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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – षष्ठी पूजन और नामकरण – इन दोनों संस्कारों का भी सम्बन्ध गर्भ संस्कारों से ही है | गर्भाधान गर्भ से पूर्व का संस्कार, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन गर्भ धारण करने के बाद के संस्कार तथा जातकर्म, षष्ठी पूजन और नामकरण जन्म के तुरन्त बाद के संस्कार | षष्ठी पूजन – नाम के अनुरूप ही जन्म के छठे दिन किया जाता है | इसका उद्देश्य है षष्ठी देवी की पूजा अर्चना के माध्यम से समस्त देवी देवताओं से प्रार्थना करना कि नवजात शिशु का मंगल हो तथा वह शरीर, मन और अन्तःकरण से बलिष्ठ एवं गुणी बने | और इसके बाद किया जाता है नामकरण संस्कार |

“नामधेयं दशम्या च द्वादश्यां वास्यकारयेत् | पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ||” (मनु. 2/30) दसवें अथवा बारहवें दिन पुण्य तिथि, नक्षत्र आदि शुभ मुहूर्त देखकर शिशु का नामकरण करना चाहिये | लेकिन सर्वसम्मत मान्यता यह है कि ग्यारहवें दिन नामकरण किया जाता है | किन्तु आवश्यक नहीं कि दसवें अथवा ग्यारहवें दिन ही नामकरण किया जाए – परिवार की रीति के अनुसार ही नामकरण के लिए मुहूर्त सिद्ध किया जाता है | नाम ऐसा हो जो सुगम और सुन्दर होने के साथ साथ मंगल, सामर्थ्य और धनवत्ता का द्योतक भी हो | कहा जाता है कि नाम अच्छा होने से गुण भी अच्छे होते हैं |

जब से मनुष्य ने भाषा की खोज की उसने दिन प्रतिदिन प्रयोग की जाने वस्तुओं को किसी न किसी नाम से पुकारना आरम्भ कर दिया | जैसे जैसे समाज जागरूक होता गया वैसे वैसे सभ्य भी होता गया | और इसी क्रम में नाम की महत्ता भी सभी को अनुभव होने लगी | और धीरे धीरे नामकरण को धार्मिक संस्कारों के साथ जोड़ दिया गया | बृहस्पति के अनुसार “नामाखिलस्य व्यवहारहेतु: शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतु: | नाम्नैव कीर्तिं लभते मनुष्य: तत: प्रशस्तं खलु नामकर्म ||” अर्थात समस्त व्यवहार का आरम्भ नाम से ही होता है | यही मनुष्य के लिये शुभदायक होता है, भाग्यदायक होता है | नाम से ही मनुष्य को प्रसिद्धि प्राप्त होती है | इसीलिये नामकरण संस्कार सबसे प्रमुख संस्कार है |

इस संस्कार का उदेश्य केवल शिशु को नाम भर देना नहीं है, अपितु उसे श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर उच्च से उच्चतर मानव के रूप में विकसित करना भी है | चरक के अनुसार नाम ऐसे होने चाहियें जिनका कोई अर्थ हो, क्योंकि नाम का उद्देश्य केवल सम्बोधन भर देना नहीं था अपितु उस नाम के माध्यम से बालक के समक्ष उसके लिए एक लक्ष्य भी प्रतुत किया जाता था | नाम भी ऐसा होना चाहिए जो बोलने और सुनने में कठिन न हो, तथा कानों को अच्छा लगे |

आध्यात्मिक दृष्टि से “कः कतर: कतमः“ सिद्धान्त नामकरण का आधार होता था | अर्थात तुम कौन हो ? तुम ब्रह्मवत हो और सुख हो | तुम कौन-तर हो ? तुम ब्रह्मतर हो अर्थात ब्रह्म के गुण तुममें विद्यमान हैं | तुम कौन-तम हो ? तुम ब्रह्मतम हो अर्थात पूर्ण रूप से ब्रह्मस्वरूप ही हो | ब्रह्म का अर्थ होता है व्यापकत्व | इस प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से उस परब्रह्म के साथ – समग्र के साथ – सम्बन्ध जिस नाम से प्रतीत होता हो ऐसा नाम रखने की प्रथा उस समय थी | किन्तु सर्वमान्य धारणा यही थी कि नाम सुन्दर, कर्णप्रिय तथा बोलने में सरल होना चाहिए | साथ ही जातक के जन्म नक्षत्र के आधार पर नाम रखा जाता था |

इस प्रकार शिशु के जन्म एक पश्चात होने वाले संस्कारों में ज्योतिषीय आधार पर नक्षत्र आदि की गणना के द्वारा मुहूर्त सिद्ध करके नामकरण संस्कार का विशेष महत्त्व था, आज भी है, और सदा रहेगा…

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – जातकर्म संस्कार – पिछले लेखों में हमने चर्चा की गर्भ से पूर्व तथा गर्भ की स्थिति में किये जाने वाले संस्कारों की | शिशु के जन्म के समय तथा उसके बाद बाल्यावस्था में भी कुछ संस्कार सम्पन्न किये जाते हैं | यों तो व्यक्ति के संस्कारित होने की प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है | कभी पारम्परिक रूप से उसके पुनर्जन्म की यात्रा तक बहुत से संस्कार किये जाते हैं | तो कभी वह परिवार तथा समाज के मध्य रहकर देश-काल-परिस्थितियों के संसर्ग में आकर बहुत कुछ सीखता है – स्वयं को उस व्यवस्था के अनुकूल बनाने के लिए स्वयं ही प्रयास करता रहता है – स्वयं को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार संस्कारित करता रहता है | अतः यहाँ हम सभी संस्कारों की बात नहीं करेंगे | यहाँ हम केवल जन्म के समय तक किये जाने वाले संस्कारों की बात करेंगे | क्योंकि इन सभी संस्कारों का उद्देश्य था माता पिता को यह समझाना कि किस प्रकार की शारीरिक और मानसिक अवस्था में गर्भ धारण करना उचित रहता है | साथ ही गर्भिणी की समुचित देख भाल भी इन संस्कारों का एक उद्देश्य था – ताकि वह स्वयं मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हुए अपने गर्भस्थ शिशु के साथ वार्तालाप करते हुए उसे संस्कारित बना सके – उसे स्नेह और विश्वास का पाथेय प्रदान कर सके – ताकि जब वह स्वस्थ और संस्कारित शिशु गर्भ से बाहर आए तो सांसारिक जीवन में उसी आशा, स्नेह और विश्वास के साथ सबके साथ मिलकर आगे बढ़ सके जो उसे उसकी माता ने गर्भ की अवस्था में प्रदान किया है | और अन्त में सुखपूर्वक एक स्वस्थ शिशु का जन्म |

