है रचा बसा हर एक कण में

एक दिन सुबह सुबह मन्दिर के बाहर हंगामा सुना तो कारण जानने की जिज्ञासा मन में हुई और जा पहुँची घटना स्थल पर | जाकर देखा तो कुछ लोग मन्दिर से कुछ दूर खड़ी एक कार को हटवाना चाहते थे | कार जिस लड़की की थी वह बाथरूम में थी और ऑफिस जाने के लिये तैयार हो रही थी | 8 बजे तक उसे घर से चले भी जाना था | उसकी माँ को ड्राइविंग आती नहीं थी | पास जाकर देखा तो कार मन्दिर से इतनी दूरी पर थी कि मन्दिर में आने जाने में कोई रुकावट नहीं थी | यदि दो लाइन बनाकर भी जाना होता तब भी पूरा रास्ता खुला था | और साथ में मन्दिर का मुख्य द्वार तो पूरी तरह ख़ाली था, वहाँ तो कोई वाहन नहीं खड़ा था | इस पर पण्डित जी और दूसरे भक्तगणों का तर्क था कि “कार भगवान जी की मूर्ति के सामने आ रही है |” जबकि ऐसा भी बिल्कुल नहीं था | ये सब देखकर मैं सोचने लगी कि धार्मिक स्थलों के नाम पर इस तरह की बेहूदा हरकतें आख़िर क्यों ? आख़िर कब तक ? मैं प्रायः देखती हूँ कि सर्दियों की दोपहर में धूप सकती महिलाएँ अपने भगवान जी की मूर्तियों के लिये सुन्दर सुन्दर स्वेटर फ्राक वगैरा बुनती रहती हैं “हमारे भगवान जी को ठण्ड लगती है न…” पत्थर की मूर्ति की सर्दी गर्मी का ख़याल रखना अपनी श्रद्धा का विषय है, इस विषय में मुझे कुछ नहीं कहना | लेकिन क्या कभी किसी ग़रीब नंगे का तन ढकने का विचार मन में आया ? मन्दिरों में होने वाले धार्मिक आयोजनों में छप्पन भोगों का प्रसाद लगाया जाता है, और यह प्रसाद केवल उन्हीं लोगों को प्राप्त हो सकता है जो इसके लिये तगड़ा चन्दा देते हैं | शेष लोगों को केवल हलवा-पूरी देकर वहाँ से भगा दिया जाता है | काश इस प्रकार के छप्पन भोग के स्थान पर ग़रीबों का पेट भरने की सोचें… नारायणी सेवा करें… यदि एक भी ग़रीब दुखियारे को गले से लगा लिया तो परमात्मा से साक्षात्कार इसी जन्म में इसी पृथिवी पर हो जाएगा… उसके लिये दूसरा जन्म लेने की या किसी दूसरे लोक में जाने की आवश्यकता नहीं… क्योंकि वास्तविक परमात्मतत्व तो हमारी अन्तरात्मा ही है… और यह आत्मा सृष्टि के हर कण में विद्यमान है… फिर मानव मानव में ये भेद क्यों ??? आख़िर क्यों ???

ना मन्दिर में, ना मस्ज़िद में, ना गिरजे या गुरद्वारे में |
उसको मत खोजो बाहर, वह तो बस्ता है हर एक दिल में ||
मन्दिर में पत्थर की मूरत को जी भरकर नहलाते हो |
आ जाए कोई प्यासा दर पर, तो उसको दूर भगाते हो ||
छप्पन चीज़ों का भोग तो उस प्रस्तर प्रतिमा को देते हो |
और “कर्म करो” गीता की ये शिक्षा भूखे को देते हो ?
ईश्वर की प्रतिमा को मौसम के सभी वस्त्र पहनाते हो |
पर एक ग़रीब नंगे का तन ढकने को न आतुर होते हो ||
ऊँची आवाज़ों में माइक पर ईश्वर अल्लाह जपते हो |
पर दीन हीन की करुण पुकारों से हरदम कतराते हो ||
ऐ काश कभी झाँको मन में, ऐ काश कभी आँखें खोलो |
अपनी आत्मा को झकझोरो, कातर को बाँहों में भर लो ||
गर ऐसा कर पाए, तो जानो ईश मिलेगा भू पर ही |
है नहीं अलग वह मानव से, है रचा बसा हर एक कण में ||

