मैं करती हूँ नृत्य

मैं करती हूँ नृत्य

दोनों हाथ ऊपर उठाकर, आकाश की ओर

भर लेने को सारा आकाश अपने हाथों में |

चक्राकार घूमती हूँ

कई आवर्तन घूमती हूँ

गतों और परनों के, तोड़ों और तिहाइयों के |

घूमते घूमते बन जाती हूँ बिन्दु

हो जाने को एक

ब्रह्माण्ड के उस चक्र के साथ |

खोलती हूँ अपनी हथेलियों को ऊपर की ओर

बनाती हूँ नृत्य की एक मुद्रा

देने को निमन्त्रण समस्त विशाल को

कि आओ, करो नृत्य मेरे साथ

मेरी लय में लय मिला, मुद्राओं में मुद्रा मिला

भावों में भाव मिला

और धीरे धीरे बढ़ती है गति

छाता है उन्माद मेरे नृत्य में

क्योंकि मुझे होता है भास अपनी एकता का

उस समग्र के साथ |

और मैं करती हूँ नृत्य, आनन्द में उस क्षण को जीने को |

मैं करती हूँ नृत्य, शिथिल करने के लिये मन को |

मैं करती हूँ नृत्य, खो देने को अपनी सारी उपलब्धियाँ |

मैं करती हूँ नृत्य, मिटा देने को सारी सम्वेदनाएँ |

मैं करती हूँ नृत्य, विस्मृत कर देने को सारा ज्ञान |

मैं करती हूँ नृत्य, अन्तिम समर्पण को स्वयं के |

 

 

 

 

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ईश्वर की अद्भुत कृति औरत

ईश्वर की अद्भुत कृति “औरत”…

ख़ूबसूरती, दृढ़ इच्छाशक्ति, विद्वत्ता और सद्गुणों का

एक बेहतरीन मेल “औरत”…

प्रेम, स्नेह, सम्मान, उमंग, उछाह और उत्साह का

एक बेहतरीन मेल “औरत”…

क्योंकि ईश्वर ने अपनी इस अद्भुत कृति की रचना ही की है

निर्माण के लिए, सृजन के लिए, सम्वर्धन और पोषण के लिए

मानवमात्र के मार्ग दर्शन के लिए…

जो असम्भव है बिना प्रेम और स्नेह का दान दिए

जो असम्भव है उमंग और उत्साह के भी बिना

नहीं होगी दृढ़ इच्छशक्ति / या नहीं होंगे गुण

तो कैसे कर पाएगी मार्गदर्शन

और ये समस्त कार्य पूर्ण सत्यता और निष्ठा के साथ करती आ रही है नारी

हर युग में… हर काल में… हर परिस्थिति में…

आज वह पूर्ण दृढ़ता के साथ आवाज़ उठा सकती है

किसी भी प्रकार की अव्यवस्था के ख़िलाफ़…

आज वह किसी की अनुगामी नहीं

बल्कि स्वयं अपने ही पदचिह्नों की छाप छोड़ती

बढ़ रही है आगे

जिनसे दिशा प्राप्त हो रही है दूसरों को भी…

आज वह भीड़तन्त्र जा हिस्सा नहीं है

रखती है साहस और उत्साह नियन्त्रित करने का भीड़ को…

उसे नहीं है आवश्यकता माँगने को भीख अपने अधिकार की

वह तो स्वयं है समाज की रचनाकार…

तभी तो जब अवसर मिलता है / झूम उठती है मस्ती में भर

नाच उठती है अपने हाथ आकाश की ओर उठा

मानों भर लेना चाहती हो समूचे ब्रह्माण्ड को

अपनी स्नेह से कोमल किन्तु साहस से दृढ़ बाहों में…

सीखना होगा

रविवार यानी 10 मार्च को WOW India और DGF के सदस्यों ने मिलकर बड़े उत्साह के साथ महिला दिवस मनाया | तभी कुछ विचार मन में उठे कि हम महिलाएँ जब परिवार की, समाज की, राष्ट्र की, विश्व की एक अनिवार्य इकाई हैं – जैसा कि हमारी लघु नाटिका के माध्यम से कहने का प्रयास भी हम लोगों ने किया – फिर क्या कारण है कि महिला सशक्तीकरण के लिए हमें आन्दोलन चलाने पड़ रहे हैं ? और तब एक बात समझ आई, कि अभी भी बहुत कुछ सीखना समझना शेष है…

