Category Archives: सम सामयिक

विश्व पर्यावरण दिवस

विश्व पर्यावरण दिवस

मनुष्य ही नहीं समस्त प्राणीमात्र – सृष्टि के समस्त जीव – इस स्वयंभू शाश्वत और विहंगम प्रकृति का अंग है | इसी से समस्त जीवों की उत्पत्ति हुई है | प्रकृति के विकास के साथ ही हम सबका भी विकास होता है यानी विकास यात्रा में हम प्रकृति के सहचर हैं – सहगामी हैं | प्रदूषित पर्यावरण के द्वारा यदि हम इस प्रकृति का ही अस्तित्व ख़तरे में डाल देंगे तो हमारा और दूसरे अन्य अनेकों जीवों का अस्तित्व क्या बचा रह पाएगा ? प्रयावरण की सुरक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो प्राणिमात्र को प्राकृतिक आपदाओं के रूप में प्रकृति का कोपभाजन बनने से कोई भी नहीं बचा पाएगा | यद्यपि अभी भी बहुत देर हो चुकी है, किन्तु फिर भी, यदि अब भी हम जागरूक नहीं हुए पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति तो वह दिन दूर नहीं जब हम स्वच्छ हवा में साँस लेने को भी तरस जाएँगे… एक एक बूँद पानी के लिए लोग आपस में झगडेंगे… जेबों में पैसा भरा होगा लेकिन किसी भाव भी अन्न के दर्शन नहीं होंगे, या होंगे भी तो बड़ी कठिनाई से…

और ये सब हम इसलिए नहीं लिख रहे हैं कि ज्योतिष के आधार पर ग्रह नक्षत्रों की गतियाँ ऐसा कुछ बता रही हैं, बल्कि जिस तरह से आज जंगलों की अनावश्यक कटाई लगातार ज़ारी है, खेती योग्य ज़मीनों को ख़रीद कर जिस प्रकार वहाँ कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं, जिस प्रकार प्लास्टिक और पोलीथिन का उपयोग करने से हम स्वयं को रोक नहीं पा रहे हैं और जिस प्रकार Industries और वाहनों से निकलता प्रदूषण हवा और पानी में घुलता जा रहा है – उस सबको देखकर तो कम से कम यही प्रतीत होता है कि यदि अभी जागरूक नहीं हुए इस दिशा में तो निश्चित रूप से आने वाला समय जीवमात्र के लिए अनुकूल नहीं रहेगा…

इसी सत्य को समझकर आइये हम सभी संकल्प लें कि वर्ष में कम से कम एक वृक्ष अवश्य लगाएँगे | और केवल लगाना ही काफी नहीं है, उसकी देख भाल की व्यवस्था भी करेंगे ताकि वह पल्लवित और पुष्पित होकर हमारे लिए भी और हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भी स्वच्छ और ताज़ा हवा का स्रोत बन सके | साथ ही वनों को अनावश्यक कटने से बचाएँगे | क्योंकि पर्यावरण सुरक्षित होगा तभी हमारी साँसें भी सुरक्षित रहेंगी… पर्यावरण अनुकूल होगा तभी सारे मौसम भी अनुकूल रहेंगे और समय पर आते जाते रहेंगे… पर्यावरण स्वच्छ रहेगा तभी धरती भी अन्न रूपी सोना उगलेगी और कोई भूखा प्यासा नहीं सोएगा…

साथ ही केवल एक दिन के लिए World’s Environment Day के नाम पर गोष्ठियाँ और आन्दोलन करने से भी बात नहीं बनेगी | हमें हर दिन अपनी हर गतिविधि में पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखना होगा… और एक बात, पर्यावरण के प्रदूषण तथा उसकी सुरक्षा दोनों ही का उत्तरदायित्व सरकार के कन्धों पर सौंप देने से बात नहीं बनेगी | जब तक हम स्वयं इस दिशा में जागरूक नहीं होंगे तब तक कोई भी सरकार कुछ नहीं कर सकती |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/06/05/worlds-environment-day/

 

 

प्रथम नवरात्र

प्रथम नवरात्र – देवी के शैलपुत्री रूप की उपासना

आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से कलश स्थापना के साथ ही वासन्तिक नवरात्रों का आरम्भ हो चुका है… भारतीय दर्शन की “प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं” की उदात्त भावना के साथ सर्वप्रथम सभी को साम्वत्सरिक नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ…

आज प्रथम नवरात्र को देवी के शैलपुत्री रूप की उपासना सभी ने पूर्ण हर्षोल्लास के साथ की है | माँ शैलपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमलपुष्प शोभायमान है और वृषभ अर्थात भैंसा इनका वाहन माना जाता है…

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् |

वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् |

इस मन्त्र से माँ शैलपुत्री की उपासना का विधान है | इसके अतिरिक्त “ऐं ह्रीं शिवायै नमः” माँ शैलपुत्री के इस बीज मन्त्र के साथ भी भगवती की उपासना की जा सकती है |

माना जाता है कि शिव की पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान देखकर उसी यज्ञ की अग्नि में कूदकर स्वयं को होम कर दिया था और उसके बाद हिमालय की पत्नी मैना के गर्भ से हिमपुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या करके पुनः शिव को पति के रूप में प्राप्त किया | शैल अर्थात पर्वत और पुत्री तो पुत्री होती ही है – यद्यपि ये सबकी अधीश्वरी हैं तथापि पौराणिक मान्यता के अनुसार हिमालय की तपस्या और प्रार्थना से प्रसन्न हो कृपापूर्वक उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं |

नवरात्र में की जाने वाली भगवती दुर्गा के नौ रूपों की उपासना नवग्रहों की उपासना भी है | कथा आती है कि देवासुर संग्राम में समस्त देवताओं ने अपनी अपनी शक्तियों को एक ही स्थान पर इकट्ठा करके देवी को भेंट कर दिया था | माना जाता है कि वे समस्त देवता और कोई नहीं, नवग्रहों के ही विविध रूप थे, और दुर्गा के नौ रूपों में प्रत्येक रूप एक ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है | इस मान्यता के अनुसार दुर्गा का शैलपुत्री का यह रूप मन के कारक चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करने के कारण साधक के मन को प्रभावित करता है | साथ ही Astrologers के अनुसार कुण्डली (Horoscope) के चतुर्थ भाव और उत्तर-पश्चिम दिशा पर शैल पुत्री का आधिपत्य माना जाता है | अतः यदि किसी की कुण्डली में चन्द्रमा अथवा चतुर्थ भाव तथा चतुर्थ भाव से सम्बन्धित जितने भी पदार्थ हैं जैसे घर, वाहन, सुख-समृद्धि आदि – से सम्बन्धित कोई दोष है तो उसके निवारण के लिए भी माँ भगवती के शैलपुत्री रूप की उपासना करने का विधान है |

मान्यता जो भी हो, किन्तु भगवती के इस रूप से इतना तो निश्चित है कि शक्ति का यह रूप शिव के साथ संयुक्त है, जो प्रतीक है इस तथ्य का कि शक्ति और शिव के सम्मिलन से ही जगत का कल्याण सम्भव है |

शैलपुत्री के रूप में माँ भगवती सभी का कल्याण करें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/04/06/navadurga/

 

रंग की एकादशी

रंग की एकादशी – कुछ भूली बिसरी यादें

कल रविवार 17 मार्च को फाल्गुन शुक्ल एकादशी है | यों आज रात्रि ग्यारह बजकर चौंतीस मिनट के लगभग वणिज करण, शोभन योग और पुनर्वसु नक्षत्र में एकादशी तिथि का आगमन हो जाएगा, किन्तु उदया तिथि होने के कारण कल एकादशी का उपवास रखा जाएगा | इस प्रकार जैसी कि मान्यता है कि द्वादशी तिथि में एकादशी का परायण उचित रहता है, तो कल सायं आठ बजकर इक्यावन मिनट के लगभग द्वादशी तिथि का भी आगमन हो जाएगा | यह एकादशी आमलकी एकादशी कहलाती है और इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा अर्चना का विधान है | किन्तु एक अन्य महत्त्व भी इस एकादशी का है | इसे “रंग की एकादशी” भी कहा जाता है | बृज में जहाँ होलाष्टक यानी फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होली के उत्सव का आरम्भ हो जाता है वहीं काशी विश्वनाथ मन्दिर में फाल्गुन शुक्ल एकादशी से इस उत्सव का आरम्भ माना जाता है | होलाष्टक के विषय में जहाँ मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को भगवान कृष्ण प्रथम बार राधा जी के परिवार से मिलने बरसाने गए थे तो वहाँ लड्डू बाँटे गए थे, वहीं काशी विश्वनाथ में रंग की एकादशी के विषय में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माता पार्वती को अपने घर लिवा लाने के लिए पर्वतराज हिमालय की नगरी की ओर प्रस्थान किया था |

होलाष्टक के विषय में एक और भी मान्यता है कि तारकासुर का उत्पात जब बहुत अधिक बढ़ गया तो ऐसा माना गया कि केवल शिव और पार्वती से उत्पन्न सन्तान ही  उसका वध करने में सक्षम होगी | किन्तु शिवपत्नी सती ने जब से अपने पिता के यज्ञ का विध्वंस करने के लिए उसमें आत्माहुति दी थी तब से शिव घोर तपस्या में लीन हो गए थे | किसी भी उपाय से जब उनका तप भंग नहीं किया जा सका तो देवताओं ने कामदेव की सहायता ली और उन्होंने प्रेम का बाण उन पर चला दिया | जिसके कारण शिवजी का तीसरा नेत्र खुल गया और उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया | माना जाता है कि यह घटना फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को ही घटित हुई थी | तब कामदेव की पत्नी रति ने शिव को तपस्या से प्रसन्न किया और उन्होंने कामदेव को रति के साथ छाया रूप में विचरण करने का वरदान दिया | रति की तपस्या के वे आठ दिन होलाष्टक कहलाए | तभी भगवान शिव का ध्यान पार्वती की तपस्या पर गया और वे फाल्गुन शुक्ल एकादशी को उनसे विवाह करने निकल पड़े |

बहरहाल, मान्यताएँ कुछ भी हों, कथाएँ कितनी भी हों, सत्य बस यही है कि होली का उत्साहपूर्ण रंगपर्व ऐसे समय आरम्भ होता है जब सर्दी धीरे धीरे पीछे खिसक रही होती है और गर्मी चुपके से अपने पैर आगे बढ़ाने की ताक में होती है | साथ में वसन्त की खुमारी हर किसी के सर चढ़ी होती है | फिर भला हर कोई मस्ती में भर झूम क्यों न उठेगा | कोई विरह वियोगी ही होगा जो ऐसे मदमस्त कर देने वाले मौसम में भी एक कोने में सूना सूखा और चुपचाप खड़ा रह जाएगा |

हमें याद आता है हमारे शहर में मालिनी नदी के पार छोटी सी बस्ती थी | रंगपंचमी यानी फाल्गुन शुक्ल पंचमी से रात को भोजन आदि से निवृत होकर सब लोग चौपाल में इकट्ठा हो जाते थे | उन दिनों रात का भोजन अधिकांशतः दिन छिपते ही हो जाया करता था | रात को सारंगी और बाँसुरी से काफी पीलू के सुर उभरने शुरू होते, धीरे धीरे खड़ताल खड़कनी शुरू होती, चिमटे चिमटने शुरू होते, मँजीरे झनकने की आवाज़ें कानों में आतीं और साथ में धुनुकनी शुरू होतीं ढोलकें धमार, चौताल, ध्रुपद या कहरवा की लय पर – फिर धीरे धीरे कंठस्वर उनमें मिल जाते और आधी रात के भी बाद तक काफी, बिरहा, चैती, फाग, धमार, ध्रुपद, रसिया और उलटबांसियों के साथ ही स्वांग का जो दौर चलता तो अपने अपने घरों में बिस्तरों में दुबके लोग भी अपना सुर मिला देते | हमारे पिताजी को अक्सर वे लोग साथ में ले जाया करते थे तो जब पिताजी वापस लौटते थे तो वही सब गुनगुनाते कब में घर की सीढ़ियाँ चढ़ जाते थे उन्हें कुछ होश ही नहीं रहता था | और ऐसा नहीं था कि उस चौपाल में गाने बजाने वाले लोग कलाकार होते थे | सीधे सादे ग्रामीण किसान होते थे, पर होली की मस्ती जो कुछ उनसे प्रदर्शन करा देती थी वह लाजवाब होता था और इस तरह फ़जां में घुल मिल जाता था कि रात भर ठीक से नींद पूरी न होने पर भी किसी को कोई शिकायत नहीं होती थी, उल्टे फिर से उसी रंग और रसभरी रात का इंतज़ार होता था | तो ऐसा असर होता है इस पर्व में |

