हरियाली तीज

सावन का महीना आते ही अपने पुराने दिनों की याद ताज़ा हो आती है | कई रोज़ पहले से पिताजी उत्साह में भर घर सर पर उठा लिया करते थे “अरे भई मास्टरनी जी (हमारी माँ को पिताजी मास्टरनी जी बुलाते थे) पूनम की चाचियों के चूड़ियों के नाप तो लाकर दो | और हाँ वो लाली और सरसुती की चूड़ियों का माप भी ले आना | अच्छा छोड़ो आपको तो फुर्सत ही कहाँ इन सब कामों के लिए, हम ही जाकर ले आते हैं…” और पहुँच जाते पहले बिब्बी यानी अपनी बड़ी बेटी हमारी बड़ी बहन के पास और उनकी एक चूड़ी ले आते, फिर सरसुती (सरस्वती) यानी हमारी बुआ की चूड़ी ली जाती और फिर दोनों चाचियों की एक एक चूड़ी ले आते और हमें साथ में ले पहुँच जाते चूड़ी वाली दूकान पर | उन दिनों शहर में एक ही बड़ी दूकान ऐसी थी जिस पर चूड़ी के साथ साथ लड़कियों की ज़रूरत का हर सामान मिल जाया करता था | बस अपनी पसन्द से चूड़ियाँ ख़रीद लाते | फिर सुन्दरलाल ताऊ जी की दूकान से घेवर और फेनी लाए जाते और माँ घर पर ही उन्हें पागती | फिर तीज से एक दो रोज़ पहले चारों घरों में चूड़ी और घेवर फेनी पहुँचाए जाते | माँ को तो उत्साह था ही इन सब कामों का – आख़िर तीज तो होता ही औरतों का त्यौहार है, पर पिताजी का भी उत्साह देखते ही बनता था | साथ में चाचियाँ, बिब्बी और बुआ भी साल भर इंतज़ार करती थीं इस अवसर का और जब उन्हें उनकी चूड़ियाँ और माँ के हाथों का पगा घेवर फेनी मिल जाता तो सबकी ख़ुशी देखते ही बनती थी |

उधर मामा जी आते संभल से माँ के लिए और हम सबके लिए चूड़ी कपड़े घेवर फेनी वगैरा लेकर – यानी सिधारा लेकर | कितनी धूम रहती थी त्यौहार की | सादे लोग थे, सादे तरीक़े से त्यौहार मनाते थे | न अधिक कुछ लिया दिया जाता था न किसी तरह का कोई दिखावा ही होता था | लड़कियों को अपनी पसन्द की थोड़ी चूड़ियाँ मिल गईं और एक जोड़ा कपड़े और एक जोड़ी सैंडल मिल गए तो मज़ा आ गया | लड़कों को भी उनकी पसन्द के कपड़े और जूते मिल गए तो और क्या चाहिए | न शगुन के लिफ़ाफ़े लिए दिए जाते थे न तरह तरह की गिफ्ट्स | घर में ही पकवान बनाए जाते थे | पर उस सादगी में भी जो मस्ती आती थी – त्यौहार का जो मज़ा आता था – वो आज बहुतेरे ताम झाम के बाद भी नहीं आने पाता | इसी सब में इतनी चहल पहल हो जाती थी – और कई दिनों तक रहा करती थी | सारी चहल पहल के बीच मीठी नोक झोंक भी चलती रहती थी | और साल भर त्यौहार लगे ही रहते थे तो साल भर ही इस तरह के उत्सव चलते रहते थे |

