नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या

 

मातृवत् लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका, नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या ||

वास्तव में ऐसी श्रद्धा और प्रज्ञा से युत होती है गुरु की सत्ता – गुरु की प्रकृति – जो माता के सामान  ममत्व का भाव रखती है तो पिता के सामान उचित मार्गदर्शन भी करती है | आज गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व है – हमारे विचार से सभी पर्वों में सबसे उत्तम पर्व है गुरु पूर्णिमा का पर्व | क्योंकि गुरु अपने ज्ञान रूपी अमृत जल से शिष्य के व्यक्तित्व की नींव को सींच कर उसे दृढ़ता प्रदान करता है और उसका रक्षण तथा विकास करता है | तो सर्वप्रथम तो समस्त गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ | वास्तव में तो – यज्ञोपवीत को छोड़कर –  गुरु पूजा न तो किसी प्रकार का कोई कर्मकाण्ड है और न ही गुरु पर किसी प्रकार का कोई उपकार ही है | यह तो एक अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रयोग है । जिसके द्वारा शिष्य अपनी श्रद्धा और सङ्कल्प के सहारे गुरु के समर्थ व्यक्तित्व के साथ स्वयं को युत करता है । गुरु की पूजा करके, गुरु के प्रति सम्मान के भाव सुमन समर्पित करके गुरु के पूर्ण रूप से विकसित प्राणों के ही कुछ अंश शिष्य को आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त होते हैं जो उसे जीवन भर दिशा निर्देश देते रहते हैं | गुरु शिष्य को ज्ञान और पुरुषार्थ का मार्ग दिखाता है, किन्तु यह शिष्य पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार उस ज्ञान और पुरुषार्थ में वृद्धि करके प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है | क्योंकि अन्ततोगत्वा पुरुषार्थ तो व्यक्ति को स्वयं ही करना पड़ता है | वास्तव में देखा जाए तो गुरु और शिष्य एक दूसरे के पूरक होते हैं | जिस प्रकार गुरु अपने ज्ञान और शक्ति से शिष्य के उत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील रहता है उसी प्रकार शिष्य का भी कर्तव्य होता है कि वह गुरु का उचित सम्मान करे |

हमारे देश में पौराणिक काल से ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूजा के रूप में मनाया जाता है | इसी दिन पंचम वेद “महाभारत” के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्मदिन भी माना जाता है और इसीलिए इसे “व्यास पूर्णिमा” भी कहा जाता है | और महर्षि वेदव्यास को ही आदि गुरु भी माना जाता है इसीलिए व्यास पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है | भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, पुराणों और उपपुराणों की रचना की, ऋषियों के अनुभवों को सरल बना कर व्यवस्थित किया, पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना की तथा विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन किया । इस सबसे प्रभावित होकर देवताओं ने महर्षि वेदव्यास को “गुरुदेव” की संज्ञा प्रदान की तथा उनका पूजन किया । तभी से व्यास पूर्णिमा को “गुरु पूर्णिमा” के रूप में मनाने की प्रथा चली आ रही है | बौद्ध ग्रंथों के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के पाँच सप्ताह बाद भगवान बुद्ध ने भी सारनाथ पहुँच कर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही अपने प्रथम पाँच शिष्यों को उपदेश दिया था | इसलिये बौद्ध धर्मावलम्बी भी इसी दिन गुरु पूजन का आयोजन करते हैं |

प्राचीन काल में जब आश्रम व्यवस्था थी तब २५ वर्ष की आयु हो जाने तक विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर ही समस्त शास्त्रों का तथा युद्ध, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला इत्यादि कलाओं का, ज्योतिष आदि अनेकों विधाओं आदि का अध्ययन किया करते थे | और प्रायः यह अध्ययन निःशुल्क होता था | गुरुजन इस कार्य के लिये किसी प्रकार की “दक्षिणा” आदि नहीं लेते थे | उन गुरुजनों तथा उनके आश्रम में रह रहे शिष्यों के जीवन यापन का समस्त भार गृहस्थ लोग वहन किया करते थे | उस समय आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन तथा शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात् गुरुकुल छोड़कर जब सांसारिक जीवन में प्रविष्ट होने का समय होता था उस समय भी गुरुजनों का पूजन करके यथाशक्ति गुरुदक्षिणा आदि देने की प्रथा थी | और इस गुरुपूजा के अवसर पर न केवल गुरुओं का स्वागत सत्कार किया जाता था, बल्कि माता पिता तथा अन्य गुरुजनों की भी गुरु के समान ही पूजा अर्चना की जाती थी | वैसे भी व्यक्ति के प्रथम गुरु तो उसके माता पिता ही होते हैं |

