श्रावणी – रक्षाबंधन

आप सभी रक्षा बन्धन के पर्व की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा में होंगे | कल रक्षा बन्धन का त्यौहार है | सभी को बहुत बहुत बधाई | जैसा कि हम सब ही जानते हैं कि भारत में पर्व-त्यौहारों का विशेष महत्व है । कोई न कोई त्यौहार साल भर लगा ही रहता है | किन्तु श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला रक्षा बन्धन का पर्व एक ऐसा पर्व है जिसकी प्रतीक्षा हर कोई बड़ी उत्कण्ठा के साथ करता है |

लोकभाषाओं में इस पर्व को सलूनो, राखी और श्रावणी भी कहा जाता है | क्योंकि यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है इसलिये इसे श्रावणी कहते हैं | इस दिन बहनें अपने भाई के दाहिने हाथ पर रक्षा सूत्र बाँधकर उसकी दीर्घायु की कामना करती हैं | जिसके बदले में भाई उनकी रक्षा का वचन देता है | सगे भाई बहन के अतिरिक्त अन्य भी अनेक सम्बन्ध इस भावनात्मक सूत्र के साथ बंधे होते हैं जो धर्म, जाति और देश की सीमाओं से भी ऊपर होते हैं | कहने का अभिप्राय यह है की यह पर्व केवल भाई बहन के ही रिश्तों को मज़बूती नहीं प्रदान करता वरन जिसकी कलाई पर भी यह सूत्र बाँध दिया जाता है उसी के साथ सम्बन्धों में माधुर्य और प्रगाढ़ता घुल जाती है | यही कारण है कि इस अवसर पर केवल भाई बहनों के मध्य ही यह त्यौहार नहीं मनाया जाता अपितु गुरु भी शिष्य को रक्षा सूत्र बाँधता है, मित्र भी एक दूसरे को रक्षा सूत्र बाँधते हैं | भारत में जिस समय गुरुकुल प्रणाली थी और शिष्य गुरु के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करते थे उस समय अध्ययन के सम्पन्न हो जाने पर शिष्य गुरु से आशीर्वाद लेने के लिये उनके हाथ पर रक्षा सूत्र बाँधते थे तो गुरु इस आशय से शिष्य के हाथ में इस सूत्र को बाँधते थे कि उन्होंने गुरु से जो ज्ञान प्राप्त किया है सामाजिक जीवन में उस ज्ञान का वे सदुपयोग करें ताकि गुरुओं का मस्तक गर्व से ऊँचा रहे | आज भी इस परम्परा का निर्वाह धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है | कई जगहों पर पुत्री भी पिता को राखी बाँधती है उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिये | आजकल नेताओं को भी राखी बाँधने की प्रथा चल निकली है | वन संरक्षण के लिये वृक्षों को भी राखी बाँधी जाती है | 1947 के भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में भी जन जागरण के लिये राखी को माध्यम बनाया गया था | गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बंग-भंग का विरोध करते समय इस पर्व को बंगाल के निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता के प्रतीक के रूप में इसका राजनीतिक उपयोग आरम्भ किया था |

इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपाकर्म होता है | उत्सर्जन, स्नान विधि, ऋषि तर्पण आदि करके नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है | प्राचीन काल में इसी दिन से वेदों का अध्ययन आरम्भ करने की प्रथा थी | मनुस्मृति में कहा गया है कि श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि से आरम्भ करके साढ़े चार मास तक वेदों का अध्ययन करना चाहिए और पौष अथवा माघ माह की शुक्ल प्रतिपदा को इसका उत्सर्जन कर देना चाहिए |

श्रावण्यां पौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि, युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोSर्ध पंचमान्।।

पुष्ये तु छंदस कुर्याद बहिरुत्सर्जनं द्विज:, माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वार्धे प्रथमेSहनि॥

इसका एक कारण कृषि भी था | आषाढ़ और श्रावण मास में वनों में वर्षा की अधिकता के कारण ऋषि मुनि गाँवों के निकट आकर रहना आरम्भ कर देते थे | इसे ही चातुर्मास भी कहा जाता था | ऋषि मुनियों के गाँवों के निकट आकर रहने से ग्रामीणों को ये लाभ होता था कि उन्हें इन गुणीजनों के साथ वेदाध्ययन करने का अवसर प्राप्त हो जाया करता था | जिस दिन से वेदाध्ययन आरम्भ होता था उसे उपाकर्म कहते थे | क्योंकि यह श्रावण मास की पूर्णिमा को आरम्भ होता था इसलिए इसे “श्रावणी उपाकर्म” कहा जाने लगा | श्रावणी पूर्णिमा से आरम्भ होकर पौष अमावस्या तक ये चातुर्मास चलता था और पौष माह में इस उपाकर्म का समापन कर दिया जाया करता था | इन साढ़े चार महीनों की अवधि में प्रतिदिन वेदाध्ययन, सन्ध्या, अग्निहोत्र आदि का पालन किया जाता था | नया यज्ञोपवीत धारण करके स्वाध्याय का व्रत लिया जाता था |

विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भागवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था । हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है । ऋग्वेदीय उपाकर्म श्रावण पूर्णिमा से एक दिन पहले सम्पन्न किया जाता है | जबकि सामवेदीय उपाकर्म श्रावण अमावस्या के दूसरे दिन प्रतिपदा तिथि में किया जाता है |

महाराष्ट्र राज्य में इस पर्व को नारियल पूर्णिमा और श्रावणी दोनों नामों से जाना जाता है | वहाँ भी इस दिन समुद्र के तट पर जाकर स्नानादि से निवृत्त होकर मंत्रोच्चार के साथ यज्ञोपवीत बदलते हैं तथा वरुण देवता को प्रसन्न करने के लिये नारियल से समुद्र की पूजा अर्चना करते हैं | तमिलनाडु, केरल, उड़ीसा तथा अन्य दक्षिण भारतीय प्रदेशों में यह पर्व “अवनि अवित्तम” के नाम से जाना जाता है तथा वहाँ भी नदी अथवा समुद्र के तट पर जाकर स्नानादि के पश्चात् ऋषियों का तर्पण करके नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है | अब तक किये पापकर्मों का पुराने यज्ञोपवीत की भाँति त्याग करके नवीन यज्ञोपवीत धारण करने के समान शुद्ध एवं नवीन जीवन आरम्भ करने की प्रतिज्ञा ली जाती है | कहने का तात्पर्य यह है की रक्षा बन्धन के साथ साथ इस दिन देश के लगभग सभी प्रान्तों में यज्ञोपवीत धारण करने वाले द्विज लगभग एक ही रूप में उपाकर्म भी करते हैं |

राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी या लूंबा बाँधा जाता है । कई स्थानों पर दोपहर में गोबर मिट्टी और भस्म से स्नान करके शरीर को शुद्ध किया जाता है और फिर अरुंधती, गणपति तथा सप्तर्षियों की पूजा के लिये वेदी बनाकर मंत्रोच्चार के साथ इनकी पूजा की जाती है | पितरों का तर्पण किया जाता है | उसके बाद घर आकर यज्ञ आदि के बाद राखी बाँधी जाती है |

रक्षा बन्धन आजकल के रूप में कब आरम्भ हुआ यह तो किसी को ज्ञात नहीं | किन्तु पुराणों से सम्बद्ध बहुत सी कथाएँ प्रचलित हैं | जिनमे से एक कथा भविष्य पुराण से है कि जब देव और दानवों के मध्य युद्ध आरम्भ हुआ तो दानव विजयी होते जान पड़ने लगे | जिससे इन्द्र घबरा गए और बृहस्पति के पास पहुँचे उनकी सलाह तथा सहायता माँगने | इन्द्राणी भी वहीं बैठी थीं | सारा समाचार जानकर उन्होंने इन्द्र को आश्वस्त किया और रेशम का एक धागा मन्त्रों से अभिषिक्त करके अपने पति इन्द्र की कलाई पर बाँध दिया | उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी | इन्द्र विजयी हुए और इन्द्राणी द्वारा बांधे गए धागे को इस विजय का कारण माना गया | तभी से धन, शक्ति, हर्ष तथा विजय की कामना से श्रावण पूर्णिमा के दिन राखी बाँधने का प्रचलन है | राजपूतनी रानियाँ भी पति के युद्धभूमि में जाते समय उनकी विजय की कामना से उनकी कलाई में राखी बाँधा करती थीं |