शिशु के विश्व प्रवेश पर उसके ओजमय अभिनन्दन के लिए जातकर्म संस्कार करने की प्रथा थी और आज भी कुछ पारम्परिक (Traditional) परिवारों में यह संस्कार किया जाता है | इसका सबसे प्रमुख कारण तो था कि प्रसव के लिए ऐसे स्थान को तैयार करना जो शुद्ध एवं समशीतोष्ण हो – अर्थात Normal Temperature उस स्थान का हो ताकि गर्भ से बाहर आते ही शिशु शुद्ध एवं समशीतोष्ण वातावरण में श्वास ले सके | इसलिए पहले उस स्थान को साफ़ किया जाता है जहाँ प्रसव किया जाना है | बच्चे का जन्म हो जाने के बाद नाल काटकर बच्चे को तथा माता को मन्त्रोच्चारपूर्वक स्नान कराया जाता है | उसके बाद दोनों को नवीन वस्त्र पहनाकर बच्चे के मुँह में माता के स्तन लगाए जाते हैं | उसके बाद पिता बालक को शहद चटाता है ताकि बालक स्वस्थ रहे | इस समय पिता अक्षत तथा सरसों के दानों से होम भी करता है | अर्थात् जन्म होने से पहले और बाद में घर की सफ़ाई, माँ तथा बालक का स्नान, नाल काटना तथा पहला दूध पिलाना आदि सभी क्रियाएँ जातकर्म संस्कार के अंग हैं | इन सबका उद्देश्य है बालक की शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नति |

इस संस्कार के समय जितने भी विधि विधान किये जाते हैं, आज के युग में उनका पालन करना वास्तव में बहुत कठिन कार्य है | इसका एक कारण यह भी है कि आज सभी बच्चों का जन्म अस्पतालों में कुशल डॉक्टर्स के निर्देशन में होता है – जो वास्तव में सराहनीय है | किन्तु जिन परिवारों में संस्कारों का पालन किया जाता है वहाँ माँ और बच्चे के अस्पताल से घर वापस आने पर कुछ क्रियाओं को छोड़कर शेष क्रियाएँ उसी प्रकार की जाती हैं |

ऐसी मान्यता है कि जन्म के समय इस संस्कार के करने से शिशु बड़ा होकर तेजस्वी तथा विद्वान बनता है | गर्भ के समस्त दोषों को दूर करने के लिये भी जातकर्म की व्यवस्था है | स्वर्णशलाका से बालक को मधु चटाने से स्मरण शक्ति तीव्र होती है तथा उसमें बल की वृद्धि होती है | मधुपान कराने से बालक के वात पित्त कफ़ आदि त्रिदोषों का शमन होता है | यदि बालक ने गर्भ में माता के माध्यम से कुछ दूषित भोजन भी कर लिया है तो मधु एवं घी के मिश्रण को चटाने से वो दोष भी दूर हो जाता है |

इसी प्रकार और बहुत से उपाय इस निमित्त हैं जिनका एक ओर सम्भवतः आयुर्वेदिक महत्व रहा होगा वहीं दूसरी ओर लोकमान्य महत्व तो है ही | वैद्य डॉक्टर जिन दिनों कम होते थे या नहीं होते थे उस समय इन संस्कारों का वास्तव में न केवल बहुत महत्व रहा होगा बल्कि इनसे लाभ भी अवश्य होता होगा | उस समय जबकि नर्सिंग होम भी नहीं थे, दाई घर पर आकर ही प्रसवकार्य कराती थी, प्रसव के स्थान की सफ़ाई, गर्भिणी के कष्ट को कम करने आदि के लिये इसी प्रकार की घरेलू औषधियाँ प्रयुक्त की जाती थीं | सम्भवतः आज भी यदि इन सब बातों पर ध्यान दिया जाए तो काफ़ी हद तक प्रसव के समय आपरेशन से बचा जा सकता है |

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – हम बात कर रहे हैं सीमन्तोन्नयन संस्कार की – आज की भाषा में जिसे “बेबी शावर” कहा जाता है | यह संस्कार भी गर्भ संस्कारों का एक महत्त्वपूर्ण अंग है | पारम्परिक रूप से ज्योतिषीय गणनाओं द्वारा शुभ मुहूर्त निश्चित करके उस मुहूर्त में यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था | इस संस्कार के समय सौभाग्यवती स्त्रियाँ गर्भवती का पूर्ण श्रृंगार करती थीं | पति पत्नी के साथ नवग्रह आदि का पूजन करके कुछ इस प्रकार संकल्प लेता था “ॐ अद्येत्यादि अमुकनाम्नोSहं ममास्या भार्यायां गर्भाभिवृद्धिपरिपन्थिपिशितप्रियाSलक्ष्मीभूतराक्षसगण निरसनक्षेम सकलसौभाग्यनिधानलक्ष्मीसमावेशनद्वारा बीजगर्भसमुद्भवैनौनिबर्हणाय श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थं स्त्रीसंस्काररूपं सीमन्तोनयनकर्म करिष्ये |”

