शनि का धनु में गोचर और वक्री शनि

वक्री और मार्गी शनि

26 अक्टूबर 2017 से 24 जनवरी 2020 तक शनि का गोचर धनु राशि में रहेगा | इसी मध्य 18 अप्रेल 2018 से 6 सितम्बर तक शनिदेव वक्री भी रहे | लगभग साढ़े चार माह वक्री चाल चलने के बाद 6 सितम्बर को 17:24 के लगभग शनिदेव मार्गी हुए हैं | धनु राशि में संचार करते हुए वर्तमान में वृश्चिक, धनु और मकर राशियों पर साढ़ेसाती का प्रभाव भी चल रहा है | साथ ही वृषभ और कन्या राशियों पर शनि की ढैया भी चल रही है | सामान्यतः शनि के वक्री होने पर व्यापार में मन्दी, राजनीतिक दलों में मतभेद, जन साधारण में अशान्ति तथा प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़ और आँधी तूफ़ान आदि की सम्भावनाएँ अधिक रहती हैं | किन्तु अब पुनः मार्गी हो जाने पर इस प्रकार की घटनाओं में कमी की सम्भावना की जा सकती है | वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि को कर्म और सेवा का कारक माना जाता है | यही कारण है कि शनि के वक्री अथवा मार्गी होने का प्रभाव व्यक्ति के कर्मक्षेत्र पर भी पड़ता है | शनि को अनुशासनकर्ता भी माना जाता है और धनु राशिचक्र की नवम राशि है | नवम भाव भाग्य, धर्म, आध्यात्म, पिता, गुरु और शिक्षक का माना जाता है | धनु का राश्यधिपति गुरु भी इन्हीं समस्त बातों का प्रतिनिधित्व करता है | सम्भवतः इसीलिए धनु राशि में शनि का होना इस सत्य का भी संकेत होता है कि हमारे स्वयं के अनुभव ही हमारे सबसे बड़े गुरु होते हैं जिनसे शिक्षा प्राप्त करके हम अपनी नकारात्मकताओं को त्याग कर सकारात्मकता के साथ पुनः खड़े होकर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं | साथ ही यह भी कि आशावादी होना अच्छा है, किन्तु आवश्यकता से अधिक आशावादी होकर निष्कर्मण्य हो बैठ रहना मूर्खता ही कहा जाएगा | तो आइये जानने का प्रयास करते हैं कि धनु राशि में गोचर करते हुए वक्री और पुनः मार्गी होने के जनसाधारण पर क्या प्रभाव हो सकते हैं…

मेष : शनि आपके लिए कर्म स्थान और लाभ स्थानों का स्वामी होकर आपके नवम भाव में गोचर कर रहा है | कार्य तथा आर्थिक लाभ और व्यक्तिगत सम्बन्धों की दृष्टि से यह गोचर आपके लिए भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | शनि के वक्री होने की स्थिति में अभी तक आपके व्यक्तिगत जीवन में अनेक प्रकार की उथल पुथल की स्थिति चल रही थी | किन्तु अब पुनः मार्गी होने से उस स्थिति में धीरे धीरे सुधार की आशा की जा सकती है | समाज में मान सम्मान तथा कार्य में प्रगति की सम्भावना भी की जा सकती है | व्यक्तिगत सम्बन्धों की दृष्टि से भी यह समय आपके लिए भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है |

वृषभ : आपके लिए आपका योगकारक होकर शनि का गोचर आपके अष्टम भाव में हो रहा है | आपकी राशि के लिए शनि की ढैया भी चल रही है | बहुत अधिक अनुकूल यह गोचर नहीं कहा जा सकता | वक्री रहते हुए इसके कारण आपके आत्म विशवास में भी कमी आई होगी | कार्य में भी रुकावटों का सामना करना पड़ा होगा | अब मार्गी होने पर सम्भव है परिस्थितियों में कुछ सुधार का अनुभव हो, किन्तु कुछ अधिक सुधार की आशा नहीं की जा सकती | आपको विशेष रूप से अपने स्वास्थ्य तथा पारिवारिक विवादों के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है | इन बातों का विपरीत प्रभाव आपके कार्य पर भी पड़ सकता है | कार्यक्षेत्र में गुप्त शत्रुओं को पहचान कर उनकी ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है |

