मेरा अन्तर इतना विशाल

मेरा अन्तर इतना विशाल

समुद्र से गहरा / आकाश से ऊँचा / धरती सा विस्तृत

जितना चाहे भर लो इसको / रहता है फिर भी रिक्त ही

अनगिन भावों का घर है ये मेरा अन्तर

कभी बस जाती हैं इसमें आकर अनगिनती आकाँक्षाएँ और आशाएँ

जिनसे मिलता है मुझे विश्वास और साहस / आगे बढ़ने का

क्योंकि नहीं है कोई सीमा इस मन की

चाहे जितनी ऊँची पेंग बढ़ा लूँ / छू लूँ नभ को भी हाथ बढ़ाकर

क्योंकि धरती और आकाश दोनों ही हैं मेरा घर

या पहुँच जाऊँ नभ के भी पार / जहाँ न हो धरती का भी कोई आकर्षण

या चाहे अपनी कल्पनाओं से करा दूँ मिलन / धरा और आकाश का

इतना कुछ छिपा है मेरे इस अन्तर में / फिर भी है ये रीता का रीता

खिले हैं अनगिनती पुष्प मेरे अन्तर में

आशाओं के, विश्वासों के, उत्साहों के

न तो कोई दीवार है इसके चारों ओर / न ही कोई सीमा इसकी

अतुलित स्नेह का भण्डार मेरे इस अन्तर में

आ जाता है जो एक बार / नहीं लौटता फिर वो रिक्त हस्त

अपने इसी खालीपन में तो मिलता है मुझे

विस्तार अपार

नहीं चाहती भरना इसे पूरी तरह

भर गया यदि यह रीता घट / तो कहाँ रह जाएगा स्थान

नवीन भावनाओं के लिए… नवीन आशाओं के लिए…

इसीलिए तो प्रिय है मुझे

अपना ये विशाल अन्तर

क्योंकि रहता है सदा इसमें / अवकाश अपार…

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

हम सभी जानते हैं कि ज्योतिष एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और सम सामयिक विषय है | वेदांगों के अन्तर्गत ज्योतिष को अन्तिम वेदान्त माना गया है | प्रथम वेदांग है शिक्षा – जिसे वेद की नासिका माना गया है | दूसरा वेदांग है व्याकरण जिसे वेद का मुख माना जाता है | तीसरे वेदांग निरुक्त को वेदों का कान, कल्प को हाथ, छन्द को चरण और ज्योतिष को वेदों का नेत्र माना जाता है |

वेद की प्रवृत्ति यज्ञों के सम्पादन के निमित्त हुई थी | और यज्ञों का सम्पादन विशेष मुहूर्त में ही सम्भव है | इसी समय विशेष के निर्धारण के लिए ज्योतिष की आवश्यकता प्रतीत हुई | और इस प्रकार ग्रह नक्षत्रों से सम्बन्धित ज्ञान ही ज्योतिष कहलाया | नक्षत्र, तिथि, पक्ष, मास, ऋतु तथा सम्वत्सर – काल के इन समस्त खण्डों के साथ यज्ञों का निर्देश वेदों में उपलब्ध है | वास्तव में तो वैदिक साहित्य के रचनाकाल में ही भारतीय ज्योतिष पूर्णरूप से अस्तित्व में आ चुका था | सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में इसके प्रमाण इधर उधर बिखरे पड़े हैं | हमारे ऋषि मुनि किस प्रकार समस्त ग्रहों नक्षत्रों से अपने और समाज के लिए मंगल कामना करते थे इसी का ज्वलन्त उदाहरण है प्रस्तुत मन्त्र:

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: |

स्वस्ति न तार्क्ष्योSरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ||

प्रस्तुत मन्त्र में राशि चक्र के समान चार भाग करके परिधि पर समान दूरी वाले चारों बिन्दुओं पर पड़ने वाले नक्षत्रों से अपने व समस्त संसार के कल्याण की कामना इन ऋषि मुनियों ने की है | इन्द्र से चित्रा का, पूषा से रेवती का, तार्क्ष्य से श्रवण का तथा बृहस्पति से पुष्य नक्षत्रों का ग्रहण किया गया है | चित्रा का अन्तिम भाग कन्या राशि के अन्त पर और रेवती का अन्तिम भाग मीन राशि के अन्त पर 180 अंश का कोण बनाते हैं | यही स्थिति श्रवण व पुष्य नक्षत्रों की मकर व कर्क राशियों में है |

