Category Archives: वैदिक ज्योतिष

वक्री बुध मीन राशि में

पाँच मार्च को 23:49 पर बुध वक्री हो चुका है | वक्री होता हुआ बुध 15 मार्च को प्रातः नौ बजे के लगभग कुम्भ में वापस लौट जाएगा | 28 मार्च से 19:30 के लगभग मार्गी होना आरम्भ होगा और 12 अप्रेल को प्रातः चार बजकर चौबीस मिनट के लगभग मीन में पहुँच जाएगा | जहाँ 3 मई को 17:03 तक विचरण करने के बाद अन्त में मेष राशि में प्रस्थान कर जाएगा | कल यानी आठ मार्च से इक्कीस मार्च तक बुध अस्त भी रहेगा | बुध के मीन राशि में गोचर के फल पूर्व में लिख चुके हैं | बुध ज्ञान विज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान, गणित, सांख्यिकी, व्यापार, आज की स्थिति में कम्प्यूटर विज्ञान इत्यादि का कारक माना जाता है | Astrologers की मान्यता है कि बुध यदि वक्री हो तो जीवन में नकारात्मक प्रभाव होते हैं | किन्तु हमारे विचार से गोचर में किसी भी ग्रह के वक्री होने से केवल नकारात्मक प्रभाव ही नहीं होने चाहियें | अपितु ग्रह के वक्री होने पर जो उसके प्रभाव हैं उनमें और अधिक वृद्धि हो जानी चाहिए – फिर चाहे वह नकारात्मक हों या सकारात्मक – क्योंकि वक्री होने पर गह के चेष्टाबल में वृद्धि हो जाती है |

बुध सूर्य के सबसे अधिक निकट है अतः बहुत शीघ्र ही वक्री हो जाता है, बहुत शीघ्र मार्गी हो जाता है, बहुत शीघ्र अतिगामी भी हो जाता है | वक्री होने पर बुध के दोनों ही प्रभाव हो सकते हैं – शुभ भी और अशुभ भी | शुभ ग्रहों के प्रभाव में आएगा या किसी शुभ भाव में जाएगा तो जातक की बुद्धि, वाणी, संचार क्षमता – Communication skills, निर्णायक क्षमता, लेखन, व्यापार इत्यादि में कौशल तथा प्रगति परिलक्षित होगा | अशुभ ग्रह के प्रभाव अथवा भाव में आएगा तो इसके विपरीत फल हो सकते हैं |

हाँ, यहाँ हम कह सकते हैं कि बुध क्योंकि अपनी नीच राशि में भ्रमण कर रहा है तो इस स्थिति में सम्भव है उतने अच्छे प्रभाव बुध के न परिलक्षित हों | तो आइये जानने का प्रयास करते हैं कि मीन राशि में बुध के वक्री होने पर जन साधारण के लिए क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं |

किन्तु ध्यान रहे, ये परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु किसी योग्य Astrologer द्वारा उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |

मेष : आपका तृतीयेश और षष्ठेश होकर बुध आपकी राशि से बारहवें भाव में वक्री हो रहा है | आपके लिए उत्साह तथा निर्णायक क्षमता में वृद्धि का समय प्रतीत होता है | जिसके कारण आप स्वयं ही अपने विरोधियों को परास्त करने में समर्थ हो सकेंगे तथा आपके कार्य समय पर और सुचारू रूप से सम्पन्न हो सकेंगे | साथ ही आपके जीवन में कोई ऐसा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन भी हो सकता है जो आपके लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है | कार्य में प्रगति तथा अर्थ लाभ की सम्भावना की जा सकती है |

वृषभ : आपके लिए द्वितीयेश और पंचमेश होकर आपके लाभ स्थान में बुध वक्री हो रहा है | एक ओर आपके लिए आय में प्रगति के संयोग प्रतीत होते हैं वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत सम्बन्धों में किसी प्रकार की समस्या का सामना भी करना पड़ सकता है | अपने स्वभाव और वाणी को नियन्त्रण में रखेंगे तो इन समस्याओं से बच सकते हैं |