मसलन, माँ घेवर फेनी पागने बैठतीं तो पिताजी भी साथ देने के लिए बैठ जाते और बार बार कुछ ऐसा कर बैठते कि माँ का काम बिगड़ जाता | माँ नकली गुस्सा दिखातीं “मैंने बोला न हट जाओ, काम बिगाड़ने पर लगे हो… हटो यहाँ से…” और पिताजी का हाथ खींच कर उन्हें वहाँ से हटाने की कोशिश करतीं तो पिताजी भी भूरी आँखों से हँसते हुए बोलते “लो जी बिटिया रानी देख लो… शराफ़त का तो ज़माना ही नहीं है… अरे हम तो इनकी मदद कर रहे थे और ये हैं कि हमें रसोई से धक्का ही दिए दे रही हैं… चलो जी कैरम निकालो… हम दोनों बैठकर कैरम खेलते हैं…” और उसी तरह मीठी सी हँसी हँसते हुए बाहर आ जाते और माँ लग जातीं अपने काम में तसल्ली से | उसके बाद जब चाची के पास उनका सामान लेकर जाते तब माँ और पिताजी दोनों अपनी नोक झोंक की बातें उन्हें सुनाते और वो हँसती रहतीं | भला आज के रेडीमेड के ज़माने में इन सब ठिठोलियों का मज़ा कहाँ ? और फिर आज समय भी किसके पास है इस तरह की हँसी ठिठोलियों के लिए ?

खैर, तो बात चल रही सावन की और हरियाली तीज की | यों तो सारा सावन ही बागों में और घर में लगे नीम और आम के पेड़ों पर झूले लटके रहते थे और लड़कियाँ गीत गा गाकर उन पर झूला करती थीं | पर तीज के दिन तो एक एक घर में सारे मुहल्ले की महिलाएँ और लड़कियाँ हाथों पैरों पर मेंहदी की फुलवारी खिलाए, हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ पहने सज धज कर इकट्ठी हो जाया करती थीं दोपहर के खाने पीने के कामों से निबट कर और फिर शुरू होता था झोंटे देने का सिलसिला | दो महिलाएँ झूले पर बैठती थीं और बाक़ी महिलाएँ गीत गाती उन्हें झोटे देती जाती थीं और झूला झूलने के साथ साथ चुहलबाज़ी भी चलती रहती | सावन के गीतों की वो झड़ी लगती थी कि समय का कुछ होश ही नहीं रहता था | पुरुष भी कहाँ पीछे रहने वाले थे ? वे भी जबरदस्ती करके इस हुल्लड़ में शामिल हो जाया करते और झोटे देते देते हल्की फुल्की चुहल भी चलती रहती | और किसी की नई नई शादी हुई हो तब तो फिर उस भाभी या उस जीजा के ही पीछे सारे लड़के लड़कियाँ पड़ जाया करते और बदले में बड़े बुजुर्गों की मीठी झिड़की भी सुना करते “अरे क्यों तंग कर रहे हो बेचारों को…” वक़्त जैसे ठहर जाया करता था इन मादक दृश्यों का गवाह बनने के लिये |

बहरहाल, सबसे पहले तो इस पर्व की बधाई | श्रावण मास में जब समस्त चराचर जगत वर्षा की रिमझिम फुहारों में सराबोर हो जाता है, इन्द्रदेव की कृपा से जब मेघराज मधु के समान जल का दान पृथिवी को देते हैं – और उस अमृतजल का पान करके जब प्यासी धरती की प्यास बुझने लगती है – तब हरे घाघरे में लिपटी धरती अपनी इस प्रसन्नता को वनस्पतियों के लहराते नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त करने लगती है – जिसे देख जन जन का मानस मस्ती में झूम झूम उठता है – तब उस उल्लास का अभिनन्दन करने के लिये – उस मादकता की जो विचित्र सी अनुभूति होती है उसकी अभिव्यक्ति के लिये – “हरियाली तीज” अथवा “मधुस्रवा तीज” का पर्व मनाया जाता है | “मधुस्रवा अथवा मधुश्रवा” शब्द का अर्थ ही है मधु अर्थात अमृत का स्राव यानी वर्षा करने वाला | अब गर्मी से बेहाल हो चुकी धरती के लिए भला जल से बढ़कर और कौन सा अमृत हो सकता है ? वैसे भी जल को अमृत ही तो कहा जाता है |