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से प्रायः वर्षा आरम्भ हो जाती है और उस समय तो चार चार महीनों तक इन्द्रदेव धरती पर अमृत रस बरसाते रहते थे | आवागमन के साधन इतने थे नहीं, इसलिए उन चार महीनों तक सभी ऋषि मुनि एक ही स्थान पर निवास करते थे | अतः इन चार महीनों तक प्रतिदिन गुरु के सान्निध्य का सुअवसर शिष्य को प्राप्त हो जाता था और उसकी शिक्षा निरवरोध चलती रहती थी | क्योंकि विद्या अधिकाँश में गुरुमुखी होती थी, अर्थात लिखा हुआ पढ़कर कण्ठस्थ करने का विधान उस युग में नहीं था, बल्कि गुरु के मुख से सुनकर विद्या को ग्रहण किया जाता था | गुरु के मुख से सुनकर उस विद्या का व्यावहारिक पक्ष भी विद्यार्थियों को समझ आता था और वह विद्या जीवनपर्यन्त शिष्य को न केवल स्मरण रहती थी, बल्कि उसके जीवन का अभिन्न अंग ही बन जाया करती थी | इस समय मौसम भी अनुकूल होता था – न अधिक गर्मी न सर्दी | तो जिस प्रकार सूर्य से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता तथा फसल उपजाने की सामर्थ्य प्राप्त होती है उसी प्रकार गुरुचरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञानार्जन की सामर्थ्य प्राप्त होती थी और उनके व्यक्तित्व की नींव दृढ़ होती थी जो उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती थी |

“अज्ञान्तिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया, चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः |” अर्थ सर्वविदित ही है – अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर भगाने के लिये जिस गुरु ने ज्ञान की शलाका से नेत्रों को प्रकाश प्रदान किया उस गुरु का मैं अभिवादन करता हूँ | तथा “गुरुर्ब्रह्मागुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरुर्सक्षात्परब्रहम तस्मै श्री गुरवे नमः |” अर्थात शिष्य के लिये तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब कुछ गुरु ही होता है | वही उसके लिये परब्रह्म होता है | भारतीय संस्कृति में गुरु को गोविन्द अर्थात उस परम तत्व ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है, क्योंकि वह गुरु ही होता है जो शिष्य के मन से अज्ञान का आवरण हटाकर उसे ज्ञान अर्थात ईश्वर के दर्शन कराता है, तभी तो कहा गया है कि “गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय | बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो मिलाय ||”

आज स्थिति यह है कि ५ सितम्बर को हम टीचर्स डे तो मनाते हैं, जो कि अच्छी बात है – क्योंकि उस दिन हम अपने देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिवस मनाते हैं – लेकिन विचारणीय बात यह है कि गुरु पूर्णिमा बस एक औपचारिक पर्व भर बनकर रह गया है | कुछ संगीत आदि कलाओं की शिक्षा देने वाले घरानों को इसका अपवाद अवश्य कहा जा सकता है | क्योंकि वहाँ संगीत आदि का ज्ञान भी गुरुमुख से सुनकर या गुरु के समक्ष बैठकर क्रियात्मक रूप से ही ग्रहण किया जाता है | संगीत आदि कलाओं का ज्ञान कोई पुस्तकों का विषय नहीं है |

आज स्थिति यह है कि स्कूल कालेजों में “गुरु” अथवा “शिक्षक” न रहकर “टीचर” रह गए हैं  | जिनके लिये विद्यादान शिष्य को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाने की अपेक्षा धनोपार्जन का साधन अधिक होता है | उसी प्रकार शिष्य के लिये भी ज्ञानार्जन उस परम तत्व से साक्षात्कार का माध्यम न रहकर अच्छी नौकरी प्राप्त करने अथवा अच्छा व्यवसाय स्थापित करने के लिये ऊँची शिक्षा ग्रहण करके उसका सर्टिफिकेट अथवा डिग्री प्राप्त करने का माध्यम ही बन गया है | उच्च शिक्षा प्राप्त करके व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति करने की सोचना अच्छी बात है, लेकिन शिक्षा के, ज्ञान के उच्च और उदात्त आदर्शों का व्यावसायीकरण हो जाना अच्छी बात नहीं | शिक्षा का व्यावसायीकरण हो जाने पर गुर शिष्य के मध्य स्वस्थ और पवित्र सम्बन्ध स्थापित हो ही नहीं सकता |

रही सही कसर पूरी कर दी है तथाकथित “सद्गुरुओं” ने जिन्होंने समाज की धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए स्वयं का इतना पतन कर लिया है कि उनके लिये शिष्य से येन केन प्रकारेण धन तथा अन्य प्रकार के लाभ प्राप्त करना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है जीवन का | और कुछ ढोंगी गुरु तो और भी नीचे गिर जाते हैं – आए दिन अखबारों और टी वी चैनल्स के माध्यम से ऐसी घटनाओं की जानकारी मिलती रहती है | और ऐसा नहीं है कि उनके भक्तों में केवल अनपढ़ कहे जाने वाले लोग ही शामिल हों, अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इन ढोंगी गुरुओं के चक्कर में फँस जाते हैं |