और रंग की एकादशी से तो सारे स्कूल कालेजों और शायद ऑफिसेज़ की भी होली की छुट्टियाँ ही हो जाया करती थीं | फिर तो हर रोज़ बस होली का हुडदंग मचा करता था | रंग की एकादशी को हर कोई स्कूल कॉलेज ज़रूर जाता था – अपने दोस्तों और टीचर्स के साथ होली खेले बिना भला कैसा रहा जा सकता था ? और टीचर्स भी बड़े जोश के साथ अपने स्टूडेंट्स के साथ उस दिन होली खेलते थे |

घरों में होली के पकवान बनने शुरू हो जाया करते थे | जो होली के दिन तक भी पूरे नहीं हो पाते थे | होलिकादहन के स्थल पर जो अष्टमी के दिन होलिका और प्रहलाद के प्रतीकस्वरूप दो दण्ड स्थापित किये गए थे अब उनके चारों ओर वृक्षों से गिरे हुए सूखे पत्तों, टहनियों, लकड़ियों आदि के ढेर तथा बुरकल्लों की मालाओं आदि को इकठ्ठा किया जाने का कार्यक्रम शुरू हो जाता था | ध्यान ये रखा जाता था कि अनावश्यक रूप से किसी पेड़ को न काटा जाए | हाँ शरारत के लिए किसी दोस्त के घर का मूढा कुर्सी या चारपाई या किसी के घर का दरवाज़ा होली की भेंट चढ़ाने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होती थी | और ये कार्य लड़कियाँ नहीं करती थीं | विशेष रूप से हर लड़का हर दूसरे लड़के के घर के दरवाज़े और फर्नीचर पर अपना मालिकाना हक समझता था और होलिका माता को अर्पण कर देना अपना परम कर्त्तव्य तथा पुण्य कर्म समझता था | और इसी गहमागहमी में आ जाता था होलिकादहन का पावन मुहूर्त |

गन्ने के किनारों पर जौ की बालियाँ लपेट कर घर के पुरुष प्रज्वलित होलिका की परिक्रमा करते हुए आहुति देते थे और होलिका की अग्नि में भुने हुए इस गन्ने को प्रसादस्वरूप वितरित करते थे | अगली सुबह होलिका की अग्नि से हर घर का चूल्हा जलता था | रात भर होलिका की अग्नि पर टेसू के फूलों का रंग पकता था जो सुबह सुबह कुछ विशिष्ट परिवारों में भेजा जाता था और बाक़ी बचा रंग बड़े बड़े ड्रमों में भरकर होली के जुलूस में ले जाया जाता था और हर आते जाते को उस रंग से सराबोर किया जाता था | गुनगुना मन को लुभाने वाली ख़ुशबू वाला टेसू के फूलों का रंग जब घर में आता तो पूरा घर ही एक नशीली सी ख़ुशबू से महक उठता |

दोपहर को इधर सब नहा धोकर तैयार होते और उधर होली पर बना देसी घी का सूजी का गरमा गरमा हलवा प्रसाद के रूप में हर घर में पहुँचा दिया जाता | हलवे का प्रसाद ग्रहण करके और भोजनादि से निवृत्त होकर नए वस्त्र पहन कर शाम को सब एक दूसरे के घर होली मिलने जाते | अब त्यौहार आता अपने समापन की ओर | नजीबाबाद जैसे सांस्कृतिक विरासत के धनी शहर में भला कोई पर्व संगीत और साहित्य संगोष्ठी से अछूता रहा जाए ऐसा कैसे सम्भव था ? तो रात को संगीत और कवि गोष्ठियों का आयोजन होता जो अगली सुबह छह सात बजे जाकर सम्पन्न होता | रात भर चाय, गुझिया, समोसे, दही भल्ले पपड़ी चाट के दौर भी चलते रहते | यानी रंग की पञ्चमी से जो होली के गान का आरम्भ होता उसका उत्साह बढ़ते बढ़ते होलाष्टक तक अपने शैशव को पार करता हुआ रंग की एकादशी को किशोरावस्था को प्राप्त होकर होली आते आते पूर्ण युवा हो जाता था |

याद आते हैं वे दिन… याद आते हैं वे लोग… उन्हीं दिनों और उन्हीं लोगों का स्मरण करते हुए, सभी को कल रंग की एकादशी के साथ ही अग्रिम रूप से होली की रंग भरी… उमंग भरी… हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/03/16/ekadashi-of-colours-some-memories/

 

 

