षडजान्तर

सुबह सुबह उनींदे भाव से खोली जब खिड़की रसोई की

बारिश में भीगे ठण्डी हवा के रेशमी झोंके ने

लपेट लिया प्यार से अपने आलिंगन में

और भर दिया एक सुखद सा अहसास मेरे तन मन में…

बाहर झाँका

वर्षा की बूँदों के सितार पर / हवा छेड़ रही थी मधुर राग

जिसकी धुन पर झूमते लहलहाते वृक्ष गा रहे थे मंगल गान…

वृक्षों के आलिंगन में सिमटे पंछी

झोंटे लेते मस्त हुए मानों निद्रामग्न लेटे थे…

कभी कोई चंचल फुहार बारिश की

करती अठखेली उनके नाज़ुक से परों के साथ

करती गुदगुदी सी उनके तन में और मन में

तो चहचहा उठते वंशी सी मीठी सुरीली ध्वनि में…

कहीं दूर आम के पेड़ों के बीच स्वयं को छिपाए कोयल

कुहुक उठती मित्र पपीहे के निषाद में अपनी पंचम को मिला

मानों मिलकर गा रहे हों राग देस या कि मेघ मलहार

कभी मिल जाती उनके बीच में दादुरवृन्द की गंधार ध्वनि भी

मानों वीणा के मिश्रित स्वरों के मध्य से उपज रही हो

एक ध्वनि अन्तर गंधार की

जो नहीं है प्रत्यक्ष, किन्तु समाया हुआ है षडज-गंधार के अन्तर में…

शायद इसीलिए बरखा के स्वरों से

गूँज उठता है षडज का नाद दसों दिशाओं में

घोषणा सी करता हुआ कि स्वर ही नहीं

प्रणव के रूप में समस्त ब्रह्माण्ड भी उत्पन्न हुआ है षडज से ही…

और ऐसे सुरीले मौसम में खिड़की पर सिर टिकाए

सोचने लगा प्रफुल्लित मन

कि शायद हो गया है भान प्रकृति को

अपने इस श्रुतिपूर्ण सत्य का

तभी तो रात भर मेघ बजाते रहे मृदंग

और मस्त बनी बिजुरिया दिखलाती रही झूम झूम कर

अनेकों भावों और अनुभावों से युक्त मस्त नृत्य / सारी रात…

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कजरारी बरसात

रात भर से रुक रुक कर बारिश हो रही है – मुरझाई प्रकृति को मानों नए प्राण मिल गए हैं… वो बात अलग है कि दिल्ली जैसे महानगरों में तथा दूसरी जगहों पर भी – जहाँ आबादी बढ़ने के साथ साथ “घरों” की जगह “मल्टीस्टोरीड अपार्टमेंट्स” के रूप में कंकरीट के घने जंगलों ने ले ली है… बिल्डिंग्स कारखाने बनाने के लिए पेड़ों पर बिना सोचे समझे ही कुल्हाड़ी चलाई जा रही हैं… पहाड़ों की कटाई के कारण पहाड़ खिसके जा रहे हैं… ऐसे में बरसात में मिट्टी की सौंधी सुगन्ध अब केवल स्मृतिशेष रह गई है… कोयल की पंचम के संग सुर मिलाते पपीहे की पिहू पिहू अब आपको मेघ मल्हार नहीं सुना पाती… लेकिन फिर भी मृदंग की थाप के समान बादलों के गम्भीर गर्जन की लय पर पवन देव से मिल कर मतवाली हो चुकी बूँदों का मधुरिम गान, और इस सबको देख कर मस्त हुई दामिनी का मादक नृत्य – इतना ही काफ़ी है मन के प्यासे पपीहे की नीरवता को दूर भगा उसे आह्लादित करने के लिए… कोई पत्थरदिल ही होगा जिसके मन का बिरवा ऐसे शराबी मौसम में झूम न उठेगा… इसी बात पर प्रस्तुत हैं बरखा की बूँदों के रस में डूबी कुछ पंक्तियाँ…