इसके बाद कुशा के द्वारा विधि विधान पूर्वक समस्त दिशाओं को तथा स्वयं को भी स्त्री पवित्र करती थी | वेदी को पवित्र किया जाता था | उसके बाद पति मंगल नामक अग्नि का पूजन करके गर्भिणी के बालों के पाँच भाग करके पाँच चोटियाँ बनाकर उनमें सुगन्धित वनस्पतियों की वेणी लगाता था | सौभाग्यवती स्त्रियाँ गर्भिणी को आशीर्वाद देती थीं | और यज्ञ के अन्त में पति पत्नी दोनों मिलकर फल पुष्प युक्त घी की पूर्णाहुति यज्ञाग्नि में देते थे | बाद में पति पत्नी को हरे भरे उपवन के दर्शन कराए जाते थे | आज भी कुछ पारम्परिक (Traditional) परिवारों में यह प्रथा जीवित है |

इस आयोजन का तात्पर्य होता यही था कि हर्षोल्लास के वातावरण के चलते गर्भिणी का मन प्रसन्न रहे ताकि वह एक स्वस्थ और प्रसन्नचित्त सन्तान को जन्म दे सके | साथ ही गर्भिणी की देखभाल करने वाले परिजनों के लिए भी यह सलाह दोहराई जाती थी कि किस प्रकार गर्भिणी के लिए अनुकूल वातावरण तथा पौष्टिक भोजन की व्यवस्था की जानी चाहिए | क्योंकि माता प्रसन्नचित्त रहेगी तो सन्तान भी प्रसन्नचित्त, बलिष्ठ तथा दीर्घायु होगी | प्रसन्न तथा शान्त चित्त से जब माता गर्भस्थ शिशु के साथ वार्तालाप करती है तो उसका बड़ा गहरा प्रभाव शिशु पर पड़ता है | शिशु – एक पवित्र, मासूम किन्तु पूर्ण रूप से ज्ञानवान आत्मा – अपनी इच्छा से माता का चयन करके उसके गर्भ में प्रविष्ट तो हो जाती है, किन्तु उसके मन में ऊहापोह चलता रहता है कि न जाने बाहर का संसार कैसा होगा | माता प्रसन्न, सन्तुष्ट तथा शान्त चित्त से जब गर्भस्थ शिशु के साथ वार्तालाप करती है और उसे अपने स्नेह के माध्यम से विश्वास दिलाती है कि उसके साथ वह शिशु पूर्ण रूप से सुरक्षित है तो गर्भ में शिशु का मानसिक और शारीरिक विकास भली भाँति होता रहता है और उसका जन्म भी सरलता से हो जाता है | अभिमन्यु की कथा केवल कपोल कल्पनामात्र नहीं है | इस तथ्य के प्रति आज के चिकित्सा वैज्ञानिक भी अपनी सहमति प्रदान करते हैं | आज भी बेबी शावर या गर्भवती स्त्री की गोद भराई करने के मूल में भावना यही निहित होती है…

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – बात चल रही थी गर्भ संस्कारों की… उसे ही आगे बढाते हैं…

गर्भाधान – आत्मा का पुनर्जन्म – एक शरीर को त्यागने के बाद अपनी इच्छानुसार आत्मा अन्य शरीर में प्रविष्ट होकर नौ माह तक माता के गर्भ में निवास करने का बाद पुनः जन्म लेती है… एक नन्हे से शिशु के रूप में… एक नन्ही कली या एक नन्हे फ़रिश्ते के रूप में… वास्तव में आत्मा का यह पुनर्जन्म होता है… यही गीता और उपनिषदों में कहा भी गया है… और गर्भ धारण करने से पूर्व से लेकर शिशु के जन्म के बाद तक जितने संस्कार किये जाते हैं वे सभी आत्मा की “इस जन्म से पुनर्जन्म” तक की यात्रा को सुखद तथा सरल बनाने के लिए ही किये जाते हैं… ताकि वह पूर्ण विश्वास के साथ सांसारिक जीवन में प्रविष्ट हो सके… इस श्रृंखला में हमने गर्भाधान और पुंसवन की बात की… आज बात करते हैं सीमन्तोन्नयन संस्कार की…

पुंसवन संस्कार के बाद सीमन्तोन्नयन संस्कार किया जाता था | सीमन्त का अर्थ है मस्तक और उन्नयन का अर्थ है उत्थान – विकास | अर्थात मानसिक विकास के लिए यह संस्कार किया जाता था | “सीमन्त: उन्नीयते यस्मिन्कर्मणि तत्सीमन्तोन्नयनमिति कर्मनामधेयम् |” इस प्रकार गर्भस्थ शिशु के शारीरिक विकास के लिए पुंसवन संस्कार और मानसिक विकास तथा दुष्ट आत्माओं को शिशु से दूर रखने के लिए सीमन्तोन्नयन संस्कार किया जाता था | गर्भ के चौथे, छठे अथवा आठवें माह में इस संस्कार को करने का विधान मनीषियों ने प्रतिपादित किया है | “प्रथम गर्भायाश्चतुर्थे मासि सीमन्तोन्नयनम् | षष्ठे अष्टमे वा सीमन्त: |” सुश्रुत ने कहा है “पञ्चमे मन: प्रतिबुद्धतरं भवति, षष्ठे बुद्धि:… पञ्चम माह में गर्भस्थ शिशु का मन प्रबुद्ध होकर छठे माह में बुद्धि उन्नत होती है | सप्तम माह में अंग प्रत्यंग पूर्ण रूप से परिलक्षित होने लगते हैं और अष्टम माह में शिशु का ओज विकसित तथा स्थिर होने लगता है |

