Category Archives: सम सामयिक

होली है

टेसू – प्रेम और प्यार का रंग

कल यानी आठ मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है – सशक्त नारी शक्ति को बधाई और शुभकामनाएँ… इस कामना के साथ कि अभी भी जो महिलाएँ दुर्बल हैं उन्हें सशक्त बनाने में उनकी मदद करेंगे…

इसके साथ ही नौ व दस मार्च को होली का रंगारंग त्यौहार – कोरोना के डर ने जिसके रंग फीके कर दिए हैं | लेकिन कोरोना से डरने के बजाए यदि सुरक्षात्मक उपाय – जैसे बाहर भीतर सफाई रखना, घर का बना सन्तुलित आहार लेना – इत्यादि का पालन किया जाए तो कोरोना ही क्या, कोई भी वायरस डरकर दूर भाग जाएगा | वैसे भी पारम्परिक रूप से यदि होली का त्यौहार मनाया जाए तो किसी भी तरह के वायरस अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं | जैसे होलिका दहन की अग्नि यज्ञ की सामग्री से प्रज्वलित करने की प्रथा रही है | यज्ञ की सामग्री में सभी प्रकार के कीटाणु समाप्त करने की क्षमता होती है – सम्भवतः इसीलिए हमारे पूर्वज इस प्रथा का पालन करते थे | साथ ही, जिन टेसू के पूलों को पकाकर उनके रंग से होली खेली जाती थी उनमें भी बहुत से गुण हैं |

टेसू को कई नामों से जाना जाता है : पलाश, परसा, ढाक, किंशुक (इनका आकार तोते की लाल चोंच सा होने के कारण इन्हें संस्कृत में किंशुक – कहीं ये तोता तो नहीं ? कहा जाता है) वग़ैरा वग़ैरा | इसे “जंगल की आग” भी कहा जाता है | संस्कृत साहित्य में बड़ा ख़ूबसूरत प्रयोग कई जगहों पर इस “जंगल की आग” का हुआ है – ख़ासतौर पर प्रेम के उद्दीपन और विरह के वर्णनों में | इसके अतिरिक्त, जब तक उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश में शामिल था तब तक ब्रह्मकमल उत्तर प्रदेश का राज्य पुष्प कहलाता था, उसके बाद से टेसू का पुष्प उत्तर प्रदेश का राज्य पुष्प घोषित किया गया | ये तो एक पेड़ होता है, इसी नाम की एक लता भी है जिस पर भी सफेद और लाल दोनों फूल आते हैं और उसे लता पलाश कहते हैं और उससे आयुर्वेदिक औषधियाँ बनाई जाती हैं |

इसका वर्णन वैदिक काल से ही उपलब्ध होता है तथा इसे पवित्र वृक्ष माना जाता है | श्रौतसूत्रों में कई यज्ञपात्र इसी की लकड़ी से बनाए जाने का वर्णन है | उपनयन के समय भी इसी की लकड़ी का दण्ड ब्रह्मचारी को दिया जाता था | और संस्कृत तथा हिन्दी के कवियों ने तो इसके सौन्दर्य पर न जाने कितनी रचनाएँ रच दी हैं |

माघ मास की समाप्ति पर ठण्ड की विदाई के साथ जब वसन्त ऋतु का आगमन होता है उस समय मानों ऋतुराज के स्वागत हेतु समस्त धरा अपने हरे घाघरे के साथ पलाश के पीत पुष्पों की चूनर ओढ़ लेती है और वृक्षों की टहनियों रूपी अपने हाथों में ढाक के इन श्वेत पुष्पों के चन्दन से ऋतुराज के माथे पर तिलक लगाकर लाल पुष्पों के दीपों से कामदेव के प्रिय मित्र का आरता उतारती है | वास्तव में अत्यन्त मनोहारी दृश्य होता है यह | होली के मौसम में जब टेसू के वृक्ष रक्तपुष्पों से लद जाते हैं तब ऐसा जान पड़ता है जैसे होली की उत्सव में मुख्य अतिथि ये ही हैं | प्रकृति नटी के चतुर चितेरे कालिदास को तो वसन्त ऋतु में पवन के झोंकों से हिलती हुई पलाश की टहनियाँ वन में धधक उठी दावानल की लपटों जैसी प्रतीत होती हैं और इनसे घिरी हुई धरा ऐसी प्रतीत होती है मानो रक्तिम वस्त्रों में लिपटी कोई नववधू हो |

टेसू के पुष्पों का केवल वैदिक या सांस्कृतिक महत्त्व हो ऐसा भी नहीं है | इनका आयुर्वेद की दृष्टि से भी अत्यन्त होलीमहत्त्व है | टेसू के पेड़ के लाल फूल जिनसे होली का रंग बनता है उन्हें भी इंफेक्शन वग़ैरा दूर करने वाला माना जाता है | इसके अलावा, कहते हैं इसके पानी में स्नान करने से गर्मी दूर भागती है और ताज़गी का अहसास होता | ब्यूटी प्रोडक्ट्स में इसका उपयोग होता है | माना जाता है कि बहुत से चर्मरोग दूर करने में इसका पानी लाभ पहुँचाता है | कषैले और चरपरे स्वाद का यह वृक्ष तथा इसके सभी अंग ज्वर तथा कृमिनाशक होते हैं | खाँसी कफ इत्यादि में लाभदायक होता है |