तैत्तिरीय शाखा के अनुसार चित्रा नक्षत्र का स्वामी इन्द्र को माना गया है | भारत में प्राचीन काल में नक्षत्रों के जो स्वरूप माने जाते थे उनके अनुसार चित्रा नक्षत्र का स्वरूप लम्बे कानों वाले उल्लू के जैसा माना गया है | अतः इन्द्र का नाम वृद्धश्रवा भी है | जो सम्भवतः इसलिए भी है कि इन्द्र को लम्बे कानों वाले चित्रा नक्षत्र का अधिपति माना गया है | अतः यहाँ वृद्धश्रवा का अभिप्राय चित्रा नक्षत्र से ही है | पूषा का नक्षत्र रेवती तो सर्वसम्मत ही है | तार्क्ष्य शब्द से अभिप्राय श्रवण से है | श्रवण नक्षत्र में तीन तारे होते हैं | तीन तारों का समूह तृक्ष तथा उसका अधिपति तार्क्ष्य | तार्क्ष्य को गरुड़ का विशेषण भी माना गया है | और इस प्रकार तार्क्ष्य उन विष्णु भगवान का भी पर्याय हो गया जिनका वाहन गरुड़ है | अरिष्टनेमि अर्थात कष्टों को दूर करने वाला सुदर्शन चक्र – भगवान विष्णु का अस्त्र | पुष्य नक्षत्र का स्वामी देवगुरु बृहस्पति को माना गया है | विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में नक्षत्र पुरुष का विस्तृत वर्णन मिलता है | उसके अनुसार भगवान विष्णु ने अपने शरीर के ही अंगों से अभिजित सहित 28 नक्षत्रों की उत्पत्ति की और बाद में दयावश अपने ही शरीर में रहने के लिए स्थान भी दे दिया | बृहत्संहिता में भी इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/19/constellation-nakshatras-2/

मौन का लक्ष्य

कोई अस्तित्व न हो शब्दों का, यदि हो न वहाँ मौन का लक्ष्य |

कोई अर्थ न हो मौन का, यदि निश्चित न न हो वहाँ कोई ध्येय |

मौन का लक्ष्य है प्रेम, मौन मौन का लक्ष्य है दया

मौन का लक्ष्य है आनन्द, और मौन मौन का है लक्ष्य संगीत भी |

मौन, ऐसा गीत जो कभी गाया नहीं गया,

फिर भी मुखरित हो गया |

मौन, ऐसा सन्देश जो कभी सुना नहीं गया

फिर भी ज्ञात हो गया |

मौन, एक भाषा, जिसकी कोई लिपि नहीं |

मौन, एक नृत्य, जिसकी कोई मुद्रा नहीं |

मौन, स्थिरता की ऐसी ऊर्जा, जिसका कोई रूप नहीं |

मौन, एक शब्दहीन शब्द

इसीलिये नहीं हो सकती अनुचित व्याख्या इसकी |

प्रश्न केवल इतना ही

क्यों रुदन करते हैं हम जन्म लेते समय ?

क्यों नहीं जन्म ले सकते हम मौन भाव से ?

ताकि हमारी सत्ता ही बन जाए हमारा मोक्ष

और भाव बन जाए अभाव ?

