रात भर छाए रहे हैं

रात भर छाए रहे हैं, मेघ बौराए रहे हैं

देख बिजली का तड़पना, मेघ इतराए रहे हैं |

बाँध कर बूँदों की पायल, है धरा भी तो मचलती

रस कलश को कर समर्पित, मेघ हर्षाए रहे हैं ||

पहन कर परिधान सतरंगी, धरा भी है ठुमकती

रास धरती का निरख कर, मेघ ललचाए रहे हैं |

तन मुदित, हर मन मुदित, और मस्त सारी चेतना है

थाप देकर धिनक धिन धिन, मेघ लहराए रहे हैं ||

सुर से वर्षा के उमंगती रागिनी मल्हार की है

और पवन की बाँसुरी सुन, मेघ पगलाए रहे हैं |

मस्त नभ निज बाँह भरकर चूमता है इस धरा को

करके जल थल एक देखो, मेघ इठलाए रहे हैं ||

Radiant Cloudy Sky over Sea Water

हृदय पटल पर नाम तुम्हारा

(एक रचना “चेहरों की क़िताब” के स्मृति पटल से)

(A poem from the memory of fecebook)

720107725_40105श्वास श्वास में गीत तुम्हारा, हर धड़कन में नाम तुम्हारा

मलय पवन की हरेक छुअन में मिलता है स्पर्श तुम्हारा ||

तुमसे ही जीवन में गति है, मन में तुमसे ही लय भरती

भावों के ज्योतित दीपक में एक भरा बस नेह तुम्हारा ||

सावन की मधु बरसातों में, पावस की मीठी रातों में

इन्द्रधनुष के सप्तरंग में भरा हुआ अनुराग तुम्हारा ||

सूरज की तपती किरणों ने तुमसे ही ये दाहकता ली

चन्दा की इस शुभ्र ज्योत्स्ना में भी है मधु हास तुम्हारा ||

तुमसे मिलकर रजनीगन्धा शरमाती, निज शीश झुकाती

चम्पा और चमेली में है भरा हुआ आह्लाद तुम्हारा ||

मेरे व्याकुल नयन निरखते तुमही को हर कण हर पल में

क्यों न कहो फिर ह्रदय पटल पर लिख कर रक्खूँ नाम तुम्हारा ||

 

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ

सारी की सारी प्रकृति ही नारीरूपा है – अपने भीतर अनेकों रहस्य समेटे – शक्ति के अनेकों स्रोत समेटे – जिनसे मानवमात्र प्रेरणा प्राप्त करता है… और जब सारी प्रकृति ही शक्तिरूपा है तो भला नारी किस प्रकार दुर्बल या अबला हो सकती है ?

आज की नारी शारीरिक, मानसिक, अध्यात्मिक और आर्थिक हर स्तर पर पूर्ण रूप से सशक्त और स्वावलम्बी है और इस सबके लिए उसे न तो पुरुष पर निर्भर रहने की आवश्यकता है न ही वह किसी रूप में पुरुष से कमतर है |

पुरुष – पिता के रूप में नारी का अभिभावक भी है और गुरु भी, भाई के रूप में उसका मित्र भी है और पति के रूप में उसका सहयोगी भी – लेकिन किसी भी रूप में नारी को अपने अधीन मानना पुरुष के अहंकार का द्योतक है | हम अपने बच्चों को बचपन से ही नारी का सम्मान करना सिखाएँ चाहे सम्बन्ध कोई भी हो… पुरुष को शक्ति की सामर्थ्य और स्वतन्त्रता का सम्मान करना चाहिए…

देखा जाए तो नारी सेवा और त्याग का जीता जागता उदाहरण है, इसलिए उसे अपने सम्मान और अधिकारों की किसी से भीख माँगने की आवश्यकता नहीं…

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ – इस आशा और विश्वास के साथ कि हम अपने महत्त्व और प्रतिभाओं को समझकर परिवार, समाज और देश के हित में उनका सदुपयोग करेंगी…

इसी कामना के साथ सभी को आज का शुभ प्रभात…

महिला दिवस

 

मिलकर मनाएँ महिला दिवस….