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/01/11/%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/

 

 

 

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धरा आकाश की सीमाएँ

पूस की ठण्डी रात ठिठुरती आती है

इठलाती हुई बिखराती है ओस में भीगी चन्दा की चाँदनी

और बाँध लेती है समस्त चराचर को अपने सम्मोहन में |

हो जाता है चाँद भी सम्मोहित

देखकर अपनी प्रियतमा का धवल सौन्दर्य

और तब रच जाता है रास शीतल धवल प्रकाश का |

आह्लादित हो खिल उठती हैं दसों दिशाएँ

और मदमस्त बनी गर्व से इठलाती ठिठुरती रात

झूम उठती है देखकर अपना बुना जाल सम्मोहन का |

किन्तु जब हार जाती है अपनी ही ठिठुरन से

तो वापस लौटने लगती है ठिठुरती भोर को आगे करके

जिसके साथ साथ ऊपर उठता जाता है

कोहरे की चादर चीरकर गुनगुनी धूप लुटाता सूर्य

जो देता है संदेसा जग को

जागो नींद से, आगे बढ़ो, उठो ऊँचे

इतने, कि छू न सके तुम्हें कोई भी बाधा |

कितना भी छाया हो घना कुहासा

सन्देहों का, निराशाओं का, अविश्वासों का

छँट जाता है स्वयं ही, अनुभव करके पंथी की दृढ़ता का ताप |

उसी तरह, जैसे छँट जाता है घना कोहरा

जब नहीं झेल पाता ताप सूर्य के दृढ़ निश्चय का

कि जो भी हो, जग में फिर से प्रेम का उजियारा भरने

जग में फिर से नवजीवन का उल्लास भरने

जग में फिर से आशा और विश्वास का ताप भरने

चीरकर इस घने कोहरे की चादर

उठना ही होगा मुझे ऊँचा… और ऊँचा…

कि सिमट जाएँ जहाँ धरा आकाश की समस्त सीमाएँ

देने को मुझे मार्ग आगे बढ़ने का / ऊँचा उठने का…

 

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2017/12/23/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%81/

 

अस्तित्व और लक्ष्य

हर सुबह की एक नई कहानी / एक नया गीत

हर दिन का एक नया क़िस्सा / बन जाने को उपन्यास

गुनगुना कर भोर की मधुर रागिनी / मस्त गोरैया

समा जाएगी गुनगुनी गोद में धूप की |

दिन चढ़ेगा धीरे धीरे / लिए हुए अपनी आँखों में

“कल” के अधूरे सपने / जो पूरे करने होंगे “आज”