देखा जाए तो आज कुछ ही गिने चुने “सद्गुरु” ऐसे होंगे जो आगम निगम और पुराणों का, उपनिषदों आदि का महर्षि वेदव्यास के समान सम्पादन करके शिष्यों के लिये समर्पित कर दें | ऐसे गुरु कभी यह नहीं कहते कि वे गुरु हैं और लोगों को मोक्ष का मार्ग, ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाने के लिये आए हैं | वे उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये कभी कुछ ऐसा नहीं बताते जो तर्क संगत न हो | सरल और विनम्र होते हैं | उनके मन में शिष्यों के प्रति भी तथा अन्य लोगों के प्रति भी अगाध स्नेह भरा होता है | ज्ञान का सच्चे अर्थों में भण्डार होते हैं | पर ऐसे गुरु हैं कितने, और उन्हें खोजा किस तरह जाए ? स्कूल कालेजों में भी विद्यार्थियों को मन से पढ़ाने वाले शिक्षक मिल सकते हैं, जो ट्यूशन के लालच में स्कूल का काम घर पर ट्यूशन के समय कराने के लिए नहीं छोड़ेंगे बल्कि स्कूल में पूरा कराएँगे | जो किताबी ज्ञान के साथ साथ बच्चों को संस्कारवान भी बना सकते हैं | किन्तु इस सबके लिए आवश्यकता है कि आधुनिक तथाकथित प्रगति की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाए स्कूल कालेजों में भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखते हुए शिक्षा व्यवस्था बनाई जाए जहाँ “फोटोकापी” बनाने के स्थान पर एक योग्य और सुसंस्कृत व्यक्तित्व के विकास की ओर ध्यान दिया जाए | प्रगति तो आवश्यक है, किन्तु उसके लिए अन्धाधुन्ध कुछ भी कर गुज़रना अच्छी बात नहीं | क्योंकि पढ़ाई पैसे से नहीं होती वरन् गुरु में यदि अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण निष्ठा है, अपने विषय का पूर्ण ज्ञान है, शिष्य के प्रति तथा अपने कर्तव्य के प्रति पूरी ईमानदारी का भाव है तब ही वह गुरु लालच का त्याग करके अपना कार्य करेगा |

साथ ही धर्म और आध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों को भी “धर्म” और “आध्यात्मिकता” में अन्तर समझना होगा और धर्मान्धता तथा धर्मोन्माद का त्याग करना होगा | तभी एक ऐसे गुरु को प्राप्त कर सकते हैं जो स्वयं को “भगवान” बताने की अपेक्षा अपने शिष्यों के मानस में ज्ञान रूपी चंद्रमा की धवल ज्योत्स्ना प्रसारित करके अज्ञान रूपी अमावस्या से शिष्य को मुक्ति दिला सके | क्योंकि गुरु केवल शिक्षक ही नहीं होता अपितु माता के समान हम पर ममता का भाव रखते हुए हमें संस्कार भी प्रदान करता है और पिता के समान हमें उचित मार्ग भी दिखाता है | हमारा आत्मबल बढ़ाता है | हमें अपनी अन्तःशक्ति से परिचित कराके उसे विकसित करने के उपाय भी बताता है | साधना का मार्ग सरल बनाता है – फिर चाहे वह साधना आत्मतत्व से साक्षात्कार के लिये हो अथवा धनोपार्जन के योग्य बनने के लिये विद्यालय और कालेजों की शिक्षा की हो | ऐसा हो जाने पर ही गुरु पूर्णिमा का पर्व सार्थक हो पाएगा | और तभी प्रत्येक शिष्य गुरु के प्रति कृतज्ञ भाव से, गुरु के चरणों में श्रद्धानत होकर समर्पित हो सकेगा |

केवल एक दिन गुरु पूजा को उत्सव के रूप में मनाकर हम सब शान्त होकर बैठ जाते हैं अगले वर्ष की प्रतीक्षा में | हमें जीवनपर्यन्त गुरु के उपकारों का स्मरण करना चाहिए | तो आइये एक बार पुनः गुरु के चरणकमलों में सादर अभिवादन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें | जय गुरुदेव…..