तो एक बार पुनः अमृत की वर्षा करने वाली इस मधुश्रवा तीज की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत हैं इसी अवसर पर पुछले वर्ष लिखी गई कुछ पंक्तियाँ…

आओ मिलकर झूला झूलें ।

ऊँची पेंग बढ़ाकर धरती के संग आओ नभ को छू लें ।।

कितने आँधी तूफाँ आएँ, घोर घनेरे बादल छाएँ ।

सबको करके पार, चलो अब अपनी हर मंज़िल को छू लें ।।

हवा बहे सन सन सन सन सन, नभ से अमृत बरसा जाए ।

इन अमृत की बून्दों से आओ मन के मधुघट को भर लें ।।

ऊदे भूरे मेघ मल्हार सुनाते, सबका मन हर्षाते ।

मस्त बिजुरिया संग मस्ती में भर आओ हम नृत्य रचा लें  ।।

हरा घाघरा पहने नभ के संग गलबहियाँ करती धरती ।

आओ हम भी निज प्रियतम संग मन के सारे तार जुड़ा लें ।|

बरखा रानी छम छम छम छम पायल है झनकाती आती ।

कोयलिया की पंचम के संग हम भी पियु को पास बुला लें ।।

सावन है दो चार दिनों का, नहीं राग ये हर एक पल का ।

जग की चिंताओं को तज कर मस्ती में भर आज झूम लें ।।

झूला झूलो

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मधुस्रवा तीज की हार्दिक शुभकामनाएँ

झूला

क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी

ये बरखा का मौसम सजीला रसीला, घटाओं में मस्ती हवाओं में थिरकन |

वो बलखाती बूँदों का फूलों से मिलना, वो शाख़ों का लहराके हर पल मचलना ||

नशे में है डूबी, क़दम लड़खड़ाती, वो मेघों की टोली चली आ रही है |

कि बिजली के हाथों से ताधिन ताधिन्ता, वो मादल बजाती बढ़ी आ रही है ||

पपीहा सदा ही पियू को पुकारे, तो कोयल भी संग में है सुर को मिलाती |

जवानी की मस्ती में मतवाला भँवरा, कली जिसपे अपना है सर्वस लुटाती ||

मौसम में ठण्डक, तपन बादलों में, वो अम्बुवा की बौरों से झरता पसीना |

सावन की रिमझिम फुहारों के संग ही, लो मन में भी अमृत की धारा बरसती ||

है पगलाई बौराई सारी ही धरती, चढ़ा है नशा पत्ते पत्ते भे भारी |

कि बिखराके सुध बुध को तन मन थिरकता, तो क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी ||

सावन

 

