बिल्वपत्रं शिवार्पणम्

रात निशीथ काल में सभी शिवभक्तों ने भगवान शिव का अभिषेक किया आज दिन में भी मन्दिरों में भगवान शंकर के अभिषेक के लिए भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा था | Vedic Astrologers तथा पण्डितों के अनुसार इस अवसर पर गंगाजल, चन्दन, गाय का दूध और घी तथा मधुमिश्रित जल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है और बिल्वपत्रों से उनका शृंगार किया जाता है | बिल्ववृक्ष अर्थात बेल के वृक्ष को अमर वृक्ष, बिल्व फल को अमर फल तथा बिल्व पत्र को अमर पत्र की संज्ञा भी दी जाती है | औषधीय रूप में समूचा बिल्ववृक्ष विशेष महत्त्व रखता है तथा शीतलता प्रदान करने वाला माना जाता है | मान्यता है कि समुद्र मन्थन के समय जब भगवान महादेव ने हलाहल का पान कर लिया था उस समय गंगाजल, दूध, दूध, घी मधु तथा बिल्वपत्रों आदि के द्वारा उनका विष का ताप दूर करने का प्रयास किया गया था | बिल्वपत्र को समस्त प्रकार के तापों से मुक्ति प्रदान करने वाला माना जाता है |

एक बिल्वपत्र में तीन पत्तियाँ परस्पर जुड़ी हुई होती हैं और उन्हें भगवान शिव को समर्पित करते समय ध्यान रखना चाहिए कि पत्तियों में किसी प्रकार का कोई छिद्र आदि न हो तथा कोई पत्ती टूटी हुई न हो | बिल्वपत्र को उल्टा करके चढ़ाते हैं – अर्थात उसका चिकना भाग शिवलिंग पर रखते हैं | साथ ही बिल्वपत्र के साथ जलधारा भी निरन्तर प्रवाहित रहनी चाहिए – बिना जल के बिल्वपत्र अर्पित नहीं किये जाते | ऐसी भी मान्यता है कि यदि नूतन बिल्वपत्र न मिलें तो पहले से अर्पित किये गए बिल्वपत्रों को भी बार बार धोकर भोले बाबा को अर्पित किया जा सकता है…

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन: ।

शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित् ।।

धार्मिक मान्यता ऐसी भी है कि बिल्ववृक्ष की मूल में भगवान शंकर का वास होता है और जो बिल्व के मूल में लिंगरूपी महादेव की पूजा अर्चना करता है वह व्यक्ति पुण्य का भागी होता है…

बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम् ।

य: पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद् ॥

भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित करते समय “श्री बिल्वाष्टकम्” के निम्न मन्त्र का जाप किया जाता है…

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम् |

त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ||

तीन दल अर्थात पत्रों से युक्त, सत्व रज तम रूपी त्रिगुणस्वरूप, तीन काल और तीनों लोक रूपी तीन नेत्रों से युक्त, तीन आयुध स्वरूप तथा तीनों जन्मों के पापों का संहार करने वाला बिल्वपत्र हम शिव को समर्पित करते हैं |

हमारे द्वारा श्रद्धा भक्तिपूर्वक अर्पित किया गया बिल्वपत्र भगवान शिव स्वीकार करें, इसी कामना के साथ व्रत का पारायण करते हुए प्रस्तुत है “बिल्वाष्टकम्”…

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्

जन्मपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणम् |

त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्याच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः
शिवपूजां करिष्यामि बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ||

अखण्ड बिल्व पात्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे

शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो एक बिल्वं शिवार्पणम् |

शालिग्राम शिलामेकां विप्राणां जातु चार्पयेत्

सोमयज्ञ महापुण्यं एक बिल्वं शिवार्पणम् ||

दन्तिकोटि सहस्राणि वाजपेय शतानि च

कोटि कन्या महादानं एक बिल्वं शिवार्पणम् |

लक्ष्म्यास्तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्

बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि एक बिल्वं शिवार्पणम् ||

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्

अघोरपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणम् |

काशीक्षेत्रनिवासं च कालभैरव दर्शनम्

प्रयागमाधवं दृष्ट्वा एक बिल्वं शिवार्पणम् ||

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे

अग्रतः शिवरूपाय एक बिल्वं शिवार्पणम् |

बिल्वाष्टमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ

सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात् ||

ॐ नमः शिवाय…

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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं

हम सब प्रायः अपनी तुलना किसी अन्य से करने लगते हैं | किन्तु कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते | कोई भी दो वस्तुएँ एक जैसी नहीं हो सकतीं | किन्हीं भी दो व्यक्तियों के गुण एक जैसे नहीं हो सकते | कोई व्यक्ति किसी एक कार्य में कुशल हो सकता है तो दूसरा किसी अन्य कार्य में कुशल हो सकता है | और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम सभी अपने आप में एक पूर्ण व्यक्तित्व हैं |

ईशावास्योपनिषद् का मन्त्र है “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||” यह मन्त्र वास्तव में इसी सत्य की ओर इंगित करता है कि प्रत्येक्क वस्तु और प्रत्येक जीव स्वयं में पूर्ण होता है | “पूर्णमदः पूर्णमिदं” – वह परब्रह्म भी पूर्ण है और यह कार्यब्रह्म भी पूर्ण है | “पूर्णात् पूर्णमुदच्यते” – क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण आत्मा से ही उत्पन्न हुआ है |

अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या दो पूर्ण भी एक साथ रह सकते हैं ? बिल्कुल रह सकते हैं, क्योंकि एक पूर्ण दूसरे पूर्ण का ही तो विस्तार है – केवल उसका स्वरूप भिन्न है | “पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते” – पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी वहाँ पूर्ण ही शेष रहता है |

ईशावास्योपनिषद् का यह मन्त्र हमें देश काल की सीमाओं से अनन्त बनाते हुए हमारी पूर्णता से हमारा साक्षात्कार कराता है | इस प्रकार तत्वतः तो सृष्टि की प्रत्येक संरचना अपने आपमें पूर्ण होती है और प्रत्येक घटक किसी महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट प्रयोजन के लिए ही निर्मित होता है |

समस्त ब्रह्माण्ड अपने आपमें पूर्ण हैं | ब्रह्माण्डों में व्याप्त समस्त वायु अग्नि जल आदि तत्व, समस्त रूप रस गन्ध आदि अपने आपमें पूर्ण हैं | समस्त काल, समस्त दिशाएँ – कुछ भी अपूर्ण नहीं है – हो ही नहीं सकता – पूर्ण है समस्त विराट् अपने आपमें | इस प्रकार हम सब उस विराट के सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर कण होते हुए भी स्वयं में पूर्ण हैं, क्योंकि पूर्ण का अंश हैं | पूर्णता का बोध वास्तव में अद्वितीय होता है और उसका कोई विकल्प भी नहीं होता | और यदि विकल्प खोज भी लिया जाए तो वह भी निश्चित रूप से पूर्ण ही होगा | हम सभी पूर्ण के भीतर भी हैं और हमारे भीतर ही पूर्ण है | क्योंकि हम सभी पूर्ण हैं – क्योंकि हम सभी एक ही पूर्ण का विविध रूपों में विस्तार हैं – अतः स्वयं में हम सभी महान हैं |

जब हम सभी स्वयं में पूर्ण व्यक्तित्व हैं तो किसी की किसी अन्य से तुलना कैसी ? आज महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर हम सभी संकल्प लें कि अपनी अपनी “पूर्णता को पूर्ण” रखते हुए, अपने अपने स्वभाव और योग्यता के अनुसार कर्म करते हुए, अपने अपने लक्ष्य के प्रति अग्रसर रहें और ईशोपनिषद के इस कथन का निरन्तर स्मरण करते रहें…

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||

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ॐ नमः शिवाय

सर्वदेवात्मको रुद्रः सर्वे देवा: शिवात्मका: |

रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दन: ||

यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशनः |

ब्रह्मविष्णुमयो रूद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्त् ||

रूद्र ही ब्रह्मा भी है, रूद्र ही विष्णु भी है

सभी देवता रूद्र के ही अंश हैं

सब कुछ रूद्र से ही उत्पन्न है

रूद्र स्वम्भू है

 