गुरुदेव

 

मेघों ने बाँसुरी बजाई

मौसम ने अपनी ही एक पुरानी रचना याद दिला दी:-

मेघों ने बाँसुरी बजाई, झूम उठी पुरवाई रे |

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

उमड़ा स्नेह गगन के मन में, बादल बन कर बरस गया

प्रेमाकुल धरती ने नदियों की बाँहों से परस दिया |

लहरों ने एकतारा छेड़ा, कोयलिया इतराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

बूँदों के दर्पण में कली कली निज रूप निहार रही

धरती हरा घाघरा पहने नित नव कर श्रृंगार रही |

सजी लताएँ, हौले हौले डोल उठी अमराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

अँबुवा की डाली पे सावन के झूले मन को भाते

हर इक राधा पेंग बढ़ाए, और हर कान्हा दे झोंटे |

हर क्षण, प्रतिपल, दसों दिशाएँ लगती हैं मदिराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

15

 

 

 

बहारें

दो तीन दिनों से भारी उमस और बीच बीच में घिर आई घटाओं को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे तेज़ बारिश होगी | पर लगान वाला क़िस्सा हो रहा था… मेघराज झलक दिखलाकर अपनी प्यारी सखी मस्त हवा के पंखों पर सवार हो न जाने कहाँ उड़ जाते थे… पर आख़िरकार आज सुबह कुछ अमृत की बूँदें अपने अमृतघट से छलका ही दीं… मौसम कुछ ख़ुशनुमा हो गया… और इस भीगे मौसम में याद हो आई अपने बचपन की…

भले ही दिल्ली की इन गगनचुम्बी इमारतों में कोयल की पंचम या पपीहे की पियू पियू की पुकारें सुनाई नहीं देतीं… भले ही भँवरे की खरज की गुंजार को कान तरस जाते हैं… भले ही उन रंग बिरंगे छोटे बड़े पंछियों का सितार के तारों की झनकार सी मधुर आवाज़ों में सुरीला राग छिड़ना अब कम हो गया हो… फिर भी बरखा की रिमझिम वो पुरानी यादें तो ताज़ा करा ही देती है…

वो तीन चार महीने की अच्छी धुआंधार बारिश… वो पतनालों से गिरते पानी का किसी गड्ढे में इकट्ठा हो जाना और उसमें कागज़ की नाव बनाकर छोड़ना और ख़ुशी से तालियाँ बजाकर उछलना… स्कूल कॉलेज जाते छाते लेकर तो भी क्या मज़ाल कि भीगने से बच ही जाएँ… मेघराज अपना प्रेम कुछ इस अन्दाज़ में उंडेलते थे कि तन के साथ साथ मन भी भीज भीज जाता था… और भीगने से बचना ही कौन चाहता था…

वो घर से बैग में नमक छिपाकर ले जाना और रास्ते में किसी पेड़ से कच्ची अमियाँ तोड़कर हिलमिल कर नमक के साथ चटखारे लेकर खाते जाना… वो घर वापसी में छाते एक तरफ़ रख पीपल के चबूतरे पर बैठकर आपस में बतियाते हुए अपने बालों के रिबन खोल देना और गीली हवा के साथ अपनी जुल्फों को मस्ती में बहकने देना…

घर पहुँचते ही माँ की मीठी सुरीली रसभरी आवाज़ कानों में पड़ना “पूनम, आ गईं बेटा, आओ देखो हमने कितनी तरह की पकौड़ियाँ बनाई हैं, जल्दी से आ जाओ…” और बैग पटक गीले कपड़ों में ही रसोई में घुस जाना… भले ही पकौड़ियों के साथ माँ की मीठी फटकार भी क्यों न सुननी पड़ जाए “कितनी बार कहा बरसाती ख़रीद लो, पर तुम क्या कभी कुछ सुनोगी ?” फिर पापा की तरफ़ मुख़ातिब हो जाना “और तुम भी… कुछ नहीं कहते इसे… इतना सर चढ़ा रखा है… बीमार पड़ेगी ऐसे भीग कर तो मत बोलना…” और भूरी आँखों वाले पापा का मीठी हँसी हँसकर अपनी बिटिया को गले से लगाकर बोलना “अरी भागवान, चिन्ता मत करो, हमारी बिटिया को कुछ नहीं होगा…” और इसी तरह हँसते बतियाते दिन भर के हमारे कारनामों की जानकारी ले लेना… क्या कुछ याद करें… क्या कुछ भूलें… बहरहाल, उन्हीं दिनों की याद में प्रस्तुत हैं कुछ पंक्तियाँ…

हीरों के हारों सी चमकें फुहारें, और वीणा के तारों सी झनकें फुहारें |

धवल मोतियों सी जो झरती हैं बूँदें, तो पाँवों में पायल सी खनकें फुहारें ||

कोयल की पंचम में मस्ती लुटातीं, तो पपिहे की पीहू में देतीं पुकारें |

कली अनछुई को रिझाने को देखो षडज में ये भँवरे की देतीं गुंजारें ||

मेघों के डमरू की धुन सुनके मस्ती में बहकी हैं जातीं ये चंचल बयारें |

दमकती है बिजली तो भयभीत गोरी सी काँपी हैं जातीं ये चंचल बयारें ||

दिल की उमस से पिघलती हैं बूँदें, और मल्हारें गाती बरसती हैं बूँदें |

धड़कन सी देखो धड़कती हुई और मचलती हुई ये बरसती हैं बूँदें ||

मस्ती भरा मद टपकता है जिनसे, वो आमों की डालों पे लटकी हैं बौरें |

हरेक दिल में मदमस्त जादू जगाती और खुशबू उड़ाती ये लटकी हैं बौरें ||

कहो कैसे कोई उदासी में डूबे, जो मस्ती भरे गीत गाती बहारें |

कि रिमझिम के मीठे नशीले सुरों में हैं कितनी ही तानें सजाती बहारें ||

10

 

