Category Archives: हिन्दी कविता

इस जीवन को

आज भगवान् श्री कृष्ण का जन्म महोत्सव है | देश के सभी मन्दिर और भगवान् की मूर्तियों को सजाकर झूले लगाए गए हैं | न जाने क्यों, इस अवसर पर अपनी एक पुरानी रचना यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, क्योंकि हमारे विचार से मानव में ही समस्त चराचर का साथी बन जाने की अपार सम्भावनाएँ निहित हैं, और यही युग प्रवर्तक परम पुरुष भगवान श्री कृष्ण के महान चरित्र और उपदेशों का सार भी है…

इस जीवन को मैं केवल सपना क्यों समझूँ,
हर भोर उषा की किरण जगाती है मुझको |
हर शाम निशा की बाहों में मुस्काता है
चंदा, तब मादकता छा जाती है मुझको ||
हो समझ रहा कोई, जग मिथ्या छाया है
है सत्य एक बस ब्रह्म, और सब माया है |
पर मैं इस जग को केवल भ्रम कैसे समझूँ
क्षण क्षण कण कण है आकर्षित करता मुझको ||
कल कल छल छल स्वर में गाती है जब नदिया
प्राणों की पायल तब करती ता ता थैया |
पर्वत की ऊँची छोटी चढ़ थकती आँखें
तब मधुर कल्पना कर जाती मोहित मुझको ||
जब कोई भूखा नंगा मिल जाता पथ पर
लगता, खुद ब्रह्म खोजता है मरघट भू पर |
चंचल शिशु तुतलाए नैनों मुझको पढ़ता
जग का नश्वर बन्धन महान लगता मुझको ||
क्या ब्रह्म कभी साथी बन पाया है नर का ?
क्या देख भूख का ताण्डव मन रोया उसका ?
मैं इसी हेतु निज शीश झुकाती मानव को
वह सकल चराचर का साथी लगता मुझको ||

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अहम् ब्रह्मास्मि

मंज़िल का भान हो न हो / पथ का भी ज्ञान हो न हो

आत्मा – हमारी अपनी चेतना / नित नवीन पंख लगाए

सदा उड़ती ही जाती है / सतत / निरन्तर / अविरत…

क्योंकि मैं “वही” हूँ / मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं

“अहम् ब्रह्मास्मि” या कह लीजिये “सोSहमस्मि”

तभी तो, कभी इस तन, कभी उस तन

कभी तेरे तन तो कभी मेरे तन |

न इसके पंख जलते हैं भयंकर ताप से

न ये गलते हैं अनवरत बरखा के पानी से

और न ही ये सिकुड़ते हैं तेज़ सर्द हवाओं से |

इन डैनों को फैलाए आत्मा – हमारी अपनी चेतना

उड़ती जाती है विशाल ब्रह्माण्ड में / सतत / निरन्तर / अविरत…

कितनी दूर अभी जाना है / कहाँ रुकना है

नहीं ज्ञान इसे / बस ज्ञान है तो इतना

कि फैलेँगे पंख जितने विशाल / ऊँची होगी उतनी उड़ान |

प्रत्यक्ष की इस जीवन यात्रा में

आत्मा – हमारी अपनी चेतना

बस उड़ती ही रहती है / सतत / निरन्तर / अविरत…

थकते नहीं कभी / कमज़ोर पड़ते नहीं कभी पंख इसके

हाँ, ठहर ज़रूर जाते हैं कुछ पलों के लिए

क्योंकि आ जाते हैं व्यवधान राहों में |

कभी मार्ग रोकता है क्रोध

लेकिन साथ ही प्रेम दिखा देता है नया मार्ग |

कभी मार्ग रोकते हैं भय और कष्ट

तो साथ ही पुरुषार्थ खोल देता है नई राहें |

कभी उन फैले पंखों से पहुँचता है कष्ट किसी को

तो क्षमादान प्रशस्त करता है एक नया मार्ग |

कभी होता है अभिमान एक पंख को अपने विस्तार का

तो दूसरा पंख एक ओर झुककर / प्रशस्त करता है मार्ग विनम्रता का |

एक पंख के साथ होता है रुदन

तो दूसरा हँसकर उसे पहुँचाता है सुख |

कभी दोनों ही पंख होते हैं उपेक्षित

तो कभी दोनों को मिलता है सम्मान अपार |

यही क्रम है सृष्टि का – संसार चक्र का

आत्मा – हमारी अपनी चेतना

अनेक प्रकार के पंख लगाए

बस उड़ती जाती है अपने ही विशाल विस्तार में

सतत / निरन्तर / अविरत……..