भगवान शिव हम सभी के कष्टों को दूर कर सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करें… इसी कामना के साथ महाशिवरात्रि की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

 

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महाशिवरात्रि

ॐ माहेश्वराय नमः, ॐ महादेवाय नमः

ॐ सुरेश्वराय नमः, ॐ शिवाय नमः
ॐ शंकराय नमः, ॐ शाश्वताय नमः

ॐ पाशुपतये नमः, ॐ उमापतये नमः

ॐ ब्रह्माधिपतये नमः, ॐ परमेश्वराय नमः

ॐ भस्मांगरागाय नमः, ॐ महेशाय नमः

ॐ नित्याय नमः, ॐ शुद्धाय नमः

ॐ मृत्युंजयाय नमः, ॐ भूतेशाय नमः

ॐ मृडाय नमः, ॐ सर्वाय नमः

ॐ सदाशिवाय नमः, ॐ भवाय नमः

ॐ सर्वज्ञाय नमः, ॐ भीमाय नमः

ॐ वासुदेवाय नमः, ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः

देवाधिदेव भगवान शंकर सभी मित्रों की मनोकामनाएँ पूर्ण करें, कल महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इसी भावना से सभी मित्रों को महाशिवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ…

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कालसर्प योग

दो दिन बाद महाशिवरात्रि का पावन पर्व है | एक ओर जहाँ शिवभक्त बाबा भोलेशंकर का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए शिव परिवार का अभिषेक करेंगे वहीं दूसरी ओर राहु के दोष तथा कालसर्प दोष के निवारण के लिए भी उपाय किये जाएँगे | जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में राहु केतु के मध्य सारे ग्रह आ जाते हैं तब उसे कालसर्प दोष कहा जाता है | Vedic Astrologers का मानना है कि यदि किसी की जन्मकुण्डली में कालसर्प दोष है तो उसके कारण व्यक्ति को आर्थिक व शारीरिक समस्याओं का सामना तो करना ही पड़ता है साथ ही सन्तान सम्बन्धी कष्ट भी उस व्यक्ति को हो सकता है | बड़े से बड़े धनाढ्य परिवार में जन्म लिया हुआ जातक भी जब कालसर्प दोष में होता है तो उसे भयंकर अभावों का सामना करना पड़ता है – ऐसा व्यवहार में देखा भी गया है |

किन्तु कालसर्प योग सदा ही अशुभ फल नहीं देता | किस व्यक्ति पर इस योग का क्या प्रभाव होगा यह जानने के लिए व्यक्ति की कुण्डली का व्यापक अध्ययन और विश्लेषण किया जाना आवश्यक है | अक्सर बहुत से विद्वान् कालसर्प दोष से लोगों को इतना भयभीत कर देते हैं कि वह उनके बताए अनुसार उपाय करने में ही अपना बहुत सा धन और मानसिक शान्ति नष्ट कर देता है | इसलिए यदि कोई Astrologer अथवा पण्डित जी आपको कालसर्प के दोष से भयभीत करने का प्रयास करते हैं तो आपको घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है | दो तीन ज्योतिषियों से अपनी कुण्डली का व्यापक विश्लेषण करवाएँ और उसके बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचें |

कालसर्प दोष अनेक प्रकार के होते हैं तथा उनके निवारण के उपाय भी भिन्न भिन्न होते हैं | जिनके विषय में विस्तार के साथ चर्चा आने वाले समय में करेंगे | किन्तु अभी, सामान्य रूप से कालसर्प दोष के निराकरण के लिए जो विधान किया जाता है उस पर चर्चा करते हैं |

कालसर्प दोष के लिए भगवान शिव की उपासना का विधान है | विशेष रूप से प्रदोष के दिन यदि इस कार्य को किया जाए तो वह विशेष फलदायी माना जाता है | और यदि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात महाशिवरात्रि के दिन इस उपाय को कर लिया जाए तो उसे तो अत्यधिक अनुकूल फल देने वाला मानते हैं |