तो इसलिए, क्यों न कोरोना से भयभीत हुए बिना टेसू के रंग में प्रेम और प्यार के रंगों को मिलाकर उनमें सराबोर होकर होली की मस्ती में डूब जाएँ…

होली है, हुडदंग मचा लो, सारे बन्धन तोड़ दो |

और नियम संयम की सारी आज दीवारें तोड़ दो ||

कैसा नखरा, किसका नखरा, आज सभी को रंग डालो |

जो होगा देखा जाएगा, आज न रंग में भंग डालो ||

माना गोरी सर से पल्ला खिसकाके देगी गाली

तीखी धार कटारी की है, मत समझो भोली भाली |

पर टेसू के रंग में इसको सराबोर तुम आज करो

शहद पगी गाली के बदले मुख गुलाल से लाल करो ||

पूरा बरस दबा रक्खी थी साध, उसे पूरी कर लो

जी भरके गाली दो, मन की हर कालिख़ बाहर फेंको ||

नहीं कोई है रीत, नहीं है कोई बन्दिश होली में

मन को जिसमें ख़ुशी मिले, बस ऐसी तुम मस्ती भर लो ||

जो रूठा हो, आगे बढ़के उसको गले लगा लो आज

बाँहों में भरके आँखों से मन की तुम कह डालो आज |

शरम हया की बात करो मत, बन्धन ढीले आज करो

नाचो गाओ धूम मचाओ, पिचकारी में रंग भरो ||

गोरी चाहे प्यार के रंग में रंगना, उसका मान रखो

कान्हा चाहे निज बाँहों में भरना, उसका दिल रख लो |

डालो ऐसा रंग, न छूटे बार बार जो धुलकर भी

तन मन पुलकित हो, कुछ ऐसा प्रेम प्यार का रंग भर दो ||

सभी के जीवन में सुख, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, स्वास्थ्य, प्रेम, उल्लास और हर्ष के इन्द्रधनुषी रंग बिखरते रहें, इसी भावना के साथ सभी को महिला दिवस के साथ साथ अबीर की चमक, गुलाल के रंग और टेसू की भीनी भीनी ख़ुशबू से युक्त रंग और सुगन्ध के पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2020/03/07/tesu-the-colour-of-love-and-affection/

रंग की एकादशी – कुछ भूली बिसरी यादें

आज फाल्गुन शुक्ल एकादशी है, जिसे आमलकी एकादशी और रंग की एकादशी के नाम से भी जाना जाता है | इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा अर्चना के साथ ही रंगों का पर्व होली अपने यौवन में पहुँचने की तैयारी में होता है | बृज में जहाँ होलाष्टक यानी फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होली के उत्सव का आरम्भ हो जाता है वहीं काशी विश्वनाथ मन्दिर में फाल्गुन शुक्ल एकादशी से इस उत्सव का आरम्भ माना जाता है | होलाष्टक के विषय में जहाँ मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को भगवान कृष्ण प्रथम बार राधा जी के परिवार से मिलने बरसाने गए थे तो वहाँ लड्डू बाँटे गए थे, वहीं काशी विश्वनाथ में रंग की एकादशी के विषय में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माता पार्वती को अपने घर लिवा लाने के लिए पर्वतराज हिमालय की नगरी की ओर प्रस्थान किया था |

होलाष्टक के विषय में बहुत सी कथाएँ और मान्यताएँ जन साधारण के मध्य प्रचलित हैं, किन्तु मान्यताएँ कुछ भी हों, कथाएँ कितनी भी हों, सत्य बस यही है कि होली का उत्साहपूर्ण रंगपर्व ऐसे समय आरम्भ होता है जब सर्दी धीरे धीरे पीछे खिसक रही होती है और गर्मी चुपके से अपने पैर आगे बढ़ाने की ताक में होती है | साथ में वसन्त की खुमारी हर किसी के सर चढ़ी होती है | फिर भला हर कोई मस्ती में भर झूम क्यों न उठेगा | कोई विरह वियोगी ही होगा जो ऐसे मदमस्त कर देने वाले मौसम में भी एक कोने में सूना सूखा और चुपचाप खड़ा रह जाएगा |

अपने पैतृक नगर की होली अक्सर याद आ जाती है | हमारे शहर में मालिनी नदी के पार छोटी सी बस्ती थी | रंगपंचमी यानी फाल्गुन शुक्ल पंचमी से रात को भोजन आदि से निवृत होकर सब लोग चौपाल में इकट्ठा हो जाते थे | रात को सारंगी और बाँसुरी से काफी पीलू के सुर उभरने शुरू होते, धीरे धीरे खड़ताल खड़कनी शुरू होती, चिमटे चिमटने शुरू होते, मँजीरे झनकने की आवाज़ें कानों में आतीं और साथ में धुनुकनी शुरू होतीं ढोलकें धमार, चौताल, ध्रुपद या कहरवा की लय पर – फिर धीरे धीरे कंठस्वर उनमें मिल जाते और आधी रात के भी बाद तक काफी, बिरहा, चैती, फाग, धमार, ध्रुपद, रसिया और उलटबांसियों के साथ ही स्वांग का जो दौर चलता तो अपने अपने घरों में बिस्तरों में दुबके लोग भी अपना सुर मिला देते | हमारे पिताजी को अक्सर वे लोग साथ में ले जाया करते थे तो जब पिताजी वापस लौटते थे तो वही सब गुनगुनाते कब में घर की सीढ़ियाँ चढ़ जाते थे उन्हें कुछ होश ही नहीं रहता था | और ऐसा नहीं था कि उस चौपाल में गाने बजाने वाले लोग कलाकार होते थे | सीधे सादे ग्रामीण किसान होते थे, पर होली की मस्ती जो कुछ उनसे प्रदर्शन करा देती थी वह लाजवाब होता था और इस तरह फ़जां में घुल मिल जाता था कि रात भर ठीक से नींद पूरी न होने पर भी किसी को कोई शिकायत नहीं होती थी, उल्टे फिर से उसी रंग और रसभरी रात का इंतज़ार होता था | तो ऐसा असर होता है इस पर्व में |