मिथुन : आपके अष्टमेश और भाग्येश का गोचर आपके सप्तम भाव में चल रहा है | मिश्रित फल देने वाला गोचर है | आरम्भ में आपके लिए यह गोचर भाग्यवर्द्धक रहा होगा, किन्तु शनि के वक्री होने की स्थिति में आपके परिश्रम का जितना परिणाम आपको प्राप्त होना चाहिए थे सम्भव है उतना अच्छा परिणाम आपको न प्राप्त हुआ हो | अब शनि के मार्गी होने से परिस्थितियों में सुधार की आशा की जा सकती है | व्यक्तिगत सम्बन्धों में यदि आप स्पष्ट नहीं रहेंगे या किसी प्रकार का दुराव छिपाव करेंगे तो आपके लिए घातक हो सकता है | साथ ही स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

कर्क : सप्तमेश और अष्टमेश होकर शनि का छठे भाव में गोचर जीवन में बहुत सी उथल पुथल का कारक होता है | आरम्भ से ही इस गोचर के कारण आपको व्यक्तिगत सम्बन्धों में बहुत कठिनाइयों और छल कपट का सामना करना पड़ा है | किन्तु शनि की वक्री चाल के रहते हुए कुछ संघर्षों के बाद परिस्थितियों में सुधार भी हुआ होगा | किसी कोर्ट केस में भी आपको अनुकूल परिणाम प्राप्त हुआ होगा | अब शनि पुनः मार्गी हो गया है | यदि आपने अपने समय और योग्यताओं का उचित रूप से उपयोग नहीं किया तो ऐसा करना आपकी प्रगति में बाधक हो सकता है | प्राणायाम और ध्यान की प्रक्रियाओं के द्वारा अपने आत्मविश्वास को पुनः एकत्र करके उचित दिशा में प्रयास करने का समय है यह | साथ ही स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की भी आवश्यकता है |

सिंह : आपके षष्ठेश और सप्तमेश का गोचर आपके पञ्चम भाव में हुआ है | यह गोचर आपके लिए अनुकूल फल देने वाला नहीं कहा जा सकता | आरम्भ में ही आपने जो ग़लत निर्णय लिए हैं उनका परिणाम आप भोग चुके हैं | इसी बीच वक्री शनि के कारण आपके मनोबल में भी गिरावट आई है और आप स्वयं को एक असमंजस की स्थिति में भी अनुभव कर रहे हैं | यद्यपि शनि अब मार्गी हो चुका है किन्तु फिर भी आपको अधिक मानसिक श्रम करने की आवश्यकता है | Romantically यदि Involve हैं तो वहाँ आपको सोच समझकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है | किन्तु व्यावसायिक क्षेत्र में प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़कर आपके कार्य में प्रगति का समय प्रतीत होता है |

कन्या : एक ओर आपके लिए पंचमेश और षष्ठेश होकर शनि का गोचर आपके चतुर्थ भाव में हो रहा है वहीं दूसरी ओर शनि की ढैया भी चल रही है | गोचर का आरम्भ ही बहुत सी पारिवारिक समस्याओं के साथ हुआ है जिसका विपरीत प्रभाव आपके कार्यक्षेत्र पर भी पड़ा होगा | वक्री होने की स्थिति में आपके लिए बहुत सी समस्याओं में वृद्धि भी हो सकती है | इस अवधि में आपने अपने बहुत से मित्रों के लिए नकारात्मक सोच बना ली है | किसी भी नकारात्मक सोच का प्रभाव आपके अपने स्वास्थ्य और कार्य पर ही विपरीत प्रभाव डालता है | शनि के पुनः मार्गी हो जाने की स्थिति में परिस्थितियों में सुधार की सम्भावना तो है, किन्तु इस समय आपका अधिक ध्यान अपने कार्य की अपेक्षा पारिवारिक समस्याओं के समाधान तथा घर के Renovation की ओर अधिक जाएगा | साथ ही आप इस समय स्वाध्याय में प्रवृत्त हो सकते हैं | सन्तान से सम्बन्धित कोई समस्या भी आपके लिए चिन्ता का विषय हो सकती है |