मिथुन : आपके लिए आपका योगकारक होकर बुध आपके दशम भाव में वक्री हो रहा है | आपको पैतृक संपत्ति के लाभ होने की सम्भावना है | कार्य में प्रगति के साथ ही कार्यस्थल पर तथा परिवार में सहयोग और सौहार्द का वातावरण भी बना रह सकता है | पॉलिटिक्स से यदि आपका सम्बन्ध है तो आपके लिए विशेष रूप से यह गोचर अनुकूल फल देने वाला प्रतीत होता है |

कर्क : आपका तृतीयेश और द्वादशेश होकर बुध आपके आपके नवम भाव में वक्री हो रहा है | जो लोग हाथ के कारीगर हैं अथवा डॉक्टर वैद्य इत्यादि हैं या वैज्ञानिक हैं तो आपके लिए आपके कार्य में उन्नति तथा सफलता की सम्भावना की जा सकती है | किन्तु साथ ही भाई बहनों के साथ किसी प्रकार का मन मुटाव भी सम्भव है | इस अवधि में यात्राएँ आपके लिए सम्भव है अनुकूल न सिद्ध हों |

सिंह : आपके लिए आपका द्वितीयेश और लाभेश होकर बुध आपके अष्टम भाव में वक्री हो रहा है | यदि कहीं पैसा Invest किया हुआ है तो उसके माध्यम से आपको लाभ होना आरम्भ हो सकता है | किसी उच्च पदस्थ व्यक्ति से सम्पर्क हूँ सकता है जो धीरे धीरे प्रगाढ़ मित्रता में परिवर्तित हो सकता है जिसके कारण आपको अपने कार्य में लाभ भी प्राप्त हो सकता है | सम्भव है आपको कुछ विरोध का आभास हो, किन्तु इसके कारण चिन्ता की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप स्वयं ही अपने बुद्धिबल से इस विरोध को शान्त करने में सक्षम हो सकते हैं |

कन्या : आपके लिए आपका योगकारक होकर आपके सप्तम भाव में बुध वक्री हो रहा है | आपके व्यवसाय में प्रगति की सम्भावना की जा सकती है | किसी मित्र के माध्यम से आपको कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आपको अर्थलाभ के साथ ही आपकी व्यस्तताएँ भी बढ़ सकती हैं | साथ ही आप प्रॉपर्टी से सम्बन्धित कुछ कार्यों का निबटारा भी इस अवधि में कर सकते हैं | अविवाहित हैं तो जीवन साथी की तलाश भी इस अवधि में पूर्ण हो सकती है |

तुला : आपका नवमेश और द्वादशेश होकर बुध आपकी राशि से छठे भाव में वक्री हो रहा है | एक ओजहान आपके लिए मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं, धार्मिक गतिविधियों में वृद्धि के संकेत हैं, यात्राओं में वृद्धि के संकेत हैं, वहीं दूसरी ओर आपके मन में किसी प्रकार की निराशा और असुरक्षा की भावना भी बलवती हो सकती है | आवश्यकता है ध्यान का नियमित अभ्यास करने की | साथ यात्राओं के दौरान अपने Important Documents और सामान की सुरक्षा की भी आवश्यकता है | प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की सम्भावना की जा सकती है |

वृश्चिक : आपके लिए आपका अष्टमेश और एकादशेश होकर बुध आपके पंचम भाव में वक्री हो रहा है | यद्यपि कार्य की दृष्टि से तथा आर्थिक लाभ की दृष्टि से समय अनुकूल प्रतीत होता है, किन्तु स्वास्थ्य का विशेष रूप से ध्यान रखने की आवश्यकता है | शरीर में थकान, नींद में अभाव आदि का अनुभव इस अवधि में हो सकता है | अकस्मात् ही कहीं से अच्छा या बुरा कोई ऐसा समाचार भी प्राप्त हो सकता है जिसके कारण आपके जीवन की दिशा ही बदल सकती है |

धनु : आपके लिए योगकारक होकर बुध आपके चतुर्थ भाव में वक्री हो रहा है | आपके लिए कार्य की दृष्टि से यह समय अत्यन्त अनुकूल प्रतीत होता है | सहकर्मियों तथा जीवन साथी का सहयोग और समर्थन निरन्तर आपको प्राप्त होता रहेगा जिसके कारण आपके कार्य भी भली भाँती सम्पन्न होते रहेंगे | मान सम्मान में वृद्धि की भी सम्भावना है | किन्तु परिवार के मध्य से किसी प्रकार के विरोध अथवा तनाव की आशंका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता | ऐसी स्थिति में आवश्यकता है आप अपना स्वभाव में सकारात्मकता और शान्ति बनाए रखें |