देखने होंगे कुछ नए सपने / बनानी होंगी कुछ नई योजनाएँ

जिन्हें पूरा करना होगा “कल” |

करने को होगा बहुत कुछ नया हर पल

भरा हुआ उत्साहों से / उमंगों से / आशाओं से

तो कभी कभी कुछ निराशाओं और हताशाओं से भी |

इसी तरह धीरे धीरे नीचे उतर आएगी शाम

होने लगेगा शान्त कोलाहल

घिरेगी रात / समा जाएगा सब कुछ आँचल में उसके

जैसे छुप जाए नन्हा कोई बालक / आँचल में अपनी माँ के

और तब बुनी जाएँगी फिर से न जाने कितनी नई कहानियाँ

चादर तले अँधेरे की |

कुछ “कल” की आधी छूटी कहानियाँ / “आज” बन जाएँगी उपन्यास

तो कुछ “आज” के नए किस्से “कल” के लिए दे जाएँगे

फिर से एक नई कहानी / या एक नया गीत

जिसे गुनगुनाएगी “कल” फिर एक गोरैया

अपनी मधुर आवाज़ में / मस्ती में / प्यार में / जोश में

और समा जाएगी फिर से गुनगुनी धूप की गोद में |

ऐसे ही लुका छिपी में दिन और रात की

जाग जाएगी और एक नई भोर

दिखाते हुए हमारे अस्तित्व का एक पक्ष नया

खिल जाएगी और एक नई सुबह

देती हुई पूरा करने को एक लक्ष्य नया |

बीतते जाएँगे इसी तरह पल छिन दिन मास युग और कल्प

यही तो है क्रम जीवन का… प्रकृति का…

निरन्तर ! शाश्वत !! चिरन्तन !!!

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2017/12/19/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af/

 

शीत की पीत भोर

भोर के केसर जैसी लालिमायुत रश्मि पथ पर

धीरे धीरे आगे बढ़ता ऊपर उठता सूर्य

संदेसा देता है कि उठो, जागो मीठी नींद से

क्योंकि शीत की ये सुहानी पीत भोर

करती है नवीन आशा का संचार कण कण में…

आगे पढ़ें……..

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2017/12/14/%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%b0/

 

 

 

जयहिन्द… वन्देमातरम्…

समानी व आकृति: समाना हृदयानि व:, समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति – ऋग्वेद

हम सबके सामान आदर्श हों, हम सबके ह्रदय एक जैसे हों, हम सबके मनों में एक जैसे कल्याणकारी विचार उत्पन्न हों, ताकि सामाजिक समन्वय तथा समरसता बनी रहे |

समानो मन्त्र: समिति: समानी, समानं मन: सहचित्तमेषाम्‌ ।

समानं मन्त्रमभिमन्त्रयेव:, समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ – ऋग्वेद

हम सब साथ मिलकर कार्य करें, हम सबके विचार एक समान हों, हम सबके मन और चित्त एक समान हों, किसी भी विषय में कोई भी निर्णय लेने से पूर्व हम परस्पर मन्त्रणा करें और एक समान निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास करें, हम सब एक साथ मिलकर यज्ञों का पालन करें |

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्‌, मा स्वसारमुत स्वसा
सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया । – अथर्ववेद

भाई भाई में परस्पर किसी प्रकार का द्वेष न हो | दो बहनों में परस्पर किसी प्रकार का क्लेश न हो | और हम सब मिलकर लोक कल्याणार्थ संकल्प लें और सदैव कल्याणमयी वाणी बोलें |

जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं, नाना धर्माणां पृथिवी यथौकसम् |

सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां, ध्रुवेव धेनु: अनपस्फुरन्ती || – अथर्ववेद

विविध धर्मं बहु भाषाओं का देश हमारा, सबही का हो एक सरिस सुन्दर घर न्यारा ||

राष्ट्रभूमि पर सभी स्नेह से हिल मिल खेलें, एक दिशा में बहे सभी की जीवनधारा ||

निश्चय जननी जन्मभूमि यह कामधेनु सम,

सबको देगी सबको देगी सम्पति, दूध, पूत धन प्यारा ||

हमारे वैदिक ऋषियों ने किस प्रकार के परिवार, समाज और राष्ट्र की कल्पना की थी – एक राष्ट्र एक परिवार की कल्पना – ये कुछ मन्त्र इसी कामना का एक छोटा सा उदाहरण हैं | वैदिक ऋषियों की इस उदात्त कल्पना को हम अपने जीवन का लक्ष्य बनाने का संकल्प लें और सब साथ मिलकर स्वतन्त्रता दिवस का उत्सव मनाएँ |