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस को समर्पित रहा ये सप्ताह, जिसका कल यानी आठ मार्च को समापन है अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में… सप्ताह भर विश्व भर में अनेक प्रकार के कार्यक्रमों का, गोष्ठियों का, रैलियों का, कार्यशालाओं आदि का आयोजन होता रहा… तो इसी महिला दिवस के उपलक्ष्य में समस्त नारी शक्ति को शुभकामनाओं सहित समर्पित हैं मेरी ये नीचे की कुछ पंक्तियाँ… क्योंकि मैं समझती हूँ नारी आज “नीर भरी दुःख की बदली” नहीं है, बल्कि “यौवन और जीवन का जीता जागता स्वरूप” है… ज़रा सी हवा मिल जाए तो “आँधी” बन जाने में भी उसे कुछ देर नहीं लगती… बही चली जाती है मस्त धारा के प्रवाह की भाँति अपनी ही धुन में मस्त हो… नभ में ऊँची उड़ान भरते पंछी के समान उन्मुक्त हो कितनी भी ऊंचाइयों का स्पर्श कर सकती है… एक ओर मलय पवन के समान अपनी ममता की सुगन्ध से कण कण को सरसाने की सामर्थ्य रखती है तो दूसरी ओर रखती है सामर्थ्य बड़ी से बड़ी चट्टानों को भी अपनी छाती से टकराकर तोड़ डालने की… तो आइये मिलकर मनाएँ महिला दिवस इस संकल्प के साथ कि ईश्वर की स्नेहभरी – ममताभरी – ऊर्जावान – दृढ़संकल्प संरचना – संसार की इस आधी आबादी में से कोई भी दबी कुचली – निरक्षर – अर्थहीन – अस्वस्थ – अबला कहलाने को विवश न रहने पाए…

आज बन गई हूँ मैं आँधी इन तूफ़ानों से टकराकर |

भ्रम की चट्टानों को तोड़ा अपनी छाती से टकराकर ||

मैंने जब मुस्काना छोड़ा, चन्दा रात रात भर रोया

मन में हूक उठी, कोयल ने दर्द भरा तब गान सुनाया |

अनगिन पुष्प हँस उठे मेरे मन के शूलों से छिदवाकर

भ्रम की चट्टानों को तोड़ा अपनी छाती से टकराकर ||

मुझे मिटाने और बुझाने के प्रयास कितने कर डाले

किन्तु मेरे जलने से ही तो होते हैं जग में उजियाले |

मेरी हर एक चिता बिखर गई मुझसे बार बार परसा कर

भ्रम की चट्टानों को तोड़ा अपनी छाती से टकराकर ||

मेरा जीवन एक हवा के झोंके जैसा भटक रहा था

नहीं कहीं विश्राम, नहीं कोई नीड़ मुझे तब सूझ रहा था |

तभी धरा आकाश सिमट गए मुझे स्वयं में ही दर्शा कर

भ्रम की चट्टानों को तोड़ा अपनी छाती से टकराकर ||

मैं ही यौवन, मैं ही जीवन, मैं ही मिलन और बिछुरन हूँ

मैं ही हूँ श्रृंगार, अरे मैं ही प्रियतम का गीत मधुर हूँ |

कितने साज़ों को झनकारा मेरे हाथों ने सहलाकर

भ्रम की चट्टानों को तोड़ा अपनी छाती से टकराकर ||

1

 

 

