथवा जननेन्द्रिय के ऊपर का रहस्यमय वृत्त भी मूल कहलाता है | इस नक्षत्र में ग्यारह तारे होते हैं | इसका अन्य नाम है निर्यति – बाहर निकलना, प्रस्थान करना | राक्षसों तथा दुष्टात्माओं के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | नन्द के एक मन्त्री का नाम भी यही था | रक्षक के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | अस्रप – रक्तपायी एक राक्षस का नाम भी मूल था | यह नक्षत्र भी ज्येष्ठ माह में मई और जून के मध्य आता है |

मूल का शाब्दिक अर्थ है केन्द्रीय बिन्दु, सबसे भीतरी बिन्दु अथवा किसी पेड़ पौधे की जड़ और इस के अनुसार मूल नक्षत्र को सीधा तथा स्पष्ट, विषय की जड़ तक पहुँचने की क्षमता रखना तथा ऐसी ही अन्य विशेषताओं के देखा जा सकता है | वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक साथ बंधी हुई कुछ पौधों की जड़ों को मूल नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा इस प्रतीक चिन्ह से भी विभिन्न Astrologer विभिन्न प्रकार के अर्थ निकालते हैं | जिनमें एक अर्थ यह भी निकाला जाता है कि मूल नक्षत्र के जातकों में समस्त परिवार तथा समाज को एक साथ बाँध रखने की सामर्थ्य होती है | कुछ विद्वानों की मान्यता है कि जिस प्रकार वृक्ष की जड़ अर्थात मूल भूगर्भा होती है अतः उसके विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार मूल नक्षत्र भी बहुत से रहस्यों, गुप्त विद्याओं तथा अदृश्य शक्तियों का प्रतीक होता है | साथ ही किसी भी रहस्य को गुप्त रखने में सक्षम होते हैं तथा रहस्य विद्याओं के ज्ञाता भी होते हैं | कुछ का मानना है कि जिस प्रकार वृक्ष का मूल वृक्ष को किसी भी परिस्थिति में दृढ़ खड़े रहने की सामर्थ्य प्रदान करता है कुछ उसी प्रकार का स्वभाव मूल नक्षत्र के जातकों का भी होता है |

कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि मूल नक्षत्र के जातकों की प्रवृत्ति होती है किसी भी विषय की जड़ तक पहुँचना इसलिए वे शोध कार्यों में निष्णात होते हैं | साथ ही सीधा स्पष्ट स्वभाव होने के कारण ये जातक स्पष्टवादी होते हैं – भले ही उनका कथन किसी को उचित न लगे | जैसे वृक्ष की जड़ को इस बात की कोई चिन्ता नहीं होती कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है उसी प्रकार ये जातक भी इस बात पर कोई ध्यान नहीं देते की उनके साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है | जिस प्रकार वृक्ष को काट देने के पश्चात भी वह अपनी जड़ों के माध्यम से अपने शरीर और शक्ति को पुन: प्राप्त कर लेने में सक्षम होता है उसी प्रकार मूल नक्षत्र के जातक भी भी अपनी खोई हुई शक्ति तथा आधिपत्य पुन: प्राप्त कर लेने की क्षमता रखते हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/11/13/constellation-nakshatras-24/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

ज्येष्ठा

दीपावली के सारे पर्व सम्पन्न हो चुके | अब पुनः लौटते हैं अपनी नक्षत्र-वार्ता पर | ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा और अनुराधा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं ज्येष्ठा नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में |

ज्येष्ठ – जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है – बड़ा, किसी क़बीले का अथवा परिवार का मुखिया – सबसे बड़ा सदस्य | गंगा नदी के लिए भी ज्येष्ठा शब्द का प्रयोग किया जाता है | छिपकली को भी ज्येष्ठा कहा जाता है | यह नक्षत्र ज्येष्ठ माह में आता है मई और जून के मध्य पड़ता है | इस नक्षत्र में तीन तारे होते हैं | मध्यमा अँगुली को भी ज्येष्ठा कहा जाता है | देवी लक्ष्मी की बड़ी बहिन भी ज्येष्ठा कहलाती है | पौराणिक सन्दर्भों में दुर्भाग्य की कारक देवी भी ज्येष्ठा कहलाती है | इन्द्र के जितने भी नाम हैं जैसे शक्र, पुरन्दर आदि वे सब नाम भी इस नक्षत्र के लिए प्रयुक्त होते हैं | ज्येष्ठा के आगमन के साथ ही नौ नक्षत्रों की मघा नक्षत्र से आरम्भ हुई श्रृंखला का अन्त हो जाता है | ज्येष्ठा का अर्थ है सबसे बड़ा तथा इसी इसी कारण से बड़ा, परिपक्व, सुनियोजित आदि अर्थों में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | बहुत से Astrologers की ऐसी भी मान्यता है कि जातक पर यदि ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रबल प्रभाव हो तो वह समय से पूर्व ही मानसिक रूप से परिपक्व हो जाता है और शारीरिक रूप से भी अपनी अवस्था से बड़ा दिखाई देने लगता है | पारलौकिक तथा परा विज्ञान से सम्बन्धित ज्ञान के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है |