विविध धर्म और भाषाओं के इस आँगन में

सरस नेह में पगी हुई हम ज्योति जला लें |

मातृभूमि के हरे भरे सुन्दर उपवन में

आओ मिलकर सद्भावों के पुष्प खिला लें ||

सभी को स्वतन्त्रता दिवस के इस महान पर्व की हार्दिक बधाई… जयहिन्द… वन्देमातरम्…

स्वतन्त्रता दिवस

क्या अजीब सी चीज़ है ये ज़िन्दगी

क्या अजीब सी चीज़ है ये ज़िन्दगी |

कभी कशमकश सी / नहीं है जिसका समाधान कहीं भी

कितने ज्ञानी ध्यानी हार गए खोज खोज कर

पर नहीं पा सके एक निश्चित उत्तर |

कभी आधे देखे स्वप्न सी

ज़रा सी आहट से ही टूट कर बिखर जाता है जो पल भर में ही |

कभी भूल भुलैया सी / नहीं मिलती राह कभी भी जहाँ

चलते चलते खो जाने का भय / साथ और लक्ष्य छूट जाने का भय

नहीं मिलता जहाँ पथदर्शक भी कोई |

कभी सागर की लहरों सी चंचल / मचलती हुई सी

छोड़ दो उन लहरों के सहारे खुद को

तो डूबते उतराते / शायद कभी लग सको पार

अन्यथा, मारोगे हाथ पाँव / तो डूब जाने का भय |

कभी किनारे से भी ऊपर जाकर हिलोरें मारती लहरों सी

तो कभी शान्तभाव से तपस्या में लीन ठहरी हुई लहरों सी |

कभी सागर की गहराई सी गहरी / नहीं पा सकते जिसकी थाह

छिपाए हुए अपने भीतर / भावनाओं और सम्वेदनाओं के

अनगिनती जलचर / सीप और घोघे |

कभी समुद्र सी विशाल / नहीं पता जिसके ओर छोर का भी

और अपनी इसी असीमता के कारण

बन जाती है न जाने कितनी घटनाओं दुर्घटनाओं की साक्षी भी |

जिसके तट हर पल उतरते हैं अनेकों यात्री

क्योंकि यही तो है अन्तिम विश्रामस्थली भी |

कभी आकाश की भाँति शून्य भी

तो कभी रत्नगर्भा वसुन्धरा सी / लपेटे हुए स्वयं को

उत्साहों और उल्लासों के हरितवर्णी परिधानों में |

कभी पर्वत श्रृंखलाओं सी अन्त हीन और रहस्यमयी

एक चोटी पर पहुँचते ही / अचानक सामने खड़ी मिले कोई दूसरी चोटी

एक ऊँचाई पर पहुँचते ही मुँह चिढ़ाए / सामने से उभरती दूसरी ऊँचाई

कितना ही ऊपर / और ऊपर / उठते चले जाओ

पर नहीं मिलता मंज़िल का कोई सीधा मार्ग |

कितना ही पुकारो किसी अपने को

गूँज कर रह जाती है अपनी ही आवाज़ पर्वतों के गुफाओं में |

कभी टेढ़े मेढ़े रास्तों सी टेढ़ी मेढ़ी / नागिन सी बलखाती / लहराती |

कभी यौवन की मदिरा के नशे में धुत किसी नर्तकी सी

अपनी ही धुन में मतवाली बनी जो / दिखाती रहती है अनगिनती हाव भाव और मुद्राएँ

ठोकरें खाकर भी / विश्वास और आशा से भरी जो

बस ढूँढती रहती है संसार रूपी इस महान क्रीड़ास्थली में

अपने उस एक मात्र प्रियतम को

जो स्वयं को कहता है जरा / काल / मृत्युंजय

जिसकी गोदी में सर रख / पा सकेगी विश्राम / कुछ पलों के लिए ही सही |

जिसकी बाहों के सम्बल से / पा सकेगी स्थिरता / कुछ पलों के लिए ही सही |

क्योंकि कुछ पल की विश्रान्ति के बाद / पाकर नवजीवन / एक नवीन रूप में

फिर उठ चलना है / आगे / और आगे / टेढ़े मेढ़े मार्गों की भाँति