और रंग की एकादशी से तो सारे स्कूल कालेजों और शायद ऑफिसेज़ की भी होली की छुट्टियाँ ही हो जाया करती थीं | फिर तो हर रोज़ बस होली का हुडदंग मचा करता था | रंग की एकादशी को हर कोई स्कूल कॉलेज ज़रूर जाता था – अपने दोस्तों और टीचर्स के साथ होली खेले बिना भला कैसा रहा जा सकता था ? और टीचर्स भी बड़े जोश के साथ अपने स्टूडेंट्स के साथ उस दिन होली खेलते थे |

घरों में होली के पकवान बनने शुरू हो जाया करते थे | होलिका दहन के स्थल पर जो अष्टमी के दिन होलिका और प्रहलाद के प्रतीकस्वरूप दो दण्ड स्थापित किये गए थे अब उनके चारों ओर वृक्षों से गिरे हुए सूखे पत्तों, टहनियों, लकड़ियों आदि के ढेर तथा बुरकल्लों की मालाओं आदि को इकठ्ठा किया जाने का कार्यक्रम शुरू हो जाता था | ध्यान ये रखा जाता था कि अनावश्यक रूप से किसी पेड़ को न काटा जाए | हाँ शरारत के लिए किसी दोस्त के घर का मूढा कुर्सी या चारपाई या किसी के घर का दरवाज़ा होली की भेंट चढ़ाने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होती थी | और ये कार्य लड़कियाँ नहीं करती थीं | विशेष रूप से हर लड़का हर दूसरे लड़के के घर के दरवाज़े और फर्नीचर पर अपना मालिकाना हक समझता था और होलिका माता को अर्पण कर देना अपना परम कर्त्तव्य तथा पुण्य कर्म समझता था | और इसी गहमागहमी में आ जाता था होलिकादहन का पावन मुहूर्त |

गन्ने के किनारों पर जौ की बालियाँ लपेट कर घर के पुरुष प्रज्वलित होलिका की परिक्रमा करते हुए आहुति देते थे और होलिका की अग्नि में भुने हुए इस गन्ने को प्रसादस्वरूप वितरित करते थे | अगली सुबह होलिका की अग्नि से हर घर का चूल्हा जलता था | रात भर होलिका की अग्नि पर टेसू के फूलों का रंग पकता था जो सुबह सुबह कुछ विशिष्ट परिवारों में भेजा जाता था और बाक़ी बचा रंग बड़े बड़े ड्रमों में भरकर होली के जुलूस में ले जाया जाता था और हर आते जाते को उस रंग से सराबोर किया जाता था | गुनगुना मन को लुभाने वाली ख़ुशबू वाला टेसू के फूलों का रंग जब घर में आता तो पूरा घर ही एक नशीली सी ख़ुशबू से महक उठता |

दोपहर को इधर सब नहा धोकर तैयार होते और उधर होली पर बना देसी घी का सूजी का गरमा गरमा हलवा प्रसाद के रूप में हर घर में पहुँचा दिया जाता | हलवे का प्रसाद ग्रहण करके और भोजनादि से निवृत्त होकर नए वस्त्र पहन कर शाम को सब एक दूसरे के घर होली मिलने जाते | अब त्यौहार आता अपने समापन की ओर | नजीबाबाद जैसे सांस्कृतिक विरासत के धनी शहर में भला कोई पर्व संगीत और साहित्य संगोष्ठी से अछूता रहा जाए ऐसा कैसे सम्भव था ? तो रात को संगीत और कवि गोष्ठियों का आयोजन होता जो अगली सुबह छह सात बजे जाकर सम्पन्न होता | रात भर चाय, गुझिया, समोसे, दही भल्ले पपड़ी चाट के दौर भी चलते रहते | यानी रंग की पञ्चमी से जो होली के गान का आरम्भ होता उसका उत्साह बढ़ते बढ़ते होलाष्टक तक अपने शैशव को पार करता हुआ रंग की एकादशी को किशोरावस्था को प्राप्त होकर होली आते आते पूर्ण युवा हो जाता था |

आज जब हर तरफ एक अजीब सी अफरातफरी का माहौल बना हुआ है, एक दूसरे पर जैसे किसी को भरोसा ही नहीं रहा गया है, ऐसे में याद आते हैं वे दिन… याद आते हैं वे लोग… उन्हीं दिनों और उन्हीं लोगों का स्मरण करते हुए, सभी को कल रंग की एकादशी के साथ ही अग्रिम रूप से होली की रंग भरी… उमंग भरी… हार्दिक शुभकामनाएँ… इन पंक्तियों के साथ…

जिससे यह तन मन रंग जाए ऐसा कोई रंग भरो तो |

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

यह दीवार घृणा की ऊँची आसमान तक खड़ी हुई है

भू पर ही जन जन में भू नभ जैसी दूरी पड़ी हुई है |

आँगन समतल करो, ढहाने का इसके कुछ ढंग करो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