प्रेम के मधु का प्याला

ना हमारे बीच है कोई ऐसा खेल
जिसमें हो हार या जीत
फिर क्यों रूठी रहती है प्रीत
आओ मिलकर इसे मनाएँ / ताकि बच जाए टूटने से / प्रेम के मधु का प्याला ।
ना मुझमें है कोई खोट /  ना ही हूँ मैं खान समस्त गुणों की
ना तुममें है कोई खोट /  ना तुम ही हो खान समस्त गुणों की
हम दोनों ही हैं एक / फिर कौन कम और कौन ज़्यादा
तो आओ करें ऐसा कुछ / कि टूटने से बच जाए / प्रेम के मधु का प्याला ।
ना तुम पूर्ण / ना ही हम अधूरे
ना हम पूर्ण /  ना ही तुम अधूरे
पूर्णता और अपूर्णता / भाव हैं किसी दूसरे ही लोक के
जब हम दोनों ही हैं साधारण मानव
तो फिर कौन कम और कौन ज़्यादा
तो आओ हो जाएँ एक कुछ इस तरह / कि टूटने से बच जाए / प्रेम के मधु का प्याला ।
कभी कुछ कहा तुमने / जो शायद रहा अनसुना /  मेरे मन से
कभी कुछ कहा मैंने / जो शायद नहीं पहुँचा / मन तक तुम्हारे
छोटी छोटी मीठी इन बातों को / आओ मिलकर कर लें ताज़ा हम
कहें सुनाएँ कुछ ऐसा / ताकि बच जाए टूटने से / प्रेम के मधु का प्याला ।
देखे हैं हमने सपने / चलने के साथ मिलकर
जीवन में / सुख दुःख की आँख मिचौली में

कष्टों की भीषण ज्वाला में / या सावन की मधु बरसातों में
रोने हँसने गाने नाचने के / साथ मिलकर
अपनी ही किसी कहानी पर / खुल कर खिलखिलाने के / साथ मिलकर
पकड़े एक दूजे की बाँह / बढ़ जाने के / साथ मिलकर
टूट कर बिखर न जाए वो सपना / आओ मिलकर सहेजें कुछ ऐसे उस सपने को
जगने पर बन जाए जो हक़ीक़त / ताकि टूटने से बच जाए / प्रेम के मधु का प्याला…

SONY DSC

बिना रुके / बिना थके

जीवन क्या है ? एक ऐसी पगडण्डी

पग पग पर जहाँ हैं तीखे और तेज़ मोड़

जहाँ घटानी पड़ती है गति बार बार

आगे क्या होगा / इसका कुछ भान नहीं

सामने से क्या आएगा / इसका भी कोई ज्ञान नहीं

बस चलते जाना है / बिना रुके / बिना थके |

हर पल चुनौतियाँ / नवीन / कठिन

ऊँचे नीचे पथरीले उलझन भरे मार्ग

कहीं प्रकाश / तो कहीं अन्धकार घना

गिर पड़ने पर भय टूट जाने का

पर चलते जाना है / बिना रुके / बिना थके |

या फिर निरन्तर प्रवाहित कोई सरिता

दुखों चिन्ताओं के अनेकों जलयान जहाँ बैठे हैं लंगर डाले

अनगिनती सीप घोंघे छिपे हैं जिसके भीतर

कभी चलती है तेज़ पवन / तो मच जाती है हलचल

जीवन की इस सरिता में / जिसमें तिरती है मन की नौका

डोल उठती है जो तनिक सी भी हलचल से

डोल उठते हैं सारे जलयान / मानों हों डूब जाने को आतुर

कभी होता है प्रवाह शान्त इस सरिता का

तो हो जाती किसी तपस्वी सम निस्पृह

फिर भी रहती है प्रवाहित / बिना रुके / बिना थके |

पर कैसे इतने परिवर्तन ? कैसे इतने रूप ?