मकर : आपका षष्ठेश और नवमेश होकर बुध आपके तीसरे भाव में वक्री हो रहा है | आपके लिए उत्साह में वृद्धि का समय प्रतीत होता है | धार्मिक कार्यों में आपकी रूचि में वृद्धि की सम्भावना है | इस अवधि में आप तीर्थयात्रा के लिए भी जा सकते हैं | किन्तु स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के कारण आपकी दिनचर्या में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है | डॉक्टर के दिशानिर्देशों का पालन अवश्य करें | भाई बहनों के साथ व्यर्थ के विवाद से बचने का प्रयास करें |

कुम्भ : आपके लिए आपका पंचमेश और अष्टमेश होकर बुध आपकी राशि से दूसरे भाव में वक्री हो रहा है | आप अपने बौद्धिक कौशल से कार्य में सफलता था धनार्जन करने में पूर्ण रूप से सक्षम हैं | हाँ, अपनी वाणी और Temperament पर नियन्त्रण रखने की आवश्यकता है | आपका झुकाव धार्मिक, आध्यात्मिक तथा दार्शनिक गतिविधियों की ओर भी बढ़ सकता है | किन्तु यदि कहीं पैसा Invest करना चाहते हैं तो या तो बही कुछ समय के लिए इस विचार को स्थगित कर दें, अथवा बहुत सोच समझकर आगे बढ़ें | आँख में किसी प्रकार का इन्फेक्शन भी सम्भव है | विरोधियों की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | किसी बुज़ुर्ग का स्वास्थ्य चिन्ता का विषय हो सकता है |

मीन : आपका योगकारक आपकी लग्न में ही वक्री हो रहा है | एक ओर कार्य की दृष्टि से आपके लिए यह समय अनुकूल प्रतीत होता है | आप इस अवधि में नया घर भुई खरीद सकते हैं | प्रॉपर्टी विषयक समस्याओं का निदान इस अवधि में सम्भव है | किन्तु साथ ही यह भी सम्भव है कि आप जल्दबाज़ी में कोई निर्णय ले सकते हैं जो आपके लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है | अतः जो भी कार्य करें भली भाँति सोच समझकर करें | अविवाहित हैं तो इस अवधि में जीवन साथी की खोज भी पूर्ण हो सकती है |

अन्त में, ग्रहों के गोचर तथा उनके मार्गी, वक्री अथवा अतिगामी होने का क्रम तो अपने नियत समय पर चलता ही रहेगा | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/03/07/retrograde-mercury-in-pisces/

 

 

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

भरणी

वैदिक ज्योतिष के आधार पर मुहूर्त, पञ्चांग, प्रश्न इत्यादि के विचार के लिए प्रमुखता से प्रयोग में आने वाले “नक्षत्रों की व्युत्पत्ति और उनके नामों” पर वार्ता के क्रम में अश्विनी नक्षत्र के बाद अब दूसरा नक्षत्र होता है भरणी | भरणी शब्द की व्युत्पत्ति हुई है भरण में ङीप् प्रत्यय लगाकर हुई है | भरण का शाब्दिक अर्थ है पालन पोषण करना, भार वहन करना आदि | इस नक्षत्र में भी अश्विनी नक्षत्र के समान ही तीन तारे होते हैं तथा यह भी आश्विन माह तथा सितम्बर और अक्टूबर के महीनों में पड़ता है |

जो व्यक्ति अपने आस पास के लोगों तथा अन्य प्राणियों की देख भाल करता हो, उनका ध्यान रखता हो, पालन पोषण करता हो उसे भरण करने वाला कहा जाता है | अपने स्वयं के सामान की देखभाल करना भी इसका स्वभाव होता है | इसके अतिरिक्त ऐसे मजदूर को भी भरण करने वाला कहते हैं जो भार ढोता हो – अपने सर पर कुछ सामान रखकर यहाँ से वहाँ पहुँचाता हो | कुली के अर्थ में भी इस शब्द का प्रयोग होता है | राहु का विशेषण भी इसे माना जाता है |