दुर्भावों का हिरणाकश्यप घेर रहा है सबके मन को

विषम होलिका लिपट रही है इस पावन प्रहलाद के तन को

सच पर आँच नहीं आएगी, जला असत्य अपंग करो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

मुख गुलाल से लाल हुआ है, किन्तु न मन अनुराग रंगा है

रंग से केवल तन भीगा है, मन तो बिल्कुल ही सूखा है |

दुगुना होगा असर, नियम संयम की सच्ची गंध भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

एक दूसरे पर आरोपों की कीचड़ क्यों उछल रही है

पिचकारी से रंग के बदले नफ़रत ही क्यों निकल रही है |

ये बेशर्म ठिठोली छोड़ो, मधुर हास्य के व्यंग्य भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

खींचे कोई घूँघट का पट, हाथ पकड़ कर नीचे कर दो

मत रोको गोरी के मग को, उसे नेह आदर से भर दो |

राधा स्वयं चली आएगी, सरस श्याम का रंग भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

भीतर से यदि नहीं रंगा तो मिट्टी है मिट्टी का चोला

दुनिया का यह वैभव क्या है, हिम से ढका आग का गोला |

वहम और सन्देह तजो सब, मन में नई उमंग भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2020/03/06/ekadashi-of-colours-some-forgotten-memories/

 

 

आस्था बनाम श्रद्धा

हम  लोग  प्रायः  आस्था  और  अंध  श्रद्धा  में  भेद  करना  भूल  जाते  हैं,   इसी  विषय  पर  प्रस्तुत  है  डॉ  दिनेश  शर्मा  का  एक  लेख… बड़ी  अच्छी  तरह  इस  लेख  में  डॉ  शर्मा  ने  इस  बात  को  बताने  का  प्रयास  किया  है…

आस्था बनाम अंध श्रद्धा

डॉ दिनेश शर्मा

आज सुबह ही सोसायटी पार्क में कुछ मित्रों से बड़ी सार्थक चर्चा फेथ यानी आस्था को लेकर हुई । इधर उधर के मज़ाक और कुछ जेल के अंदर और बाहर बाबाओं की चर्चा करते करते कुछ कमाल के निष्कर्ष भी निकले । हम मनुष्यों के पास जीवन की अनसरटेनिटी या अनिश्चितता से पार पाने के लिए आस्था या फेथ का ही सबसे बड़ा सहारा होता है । वो चाहे किसी गुरु में हो, मंदिर गुरुद्वारे में हो , अपने पूजा घर में हो, किसी प्रसिद्ध तीर्थ स्थान में हो या अपनी खुद की प्रार्थनाओं में हो । हमारी आस्था या फेथ कब अंधी श्रद्धा में बदल जाती है, हमें पता ही नही लगता ।

आपको जानकर अजीब लगेगा कि ज़रूरी नही यह आस्था या फेथ किसी देवता या मंदिर ही में हो । यह किसी कॉर्पोरेशन, पोलिटिकल सिस्टम या पोलिटिकल पर्सन में भी हो सकती है । पिछले सात दशकों से चीन के लोगों ने कम्युनिज़्म को ही धर्म मानकर उसमे फेथ या आस्था रखते हुए बड़े गज़ब की तरक्की की है और आज चीन दुनिया का सबसे धनी और ताकतवर देश बन गया है । आप सब को तो पता ही है चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने सत्तर वर्ष पहले ही किसी भी प्रकार के धर्म और धार्मिक पूजा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था । चीनियों ने धीरे धीरे माओत्से तुंग और कम्युनिस्ट पार्टी में ही सम्पूर्ण आस्था स्थापित कर दी । उइगर में मुसलमानों को किसी भी प्रकार की धार्मिक अभियक्ति जैसे रोज़ा नमाज़ से रोकना उसी नीति का हिस्सा है ।

हम में से ज्यादातर लोगों की प्रवृत्ति जानने के बजाय मानने की होती है । और यहीं से अंध श्रद्धा पैदा होनी शुरू होती है । जैसे मैं आपसे कहूँ कि ऋषिकेश में एक मनोकामना सिद्ध हनुमान जी का मंदिर है जहाँ कोई भी मन्नत मांगने से पूरी हो जाती है । तो यदि आप किसी बात को लेकर परेशान या चिंतित है और आपका कोई काम अटका हुआ है तो आप बिना ज्यादा विचार के वहां जाने को तत्पर हो जाएंगे । इसे ही मानना कहते है । ज्यादातर लोग ऐसा ही करते है । कोई ही बिरला होता है जो यह कहेगा कि भाई मेरे हनुमान जी तो मेरे अपने भीतर है , मुझे कहीं जाने की क्या ज़रूरत है ।

आज गुरुओं के डेरे हों या बाबाओं के आश्रम, यहां वहां के तीर्थ स्थल हों या साल दर साल बढ़ती कांवड़ियों की भीड़ इनके सबके पीछे ‘गतानुगता’ वाली अंध श्रद्धा ही है । यानि के तुम गए थे तो हम भी जाएंगे । एक मित्र ने एक बड़ा अच्छा उदाहरण दिया कि रेलवे लाइन के ऊपर बने पुल पर अगर चार आदमी इकट्ठे होकर नीचे झांकना शुरू कर दें, तो थोड़ी देर में वहां सैंकड़ो की भीड़ लग जाएगी, स्कूटर कारें रुक जाएंगी और सब लोग एक दूसरे की देखा देखी नीचे झांकना शुरू कर देंगे ।

