काले मेघा जल्दी से आ

पिछले कुछ दिनों से धूल भरे आँधी तूफानों का सामना हो रहा है सभी को | बादल आते हैं, पर मानों सबसे गुस्सा होने के कारण उड़ जाते हैं | यही सब सोचते सोचते कुछ पंक्तियाँ अनायास ही बन गईं, प्रस्तुत हैं…

काले मेघा जल्दी से आ, भूरे मेघा जल्दी से आ ||

घाम ये कैसा चहक रहा है, अँगारे सा दहक रहा है |

लुका छिपी फिर अब ये कैसी, मान मनुव्वल अब ये कैसी ||

कितने आँधी तूफाँ आते, धूल धूसरित वे कर जाते

पल भर में धरती पर अपना ताण्डव नृत्य दिखा वे जाते |

तेरी घोर गर्जना से सब आँधी तूफाँ हैं भय खाते

आकर उनको दूर भगा तू, वसुन्धरा का मन हरषा तू ||

सूख रही हैं ताल तलैया, सूख रही हैं सागर नदियाँ

रूठ रहे हैं गाय बछरिया, रूठ गई है मस्त गोरैया |

कोयल की पंचम है रूठी, भँवरे की भी गुँजन रूठी

आके सबको आज मना तू, धरती पर हरियाली ला तू ||

माना हमने जंगल काटे, सारे पेड़ कर दिए नाटे

पर इन्सानी अपराधों का इनको अब तू दण्ड न दे रे |

ये सब तेरा ही मुँह ताकें, तुझसे ही हैं आस लगाएँ

इनको थोड़ी राहत दे दे, पूरी इनकी चाहत कर दे ||

तू रूठा तो साथ में तेरे वसुन्धरा भी रूठ रहेगी

अपनी वसु सन्तानों को जगती से फिर वह दूर रखेगी |

होगा क्या फिर आज सोच ले, जग के मन की व्यथा समझ ले

दाने पानी को तरसें सब, ऐसा मत तू प्रण अब ले रे ||

पर गुस्से में नहीं बरसना, प्यार भरा तू राग सुनाना

और ता धिन मृदंग की लय पर इस सारे जग पर छा जाना |

ताल विलम्बित में तू आना, गत के संग फिर भाव दिखाना

प्यारी मस्त बिजुरिया संग मस्ती में भर फिर नर्तन करना ||

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आओ भरकर रख दें पानी

जेठ की गर्मी, तपा महीना, अंग अंग से बहे पसीना |

घाम घमकता, ताप धधकता, मुश्किल कैसा हुआ है जीना ||

ताप कृत्तिका से लेकर अब चढ़ा रोहिणी पर है सूरज |

आग उगलता, नहीं पिघलता, सबका मुश्किल हुआ है जीना ||

कोल्ड ड्रिंक का बोल है बाला, ठण्डाई का खेल निराला |

भल्ले दही नहीं, गोल गप्पों का ठण्डा पानी पीना ||

ताल तलैया सूख चुकी हैं, हरियाली हम काट चुके हैं |

गोरैया अब नहीं फुदकती, भूल चुकी है खाना पीना ||

आँगन में अब पेड़ लगाएँ, लगे हुए जो, उन्हें बचाएँ |

गोरैया को पास बुलाएँ, देकर उसको ठण्डा पानी ||

तेज़ है गर्मी, पेड़ तले अब आओ भरकर रख दें पानी |

प्यासे पंछी की हमकों है मिल जुल कर अब प्यास बुझानी ||

गोरैया को पास बुलाएँ 2

 

 

वक्री शनि

आज अक्षय तृतीया का अक्षय पर्व है… सूर्य और चन्द्र दोनों अपनी उच्च राशियों में हैं अतः आज अक्षय तृतीया का योग अत्यन्त शुभ है… सभी को इस अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएँ…