आओ मिलकर झूला झूलें

आओ मिलकर झूला झूलें ।

ऊँची पेंग बढ़ाकर धरती के संग आओ नभ को छू लें ।।

कितने आँधी तूफाँ आएँ, घोर घनेरे बादल छाएँ ।

सबको करके पार, चलो अब अपनी हर मंज़िल को छू लें ।।

हवा बहे सन सन सन सन सन, नभ से अमृत बरसा जाए ।

इन अमृत की बून्दों से आओ मन के मधुघट को भर लें ।।

ऊदे भूरे मेघ मल्हार सुनाते, सबका मन हर्षाते ।

मस्त बिजुरिया संग मस्ती में भर आओ हम नृत्य रचा लें  ।।

हरा घाघरा पहने नभ के संग गलबहियाँ करती धरती ।

आओ हम भी निज प्रियतम संग मन के सारे तार जुड़ा लें ।|

बरखा रानी छम छम छम छम पायल है झनकाती आती ।

कोयलिया की पंचम के संग हम भी पियु को पास बुला लें ।।

सावन है दो चार दिनों का, नहीं राग ये हर एक पल का ।

जग की चिंताओं को तज कर मस्ती में भर आज झूम लें ।।

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आओ मिलकर झूला झूलें

आज सुबह जब खिड़की से बाहर झाँका तो पार्क में लगे झूलों पर अचानक ही नज़र चली गई | सभी झूलों को रंग बिरंगे फूलों से सजाया गया था | पता लगा कि कल तीज का त्यौहार है इसलिए इन झूलों को अभी से सजाया जा रहा है क्योंकि कल सुबह से इन झूलों पर लड़कियाँ और महिलाएँ झूलना शुरू कर देंगी | आज सोसायटी में मेंहदी लगाने वाली को भी बुलाया गया है ताकि महिलाएँ और लड़कियाँ अपने अपने हाथों पैरों पर मेंहदी लगवा सकें | सब कुछ देखकर और सारी बात जानकर बहुत अच्छा लगा |

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वैसे देखा जाए तो अब त्यौहारों में पारम्परिकता की कमी आई है, दिखावा बढ़ गया है | मँहगे से मँहगे उपहार देना और औपचारिकता के तौर पर कुछ देर के लिये “गेट टुगेदर” कर लेना ही त्यौहार माना जाने लगा है | जबकि अपने पुराने दिनों की याद करते हैं तो ध्यान आता है कि कई रोज़ पहले से बाज़ारों में घेवर फेनी मिलने शुरू हो जाया करते थे | बेटियों के घर घेवर फेनी तथा दूसरी मिठाइयों के साथ वस्त्र तथा श्रृंगार की अन्य वस्तुएँ जैसे मेंहदी और चूड़ियाँ आदि लेकर भाई जाया करते थे जिसे “सिंधारा” कहा जाता था | बहू के मायके से आई मिठाइयाँ जान पहचान वालों के यहाँ “भाजी” के नाम से बंटवाई जाती थीं | और इसके पीछे भावना यही रहती थी कि अधिक से अधिक लोगों का आशीर्वाद तथा शुभकामनाएँ मिल सकें | यों तो सारा सावन ही बागों में और घर में लगे नीम आदि के पेड़ों पर झूले लटके रहते थे और लड़कियाँ गीत गा गाकर उन पर झूला करती थीं | पर तीज के दिन तो एक एक घर में सारे मुहल्ले की महिलाएँ और लड़कियाँ हाथों पैरों पर मेंहदी की फुलवारी खिलाए, हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ पहने सज धज कर इकट्ठी हो जाया करती थीं दोपहर के खाने पीने के कामों से निबट कर और फिर शुरू होता था झोंटे देने का सिलसिला | दो महिलाएँ झूले पर बैठती थीं और बाक़ी महिलाएँ गीत गाती उन्हें झोटे देती जाती थीं और झूला झूलने के साथ साथ चुहलबाज़ी भी चलती रहती | सावन के गीतों की वो झड़ी लगती थी कि समय का कुछ होश ही नहीं रहता था | वक़्त जैसे ठहर जाया करता था इस मादक दृश्य का गवाह बनने के लिये |

हम सभी जानते हैं कि भारत त्योहारों और पर्वों का देश है | त्यौहारों का इतना उत्साह, इतने रंग सम्भवतः हमारे ही देश में देखने को मिलते हैं | यहाँ त्यौहार केवल एक अनुष्ठान मात्र नहीं होते, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक तारतम्य, प्राचीन सभ्यताओं की खोज एवं अपने अतीत से जुड़े रहने का सुखद अहसास भी होता है । बहुत सारे लोक पर्व इस देश में मनाए जाते हैं | इन्हीं पर्वों में से एक है तीज का पर्व | कल यानी 5 अगस्त को हरियाली तीज का उल्लासमय पर्व है | सबसे पहले तो इस पर्व की बधाई | श्रावण मास में जब समस्त चराचर जगत वर्षा की रिमझिम फुहारों में सराबोर हो जाता है, इन्द्रदेव की कृपा से जब मेघराज मधु के समान जल का दान पृथिवी को देते हैं और उस अमृतजल का पान करके जब प्यासी धरती की प्यास बुझने लगती है और हरा घाघरा पहने धरती अपनी इस प्रसन्नता को वनस्पतियों के लहराते नृत्य द्वारा जब अभिव्यक्त करने लगती है, जिसे देख जन जन का मानस मस्ती में झूम झूम उठता है तब उस उल्लास का अभिनन्दन करने के लिये, उस मादकता की जो विचित्र सी अनुभूति होती है उसकी अभिव्यक्ति के लिये “हरियाली तीज” अथवा “मधुस्रवा तीज” का पर्व मनाया जाता है | “मधुस्रवा अथवा मधुश्रवा” शब्द का अर्थ ही है मधु अर्थात अमृत का स्राव यानी वर्षा करने वाला | अब गर्मी से बेहाल हो चुकी धरती के लिए भला जल से बढ़कर और कौन सा अमृत हो सकता है ? वैसे भी जल को अमृत ही तो कहा जाता है |