इसके अतिरिक्त इस संस्कार का एक प्रयोजन गर्भिणी को प्रसन्नचित्त रखना भी था | क्योंकि प्रसन्न तथा विदुषी और संस्कारित माता के गर्भ से ही उत्तम सन्तान का जन्म सम्भव है | माता जब तक इस तथ्य को नहीं समझेगी कि सन्तान का मानसिक विकास अब उसका उत्तरदायित्व है तब तक शिशु का मानसिक विकास उचित रूप में नहीं हो पाएगा | अतः आठवें माह तक आते आते शिशु के शरीर, मन, बुद्धि, हृदय सभी को स्वस्थ और क्रियाशील बनाए रखना माता का उत्तरदायित्व होता है |

कभी कभी आवश्यकता होने पर पुंसवन और सीमन्तोन्नयन एक साथ भी किये जा सकते थे | आजकल पैसे का अनुपयुक्त प्रदर्शन करके बहुत बड़े स्तर पर किया जाने वाला Baby Shower वास्तव में पुंसवन और सीमन्तोन्नयन संस्कारों का ही आधुनिक रूप है | किन्तु आज ये संस्कार बहुतायत में तो मनोरंजन तथा पैसे का भद्दा दिखावा मात्र ही बनकर रह गए हैं | जबकि यथार्थ में इन संस्कारों का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व था और इनके पीछे ये महान सोच थी कि परिवार, समाज तथा राष्ट्र को सुसंस्कृत और सभ्य नई पीढ़ी उपलब्ध हो सके | और इसीलिए Astrologer के द्वारा ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर शुभ मुहूर्त का चयन करके उस मुहूर्त विशेष में इन संस्कारों को सम्पन्न किया जाता था |

क्या ही अच्छा हो कि हम इन संस्कारों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक महत्त्व को समझकर इन्हें इनके पारम्परिक रूप में ही सम्पन्न करते रहें, ताकि परिवार, समाज तथा राष्ट्र को योग्य और उत्तम कर्णधार प्राप्त हो सकें…

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – गर्भ संस्कारों में गर्भाधान संस्कार से अगले चरण पुंसवन संस्कार की चर्चा हम कर रहे हैं | जैसा कि सभी जानते हैं, जन्म से पूर्व किये जाने वाले संस्कारों में पुंसवन संस्कार का विशेष महत्त्व माना जाता है और यह गर्भ के तीसरे माह में ज्योतिषी से अच्छे शुभ मुहूर्त का निश्चय कराकर यह संस्कार सम्पन्न किया जाता है क्योंकि इस माह में शिशु का आकार और भावनाएँ तथा संस्कार अपना स्वरूप ग्रहण करने लगते हैं | अतः उनके आध्यात्मिक उपचार की दृष्टि से यह कर्म किया जाता था और इसीलिए ज्योतिष के आधार पर शुभ मूहूर्त निकलवाना आवश्यक होता था | कर्मकाण्ड की समग्र प्रक्रिया के साथ यह संस्कार किया जाता है, जो आज के भाग दौड़ के युग में सम्भव है हास्यास्पद प्रतीत हो | अतः कर्मकाण्ड की बात जाने देते हैं | बात करते हैं इस संस्कार की निहित भावना की |

भाव यही था कि माता पिता तथा परिवार के सभी सदस्य गर्भ के महत्त्व को समझ सकें ताकि गर्भस्थ शिशु माता-पिता, कुल, परिवार तथा समाज के लिए गर्व का कारण बन सके | इस संस्कार के माध्यम से माता-पिता तथा गर्भिणी की देखभाल करने वाले परिजनों को यह समझाया जाता था कि गर्भिणी के लिए अनुकूल वातावरण, खान-पान तथा आचार-विचार आदि का निर्धारण किस प्रकार किया जाए ताकि सुसंस्कृत शिशु का जन्म हो |

इस संस्कार के समय अन्य पूजा पाठ यज्ञ आदि के साथ साथ वट वृक्ष की जटाओं के कोमल अग्रभाग का छोटा सा टुकड़ा, गिलोय और पीपल के कोमल पत्ते एक निश्चित अनुपात में लाकर उनमें थोड़ा थोड़ा पानी डालते हुए सिल पर उन्हें पीसा जाता था और उस घोल को एक कटोरी में भरकर गर्भिणी को सूँघने और पीने के लिए दिया जाता था | इस क्रिया के द्वारा माता इन समस्त औषधियों के गुणों को आत्मसात कर लेती थी जिनके द्वारा बालक के संस्कार पनपते थे | वट वृक्ष विशालता तथा दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है | इसकी वृद्धि धीरे धीरे होती है और इस प्रकार शनै: शनै: वृद्धि प्राप्त करते हुए यह वृक्ष धैर्य का प्रतीक भी बन जाता है | कालान्तर में इसकी जटाएँ भी जड़ और तनों में परिणत हो जाती हैं और इस प्रकार यह केवल वृद्धि का ही प्रतीक भर नहीं रह जाता अपितु पुष्टि का भी प्रतीक बन जाता है | वट वृक्ष प्रतीक है इस तथ्य का कि वृद्धावस्था में भी यदि व्यक्ति स्वस्थ रहे तो उसकी वृद्धावस्था पुनः यौवन में परिणत हो सकती है और यह क्रम इसी प्रकार गतिमान रह सकता है | साथ ही माना जाता है कि वट वृक्ष के इस रस में सामर्थ्य है कि यह गर्भ को किसी प्रकार की हानि से – Abortion से बचाता है | सुश्रुत का कहना है कि वट वृक्ष किसी भी प्रकार के अनिष्ट से गर्भ की रक्षा करने की सामर्थ्य रखता है |