रात भर छाए रहे हैं

रात भर छाए रहे हैं, मेघ बौराए रहे हैं

देख बिजली का तड़पना, मेघ इतराए रहे हैं |

बाँध कर बूँदों की पायल, है धरा भी तो मचलती

रस कलश को कर समर्पित, मेघ हर्षाए रहे हैं ||

पहन कर परिधान सतरंगी, धरा भी है ठुमकती

रास धरती का निरख कर, मेघ ललचाए रहे हैं |

तन मुदित, हर मन मुदित, और मस्त सारी चेतना है

थाप देकर धिनक धिन धिन, मेघ लहराए रहे हैं ||

सुर से वर्षा के उमंगती रागिनी मल्हार की है

और पवन की बाँसुरी सुन, मेघ पगलाए रहे हैं |

मस्त नभ निज बाँह भरकर चूमता है इस धरा को

करके जल थल एक देखो, मेघ इठलाए रहे हैं ||

Radiant Cloudy Sky over Sea Water

कहाँ भला ये क्षमता मुझमें

माँ में चन्दा की शीतलता, तो सूरज का तेज भी उसमें ।

हिमगिरि जैसी ऊँची है, तो सागर की गहराई उसमें ।।

शक्ति का भण्डार भरा है, वत्सलता की कोमलता भी ।

भला बुरा सब गर्भ समाती, भेद भाव का बोध न उसमें ।।

बरखा की रिमझिम रिमझिम बून्दों का है वह गान सुनाती ।

नेह अमित है सदा लुटाती, मोती का वरदान भी उसमें ।।

धीरज की प्रतिमा है, चट्टानों सी अडिग सदा वो रहती ।

अपनी छाती से लिपटा कर सहलाने की मृदुता उसमें ।।

मैं हूँ तेरा अंश, तेरे तन मन की ही तो छाया हूँ मैं ।

बून्द अकिंचन को मूरत कर देने की है क्षमता तुझमें ।।

धन्यभाग मेरे, अपने अमृत से तूने सींचा मुझको ।

ऋण तेरा चुकता कर पाऊँ, कहाँ भला ये क्षमता मुझमें ।।

सच, आज जो कुछ भी हम हैं – हमारी माताओं के स्नेह और श्रम का ही परिणाम हैं | माँ से ही हमारी जड़ें मजबूत बनी हुई हैं – ऐसी कि बड़े से बड़े आँधी तूफ़ान भी हमें अपने लक्ष्य से – अपने आदर्शों से – अपने कर्तव्यों से डिगा नहीं सकते | करुणा-विश्वास-क्षमाशीलता की उदात्त भावनाएँ माँ से ही हमें मिली हैं | स्नेह, विश्वास, साहस और क्षमाशीलता  की प्रतिमूर्ति संसार की सभी माताओं को श्रद्धापूर्वक नमन के साथ अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की अपने साथ साथ आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ…

Happy Mother's Day

 

 

मातृ दिवस – मदर्स डे

कल “मदर्स डे” है – यानी कि “मात्तृ दिवस” – हर माँ को सम्मान और आदर देने के लिये हर वर्ष एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मातृदिवस को मनाया जाता है । यों भारत में तो मातृ शक्ति के सम्मान की महान परम्परा आरम्भ से ही रही है | उत्तरी अमेरिका में माताओं को सम्मान देने के लिये अन्ना जारविस ने इस दिवस का आयोजन आरम्भ किया था | यद्यपि वो अविवाहित महिला थी और उनकी अपनी कोई सन्तान भी नहीं थी | लेकिन उनकी माँ ने उन्हें जितना प्यार दिया और जिस प्रकार उनका पालन पोषण किया उस सबसे वे इतनी अधिक प्रभावित और अभिभूत कि अपनी माँ के स्वर्गवास के बाद संसार की समस्त माँओं को सम्मान देने के लिए उनके सच्चे और निस्वार्थ प्यार के प्रतीक के रूप में उन्होंने एक दिन माँ को समर्पित कर दिया, जिसने बाद में इतने बड़े पर्व का रूप ले लिया | अब पूरे विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग तारीखों पर हर वर्ष मातृ दिवस मनाया जाता है | भारत में, इसे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाते हैं |