आज ही प्रातः लगभग 06:46 पर शनिदेव वक्री हुए हैं | इस समय शनि का भ्रमण धनु राशि और पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में चल रहा है | वक्री चाल चलते हुए पाँच जून को वापस मूल नक्षत्र में शनि का प्रवेश होगा जहाँ वे पहले भी दो मार्च तक भ्रमण करके आ चुके हैं | छह सितम्बर तक मूल नक्षत्र में भ्रमण करने के पश्चात छह सितम्बर को 17:46 पर पुनः मार्गी होकर पूर्वाषाढ़ की ओर प्रस्थान आरम्भ कर देंगे | दो मई तक शनि के साथ मंगल भी रहेगा जो धनु राशि से द्वादशेश और पंचमेश है | वृश्चिक धनु और मकर राशियों पर शनि की साढ़ेसाती भी चल रही है | साथ ही वृषभ और कन्या राशियों पर शनि की ढैया भी चल रही है | इस प्रकार ये पाँच राशियाँ इस समय शनि के सीधे प्रभाव में हैं | Vedic Astrologer शनि के वक्री होने के विषय में अपनी अपनी धारणाओं तथा ज्योतिषीय सूत्रों के आधार पर विविध प्रकार के फलकथन भी कर रहे हैं |

तो, सबसे पहले संक्षेप में हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि किसी भी ग्रह को वक्री कब कहा जाता है | प्रायः जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत अधिक निकट आ जाता है तो या तो वह अस्त या दग्ध हो जाता है अथवा वक्री हो जाता है | सूर्य और चन्द्र कभी वक्री नहीं होते | राहु-केतु सदा वक्री ही रहते हैं | मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि सूर्य के अत्यधिक सामीप्य से कुछ समय के लिए वक्री या अस्त हो जाते हैं | इन ग्रहों के वक्री हो जाने पर इन्हें चेष्टा बल प्राप्त हो जाता है जिसके कारण इनके फलों में वृद्धि हो जाती है और इसी कारण से शुभ ग्रह के वक्री होने पर उसकी शुभता में वृद्धि हो जाती है तथा अशुभ ग्रह के वक्री होने पर उसका अशुभत्व बढ़ जाता है | साथ ही इन ग्रहों के साथ जो अन्य ग्रह स्थित होते हैं वे भी इनके बल से प्रभावित हो जाते हैं |

वक्री ग्रहों के विषय में भी विविध धारणाएँ ज्योतिषियों की हैं | कुछ लोग मानते हैं कि वक्री ग्रह सदा अशुभ फल ही प्रदान करते हैं क्योंकि वे उल्टी दिशा में चलते हैं | कुछ विद्वानों का मानना है कि ये ग्रह अपने स्वभाव के विपरीत आचरण करने लग जाते हैं | जैसे शुभ ग्रह अपना शुभत्व त्याग देता है और अशुभ ग्रह अपनी दुष्टता त्याग देता है | कुछ के विचार से कोई भी ग्रह विपरीत दिशा में भ्रमण करने में सक्षम ही नहीं है अतः उनकी चाल वक्री होती ही नहीं, अपितु सूर्य की अत्यधिक निकटता के कारण धीमी हो जाती है और इसीलिए वक्री ग्रहों का भी प्रभाव मार्गी ग्रहों की ही भाँति देखा जाना चाहिए | और भी अनेक प्रकार के सिद्धान्त, सूत्र और गणनाएँ हैं जो एक विशद विवेचना का विषय है |

हमारा स्वयं का मानना यह है कि ग्रह वक्री तो होता है इसीलिए वह वर्तमान नक्षत्र से आगे बढ़ने की अपेक्षा पिछले नक्षत्र में पहुँच जाता है और वहाँ से पुनः आगे बढ़ना आरम्भ कर देता है | यही कारण है कि इस समय शनि का गोचर पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में हो रहा है, जो वक्री चलते हुए वापस मूल नक्षत्र में पहुँच जाएगा, जहाँ छः सितम्बर तक घूमने का पश्चात पुनः मार्गी होकर आगे बढ़ना आरम्भ करेगा और 27 नवम्बर को 18:15 पर वापस पूर्वाषाढ़ में पहुँच जाएगा | इस प्रकार सूर्य के एक निश्चित सीमा पर सामीप्य से ग्रह वक्री हो जाते हैं |