कजरारी बरसात जो आई, मन का बिरवा नाच उठा |

बूँदों के संग सतरंगी सपनों में वह तो झूम उठा ||

सिहर सिहर पुरवैया चलती, धरती सारी लहराती |

वन में मोर मोरनी नाचें, कोयलिया गाना गाती ||

आसमान भी सात रंग की सुर सरगम सुन झूम उठा |

बूँदों के संग सतरंगी सपनों में वह तो झूम उठा ||

आज मेघ पर चढ़ी जवानी, बौराया सा फिरता है |

किन्तु पपीहा तृप्त हुआ ना, ये कैसा पागलपन है ||

मस्त बिजुरिया की तड़पन को लख कर वह भी हूक उठा |

बूँदों के संग सतरंगी सपनों में वह तो झूम उठा ||

जिस पपिहे की प्यास बुझा पाया ना कोई भी बादल

अरी दामिनी, मधु की गागर से तू उसकी प्यास बुझा ||

घन की ताधिन धिन मृदंग पर पात पात है झूम उठा |

बूँदों के संग सतरंगी सपनों में वह तो झूम उठा ||

ऐसो आयो सावन

ऐसो आयो सावन, चारों और नशा सा घुलता जाए |

कौन किसे अब कुछ समझाए, जग पर मदहोशी सी छाए ||

मेघा गरज गरज घहराए, मन की वीणा झनकी जाए |

बिजुरी दमक दमक दमकाए, पग की पायल शोर मचाए ||

बन में मोर मोरनी नाचें, हिय में और उछाह भर जाए |

पपीहा पिहू की टेर लगाए, मन बौराया झूमा जाए ||

अम्बुवा की डाली पर देखो कोयल कुहुक कुहुक हुलसाए |

मतवाले मौसम में भीज भीज मन पेंग बढ़ाता जाए ||

प्रियतम सागर करे इशारा तो फिर लाज शरम अब कैसी |

सारे बन्धन तज कर नदियाँ पिया मिलन को उमड़ी जाएँ ||

झूम झूम तरु झुकें धरा पर, प्यार भरा एक चुम्बन ले लें |

धरा बावरी हरा घाघरा पहन मस्त हो थिरकी जाए ||

हरियाली तीज

सावन का महीना आते ही अपने पुराने दिनों की याद ताज़ा हो आती है | कई रोज़ पहले से पिताजी उत्साह में भर घर सर पर उठा लिया करते थे “अरे भई मास्टरनी जी (हमारी माँ को पिताजी मास्टरनी जी बुलाते थे) पूनम की चाचियों के चूड़ियों के नाप तो लाकर दो | और हाँ वो लाली और सरसुती की चूड़ियों का माप भी ले आना | अच्छा छोड़ो आपको तो फुर्सत ही कहाँ इन सब कामों के लिए, हम ही जाकर ले आते हैं…” और पहुँच जाते पहले बिब्बी यानी अपनी बड़ी बेटी हमारी बड़ी बहन के पास और उनकी एक चूड़ी ले आते, फिर सरसुती (सरस्वती) यानी हमारी बुआ की चूड़ी ली जाती और फिर दोनों चाचियों की एक एक चूड़ी ले आते और हमें साथ में ले पहुँच जाते चूड़ी वाली दूकान पर | उन दिनों शहर में एक ही बड़ी दूकान ऐसी थी जिस पर चूड़ी के साथ साथ लड़कियों की ज़रूरत का हर सामान मिल जाया करता था | बस अपनी पसन्द से चूड़ियाँ ख़रीद लाते | फिर सुन्दरलाल ताऊ जी की दूकान से घेवर और फेनी लाए जाते और माँ घर पर ही उन्हें पागती | फिर तीज से एक दो रोज़ पहले चारों घरों में चूड़ी और घेवर फेनी पहुँचाए जाते | माँ को तो उत्साह था ही इन सब कामों का – आख़िर तीज तो होता ही औरतों का त्यौहार है, पर पिताजी का भी उत्साह देखते ही बनता था | साथ में चाचियाँ, बिब्बी और बुआ भी साल भर इंतज़ार करती थीं इस अवसर का और जब उन्हें उनकी चूड़ियाँ और माँ के हाथों का पगा घेवर फेनी मिल जाता तो सबकी ख़ुशी देखते ही बनती थी |