माँ का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता | केवल एक दिन कोई पर्व मनाकर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कर सकते | लेकिन यदि एक दिन सारा संसार मिलकर माँ के प्यार, देखभाल, कड़ी मेहनत और प्रेरणादायक विचारों का स्मरण करे और इस तथ्य को समझने का प्रयास करे कि हमारे जीवन में वो एक महान इंसान है जिसके बिना हम एक सरल जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, जो हमारे जीवन को अपने प्यार के साथ बहुत आसान बना देती है – तो ऐसे पर्व मनाना वास्तव में एक सार्थक प्रयास है | माँ एक ऐसी देवी होती है जो सन्तान को केवल देना ही जानती है, प्रतिदान की कभी इच्छा नहीं रखती | एक पथप्रदर्शक शक्ति के रूप में सदा हमें आगे बढ़ने में और किसी भी समस्या से साहस के साथ उबरने में हमारी सहायता करती है | इसलिए आज के इस भाग दौड़ के युग में जहाँ पूरा परिवार एक साथ खाने की मेज़ पर भी हर दिन सम्भवतः नहीं मिलता होगा, सन्तान और माता पिता के पारस्परिक सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाने की दिशा में इस प्रकार के पर्वों का आयोजन किया जाना वास्तव में बड़ा सुखद और सार्थक प्रयास है |

तो, मेरी अपनी माँ के साथ साथ संसार की हर माँ को समर्पित हैं कुछ पंक्तियाँ… मदर्स डे की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ…