वक्री होने पर ग्रहों के किस प्रकार के परिणाम हो सकते हैं इसे हम इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि मान लीजिये हमें किसी इन्टरव्यू के जाना है और हम अपने बहुत ज़रूरी Documents घर भूल जाते हैं | जब हमें इस बात का पता लगता है तो हम वापस घर की ओर दौड़ पड़ते हैं और अपनी वो फाइल लेकर इन्टरव्यू के स्थान की ओर वापस दौड़ लगाते हैं | तो उस आधे रास्ते से घर का उल्टा सफ़र और फिर घर से ऑफिस तक का सफ़र हमारा जिस प्रकार का रहेगा ठीक वही स्थिति हम वक्री ग्रह की भी समझ सकते हैं | हमारे मन में चिन्ता हो रही होती है कि घर वापस पहुँच कर फाइल लेकर हम सही समय पर इन्टरव्यू के लिए पहुँच भी पाएँगे या नहीं, और इसी ऊहापोह में हम इतना भी नहीं सोच पाते कि इस भागमभाग में हमारी किसी से टक्कर हो सकती है और उस कारण हमें अथवा दूसरे को कोई हानि पहुँच सकती है | हम बस चिन्ता और जोश की मिली जुली मानसिक स्थिति में चलते रहते हैं | परिणाम कुछ परिस्थितियों में अनुकूल भी हो सकता है और कुछ में प्रतिकूल भी | या इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि हम कार ड्राइव कर रहे हैं और सामने से अचानक कोई हाई बीम पर ड्राइव करता आ सकता है जिसके कारण हमारी आँखें कुछ पल के लिए बन्द हो सकती हैं और उस स्थिति में हम दिग्भ्रमित हो सकते हैं, हमारी गति लड़खड़ा सकती है, हमारी किसी के साथ टक्कर भी हो सकती है, इत्यादि इत्यादि…

बस इसी प्रकार वक्री ग्रहों के फलों को भो समझना चाहिए | सूर्य की एक निश्चित सीमा के भीतर आ जाने से उस ग्रह को सूर्य के अत्यधिक प्रकाश से जहाँ एक ओर वह बल मिल जाता है जिसकी उसे बहुत समय समय से प्रतीक्षा थी – अर्था चेष्टा बल, वहीं दूसरी ओर उसकी चाल भी लड़खड़ा सकती है और वह विपरीत दिशा में चलना आरम्भ कर सकता है… अथवा बली और दिग्भ्रमित होकर जोश में आकर कुछ भी कर सकता है…

अस्तु, यह एक खगोलीय घटना है और इसके कारण भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है | वैसे भी धनु राशि का अधिपति गुरु शनि के लिए तटस्थ ग्रह है अतः घबराने की आवश्यकता नहीं है | हाँ, शनि ग्रह को स्वाभाविक क्रूर ग्रह मानते हुए हम कह सकते हैं कि जो राशियाँ इसके सीधे प्रभाव में इस समय हैं उन जातकों को सावधान रहने की आवश्यकता है | उनके स्वभाव में कोई अन्तर इस समय में नहीं आएगा किन्तु उनके व्यवहार में कुछ परिवर्तन आ जाने के कारण उसका प्रभाव उनके कार्यों पर पड़ सकता है और उसके अनुसार शुभाशुभ परिणाम उन्हें प्राप्त हो सकते हैं…

शनि का तो अर्थ ही है धीरे चलने वाला और शान्ति प्रदान करने वाला, तो हम कह सकते हैं कि जन्मकुण्डली में शनि की स्थिति के अनुसार उसके शुभाशुभ परिणाम जातक को प्राप्त होते रहेंगे, किन्तु शनै: शनै:.. यदि किसी प्रतिकूल परिणाम का अनुभव आपको हो तो शनिदेव के किसी भी मन्त्र का जाप आप कर सकते हैं…