तुला : आपके लिए योगकारक का गोचर आपके तृतीय भाव में चल रहा है | आरम्भ अनुकूल रहा, किन्तु वक्री होने के बाद सम्भव है पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने में आपका अधिक समय व्यतीत हुआ होगा | किन्तु अब शनि मार्गी हो चुका है अतः आपको चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है | आप इस अवधि में अपना लक्ष्य निर्धारित करके उसके अनुसार आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे और उसमें आपको सफलता भी प्राप्त हो सकती है | सम्भव है अभी तक व्यावसायिक स्तर पर आपको कुछ निराशा का अनुभव हुआ हो, किन्तु अब उत्साहपूर्वक आप कुछ नया कार्य भी आरम्भ कर सकते हैं | यह समय छोटे मोटे लाभ पर ध्यान देने की अपेक्षा कोई बड़ा दूरगामी लक्ष्य निर्धारित करने का है |

वृश्चिक : आपके लिए साढ़ेसाती का अन्तिम पड़ाव चल रहा है जो आपके लिए उतना अधिक अशुभ नहीं है | यद्यपि शनि के धनु राशि में गोचर के बाद से और उसके बाद वक्री होने की स्थिति में परिस्थितियाँ अधिकाँश में विपरीत ही रही होंगी | मानसिक तनाव के कारण आपके स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव रहा होगा | किन्तु अब जब शनिदेव मार्गी हो चुके हैं और साढ़ेसाती भी अपने अन्तिम पड़ाव पर पहुँच चुकी है तो परिस्थितियों में सुधार की सम्भावना की जा सकती है | कार्य में उन्नति और धनप्राप्ति के योग प्रतीत होते हैं | किन्तु परिश्रम अधिक करना पड़ेगा | साथ ही, जिन लोगों के विषय में विगत समय में आपने नकारात्मक सोच बनाई है उसमें भी सुधार होगा और आप पुनः उन लोगों के साथ सम्बन्धों को सुधारने का प्रयास कर सकते हैं | व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों ही स्तरों पर मित्रों तथा सम्बन्धियों के साथ सम्बन्धों में सुधार करना आपके हित में रहेगा | सम्बन्धों में किसी प्रकार की अपेक्षा से हम अपना स्वयं का अनर्थ करते हैं |

धनु : आपकी राशि पर साढ़ेसाती अपने मध्यकाल में चल रही है | शनि आपका द्वितीयेश भी है और तृतीयेश भी | इस गोचर के आरम्भ से ही आपके लिए मानसिक तनाव की स्थितियाँ रही होंगी | किन्तु चुनौतियों के बाद भी अर्थलाभ निरन्तर होता रहा होगा | शनि के वक्री होने की स्थिति में आय से अधिक व्यय की समस्या भी रही होगी | साथ ही आपके स्वास्थ्य पर भी इसका विपरीत प्रभाव ही पड़ा है | अब शनि यद्यपि मार्गी हो चुका है किन्तु अभी जब तक साढ़ेसाती का यह मध्यभाग पूर्ण नहीं हो जाता तब तक आपको सावधानीपूर्वक चलने की आवश्यकता है | आर्थिक दृष्टि से यद्यपि समय उतना प्रतिकूल नहीं प्रतीत होता | समाज में मान सम्मान में वृद्धि की भी सम्भावना है किन्तु भावनात्मक और स्वास्थ्य की दृष्टि से आपको सावधान रहने की आवश्यकता है | किसी भी समस्या के प्रति चिन्तित होकर आप अपने स्वास्थ्य की ही हानि करेंगे | अच्छा यही रहेगा कि अपनी जीवन शैली में परिवर्तन करें ताकि आपकी सोच सकारात्मक बन सके और आप निष्ठापूर्वक अपने लक्ष्य के प्रति अग्रसर रह सकें |