कहीं कोई है अनदेखा सा / अजाना सा

जो नचाता है अपनी इच्छा से / डोर है हाथ में जिसके

अन्यथा हो जाएगा अवसान इस खेल का असमय ही

हो जाएगा पटाक्षेप इस नाटक का मध्यान्तर में ही

हो जाएगा समापन उपन्यास का / बिना किसी उपसंहार के ही

कोई है चित्रकार / छिपा हुआ / ओझल दृष्टि की सीमाओं से

भरता है जो रंग / अपनी ही रचना में / भरता है भाव भी

तभी तो बस चलते जाना है / बिना रुके / बिना थके |

कभी तो पहुँच ही जाएँगे गन्तव्य तक अपने

गन्तव्य – जो नियत किया है उसी अदेखे कलाकार ने

और तब अनुभव होगा वास्तविक आनन्द का / आनन्द के अतिरेक का

आनन्द – जिसके कारण हमारा दिल गा उठेगा मधुर गान

आनन्द – थिरक उठेंगे हमारे पाँव जिसकी मतवाली लय पर

आनन्द – जो भर देगा सकारात्मकता हमारे विचारों में

और तब ये जटिल संसार लगने लगेगा सरल

पीछे छूटे तीखे मोड़ / हो जाएँगे ओझल दृष्टि से

सब कुछ होगा जहाँ प्रत्यक्ष / नहीं होगा कोई भी आवरण

शान्त हो जाएगा सरिता के जल में उठा तूफ़ान

और तब झूम उठेगा मन अपनी ही ताल और लय पर

आनन्द के उस मधुर संगीत के साथ

क्योंकि चलते जाना है / बिना रुके / बिना थके

क्योंकि रहना है प्रवाहित / बिना रुके / बिना थके…

ootee-12-15-2006-8-26-57

ढाई अक्षर का शब्द

कल वेलेंटाईन डे है, उत्साह है समस्त युवा वर्ग में… अभी एक फरवरी को पर्व था वसन्त पंचमी का – जिसे भारतीय वेलेंटाईन डे भी कहा जाता है… जिस दिन ज्ञान विज्ञान की दात्री माँ वाणी की पूजा अर्चना करने के साथ ही सब प्रेम के रंग में रंग जाते हैं, और केवल मानवमात्र ही नहीं, सारी प्रकृति ही वासन्ती प्रेम के रंग में डूबी होती है… और संयोग ये कि वसन्त पंचमी तो आती ही वसन्त ऋतु के स्वागत के लिए है, ऐसा लगता है मानों वेलेंटाईन डे भी वसन्त के स्वागत के लिए इन्हीं दिनों मनाया जाता है | बहुत सारे लोग इस वेलेंटाईन डे के पक्ष में रहते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो इसका विरोध करते हैं |

पर विरोध किसलिए ? क्या केवल इसलिए कि इस पर “विदेशी” की छाप लगी है ? यदि ऐसा है तब तो हमें विदेशों में जाकर न तो पढ़ाई करनी चाहिए और न ही नौकरी व्यवसाय आदि करना चाहिए और न ही अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म का अनुभव करना चाहिए | लेकिन हम यही सब तो करते आ रहे हैं – अगर कोई व्यक्ति मात्र हिन्दी में बात करता है और अंग्रेज़ी में उसका हाथ तंग होता है तो वह उपहास का पात्र बना दिया जाता है, उसे अच्छी नौकरी नहीं मिलती, अच्छी लड़की या लड़के से उसका विवाह होने में समस्याएँ उत्पन्न होती हैं | तो मित्रों, जब अंग्रेज़ी का इतना बोलबाला है हम “भारतीयों” के जीवन में कि उसके बिना हम अनपढ़ गँवार माने जाएँ तो भला वेलेंटाईन डे से इतना परहेज़ क्यों ?

एक और बात पर “डिस्कशन” चल रहे हैं – और वो ये कि “यदि ये प्रेम का पर्व है तो एक ही दिन वेलेंटाईन डे क्यों ? हर रोज़ क्यों नहीं ?” तो क्या हम हर दिन वसन्त एक पर्व के रूप में मनाते हैं ? क्या हर दिन होली के रंगों में नहाया जा सकता है ? क्या हर रात दिवाली के दीप जलाए जा सकते हैं ? एक ही दिन क्यों ये पर्व मनाए जाते हैं – रोज़ रोज़ क्यों नहीं ? तो मित्रों, पर्व तो एक ही दिन मनाया जाता है – तभी उसमें इतना अधिक उत्साह और जीवन भरा होता है | हर रोज़ यदि होली, दिवाली, वसन्त, राखी, ईद या कोई भी पर्व मनाया जाने लगा तो वह पर्व अपना उत्साह खो देगा और महज़ एक औपचारिकता मात्र बनकर रह जाएगा |