बेहद खुश थी मैं उस दिन / जब बताया गया था मुझे

बनने वाली हूँ मैं भी एक माँ…

जब पहली बार अहसास हुआ माँ बनने का

प्रतीक्षा कर रही थी बड़ी उत्सुकता से / उस सुखद क्षण की…

और तब अहसास हुआ / तुम भी रही होगी इतनी ही उत्सुक

जब प्रथम बार पता लगा होगा / तुम बनने वाली हो माँ…

कानों में पड़ा बिटिया का प्रथम रुदन

सीने से लगाया बिटिया को अपनी

भीग उठा मन स्नेह और करुणा के अमृत जल से

मानों घाम से जलती देह पर / पड़ गई हो वर्षा की प्रथम बूँद…

तुम्हें भी अहसास हुआ होगा ऐसी ही शान्ति का

जब सुना होगा मेरा प्रथम रुदन / या भरा होगा अंक में मुझे

तभी तो मिलती थी शान्ति मुझे / जब ढँक लेती थीं तुम आँचल से अपने…

बिटिया को देख नैनों से प्रवाहित हो चला था आनन्द का जल

और तब मैंने जाना / क्यों आ जाती थी चमक तुम्हारी आँखों में / मेरी हर बात से…

वात्सल्य से भरा था तुम्हारा अन्तर / भोली थीं तुम / मात्र स्नेह में पगी

पर साथ ही भरी थी व्यावहारिकता भी कूट कूट कर तुममें…

तभी तो खड़ी रहीं अदम्य साहस के साथ / हर परिस्थिति में…

और यही सब सिखाया मुझे भी / कभी स्नेह से / तो कभी क्रोध से…

और क्रोध में भी तुम्हारे / छलकता था करुणा का अथाह समुद्र

मौन में भी सुनाई पड़ता था / तुम्हारे हृदय का वह वात्सल्य गान…

उँगली पकड़ कर चलना सिखाया तुम्हीं ने

घुटनों पर रेंगते रेंगते / कब खड़ी हो गई अपने पाँवों पर

पता ही नहीं लगने दिया तुमने…

नहीं पता कितनी कक्षाएँ पास की थीं तुमने

पर बोलना और पढ़ना लिखना / सिखाया तुम्हीं ने

तुम ही तो हो मेरी सबसे बड़ी शिक्षक / ज्ञान और व्यवहार / दोनों क्षेत्रों में…

गाना तुम्हें नहीं आता था / बाद में पता चला था

पर रातों को मीठी लोरी गाकर / गहन निद्रा में ले जाती तुम्हीं थीं

स्नेह निर्झर बरसाती हुई / सहलाती हुई मेरे सपनों को…

रातों को नींद में / हटा देती जब मैं रजाई अपने ऊपर से

दिन भर थकी संसार के कर्तव्यों से / फिर भी जागकर वापस मुझे ढंकती तुम्हीं थीं…

कितनी थीं दुबली पतली तुम

फिर भी मेरे गिर पड़ने पर / संभालती तुम्हीं थीं…

मैंने देखी हैं / तुम्हारे अन्तर की वेदना से भीगी तुम्हारी आँखें

पर मुझे सदा हँसना सिखाती तुम्हीं थीं…

तुम रहीं सदा स्नेह से पूर्ण / भय और आशंकाओं से रहित

फिर भी मेरे लिए सदा ईश्वर से करती रहतीं प्रार्थना / झोली पसार

न जाने कितने रखतीं व्रत उपवास / आज भी जो हैं मेरे साथ…

मैंने कुछ भी किया / नहीं किया / सफल रही / या असफल

तुम्हारे लिए मैं ही थी / संसार की सबसे अच्छी बच्ची…

क्या सही है क्या ग़लत / तुमने ही बताया इनके मध्य का अन्तर

व्यस्त होते हुए भी / समाज से मिलवाया तुम्हीं ने…

तुमसे ही तो था मेरा अस्तित्व – मेरा सर्वस्व…

तुम्हारे ही अंक से लगकर / ममता की छाँव में / स्नेह के जल से सिंच कर

विकसित हुई थीं मेरी पंखुड़ियाँ…

तुम्हारे ही आँचल की छाया में / पाया था संसार का सारा वैभव मैंने…

आज भी दिल चाहता है / काश तुम्हारी गोदी में सर रखकर सो पाती

गाती तुम लोरी / राहत मिलती थके हुए दिल को मेरे

नहीं है कोई ख़ुशी बढ़कर तुम्हारे आँचल की छाया से माँ

जानती हूँ / तुम्हारे आशीष सदा सदा हैं साथ मेरे

दिखाती हो आज भी मार्ग मुझे आगे बढ़ने का…

लुटाती हो आज भी नेह का रस / मिलता है जिससे साहस / आगे बढ़ने का…

क्योंकि तुम रहो / न रहो / तुम समाई हो मेरे भीतर ही…

क्योंकि तुम्हारा प्रतिरूप ही तो हूँ मैं माँ…

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शुभ प्रभात – बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ

“आज हम जो कुछ भी हैं वो हमारी आज तक की सोच का परिणाम है | इसलिए अपनी सोच ऐसी बनानी चाहिए ताकि क्रोध न आए | क्योंकि हमें अपने क्रोध के लिए दण्ड नहीं मिलता, अपितु क्रोध के कारण दण्ड मिलता है | क्योंकि क्रोध तो एक ऐसा जलता हुआ कोयला है जो दूसरों पर फेंकेंगे तो पहले हमारा हाथ ही जलाएगा | यही कारण है कि हम कितने भी युद्धों में विजय प्राप्त कर लें, जब तक हम स्वयं को वश में नहीं कर सकते तब तक हम विजयी नहीं कहला सकते | इसलिए सर्वप्रथम तो अपने शब्दों पर ध्यान देना चाहिए | भले ही कम बोलें, लेकिन ऐसी वाणी बोलें जिससे प्रेम और शान्ति का सुगन्धित समीर प्रवाहित हो | साथ ही अहंकार, सन्देह और शक़ से व्यक्तिगत सम्बन्धों को आघात पहुँचता है | हम आध्यात्मिकता की कितनी भी बातें पढ़ लें या उन पर चर्चा कर लें, कितने भी मन्त्रों का जाप कर लें, लेकिन जब तक हम उनमें निहित गूढ़ भावनाओं को अपने जीवन का अंग नहीं बनाएँगे तब तक सब व्यर्थ है | इस सबके साथ ही हमें अपने अतीत के स्मरण और भविष्य की चिन्ताओं को भुलाकर अपना वर्तमान सुखद बनाने का प्रयास करना चाहिए | क्योंकि संसार दुखों का घर है, दुख का कारण वासनाएँ हैं, वासनाओं को मारने से दुख दूर होते हैं, वासनाओं को मारने के लिए मानव को अष्टमार्ग अपनाना चाहिये, अष्टमार्ग अर्थात – शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि” – इस प्रकार की जीवनोपयोगी और व्यावहारिक शिक्षाएँ देने वाले भगवान बुद्ध के जन्मदिवस (जो सिद्धार्थ गौतम के रूप में था), बुद्धत्व प्राप्ति (जिस दिन गीर्घ तपश्चर्या के बाद गौतम बुद्ध बने, और इस प्रकार बुद्धत्व प्राप्ति गौतम बुद्ध का नया जन्म था), और महानिर्वाण (मोक्ष) दिवस के रूप में मनाए जाने वाले पर्व बुद्ध पूर्णिमा की सभी को बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ | बुद्ध न केवल बौद्ध सम्प्रदाय के ही प्रवर्तक हैं अपितु भगवान विष्णु के नवम अवतार के रूप में भी भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना की जाती है |

व्यक्ति के आत्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास के लिए बुद्ध ने शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि  के अष्टमार्ग के साथ साथ पाँच बातें और कही हैं:

  • व्यक्ति को मनसा वाचा कर्मणा किसी भी जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए |
  • किसी दूसरे की कोई भी वस्तु उस व्यक्ति से बिना पूछे लेने का अधिकार किसी को नहीं है – जो वस्तु कोई अपने आप प्रेम और सम्मान से दे बस उसी वस्तु को सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए |
  • किसी भी प्रकार के दुराचार अथवा व्यभिचार से बचना चाहिए |
  • असत्य सम्भाषण उचित नहीं है |
  • मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए |

लेकिन इन पाँचों उपदेशों का यह अर्थ कदापि नहीं समझना चाहिए कि बुद्ध अपनी किसी परम्परा या अपने विचारों को व्यक्ति पर थोपना चाहते हैं | सदा से ही हमारे धर्म प्रवर्तक – चाहे वो किसी भी सम्प्रदाय से हों – व्यक्ति को एक ऐसा मार्ग दिखाना चाहते रहे हैं कि व्यक्ति का हर स्तर पर उत्थान हो सके, और अपने सांसारिक कर्तव्य कर्म करते हुए आत्मोत्थान के मार्ग पर अग्रसर होकर मोक्ष अर्थात पूर्ण ज्ञान की स्थिति को प्राप्त हो जाए | बुद्ध के भी इन समस्त उपदेशों का मर्म समझकर “क्या उचित है और क्या अनुचित” ये सब व्यक्ति को स्वयं अपने देश-काल-परिस्थिति के अनुसार पूर्ण सत्यता और ईमानदारी के साथ नियत करना होगा | हाँ, इतना अवश्य है कि बुद्ध के उपदेशों की आत्मा को यदि मानवमात्र ने आत्मसात कर लिया तो हर प्रकार के छल, कपट, युद्ध आदि से संसार को मुक्ति प्राप्त हो सकेगी और शान्त तथा आनन्दित हुआ मानव अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा – अध्यात्म मार्ग अर्थात स्वयं अपने भीतर झाँकने का मार्ग – स्वयं अपनी आत्मा से साक्षात्कार करने का मार्ग | और समस्त भारतीय दर्शनों की मूलभूत भावना यही है |

उदाहरण के लिए बुद्ध ने कायिक, वाचिक, मानसिक किसी भी प्रकार की हिंसा को अनुचित माना है | लेकिन जो लोग सेना में हैं – देश की सुरक्षा के लिए जो कृतसंकल्प हैं – आततायियों को नष्ट करने का उत्तरदायित्व जिनके कन्धों पर है – उनके लिए उस प्रकार की हिंसा ही उचित और कर्तव्य कर्म है, यदि वे पूर्ण रूप से अहिंसा का मार्ग अपना लेंगे तो न केवल वे कायर कहलाएँगे, बल्कि देश की सुरक्षा भी नहीं कर पाएँगे |

बुद्ध ने दुराचार और व्यभिचार से बचने की बात कही | आज जिस प्रकार से महिलाओं के साथ दुराचार और व्यभिचार की घटनाएँ सामने आ रही हैं – यदि अपने घरों में ही हम परिवार का केन्द्र बिन्दु – समाज की आधी आबादी – नारी शक्ति का सम्मान करना सीख जाएँ तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है | बुद्ध ने मदाक पदार्थों से बचने की बात कही – तो क्या केवल नशीली वस्तुओं का सेवन ही मादक पदार्थों का सेवन है ? दूसरों की चुगली करना, दूसरों के कार्यों में विघ्न डालना, आत्मतुष्टि के लिए अकारण ही दूसरों पर सन्देह करना, दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करना, अकारण ही क्रोध करना – ऐसी अनेक बातें हैं जिनकी लत पड़ जाए तो कठिनाई से छूटती है – इस प्रकार के नशों का भी त्याग करने के लिए बुद्ध प्रेरणा देते हैं | हम सभी दोनों “कल” की चिन्ता करते रहते हैं और “आज” को लगभग भुला ही देते हैं – और बीते कल को भुलाने की तथा आने वाले कल को उत्तम बनाने की चेष्टा में अनेकों बार जाने अनजाने असत्य भाषण कर बैठते हैं – जो निश्चित रूप से अनुचित है | हाँ, यदि हमारे असत्य भाषण से कुछ अच्छा परिणाम प्राप्त होने वाला हो तो बात अलग है |

तो, देश काल और परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति को अपने लिए उचित-अनुचित का निर्धारण करना चाहिए | हाँ, इतना प्रयास अवश्य करना चाहिए कि हमारे कर्म ऐसे हों कि जिन्हें करने के बाद हमारे मन में किसी प्रकार के अपराध बोध अथवा पश्चात्ताप की भावना न आने पाए | क्योंकि यदि हमारे मन में किसी बात के लिए अपराध बोध आ गया या किसी प्रकार के पश्चात्ताप की भावना आ गई तो हमें स्वयं से ही घृणा होने लगेगी और तब हम किस प्रकार सुखी रह सकते हैं ? स्वयं को दुखी करना भी एक प्रकार की हिंसा ही तो है | जो व्यक्ति स्वयं ही दुखी होगा वह दूसरे लोगों को सुख किस प्रकार पहुँचा सकता है ? जबकि बुद्ध के इन उपदेशों का मूलभूत उद्देश्य ही है मानव मात्र की प्रसन्नता – मानव मात्र का सुख…

युग के महान अवतार भगवान बुद्ध की महान शिक्षाओं को ध्यान में रखकर हम सब अपनी अपनी उन्नति के मार्ग पर इस प्रकार आगे बढ़ते जाएँ कि हमारे साथ दूसरों की भी उन्नति हो – इसी कामना के साथ एक बार फिर सभी को बुद्ध जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…