निशा से भोर तलक – भोर से फिर निशा तलक – एक कहानी

हर सुबह आती है लेकर एक नई कहानी…

हर नवीन दिवस के गर्भ में छिपे होते हैं

न जाने कितने रहस्य निशा बावरी के…

जैसे जैसे चढ़ता है दिन / होने लगते हैं अनावृत जो धीरे धीरे…

जो बनाते हैं हमें सक्षम

ताकि कर सकें हम पालन अपने समस्त कर्तव्यों का…

हर दिन का सौन्दर्य होता है दिव्य और अनूठा…

ऐसा दिव्य / ऐसा अनूठा / जो करता है नृत्य सूर्यकिरणों संग

और खोलता है एक रहस्य / कि जीवन नहीं है बोझ…

जीवन तो है एक उत्सव / प्रकाश का / गीत और संगीत का / नृत्य का…

फिर धीरे धीरे ढलता है दिन

उतरती आती है सन्ध्या परी / हौले हौले / लुटाती अपना मादक सौन्दर्य…

जिसे देख आरम्भ हो जाती है मौन साधना दिवस की

ताकि बचा रहे बहकने से / सन्ध्या सुन्दरी के यौवन की मदिरिमा से…

और मिल जाता है अवकाश उस सुन्दरी को

सुनाने को अपना राग जगत प्रियतम को…

आरम्भ कर देती है झिलमिलाते तारकों संग मस्ती भरा नृत्य

धवल चन्द्रिका के मधुहास युक्त सरस गान पर…

और जब थक कर हो जाती है बेसुध / तो आती है शान्त निशा

ले जाती है सखी सन्ध्या को / ढाँप कर अपने आँचल में

और मौन हो छिप जाती हैं भोर के पीछे दोनों सखियाँ

करने को कुछ पल विश्राम…

तब फिर से सुबह आती है लेकर एक नई कहानी

और देती है संदेसा निज प्रियतम को

कि आएँ / और प्रस्तुत करें नृत्य रजत रश्मियों संग

सृष्टि के मनोरम सभागार में

दिवस निशा का ये खेल / देता है संदेसा हर जन को

कि मत बैठो थक कर / चाहे कितना भी किया हो श्रम

बढ़ते जाओ अपनी दिशा में… पाना है जो लक्ष्य अपना…

कि मत घबराओ / यदि हो जाए कोई द्वार बन्द

देखो आगे बढ़कर / खुलेगा कोई नया द्वार

आशा का / विश्वास का / उत्साह का / उमंग का

जो पहुँचायेगा लक्ष्य तक तुम्हें

निर्बाध / निरवरोध

क्योंकि यही तो क्रम है सृष्टिचक्र का… प्रकृति का…

शाश्वत… सत्य… चिरन्तन…

 

 

संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – हम बात कर रहे हैं सीमन्तोन्नयन संस्कार की – आज की भाषा में जिसे “बेबी शावर” कहा जाता है | यह संस्कार भी गर्भ संस्कारों का एक महत्त्वपूर्ण अंग है | पारम्परिक रूप से ज्योतिषीय गणनाओं द्वारा शुभ मुहूर्त निश्चित करके उस मुहूर्त में यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था | इस संस्कार के समय सौभाग्यवती स्त्रियाँ गर्भवती का पूर्ण श्रृंगार करती थीं | पति पत्नी के साथ नवग्रह आदि का पूजन करके कुछ इस प्रकार संकल्प लेता था “ॐ अद्येत्यादि अमुकनाम्नोSहं ममास्या भार्यायां गर्भाभिवृद्धिपरिपन्थिपिशितप्रियाSलक्ष्मीभूतराक्षसगण निरसनक्षेम सकलसौभाग्यनिधानलक्ष्मीसमावेशनद्वारा बीजगर्भसमुद्भवैनौनिबर्हणाय श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थं स्त्रीसंस्काररूपं सीमन्तोनयनकर्म करिष्ये |”

इसके बाद कुशा के द्वारा विधि विधान पूर्वक समस्त दिशाओं को तथा स्वयं को भी स्त्री पवित्र करती थी | वेदी को पवित्र किया जाता था | उसके बाद पति मंगल नामक अग्नि का पूजन करके गर्भिणी के बालों के पाँच भाग करके पाँच चोटियाँ बनाकर उनमें सुगन्धित वनस्पतियों की वेणी लगाता था | सौभाग्यवती स्त्रियाँ गर्भिणी को आशीर्वाद देती थीं | और यज्ञ के अन्त में पति पत्नी दोनों मिलकर फल पुष्प युक्त घी की पूर्णाहुति यज्ञाग्नि में देते थे | बाद में पति पत्नी को हरे भरे उपवन के दर्शन कराए जाते थे | आज भी कुछ पारम्परिक (Traditional) परिवारों में यह प्रथा जीवित है |