सभी पर्वों के मूल में भाव प्रेम का ही होता है, मस्ती और उत्साह का ही होता है | यदि उस एक दिन पारस्परिक दुराग्रहों, ईर्ष्या-द्वेष-घृणा आदि को तज कर साथ मिलकर पूर्ण उत्साह के साथ प्रेम के मार्ग पर चलने का आरम्भ किया जा सकता है तो क्यों न किया जाए ? और एक बार जब आरम्भ हो जाता है तो देर में सही, मंज़िल पर तो पहुँच ही जाते हैं | क्योंकि प्रेम केवल प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी के मध्य ही नहीं होता – जीवमात्र के प्रति प्रेम का भाव ही वास्तविक प्रेम है | सभी पर्वों की मूलभूत भावना है परस्पर प्रेम और सद्भाव रखते हुए सकारात्मक सोच में वृद्धि करते हुए आत्मोत्थान की ओर अग्रसर होना | हाँ, हर पल यदि परस्पर प्रेम और सद्भाव का भाव विद्यमान रहा तो हर पल पर्व जैसा होगा और तब पर्व का कुछ अलग ही उत्साह बनेगा |

बहरहाल, और किसी भी चर्चा में न पड़ते हुए केवल कुछ पंक्तियाँ…

प्रेम नहीं है ढाई अक्षर का मात्र एक शब्द
जो उच्चरित होते ही हो जाता है व्यर्थ

खो देता है अपना अर्थ / अपना अस्तित्व / अपना सार
न ही है कोरा भाव / जो उत्पन्न होते ही बन जाए अभाव

न ही समय है उसका आधार / न ही है कोई घटना उसका कारण

ना ही है इसका कोई रूप / न ही है इसकी कोई परिभाषा

ना ही है यह कोई दिखावा / ना ही छल / ना ही भ्रम

उपजता है यह हमारे ही अन्तरतम से

जो है अछूता किसी भी स्पर्श से / जो है अदृश्य किसी भी दृष्टि से

जो है परे देश-काल-युग-कल्प की भी समस्त सीमाओं से

है मात्र एक अनुभूति / होती है आन्दोलित जो गहराइयों में मन की

है ऐसा एक भराव / जो भर देता है समस्त शून्यता को सम्बन्धों की

नहीं करना होता प्रयास इसे पाने का तनिक भी

दस्तक देता है द्वार पर अनायास ही / बिना किसी पूर्वानुमान के

बस हटाना होगा आवरण भ्रम का / द्विविधा का

पाना होगा नियन्त्रण समस्त विचारों पर / हो जाने को विचारशून्य

करना होगा शान्त समस्त तर्कों को / हो जाने को तर्कशून्य

लाँघनी होंगी समस्त सीमाएँ ज्ञान की / बन जाने को एक भोला बालक

तभी समझ आएगा प्रेम का अनुशासन / भावना कर्तव्य की

तभी अनुभव होगा प्रेम का आन्दोलन / एक लक्ष्य

है कठिन जिस तक पहुँचना भी / है कठिन जिसे पूर्ण करना भी

क्योंकि मार्ग है कठिन / घुमावदार / ऊँचा नीचा और पथरीला

किन्तु पा ली सफलता इस आन्दोलन में / प्राप्त कर लिया इस लक्ष्य को

तो होगा उत्थान मानव मात्र का / जीव मात्र का / समस्त जगती का

क्योंकि है सत्य / कि जब नहीं था अस्तित्व किसी जीव का भी

था तब भी अस्तित्व प्रेम का

तभी तो सृष्टि चक्र का प्रथम बीज / गिरा होगा इस पृथिवी पर

क्योंकि है सत्य / कि नहीं रहेगा अस्तित्व किसी जीव का भी

रहेगा तब भी अस्तित्व प्रेम का

तभी तो रच सकेगा रचेता एक नवीन रचना / एक नवीन चक्र सृष्टि का

और इसीलिए कर्तव्य बोध प्रेम का / आन्दोलन प्रेम का

बन जाता है शाश्वत… अजर… अमर…

और तब नहीं रहता प्रेम ढाई अक्षर का मात्र एक शब्द / जो हो सकता है व्यर्थ

और ना ही रहने पाता है मात्र कोरा भाव / जो बन सकता है कभी भी अभाव…

photo_2015-10-19_10-39-01