इसके अतिरिक्त स्कन्द पुराण, पद्मपुराण तथा श्रीमद्भागवत में भी रक्षा बन्धन का प्रसंग मिलता है | प्रसंग कुछ इस प्रकार है कि प्रह्लाद के पुत्र विरोचन के यहाँ एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम रखा गया बलि | दानवों के इस प्रतापी राजा बलि ने १०० यज्ञ पूर्ण कर लिये तब उन्होंने स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयास किया | तब इन्द्र तथा अन्य देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने कश्यप तथा अदिति के यहाँ वामन के रूप में अवतार लिया और रजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँच गए | राजा बलि उन्हें तमाम तरह के रत्नादि भिक्षा में दे रहे थे, किन्तु वामन देव ने कुछ भी लेने से इनकार कर दिया और कहा कि उन्हें तो बस उतनी पृथिवी चाहिए जितनी उनके तीन पैरों की माप में समा सके | वामन का लघु रूप देखकर बलि ने सोचा की ऐसी कितनी पृथिवी यह वामन ले लेगा तीन पैरों में – और इस तरह वामन को तीन पग पृथिवी दान में दे दी | वामन देव ने पहला पैर रखा तो सम्पूर्ण पृथिवी उसके नीचे आ गई | उनके दूसरे पैर में पूरा स्वर्ग समा गया | अब जब तीसरा पैर रखने के लिये स्थान नहीं इला तो वाम्न्देव ने अपना तीस्तापैर बलि के सर पर रख दिया और इस तरह उसे उसकी समस्त प्रजा तथा राज्य के साथ पातळ भेज दिया | तब बाली ने विष्णु भगवान की भक्ति करके उनसे वचन ले लिया कि ठीक है आपने तो मुझे रसातल में पहुँचा ही दिया है, अब आपको भी मेरे साथ यहीं रहना होगा मेरे द्वारपाल के रूप में | उधर भगवान के घर न लौटने से लक्ष्मी जी परेशान हो गई थीं | नारद से सारी बातें जानकार और साथ ही उपाय भी जानकर लक्ष्मी रसातल पहुँचीं और राजा बलि के हाथ पर राखी बाँधकर उसे अपना भाई बना लिया | लक्ष्मी के उस अनुराग से बाली इतना प्रसन्न हुआ कि विष्णु को उन्हें भेंटस्वरूप वापस लौटा दिया तथा साथ ही जो कुछ उसके पास था वह सब भी उसने लक्ष्मी को भेंट में दे दिया | उस दिन श्रावण पूर्णिमा ही थी | कहा जाता है कि तभी से प्रथा चली आ रही है कि राखी के दिन बहनें भाइयों के घर जाकर उन्हें राखी बाँधती हैं और बदले में भाई न केवल उनकी रक्षा का वचन देते हैं बल्कि बहुत सारे उपहार भी बहनों को देते हैं | इस अवसर पर तथा अन्य भी पूजा विधानों में इसीलिए रक्षासूत्र बाँधते समय राजा बलि की ही कथा से सम्बद्ध एक मन्त्र का उच्चारण किया जाता है जो इस प्रकार है “येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः, तेन त्वां निबध्नामि रक्षे माचल माचल |” श्लोक का भावार्थ यह है कि जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिहशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बाँध रहा हूँ जिससे तुम्हारी रक्षा होगी ।

एक कथा महाभारत में भी आती है कि जब युधिष्ठिर ने भगवान से प्रश्न किया कि वे संकटों से किस प्रकार मुक्त हो सकते हैं तब कृष्ण ने समस्त पाण्डव सेना को रक्षाबन्धन मनाने की सलाह दी | उस समय द्रौपदी ने कृष्ण को तथा कुंती ने अभिमन्यु को राखी बाँधी थी | एक कथा इस प्रकार भी आती है कि जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी उँगली में चोट लग गई थी | द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उससे कृष्ण की उँगली पर पट्टी बाँधी थी | उस दिन भी श्रावण पूर्णिमा ही थी | कहते हैं कि बाद में चीर हरण के समय द्रौपदी की साड़ी बढ़ाकर कृष्ण ने उनकी रक्षा की थी |

