श्री विष्णुशतनाम स्तोत्रम्

पुरुषोत्तम मास का कल से आरम्भ हो चुका है, जिसके विषय में कल लिखा था | अधिक मास के विषय में विशेष रूप से Indian Vedic Astrologers की मान्यता है कि इस अवधि में कोई भी धार्मिक अनुष्ठान यदि किया जाए तो वह कई गुणा अधिक फल देता है | और इस मान्यता का आधार एक कथा है | इस प्रचलित कथा के अनुसार प्रत्येक राशि, नक्षत्र, करण तथा बारहों मासों के सभी के स्वामी होते हैं, किन्तु मलमास का कोई नाम न होने के कारण उसका स्वामी भी कोई नहीं था | नाम और स्वामीविहीन होने के कारण ही अधिक मास को ‘मलमास’ अर्थात अशुद्ध माह कहकर उसकी निन्दा की जाने लगी | इस बात से दु:खी होकर मलमास भगवान् विष्णु के पास गया और उनसे सारी बात बताई | तब भगवान् विष्णु ने कहा कि “अब से मैं तुम्हारा स्वामी हूँ और अपना नाम “पुरुषोत्तम” तुम्हें देते हुए अपने समस्त गुण तुम्हारे भीतर समाविष्ट कर रहा हूँ | अबसे तुम “पुरुषोत्तम” नाम से ही जाने जाओगे | और प्रत्येक तीसरे वर्ष तुम्हारे आगमन पर जो भी व्यक्ति श्रद्धा भक्ति पूर्वक दान पुण्य करेगा उसे उसके पुण्य कर्मों का दुगुना फल प्राप्त होगा |” किन्तु इस अवधि में विवाह, नूतन गृह प्रवेश आदि स्वार्थसिद्धि के माँगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं | साथ ही भगवान् विष्णु का आशीर्वाद इस माह को प्राप्त होने के कारण इस माह में भगवान् विष्णु की पूजा अर्चना विशेष फलदायी मानी जाती है |

मान्यताएँ और कथाएँ अनेकों हो सकती है, किन्तु इतना तो निश्चित ही है कि अपने आराध्य की उपासना तथा मन्त्र जाप में बहुत सामर्थ्य होती है | किन्तु स्मरण रहे कि समस्त चराचर जगत के प्रति जब तक सेवा का भाव नहीं होता तब तक “माधव” भी प्रसन्न नहीं होते… क्योंकि समस्त दृश्य जगत माधव के ही विराट स्वरूप का एक अंग हैं…

प्रस्तुत है विष्णुपुराण में वर्णित व्यास-मुनि-रचित तथा नारद-मुनि-कथित श्री विष्णुशतनामस्तोत्रम्…

|| अथ श्री विष्णुशतनामस्तोत्रम् ||

नारद उवाच

ऊँ वासुदेवं हृषीकेशं वामनं जलशायिनम् |

जनार्दनं हरिं कृष्णं श्रीवक्षं गरुडध्वजम् ||

वाराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं नरकान्तकम् |

अव्यक्तं शाश्वतं विष्णुमनन्तमजमव्ययम् ||

नारायणं गदाध्यक्षं गोविन्दं कीर्तिभाजनम् |

गोवर्द्धनोद्धरं देवं भूधरं भुवनेश्वरम् ||

वेत्तारं यज्ञपुरुषं यज्ञेशं यज्ञवाहकम् |

चक्रपाणिं गदापाणिं शंखपाणिं नरोत्तमम् ||

वैकुण्ठं दुष्टदमनं भूगर्भं पीतवाससम् |

त्रिविक्रमं त्रिकालज्ञं त्रिमूर्तिं नन्दिकेश्वरम् ||

रामं रामं हयग्रीवं भीमं रौद्रं भवोद्भवम् |

श्रीपतिं श्रीधरं श्रीशं मंगलं मंगलायुधम् ||

दामोदरं दमोपेतं केशवं केशिसूदनम् |

वरेण्यं वरदं विष्णुमानन्दं वासुदेवजम् ||

हिरण्यरेतसं दीप्तं पुराणं पुरुषोत्तमम् |

सकलं निष्कलं शुद्धं निर्गुणं गुणशाश्वतम् ||

हिरण्यतनुसंकाशं सूर्यायुतसमप्रभम् |

मेघश्यामं चतुर्बाहुं कुशलं कमलेक्षणम् ||

ज्योतिरूपमरूपं च स्वरूपं रूपसंस्थितम् |

सर्वज्ञं सर्वरूपस्थं सर्वेशं सर्वतोमुखम् ||

ज्ञानं कूटस्थमचलं ज्ञानदं परमं प्रभुम् |

योगीशं योगनिष्णातं योगिनं योगरूपिणम् ||

ईश्वरं सर्वभूतानां वन्दे भूतमयं प्रभुम् |

इति नामशतं दिव्यं वैष्णवं खलु पापहहम् ||

व्यासेन कथितं पूर्वं सर्वपापप्रणाशनम् |

य: पठेत् प्रातरुत्थाय स भवेद् वैष्णवो नर: ||

सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् |

चान्द्रायणसहस्त्राणि कन्यादानशतानि च ||

गवां लक्षसहस्त्राणि मुक्तिभागी भनेन्नर: |

अश्वमेधायुतं पुण्यं फलं प्राप्नोति मानव: ||

|| इति विष्णुपुराणे श्रीविष्णुशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||

भगवान् विष्णु के उपरोक्त शतनाम समस्त पापों को दूर करने वाले हैं | जो व्यक्ति इन शतनामों का पठन श्रवण करता है उसे सौ कन्याओं के दान (विवाह) का और अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है तथा अनेक प्रकार से समृद्धिशाली होकर वह व्यक्ति अन्त में विष्णु का सान्निध्य प्राप्त करता है |

हम सभी समस्त चराचर और समस्त प्रकृति के प्रति सम्मान तथा सेवा का भाव रखते हुए “माधव सेवा” के पथ पर अग्रसर हों यही कामना है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/05/17/shree-vishnu-shatanaam-stotram/

 

 

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