इस आयोजन का तात्पर्य होता यही था कि हर्षोल्लास के वातावरण के चलते गर्भिणी का मन प्रसन्न रहे ताकि वह एक स्वस्थ और प्रसन्नचित्त सन्तान को जन्म दे सके | साथ ही गर्भिणी की देखभाल करने वाले परिजनों के लिए भी यह सलाह दोहराई जाती थी कि किस प्रकार गर्भिणी के लिए अनुकूल वातावरण तथा पौष्टिक भोजन की व्यवस्था की जानी चाहिए | क्योंकि माता प्रसन्नचित्त रहेगी तो सन्तान भी प्रसन्नचित्त, बलिष्ठ तथा दीर्घायु होगी | प्रसन्न तथा शान्त चित्त से जब माता गर्भस्थ शिशु के साथ वार्तालाप करती है तो उसका बड़ा गहरा प्रभाव शिशु पर पड़ता है | शिशु – एक पवित्र, मासूम किन्तु पूर्ण रूप से ज्ञानवान आत्मा – अपनी इच्छा से माता का चयन करके उसके गर्भ में प्रविष्ट तो हो जाती है, किन्तु उसके मन में ऊहापोह चलता रहता है कि न जाने बाहर का संसार कैसा होगा | माता प्रसन्न, सन्तुष्ट तथा शान्त चित्त से जब गर्भस्थ शिशु के साथ वार्तालाप करती है और उसे अपने स्नेह के माध्यम से विश्वास दिलाती है कि उसके साथ वह शिशु पूर्ण रूप से सुरक्षित है तो गर्भ में शिशु का मानसिक और शारीरिक विकास भली भाँति होता रहता है और उसका जन्म भी सरलता से हो जाता है | अभिमन्यु की कथा केवल कपोल कल्पनामात्र नहीं है | इस तथ्य के प्रति आज के चिकित्सा वैज्ञानिक भी अपनी सहमति प्रदान करते हैं | आज भी बेबी शावर या गर्भवती स्त्री की गोद भराई करने के मूल में भावना यही निहित होती है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/07/samskaras-10/

 

शुक्र का सिंह में गोचर

आज आषाढ़ कृष्ण सप्तमी को विष्टि करण और सौभाग्य योग में 26:25 (अर्द्धरात्र्योत्तर दो बजकर पच्चीस मिनट) के लगभग समस्त सांसारिक सुख, समृद्धि, विवाह, परिवार सुख, कला, शिल्प, सौन्दर्य, बौद्धिकता, राजनीति तथा समाज में मान प्रतिष्ठा में वृद्धि आदि के कारक शुक्र का अपने शत्रु ग्रह सूर्य की सिंह राशि में प्रस्थान होगा | इस प्रस्थान के समय शुक्र मघा नक्षत्र में होगा | यहाँ पाँच जुलाई को सिंह राशि में प्रविष्ट हो जाएगा | इस बीच 17 जुलाई  को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में तथा 29 जुलाई को उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में भ्रमण करता हुआ अन्त में एक अगस्त को 12:27 के लगभग कन्या राशि में प्रस्थान कर जाएगा | मघा नक्षत्र का स्वामी केतु है, पूर्वा फाल्गुनी का स्वामी स्वयं शुक्र ही है और उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र का स्वामी सूर्य है | आइये जानने का प्रयास करते हैं कि प्रत्येक राशि के लिए शुक्र के सिंह में गोचर के सम्भावित परिणाम क्या रह सकते हैं…

मेष : शुक्र आपका द्वितीयेश और सप्तमेश होकर आपके पंचम भाव में गोचर कर रहा है | पारिवारिक तथा आर्थिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | परिवार में माँगलिक आयोजनों की सम्भावना है | Romantically कहीं Involve हैं तो सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आने के साथ ही यह सम्बन्ध विवाह में भी परिणत हो सकता है | किन्तु यदि विवाहित हैं तो किसी भी बहस से बचने के लिए अपने Temperament को नियन्त्रित रखने की भी आवश्यकता है | आपकी सन्तान के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है |