प्रभुतासम्पन्न व्यक्ति के लिए ज्येष्ठ शब्द का प्रयोग किया जाता है | छाते को भी ज्येष्ठा नक्षत्र का चिह्न माना जाता है | छाते का प्रयोग धूप वर्षा आदि से बचाव के लिए भी क्या जाता है तथा राजा महाराजा भी अपने प्रभुत्व के प्रदर्शन के लिए छत्र का प्रयोग करते थे | इस प्रकार ज्येष्ठा नक्षत्र को रक्षा, सुरक्षा, परिपक्वता, पारलौकिक तथा प्रभुता आदि के साथ भी जोड़ा जा सकता है | ज्येष्ठा नक्षत्र का अधिपति देवराज इन्द्र को माना जाता है – यह भी इस तथ्य का द्योतक है कि प्रभुत्व के अर्थ में इस नक्षत्र की और देखा जाता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/11/10/constellation-nakshatras-23/

लक्ष्मी पूजन का मुहूर्त

जैसा कि सभी जानते हैं कि दीपावली बुराई, असत्य, अज्ञान, निराशा, निरुत्साह, क्रोध, घृणा तथा अन्य भी अनेक प्रकार के दुर्भावों रूपी अन्धकार पर सत्कर्म, सत्य, ज्ञान, आशा तथा अन्य अनेकों सद्भावों रूपी प्रकाश की विजय का पर्व है और इस दीपमालिका के प्रमुख दीप हैं सत्कर्म, सत्य, ज्ञान, आशा, उत्साह, प्रेम, स्नेह आदि सद्भाव | अस्तु, सर्वप्रथम सभी को दीपावली के प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

इस दिन लक्ष्मी पूजा का विधान है | लक्ष्मी पूजा एक विशेष मुहूर्त में की जाती है और इसके विषय में कई मतान्तर हैं | कुछ लोगों का मानना है कि प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजन किया जाना चाहिए | प्रदोष काल सूर्यास्त से कुछ समय पूर्व आरम्भ होता है और लगभग दो घन्टे चौबीस मिनट तक रहता है | कुछ तान्त्रिक विधि से लक्ष्मी पूजन करने वाले लोग तथा कर्मकाण्ड में अत्यन्त दक्ष लोगों की मान्यता है कि महानिशीथ काल में लक्ष्मी पूजा की जानी चाहिए | लेकिन जन साधारण के लिए प्रदोषकाल में लक्ष्मी पूजन का उपयुक्त समय है | इसमें भी स्थिर लग्न का ध्यान रखने की सलाह गुणीजन देते हैं |

आज रात्रि 10:27 से अमावस्या तिथि आ जाएगी, किन्तु उदया तिथि कल यानी 7 नवम्बर को ही होगी | इस दिन रात्रि 09:32 तक अमावस्या है और उसके बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा लग जाएगी | इसलिए उससे पूर्व ही लक्ष्मी पूजन किया जाएगा | सामान्यतः प्रदोष काल और वृषभ लग्न लक्ष्मी पूजा के लिए सबसे उपयुक्त मुहूर्त होता है | पञ्चांग की गणना के अनुसार सायं 6 बजे से रात्रि 07:54 तक प्रदोष काल में वृषभ लग्न रहेगी अतः यही लग्न सर्व साधारण के लिए लक्ष्मी पूजन के लिए उपयुक्त मुहूर्त है | इस वर्ष सायं सात बजकर छत्तीस मिनट तक चन्द्रमा स्वाति नक्षत्र में है और उसके बाद विशाखा नक्षत्र में चला जाएगा | साथ ही इस वर्ष तुला राशि में सूर्य, चन्द्र और शुक्र का त्रिग्रही योग बन रहा है जो अत्यन्त शुभ माना जाता है | इसके अतिरिक्त आयुष्मान योग और सौभाग्य योग भी बन रहे हैं | ये दोनों योग भी अपने नामों के ही अनुसार फल देने वाले योग हैं | बहुत से व्यापारी लोग निशीथ काल में लक्ष्मी पूजा करना चाहते हैं उनके लिए 20:11 से 22:51 तक निशीथ काल रहेगा | कुछ तान्त्रिक विधि से उपासना करने वाले लोग महानिशीथ काल और सिंह काल में पूजा करते हैं | महानिशीथ काल 23:14 से 24:06 तक रहेगा और सिंह काल (लग्न) 24:30 से 26:46 तक | किन्तु प्रायः जन साधारण के लिए प्रदोष काल और वृषभ लग्न में ही लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त है – यानी सायं 6 बजे से रात्रि 07:54 के मध्य |