इसके लिए आप अपने घर में ही शिवलिंग का अभिषेक कर सकते हैं | शिवलिंग नहीं भी है तो भगवान शंकर की प्रतिमा अथवा चित्र रखकर उसके समक्ष बैठकर उपासना की जा सकती है | अपने समक्ष भोले बाबा का एक चित्र अथवा प्रतिमा अथवा शिवलिंग रख लें | मिट्टी का भी शिवलिंग बना सकते हैं | उसे एक पात्र में रख दें और गाय के दूध में गाय का घी, गंगाजल, मधु, चन्दन तथा हल्दी मिलाकर श्रद्धा पूर्वक उस प्रतिमा का अभिषेक करें | उसके बाद या तो चाँदी का सर्प किसी पात्र में रख लें | यदि चाँदी का सर्प नहीं ला सकते हैं तो किसी कागज़ पर सर्प का आकार बनाकर उसे किसी पात्र में या दीवार के सहारे खड़ा कर लें और और जिस जल से भोले शंकर का अभिषेक किया था उसी जल से इस सर्प को भी अभिषिक्त करें तथा रक्त-श्वेत पुष्पों और अक्षत चन्दन आदि से इसकी पूजा करके कम से कम एक सौ आठ बार महामृत्युंजय मन्त्र का जाप करें | महामृत्युंजय मन्त्र का जितना अधिक जाप करेंगे उतना ही अच्छा रहेगा | बाद में फल मिष्टान्न आदि का भोग लगाकर प्रसाद रूप में परिवार सहित ग्रहण करें |

तो, प्रस्तुत है महा मृत्युन्जय मन्त्र…

ॐ ह्रौं जूँ सः ॐ | ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ |

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् |

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ||

ॐ स्वः भुवः भू: ॐ | ॐ सः जूँ ह्रौं ॐ |

त्रयम्बकम् – जिनकी इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति ये तीन विश्व का निर्माण करने वाली माताएँ हैं | अथवा जिनके त्रीणि अम्बकानि – तीन नेत्र हैं – ज्योतिषियों के अनुसार भूत, भविष्य और वर्तमान ये तीन नेत्र भगवान शंकर के माने जाते हैं, सांख्य सत्व, रजस और तमस इन तीन गुणों को भगवान शिव के तीन नेत्र मानता है, और याज्ञिक पृथिवीद्यौरन्तरिक्षौ अर्थात पृथिवी, द्यु तथा अन्तरिक्ष इन तीनों लोकों को महादेव के तीन नेत्र मानते हैं |

सुगन्धिम् – जो समस्त तत्वों को उनके वास्ताविक रूप – वास्तविक सुगन्धि – को बनाए रखने की सामर्थ्य प्रदान करता है | अर्थात किसी प्रकार का विकार किसी तत्व में नहीं आने देता |

पुष्टिवर्धनम् – जो समस्त चराचर का पालन करने वाला है – पौष्टिकता प्रदान करने वाला है |

यजामहे – ऐसे उस परमेश्वर का हम यजन करते हैं |

उर्वारुकमिव मृत्योर्बंधनात् – जिस प्रकार पका हुआ बिल्वफल बिना किसी कष्ट के वृक्ष के बन्धन से मुक्त हो जाता है उसी प्रकार हम भी जन्म-मरण रूपी अज्ञान के बन्धन से मुक्त हो जाएँ |

अमृतात मा मुक्षीय – और उस अमर प्रकाशस्वरूप ब्रह्म से कभी हमारा सम्बन्ध छूटने न पाए |

ऐसी उदात्त भावना जिस मन्त्र की है उसके जाप से निश्चित रूप से न केवल कालसर्प दोष वरन सभी प्रकार के कष्टों से सबको मुक्ति प्राप्त हो, यही हमारी सबके लिए मंगलकामना है…

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सूर्य का कुम्भ राशि में संक्रमण