गिलोय की प्रवृत्ति है ऊपर चढ़ने की – आरोहण की | साथ ही यह हानिकारक कीटाणुओं का नाश करने वाली औषधि है | अतः शरीर के रोगाणुओं के साथ साथ मन के भी समस्त प्रकार के दुर्भावों का – समस्त निराशाओं आदि का भी नाश करने की सामर्थ्य इसमें है | यह शरीर को पुष्ट करती है तथा प्राण ऊर्जा में वृद्धि करती हुई सत्प्रवृत्तियों के पोषण की सामर्थ्य उत्पन्न करती है | आपने देखा भी होगा पिछले कुछ समय से जब भी डेंगू या चिकनगुनिया जैसे रोगों ने जोर पकड़ा है तब तब गिलोय का काढ़ा पीने या गोली खाने की सलाह दी जाती है |

पीपल देवयोनि का वृक्ष माना जाता है | वास्तविक देवत्व क्या है – धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की सिद्धि के द्वारा परमार्थ की सिद्धि | इस प्रकार परमार्थ के संस्कारों को वरण करके उनका विकास करना भी इस क्रिया का उद्देश्य है |

इन तीनों औषधियों का रस गर्भिणी को पीने और सूँघने के लिए दिया जाता था | साथ ही चरक के अनुसार दूध में घी और शहद का एक निश्चित विषम अनुपात में मिश्रण भी गर्भिणी के लिए मुख्या भोजन के रूप में दिया जाता था | “ॐ अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च, विश्वकर्मणः समर्वत्तताग्रे। तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति, तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे॥“ साथ ही, गायत्री के मन्त्रोच्चार से गुँजित दिव्य वातावरण इस क्रिया को और भी अधिक आनन्ददायक बना देता था |

इसके साथ ही जल से पूर्ण पात्र गर्भवती की गोद में दिया जाता था, जो प्रतीक था इस बात का कि बहुत शीघ्र माँ की गोद में एक स्वस्थ- संस्कारयुक्त हृष्ट पुष्ट बालक आने वाला है | इस पात्र को गर्भ से स्पर्श कराने का एक अभिप्राय यह भी था कि गर्भस्थ शिशु स्वयं को सुरक्षित, स्वस्थ और शक्तिशाली अन्य्भव करे तथा किसी भी प्रकार की गर्भपात आदि की समस्या उत्पन्न न होने पाए और शिशु के मन से हर प्रकार का भी समाप्त हो जाए ताकि वह अपनी माता तथा परिजनों पर पूर्ण विश्वास रखता हुआ सरलता से गर्भ से बाहर आ सके…

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – गर्भाधान संस्कार की ही बात आगे बढाते हुए अब बात करते हैं गर्भ संस्कारों के अगले चरण – पुंसवन संस्कार की | गर्भाधान निर्विघ्न सम्पन्न हो गया, माता पिता दोनों ने स्वस्थ मन और स्वस्थ शरीर से इस कार्य को सम्पन्न किया तो उसके तीन माह के बाद पुंसवन संस्कार किये जाने का विधान था | वैसे तो – पुंसः सवनं पुन्सवनम् – अर्थात जिस संस्कार को करने से पुत्र सन्तान की प्राप्ति हो वह पुंसवन संस्कार कहलाता था | किन्तु इसकी मूलभूत भावना बहुत विशाल थी | इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य था माता पिता को इस प्रकार की शिक्षा देना ताकि वह गर्भस्थ शिशु की देखभाल अच्छी तरह कर सके | इसका भी उद्देश्य वही था जो गर्भाधान संस्कार का था – स्वस्थ, सुन्दर और गुणवान सन्तान की प्राप्ति |

यों, मनु, याज्ञवल्क्य और शौनक के अनुसार यह संस्कार उस समय तक सम्पन्न कर दिया जाना चाहिए जब तक की शिशु गर्भ में भ्रमण करना (Movement) नहीं आरम्भ कर देता | किन्तु बृहस्पति मानते हैं कि गर्भ में शिशु के भ्रमण आरम्भ करने का बाद (सवनं स्पन्दिते शिशौ) यह संकार किया जाना चाहिए | और इन मतान्तरों के कारण इस संस्कार को सम्पन्न करने की समय सीमा गर्भ का निश्चय हो के बाद तीन माह की अवधि से लेकर आठ माह की अवधि तक विस्तृत हो जाती है | इसका एक कारण यह भी था कि गर्भ के लक्षण प्रत्येक महिला में अलग अलग समय प्रकट होते थे | आज के युग में तो मेडिकल साइंस की तरक्क़ी के साथ ही इस विषय में भी समय पर ही पुष्टि कर ली जाती है | किन्तु पहले ऐसा नहीं होता था | इसमें भी प्रथम गर्भ के समय गर्भ से तीन माह की अवधि में पुंसवन संस्कार सम्पन्न कर लेने का विधान था | उसके बाद जब भी गर्भ होता था तो उस समय पुंसवन संस्कार चौथे, छठे अथवा आठवें माह में किये जाने की प्रथा थी | इसको और अधिक स्पष्ट करते हुए बृहस्पति ने कहा है:

तृतीये मासि कर्तव्यं गृष्टेरन्यत्रशोभनम् |

गृष्टेश्चतुर्थे मासे तु षष्ठे मासेSव चाष्टमें ||

किन्तु अधिकाँश में इसका समय गर्भ धारण करने के तीन माह के भीतर ही माना जाता है | साथ ही कुछ मनीषियों का मानना है कि प्रथम गर्भ के समय ही यह संस्कार किया जाना चाहिए | क्योंकि उस समय गर्भिणी को तथा उसके पति और अन्य सम्बन्धियों को सारी बातें – सारी Precautions के विषय में भली भाँति समझा दिया जाता है इसलिए बाद के गर्भ में इस संस्कार की उतनी आवश्यकता नहीं रह जाती | किन्तु कुछ विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि जितनी बार भी महिला गर्भवती हो उतनी बार ही यह संस्कार किया जाना चाहिए | उनके अनुसार – आवश्यक नहीं कि पिछले संस्कार के समय बताई गई बातें दूसरे संस्कार के समय तक याद रह ही जाएँ…

क्रमशः………..