लानी है समानता समाज में / और बढ़ाना है सौहार्द दिलों में

तो आवश्यक है सशक्तीकरण महिलाओं का

क्योंकि विश्व की आधी आबादी / नारी

प्रतीक है माँ दुर्गा की शक्ति का

प्रतीक है माँ वाणी के ज्ञान का

प्रतीक है इस तथ्य का / कि शक्ति और ज्ञान के अभाव में

धन की देवी लक्ष्मी का भी नहीं है कोई अस्तित्व…

प्रतीक है स्नेह, सेवा, त्याग और बलिदान का

ईश्वर की अद्भुत कृति नारी

नहीं है सम्भव जिसके बिना कोई भी रचना…

थम जाएगी संसार की प्रगति / यदि थम गई नारी

क्योंकि वही तो करती है सृजन और संवर्धन…

जनयित्री के रूप में करती है पोषण / नौ माह तक गर्भ में

और फिर झूम उठती है अपने कोमल किन्तु सशक्त हाथों में थामे

अपने ही अस्तित्व के अंश को…

उसके बाद समूची जीवन यात्रा में / करती है मार्ग प्रशस्त

कभी माँ, कभी बहन, कभी प्यारी सी बिटिया

और कभी प्रेमिका या पत्नी के रूप में

निर्वाह करती है दायित्व हर रूप में / एक मार्गदर्शक का…

बिटिया के रूप में एक कल्पनाशील मन लिए

जो छू लेना चाहता है आकाश / अपने नन्हे से हाथों से…

सुन्दरी युवती के रूप में कुछ अनोखे भाव लिए

जो मिलाकर एक कर सकती है / धरा गगन की सीमाओं को भी

इसीलिए अपनाती है एक सशक्त जीवन दर्शन…

और अन्त में जीवन के अनेकों अनुभवों से पूर्ण

एक प्रौढ़ा और फिर वृद्धा के रूप में

मिला देती है हरेक दर्शन को

साथ में अपने जीवन दर्शन के…

ठीक वैसे ही / जैसे प्रकृति दिखलाती है नित रूप नए

जिनमें होते हैं निहित मनोभाव / समस्त जड़ चेतन के…

पर हे नारी ! सीखना होगा तुम्हें सबसे पहले

प्यार और सम्मान करना स्वयं की ही आन्तरिक शक्ति का…

गर्व करना स्वयं के ही ज्ञान और जीवन दर्शन पर…

मुग्ध हो जाना अपने स्वयं के ही आन्तरिक सौन्दर्य पर…

और अभिभूत हो जाना अपनी स्वयं की हर छोटी बड़ी उपलब्धि पर…

 

 

वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ

लो फिर से मदिराया वसन्त

कल वसन्त पञ्चमी – प्रकृति के उत्सव का वासन्ती पर्व समस्त उत्तर भारत में मनाया जाएगा और हम सब ज्ञान विज्ञान की देवी माँ वाणी का अभिनन्दन करेंगे | ज्ञान यानी शक्ति प्राप्त करना, सम्मान प्राप्त करना | ज्ञानार्जन करके व्यक्ति न केवल भौतिक जीवन में प्रगति कर सकता है अपितु मोक्ष की ओर भी अग्रसर हो सकता है | पुराणों में कहा गया है “सा विद्या या विमुक्तये” (विष्णु पुराण 1/19/41) अर्थात ज्ञान वही होता है जो व्यक्ति को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करे | मोक्ष का अर्थ शरीर से मुक्ति नहीं है | मोक्ष का अर्थ है समस्त प्रकार के भयों से मुक्ति, समस्त प्रकार के सन्देहों से मुक्ति, समस्त प्रकार के अज्ञान – कुरीतियों – दुर्भावनाओं से मुक्ति – ताकि व्यक्ति के समक्ष उसका लक्ष्य स्पष्ट हो सके और उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग स्पष्ट हो सके |

सभी जानते हैं कि ये पर्व ऐसे समय आता है जब भगवान् भास्कर अपनी रश्मियों के रथ पर सवार हो ठिठुराती ठण्ड को दूर भगाते हुए उत्तर दिशा की ओर भ्रमण कर रहे होते हैं | सर्दियों की विदाई के साथ ही प्रकृति स्वयं अपने समस्त बन्धन खोलकर – अपनी समस्त सीमाएँ तोड़कर – प्रेम के मद में ऐसी मस्त हो जाती है कि मानो ऋतुराज को रिझाने के लिए ही वासन्ती परिधान धारण कर नव प्रस्फुटित कलिकाओं से स्वयं को सुसज्जित कर लेती है… जिनका अनछुआ नवयौवन लख चारों ओर मंडराते भँवरे गुन गुन करते वसन्त का राग आलापने लगते हैं… आम बौरा जाते हैं… वसन्त के परम मित्र कामदेव अपने धनुष पर स्नेह प्रेम के पुष्पों का बाण चढ़ा देते हैं… और प्रकृति की इस रंग बिरंगी छटा को देखकर मगन हुई कोयल भी कुहू कुहू का गान सुनाती हर जड़ चेतन को प्रेम का नृत्य रचाने को विवश कर देती है… इसीलिए तो वसन्त को ऋतुओं का राजा कहा जाता है…