यह भी ‘अंध श्रद्धा’ का ही एक रूप है ।

प्यार भरे कुछ दीप जलाओ

प्यार भरे कुछ दीप जलाओ

दीपमालिका का प्रकाशमय पर्व बस आने ही वाला है… कल करवाचौथ के साथ उसका आरम्भ तो हो ही जाएगा… यों तो श्रद्धापर्व का श्राद्ध पक्ष बीतते ही नवरात्रों के साथ त्यौहारों की मस्ती और भागमभाग शुरू हो जाती है… तो आइये हम सभी स्नेहपगी बाती के प्रकाश से युक्त मन के दीप प्रज्वलित करते हुए मतवाले गीतों से कण कण को पुलकित करते हुए स्वागत करें प्रकाशोत्सव का…

माटी के ये दीप जलाने से क्या होगा

जला सको तो प्यार भरे कुछ दीप जलाओ |

वीराने में फूल खिलाने से क्या होगा

खिला सको तो हर घर में कुछ पुष्प खिलाओ ||

माटी का दीपक तो क्षणभँगुर होता है

किन्तु प्रेम का दीपक अजर अमर होता है |

स्नेहरहित बाती उकसाने से क्या होगा

बढ़ा सको तो पहले उसमें स्नेह बढ़ाओ ||

वीराने में खिला पुष्प किसने देखा है

मन के आँगन में हर पल मेला रहता है |

बिना खाद पौधा लगवाने से क्या होगा

मिला सको तो प्रेम प्रीत की खाद मिलाओ ||

टूटे तारों की वीणा से कब निकला है

कजरी बिरहा या फिर मेघ मल्हार निराला |

इन टूटे तारों को छूने से क्या होगा

जुड़ा सको तो झनकाते कुछ तार जुड़ाओ ||

किसी कथा से कोई उपन्यास बनता है

लेकिन कौन उसे कब पूरा सुन पाता है |

कोरा एक निबन्ध बनाने से क्या होगा

सुना सको तो मतवाले कुछ गीत सुनाओ ||

करवाचौथ – करक चतुर्थी

करवाचौथ व्रत

हम सभी परिचित हैं कि भारत के उत्तरी और पश्चिमी अंचलों में कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को करवाचौथ व्रत अथवा करक चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है | इस वर्ष गुरुवार 17 अक्तूबर को पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना से महिलाएँ करवाचौथ के व्रत का पालन करेंगी | करवाचौथ के व्रत का पारायण उस समय किया जाता है जब चन्द्रदर्शन के समय चतुर्थी तिथि रहे | इसीलिए यदि प्रातःकाल से चतुर्थी तिथि नहीं भी हो तो प्रायः तृतीया में व्रत रखकर तृतीया-चतुर्थी के सन्धिकाल – प्रदोष काल – में पूजा अर्चना का विधान है | कुछ स्थानों पर निशीथ काल – मध्य रात्रि – में भी करवा चौथ की पूजा अर्चना की जाती है | इस अवसर पर अन्य देवी देवताओं के साथ शिव परिवार की पूजा अर्चना की जाती है | इस वर्ष सौभाग्य से 17 तारीख को प्रातः 6:48 से लेकर 18 तारीख को 7:29 तक चतुर्थी तिथि ही रहेगी | भारत के विभिन्न भागों में 17 तारीख को रात्रि 7:41 से 8:19 के मध्य चन्द्रमा का उदय होने की सम्भावना | दिल्ली में आठ बजकर सोलह मिनट पर चन्दोदय होगा | पूजा का मुहूर्त सायंकाल 5:50 से 6:59 तक है |

ऐसी मान्यता है कि सती ने अपने पति शिव के अपमान का बदला लेने के लिए अपने पिता दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने हेतु उनके यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया था | उसके बाद वे महाराज हिमालय की पुत्री के रूप में उनकी पत्नी मैना के गर्भ से पार्वती के रूप में उत्पन्न हुईं | उस समय भगवान शंकर को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए बहुत से अन्य उपवासों के साथ इस व्रत का भी पालन किया था | अतः यह व्रत और इसकी पूजा शिव-पार्वती को समर्पित होती है |

करवाचौथ एक आँचलिक पर्व है और उन अंचलों में इसके सम्बन्ध में बहुत सी कथाएँ प्रचलित हैं, व्रत के दौरान जिनका श्रवण सौभाग्यवती महिलाएँ करती हैं | उन सबमें महाभारत की एक कथा हमें विशेष रूप से आकर्षित करती है | इसके अनुसार अर्जुन शक्तिशाली अस्त्र प्राप्त करने के उद्देश्य से पर्वतों में तपस्या करने चले गए और बहुत समय तक वापस नहीं लौटे | द्रौपदी इस बात से बहुत चिन्तित थीं | तब भगवान कृष्ण ने उन्हें पार्वती के व्रत की कथा सुनाकर कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी थी |