उधर मामा जी आते संभल से माँ के लिए और हम सबके लिए चूड़ी कपड़े घेवर फेनी वगैरा लेकर – यानी सिधारा लेकर | कितनी धूम रहती थी त्यौहार की | सादे लोग थे, सादे तरीक़े से त्यौहार मनाते थे | न अधिक कुछ लिया दिया जाता था न किसी तरह का कोई दिखावा ही होता था | लड़कियों को अपनी पसन्द की थोड़ी चूड़ियाँ मिल गईं और एक जोड़ा कपड़े और एक जोड़ी सैंडल मिल गए तो मज़ा आ गया | लड़कों को भी उनकी पसन्द के कपड़े और जूते मिल गए तो और क्या चाहिए | न शगुन के लिफ़ाफ़े लिए दिए जाते थे न तरह तरह की गिफ्ट्स | घर में ही पकवान बनाए जाते थे | पर उस सादगी में भी जो मस्ती आती थी – त्यौहार का जो मज़ा आता था – वो आज बहुतेरे ताम झाम के बाद भी नहीं आने पाता | इसी सब में इतनी चहल पहल हो जाती थी – और कई दिनों तक रहा करती थी | सारी चहल पहल के बीच मीठी नोक झोंक भी चलती रहती थी | और साल भर त्यौहार लगे ही रहते थे तो साल भर ही इस तरह के उत्सव चलते रहते थे |

मसलन, माँ घेवर फेनी पागने बैठतीं तो पिताजी भी साथ देने के लिए बैठ जाते और बार बार कुछ ऐसा कर बैठते कि माँ का काम बिगड़ जाता | माँ नकली गुस्सा दिखातीं “मैंने बोला न हट जाओ, काम बिगाड़ने पर लगे हो… हटो यहाँ से…” और पिताजी का हाथ खींच कर उन्हें वहाँ से हटाने की कोशिश करतीं तो पिताजी भी भूरी आँखों से हँसते हुए बोलते “लो जी बिटिया रानी देख लो… शराफ़त का तो ज़माना ही नहीं है… अरे हम तो इनकी मदद कर रहे थे और ये हैं कि हमें रसोई से धक्का ही दिए दे रही हैं… चलो जी कैरम निकालो… हम दोनों बैठकर कैरम खेलते हैं…” और उसी तरह मीठी सी हँसी हँसते हुए बाहर आ जाते और माँ लग जातीं अपने काम में तसल्ली से | उसके बाद जब चाची के पास उनका सामान लेकर जाते तब माँ और पिताजी दोनों अपनी नोक झोंक की बातें उन्हें सुनाते और वो हँसती रहतीं | भला आज के रेडीमेड के ज़माने में इन सब ठिठोलियों का मज़ा कहाँ ? और फिर आज समय भी किसके पास है इस तरह की हँसी ठिठोलियों के लिए ?

खैर, तो बात चल रही सावन की और हरियाली तीज की | यों तो सारा सावन ही बागों में और घर में लगे नीम और आम के पेड़ों पर झूले लटके रहते थे और लड़कियाँ गीत गा गाकर उन पर झूला करती थीं | पर तीज के दिन तो एक एक घर में सारे मुहल्ले की महिलाएँ और लड़कियाँ हाथों पैरों पर मेंहदी की फुलवारी खिलाए, हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ पहने सज धज कर इकट्ठी हो जाया करती थीं दोपहर के खाने पीने के कामों से निबट कर और फिर शुरू होता था झोंटे देने का सिलसिला | दो महिलाएँ झूले पर बैठती थीं और बाक़ी महिलाएँ गीत गाती उन्हें झोटे देती जाती थीं और झूला झूलने के साथ साथ चुहलबाज़ी भी चलती रहती | सावन के गीतों की वो झड़ी लगती थी कि समय का कुछ होश ही नहीं रहता था | पुरुष भी कहाँ पीछे रहने वाले थे ? वे भी जबरदस्ती करके इस हुल्लड़ में शामिल हो जाया करते और झोटे देते देते हल्की फुल्की चुहल भी चलती रहती | और किसी की नई नई शादी हुई हो तब तो फिर उस भाभी या उस जीजा के ही पीछे सारे लड़के लड़कियाँ पड़ जाया करते और बदले में बड़े बुजुर्गों की मीठी झिड़की भी सुना करते “अरे क्यों तंग कर रहे हो बेचारों को…” वक़्त जैसे ठहर जाया करता था इन मादक दृश्यों का गवाह बनने के लिये |