वृषभ : आपका राश्यधिपति तथा षष्ठेश होकर शुक्र आपके चतुर्थ भाव में गोचर कर रहा है | उत्साह में वृद्धि का समय प्रतीत होता है | आप कोई नया वाहन अथवा घर खरीदने की योजना बना सकते हैं | घर को Renovate भी करा सकते हैं | किन्तु परिवार में किसी प्रकार के तनाव की भी समभावना है | महिलाओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

मिथुन : आपका पंचमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से तीसरे भाव में हो रहा है | आपके तथा आपकी सन्तान की विदेश यात्राओं में भी वृद्धि हो सकती है | आपकी सन्तान उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए यदि कलाकार है तो कला के प्रदर्शन के लिए बाहर जा सकती है | यदि आपका कोई भाई अथवा बहन कहीं दूसरे देश अथवा शहर में हैं तो वापस आ सकते हैं |

कर्क : आपका चतुर्थेश और एकादशेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से दूसरे भाव में हो रहा है | किसी महिला मित्र के माध्यम से आपको नवीन प्रोजेक्ट्स मिलने तथा अर्थलाभ की सम्भावना है | आपका व्यवसाय प्रॉपर्टी अथवा वाहन आदि की ख़रीद फ़रोख्त से सम्बन्धित है, अथवा आप कलाकार हैं तो आपके कार्य में उन्नति की सम्भावना है | नया घर अथवा नया वाहन भी खरीद सकते हैं | आपकी वाणी तथा व्यक्तित्व में निखार आने के साथ ही आपको किसी प्रकार का पुरूस्कार आदि भी प्राप्त हो सकता है |

सिंह : आपका तृतीयेश और दशमेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि में ही हो रहा है | यदि आप दस्कार हैं, कलाकार हैं अथवा सौन्दर्य प्रसाधनों से सम्बन्धित कोई कार्य आपका है, या मीडिया से किसी प्रकार सम्बद्ध हैं तो आपके कार्य की प्रशंसा के साथ ही आपको कुछ नए प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त होने की सम्भावना है | इन प्रोजेक्ट्स के कारण आप बहुत दीर्घ समय तक व्यस्त रह सकते हैं तथा अर्थ लाभ कर सकते हैं |

कन्या : आपका द्वितीयेश और भाग्येश होकर शुक्र आपकी राशि से बारहवें भाव में गोचर कर रहा है | आर्थिक रूप से स्थिति में दृढ़ता आने के साथ ही आपके लिए कार्य से सम्बन्धित लम्बी विदेश यात्राओं के योग भी प्रतीत होते हैं | आपको महिला मित्रों के माध्यम से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आप बहुत समय तक व्यस्त रह सकते हैं | साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि में वृद्धि हो सकती है |

तुला : लग्नेश और अष्टमेश होकर शुक्र आपकी राशि से लाभ स्थान में गोचर कर रहा है | कार्य क्षेत्र में अप्रत्याशित रूप से लाभ की सम्भावना है | आपको अचानक किसी ऐसे स्थान से कार्य का निमन्त्रण प्राप्त हो सकता है जिसके विषय में आपने कल्पना भी नहीं की होगी | यह प्रस्ताव आपके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है | किन्तु बॉस से किसी प्रकार का पंगा लेना आपके हित में नहीं रहेगा |

वृश्चिक : आपके लिए आपका सप्तमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपके दशम भाव में हो रहा है | कार्य से सम्बन्धित यात्राओं में वृद्धि के संकेत हैं | आप अपने जीवन साथी के साथ किसी धार्मिक स्थल की यात्रा के लिए भी जा सकते हैं | किन्तु जीवन साथी के स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है |

धनु : आपका षष्ठेश और एकादशेश आपकी राशि से नवम भाव में गोचर कर रहा है | यदि आपका कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसके अनुकूल दिशा में प्रगति की सम्भावना है | यदि आप किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो उसमें आपको सफलता प्राप्त हो सकती है | कार्य की दृष्टि से यह गोचर उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है |

मकर : आपका योगकारक आपकी राशि से अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | कार्य में किसी प्रकार का व्यवधान सम्भव है | कार्यस्थल में किसी प्रकार की विपरीत परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ सकता है | सन्तान के साथ किसी प्रकार की बहस सम्भव है अतः अपने Temperament को नियन्त्रण में रखना आवश्यक है | सन्तान के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है |