दीपावली पर्व प्रकाश का पर्व है | माँ लक्ष्मी की कृपा दृष्टि सभी पर बनी रहे और इस अवसर पर प्रज्वलित दीपमालिका के प्रत्येक दीप की प्रत्येक किरण सभी का जीवन सुख-शान्ति-उल्लास-प्रेम-सौभाग्य-स्नेह और ज्ञान के आलोक से आलोकित करे… इसी कामना के साथ सभी को एक बार पुनः दीपावली की अनेकशः हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/11/06/muhurta-for-lakshami-poojan/

 

नक्षत्र – एक विश्लेषण

स्वाति नक्षत्र

नक्षत्रों की वार्ता को ही और आगे बढाते हैं | ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों के विषय में हम बात कर रहे हैं | इस क्रम में अब तक अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, दोनों फाल्गुनी, हस्त और चित्रा नक्षत्रों के विषय में हम बात कर चुके हैं | आज चर्चा करते हैं स्वाति नक्षत्र के नाम और उसके अर्थ के विषय में |

यह नक्षत्र एक अत्यन्त ही शुभ नक्षत्र माना जाता है | नक्षत्र मण्डल में स्वाति नक्षत्र पन्द्रहवाँ नक्षत्र है | चित्रा नक्षत्र की ही भाँति इस नक्षत्र में भी स्वाति नाम का एक ही तारा होता है जिसके नाम पर इस नक्षत्र का नाम पड़ा है | सूर्य की पत्नी का नाम भी स्वाति है | तलवार के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है | लोकमान्यता है कि सीपी के मुख में जब स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूँदें पड़ती हैं तो वे मोती बन जाती हैं और यही मोती असली मोती होता है जो निश्चित रूप से बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होता है | कहने का अभिप्राय यह है कि असली मोती बनाया नहीं जा सकता अपितु स्वतः उत्पन्न होता है और अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही विकसित भी होता है | इसी प्रकार मूँगा भी स्वतः उत्पन्न वृक्ष से प्राप्त एक फल है – अर्थात इस वृक्ष की उत्पत्ति या प्रजनन स्वतः ही होता है तथा इसका विकास भी स्वतः ही होता है – न इसे किसी प्रकार बनाया जा सकता है न ही इसके विकास में किसी प्रकार की खाद पानी आदि से सहायता की जा सकती है | जिस आकार में भी और जितना अधिक एक मूँगे को अथवा मोती को बढ़ना होगा वह उतना ही बढ़ेगा | इस प्रकार स्वाति शब्द प्रजनन क्षमता तथा विकास और आत्म निर्भरता का भी द्योतक है |

चातक पक्षी के विषय में कहा जाता है कि वह वर्ष भर स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूँदों की प्रतीक्षा में धैर्यपूर्वक आकाश की ओर ताकता रहता है और स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूँदों का पान करके ही अपनी प्यास बुझाता है और सन्तुष्टि का अनुभव करता है | इस प्रकार स्वाति शब्द धैर्य और सन्तुष्टि का भी पर्याय बन जाता है | हमारे कवियों ने उपमान के रूप में इस कथा के बड़े ही सुन्दर प्रयोग किये हैं | स्वेनैव अतति या सा स्वाति – स्वभाव से भ्रमणशील, स्वतन्त्र अथवा स्वच्छन्द आचरण करने वाला | इस नक्षत्र के अन्य नाम तथा भाव हैं वायु | यह नक्षत्र भी चित्रा नक्षत्र की ही भाँति चैत्र माह में आता है जो मार्च और अप्रेल के मध्य पड़ता है |