ईश्वर की अद्भुत कृति औरत

ईश्वर की अद्भुत कृति “औरत”…

ख़ूबसूरती, दृढ़ इच्छाशक्ति, विद्वत्ता और सद्गुणों का

एक बेहतरीन मेल “औरत”…

प्रेम, स्नेह, सम्मान, उमंग, उछाह और उत्साह का

एक बेहतरीन मेल “औरत”…

क्योंकि ईश्वर ने अपनी इस अद्भुत कृति की रचना ही की है

निर्माण के लिए, सृजन के लिए, सम्वर्धन और पोषण के लिए

मानवमात्र के मार्ग दर्शन के लिए…

जो असम्भव है बिना प्रेम और स्नेह का दान दिए

जो असम्भव है उमंग और उत्साह के भी बिना

नहीं होगी दृढ़ इच्छशक्ति / या नहीं होंगे गुण

तो कैसे कर पाएगी मार्गदर्शन

और ये समस्त कार्य पूर्ण सत्यता और निष्ठा के साथ करती आ रही है नारी

हर युग में… हर काल में… हर परिस्थिति में…

आज वह पूर्ण दृढ़ता के साथ आवाज़ उठा सकती है

किसी भी प्रकार की अव्यवस्था के ख़िलाफ़…

आज वह किसी की अनुगामी नहीं

बल्कि स्वयं अपने ही पदचिह्नों की छाप छोड़ती

बढ़ रही है आगे

जिनसे दिशा प्राप्त हो रही है दूसरों को भी…

आज वह भीड़तन्त्र जा हिस्सा नहीं है

रखती है साहस और उत्साह नियन्त्रित करने का भीड़ को…

उसे नहीं है आवश्यकता माँगने को भीख अपने अधिकार की

वह तो स्वयं है समाज की रचनाकार…

तभी तो जब अवसर मिलता है / झूम उठती है मस्ती में भर

नाच उठती है अपने हाथ आकाश की ओर उठा

मानों भर लेना चाहती हो समूचे ब्रह्माण्ड को

अपनी स्नेह से कोमल किन्तु साहस से दृढ़ बाहों में…

वो काटा

(मेरी अपनी एक सखी के जीवन की सत्य घटना पर आधारित कथा – अन्त में थोड़े से परिवर्तन के साथ)

वो काटा

“मेम आठ मार्च में दो महीने से भी कम का समय बचा है, हमें अपनी रिहर्सल वगैरा शुरू कर देनी चाहिए…” डॉ सुजाता International Women’s Day के प्रोग्राम की बात कर रही थीं |

‘जी डॉ, आप फ़िक्र मत कीजिए, आराम से हो जाएगा… आप बस अगले हफ्ते एक मीटिंग बुला लीजिये, बात करते हैं सबसे…” मोबाइल पर बात करती करती नीना पार्क में धूप सेंकने के लिए आ बैठी थी |

आज मकर संक्रान्ति थी और सारे बच्चे पतंग उड़ाने के लिए छतों पर चढ़े हुए थे | डॉ कपूर पार्क ही में बैठी थीं | नीना को देखते ही सोसायटी की छत की तरफ इशारा करती बोलीं “वो देखो… और तो सब ठीक है नीना जी, पर ये स्नेहा इन लड़कों के बीच जाकर पतंग उड़ा रही है, अच्छा लगता है क्या ? इसके घरवाले भी तो इसे नहीं रोकते… बहुत सर चढ़ा रखा है… देखना एक दिन क्या गुल खिलाएगी…? पता है न जाने कहाँ कहाँ म्यूज़िक के प्रोग्राम देती फिरती है… हम तो बगल में रहते हैं इसलिए हमें पता है, कितनी कितनी देर से घर आती है प्रोग्राम करके… ये कोई ढंग होते हैं अच्छे घर की बहू बेटियों के…?”

“हुम्…” कुछ सोचते हुए नीना ने पूछा “डॉ कपूर, International Women’s Day पर कुछ कर रहे हैं आप लोग सोसायटी में…?”

“हाँ हाँ, तैयारियाँ चल रही हैं… देखो भई तम्बोला सब पसन्द करते हैं तो वो तो रहेगा ही, बाक़ी कुछ लेडीज़ के डांस वगैरा होंगे… लंच होगा… अब भई हम लेडीज़ के लिए तो ये दिन बड़े गर्व की बात होती है…” बड़े उत्साह से डॉ कपूर ने जवाब दिया |

“Women’s Day Celebration की बात इतने गर्व से करती हैं, और आज अगर कोई बच्ची अपने भाइयों और दोस्तों के साथ पतंग उड़ाने छत पर चली गई तो उसके विस्तार लेते पंखों से आपको ईर्ष्या हो रही है…?” मन ही मन सोचते हुए नीना ने आसमान की ओर नज़र उठाई तो ख़ुशी से झूम उठी, रंग बिरंगी – तरह तरह के डिज़ाइन की पतंगें आसमान में तैर रह थीं | बड़ा अच्छा लग रहा था नीना को ये देखकर और अपना बचपन याद आ गया था | तभी कहीं से आवाज़ आई “वो काटा…” और नीना भी साथ में ताली बजाती ख़ुशी में चिल्ला उठी “वो काटा…” किसी की पतंग किसी ने काट दी थी और नीना के साथ पार्क में बैठी डॉ कपूर भी ये सब देखकर हँस रही थीं |

अचानक उसे महसूस हुआ कि पार्क में तो कहीं से आवाज़ आई नहीं थी, बच्चे सारे छतों पर चढ़े हुए थे, फिर ये आवाज़ आई कहाँ से ? और कुछ सोचकर ख़ुशी और प्यार से मुस्कुरा उठी | मिसेज़ कपूर शायद नीना को बच्चों की तरह उछलते देख हँसी थीं | इसी ख़ुशी के माहौल में न जाने कहाँ जा पहुँची थी नीना… शायद बहुत पीछे…

“भाई साहब ये कोई भले घर की लड़कियों के ढंग हैं… बताइये, शाम के पाँच बजने को आए और हमारी नीना देवी का अभी तक कोई अता पता नहीं… लगी रहती है उस चारु के साथ पतंगबाज़ी के चक्कर में… देखना एक दिन क्या गुल खिलाएगी वो चारु…” नीना घर के भीतर घुसने ही वाली थी कि भीतर से चाचा की कड़क आवाज़ कानों में पड़ी और चप्पल हाथ में लेकर चुपके से घर में घुसने का रास्ता तलाशती एक कोने में खड़ी हो गई | माँ और चाची ने देख लिया था और प्यार से मुस्कुराते हुए उसे वहीं छिप कर खड़े रहने का इशारा किया |

“अरे ये क्या बकवास किये जा रहे हो रामेश्वर…” ये पापा की मीठी सी आवाज़ थी “जिस चारु को आप रात दिन मुँह भर भर कर कोसते हो पता है वो है किस खानदान की…?”