मान्यता है कि पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने जब सौ वर्ष की घोर तपस्या करके शिव को पति के रूप में प्राप्त कर लिया तो श्रावण शुक्ल तृतीया को ही शिव के घर में उनका पदार्पण हुआ था | दक्ष के यज्ञ में पत्नी सती के होम होने के बाद क्रोध में दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करके शिव हिमशिखर पर तपस्या करने चले गए थे | उसी समय सती ने पर्वतराज हिमालय के यहाँ उनकी पत्नी मैना के गर्भ से पार्वती के रूप में जन्म लिया | वह कन्या उमा तथा गौरी के नाम से भी विख्यात हुई । उस समय नारद कन्या को आशीर्वाद देने आए और भविष्यवाणी करते गए कि इस कन्या का विवाह शिव के साथ होगा | इसे सुन पर्वतराज हिमालय सन्तुष्ट हो गए | पार्वती विवाह योग्य हुईं तो हिमालय ने नारद की भविष्यवाणी का स्मरण करके एक सखी के साथ पार्वती को हिमालय के शिखर पर तप कर रहे शिव की सेवा के लिये भेज दिया |

इसी बीच ब्रह्मा के वरदान से वारंगी और वज्रांग के यहाँ तारक नाम के एक पुत्र ने जन्म लिया | तारक जन्म से ही उत्पाती था | जब बड़ा हुआ तो उसने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए आसुरी तप किया | तारक के तप से शिव प्रसन्न हुए और औघड़दानी ने तारक से वर माँगने के लिये कहा | तारक ने शिव से वर माँगा कि करोड़ों वर्षों तक उसका समस्त लोकों में राज्य रहे | शिव से वर प्राप्त करने के बाद तारक और भी अधिक बलशाली एवं क्रूर हो गया | उसने समस्त देवलोक पर अधिकार कर लिया और देवताओं को तरह तरह से त्रस्त करना आरम्भ कर दिया | तारकासुर ने देवलोक में महासंहार मचा दिया | अब नारद ने उपाय बताया कि केवल शिव के वीर्य से उत्पन्न बालक ही तारकासुर का संहार कर सकता है | किन्तु शिव की पत्नी सती तो दक्ष के यज्ञ में होम हो चुकी थीं | पत्नी के बिना पुत्र कैसे उत्पन्न होता ? शिव कठोर तपस्या में लीन थे, इस स्थिति में उन्हें दूसरे विवाह के लिये कैसे मनाया जा सकता था ? तब देवताओं को एक उपाय सूझा | उन्होंने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिये भेजा | किन्तु शिव ने क्रोध में आकर कामदेव को ही भस्म कर दिया और हिमालय छोड़कर कैलाश पर्वत पर चले गए | तब नारद ने पार्वती से आग्रह किया कि वे शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये तपस्या करें | नारद के आग्रह पर १०० वर्षों तक पार्वती ने घोर तपस्या की | किन्तु शिव तपस्या में ऐसे लीन हुए कि पार्वती की तपस्या की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया | स्थिति यहाँ तक पहुँच गई की शिव की तपस्या में पार्वती को अपने तन का भी होश नहीं रहा | खाना पीना पहनना ओढ़ना सब भूल गईं | उसी स्थिति में उन्हें “अपर्णा” भी कहा जाने लगा | अन्त में पार्वती की तपस्या रंग लाई और अनेक प्रकार से पार्वती की परीक्षा लेने के बाद शिव उनसे प्रसन्न हुए और अपना तप पूर्ण करने के बाद पार्वती के साथ विवाह किया | शिव-पार्वती के मिलन से उत्पन्न कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया | मान्यता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया को ही शिव के घर में पार्वती पदार्पण हुआ था | यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि शिव पार्वती का पुनर्मिलन लोक कल्याण की भावना से हुआ था न कि किसी काम भावना के कारण | इसीलिये तो शिव ने उनके यज्ञ में बाधा डालने आए कामदेव को भी भस्म कर दिया था | अतः शिव पार्वती के मिलन का यह पर्व भी इसी प्रकार सात्विक भावना के साथ मनाया जाना चाहिये |