भरणी नक्षत्र के अन्य नाम हैं : अन्तक – किसी भी वस्तु, वातावरण अथवा समस्या का अन्त करने वाला अथवा किसी भी कार्य को या वार्तालाप को या विवाद इत्यादि को उसके अन्त तक या पूर्णता तक पहुँचाने वाला या नष्ट करने वाला | सीमा के अर्थ में भी भरणी शब्द का प्रयोग किया जाता है | इसके अतिरिक्त यम अर्थात युगल यानी Twin के अर्थ में भी इसका प्रयोग होता है | साथ ही किसी बात के लिए रोकना, नियन्त्रित करना, बाधा डालना, आत्म नियन्त्रण यानी Self-Control तथा महान नैतिक – धार्मिक – आध्यात्मिक कर्तव्यों का निर्वाह करना तथा रीति रिवाजों का पालन करने के अर्थ में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/24/constellation-nakshatras-11/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

27 नक्षत्रों का हिन्दी महीनों में विभाजन तथा हिन्दी माहों के वैदिक नाम

पिछले अध्याय में चर्चा की थी 27 नक्षत्रों की और उनके नामों का उल्लेख किया था | जैसा कि पहले भी लिखा है कि जिस हिन्दी माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को जिस नक्षत्र का उदय होता है उसी के आधार पर उस माह का नाम रखा गया है | इन 12 हिन्दी महीनों के वैदिक नाम भी हैं | तो, अब बात करते हैं कि इन 27 नक्षत्रों का बारह वैदिक महीनों में किस प्रकार से विभाजन हुआ है – अर्थात किस माह में कौन कौन से नक्षत्र आते हैं, तथा उन महीनों के वैदिक और हिन्दी नाम क्या हैं…

हिन्दी महीनों में सबसे प्रथम महीना है चैत्र का – और इसका वैदिक नाम है मधु | इस मधु अर्थात चैत्र माह में चित्रा और स्वाति ये दो नक्षत्र आते हैं | मधु माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र का उदय होता है, अतः इस माह का हिन्दी नाम चैत्र रखा गया |

वैशाख माह का वैदिक नाम है माधव तथा इसमें विशाखा और अनुराधा ये दो नक्षत्र आते हैं | क्योंकि माधव माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र का उदय होता है, इसलिए इस माह का हिन्दी नाम वैशाख हुआ |

ज्येष्ठ का वैदिक नाम है शुक्र और इसके अन्तर्गत ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र आते हैं | इसमें भी ज्येष्ठ नक्षत्र का शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को उदय होने के कारण इसका नाम ज्येष्ठा हुआ |

आषाढ़ माह का वैदिक नाम शुचि है तथा इसमें दोनों आषाढ़ – यानी पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ आते हैं | शुचि माह में शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र का उदय होता है और उसके बाद आता है उत्तराषाढ़ नक्षत्र | यही कारण है कि इस माह का हिन्दी नाम आषाढ़ है |

श्रावण माह का वैदिक नाम नभ है तथा इसमें श्रवण और धनिष्ठा नक्षत्रों का समावेश होता है | नभ नामक वैदिक माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र का उदय होता है अतः इस माह का हिन्दी नाम श्रावण है |

भाद्रपद माह का वैदिक नाम नभस्य है तथा इसमें तीन नक्षत्र आते हैं – शतभिषज और दोनों भाद्रपद – यानी पूर्वा भाद्रपद और उत्तर भाद्रपद | नभस्य माह में शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा तिथि को पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र का उदय होता है इसलिए इसका हिन्दी नाम भाद्रपद हुआ |

आश्विन माह का वैदिक नाम है ईश, तथा इसमें भी तीन नक्षत्र आते हैं – रेवती, अश्विनी और भरणी | इस माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को अश्विनी नक्षत्र का उदय होता है अतः इस माह का हिन्दी नाम आश्विन है |

कार्तिक माह का वैदिक नाम ऊर्जा है और इस माह में दो नक्षत्र आते हैं – कृत्तिका और रोहिणी | ऊर्जा नामक वैदिक माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को ऊर्जावान कृत्तिका नक्षत्र का उदय होने के कारण इस माह का हिन्दी नाम कार्तिक हुआ |