बुधवार 13 फरवरी 2018 को दोपहर दो बजकर 48 मिनट पर सूर्य का कुम्भ राशि में संक्रमण होने जा रहा है | जहाँ वे बुधवार 14 मार्च को 23:43 तक विश्राम करके आगे मीन राशि में प्रस्थान कर जाएँगे | अपनी इस यात्रा के दौरान भगवान भास्कर 20 फरवरी तक धनिष्ठा नक्षत्र में, उसके बाद 5 मार्च तक शतभिषज में और अन्त में पूर्वा भाद्रपद में संचार करेंगे | धनिष्ठा और शतभिषज दोनों ऊर्ध्वमुखी, चर, पित्त प्रकृति के तामसिक नक्षत्र हैं | पूर्वा भाद्रपद अधोमुखी, उग्र और वात प्रकृति का सात्त्विक नक्षत्र है | अर्थात हम कह सकते हैं कि इस अवधि में जन साधारण में पित्त और वात प्रकृति की अधिकता रहेगी – जो कि आमतौर पर इस मौसम में रहती भी है | अतः मौसमी रोगों से बचने के लिए अपने खान पान पर नियन्त्रण तथा जीवन शैली में परिवर्तन की आवश्यकता तो होगी ही | अधिकाँश लोग अपने कार्यक्षेत्र में प्रगति कर सकते हैं | इसके अतिरिक्त इस यात्रा के दौरान सूर्य अपनी उच्च राशि मेष से ग्यारहवें भाव में गोचर करेंगे – जो मेष राशि के लिए लाभ स्थान है, तथा अपनी राशि सिंह से सप्तम भाव में गोचर करेंगे | इन दोनों राशियों के जातको के लिए निश्चित रूप से यह अवधि शुभ फल देने वाली कही जा सकती है |

यह प्रभाव चन्द्रमा की राशि को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है और चन्द्रमा एक राशि में पूरे चौबीस घंटे रहता है तथा उन चौबीस घण्टों में हज़ारों बच्चों का जन्म होता है | आवश्यक नहीं कि सबके लिए नीचे लिखी बातें सत्य सिद्ध हो जाएँ | किसी व्यक्ति की कुण्डली का अध्ययन करते समय केवल एक ही तथ्य का आकलन नहीं किया जाता है अपितु बहुत से सूत्रों के आधार पर किसी कुण्डली का अध्ययन किया जाता है तब किसी सम्भावित परिणाम पर पहुँच सकते हैं | साथ ही, हर एक वर्ष में सूर्य पूरी बारह राशियों में भ्रमण करता है अतः आवश्यक नहीं कि हर वर्ष सूर्य के किसी विशिष्ट राशि में गोचर होने पर समान परिणाम ही परिलक्षित हों | इसलिए अधिक सत्य फलकथन के लिए तो आपको किसी अच्छे वैदिक ज्योतिषी – Vedic Astrologer – से स्वयं मिलकर ही कुण्डली का समग्र अध्ययन कराना होगा | तथापि, यदि दस प्रतिशत लोगों को भी इसका लाभ मिल सका तो अपना ये प्रयास सफल मानेंगे…

तो आइये जानते हैं ज्योतिषीय आधार पर जन साधारण पर क्या होगा सूर्य के इस गोचर का सम्भावित प्रभाव…

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महाशिवरात्रि

प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के व्रत का पालन किया जाता है, जिसे शिव पार्वती के विवाह का अवसर माना जाता है – अर्थात मंगल के साथ शक्ति का मिलन | कुछ पौराणिक मान्यताएँ इस प्रकार की भी हैं कि इसी दिन महादेव के विशालकाय स्वरूप अग्निलिंग से सृष्टि का आरम्भ हुआ था | जो भी मान्यताएँ हों, महाशिवरात्रि का पर्व समस्त हिन्दू समाज में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है | इसी दिन ऋषि बोधोत्सव भी है, जिस दिन आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द को सच्चे शिवभक्त का ज्ञान प्राप्त हुआ था और उनके हृदय से उदगार फूटे थे कि सच्चा शिव किसी मन्दिर या स्थान विशेष में विराजमान मूर्ति में निवास नहीं करता, अपितु वह इस सृष्टि के प्राणि मात्र में विराजमान है, और इसलिए प्राणिमात्र की सेवा ही सच्ची ईश्वरभक्ति है |