मकर : आपके लिए साढ़ेसाती का प्रथम चरण चल रहा है | साथ ही लग्नेश और द्वितीयेश का बारहवें भाव में गोचर भी उतना अधिक शुभ नहीं कहा जा सकता | आपने इस गोचर के आरम्भ से ही अनावश्यक खर्चों में अधिकता तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का अनुभव किया होगा, जो शनि के वक्री होने से और भी बढ़ गई होंगी | सम्भव है किसी कोर्ट केस का सामना भी इस अवधि में हुआ हो | ननिहाल पक्ष के साथ भी सम्बन्धों में दरार की सम्भावना हो सकती है | अब शनि के मार्गी हो जाने से कुछ सुधार की सम्भावना की जा सकती है | यदि आपका कार्य विदेश से सम्बन्ध रखता है तो आपके लिए धनलाभ की सम्भावना की जा सकती है | मानसिक तनाव तो रहेगा किन्तु आप अपनी जीवन शैली में सुधार कर लेंगे तो बहुत सी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से बचे रह सकते हैं | आध्यात्मिक तथा धार्मिक गतिविधियों में वृद्धि की भी सम्भावना है | विदेश यात्राओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | किन्तु इन यात्राओं के दौरान आपको अपने स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है |

कुम्भ : आपके लिए लग्नेश और द्वादशेश का लाभ स्थान में गोचर अत्यन्त शुभ प्रतीत होता है | वक्री शनि भी आपके लिए अशुभ नहीं प्रतीत होता | आपके लिए कार्य में प्रगति के साथ ही आर्थिक स्थिति में दृढ़ता की सम्भावना भी की जा सकती है | यदि नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ ही स्थानान्तरण भी सम्भव है | आप किसी व्यावसायिक कार्य से भी विदेश यात्राएँ कर सकते हैं और यों ही सपरिवार भी कहीं घूमने जाने की योजना बना सकते हैं | किन्तु अपने अधिकारियों के साथ तथा पिता अथवा बड़े भाई के साथ किसी प्रकार का विवाद आपके हित में नहीं रहेगा | यदि आपने अपना Temperament सही रखा तो अधिकारियों का, सहकर्मियों का तथा परिवार के लोगों का भी सहयोग आपको प्राप्त होता रह सकता है | आप नया घर अथवा वाहन भी खरीद सकते हैं अथवा प्रॉपर्टी में पैसा Invest भी कर सकते हैं, जिसका भविष्य में आपको लाभ होगा | परिवार में किसी बुज़ुर्ग महिला के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | साथ ही समय तथा कार्य का उचित रूप से प्रबन्धन करने की आवश्यकता है |

मीन : आपका व्यवसाय अथवा Job यदि विदेश से सम्बन्ध रखती है तो आपके लिए यह गोचर अत्यन्त भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | किन्तु बीच में कुछ समय शनि के वक्री रहने की स्थिति में सम्भव है जीवन में कुछ ऐसा घटित हुआ हो जिसके कारण आप अपने कार्य से भी तथा जीवन से भी निराशा का अनुभव कर रहे हैं | इस अवधि में आपने अपने कार्य के सम्बन्ध में कुछ ग़लत निर्णय ले लिए हैं जिनसे बहुत शीघ्र मुक्ति सम्भव है न हो सके | शनि के मार्गी हो जाने से आपकी सोच में धीरे धीरे सकारात्मकता आणि आरम्भ होगी और आप अधिक एकाग्र होकर अपने जीवन की घटनाओं का अनुशीलन कर सकेंगे | नौकरी में हैं तो आपको अपने अधिकारियों के साथ समझदारी से व्यवहार करने की आवश्यकता है | आपका अपना व्यवसाय है तो उसमें भी बहुत अधिक उत्साह के प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है | कुछ समय शान्त बैठकर परिस्थितियों की निरीक्षण करते हुए अपनी योजनाओं और प्राथमिकताओं का निर्धारण कीजिए |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – ग्रहों की वक्री-मार्गी चाल भी नियत समय पर आती जाती रहती है – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | किन्तु इस सबसे भी प्रमुख बात यह है कि व्यक्ति का अपना कर्म प्रधान होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/09/retrograde-direct-saturn/