तो आइये आज दे दें अपनी आत्मा को पंख उन्मुक्त प्रेम के

भर दें इन पंखों में माधुर्य क्षमा का

पुरुषार्थ से कर दें इन पंखों को बलिष्ठ

हवा भर दें इन पंखों में विनम्रता की

ताकि उड़ती रहे आत्मा – हमारी अपनी चेतना

अपने ही विशाल विस्तार में / सतत / निरन्तर / अविरत / अनवरत……

निस्वार्थ प्रेम ही है ध्यान

निस्वार्थ प्रेम ही है ध्यान

संसार के समस्त वैभव होते हुए भी

कँगाल है मनुष्य, रीते हैं हाथ उसके

यदि नहीं है प्रेम का धन उसके पास…

किया जा सकता है प्रेम समस्त चराचर से

क्योंकि नहीं होता कोई कँगाल दान करने से प्रेम का

जितना देते हैं / बढ़ता है उतना ही…

नहीं है कोई परिभाषा इसकी / न ही कोई नाम / न रूप

बस है एक विचित्र सा अहसास…

सोचते सोचते हुआ आभास कुछ / आँखों ने देखा कुछ

कानों ने सुना कुछ / कुछ ऐसा जिसने किया मुझे आकर्षित

खटखटाया द्वार किसी ने धीमे धीमे प्यार से…

मैंने सुना, और मैं सुनती रही / मैंने देखा, और मैं देखती रही

मैंने सोचा, और मैं सोचती रही / द्वार खोलूँ या ना खोलूँ…

प्रेम खटखटाता रहा द्वार / और भ्रमित मैं बनी रही जड़

खोई रही अपने ऊहापोह में..

तभी कहा किसी ने / सम्भवतः मेरी अन्तरात्मा ने

सारा सोच विचार है व्यर्थ

क्योंकि तुम द्वार खोलो या ना खोलो / द्वार टूटेगा,

और प्रेम आएगा भीतर

कब, इसका भान भी नहीं हो पाएगा तुम्हें…

हाँ, यदि करती रही प्रयास इसे पाने का

गणनाएँ और मोल भाव / लेन देन या नक़द उधार

तो लौटना होगा रिक्त हस्त

क्योंकि आदत नहीं प्रेम को गणनाओं की

मोल भाव की या नक़द उधार की…

क्या होगा, इसका प्रश्न क्यों ?

कैसे होगा, इसका चिन्तन क्यों ?

कितना होगा, इसका मनन क्यों ?

छोड़ दो ये सारे प्रश्न, विचार, चिन्तन और मनन

प्रेम के प्रकाश को करने दो पार सीमाएँ अपने समस्त तर्कों की

और तब, वही निस्वार्थ निराकार प्रेम / बन जाएगा ध्यान…

ध्यान, जो होगा तुम्हारे ही भीतर…

ध्यान, जो होगा तुम्हारे ही लिये…

ध्यान, जो होगी तुम स्वयम् ही…

मैं करती हूँ नृत्य

मैं करती हूँ नृत्य

दोनों हाथ ऊपर उठाकर, आकाश की ओर

भर लेने को सारा आकाश अपने हाथों में |

चक्राकार घूमती हूँ

कई आवर्तन घूमती हूँ

गतों और परनों के, तोड़ों और तिहाइयों के |

घूमते घूमते बन जाती हूँ बिन्दु

हो जाने को एक

ब्रह्माण्ड के उस चक्र के साथ |

खोलती हूँ अपनी हथेलियों को ऊपर की ओर

बनाती हूँ नृत्य की एक मुद्रा

देने को निमन्त्रण समस्त विशाल को

कि आओ, करो नृत्य मेरे साथ

मेरी लय में लय मिला, मुद्राओं में मुद्रा मिला

भावों में भाव मिला

और धीरे धीरे बढ़ती है गति

छाता है उन्माद मेरे नृत्य में

क्योंकि मुझे होता है भास अपनी एकता का

उस समग्र के साथ |

और मैं करती हूँ नृत्य, आनन्द में उस क्षण को जीने को |

मैं करती हूँ नृत्य, शिथिल करने के लिये मन को |

मैं करती हूँ नृत्य, खो देने को अपनी सारी उपलब्धियाँ |

मैं करती हूँ नृत्य, मिटा देने को सारी सम्वेदनाएँ |

मैं करती हूँ नृत्य, विस्मृत कर देने को सारा ज्ञान |

मैं करती हूँ नृत्य, अन्तिम समर्पण को स्वयं के |

 