“जी हाँ मालूम है आप यही कहेंगे कि शहर के इतने रईस परिवार की लड़की है… वो भी ऐसा परिवार जिसमें हर कोई बेहद पढ़ा लिखा है | पर क्या फायदा ऐसी पढ़ाई लिखाई का जो बच्चों में अच्छे संस्कार न डाल सके…” चाचा ने जवाब दिया |

“तो आपके हिसाब से अच्छे संस्कार यही हैं कि औरतों को, लड़कियों को दबा कर रखा जाए… जैसा हमारे घर में हुआ है…? ये दोनों – आपकी और मेरी पत्नियाँ – पोस्ट ग्रेजुएट हैं दोनों ही, पर नहीं जी – लड़की पढ़ी लिखी चाहिए लेकिन नौकरी नहीं कराएँगे | हमें बहू बेटी की कमाई नहीं खानी है | अरे नौकरी नहीं करानी है तो इतना पढ़ाने लिखाने की क्या ज़रूरत है भाई, नवीं दसवीं पास करते ही बिठा लो घर में और घर गृहस्थी के काम सिखाकर कर दो जल्दी से शादी | भले ही वहाँ दम घुटकर मर जाए | और मुझे तो ताज्जुब है अपने मरहूम पिता बैरिस्टर अमरनाथ पर, हमारे लिए लड़कियाँ तो पढ़ी लिखी ले आए पर इनके काम छुडवा दिए | वाह, कितने ऊँचे विचार थे | कभी देखा है आपने इन दोनों औरतों के चेहरों पर फैली उदासी को ? नहीं आप क्यों देखेंगे ? आप तो बैरिस्टर साहब के सबसे काबिल पुत्र हैं न…” व्यंग्य से पापा बोले |

“भाई साहब मैं आपसे भाभी जी की या लक्ष्मी की बात नहीं कर रहा | हाँ नहीं करने दी इन दोनों को नौकरी | पर कभी कोई कमी छोड़ी क्या ? मुँह से बात निकलने की देर होती है बस, जो कुछ चाहती हैं पल भर में हाज़िर हो जाता है | पर अब बात नीना की हो रही है | पता है घनश्याम जी क्या बता रहे थे ? बोल रहे थे नेज़ों के मेले में चारु पतंग उड़ा रही थी और अपनी नीना उसकी चरखी पकड़े खड़ी थी | पता है शहर में कितनी बदनामी हो रही है कि वो देखो बैरिस्टर साहब के घर की लड़की क्या नेज़ों के मेले में घूमती फिरती है और पतंग उड़ाती है सो अलग…”

“भई देखो, मैं तो इस सबमें कोई बुराई समझता नहीं | हमने अपनी बीवियों को तो दबा कर रख लिया पर इन बच्चों को दबाएँगे नहीं | आप प्लीज़ इन बच्चों को करने दीजिये इनके मन की | वैसे भी लड़कियाँ हैं, कल को शादी हो जाएगी तो न जाने वहाँ कैसा माहौल मिले, यहाँ तो कम से कम अपने मन की कर लेने दो…” पापा ने जवाब दिया |

“आपसे तो बात ही करना बेकार है इस बारे में…” चाचा झुँझला कर बोले और अपने कमरे में चले गए | चाची और माँ के इशारे पर नीना भी चप्पलें हाथ में उठाए बड़ी खामोशी से अपने कमरे में चली गई, ताकि चाचा को पता न चले |

नीना और चारु एक साथ कॉलेज जाती थीं | नीना एक अच्छी सिंगर और डांसर के रूप में जानी जाती थी और चारु एक अच्छी पतंगबाज़ के रूप में | दोनों के बीच दोस्ताना ऐसा था कि जब कभी नीना का कहीं कोई प्रोग्राम होता तो चारु उसके Instruments उठाकर उसके साथ चलने में अपनी शान समझती थी | उसे अपने आप पर गर्व होता था कि वो एक ऐसी लड़की की सहेली है जिसका आज काफी नाम हो चुका है उसकी सिंगिंग और डांसिंग के लिए | तो दूसरी तरफ नीना भी चारु के पतंगबाज़ी के मुक़ाबलों में उसकी चरखी पकड़ने में अपनी शान समझती थी |

नेज़ों का मेला शुरू होने जा रहा था | ये दिन तो चारू और नीना के लिए बड़े ख़ास होते थे | इस मेले में पतंगबाज़ी के Competition हुआ करते थे | चारु भी इनमें हिस्सा लेती थी | नीना और चारु को बड़ा मज़ा आता था ये देखकर कि लड़के चारु की शक्ल देखकर ही घबरा जाते थे | अच्छे अच्छों की पतंग चारु काट दिया करती थी | लड़के अपने मान्झों और सारी चीज़ों को अच्छी तरह तैयार करते थे कि इस बार तो चारु को मज़ा चखाएँगे, पर हर राउंड में चारु ही आगे निकल जाती थी और Prize लेकर घर लौटती थी | नीना घर आकर माँ पापा और चाची को मेले के सारे किस्से मज़े लेकर सुनाया करती थी |

अब तक दोनों बी ए पास कर चुकी थीं | नीना ने आगे एम ए में एडमीशन लिया लेकिन चारु नहीं ले सकी थी | पता लगा उसकी शादी तय हो गई है और इन्हीं गर्मी की छुट्टियों में उसकी शादी होनी है | शहर के एक बहुत बड़े बिजनेसमैन के इकलौते बेटे के साथ उसकी शादी हो रही थी | नीना ने उससे पूछा “तू खुश है इतनी जल्दी शादी कराके…?” और चारु ने जवाब दिया “देख भई, अपने राम का तो एक ही सीधा सादा फंडा है, सही वक़्त पर सही काम हो जाना चाहिए…”

“पर तू तो आगे पढना चाहती थी और बी एड करके नौकरी करना चाहती थी, उसका क्या…?”