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इस प्रकार की तीन तीज आती हैं एक वर्ष में | हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज | कजरी तीज के अवसर पर दूध दही तथा पुष्पों से नीम की पूजा की जाती है और शिव पार्वती से सम्बन्धित गीत गाए जाते हैं | यह पर्व भाद्रपद कृष्ण तृतीया को मनाया जाता है |

सबसे कठिन पूजा होती है हरतालिका तीज की | तीन दिनों तक महिलाएँ व्रत रखती हैं | भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में हरतालिका तीज की पूजा होती है | कहा जाता है कि भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी ।

श्रावण शुक्ल तृतीया को राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरयाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश में समान रूप से हरियाली तीज का त्यौहार मनाया जाता है | इसमें पारम्परिक रूप से चंद्रमा तथा वट वृक्ष की पूजा की जाती है और लड़कियाँ तथा महिलाएँ सावन से सम्बन्धित लोक गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं | विविध प्रकार के पकवान इस दिन बनाए जाते है | कुछ स्थानों पर मेलों का भी आयोजन किया जाता है | नेपाल में भी यह त्यौहार इतने ही उत्साह के साथ मनाया जाता है और पशुपतिनाथ मन्दिर में पूजा अर्चना की जाती है | वृन्दावन में हरियाली तीज पर राधा कृष्ण की पूजा की जाती है उनके दिव्य प्रेम का सम्मान करने के लिये तथा इस कामना से कि सभी महिलाओं का उनके पति के साथ उसी प्रकार का दिव्य प्रेम सम्बन्ध बना रहे | साथ ही जिस प्रकार पार्वती को उनका इच्छित वर प्राप्त हुआ उसी प्रकार हर लड़की को उसका मनचाहा वर प्राप्त हो इस कामना से कुँआरी लड़कियाँ तीज का पर्व मनाती हैं |