 

 

 

ईश्वर की अद्भुत कृति औरत

ईश्वर की अद्भुत कृति “औरत”…

ख़ूबसूरती, दृढ़ इच्छाशक्ति, विद्वत्ता और सद्गुणों का

एक बेहतरीन मेल “औरत”…

प्रेम, स्नेह, सम्मान, उमंग, उछाह और उत्साह का

एक बेहतरीन मेल “औरत”…

क्योंकि ईश्वर ने अपनी इस अद्भुत कृति की रचना ही की है

निर्माण के लिए, सृजन के लिए, सम्वर्धन और पोषण के लिए

मानवमात्र के मार्ग दर्शन के लिए…

जो असम्भव है बिना प्रेम और स्नेह का दान दिए

जो असम्भव है उमंग और उत्साह के भी बिना

नहीं होगी दृढ़ इच्छशक्ति / या नहीं होंगे गुण

तो कैसे कर पाएगी मार्गदर्शन

और ये समस्त कार्य पूर्ण सत्यता और निष्ठा के साथ करती आ रही है नारी

हर युग में… हर काल में… हर परिस्थिति में…

आज वह पूर्ण दृढ़ता के साथ आवाज़ उठा सकती है

किसी भी प्रकार की अव्यवस्था के ख़िलाफ़…

आज वह किसी की अनुगामी नहीं

बल्कि स्वयं अपने ही पदचिह्नों की छाप छोड़ती

बढ़ रही है आगे

जिनसे दिशा प्राप्त हो रही है दूसरों को भी…

आज वह भीड़तन्त्र जा हिस्सा नहीं है

रखती है साहस और उत्साह नियन्त्रित करने का भीड़ को…

उसे नहीं है आवश्यकता माँगने को भीख अपने अधिकार की

वह तो स्वयं है समाज की रचनाकार…

तभी तो जब अवसर मिलता है / झूम उठती है मस्ती में भर

नाच उठती है अपने हाथ आकाश की ओर उठा

मानों भर लेना चाहती हो समूचे ब्रह्माण्ड को

अपनी स्नेह से कोमल किन्तु साहस से दृढ़ बाहों में…

सीखना होगा

रविवार यानी 10 मार्च को WOW India और DGF के सदस्यों ने मिलकर बड़े उत्साह के साथ महिला दिवस मनाया | तभी कुछ विचार मन में उठे कि हम महिलाएँ जब परिवार की, समाज की, राष्ट्र की, विश्व की एक अनिवार्य इकाई हैं – जैसा कि हमारी लघु नाटिका के माध्यम से कहने का प्रयास भी हम लोगों ने किया – फिर क्या कारण है कि महिला सशक्तीकरण के लिए हमें आन्दोलन चलाने पड़ रहे हैं ? और तब एक बात समझ आई, कि अभी भी बहुत कुछ सीखना समझना शेष है…