मृगशिर माह का वैदिक नाम है सह तथा इसमें जो दो नक्षत्र आते हैं वे हैं मृगशिरा और आर्द्रा | जैसा कि आप समझ ही गए होंगे, इस माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा तिथि को मृगशिरा नक्षत्र का उदय होता है इसीलिए इस माह का हिन्दी नाम है मृगशिर |

पौष माह का वैदिक नाम है सहस्य – जो सह के साथ आए – तथा इसके अन्तर्गत पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र आते हैं | इस माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को उदय होता है पुष्य नक्षत्र का, इसीलिए इस माह का हिन्दी नाम पौष हुआ |

माघ माह का वैदिक नाम है तप तथा इसमें दो नक्षत्र – आश्लेषा और मघा होते हैं | निश्चित रूप से इस माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को मघा नक्षत्र का उदय होने के कारण ही इसका हिन्दी नाम मघा हुआ |

फाल्गुन माह का वैदिक नाम है तपस्य तथा इसमें तीन नक्षत्र आते हैं – दोनों फाल्गुन – अर्थात पूर्वा फाल्गुनी और उत्तर फाल्गुनी और साथ में हस्त | इस माह में भी निश्चित रूप से शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा तिथि को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र का उदय होता है और इसीलिए इसका हिन्दी नाम फाल्गुन है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/10/constellation-nakshatras-9/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

27 नक्षत्रों के वैदिक नाम

अब मुहूर्त आदि के लिए प्रमुख रूप से विचारणीय वैदिक ज्योतिष के महत्त्वपूर्ण अंग नक्षत्रों की वार्ता को आगे बढाते हुए  27 नक्षत्रों के वैदिक नामों पर प्रकाश डालते हैं | जैसे कि पहले ही बताया है कि किसी भी हिन्दी अथवा वैदिक महीने के नाम उस नक्षत्र के नाम पर होता है जो उस माह की पूर्णिमा के दिन होता है | अर्थात किसी भी माह की पूर्णिमा को जिस नक्षत्र का उदय हो रहा होगा, उस माह का नाम उसी नक्षत्र के नाम पर होगा |

उदाहरण के लिए चैत्र माह की पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र का उदय होता है इसलिए इस माह का नाम चैत्र रखा गया | वैशाख माह की पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र का उदय होता है इसलिए इस नक्षत्र का नाम वैशाख रखा गया, इत्यादि इत्यादि…

सूर्य सिद्धान्त के अनुसार आश्विन, भाद्रपद और फाल्गुन माह में तीन तीन नक्षत्र होते हैं और शेष नौ महीनों में दो दो नक्षत्र होते हैं | ये 27 नक्षत्र हैं – अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषज, पूर्वा भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती |

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: |

स्वस्ति न तार्क्ष्योSरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ||

अगले अध्याय में चर्चा करेंगे इन 27 नक्षत्रों का हिन्दी महीनों में विभाजन किस प्रकार किया गया है तथा इन नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी के बारह महीनों के वैदिक नाम क्या हैं…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/08/constellation-nakshatras-8/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

पौराणिक ग्रन्थों जैसे रामायण में नक्षत्र विषयक सन्दर्भ

वेदांग ज्योतिष के प्रतिनिधि ग्रन्थ दो वेदों से सम्बन्ध रखने वाले उपलब्ध होते हैं | एक याजुष् ज्योतिष – जिसका सम्बन्ध यजुर्वेद से है | दूसरा आर्च ज्योतिष – जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद से है | इन दोनों ही ग्रन्थों में वैदिककालीन ज्योतिष का समग्र वर्णन उपलब्ध होता है | बाद में यज्ञ भाग के विविध विधानों के साथ साथ दैनिक जीवन में भी ज्योतिष का महत्त्व वैदिक काल में ही जनसामान्य को मान्य हो गया था | परवर्ती ब्राहमण और संहिता काल में तो अनेक विख्यात ज्योतिषाचार्यों का वर्णन तथा रचनाएँ हमें उपलब्ध होती ही हैं | जिनमें पाराशर, गर्ग, वाराहमिहिर, आदिभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य तथा कमलाकर जैसे ज्योतिर्विदों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं | ज्योतिषीय गणना का मूलाधार वाराहमिहिर का सूर्य सिद्धान्त ही है |