कुम्भ : आपका योगकारक शुक्र आपकी राशि से सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | परिवार में माँगलिक आयोजन जैसे किसी का विवाह आदि हो सकते हैं जिनके कारण परिवार में उत्सव का वातावरण बन सकता है | साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि बढ़ सकती है | कार्य से सम्बन्धित यात्राओं के भी संकेत हैं | अविवाहित हैं अथवा प्रेम सम्बन्ध चल रहा है तो वह विवाह में परिणत हो सकता है | विवाहित हैं तो जीवन साथी के साथ सम्बन्धों में अन्तरंगता में वृद्धि के संकेत हैं |

मीन : आपके लिए तृतीयेश और अष्टमेश होकर शुक्र का गोचर आपके छठे भाव में हो रहा है | छोटे भाई बहनों के कारण किसी प्रकार का विवाद सम्भव है | यदि इस विवाद को समय रहते नहीं सुलझाया गया तो बात कोर्ट तक भी पहुँच सकती है | साथ ही इसके कारण आपका तथा आपके भाई बहनों का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो सकता है |

किन्तु ध्यान रहे, ये समस्त फल सामान्य हैं | व्यक्ति विशेष की कुण्डली का व्यापक अध्ययन करके ही किसी निश्चित परिणाम पर पहुँचा जा सकता है | अतः कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन कराने के लिए किसी Vedic Astrologer के पास ही जाना उचित रहेगा |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/04/venus-transit-in-leo/

बहुत याद आते हो तुम

आज फिर यों ही याद आ गए तुम |

कल बैठी देख रही थी एक तस्वीर / इन्द्रधनुष की

जो उतारी थी कभी किसी पहाड़ी पर

सात रंगों की माला धारण किये / इन्द्रधनुष |

और याद आ गया मुझे अपना वो बचपन

कि अक्सर बारिश के बाद

जब भी दीख पड़ता था ये प्यारा सा इन्द्रधनुष

हम देते थे संदेसा उसे / पहुँचाने को उन अपनों के पास

जो जा बैठे थे दूर कहीं / दूसरी दुनिया में

दादी बाबा और दूसरे वो अपने

जिन्होंने बढ़ाया था सदा उत्साह और बरसाया सा असीम स्नेह

कोमल मन पर |

क्योंकि बचपन में कभी दिखाते हुए इन्द्रधनुष / बताया था आपने ही तो

“अपने कभी मरते नहीं, तारे बन कर आकाश में चमकते रहते हैं

और लुटाते रहते हैं अपना स्नेह और आशीर्वाद / वहीं बैठे

जब भी उनसे कुछ कहना चाहो

इन्द्रधनुष को बता देना

पहुँचा देगा संदेसा वो उन तक तुम्हारा…

लिख कर सात रंगों की स्याही से…” |

पर कहाँ अब वो बरसातें / कि जिनके बाद दीख पड़े सतरंगी इन्द्रधनुष

क्योंकि काट कर पेड़ / कर डाला धरा को निर्वस्त्र / स्वार्थी मनुष्य ने |

कहाँ से अब वो उमडें / घुमड़ घुमड़ कर मेघराज की सेनाएँ भी

क्योंकि धरा और नदियों से उठते प्रेरणादायी वाष्पकण

तो सूख चुके हैं जाने कब के |

अब तो आते हैं तेज़ आँधी और तूफ़ान

और कर जाते हैं धूल धूसरित पल भर में हर घर आँगन को |

काश कि फिर से पेड़ उगाकर

वापस लौटा लाएँ ऋतुओं की सखियों को

ताकि सावन में जब बरखा रानी झूमती गाती आए

तो देख सकूँ मैं फिर से वो अनोखा इन्द्रधनुष

जो ले जाएगा मेरा संदेसा पास तुम्हारे…

कि तुम याद बहुत आते हो / ये जानते हुए भी

कि तारे बने तुम लुटा रहे हो / आशीष और नेह की इन्द्रधनुषी किरणें…

मेरे कोमल मन पर… निरन्तर… अनवरत…