लानी है समानता समाज में / और बढ़ाना है सौहार्द दिलों में

तो आवश्यक है सशक्तीकरण महिलाओं का

क्योंकि विश्व की आधी आबादी / नारी

प्रतीक है माँ दुर्गा की शक्ति का

प्रतीक है माँ वाणी के ज्ञान का

प्रतीक है इस तथ्य का / कि शक्ति और ज्ञान के अभाव में

धन की देवी लक्ष्मी का भी नहीं है कोई अस्तित्व…

प्रतीक है स्नेह, सेवा, त्याग और बलिदान का

ईश्वर की अद्भुत कृति नारी

नहीं है सम्भव जिसके बिना कोई भी रचना…

थम जाएगी संसार की प्रगति / यदि थम गई नारी

क्योंकि वही तो करती है सृजन और संवर्धन…

जनयित्री के रूप में करती है पोषण / नौ माह तक गर्भ में

और फिर झूम उठती है अपने कोमल किन्तु सशक्त हाथों में थामे

अपने ही अस्तित्व के अंश को…

उसके बाद समूची जीवन यात्रा में / करती है मार्ग प्रशस्त

कभी माँ, कभी बहन, कभी प्यारी सी बिटिया

और कभी प्रेमिका या पत्नी के रूप में

निर्वाह करती है दायित्व हर रूप में / एक मार्गदर्शक का…

बिटिया के रूप में एक कल्पनाशील मन लिए

जो छू लेना चाहता है आकाश / अपने नन्हे से हाथों से…

सुन्दरी युवती के रूप में कुछ अनोखे भाव लिए

जो मिलाकर एक कर सकती है / धरा गगन की सीमाओं को भी

इसीलिए अपनाती है एक सशक्त जीवन दर्शन…

और अन्त में जीवन के अनेकों अनुभवों से पूर्ण

एक प्रौढ़ा और फिर वृद्धा के रूप में

मिला देती है हरेक दर्शन को

साथ में अपने जीवन दर्शन के…

ठीक वैसे ही / जैसे प्रकृति दिखलाती है नित रूप नए

जिनमें होते हैं निहित मनोभाव / समस्त जड़ चेतन के…

पर हे नारी ! सीखना होगा तुम्हें सबसे पहले

प्यार और सम्मान करना स्वयं की ही आन्तरिक शक्ति का…

गर्व करना स्वयं के ही ज्ञान और जीवन दर्शन पर…

मुग्ध हो जाना अपने स्वयं के ही आन्तरिक सौन्दर्य पर…

और अभिभूत हो जाना अपनी स्वयं की हर छोटी बड़ी उपलब्धि पर…

 

 

वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ

लो फिर से मदिराया वसन्त

कल वसन्त पञ्चमी – प्रकृति के उत्सव का वासन्ती पर्व समस्त उत्तर भारत में मनाया जाएगा और हम सब ज्ञान विज्ञान की देवी माँ वाणी का अभिनन्दन करेंगे | ज्ञान यानी शक्ति प्राप्त करना, सम्मान प्राप्त करना | ज्ञानार्जन करके व्यक्ति न केवल भौतिक जीवन में प्रगति कर सकता है अपितु मोक्ष की ओर भी अग्रसर हो सकता है | पुराणों में कहा गया है “सा विद्या या विमुक्तये” (विष्णु पुराण 1/19/41) अर्थात ज्ञान वही होता है जो व्यक्ति को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करे | मोक्ष का अर्थ शरीर से मुक्ति नहीं है | मोक्ष का अर्थ है समस्त प्रकार के भयों से मुक्ति, समस्त प्रकार के सन्देहों से मुक्ति, समस्त प्रकार के अज्ञान – कुरीतियों – दुर्भावनाओं से मुक्ति – ताकि व्यक्ति के समक्ष उसका लक्ष्य स्पष्ट हो सके और उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग स्पष्ट हो सके |

सभी जानते हैं कि ये पर्व ऐसे समय आता है जब भगवान् भास्कर अपनी रश्मियों के रथ पर सवार हो ठिठुराती ठण्ड को दूर भगाते हुए उत्तर दिशा की ओर भ्रमण कर रहे होते हैं | सर्दियों की विदाई के साथ ही प्रकृति स्वयं अपने समस्त बन्धन खोलकर – अपनी समस्त सीमाएँ तोड़कर – प्रेम के मद में ऐसी मस्त हो जाती है कि मानो ऋतुराज को रिझाने के लिए ही वासन्ती परिधान धारण कर नव प्रस्फुटित कलिकाओं से स्वयं को सुसज्जित कर लेती है… जिनका अनछुआ नवयौवन लख चारों ओर मंडराते भँवरे गुन गुन करते वसन्त का राग आलापने लगते हैं… आम बौरा जाते हैं… वसन्त के परम मित्र कामदेव अपने धनुष पर स्नेह प्रेम के पुष्पों का बाण चढ़ा देते हैं… और प्रकृति की इस रंग बिरंगी छटा को देखकर मगन हुई कोयल भी कुहू कुहू का गान सुनाती हर जड़ चेतन को प्रेम का नृत्य रचाने को विवश कर देती है… इसीलिए तो वसन्त को ऋतुओं का राजा कहा जाता है…

वसन्त को भगवान् कृष्ण ने गीता में अपना ही एक रूप बताया है | धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व इस पर्व का यही है कि ज्ञान विज्ञान की देवी भगवती सरस्वती के साथ ही सूर्य, गंगा मैया तथा भू देवी की पूजा अर्चना के माध्यम से जन जन को सन्देश प्राप्त होता है कि जिस प्रकृति ने हमारे जीवन में इतने सारे रंग भरे हैं, हमें वृक्षों, वनस्पतियों, स्वच्छ वायु, जल, पशु पक्षियों आदि के रूप में जीवित रहने के समस्त साधन प्रदान किये हैं – उस पञ्चभूतात्मिका प्रकृति को धन्यवाद दें और उसका सम्मान करना सीखें |