इस वर्ष 13 फरवरी को दिन भर त्रयोदशी तिथि है तथा रात्रि में 10:34 से चतुर्दशी तिथि का आगमन हो रहा है | 14 फरवरी को रात्रि 12:46 तक चतुर्दशी तिथि है | क्योंकि दोनों ही दिन निशीथ काल में चतुर्दशी तिथि है अतः यह द्विविधा होनी स्वाभाविक ही है कि किस दिन व्रत किया जाए | इसका समाधान धर्मग्रन्थों में इस प्रकार है कि यदि दूसरे दिन निशीथ काल में कुछ ही समय के लिए चतुर्दशी हो किन्तु पहले दिन सम्पूर्ण भाग में हो तो अभिषेक पहली रात्रि में करना चाहिए | हाँ यदि एक ही दिन चतुर्दशी तिथि है तो भले ही वह मध्यरात्रि में कुछ ही पलों के लिए है, अभिषेक उसी दिन होगा | रात्रि का मध्यभाग निशीथ काल कहलाता है | इस वर्ष सौभाग्य से दो रातों में चतुर्दशी तिथि है – ऐसा योग कभी कभी ही बनता है | 13 फरवरी को सम्पूर्ण रात्रि में चतुर्दशी तिथि है अतः अधिकाँश भागों में 13 तारीख़ को ही शिवरात्रि का व्रत रखकर निशीथ काल का अभिषेक किया जाएगा | इसी दिन भौम प्रदोष भी है | जिन लोगों को रात्रि में अभिषेक नहीं करना है और दिन में ही व्रत रखकर उसका पारायण करना है वे लोग 14 फरवरी को व्रत रख सकते हैं |

वैसे Vedic Astrologers और पण्डितों के अनुसार निशीथ काल की पूजा का समय मध्य रात्रि बारह बजकर नौ मिनट से आरम्भ होकर एक बजे तक का बताया जा रहा है | यानी कुल 51 मिनट मुहूर्त की अवधि है | रात्रि में चार बार भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है | 14 फरवरी को प्रातः 07:04 से लेकर दोपहर 15:20 तक पारायण का समय बताया जा रहा है |

शिव का अभिषेक अनेक वस्तुओं से किया जाता है | जिनमें प्रमुख हैं :

सुगन्धित जल : भौतिक सुख सुविधाओं की उपलब्धि के लिए जल में चन्दन आदि की सुगन्धि मिलाकर उस जल से शिवलिंग को अभिषिक्त किया जाता है |

मधु अर्थात शहद : अच्छे स्वास्थ्य तथा जीवन साथी की मंगलकामना के लिए मधु से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है |

गंगाजल : समस्त प्रकार के तनावों से मुक्तिदाता माना जाता है गंगाजल को | इसी भावना से गंगाजल द्वारा शिवलिंग को अभिसिंचित करने की प्रथा है |

गौ दुग्ध तथा गौ धृत : गाय का दूध और घी पौष्टिकता प्रदान करता है | हृष्ट पुष्ट रहने के लिए गाय के दूध और घी से शिवलिंग को स्नान कराया जाता है |

बिल्व पत्र और धतूरा : सांसारिक तापों से मुक्ति के लिए बिल्व पत्रों तथा धतूरे से शिवलिंग का शृंगार किया जाता है | ऐसी मान्यता है कि धतूरा भगवान शंकर का सबसे अधिक प्रिय पदार्थ है और बिल्व को अमर वृक्ष तथा बिल्व पत्र को अमर पत्र और बिल्व फल को अमर फल की संज्ञा दी जाती है |

किन्तु हमारी मान्यता है कि केवल जल तथा बिल्व पत्र के साथ श्रद्धा, भक्ति और पूर्ण आस्था तथा विश्वास का गंगाजल एक साथ मिलाकर उस जल से यदि शिवलिंग को अभिषिक्त किया जाए तो भोले शंकर को उससे बढ़कर और कुछ प्रिय हो ही नहीं हो सकता | इसी श्रद्धा, भक्ति और पूर्ण आस्था तथा विश्वास के गंगाजल के साथ प्रस्तुत है शिव स्तुति तथा शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम्…

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय ||

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय ||

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ||

वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मूनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय ||

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय ||

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ |

शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते ||

ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय…

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