संस्कृत ग्रन्थों में स्वाति शब्द को स्वतन्त्रता, कोमलता तथा तलवार आदि के लिए भी प्रयुक्त किया गया है | इन्हीं समस्त अर्थों से स्वाति नक्षत्र की विशेषताओं का भी कुछ भान हो जाता है | इसके अतिरिक्त हवा में झूलते हुए छोटे से पौधे को स्वाति नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है | छोटा सा पौधा बच्चों की भाँति मुलायम होता है – स्निग्ध होता है – और सम्भवतः इसीलिए स्वाति शब्द का प्रयोग कोमलता तथा स्निग्धता के पर्याय के रूप में भी किया जाता रहा है | साथ ही एक सत्य और इस नाम के साथ प्रतिध्वनित होता है – वह यह कि यदि वायु का वेग तेज़ हो तो इस नन्हे से पौधे को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए बहुत अधिक प्रयास करना पड़ता है | पवन के थपेड़े उसे इधर से उधर झुलाते रहते हैं किन्तु यह नन्हा सा पौधा अपनी पूरी शक्ति के साथ उस वायु वेग से संघर्ष करता है और अपना अस्तित्व बचाए रखने का प्रयास करता है | इस प्रकार स्वाति शब्द का प्रयोग संघर्ष तथा क्षमता के अर्थ में भी किया जाता है |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

फाल्गुनी और हस्त नक्षत्र

ज्योतिष में मुहूर्त गणना, प्रश्न तथा अन्य भी आवश्यक ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पञ्चांग के आवश्यक अंग नक्षत्रों के नामों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ तथा पर्यायवाची शब्दों पर चर्चा के क्रम में अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा और मघा नक्षत्रों के नामों पर बात करने के पश्चात आज चर्चा करते हैं फाल्गुनी और हस्त नक्षत्रों के नामों की निष्पत्ति तथा इनके अर्थ के विषय में |

फाल्गुनी :-

नक्षत्र मण्डल में दोनों फाल्गुनी नक्षत्र ग्यारहवें और बारहवें क्रम में आते हैं | फाल्गुन माह में ये दोनों फाल्गुनी नक्षत्र आते हैं इसीलिए इस माह का नाम फाल्गुन पड़ा है | यह माह फरवरी और मार्च के मध्य आता है | इन्द्र का भी एक नाम फाल्गुनी है | दोनों फाल्गुनी – पूर्वा फाल्गुनी और उतर फाल्गुनी – नक्षत्रों में प्रत्येक में दो दो तारे होते हैं | वसन्त ऋतु भी इसी माह में आती है अतः उसे भी फाल्गुन अथवा लौकिक भाषा में फागुन या फाग कहा जाता है | इस नक्षत्र की व्युत्पत्ति फल्गु शब्द से हुई है, जिसके शाब्दिक अर्थ हैं रस और बल का अभाव, निरर्थक, लघु, क्षुद्र, बहुत थोड़ा इत्यादि | गूलर के वृक्ष को भी फल्गु कहा जाता है | अर्जुन का जन्म फाल्गुनी नक्षत्र में हुआ था इस कारण उन्हें भी फाल्गुनी ही कहा जाने लगा | गुरु का जन्म नक्षत्र भी फाल्गुनी होने के कारण गुरु अर्थात बृहस्पति को फाल्गुनीभव कहा जाता है | इन दोनों नक्षत्रों के अन्य नाम तथा उसके अर्थ हैं भग अर्थात भाग्य (Destiny), सौभाग्य (Good Fortune), सम्पन्नता, गरिमा, गुण, आदर्श आदि | प्रयास करने के अर्थ में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है | लाल रंग के लिए भी फाल्गुनी शब्द का प्रयोग किया जाता है | एक नाम योनि भी है | झरने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है | पितृगणों के प्रमुख तथा द्वादश आदित्यों में से एक देवता “अर्यमा” के लिए भी भग शब्द का प्रयोग होता है |

पूर्वा फाल्गुनी

उत्तर फाल्गुनी

हस्त :-

यह नक्षत्र मण्डल का तेरहवाँ नक्षत्र है | हस्त अर्थात हाथ तथा हाथी की सूँड | इस नक्षत्र में पाँच तारे होते हैं | इसके अन्य नाम हैं रवि, कर, सूर्य | फरवरी और मार्च के महीनों में फाल्गुन माह में दोनों फाल्गुनी नक्षत्रों के बाद यह नक्षत्र आता है |

हस्त

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/20/constellation-nakshatras-18/