वसन्त के महान गायक कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् और ऋतुसंहार तथा बाणभट्ट के कादम्बरी और हर्ष चरित जैसे अमर ग्रन्थों में प्रेम की इस मदिर ऋतु तथा इस मधुर पर्व का इतना सुरुचिपूर्ण वर्णन उपलब्ध होता है कि जहाँ या तो प्रेमीजन जीवन भर साथ रहने का संकल्प लेते देखाई देते हैं या फिर बिरहीजन अपने प्रिय के शीघ्र मिलन की कामना करते दिखाई देते हैं | संस्कृत ग्रन्थों में तो वसन्तोत्सव को मदनोत्सव ही कहा गया है जबकि वसन्त के श्रंगार टेसू के पुष्पों से सजे वसन्त की मादकता देखकर तथा होली की मस्ती और फाग के गीतों की धुन पर हर मन मचल उठता था | इस मदनोत्सव में नर नारी एकत्र होकर चुन चुन कर पीले पुष्पों के हार बनाकर एक दूसरे को पहनाते और एक दूसरे पर अबीर कुमकुम की बौछार करते हुए वसन्त की मादकता में डूबकर कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा करते थे | वसन्त पञ्चमी से लेकर होली तक सारा समय प्रेम के लिए समर्पित होता था | आज भी देश के अनेक अंचलों में पीतवस्त्रों और पीतपुष्पों में सजे नर-नारी बाल-वृद्ध एक साथ मिलकर माँ वाणी के वन्दन के साथ साथ प्रेम के इस देवता की भी उल्लासपूर्वक अर्चना करते हैं |

इस पर्व के दौरान पीले वस्त्र धारण करने के एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि पीत वर्ण का सम्बन्ध जहाँ एक ओर सूर्य से माना जाता है, वहीं भगवान् विष्णु और माँ वाणी से सम्बद्ध माना जाता है | साथ ही पीला रंग सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है तथा मन को स्थिरता प्रदान करने वाला, शान्ति प्रदान करने वाला माना जाता है | पीला रंग विचारों में सकारात्मकता, आशा तथा ताज़गी का प्रतीक माना जाने के कारण व्यक्ति को उसके Career में में उन्नति का सूचक भी माना जाता है | इन्हीं कारणों से भगवान् विष्णु और भगवती सरस्वती को पीले पुष्प अर्पित किये जाते हैं |

और संयोग देखिए कि आज ही के दिन नूतन काव्य वधू का अपने गीतों के माध्यम से नूतन शृंगार रचने वाले प्रकृति नटी के चतुर चितेरे महाप्राण निराला का जन्मदिवस भी धूम धाम से मनाया जाता है…

तो, वसन्त के मनमोहक संगीत के साथ सभी मित्रों को सरस्वती पूजन, निराला जयन्ती तथा प्रेम के मधुमय वासन्ती पर्व वसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ… इस संकल्प के साथ कि प्रकृति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाएँगे… और इस आशा और विश्वास के साथ कि हम सब ज्ञान प्राप्त करके समस्त भयों तथा सन्देहों से मोक्ष प्राप्त कर अपना लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढ़ सकें… ताकि अपने लक्ष्य को प्राप्त करके उन्मुक्त भाव से प्रेम और मस्ती का राग आलाप सकें…

लो फिर से है आया वसन्त, लो फिर से मुस्काया वसन्त ||

मन की कोयल है कूक उठी, हर सेज सेज है महक उठी |

और अंग अंग में मधु की मस्त बहारों सा छाया वसन्त ||

भंवरा गाता गुन गुन गुन गुन, कलियों से करता अठखेली |

और प्रेम पगे भावों से मन में उनके हूक उपज उठती ||

हरियाली धरती को मदमस्त बनाता लो आया वसन्त ||

दूल्हा वसन्त निज दुल्हनिया को पीत हार है पहनाता |

दुल्हिन धरती का हरा घाघरा आज कहीं उड़ता जाता |

लो कामदेव के बाणों पर है पुष्प सजा आया वसन्त ||

पपीहा बंसी में सुर फूँके, और डार डार सरसों फूले |

है सजा प्रणय का राग, हरेक जड़ चेतन का है मन झूमे |

लो मस्ती का है रास रचाता महकाता आया वसन्त ||

लो फिर से है लहराया वसन्त, लो फिर से मदिराया वसन्त…

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