“नीना तू भी न पागल है बिल्कुल… बेवकूफ… तेरी शादी जल्दी नहीं हो सकती… तेरा तो पता है मुझे, अच्छे लड़कों को छोड़ देगी इस केरियर वेरियर के चक्कर में… अरे पागल जब इतना अच्छा घर बर मिल रहा हो तो मना करे मेरी जूती…” और खिलखिला कर हँस दी थी | इसी हँसी ख़ुशी में चारु की शादी हो गई थी और शहर में ही एक घर से निकल कर दूसरे घर में चली गई थी |

नीना को याद है किस तरह ताना मारा था चाचा ने “देख लिया भाई साहब आपके वो “Intellectual” लोग, अपने से ज्यादा पैसे वाला घर देखा तो टपक पड़ी मुँह से लार और करा दिए लड़की के हाथ पीले | क्या हम लोग अपनी लड़कियों का ब्याह इतनी कम उम्र में कर सकते हैं…?”

और पापा ने धीरे से बात आई गई कर दी थी | बेमतलब की बहसों में उलझना उनका स्वभाव नहीं था | उसके बाद कुछ ज्यादा मिलना नहीं हुआ था चारु से | चारु जिस घर में गई थी वहाँ का हिसाब किताब वही था कि सर पर साड़ी का पल्ला रखकर एक ठुक्का साइड में खोंसकर दिन भर घर में इधर उधर काम निबटाते रहो | सुबह सबसे पहले महाराज के साथ मिलकर घर भर का नाश्ता तैयार कराओ, फिर दोपहर का लंच तैयार कराओ, उसके बाद शाम की चाय, फिर रात के डिनर की सोचो | सुबह से लेकर रात तक उनके घर के रसोई के काम ही ख़त्म होने में नहीं आते थे | चारु की शादी के बाद जब पहले नेज़े आए तो नीना बहुत रोई थी | चारु उस समय प्रेगनेंट थी इसलिए पतंग उड़ाने नहीं जा सकती थी | वैसे भी उस परिवार की बहुएँ आम लोगों के बीच नहीं आ जा सकती थीं | प्रतिष्ठा की क़ीमत घर में बन्द रहकर ही चुकाई जा सकती थी | नीना ने चारु से पूछा भी था एक बार कि ऐसे माहौल में उसका दम नहीं घुटता ? पर चारु के चहरे पर सन्तोष का भाव देखा तो आगे कुछ नहीं बोल पाई थी |

इस बीच घरवालों से पता लगता रहा था कि चारु के एक के बाद एक पाँच बच्चे हो गए थे और शरीर बेडौल हो गया था |

नीना पढ़ाई में लगी रही | एम ए दो दो सब्जेक्ट्स में, पी एच डी, फिर नौकरी – अपने आपमें ही इतनी खो गई थी कि किसी दूसरे के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं थी | उसकी उपलब्धियों पर उसके साथ साथ उसके सारे घरवाले भी नाज़ करते थे |

और इसी सबके बीच 29 साल की उम्र में एक दिन पसन्द के लड़के से उसकी शादी भी हो गई | जैसा खुलापन वो चाहती थी वैसा ही उसे ससुराल में मिला तो वह धन्य हो उठी | आज उसकी अपनी एक पहचान बन चुकी है | एक तरफ वह शरद की पत्नी के रूप में जानी जाती है तो दूसरी तरफ “डॉ नीना” के प्रशंसकों की भी कमी नहीं है |

अगले दो तीन दिन उसके फेसबुक पर गुज़रे | आख़िर एक दिन चारु को उसने ढूँढ़ ही निकाला | उसके सारे बच्चों की शादियाँ हो चुकी थीं और उनके भी बच्चे बड़े बड़े हो गए थे और उनके भी शादी ब्याह हो चुके थे | वो तो होने ही थे | कितनी जल्दी तो उसकी शादी हो गई थी | नीना और चारु दोनों इस समय 66+ की हो चुकी हैं | लेकिन जल्दी शादी और घर की ज़िम्मेदारियाँ उठाते उठाते चारु जहाँ बूढ़ी दिखने लगी है वहीं नीना में अभी भी कशिश बाक़ी है | हालाँकि वज़न उसका भी बढ़ गया है उम्र के साथ |

नीना ने चारु को फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजी जो बड़े आश्चर्य के साथ चारु ने एक्सेप्ट भी कर ली और शुरू हो गया बरसों की बिछड़ी दो सहेलियों का बातों का सिलसिला | चारु के एक बड़े बेटे को छोड़कर बाक़ी सारे बच्चे बाहर सेटल हो चुके थे | चारु अपने बड़े बेटे के साथ ही रहती थी | आख़िर दोनों ने मिलने का प्रोग्राम बनाया | नीना ने शरद को साथ चलने के लिए तैयार किया और दोनों नीना के साथ उसके मायके पहुँच गए | माँ पापा तो रहे नहीं थे सो एक होटल में रूम बुक कराके शहर में निकल पड़े | पता लगा शहर में काफी कुछ तब्दीलियाँ हो गई थीं | नई सडकें, फ्लाई ऑवर बन चुके थे | फ्लैट्स, मल्टीप्लेक्स और मॉल की कल्चर वहाँ भी पहुँच चुकी थी | चारु की ससुराल का पता हालाँकि फोन पर मिल गया था, फिर भी घर ढूँढने में कुछ वक़्त लग गया | महर्षि गूगलानंद के पास नया नक्शा अभी नहीं था तो उन्होंने किसी पुराने रास्ते पर डाल दिया था जो आगे जाकर बन्द हो जाता था | पर देर से ही सही, पहुँच गए |

चारु को मिली तो सबसे पहले नेज़ों का ही पूछा | लेकिन चारु अपनी घर गिरस्ती में ऐसी खोई थी कि अब उसे नहीं पता था कि कहीं कोई नेज़ों के मेले जैसा कुछ होता भी है या नहीं | उसके चेहरे पर लगातार एक उदासी बिखरी हुई थी |