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – बात चल रही है गर्भाधान संस्कार की | यह संस्कार न तो कोरा धार्मिक अनुष्ठान ही था और न ही काम वासना का प्रतीक था | यह तो एक बहुत ही पवित्र कर्म माना जाता था | उदाहरण के लिए शिव-पार्वती का मंगल मिलन काम वासना के कारण नहीं हुआ था | काम को तो शिव ने कब का जलाकर भस्म कर दिया था | शिव-पार्वती का मिलन हुआ था कार्तिकेय के जन्म के निमित्त क्योंकि तारकासुर जैसे दानव का वध करने की सामर्थ्य केवल उसी में सम्भव थी | गर्भाधान संस्कार के अन्तर्गत भावी माता-पिता को यह तथ्य समझाने का प्रयास किया जाता था कि वंशवृद्धि आवश्यक है, किन्तु तभी इसका विचार करना चाहिए जब दोनों शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व हों और सन्तान पालन करने की योग्यता उनमें हो, तभी वे परिवार और समाज के लिए श्रेष्ठ और तेजस्वी नई पीढ़ी की संरचना कर पाने में समर्थ हो सकेंगे | और इस प्रकार से आज के युग में भी इन संस्कारों का उतना ही महत्त्व है जितना वैदिक अथवा उसके परवर्ती काल में था |

गर्भ में ही बालक का विकास आरम्भ हो जाता है | गर्भस्थ शिशु चैतन्य जीव की भाँति व्यवहार करने लगता है | वह सब कुछ सुनता भी है और उसे ग्रहण भी करता है | यही कारण है कि माता के गर्भ में आने के बाद से ही शिशु को संस्कारित किया जा सकता है | हमारे पूर्वज इस तथ्य से भली भाँति परिचित थे इसीलिए इस संस्कार के महत्त्व को उन्होंने स्वीकार किया था | महर्षि चरक ने कहा है कि गर्भ धारण करने की सबसे पहली शर्त यह है कि माता पिता दोनों के मन प्रसन्न हों तथा उनके शरीर स्वस्थ हों | इसीलिए उनके लिए उत्तम भोजन और सदा प्रसन्नचित्त रहना आवश्यक है | जिस समय गर्भाधान किया जाए उस समय दोनों का मन उत्साह और प्रसन्नता से भरा हुआ होना चाहिए | ऐसा कोई कार्य उन्हें नहीं करना चाहिए जिसके कारण उन्हें किसी प्रकार का तनाव अथवा चिन्ता हो | माता के लिए भी सुझाव है कि गर्भ में पल रहा शिशु माँ की आवाज़ और मनोभावों को सम्वेदनाओं के माध्यम से अच्छी तरह समझता है | अभिमन्यु की चर्चा हम कर ही चुके हैं  और सभी उस कथा से परिचित भी हैं | अतः माँ जितना स्वयं को शान्त और प्रसन्न रखते हुए रचनात्मक गतिविधियों में अपना समय व्यतीत करेगी बालक उतना ही शान्तचित्त और समझदार होगा | गर्भ से लेकर सात वर्ष की अवस्था तक शिशु जो कुछ सीखता समझता है वही उसके जीवन की आधारशिला यानी नींव होती है |

आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभिः समन्वितौ | स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुतोडपि तादृशः ||

अर्थात, स्त्री और पुरुष जैसे आहार-व्यवहार तथा चेष्टा से संयुक्त होकर परस्पर समागम करते हैं उनकी सन्तान भी वैसे ही स्वभाव की होती है |

इस प्रकार वास्तव में तो यह संस्कार प्रजनन-विज्ञान का आध्यात्मिक एवं सामाजिक आधार पर मार्गदर्शन कराने वाला संस्कार ही था | जिसकी मूलभूत भावना यही थी कि भावी माता पिता ने पूर्ण रूप से शिक्षित होकर शारीरिक तथा मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहते हुए उचित मनोदशा में यदि गर्भाधान कर लिया तो माता के गर्भ से योग्य, गुणवान और आदर्श सन्तान प्राप्त होने में कोई सन्देह नहीं रह जाएगा |

क्रमशः…

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – बात चल रही है शिशु के जन्म से पूर्व के संस्कारों की | तो इसे ही आगे बढाते हैं…

एक बात स्पष्ट कर दें, कि इस लेख की लेखिका यानी कि हम कोई वैद्य या डॉक्टर नहीं हैं, लेकिन वैदिक साहित्य के अध्येता – Vedic Scholar – अवश्य हैं, और ज्योतिष के ही समान आयुर्वेद भी क्योंकि वैदिक साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग है और ज्योतिष तथा आयुर्वेद परस्पर सम्बद्ध भी हैं – इसलिए आयुर्वेद से सम्बन्धित ग्रन्थों के अध्ययन में भी थोड़ी बहुत रूचि रही है | साथ ही मेरे पति डॉ दिनेश शर्मा एक आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं तो उनके सान्निध्य में भी बहुत सी बातों पर चर्चा होती रहती है | और संस्कारों के आयोजनों के लिए ज्योतिष की गणनाओं के आधार पर मुहूर्त आवश्यक होते हैं | उन्हीं सब सूचनाओं के आधार पर कुछ लिखने का प्रयास कर रहे हैं |