शनिदेव सभी को कर्तव्य मार्ग पर अग्रसर रखते हुए सभी का कल्याण करें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/04/18/saturn-in-retrogression/

 

अक्षय तृतीया

ॐ जमदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात

कल बुधवार 18 तारीख़ को अक्षय तृतीया का अक्षय पर्व है, जिसे भगवान् विष्णु के छठे अवतार परशुराम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है | सर्वप्रथम सभी को अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएँ…

यों तो हर माह की तृतीया जया तिथि होने के कारण शुभ मानी जाती है, किन्तु वैशाख शुक्ल तृतीया स्वयंसिद्ध तिथि मानी जाती है | पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं उनका अक्षत अर्थात कभी न समाप्त होने वाला शुभ फल प्राप्त होता है | भविष्य पुराण तथा अन्य पुराणों की मान्यता है कि भारतीय काल गणना के सिद्धान्त से अक्षय तृतीया के दिन ही सतयुग और त्रेतायुग का आरम्भ हुआ था जिसके कारण इस तिथि को युगादि तिथि – युग के आरम्भ की तिथि – माना जाता है |

परशुराम के अतिरिक्त भगवान् विष्णु ने नर-नारायण और हयग्रीव के रूप में अवतार भी इसी दिन लिया था | ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतार भी इसी दिन माना जाता है | प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्री-केदार के कपाट भी इसी दिन खुलते हैं | माना जाता है कि महाभारत के युद्ध और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था तथा महर्षि वेदव्यास ने इसी दिन महान ऐतिहासिक महाकाव्य महाभारत की रचना आरम्भ की थी |

इस प्रकार विभिन्न पौराणिक तथा लोकमान्यताओं के अनुसार इस तिथि को इतने सारे महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न हुए इसीलिए सम्भवतः इस तिथि सर्वार्थसिद्ध तिथि माना जाता है और इसीलिए सम्भवतः इसे अक्षय – जिसका कभी क्षय न हो – तिथि भी कहा जाता है | किसी भी शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, किसी संस्था अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान या दूकान आदि का उद्घाटन करने के लिए यदि कोई अनुकूल समय न उपलब्ध हो रहा हो तो अक्षय तृतीया के दिन ये कार्य किये जा सकते हैं | इसके अतिरिक्त नवीन वस्त्राभूषण, ज़मीन तथा वाहन आदि खरीदने के लिए भी अक्षय तृतीया को सर्वोत्तम मुहूर्त माना जाता है | पौराणिक मान्यता तो यह भी है कि इन दिन पितरों के लिए अथवा किसी अन्य भी कारण से किया गया दान अत्यन्त शुभफलदायी होता है तथा इन शुभ फलों का कभी क्षय नहीं होता :

“अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तम्, तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया |

उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै:, तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव ||”

साथ ही पद्मपुराण के अनुसार यह तिथि मध्याह्न के आरम्भ से लेकर प्रदोष काल तक अत्यन्त शुभ मानी जाती है | इसका कारण भी सम्भवतः यह होगा कि पुराणों के अनुसार भगवान् परशुराम का जन्म प्रदोष काल में हुआ था |

जैन धर्म में भी अक्षय तृतीया का महत्त्व माना जाता है | प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को उनके वर्षीतप के सम्पन्न होने पर उनके पौत्र श्रेयाँस ने इसी दिन गन्ने के रस के रूप में प्रथाम आहार दिया था | श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बन्धनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार किया था | सत्य और अहिंसा के प्रचार करते करते आदिनाथ हस्तिनापुर पहुँचे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था | वहाँ सोमयश के पुत्र श्रेयाँस ने इन्हें पहचान लिया और शुद्ध आहार के रूप में गन्ने का रस पिलाकर इनके व्रत का पारायण कराया | गन्ने को इक्षु कहते हैं इसलिए इस तिथि को इक्षु तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया कहा जाने लगा | आज भी बहुत से जैन धर्मावलम्बी वर्षीतप की आराधना करते हैं जो कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होकर दूसरे वर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया को सम्पन्न होती है और इस अवधि में प्रत्येक माह की चतुर्दशी को उपवास रखा जाता है | इस प्रकार यह साधना लगभग तेरह मास में सम्पन्न होती है |