वसन्त को भगवान् कृष्ण ने गीता में अपना ही एक रूप बताया है | धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व इस पर्व का यही है कि ज्ञान विज्ञान की देवी भगवती सरस्वती के साथ ही सूर्य, गंगा मैया तथा भू देवी की पूजा अर्चना के माध्यम से जन जन को सन्देश प्राप्त होता है कि जिस प्रकृति ने हमारे जीवन में इतने सारे रंग भरे हैं, हमें वृक्षों, वनस्पतियों, स्वच्छ वायु, जल, पशु पक्षियों आदि के रूप में जीवित रहने के समस्त साधन प्रदान किये हैं – उस पञ्चभूतात्मिका प्रकृति को धन्यवाद दें और उसका सम्मान करना सीखें |

वसन्त के महान गायक कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् और ऋतुसंहार तथा बाणभट्ट के कादम्बरी और हर्ष चरित जैसे अमर ग्रन्थों में प्रेम की इस मदिर ऋतु तथा इस मधुर पर्व का इतना सुरुचिपूर्ण वर्णन उपलब्ध होता है कि जहाँ या तो प्रेमीजन जीवन भर साथ रहने का संकल्प लेते देखाई देते हैं या फिर बिरहीजन अपने प्रिय के शीघ्र मिलन की कामना करते दिखाई देते हैं | संस्कृत ग्रन्थों में तो वसन्तोत्सव को मदनोत्सव ही कहा गया है जबकि वसन्त के श्रंगार टेसू के पुष्पों से सजे वसन्त की मादकता देखकर तथा होली की मस्ती और फाग के गीतों की धुन पर हर मन मचल उठता था | इस मदनोत्सव में नर नारी एकत्र होकर चुन चुन कर पीले पुष्पों के हार बनाकर एक दूसरे को पहनाते और एक दूसरे पर अबीर कुमकुम की बौछार करते हुए वसन्त की मादकता में डूबकर कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा करते थे | वसन्त पञ्चमी से लेकर होली तक सारा समय प्रेम के लिए समर्पित होता था | आज भी देश के अनेक अंचलों में पीतवस्त्रों और पीतपुष्पों में सजे नर-नारी बाल-वृद्ध एक साथ मिलकर माँ वाणी के वन्दन के साथ साथ प्रेम के इस देवता की भी उल्लासपूर्वक अर्चना करते हैं |

इस पर्व के दौरान पीले वस्त्र धारण करने के एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि पीत वर्ण का सम्बन्ध जहाँ एक ओर सूर्य से माना जाता है, वहीं भगवान् विष्णु और माँ वाणी से सम्बद्ध माना जाता है | साथ ही पीला रंग सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है तथा मन को स्थिरता प्रदान करने वाला, शान्ति प्रदान करने वाला माना जाता है | पीला रंग विचारों में सकारात्मकता, आशा तथा ताज़गी का प्रतीक माना जाने के कारण व्यक्ति को उसके Career में में उन्नति का सूचक भी माना जाता है | इन्हीं कारणों से भगवान् विष्णु और भगवती सरस्वती को पीले पुष्प अर्पित किये जाते हैं |

और संयोग देखिए कि आज ही के दिन नूतन काव्य वधू का अपने गीतों के माध्यम से नूतन शृंगार रचने वाले प्रकृति नटी के चतुर चितेरे महाप्राण निराला का जन्मदिवस भी धूम धाम से मनाया जाता है…

तो, वसन्त के मनमोहक संगीत के साथ सभी मित्रों को सरस्वती पूजन, निराला जयन्ती तथा प्रेम के मधुमय वासन्ती पर्व वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ… इस संकल्प के साथ कि प्रकृति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाएँगे… और इस आशा और विश्वास के साथ कि हम सब ज्ञान प्राप्त करके समस्त भयों तथा सन्देहों से मोक्ष प्राप्त कर अपना लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढ़ सकें… ताकि अपने लक्ष्य को प्राप्त करके उन्मुक्त भाव से प्रेम और मस्ती का राग आलाप सकें…