 

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शनि कवचम्

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् |

छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ||

भारतीय वैदिक ज्योतिष में शनि को मन्दगामी भी कहा जाता है | यह इतना मन्दगति ग्रह है कि एक राशि से दूसरी राशि में जाने में इसे ढाई वर्ष का समय लगता है, किन्तु वक्री, मार्गी अथवा अतिचारी होने की दशा में इस अवधि में कुछ समय का अन्तर भी आ सकता है | माना जाता है कि शनि हमारे कर्मों का फल हमें प्रदान करता है | प्रायः इसे स्वाभाविक मारक और अशुभ ग्रह माना जाता है | विशेष रूप से इसकी दशा, ढैया तथा साढ़ेसाती को लेकर जन साधारण में बहुत भय व्याप्त रहता है | जिस व्यक्ति की कुण्डली में शनि प्रतिकूल अवस्था में होता है तो इसके वात प्रकृति होने के कारण जातक को वायु विकार, कम्प, हड्डियों तथा दाँतों से सम्बन्धित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है | इसकी दशा 19 वर्ष की मानी जाती है | शनि को प्रसन्न करके उसके दुष्प्रभाव को शान्त करने के लिए Vedic Astrologer कुछ मन्त्रों के जाप का सुझाव देते हैं | जिनमें शनि कवच भी शामिल है | अतः, प्रस्तुत है कश्यप ऋषि द्वारा प्रणीत शनिकवचम्…

कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम: |

सौरि: शनैश्चरो मन्द: पिप्पलादेन संस्तुत: ||

कोणस्थ (कोण में विराजमान) पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्रान्तक, यम, सौरि, शनैश्चर, मन्द, पिप्पलाद शनिदेव के इन दशनामों का स्मरण करते हुए प्रस्तुत है शनिकवचम्…

|| अथ श्री शनिकवचम् ||

अस्य श्री शनैश्चरकवचस्तोत्रमन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, शनैश्चरो देवता,  शीं शक्तिः, शूं कीलकम्, शनैश्चरप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ||

नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् |

चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः ||

ब्रह्मोवाच :

श्रुणूध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् |

कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ||

कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् |

शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ||

ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दन: |

नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कर्णौ यमानुजः ||

नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा |

स्निग्धकण्ठंश्च मे कण्ठं भुजौ पातु महाभुजः ||

स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रदः |

वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितत्सथा ||

नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्द: पातु कटिं तथा |

ऊरू ममान्तक: पातु यमो जानुयुगं तथा ||

पादौ मन्दगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः |

अङ्गोपाङ्गानि सर्वाणि रक्षेन्मे सूर्यनन्दन: ||

इत्येतत्कवचं दिव्यं पठेत्सूर्यसुतस्य यः |

न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः ||

व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोSपि वा |

कलत्रस्थो गतो वापि सुप्रीतस्तु सदा शनिः ||

अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे |

कवचं पठतो नित्यं न पीडा जायते क्वचित् ||

इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यनिर्मितं पुरा |

द्वादशाष्टमजन्मस्थदोषान्नाशयते सदा ||

जन्मलग्नास्थितान्दोषान्सर्वान्नाशयते प्रभुः ||

II इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्मनारदसम्वादे शनैश्चरकवचं सम्पूर्णम् ||

शान्ति तथा सन्तुलन के पर्याय शनिदेव सबके जीवन में प्रसन्नता और शान्ति प्रसारित करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/19/shani-kavacham/

 