परवर्ती साहित्य और इतिहास में यदि हम रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थों का अध्ययन करें तो यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आता है कि उस काल में भी प्रत्येक आचार्य ज्योतिषाचार्य अवश्य होते थे | इन दोनों ही इतिहास ग्रन्थों में ज्योतिषीय आधार पर फल कथन यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं | भगवान् राम की जन्मपत्री बनाकर उनके भविष्य का फलकथन आचार्यों ने किया था | श्री राम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में हुआ था | उस समय सूर्य मेष में दशम भाव में, मंगल मकर में सप्तम में, शनि तुला में चतुर्थ में, गुरु कर्क में लग्न में, और शुक्र मीन का होकर नवम भाव में – इस प्रकार ये पाँच ग्रह अपनी अपनी उच्च राशियों में विराजमान थे | लग्न में गुरु के साथ चन्द्रमा भी था…

…….. चैत्रे नावमिके तिथौ ||

नक्षत्रेSदितिदैवत्ये सवोच्चसंस्थेषु पञ्चसु |

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ||… वा. रा. बालकाण्ड 18/8,9

भरत का जन्म पुष्य नक्षत्र और मीन लग्न में हुआ था | लक्षमण और शत्रुघ्न आश्लेषा नक्षत्र और करके लग्न में पैदा हुए थे | उस समय सूर्य भी अपनी उच्च राशि में विद्यमान थे |

पुण्ये जातस्तु भरतो मीनलग्ने प्रसन्नधी: |

सर्पे जातौ तु सौमित्री कुलीरेSभ्युदिते रवौ ||… वा. रा. बालकाण्ड 18/15

साथ ही यह भी कहा गया है कि ये चारों भाई दोनों भाद्रपद नक्षत्रों के चारों तारों के समान कान्तिमान थे (वा. रा. बालकाण्ड 18/16)

श्री राम व उनके तीनों भाइयों के विवाह का मुहूर्त बताते हुए महर्षि वशिष्ठ कहते हैं…

उत्तरे दिवसे ब्रह्मन् फल्गुनीभ्यां मनीषिण: |

वैवाहिकं प्रशंसन्ति भगो यत्र प्रजापतिः ||… वा रा. बालकाण्ड 72/13

अर्थात, आने वाले दो दिन दोनों फाल्गुनी नक्षत्रों से युक्त हैं | जिनके देवता प्रजापति भग हैं | विद्वानों ने इस नक्षत्र में किया गया वैवाहिक कर्म सबसे अधिक उत्तम माना है |

राम के राज्याभिषेक के लिए राजा दशरथ बहुत चिन्तित थे | क्योंकि ऋषियों ने कुछ इस प्रकार की भविष्यवाणियाँ की थीं जिनके अनुसार राज्याभिषेक में बाधा पड़ सकती थी | इसीलिए दशरथ चाहते थे कि भरत के ननिहाल से आने से पहले ही राम का राज्याभिषेक हो जाए तो अच्छा है (वा. रा. अयोध्याकाण्ड 4/18,25) इसी प्रकार अयोध्याकाण्ड ही 41वें सर्ग में राम के वनगमन के समय उत्पातकालिक ग्रह स्थिति का वर्णन भी देखने योग्य है | श्री राम जब अयोध्या से जा रहे थे उस समय छह ग्रह वक्री होकर एक ही स्थान पर स्थित थे |