करवाचौथ का पालन उत्तर भारत में प्रायः सभी विवाहित हिन्दू महिलाएँ चिर सौभाग्य की कामना से करती हैं और करवाचौथजिसमें पार्वती तथा गणेश की पूजा का विधान है | इस व्रत को पार्वती की तपस्या का प्रतीक भी माना जाता है | कुछ स्थानों पर उन लड़कियों से भी यह व्रत कराया जाता है जो विवाह योग्य होती हैं अथवा जिनका विवाह तय हो चुका है | यह व्रत पारिवारिक परम्पराओं तथा स्थानीय रीति रिवाज़ के अनुसार किया जाता है | व्रत की कहानियाँ भी अलग अलग हैं | लेकिन कहानी कोई भी हो, एक बात हर कहानी में समान है कि बहन को व्रत में भूखा प्यासा देख भाइयों ने नकली चाँद दिखाकर बहन को व्रत का पारायण करा दिया, जिसके फलस्वरूप उसके पति के साथ अशुभ घटना घट गई |

कथा एक लोक कथा ही है | किन्तु इस लोक कथा में इस विशेष दुर्घटना का चित्र खींचकर एक बात पर विशेष रूप से बल दिया गया है कि जिस दिन व्यक्ति नियम संयम और धैर्य का पालन करना छोड़ देगा उसी दिन से उसके कार्यों में बाधा पड़नी आरम्भ हो जाएगी | नियमों का धैर्य के साथ पालन करते हुए यदि कार्यरत रहे तो समय अनुकूल बना रह सकता है |

हम सभी नियम संयम की डोर को मज़बूती से थामे हुए सोच विचार कर हर कार्य करते हुए आगे बढ़ते रहें, इसी कामना के साथ सभी महिलाओं को करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/15/karvachauth-vrat/

 

शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा

रविवार तेरह अक्तूबर को आश्विन मास की पूर्णिमा, जिसे शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है का मोहक पर्व है | और इसके साथ ही पन्द्रह दिनों बाद आने वाले दीपोत्सव की चहल पहल आरम्भ हो जाएगी | आज अर्द्धरात्र्योत्तर 12:36 पर पूर्णिमा तिथि आरम्भ होगी और कल अर्द्धरात्र्योत्तर 2:38 तक रहेगी | देश के अलग अलग भागों में इस पर्व की धूम रहती है और इसे रास पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा, नवान्न पूर्णिमा, कुमुद्वती तथा कुमार पूर्णिमा आदि अनेकों नामों से जाना जाता है | आज ही के दिन महर्षि वाल्मीकि का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है | सभी को शरद पूर्णिमा तथा वाल्मीकि जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ इस आशा के साथ कि हम सभी का जीवन शरद पूर्णिमा के चाँद जैसा प्रफुल्लित रहे…

यों हिन्दू मान्यता के अनुसार हर माह की पूर्णिमा महत्त्वपूर्ण होती हैं | लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्त्व इस मान्यता के कारण और अधिक बढ़ जाता है कि आज के दिन चन्द्रमा पृथिवी के इतने अधिक निकट होता है कि उसकी किरणों के सारे जीवन रक्षक पौष्टिक तत्व पृथिवीवासियों को उपलब्ध हो जाते हैं | एक ओर तो वर्षा ऋतु बीत जाती है | मेघराज भी अपनी टोली के साथ इन्द्रलोक को वापस लौट जाते हैं | उनके साथ ही उनकी प्रेयसि नृत्यांगना दामिनी भी अपने बरखा की बूँदों के घुँघरूओं को झनकाती फिर से वापस लौटने का वादा कर अपने महल की ओर प्रस्थान कर जाती हैं | शरद ऋतु के स्वागत में धवल चन्द्रिका की शीतल प्रकाश गंगा में डुबकी लगाकर चन्द्रकिरणों की अठखेलियों से रोमांचित हुआ आकाश पूर्ण रूप से स्वच्छ और विशाल दिखाई देने लगता है | निश्चित रूप से आज की रात चन्द्रदेव अपनी समस्त पौष्टिकता अपनी किरणों के माध्यम से समस्त जड़ चेतन पर लुटाने को तत्पर रहते हैं | इसीलिए आज की रात अधिकाँश लोग घरों के आँगन में या कहीं भी खुले स्थान में रात बिताना अधिक पसन्द करते हैं – ताकि चन्द्रमा की उन पौष्टिक किरणों में अच्छी तरह स्नान करके स्वयं को पुनः ऊर्जावान अनुभव कर सकें |

इसीलिए तो ऐसी लोकमान्यताएँ हैं कि आज के दिन चन्द्रमा को एकटक कुछ देर के लिए निहारते रहने से नेत्रज्योति में वृद्धि होती है | हमारी आयु के लोगों को अपना बचपन भी याद अवश्य होगा जब हममें से अधिकाँश घरों में माताएँ हम सबके हाथों में सुई धागा पकड़ा कर आँगन में चन्दा की चाँदनी में बैठा दिया करती थीं सुई में धागा डालने के लिए और हमसे कहा जाता था कि आज के दिन चन्द्रमा के प्रकाश में सुई में धागा डालोगे तो आँखों की रोशनी अच्छी बनी रहेगी | और वास्तव में इतना स्पष्ट और आँखों के रास्ते मन में उतर कर समूचे व्यक्तित्व को आह्लाद की सरिता में स्नान कराके रोमांचित कर देने वाला प्रकाश शरद पूर्णिमा के उजले चाँद का होता था कि अन्य किसी भी प्रकाश की आवश्यकता ही नहीं होती थी | बड़े आराम से चाँद के शीतल प्रकाश की चादर में लिपटे सुई में धागा डाल देते थे और काफ़ी समय तक यही खेल चलता रहता था – जब तक कि माँ की मीठी झिडकियाँ कानों में सुनाई देनी आरम्भ नहीं हो जाती थीं “अरे अब चलकर सो जाओ | मैंने खेल करने को नहीं कहा था, बस एक बार धागा डालना था और बस – पर तुम लोगों को तो हर काम में खेल चाहिए | चलो सोने के लिए जाओ – सुबह उठकर पढ़ाई नहीं करनी क्या ?” उत्सव की रुत में पढ़ाई का नाम सुनकर वैसे ही बच्चों को खुन्दक आ जाती थी – सो बेमन से जाकर लेट जाते थे अपने बिस्तरों पर – आँखों में शीतल चाँदनी लुटाते उस धवल मनोहारी शरद के पूर्ण चन्द्र की छवि को बसाए |