बहुत दुःख हुआ चारु का हाल देखकर नीना को और उसने उसे अपने घर दिल्ली आने की दावत दी | शरद के स्वभाव के कारण चारु के पति की भी उनसे दोस्ती हो गई थी और एक दिन वे दोनों प्रोग्राम बनाकर दिल्ली पहुँच गए |

दोनों की वापस से दोस्ती हो गई थी | और इस दोस्ती ने जो नया गुल खिलाया वो था – इस साल के नेज़ों के मेले में किसी बड़ी कम्पनी के ट्रेक सूट और स्पोर्ट्स शूज़ पहने दोनों 66 साल की सफ़ेद बालों वाली सहेलियाँ पतंग उड़ा रही थीं… चारु पतंग उड़ा रही थी… नीना उसकी चरखी पकड़े खड़ी थी… दोनों के परिवार भी दर्शक समूह में शामिल थे और इन दोनों को ये सब करते देख खुश हो रहे थे…

तभी चारु ख़ुशी में चिल्लाई “वो काटा…”

 

सीखना होगा

रविवार यानी 10 मार्च को WOW India और DGF के सदस्यों ने मिलकर बड़े उत्साह के साथ महिला दिवस मनाया | तभी कुछ विचार मन में उठे कि हम महिलाएँ जब परिवार की, समाज की, राष्ट्र की, विश्व की एक अनिवार्य इकाई हैं – जैसा कि हमारी लघु नाटिका के माध्यम से कहने का प्रयास भी हम लोगों ने किया – फिर क्या कारण है कि महिला सशक्तीकरण के लिए हमें आन्दोलन चलाने पड़ रहे हैं ? और तब एक बात समझ आई, कि अभी भी बहुत कुछ सीखना समझना शेष है…

लानी है समानता समाज में / और बढ़ाना है सौहार्द दिलों में

तो आवश्यक है सशक्तीकरण महिलाओं का

क्योंकि विश्व की आधी आबादी / नारी

प्रतीक है माँ दुर्गा की शक्ति का

प्रतीक है माँ वाणी के ज्ञान का

प्रतीक है इस तथ्य का / कि शक्ति और ज्ञान के अभाव में

धन की देवी लक्ष्मी का भी नहीं है कोई अस्तित्व…

प्रतीक है स्नेह, सेवा, त्याग और बलिदान का

ईश्वर की अद्भुत कृति नारी

नहीं है सम्भव जिसके बिना कोई भी रचना…

थम जाएगी संसार की प्रगति / यदि थम गई नारी

क्योंकि वही तो करती है सृजन और संवर्धन…

जनयित्री के रूप में करती है पोषण / नौ माह तक गर्भ में

और फिर झूम उठती है अपने कोमल किन्तु सशक्त हाथों में थामे

अपने ही अस्तित्व के अंश को…

उसके बाद समूची जीवन यात्रा में / करती है मार्ग प्रशस्त

कभी माँ, कभी बहन, कभी प्यारी सी बिटिया

और कभी प्रेमिका या पत्नी के रूप में

निर्वाह करती है दायित्व हर रूप में / एक मार्गदर्शक का…

बिटिया के रूप में एक कल्पनाशील मन लिए

जो छू लेना चाहता है आकाश / अपने नन्हे से हाथों से…

सुन्दरी युवती के रूप में कुछ अनोखे भाव लिए

जो मिलाकर एक कर सकती है / धरा गगन की सीमाओं को भी

इसीलिए अपनाती है एक सशक्त जीवन दर्शन…

और अन्त में जीवन के अनेकों अनुभवों से पूर्ण

एक प्रौढ़ा और फिर वृद्धा के रूप में

मिला देती है हरेक दर्शन को

साथ में अपने जीवन दर्शन के…

ठीक वैसे ही / जैसे प्रकृति दिखलाती है नित रूप नए

जिनमें होते हैं निहित मनोभाव / समस्त जड़ चेतन के…

पर हे नारी ! सीखना होगा तुम्हें सबसे पहले

प्यार और सम्मान करना स्वयं की ही आन्तरिक शक्ति का…

गर्व करना स्वयं के ही ज्ञान और जीवन दर्शन पर…

मुग्ध हो जाना अपने स्वयं के ही आन्तरिक सौन्दर्य पर…

और अभिभूत हो जाना अपनी स्वयं की हर छोटी बड़ी उपलब्धि पर…

 

 

वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ

लो फिर से मदिराया वसन्त

कल वसन्त पञ्चमी – प्रकृति के उत्सव का वासन्ती पर्व समस्त उत्तर भारत में मनाया जाएगा और हम सब ज्ञान विज्ञान की देवी माँ वाणी का अभिनन्दन करेंगे | ज्ञान यानी शक्ति प्राप्त करना, सम्मान प्राप्त करना | ज्ञानार्जन करके व्यक्ति न केवल भौतिक जीवन में प्रगति कर सकता है अपितु मोक्ष की ओर भी अग्रसर हो सकता है | पुराणों में कहा गया है “सा विद्या या विमुक्तये” (विष्णु पुराण 1/19/41) अर्थात ज्ञान वही होता है जो व्यक्ति को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करे | मोक्ष का अर्थ शरीर से मुक्ति नहीं है | मोक्ष का अर्थ है समस्त प्रकार के भयों से मुक्ति, समस्त प्रकार के सन्देहों से मुक्ति, समस्त प्रकार के अज्ञान – कुरीतियों – दुर्भावनाओं से मुक्ति – ताकि व्यक्ति के समक्ष उसका लक्ष्य स्पष्ट हो सके और उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग स्पष्ट हो सके |