त्रिशंकुर्लोहितांगश्च बृहस्पतिबुधावपि |

दारुणा: सोममभ्येत्य ग्रहा: सर्वे व्यवस्थिता: || वा. रा. अयोध्याकाण्ड 41/11

इसी प्रकार युद्धकाण्ड में रावण मरण के समय की ग्रहस्थिति भी दर्शनीय है | राम रावण युद्ध के समय की ग्रहस्थिति का कलात्मक वर्णन देखते ही बनता है | श्री राम रूपी चन्द्रमा को रावण रूपी राहु से ग्रस्त हुआ देखकर बुध से रहा नहीं गया और वह भी चन्द्रप्रिया रोहिणी नामक नक्षत्र पर जा बैठा | यह स्थिति प्रजा के लिए अहितकर थी | सूर्य की किरणें मन्द हो गई थीं | सूर्यदेव अत्यन्त प्रखर कबन्ध के चिह्न से युक्त धूमकेतु नामक उत्पात ग्रह से संसक्त दिखाई दे रहे थे | आकाश में इक्ष्वाकु वंश के नक्षत्र विशाखा पर – जिसके कि देवता इन्द्र और अग्नि हैं – मंगलदेव विराजमान थे (वा. रा. युद्धकाण्ड 102/32-35) यहाँ एक यह बात भी स्पष्ट दिखाई दे रही है कि उस समय किसी भी वंश का मुखिया जिस नक्षत्र में जन्म लेता होगा सम्भवतः वह नक्षत्र समस्त परिवार के लिए पूज्य हो जाता होगा | इसीलिए विशाखा नक्षत्र को इक्ष्वाकु वंश का नक्षत्र बताया गया है | ये सभी इस बात के ज्वलन्त प्रमाण हैं कि उस काल में ज्योतिष शास्त्र को परम प्रमाण माना जाता था |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/01/constellation-nakshatras-4/

देवशयनी एकादशी

देवशयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी, पद्मनाभा एकादशी

हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्त्व है | प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती है, और अधिमास हो जाने पर ये छब्बीस हो जाती हैं | इनमें से आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है | इस एकादशी को पद्मनाभा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है | तथा उसके लगभग चार माह बाद सूर्य के तुला राशि में आ जाने पर आने वाली कार्तिक शुक्ल एकादशी देव प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है |

“आषाढ़ शुक्लपक्षे तु शयनी हरिवासर: |

दीपदानेन पलाशपत्रे भुक्त्याव्रतेन च

चातुर्मास्यं नयन्तीह ते नरा मम वल्लभा: ||” – पद्मपुराण उत्तरखण्ड / 54/24, 32

मान्यता है कि इन चार महीनों में – जिन्हें चातुर्मास कीं संज्ञा दी गई है – भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन हेतु प्रस्थान कर जाते हैं | भगवान विष्णु की इस निद्रा को योग निद्रा भी कहा जाता है | इस अवधि में यज्ञोपवीत, विवाह, गृह प्रवेश आदि संस्कार वर्जित होते हैं |

भारतीय संस्कृति में व्रतादि का विधान पूर्ण वैज्ञानिक आधार पर मौसम और प्रकृति को ध्यान में रखकर किया गया है | चातुर्मास अर्थात आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर श्रावण, भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीने वर्षा के माने जाते हैं | भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए वर्षा के ये चार महीने कृषि के लिए बहुत उत्तम माने गए हैं | किसान विवाह आदि समस्त सामाजिक उत्तरदायित्वों से मुक्त रहकर इस अवधि में पूर्ण मनोयोग से कृषि कार्य कर सकता था | आवागमन के साधन भी उन दिनों इतने अच्छे नहीं थे | साथ ही चौमासे के कारण सूर्य चन्द्र से प्राप्त होने वाली ऊर्जा भी मन्द हो जाने से जीवों की पाचक अग्नि भी मन्द पड़ जाती है | अस्तु, इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए जो व्यक्ति इन चार महीनों में जहाँ होता था वहीं रहकर अध्ययन अध्यापन करते हुए आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता था तथा खान पान पर नियन्त्रण रखता था ताकि पाचन तन्त्र उचित रूप से कार्य कर सके | और वर्षा ऋतु बीत जाते ही देव प्रबोधिनी एकादशी से समस्त कार्य पूर्ववत आरम्भ हो जाते थे |

सुप्तेत्वयिजगन्नाथ जगत्सुप्तंभवेदिदम् । विबुद्धेत्वयिबुध्येतजगत्सर्वचराचरम् ॥

हे जगन्नाथ ! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सो जाता है तथा आपके जागने पर समस्त चराचर पुनः जागृत हो जाता है तथा फिर से इसके समस्त कर्म पूर्ववत आरम्भ हो जाते हैं…

आज देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास का आरम्भ हो रहा है… देवशयनी एकादशी सभी के लिए शुभ हो और चातुर्मास में सभी अपने अपने कर्तव्य धर्म का सहर्ष पालन करें… यही शुभकामना अपने साथ ही सभी के लिए… पूरा पढ़ने के लिए क्लिक करें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/23/devashayani-ekadashi/

 