शनि – Saturn

वैदूर्यकान्ति रमल: प्रजानां वाणातसी कुसुमवर्णविभश्च शरत: |

अन्यापि वर्ण भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद: ||

वैदूर्य मणि तथा अलसी के पुष्प के समान कान्ति वाले शनि के विषय में पुराणों में अनेक आख्यान उपलब्ध होते हैं | जिनमें प्रमुख यही है कि शनि सूर्य की पत्नी छाया के गर्भ से उत्पन्न हुए थे | इनका श्याम वर्ण देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी पर आरोप लगाया कि शनि उनका पुत्र है ही नहीं | बड़े होने पर जब शनि को इस बात का पता चला तभी से सूर्य को वे अपना शत्रु मानने लगे | उन्होंने शिवजी की तपस्या करके अपने पिता सूर्य के समान शक्तियाँ प्राप्त कीं | साथ ही शिवजी से वरदान प्राप्त किया कि उनकी माता को कष्ट पहुँचाने वाले उनके पिता के साथ ही अन्य देवता तथा मानव भी उनसे भयभीत रहेंगे | और भी अनेक कथाएँ इस विषय में उपलब्ध होती हैं | किन्तु यहाँ हम वैदिक ज्योतिष के आधार पर इस ग्रह की बात कर रहे हैं |

भारतीय वैदिक ज्योतिष में शनि को मन्दगामी भी कहा जाता है | यह इतना मन्दगति ग्रह है कि एक राशि से दूसरी राशि में जाने में इसे ढाई वर्ष का समय लगता है, किन्तु वक्री, मार्गी अथवा अतिचारी होने की दशा में इस अवधि में कुछ समय का अन्तर भी आ सकता है | माना जाता है कि शनि हमारे कर्मों का फल हमें प्रदान करता है | प्रायः इसे स्वाभाविक मारक और अशुभ ग्रह माना जाता है | विशेष रूप से इसकी दशा, ढैया तथा साढ़ेसाती को लेकर जन साधारण में बहुत भय व्याप्त रहता है | जबकि वास्तविकता तो यह है कि प्रकृति में सन्तुलन स्थापित करने के साथ यह ग्रह व्यक्तियों के साथ उचित न्याय भी करता है | पुष्य, अनुराधा औत उत्तर भाद्रपद नक्षत्रों तथा मकर और कुम्भ राशियों का स्वामित्व इसे प्राप्त है | तुला में शनि अपनी उच्च राशि में होता है जबकि मेष में नीच का माना जाता है | सूर्य, चन्द्र तथा मंगल इसके शत्रु ग्रह हैं, जबकि बुध और शुक्र मित्र ग्रह तथा गुरु सम ग्रह है | इसे नीरस वृक्षों की उत्पत्ति करने वाला तथा सदा वृद्ध माना जाता है | पश्चिम दिशा तथा शिशिर ऋतु का स्वामी शनि को माना जाता है | जिस व्यक्ति की कुण्डली में शनि प्रतिकूल अवस्था में होता है तो इसके वात प्रकृति होने के कारण जातक को वायु विकार, कम्प, हड्डियों तथा दाँतों से सम्बन्धित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है | इसकी दशा 19 वर्ष की मानी जाती है |

शनि को प्रसन्न करके उसके दुष्प्रभाव को शान्त करने के लिए Vedic Astrologer कुछ मन्त्रों के जाप का सुझाव देते हैं | प्रस्तुत हैं उन्हीं में से कुछ मन्त्र…

वैदिक मन्त्र : ॐ शं शनैश्चराय नम: अथवा : ॐ ऐं ह्लीं श्रीशनैश्चराय नम:

पौराणिक मन्त्र : ॐ  ह्रिं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् | छाया मार्तण्डसम्भूतं त्वं नमामि शनैश्चरम् ||

तन्त्रोक्त मन्त्र : ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:

बीज मन्त्र : ॐ खां खीं खूं स: मन्दाय नम:

गायत्री मन्त्र : ॐ कृष्णांगाय विद्महे रविपुत्राय धीमहि तन्नो सौरि: प्रचोदयात्

सब पर शनिदेव की कृपादृष्टि बनी रहे यही कामना है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/18/%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a4%bf-saturn/