सांस्कृतिक दृष्टि से इस दिन विवाह आदि माँगलिक कार्यों का आरम्भ किया जाता है | कृषक लोग एक एथल पर एकत्र होकर कृषि के शगुन देखते हैं साथ ही अच्छी वर्षा के लिए पूजा पाठ आदि का आयोजन करते हैं | ऐसी भी मान्यता है इस दिन यदि कृषि कार्य का आरम्भ किया जाए जो किसानों को समृद्धि प्राप्त होती है | इस प्रकार प्रायः पूरे देश में इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है तथा भगवान् विष्णु के साथ ही श्री लक्ष्मी गणेश की उपासना की जाती है |

जनसाधारण की मान्यता है कि इस दिन यदि स्वर्ण खरीदा जाए तो वह दुगुना हो जाता है अथवा उसका कभी क्षय नहीं होता | पर जैसे ऊपर लिखा है, हम जो भी शुभ कार्य – दान-जप-तप-अध्ययन-साधना आदि करते हैं उनके पुण्य फलों का कभी क्षय नहीं होता | अन्यथा, वास्तविकता तो यह है कि यह समस्त संसार ही क्षणभंगुर है | ऐसी स्थिति में हम यह कैसे मान सकते हैं कि किसी भौतिक और मर्त्य पदार्थ का कभी क्षय नहीं होगा ? हमारे मनीषियों के कथन का तात्पर्य सम्भवतः यही रहा होगा कि हमारे कर्म सकारात्मक तथा लोक कल्याण की भावना से निहित हों, जिनके करने से समस्त प्राणीमात्र में आनन्द और प्रेम की सरिता प्रवाहित होने लगे तो उस उपक्रम का कभी क्षय नहीं होता अपितु उसके शुभ फलों में दिन प्रतिदिन वृद्धि ही होती है – और यही तो है जीवन का वास्तविक स्वर्ण | किन्तु परवर्ती जन समुदाय ने – विशेषकर व्यापारी वर्ग ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए इसे भौतिक वस्तुओं – विशेष रूप से स्वर्ण – के साथ जोड़ लिया | लोग अपने आनन्द के लिए प्रत्येक पर्व पर कुछ न कुछ नई वस्तु खरीदते हैं तो वे ऐसा कर सकते हैं, किन्तु वास्तविकता तो यही है कि इस पर्व का स्वर्ण की ख़रीदारी से कोई सम्बन्ध नहीं है | वैसे भी यह समय वसन्त ऋतु के समापन और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के कारण दोनों ऋतुओं का सन्धिकाल होता है | इस मौसम में गर्मीं और उमस वातावरण में व्याप्त होती है | सम्भवतः इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस दिन सत्तू, खरबूजा, खीरा तथा जल से भरे मिट्टी के पात्र दान देने की परम्परा है अत्यन्त प्राचीन काल से चली आ रही है | साथ ही यज्ञ की आहुतियों से वातावरण स्वच्छ हो जाता है और इस मौसम में जन्म लेने वाले रोग फैलाने वाले बहुत से कीटाणु तथा मच्छर आदि नष्ट हो जाते हैं – सम्भवतः इसीलिए इस दिन यज्ञ करने की भी परम्परा है |

अस्तु, ऊँ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्…

श्री लक्ष्मी-नारायण की उपासना के पर्व अक्षय तृतीया तथा परशुराम जयन्ती की सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ… सभी के जीवन में सुख-समृद्धि-सौभाग्य-ज्ञान की वृद्धि होती रहे तथा हर कार्य में सफलता प्राप्त होती रहे यही कामना है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/04/17/akshaya-tritiya/

 