नक्षत्र – एक विश्लेषण

हम सभी जानते हैं कि ज्योतिष एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और सम सामयिक विषय है | वेदांगों के अन्तर्गत ज्योतिष को अन्तिम वेदान्त माना गया है | प्रथम वेदांग है शिक्षा – जिसे वेद की नासिका माना गया है | दूसरा वेदांग है व्याकरण जिसे वेद का मुख माना जाता है | तीसरे वेदांग निरुक्त को वेदों का कान, कल्प को हाथ, छन्द को चरण और ज्योतिष को वेदों का नेत्र माना जाता है |

वेद की प्रवृत्ति यज्ञों के सम्पादन के निमित्त हुई थी | और यज्ञों का सम्पादन विशेष मुहूर्त में ही सम्भव है | इसी समय विशेष के निर्धारण के लिए ज्योतिष की आवश्यकता प्रतीत हुई | और इस प्रकार ग्रह नक्षत्रों से सम्बन्धित ज्ञान ही ज्योतिष कहलाया | नक्षत्र, तिथि, पक्ष, मास, ऋतु तथा सम्वत्सर – काल के इन समस्त खण्डों के साथ यज्ञों का निर्देश वेदों में उपलब्ध है | वास्तव में तो वैदिक साहित्य के रचनाकाल में ही भारतीय ज्योतिष पूर्णरूप से अस्तित्व में आ चुका था | सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में इसके प्रमाण इधर उधर बिखरे पड़े हैं | हमारे ऋषि मुनि किस प्रकार समस्त ग्रहों नक्षत्रों से अपने और समाज के लिए मंगल कामना करते थे इसी का ज्वलन्त उदाहरण है प्रस्तुत मन्त्र:

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: |

स्वस्ति न तार्क्ष्योSरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ||

प्रस्तुत मन्त्र में राशि चक्र के समान चार भाग करके परिधि पर समान दूरी वाले चारों बिन्दुओं पर पड़ने वाले नक्षत्रों से अपने व समस्त संसार के कल्याण की कामना इन ऋषि मुनियों ने की है | इन्द्र से चित्रा का, पूषा से रेवती का, तार्क्ष्य से श्रवण का तथा बृहस्पति से पुष्य नक्षत्रों का ग्रहण किया गया है | चित्रा का अन्तिम भाग कन्या राशि के अन्त पर और रेवती का अन्तिम भाग मीन राशि के अन्त पर 180 अंश का कोण बनाते हैं | यही स्थिति श्रवण व पुष्य नक्षत्रों की मकर व कर्क राशियों में है |

तैत्तिरीय शाखा के अनुसार चित्रा नक्षत्र का स्वामी इन्द्र को माना गया है | भारत में प्राचीन काल में नक्षत्रों के जो स्वरूप माने जाते थे उनके अनुसार चित्रा नक्षत्र का स्वरूप लम्बे कानों वाले उल्लू के जैसा माना गया है | अतः इन्द्र का नाम वृद्धश्रवा भी है | जो सम्भवतः इसलिए भी है कि इन्द्र को लम्बे कानों वाले चित्रा नक्षत्र का अधिपति माना गया है | अतः यहाँ वृद्धश्रवा का अभिप्राय चित्रा नक्षत्र से ही है | पूषा का नक्षत्र रेवती तो सर्वसम्मत ही है | तार्क्ष्य शब्द से अभिप्राय श्रवण से है | श्रवण नक्षत्र में तीन तारे होते हैं | तीन तारों का समूह तृक्ष तथा उसका अधिपति तार्क्ष्य | तार्क्ष्य को गरुड़ का विशेषण भी माना गया है | और इस प्रकार तार्क्ष्य उन विष्णु भगवान का भी पर्याय हो गया जिनका वाहन गरुड़ है | अरिष्टनेमि अर्थात कष्टों को दूर करने वाला सुदर्शन चक्र – भगवान विष्णु का अस्त्र | पुष्य नक्षत्र का स्वामी देवगुरु बृहस्पति को माना गया है | विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में नक्षत्र पुरुष का विस्तृत वर्णन मिलता है | उसके अनुसार भगवान विष्णु ने अपने शरीर के ही अंगों से अभिजित सहित 28 नक्षत्रों की उत्पत्ति की और बाद में दयावश अपने ही शरीर में रहने के लिए स्थान भी दे दिया | बृहत्संहिता में भी इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है |

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