प्रातः दैनिक कर्मों से निवृत्त होने के बाद घर भर को दूध में भीगे चोले (पोहा) प्रसाद के रूप में नाश्ते में दिए जाते थे | रात को माँ दूध में चोले भिगाकर बाहर आँगन में चाँद की चाँदनी के नीचे छींके पर लटका दिया करती थीं | प्रायः हर घर में ऐसा होता था | माना जाता था कि आज रात की चाँद की किरणों के समस्त पौष्टिक तत्व इन चोलों में घुल मिल जाएँगे | और वास्तव में सुबह जब हम उन्हें खाते थे तो इतने शीतल और अमृततुल्य स्वाद से युक्त होते थे कि मन ही नहीं भरता था | इन सभी मान्यताओं में सम्भव है कहीं न कहीं कुछ न कुछ वैज्ञानिक तथ्य अवश्य रहा होगा |

ये तो थी शरद पूर्णिमा के पर्व से जुड़े कुछ ख़ूबसूरत से लोक रिवाज़ों की बात | कृष्ण भक्तों के लिए शरद पूर्णिमा की रात्रि का कितना अधिक और विशेष महत्त्व है ये सभी जानते हैं | आज रात को ही भगवान कृष्ण अपनी महाशक्ति राधा सहित समस्त गोपियों के साथ महारास रचाते हैं | कितना आकर्षक दृश्य रहा होगा जब हर गोपी को उसके प्यारे कन्हाई अपने साथ नृत्य करते जान पड़े होंगे | लेकिन ये रास केवल एक युग का ही रास नहीं है, अनन्त युगों से चला आ रहा है और युगों युगों तक चलता रहेगा |

जो लोग कृष्ण को केवल रास रचैया भर मानते हैं वास्तव में वे लोग रास के अर्थ तथा मर्म को ही भली भाँति नहीं समझ पाए हैं | कृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य करना कोई साधारण घटना नहीं है | भाव, ताल, नृत्य, छन्द, गीत, शरद पूर्णिमारूपक एवं लीलाभिनय से युक्त यह रास – जिसमें रस का उद्भव मन से होता है तथा जो पूर्ण रूप से अलौकिक और आध्यात्मिक है – वैष्णव परम्पराओं से लेकर जैन परम्पराओं तक समस्त चिन्तन परम्पराओं में ज्ञान का आलोक लेकर आया | समस्त ब्रह्माण्ड में जो विराट नृत्य चल रहा है प्रकृति और पुरुष (परमात्मा) का, श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य उस विराट नृत्य की ही तो एक झलक है । उस रास में किसी प्रकार की काम भावना नहीं है | कृष्ण पुरुष तत्व है और गोपियाँ प्रकृति तत्व । इस प्रकार कृष्ण और गोपियों का नृत्य प्रकृति और पुरुष का महानृत्य है । विराट प्रकृति और विराट पुरुष का महारास है यह | तभी तो प्रत्येक गोपी यही अनुभव करती है कि कृष्ण उसी के साथ नृत्यलीन हैं । सांसारिक दृष्टि से यह रास नृत्य मनोरंजन मात्र हो सकता है, किन्तु यह नृत्य पूर्ण रूप से पारमार्थिक नृत्य है | इस महारास के द्वारा यही सिखाने का प्रयास श्री कृष्ण का रहा कि प्रेम न तो वासना है न ही किसी का एकाधिकार, वरन प्रेम का कालुष्यरहित सामूहिक विकास आवश्यक है, और प्रेमियों के मध्य किसी प्रकार का आवरण – किसी प्रकार का रहस्य नहीं रहता – वहाँ होती है केवल विचारों की – भावों की – स्पष्टता और समर्पण | रासलीला कृष्ण तथा गोपियों के प्रेम का वह चरम उत्कर्ष बिन्दु है जहाँ किसी भी प्रकार की शारीरिक अथवा मानसिक गोपनीयता अथवा रहस्य का आवरण नहीं है | राग योग की इस दशा में बृहदारण्यक का यह कथन सत्य सिद्ध होता है “जैसे पुरुष को अपने आलिंगनकाल में बाहर भीतर की कोई सुध नहीं रहती उसी प्रकार जब उपासक प्राज्ञ द्वारा आलिंगित होता है तब वह अपनी सुध बुध खो बैठता है |”

तो विराट प्रकृति और विराट पुरुष के महारास के साक्षी और प्रतीक तथा अपनी ज्योति किरणों द्वारा समस्त चराचर को नवजीवन का सुधापान कराते शरद पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्र को नमन करते हुए सभी को शरद पूर्णिमा के उल्लासमय अमृतमय पर्व की एक बार पुनः हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/11/aashwin-sharad-purnima/