सभी जानते हैं कि ये पर्व ऐसे समय आता है जब भगवान् भास्कर अपनी रश्मियों के रथ पर सवार हो ठिठुराती ठण्ड को दूर भगाते हुए उत्तर दिशा की ओर भ्रमण कर रहे होते हैं | सर्दियों की विदाई के साथ ही प्रकृति स्वयं अपने समस्त बन्धन खोलकर – अपनी समस्त सीमाएँ तोड़कर – प्रेम के मद में ऐसी मस्त हो जाती है कि मानो ऋतुराज को रिझाने के लिए ही वासन्ती परिधान धारण कर नव प्रस्फुटित कलिकाओं से स्वयं को सुसज्जित कर लेती है… जिनका अनछुआ नवयौवन लख चारों ओर मंडराते भँवरे गुन गुन करते वसन्त का राग आलापने लगते हैं… आम बौरा जाते हैं… वसन्त के परम मित्र कामदेव अपने धनुष पर स्नेह प्रेम के पुष्पों का बाण चढ़ा देते हैं… और प्रकृति की इस रंग बिरंगी छटा को देखकर मगन हुई कोयल भी कुहू कुहू का गान सुनाती हर जड़ चेतन को प्रेम का नृत्य रचाने को विवश कर देती है… इसीलिए तो वसन्त को ऋतुओं का राजा कहा जाता है…

वसन्त को भगवान् कृष्ण ने गीता में अपना ही एक रूप बताया है | धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व इस पर्व का यही है कि ज्ञान विज्ञान की देवी भगवती सरस्वती के साथ ही सूर्य, गंगा मैया तथा भू देवी की पूजा अर्चना के माध्यम से जन जन को सन्देश प्राप्त होता है कि जिस प्रकृति ने हमारे जीवन में इतने सारे रंग भरे हैं, हमें वृक्षों, वनस्पतियों, स्वच्छ वायु, जल, पशु पक्षियों आदि के रूप में जीवित रहने के समस्त साधन प्रदान किये हैं – उस पञ्चभूतात्मिका प्रकृति को धन्यवाद दें और उसका सम्मान करना सीखें |

वसन्त के महान गायक कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् और ऋतुसंहार तथा बाणभट्ट के कादम्बरी और हर्ष चरित जैसे अमर ग्रन्थों में प्रेम की इस मदिर ऋतु तथा इस मधुर पर्व का इतना सुरुचिपूर्ण वर्णन उपलब्ध होता है कि जहाँ या तो प्रेमीजन जीवन भर साथ रहने का संकल्प लेते देखाई देते हैं या फिर बिरहीजन अपने प्रिय के शीघ्र मिलन की कामना करते दिखाई देते हैं | संस्कृत ग्रन्थों में तो वसन्तोत्सव को मदनोत्सव ही कहा गया है जबकि वसन्त के श्रंगार टेसू के पुष्पों से सजे वसन्त की मादकता देखकर तथा होली की मस्ती और फाग के गीतों की धुन पर हर मन मचल उठता था | इस मदनोत्सव में नर नारी एकत्र होकर चुन चुन कर पीले पुष्पों के हार बनाकर एक दूसरे को पहनाते और एक दूसरे पर अबीर कुमकुम की बौछार करते हुए वसन्त की मादकता में डूबकर कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा करते थे | वसन्त पञ्चमी से लेकर होली तक सारा समय प्रेम के लिए समर्पित होता था | आज भी देश के अनेक अंचलों में पीतवस्त्रों और पीतपुष्पों में सजे नर-नारी बाल-वृद्ध एक साथ मिलकर माँ वाणी के वन्दन के साथ साथ प्रेम के इस देवता की भी उल्लासपूर्वक अर्चना करते हैं |

इस पर्व के दौरान पीले वस्त्र धारण करने के एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि पीत वर्ण का सम्बन्ध जहाँ एक ओर सूर्य से माना जाता है, वहीं भगवान् विष्णु और माँ वाणी से सम्बद्ध माना जाता है | साथ ही पीला रंग सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है तथा मन को स्थिरता प्रदान करने वाला, शान्ति प्रदान करने वाला माना जाता है | पीला रंग विचारों में सकारात्मकता, आशा तथा ताज़गी का प्रतीक माना जाने के कारण व्यक्ति को उसके Career में में उन्नति का सूचक भी माना जाता है | इन्हीं कारणों से भगवान् विष्णु और भगवती सरस्वती को पीले पुष्प अर्पित किये जाते हैं |

और संयोग देखिए कि आज ही के दिन नूतन काव्य वधू का अपने गीतों के माध्यम से नूतन शृंगार रचने वाले प्रकृति नटी के चतुर चितेरे महाप्राण निराला का जन्मदिवस भी धूम धाम से मनाया जाता है…

तो, वसन्त के मनमोहक संगीत के साथ सभी मित्रों को सरस्वती पूजन, निराला जयन्ती तथा प्रेम के मधुमय वासन्ती पर्व वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ… इस संकल्प के साथ कि प्रकृति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाएँगे… और इस आशा और विश्वास के साथ कि हम सब ज्ञान प्राप्त करके समस्त भयों तथा सन्देहों से मोक्ष प्राप्त कर अपना लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढ़ सकें… ताकि अपने लक्ष्य को प्राप्त करके उन्मुक्त भाव से प्रेम और मस्ती का राग आलाप सकें…

लो फिर से है आया वसन्त, लो फिर से मुस्काया वसन्त ||

मन की कोयल है कूक उठी, हर सेज सेज है महक उठी |

और अंग अंग में मधु की मस्त बहारों सा छाया वसन्त ||

भंवरा गाता गुन गुन गुन गुन, कलियों से करता अठखेली |

और प्रेम पगे भावों से मन में उनके हूक उपज उठती ||

हरियाली धरती को मदमस्त बनाता लो आया वसन्त ||

दूल्हा वसन्त निज दुल्हनिया को पीत हार है पहनाता |

दुल्हिन धरती का हरा घाघरा आज कहीं उड़ता जाता |

लो कामदेव के बाणों पर है पुष्प सजा आया वसन्त ||

पपीहा बंसी में सुर फूँके, और डार डार सरसों फूले |

है सजा प्रणय का राग, हरेक जड़ चेतन का है मन झूमे |

लो मस्ती का है रास रचाता महकाता आया वसन्त ||

लो फिर से है लहराया वसन्त, लो फिर से मदिराया वसन्त…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/02/09/vasant-panchami-the-festival-of-nature/