इन पौराणिक प्रसंगों के अतिरिक्त कुछ प्रसंग इतहास से भी सुनने को मिल जाते हैं | जैसा ऊपर भी लिखा है, राजपूतों के युद्धभूमि में जाते समय उनकी विजय की कामना से महिलाएँ उनके मस्तक पर कुमकुम का तिलक लगाकर हाथ में राखी बाँधा करती थीं | चित्तौड़ की रानी कर्मावती और मुग़ल बादशाह हुमायूँ की कहानी तो जग प्रसिद्द है ही कि जब चित्तौड़ की विधवा रानी कर्मावती को गुजरात के बादशाह बहादुरशाह द्वारा राज्य पर हमला करने की पूर्व सूचना मिली तो वे समझ गईं की वे अकेले शत्रु से नहीं भिड़ सकतीं और तब उन्होंने मुग़ल बादशाह हुमायूँ को सहायता के लिये पत्र लिखा तथा साथ में एक राखी भी भेजकर हुमायूँ को मुँहबोला भाई बना लिया | हुमायूँ ने भी राखी की लाज रखी और रानी कर्मावती का साथ दिया | एक कथा और है कि सिकन्दर की पत्नी ने अपने पति के शत्रु राजा पौरस को राखी बाँधकर भाई बना लिया और सिकन्दर को न मारने का वचन ले लिया | राजा पुरुरवा ने भी अपनी मुँहबोली बहन को दिये वचन का सम्मान करते हुए सिकन्दर को जीवनदान दे दिया |

इसी तरह एक और कथा है जो मृत्यु – मोक्ष तथा यम नियम संयम के देवता – यम तथा उनकी बहन यमुना से सम्बंधित है | कथा इस प्रकार है कि यमुना ने अपने भाई के हाथ पर राखी बाँधी और बदले में अमरत्व का वरदान ले लिया | यम अपनी बहन के प्रेम से इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने उसे वचन दे दिया कि आज के बाद जो भी भाई अपनी बहन से राखी बंधवाएगा और उसकी सुरक्षा का वचन देगा वह दीर्घायु होगा |

कथाएँ चाहे जितनी भी हों, पर इनसे इस पर्व की लोकप्रियता का पता चलता है | उड़ीसा में यह पर्व घाम पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है, तो महाराष्ट्र में नाराली (नारियल) पूर्णिमा के नाम से, उत्तराँचल में जन्यो पुन्यु (जनेऊ पुण्य) के नाम से, तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड तथा बिहार में कजरी पूर्णिमा के नाम से इस पर्व को मनाते हैं | वहाँ तो श्रावण अमावस्या के बाद से ही यह पर्व आरम्भ हो जाता है और नौवें दिन कजरी नवमी को पुत्रवती महिलाओं द्वारा कटोरे में जौ व धान बोया जाता है तथा सात दिन तक पानी देते हुए माँ भगवती की वन्दना की जाती है तथा अनेक प्रकार से पूजा अर्चना की जाती है जो कजरी पूर्णिमा तक चलती है | उत्तरांचल के चम्पावत जिले के देवीधूरा में इस दिन बाराही देवी को प्रसन्न करने के लिए पाषाणकाल से ही पत्थर युद्ध का आयोजन किया जाता रहा है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बग्वाल’ कहते हैं। सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि इस युद्ध में आज तक कोई भी गम्भीर रूप से घायल नहीं हुआ और न ही किसी की मृत्यु हुई । इस युद्ध में घायल होने वाला योद्धा भाग्यवान माना जाता है और युद्ध के इस आयोजन की समाप्ति पर पुरोहित पीले वस्त्र धारण कर रणक्षेत्र में आकर योद्धाओं पर पुष्प व अक्षत् की वर्षा कर उन्हें आर्शीवाद देते हैं । इसके बाद योद्धाओं का मिलन समारोह होता है । गुजरात में इस दिन शंकर भगवान की पूजा की जाती है |

नाम चाहे जो हो, रूप चाहे जैसा भी हो, विधि विधान चाहे जैसे भी हों, चाहे कोई भी भाषा भाषी हों, किन्तु अंततोगत्वा इस पर्व को मनाने के पीछे अवधारणा केवल यही है कि लोगों में परस्पर भाईचारा तथा स्नेह प्रेम बना रहे | भारतीय समाज में रक्षाबन्धन सिर्फ भाई-बहन के रिश्तों तक ही सीमित नहीं है, अपितु प्रत्येक सम्बन्ध में यह पर्व मिठास, अपनापन तथा प्रगाढ़ता भर देता है | रक्षाबन्धन हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय रिश्तों का एक अभिन्न अंग है। किन्तु जिस प्रकार आज तरह तरह के आडम्बर इस भावपूर्ण में अपनी जगह बना चुके हैं उसे देखते हुए यही कहना चाहूंगी की इस आडम्बर को छोड़कर, व्यर्थ के दिखावे तथा दान के प्रदर्शन का मोह त्यागकर इस पर्व के साथ जुड़े संस्कारों और जीवन मूल्यों को समझने का प्रयास किया जाए तभी यह पर्व सार्थक होगा और तभी व्यक्ति, परिवार, समाज तथा देश का कल्याण सम्भव होगा |

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