स्वस्थ सुसंस्कृत युवक एवं युवती जब उचित आयु को प्राप्त हो जाएँ तो भली भाँति सोच विचार कर प्रसन्न मन तथा प्रेम-विश्वास से परिपूर्ण सन्तुष्ट हृदय के साथ उन्हें परिवार की वृद्धि हेतु गर्भाधान संस्कार करना चाहिए ऐसे वेदों में और वेदिकोत्तर साहित्य में प्रमाण उपलब्ध होते हैं | वैदिक संस्कृति के अनुसार विधिपूर्वक किया गया गर्भाधान संस्कार श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाववाली आत्मा को परिवार में आमन्त्रित करने के लिए धार्मिक और पवित्र यज्ञ के समान होता है | उस समय गर्भ के धारण तथा गर्भस्थ शिशु के शरीर की उचित वृद्धि और पोषण को ध्यान में रखते हुए आयुर्वेद के अनुसार पुरुष की न्यूनतम आयु 25 वर्ष तथा स्त्री की 16 वर्ष आवश्यक मानी जाती थी | जिस प्रकार अच्छे वृक्ष अथवा उत्तम कृषि के लिए उत्तम भूमि एवं बीज की आवश्यकता होती है उसी प्रकार उत्तम सन्तान के लिए माता पिता दोनों का मानसिक और शारीरिक रूप से परिपक्व होना आवश्यक था | साथ ही माता पिता दोनों के लिए ब्रह्मचर्य, उत्तम खान-पान व आहार विहार, स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन आदि नियमों का पालन करना भी आवश्यक था |

आयुर्वेद सम्बन्धी ग्रन्थों में इस विषय पर विशद वर्णन उपलब्ध होता है | ग्रन्थों में कहा गया है कि गर्भाधान की पुष्टि हो जाने के पश्चात पति-पत्नी शिशु के जन्म होने तक गर्भ को स्वस्थ रखने, पुष्ट रखने तथा उत्तम भावनाएँ और सम्वेदनाएँ गर्भस्थ शिशु तक प्रेषित करने के लिए स्वयं भी उसी प्रकार का आचरण करें तथा सन्तुलित और पौष्टिक भोजन ग्रहण करें | भोजन ऋतुओं के अनुकूल होना चाहिए | गर्भधारण के पश्चात 9 महीने तक ‘गर्भिणी परिचर्या’ तथा ‘सूतिका परिचर्या’ अर्थात गर्भिणी की देख भाल के नियमों का पालन करना भी आवश्यक है, क्योंकि इस अवस्था में लापरवाही से गर्भस्राव, गर्भपात अथवा रक्तस्राव जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं | गर्भस्थ शिशु अपनी इच्छाओ, भावनाओं तथा सम्वेदनाओं को माता के द्वारा प्रकट करता है, अतः उसकी इच्छाओं की पूर्ति और उसकी भावनाओं और सम्वेदनाओं का ध्यान रखना भी आवश्यक है अन्यथा शिशु में जन्मजात शारीरिक अथवा मानसिक विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं | यदि किसी महिला को बार बार गर्भपात होता है तो उसके लिए गर्भ को सुरक्षित रखने की औषधियों का भी वर्णन उपलब्ध होता है – जैसे ब्राम्ही, शतावरी, दूर्वा, पाटला इत्यादि | चिकित्सक – Gynaecologist – की देख रेख में इन औषधियों का उपयोग करना चाहिए |

इस प्रकार व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो गर्भाधान संस्कार आज के ही समान उस समय भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कार था | और हमारा मानना है कि आज भी यदि उन समस्त नियमों का पालन किया जाए तो गर्भ से सम्बन्धित बहुत सी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त हो सकती है |

……क्रमशः

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में गर्भाधान संस्कार का ही महत्त्व है | क्योंकि गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तान की उत्पत्ति है | अतः उत्तम सन्तान की कामना करने वाले माता पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन दोनों को पवित्र तथा स्वस्थ रखने के लिए यह संस्कार किया जाता था |

गर्भः संधार्यते येन कर्मणा तद्गर्भाधानमित्यनुगतार्थं कर्मनामधेयम् | – पूर्वमीमांसा 1/4/2

निषिक्तो यत्प्रयोगेण गर्भः सन्धार्यते स्त्रिया | तद्गर्भलम्भनं नाम कर्म प्रोक्तं मनीषिभ: || – शौनक

वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् | कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च || – मनु

गर्भः सन्धार्यते येन कर्मणा तद् गर्भाधानमित्यनुगतार्थं कर्मनामधेयम् | – जैमिनी

सभी के भाव स्पष्ट हैं – जिस संस्कार कर्म के द्वारा स्त्रियाँ गर्भ धारण करती हैं वह गर्भाधान संस्कार (Garbhaadhaan Sanskaar) कहलाता है |

गर्भाधान और इसके बाद किये जाने वाले पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण आदि संस्कार केवलमात्र धार्मिक अनुष्ठान – Rituals – भर ही नहीं हैं | इनका आध्यात्मिक महत्त्व है | इन समस्त संस्कारों का उद्देश्य यही था कि गर्भ में भी और जन्म के बाद भी शिशु स्वस्थ तथा प्रसन्नचित्त रहे तथा धीरे धीरे इस समस्त सृष्टि से उसका सम्बन्ध प्रगाढ़ हो सके | गर्भ धारण करने के बाद अनेक प्रकार के प्राकृतिक दोषों के आक्रमण होते रहने की सम्भावना होती है, जिनसे बचने के लिए यह संस्कार किया जाता है | इसके करने से गर्भ सुरक्षित रहता है तथा सुयोग्य सन्तान उत्पन्न होती है | चिकित्सा शास्त्र भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि गर्भाधान के समय पति-पत्नी के मन के जो भाव होंगे उनका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य पड़ेगा |

यही कारण है कि पति पत्नी दोनों को यह सिखाया जाता था कि विवाह के बाद सबसे पहले वे यह विचार करें कि उन्हें कब सन्तान उत्पन्न करनी है और किस प्रकार की सन्तान की उनकी कामना है | साथ ही अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें और उसके लिए जो भी आवश्यक उपाय करने हों वे करें | उसके बाद गर्भाधान का विचार करें | अर्थात गर्भाधान से पूर्व माता पिता दोनों को शारीरिक और मानसिक रुप से स्वयं को तैयार करना आवश्यक है, क्योंकि आने वाली सन्तान उनकी ही आत्मा का प्रतिरुप होती है | इसीलिए तो पुत्र को आत्मज और पुत्री को आत्मजा कहा जाता है |