कहने का तात्पर्य है कि, क्योंकि शिव पार्वती का यह सम्मिलन तीज के दिन ही हुआ था | सम्भवतः यही कारण है कि इस दिन सौभाग्यवती महिलाएँ अपने सौभाग्य अर्थात पति की दीर्घायु की कामना से तथा कुँआरी कन्याएँ अनुकूल वर प्राप्ति की कामना से इस पर्व को मनाती हैं | अर्थात श्रावण मास का, वर्षा ऋतु का, मानसून का अभिनन्दन करने के साथ साथ शिव पार्वती के मिलन को स्मरण करने के लिये भी इस हरियाली तीज को मनाया जाता है | जैसा कि सब ही जानते हैं, इस अवसर पर महिलाएँ और लड़कियाँ सज संवर कर, हाथों में सौभाग्य की प्रतीक मेंहदी लगाकर झूला झूलने जाती हैं | तो आइये हम सब भी मिलकर अभिनन्दन करें इस पर्व का तथा पर्व की मूलभूत भावनाओं का सम्मान करें | इस पर्व की मूलभूत भावनाएँ सामाजिक होने के साथ साथ आध्यात्मिक भी हैं – और वो इस प्रकार कि दाम्पत्य जीवन केवल काम भावना का ही नाम नहीं है, वरन पति पत्नी को परस्पर प्रेम भाव से साथ रहते हुए, एक दूसरे का सम्मान करते हुए, लोक कल्याण की भावना से जीवन व्यतीत करना चाहिए ताकि कार्तिकेय जैसा पुत्र उत्पन्न हो जो समाज को समस्त कष्टों से मुक्ति दिला सके | साथ ही सावन की मस्ती को न भूलें, क्योंकि जब सारी पृकृति ही मदमस्त हो जाती है वर्षा की रिमझिम बूँदों का मधुपान करके तो फिर मानव मन भला कैसे न झूम उठेगा……… क्यों न उसका मन होगा हिंडोले पर बैठ ऊँची ऊँची पेंग बढ़ाने का……..

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हीरे से दमकती बरखा की बूँदें

आज फिर से बारिश का दिन है |

रत भर भी छाए रहे बादल

और हलकी हलकी बूँदें

भिगोती रहीं धरा बावली को नेह के रस में |

बरखा की इस भीगी रुत में

पेड़ों की हरी हरी पत्तियों

पुष्पों से लदी टहनियों

के मध्य से झाँकता सवेरे का सूरज

बिखराता है लाल गुलाबी प्रकाश इस धरा पर |

मस्ती में मधुर स्वरों में गान करते पंछी

बुलाते हैं एक दूसरे को और अधिक निकट

आपस में मिलकर एक हो जाने को

मिटा देने को सारा दुई का भाव |

मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू

फूलों की भीनी महक

मलयानिल की सुगन्धित बयार

कर देती हैं तब मन को मदमस्त |

मन चाहता है तब गुम हो जाना

किन्हीं मीठी सी यादों में |

वंशी के वृक्ष से आती मीठी ध्वनि सुन

और हवा से झूमती टहनियों को देख

तन मन हो जाता है नृत्य में लीन |

तेज़ हवा के झोंकों से झूमती वृक्षों की टहनियाँ

जगा देती हैं मन में राग नया

और बन जाता है एक गीत नया

अनुराग भरा, आह्लाद भरा

फिर अचानक

कहीं से खिल उठती है धूप

और हीरे सी दमक उठती हैं बरखा की बूँदें

जो गिरी हुई हैं हरी हरी घास पर |

धीरे धीरे ढलने लगता है दिन

सूर्यदेव करने लगते हैं प्रस्थान

अस्ताचल को

और खो जाती है समस्त प्रकृति

इन्द्रधनुषी सपनों में

ताकि अगली भोर

पुनः प्रभात के दर्शन कर

रची जा सके एक और नई रचना

भरी जा सके चेतनता

सृष्टि के हरेक कण कण में |

यही क्रम है बरखा की रुत में प्रकृति का

शाश्वत… सत्य… चिरन्तन…

किन्तु रहस्यमय…

जिसे लखता है मन  आह्लादित हो

और हो जाता है गुम

इस सुखद रहस्य के आवरण में

पूर्ण समर्पण भाव से……….

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तीज मिलन

हरियाली तीज में अभी 12 दिनों की दूरी है, पर हम एक तीज मिलन समारोह का आनन्द ले आए | वैश्य अग्रवाल महिला पंचायत की ओर से आयोजित तीज मिलन समारोह में 24 जुलाई को हमें भी निमन्त्रण था | कार्यक्रम देखकर सच में आनन्द आ गया | बच्चों और महिलाओं द्वारा सावन का स्वागत करने के लिए रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए | महिलाओं की सौन्दर्य प्रतियोगिता हुई | आनन्द आ गया…