श्री गणपति द्वादश नाम स्तोत्रम्

हिन्दू धर्म में कोई भी मंगल कार्य करते समय सर्वप्रथम गणपति का आह्वाहन स्थापन करते हैं | ऐसी मान्यता है कि यदि पूर्ण एकाग्रचित्त से संकल्पयुक्त होकर गणपति की पूजा अर्चना की जाए तो उसके बहुत शुभ फल प्राप्त होते हैं | प्रायः सभी Vedic Astrologer बहुत सी समस्याओं के समाधान के लिए पार्वतीसुत गणेश की उपासना का उपाय बताते हैं | और आज तो अंगारक गणेश संकष्टचतुर्थी भी है | इसी निमित्त प्रस्तुत है “श्री गणपति द्वादशनामस्तोत्रम्”…

यहाँ हम इस स्तोत्र के दो रूप प्रस्तुत कर रहे हैं | दोनों का ही भाव यही है कि जो भी व्यक्ति श्रद्धाभक्ति पूर्वक इनका ध्यान करता है वह चारों पुरुषार्थों का पालन करते हुए समस्त पापों से मुक्त होकर सुख प्राप्त करता है… साधक अपनी सुविधानुसार किसी भी स्तोत्र का पठन अथवा श्रवण कर सकता है…

|| अथ श्री गणपति द्वादश नाम स्तोत्रम् ||

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः |

लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ||

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः |

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ||

विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा |

संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ||

सुन्दर मुख वाले, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन – गणपति के इन बारह नामों का विद्यारम्भकाल में, विवाह के समय, प्रवेश के समय, प्रस्थान के समय, संग्राम के समय अथवा संकट के समय जो व्यक्ति पठन अथवा श्रवण करता है उसके समक्ष कभी किसी प्रकार का विघ्न नहीं उपस्थित होता |

|| अथ श्री गणेशस्तोत्रम् ||

नारद उवाच

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् |

भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ||

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं दि्वतीयकम् |

तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ||

लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च |

सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ||

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् |

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ||

द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः |

न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ||

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् |

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ||

जपेद् गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् |

संवत्सरेण च संसिद्धिं लभते नात्र संशयः ||

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् |

तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ||

|| इतिश्रीनारदपुराणे संकटनाशननाम गणेशद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||

वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्रं, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति और गजानन – भगवान् गणेश के इन बाराह नामों का जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक पठन और श्रवण करता है उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं |

इस प्रकार प्रायः इन दो प्रकार से गणपति के द्वादश नामों का पाठ किया जाता है | शिव-पार्वती सुत गणेश सभी का मंगल करें, यही कामना है…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/04/03/shree-ganapati-dwadashnaam-stotram/

 

अंगारक गणेश संकष्ट चतुर्थी

अंगारक गणेश संकष्ट चतुर्थी

ॐ गं गणपतये नमः

आज 16:43 तक वैशाख कृष्ण तृतीया है और उसके बाद वैशाख कृष्ण चतुर्थी आ जाएगी | मंगलवार है इसलिए यह चतुर्थी अंगारक चतुर्थी कहलाती है | मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है और मंगलवार मंगल का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए इस दिन पड़ने वाली चतुर्थी अंगारक चतुर्थी कहलाती है | क्योंकि सारी ही चतुर्थी भगवान् गणेश को समर्पित हैं इसलिए इस चतुर्थी को अंगारक गणेश संकष्ट चतुर्थी कहा जाता है | इस वर्ष आज यानी 3 अप्रेल, 31 जुलाई और 31 दिसम्बर को अंगारक गणेश संकष्ट चतुर्थी मनाई जाएँगी | अंगारक गणेश संकष्ट चतुर्थी अत्यन्त शुभ मानी जाती है | माना जाता है कि आज के दिन भगवान् सिद्धिविनायक की पूजा अर्चना करने से सुख सौभाग्य में वृद्धि होती है तथा कार्य में सफलता प्राप्त होती है | आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है | ऐसी भी मान्यता है कि जिन लोगों की कुण्डली में माँगलिक दोष है, आज के दिन भगवान् गणेश की पूजा अर्चना करने से तथा दान आदि देने से वह दोष दूर होता है तथा विवाह की बाधाएँ दूर होकर वैवाहिक जीवन सुखमय व्यतीत होता है |