किसी भी व्यक्ति को अपना तन और मन दोनों स्वस्थ तथा प्रसन्न रखने के लिए सबसे पहले उत्तम और पौष्टिक भोजन ग्रहण करना होगा | माता जैसा भोजन करेगी उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य पड़ेगा | साथ ही उचित व्यायाम भी शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है | उसके बाद घर का वातावरण आनन्दमय होगा तो मन स्वतः प्रसन्नता से आन्दोलित रहेगा | इसके अतिरिक्त माता पिता की मानसिक परिपक्वता के लिए उत्तम साहित्य का अध्ययन, मन को प्रसन्न करने वाला तथा ज्ञानवर्द्धक वार्तालाप और श्रेष्ठ लोगों का साहचर्य भी आवश्यक है | इतना सब कुछ हो जाएगा तो उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर अवश्य ही पड़ेगा तथा माता पिता स्वयं ही अपने जन्म लेने वाले शिशु के लिए अच्छे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं | महाभारत को यदि इतिहास ग्रन्थ मानते हैं तो अभिमन्यु का उदाहरण सबको ज्ञात ही है |

क्रमशः…

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – एक ऐसी यात्रा – एक ऐसा चक्र जो निरन्तर गतिशील रहता है आरम्भ से अवसान और पुनः आरम्भ से पुनः अवसान के क्रम में – यही है भारतीय दर्शनों का सार जो निश्चित रूप से आशा और उत्साह से युक्त है – समस्त प्रकृति का यही तो नियम है | ये समस्त सूर्य चाँद तारकगण उदित होते हैं, इनका अवसान होता है पुनः उदित होने के लिए | समस्त प्रकृति रज:धर्मिणी है इसीलिए वह रजस्वला भी होती है | रजस्वला होने के कारण ही अपने गर्भ से समस्त वनस्पतियों इत्यादि को जन्म देती है | वनस्पतियाँ पुष्पादि सब जन्म लेते हैं – पतझर में सब झर जाते हैं – सूख कर नष्ट हो जाते हैं पुनः नवीन रूप में जन्म लेने के लिए | किसी प्रकार के नैराश्य के लिए वहाँ स्थान ही नहीं है – यदि कुछ है तो पुनः पुनः उदित होते रहने का – पुनः पुनः आरम्भ होते रहने का – नवांकुरों के पुनः पुनः पल्लवित होते रहने का उत्साह | मानव भी प्रकृति का ही एक अंग हैं और इसीलिए उसका भी जन्म-मृत्यु-ज़रा अवस्थाओं के कर्तव्यों को पूर्ण कर लेने के बाद अवसान हो जाता है – ताकि पुनः जन्म लेकर वह अपने शेष कर्मों को पूर्ण कर सके | ताकि यह उत्साह बना रहे और व्यक्ति समस्त बाधाओं को पार करते हुए अपने कर्ममार्ग पर निरन्तर गतिशील रहते हुए अग्रसर रहे – इसी के लिए संस्कारों की आवश्यकता का अनुभव हुआ |

तो इस प्रकार गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यन्त जितने भी संकार व्यक्ति के किये जाते हैं वे सभी इस जन्म से पुनर्जन्म तक की यात्रा के ही तो विभिन्न मार्ग और विभिन्न पड़ाव हैं | संस्कारों की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि व्यक्ति सरलतापूर्वक आनन्दित भाव से इस यात्रा में आगे बढ़ सके | अन्यथा जन्म तो पशु का भी होता है, और पशु भी उसी परमात्मतत्व का एक अतिसूक्ष्म अणु है, किन्तु – क्योंकि उसे संस्कारित नहीं किया जाता इसलिए वह “पशु के समान” व्यवहार करता है | “पशु के समान” इसलिए कहा क्योंकि यदि हम चाहें अपने पशुओं को भी संस्कारित कर सकते हैं –  उन्हें भी बहुत कुछ सिखा सकते हैं – व्यवहार करना सिखा सकते हैं | यही व्यवहार सिखाने की प्रक्रिया संस्कार कहलाती है | मनुष्य क्योंकि बुद्धि का प्रयोग अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक करता है इसलिए उसके लिए संस्कारों की प्रक्रिया कुछ अलग प्रकार की होती है |

ऋषि गौतम ने 40 संस्कारों का उल्लेख किया है | महर्षि अंगिरा 25 संस्कारों की बात करते हैं | कहीं कहीं 48 संस्कार भी उपलब्ध होते हैं | किन्तु वर्तमान में षोडश संस्कारों का उल्लेख प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है :

गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो जातकर्म च |

नामक्रिया निष्क्रमणो अन्न्प्राशनं वपनक्रिया: ||

कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भ: क्रियाविधि: |

केशान्त स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह: ||

प्रेताग्नि संग्रहश्चैव संस्कारा: षोडश स्मृता: || (व्यासस्मृति 1/13-15)

अर्थात सबसे प्रथम गर्भाधान संस्कार है जो जन्म से पूर्व का अर्थात गर्भ धारण करने के समय किया जाने वाला संस्कार है | उसके बाद कुछ संस्कार बच्चे के जन्म से पूर्व किये जाते हैं और कुछ बाद में अन्तिम यात्रा पर्यन्त समय समय पर किये जाते रहते हैं | अपने इस लेख में हम विवाह आदि संस्कारों का सूक्ष्म वर्णन करेंगे, किन्तु गर्भ से पूर्व तथा बाद के संस्कारों का विस्तार से विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे |

क्रमशः…

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