बहरहाल, सबसे पहले तो इस पर्व की बधाई | श्रावण मास में जब समस्त चराचर जगत वर्षा की रिमझिम फुहारों में सराबोर हो जाता है, इन्द्रदेव की कृपा से जब मेघराज मधु के समान जल का दान पृथिवी को देते हैं – और उस अमृतजल का पान करके जब प्यासी धरती की प्यास बुझने लगती है – तब हरे घाघरे में लिपटी धरती अपनी इस प्रसन्नता को वनस्पतियों के लहराते नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त करने लगती है – जिसे देख जन जन का मानस मस्ती में झूम झूम उठता है – तब उस उल्लास का अभिनन्दन करने के लिये – उस मादकता की जो विचित्र सी अनुभूति होती है उसकी अभिव्यक्ति के लिये – “हरियाली तीज” अथवा “मधुस्रवा तीज” का पर्व मनाया जाता है | “मधुस्रवा अथवा मधुश्रवा” शब्द का अर्थ ही है मधु अर्थात अमृत का स्राव यानी वर्षा करने वाला | अब गर्मी से बेहाल हो चुकी धरती के लिए भला जल से बढ़कर और कौन सा अमृत हो सकता है ? वैसे भी जल को अमृत ही तो कहा जाता है |

तो एक बार पुनः अमृत की वर्षा करने वाली इस मधुश्रवा तीज की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत हैं इसी अवसर पर पुछले वर्ष लिखी गई कुछ पंक्तियाँ…

आओ मिलकर झूला झूलें ।

ऊँची पेंग बढ़ाकर धरती के संग आओ नभ को छू लें ।।

कितने आँधी तूफाँ आएँ, घोर घनेरे बादल छाएँ ।

सबको करके पार, चलो अब अपनी हर मंज़िल को छू लें ।।

हवा बहे सन सन सन सन सन, नभ से अमृत बरसा जाए ।

इन अमृत की बून्दों से आओ मन के मधुघट को भर लें ।।

ऊदे भूरे मेघ मल्हार सुनाते, सबका मन हर्षाते ।

मस्त बिजुरिया संग मस्ती में भर आओ हम नृत्य रचा लें  ।।

हरा घाघरा पहने नभ के संग गलबहियाँ करती धरती ।

आओ हम भी निज प्रियतम संग मन के सारे तार जुड़ा लें ।|

बरखा रानी छम छम छम छम पायल है झनकाती आती ।

कोयलिया की पंचम के संग हम भी पियु को पास बुला लें ।।

सावन है दो चार दिनों का, नहीं राग ये हर एक पल का ।

जग की चिंताओं को तज कर मस्ती में भर आज झूम लें ।।

झूला झूलो

मधुस्रवा तीज की हार्दिक शुभकामनाएँ

झूला

क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी

ये बरखा का मौसम सजीला रसीला, घटाओं में मस्ती हवाओं में थिरकन |

वो बलखाती बूँदों का फूलों से मिलना, वो शाख़ों का लहराके हर पल मचलना ||

नशे में है डूबी, क़दम लड़खड़ाती, वो मेघों की टोली चली आ रही है |

कि बिजली के हाथों से ताधिन ताधिन्ता, वो मादल बजाती बढ़ी आ रही है ||

पपीहा सदा ही पियू को पुकारे, तो कोयल भी संग में है सुर को मिलाती |

जवानी की मस्ती में मतवाला भँवरा, कली जिसपे अपना है सर्वस लुटाती ||

मौसम में ठण्डक, तपन बादलों में, वो अम्बुवा की बौरों से झरता पसीना |

सावन की रिमझिम फुहारों के संग ही, लो मन में भी अमृत की धारा बरसती ||

है पगलाई बौराई सारी ही धरती, चढ़ा है नशा पत्ते पत्ते भे भारी |

कि बिखराके सुध बुध को तन मन थिरकता, तो क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी ||

सावन

 

मेघों ने बाँसुरी बजाई

मौसम ने अपनी ही एक पुरानी रचना याद दिला दी:-

मेघों ने बाँसुरी बजाई, झूम उठी पुरवाई रे |

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

उमड़ा स्नेह गगन के मन में, बादल बन कर बरस गया

प्रेमाकुल धरती ने नदियों की बाँहों से परस दिया |

लहरों ने एकतारा छेड़ा, कोयलिया इतराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

बूँदों के दर्पण में कली कली निज रूप निहार रही

धरती हरा घाघरा पहने नित नव कर श्रृंगार रही |

सजी लताएँ, हौले हौले डोल उठी अमराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

अँबुवा की डाली पे सावन के झूले मन को भाते

हर इक राधा पेंग बढ़ाए, और हर कान्हा दे झोंटे |

हर क्षण, प्रतिपल, दसों दिशाएँ लगती हैं मदिराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

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