लो फिर से है आया वसन्त, लो फिर से मुस्काया वसन्त ||

मन की कोयल है कूक उठी, हर सेज सेज है महक उठी |

और अंग अंग में मधु की मस्त बहारों सा छाया वसन्त ||

भंवरा गाता गुन गुन गुन गुन, कलियों से करता अठखेली |

और प्रेम पगे भावों से मन में उनके हूक उपज उठती ||

हरियाली धरती को मदमस्त बनाता लो आया वसन्त ||

दूल्हा वसन्त निज दुल्हनिया को पीत हार है पहनाता |

दुल्हिन धरती का हरा घाघरा आज कहीं उड़ता जाता |

लो कामदेव के बाणों पर है पुष्प सजा आया वसन्त ||

पपीहा बंसी में सुर फूँके, और डार डार सरसों फूले |

है सजा प्रणय का राग, हरेक जड़ चेतन का है मन झूमे |

लो मस्ती का है रास रचाता महकाता आया वसन्त ||

लो फिर से है लहराया वसन्त, लो फिर से मदिराया वसन्त…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/02/09/vasant-panchami-the-festival-of-nature/

 

कहानी दिवस और निशा की

हर भोर उषा की किरणों के साथ

शुरू होती है कोई एक नवीन कहानी…

हर नवीन दिवस के गर्भ में

छिपे होते हैं न जाने कितने अनोखे रहस्य

जो अनावृत होने लगते हैं चढ़ने के साथ दिन के…

दिवस आता है अपने पूर्ण उठान पर

तब होता है भान

दिवस के अप्रतिम दिव्य सौन्दर्य का…

सौन्दर्य ऐसा, जो करता है नृत्य / रविकरों की मतवाली लय पर

अकेला, सन्तुष्ट होता स्वयं के ही नृत्य से

मोहित होता स्वयं के ही सौन्दर्य और यौवन पर

देता हुआ संदेसा

कि जीवन नहीं है कोई बोझ

वरन है एक उत्सव

प्रकाश का, गीत का, संगीत का, नृत्य का और उत्साह का…

दिन ढलने के साथ

नीचे उतरती आती है सन्ध्या सुन्दरी

तो चल देता है दिवस / साधना के लिए मौन की

ताकि सुन सके जगत

सन्ध्या सुन्दरी का मदिर राग…

और बन सके साक्षी एक ऐसी बावरी निशा का

जो यौवन के मद में चूर हो करती है नृत्य

पहनकर झिलमिलाते तारकों का मोहक परिधान

चन्द्रिका के मधुहासयुक्त सरस विहाग की धुन पर…

थक जाएँगी जब दोनों सखियाँ

तो गाती हुई राग भैरवी / आएगी भोर सुहानी

और छिपा लेगी उन्हें कुछ पल विश्राम करने के लिए

अपने अरुणिम आँचल की छाँव में…

फिर भेजेगी सँदेसा चुपके से / दिवस प्रियतम को

कि अवसर है, आओ, और दिखाओ अपना मादक नृत्य

सूर्य की रजत किरणों के साथ

ऐसी है ये कहानी / दिवस और निशा की

जो देती है संदेसा / कि हो जाए बन्द यदि कोई एक द्वार

या जीवन संघर्षों के साथ नृत्य करते / थक जाएँ यदि पाँव

मत बैठो होकर निराश

त्याग कर चिन्ता बढ़ते जाओ आगे / देखो चारों ओर

खुला मिलेगा कोई द्वार निश्चित ही

जो पहुँचाएगा तुम्हें अपने लक्ष्य तक

निर्बाध… निरवरोध…

उसी तरह जैसे ढलते ही दिवस के / ठुमकती आती है सन्ध्या साँवरी

अपनी सखी निशा बावरी के साथ

और थक जाने पर दोनों के

भोर भेज देती है निमन्त्रण दिवस प्रियतम को

भरने को जगती में उत्साह

यही तो क्रम है सृष्टि का… शाश्वत… चिरन्तन…

ठिठुराती भीषण ठण्ड में

ठिठुराती भीषण ठण्ड में

जब प्रकृति नटी ने छिपा लिया हो स्वयं को

चमकीली बर्फ की घनी चादर में

छाई हो चारों ओर घरों की छत पर और आँगन में

खामोशी के साथ “टप टप” बरसती धुँध

नहीं दीख पड़ता कि चादर के उस पार दूसरा कौन है