 

बढ़ता प्रदूषण और Odd-Even

बढ़ता प्रदूषण और Odd-Even

कल रात कहीं बड़े जोर शोर से आतिशबाज़ी चल रही थी | ऐसा प्रतीत होता था शायद कहीं आतिशबाजी की प्रतियोगिता चल रही थी | हम क्यों नहीं इस बात को समझ पा रहे हैं कि आतिशबाज़ी का धुआँ प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है इसी तरह से बहुत सी आतिशबाज़ी, वाहनों का धुआँ, फैक्ट्री आदि का धुआँ मिलकर धुएँ का एक ऐसा गुबार खड़ा कर देते हैं कि लगता है हम लोग गैस चेम्बर में जी रहे हैं | समझ नहीं आता हम जा किस दिशा में रहे हैं…

पिछले कुछ दिनों से एक समाचार सुर्ख़ियों में है – दिल्ली सरकार नवम्बर से Odd-Even Formula फिर से लागू करने जा रही है | दिल्ली में एक तो त्यौहारों और शादियों के मौसम में आतिशबाजी, दूसरे मौसम बदलने के कारण आतिशबाज़ी और कार आदि से निकला धुआँ ऊपर नहीं उठ पाता जिसके कारण प्रदूषण की मात्रा बढ़ जाती है | इससे बचने के लिए ये उपाय वास्तव में कारगर होता रहा है और सम्भवतः कोई भी इसका विरोध नहीं करेगा | लेकिन विचारणीय प्रश्न ये है कि क्या हम सब दिल्ली सरकार के इस क़दम का “वास्तविक अर्थों” में समर्थन करने के लिए तैयार हैं ?

शायद हमारी ये बात आपको कुछ अजीब लगे, किन्तु सत्य है | अभी से कुछ मित्र सम्प्रदायवादी मैसेज फॉरवर्ड हवा में फैलता प्रदूषणकरने लगे हैं कि “अमुक सम्प्रदाय में ऐसा होने से कोई प्रदूषण आदि का प्रश्न नहीं उठता, हिन्दुओं के त्यौहारों पर ही सब याद क्यों आता है ?” ये क्या वही बात नहीं हुई कि “जब सामने वाला साफ़ सड़क पर कूड़ा फेंक रहा है तो हमारे अकेले के जागरूक होने से क्या होगा ? सरकार को पहले उन्हें रोकना चाहिए… हम भी वैसा ही करते हैं जो दूसरे कर रहे हैं…”

हमारी यही मनोवृत्ति बहुत सारे सुधारों के रास्ते में रोड़ा अटकाती है | यदि सामने वाले ने कुछ अनुचित किया तो क्या हमें सही कार्य करके उदाहरण प्रस्तुत नहीं करना चाहिए ? क्या सारी बातों की ज़िम्मेदारी सरकारों और पुलिस वालों की है ? हमें यदि अपने अधिकारों की चिन्ता है तो क्या अपने उत्तरदायित्वों का बोध नहीं होना चाहिए ?

अभी शादी ब्याह का मौसम चलेगा और लोग रात रात भर बैंड बाजे के साथ ही डी जे का भी शोर मचाएँगे | साथ में भयंकर रूप से आतिशबाज़ी भी होगी | ये बैंड बाजे वाले,  डी जे और आतिशबाजी वाले तो महीनों पहले से बुक हो ऊफ ये शोरजाते हैं | साथ में दीपावली की आतिशबाज़ी – जो बस शुरू ही होने वाली है | कहीं किसी पुराण अथवा धर्मशास्त्र में नहीं लिखा कि आतिशबाज़ी अथवा शोर के अभाव में दीपावली का पर्व अधूरा रहा जाएगा अथवा ब्याह शादी सफल नहीं होगी | ये सब करते हुए क्या कभी हमारी आत्मा ने हमें धिक्कारा है कि जो प्रकृति हमारे जन्म का कारण है, जो प्रकृति हमें स्वस्थ और दीर्घायु बनाए रखने के लिए स्वच्छ और स्वस्थ जलवायु तथा भोजन वस्त्रादि के रूप में अन्य अनेकों सुविधाएँ प्रदान करने में तत्पर रहती है उसके साथ कितना जघन्य अपराध कर रहे हैं ध्वनि और वायु प्रदूषण की मात्रा में वृद्धि करके ? और यदि हमारा पर्यावरण प्रदूषण इसी प्रकार बढ़ता रहा तो क्या हम स्वस्थ और सुखी रह पाएँगे ?

इसलिए मित्रों, आप सभी से करबद्ध अनुरोध है कि इस दीवाली और शादियों के मौसम में किसी भी प्रकार की “धर्म सम्प्रदाय” की भावना से ऊपर उठकर आतिशबाज़ी के धुएँ और अन्य प्रकार के व्यर्थ के शोर शराबे से “बाज़” आएँ, अपनी माता सरीखी प्रकृति का सम्मान करें ताकि हम और हमारे बाद आने वाली पीढ़ियाँ स्वच्छ और स्वस्थ हवा में साँस ले सकें और व्यर्थ के शोर से रहित शान्त तथा हर्षोल्लासपूर्ण वातावरण में अपने व्यक्तित्वों का विकास कर सकें… और यदि हम ऐसा करने में क़ामयाब हो गए तो फिर किसी सरकार को किसी प्रकार के Odd-Even Formula को लागू करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/10/increase-in-pollution-and-odd-even/