अंगारकी गणेश संकष्टी चतुर्थी के लिए गणेश पुराण में एक कथा भी है कि मंगल द्वारा पूर्ण भक्ति भाव से की गई गणेश उपासना से ऋद्धि सिद्धि दाता गणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने मंगल को वर दिया कि मंगलवार को पड़ने वाली चतुर्थी अंगारकी चतुर्थी कहलाएगी और जो भी व्यक्ति इस दिन भगवान् गणेश की उपासना करेगा उसकी समस्त बाधाएँ दूर होकर उसकी मनोकामना पूर्ण होगी तथा उसकी कुण्डली में यदि मंगल दोषयुक्त होगा तो वह दोष भी इस उपासना से शान्त हो जाएगा |

कितनी भी प्रकार की मान्यताएँ हों, कितनी भी प्रकार की पौराणिक कथाएँ हों, निष्कर्ष सबका यही है कि व्यक्ति को प्रत्येक परिस्थिति में अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक आस्थाओं का दृढ़ता से पालन करना चाहिए, तभी देवों की कृपादृष्टि उस पर बनी रह सकती है…

विघ्नहर्ता मंगलकर्ता भगवान् गणेश सभी पर प्रसन्न रहें…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/04/03/angarak-ganesha-sankasht-chaturthi/

 

षष्ठं कात्यायनी तथा

विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेषु वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या |

ममत्वगर्तेSतिमहान्धकारे, विभ्रामत्येतदतीव विश्वम् ||

देवी का छठा रूप कात्यायनी देवी का माना जाता है | इस रूप में भी इनके चार हाथ माने जाते हैं और माना जाता है कि इस रूप में भी ये शेर पर सवार हैं | इनके तीन हाथों में तलवार, ढाल और कमलपुष्प हैं तथा स्कन्दमाता की ही भाँति एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दिखाई देता है |

एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितं, पातु नः सर्वभीतेभ्यः कात्यायनी नमोSस्तु ते

उपरोक्त मन्त्र के जाप द्वारा देवी कात्यायनी की उपासना की जाती है | देवासुर संग्राम में देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये – महिषासुर जैसे दानवों का संहार करने के लिए – देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुईं और महर्षि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया, इसीलिये “कात्यायनी” नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई | इस प्रकार देवी का यह रूप पुत्री रूप है | यह रूप निश्छल पवित्र प्रेम का प्रतीक है | किन्तु साथ ही यदि कहीं कुछ भी अनुचित होता दिखाई देगा तो ये कभी भी भयंकर क्रोध में भी आ सकती हैं |

ऐसा भी माना जाता है कि जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आती है वे:

ॐ कात्यायिनी महामाये, सर्वयोगिन्यधीश्वरी

नन्दगोपसुतं देवी पतिं में कुरु, ते नमः ||

मन्त्र से कात्यायनी देवी की उपासना करें तो उन्हें उत्तम वर की प्राप्ति होती है | इसके अतिरिक्त ऐं क्लीं श्रीं त्रिनेत्रायै नमः” माँ कात्यायनी का यह बीज मन्त्र है और इनकी उपासना के लिए इस बीज मन्त्र का जाप भी किया जा सकता है |

माना जाता है कि भगवती का यह रूप बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करता है | देवगुरु बृहस्पति को सौभाग्य कारक तथा विद्या, ज्ञान-विज्ञान और धार्मिक आस्थाओं का कारक भी माना जाता है | अतः बृहस्पति को प्रसन्न करने के लिए कात्यायनी देवी की पूजा अर्चना की जानी चाहिए |

कात्यायनी देवी के रूप में माँ भगवती सभी की रक्षा करें और सभी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

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