और फिर इसी द्विविधा को दूर करने

धीरे धीरे मीठी मुस्कान के सूर्यदेव का ऊपर उठाना

जो कर देता है खिलखिलाती स्वर्णिम धूप को आगे

मिटाने को मन की द्विविधा

जो परोस देती है स्वर्ण में पिरोई मोतियों की लड़ियाँ

प्रकति की विशाल थाली में

तब याद आता है अपना बचपन

वो माँ का रजाई के भीतर हाथ डालकर

हौले हौले से अपने ठंडे हाथ मुँह पर फिराकर पुकारना

वो दोस्तों के साथ धूप रहते आँगन में चारपाई पर बैठकर मूँगफली खाना

और माँ को स्वेटर बुनते देखना

या फिर दोस्तों के साथ धूप में बाहर चबूतरे पर धमा चौकड़ी मचाना

साँझ ढलते है माँ का फिर से पुकारना भीतर आने के लिए

धूप सेंकते माँ पिताजी की मूँगफली छीलते और गज़क खाते मीठी नोंक झोंक

और देखते ही देखते फिर से छिप जाना कोहरे की घनी चादर में

प्रकृति सुकुमारी का

जिसके साथ शुरू हो जाती थी माँ और पिताजी की

बिटिया को अपनी बाहों की निवास में छिपा लेने की मीठी होड़

और इसी मिठास के साथ धीरे धीरे बड़े होते जाना

जिम्मेदारियों और काम का बोझ खुद अपने ऊपर आ जाना

क्योंकि आज न माँ है न पिताजी

बल्कि मैं खुद बन चुकी हूँ अपनी बिटिया के लिए एक मीठा गर्म अहसास

“माँ”

इस पल्लवित पुष्पित प्रकृति के साथ ही

और अब जब देखती हूँ बर्फ का लंहगा पहने

कोहरे की चादर में लिपटी

शान्तचित्त ध्यान में मग्न प्रकृति को

तो अहसास होने लगा है खुद अपने भीतर की शान्ति और ऊष्मा का

सूर्य की मुस्कराहट के साथ खिलखिलाती मोती बिखराती धूप से

जब धीरे धीरे भंग होता है प्रकृति का ध्यान

और जुट जाती है वह अपने नित्य प्रति के कर्तव्य कर्मों में

तब अहसास होता है मानव जीवन की प्रगति यात्रा का

ठण्ड ठिठुर रही तो क्या

शीघ्र ही वसन्त भी तो आने वाला है

बर्फ को पिघलाती और धुँध को छाँटते हुए

फिर आएगी गर्मी और फिर बरसात…

नहीं रुकने पाती प्रगति की यह प्रगति पथ की यात्रा…

चलती रहती है अनवरत निरन्तर निर्बाध…

इसी तरह तरह युगों युगों तक…

सूर्योदय

समस्याएँ जीवन का एक अभिन्न अंग

जिनसे नहीं है कोई अछूता इस जगत में

किन्तु समस्याओं पर विजय प्राप्त करके जो बढ़ता है आगे

नहीं रोक सकती उसे फिर कोई बाधा

हर सन्ध्या अस्त होता है सूर्य

पुनः उदित होने को अगली भोर में

जो दिलाता है विश्वास हमें

कि नहीं है जैसा मेरा उदय और अवसान स्थाई

उसी प्रकार नहीं है कोई सुख अथवा समस्या भी स्थाई

रोम रोम को आह्लादित करते सुख के मध्य से ही

सर उठाती है कोई समस्या

जो हिला देती है व्यक्ति को भीतर तक

किन्तु चिन्ता किस बात की – कल होने वाला है अन्त इस समस्या का

किन्तु नहीं है यह अन्त भी चिरस्थाई

आनन्द के समुद्र में गोते लगाते

कल फिर उपज सकती हैं नवीन समस्याएँ

जो नहीं रहेंगी परसों

और चलता रहता है यही क्रम अनवरत निरन्तर युगों युगों तक

इसीलिए तो भोर के केसर जैसी लालिमायुत रश्मिपथ पर

धीरे धीरे ऊपर उठता सूर्य देता है संदेसा जग को

कि उठो, जागो मीठी नींद से,

और भुलाकर कल की चिन्ताएँ बढ़ चलो प्रगति पथ पर

सूर्योदय से पूर्व का दृश्य

भरता है एक नवीन ऊर्जा

और एक नवीन चेतना कण कण में

और शीत की ये सुहानी पीत भोर

करती है नवीन आशा का संचार कण कण में…