कभी फिर से बन जाना है सागर सी गहरी / तो कभी लहरों सी चंचल

कभी फिर से बन जाना है आकाश सी शून्य / तो कभी धरा सी धैर्यशाली

कभी फिर से बन जाना है पर्वतश्रृंखलाओं सी / अन्तहीन

तो कभी फिर से बन जाना है उसी कशमकश सी / नहीं है जिसका समाधान

या फिर उसी भूल भुलैया सी / नहीं मिलती राह कभी भी जहाँ

क्योंकि अनन्त की इस यात्रा में / थक कर बैठने का प्रश्न कहाँ

बस चलते चले जाना है / बिना रुके / निरन्तर…

ऐसी ही अनोखी है ये ज़िन्दगी…

क्या अजीब सी चीज़ है ये ज़िन्दगी…

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फ्रेण्डशिप डे

आज “फ्रेण्डशिप डे” है… यानी “मैत्री दिवस”… सभी मित्रों को हार्दिक बधाई भी और धन्यवाद भी साथ जुड़े रहने के लिए…

यों तो आज इस सोशल मीडिया की मेहरबानी से हर दिन ही “मैत्री दिवस” होता है – क्योंकि हर दिन मित्रों से वार्तालाप यानी “चैटिंग” होती रहती है… पर एक विशेष दिन को मित्रों के नाम कर देना वास्तव में सुखद अनुभूति है…

हमें याद है जब हम बच्चे थे उन दिनों बस स्कूल के मित्र स्कूल में मिल जाया करते थे और स्कूल की छुट्टी हुई तो सब अपने अपने घर | किसी का दूसरे के घर आना जाना भी कभी कभार ही हो पाता था | टेलीफोन की सुविधा भी उन दिनों कोई बहुत अच्छी नहीं थी | रिसीवर उठाने पर एक्सचेंज से कभी नींद में अलसाई हुई कुछ जमुहाई लेती सी किसी महिला की या कभी किसी पुरुष की एक कड़क सी आवाज़ आती थी “हाँ जी नम्बर बताइये किस पर बात करनी है…” फिर उन्हेई नम्बर बताया जाता था “जी 120 मिला दीजिये प्लीज़…” या फिर बच्चे अगर कभी उस आवाज़ को सुनकर खुन्दक में आ गए तो उसी की नक़ल करके रूखेपन से बोलते थे “120…” तब वो ऑपरेटर नम्बर मिलाकर बोलता था या बोलती थी “हाँ लीजिये बात कीजिए…” तब कहीं जाकर बात हो पाती थी | और वो भी आवश्यक नहीं था कि हर घर में टेलीफोन हो ही | मुश्किल से सौ के लगभग घरों में टेलीफोन होंगे उन दिनों – या हो सकता है और भी कम हों – क्योंकि हमारे सारे परिचितों के नम्बर दो अंकों में थे |

लेकिन फिर भी हम सब बच्चों की दोस्ती हर दिन बढ़ती ही जाती थी | उन दिनों सुबह का स्कूल हुआ तो स्कूल की छुट्टी के बाद घर आकर कपड़े बदल कर और लंच करके सो जाया करते थे कुछ देर के लिए – क्योंकि घर में हर किसी को नींद आ रही होती थी इसलिए बच्चों को भी सोने के लिए विवश किया जाता था | पर बच्चे तो बच्चे, कहाँ चुपचाप सो सकते हैं – वो भी भरी दुपहरी में | सो, बीच में सर उठाकर देखते कि पास में लेटी माँ चाची बुआ सो गई हैं या नहीं | वो लोग भी ऐसी ढीठ होती थीं कि आसानी से सोती नहीं थीं | उनकी नज़र हम बेचारे बच्चों पर ही रहती थी कि बाहर धूप में खेलने के लिए न निकलें और आराम से सो जाएँ | तो हमारे सर उठाते ही सर नीचे दबा दिया जाता था “सो जाओ चुप करके, वरना…” और हमारा सर फिर तकिये पर |

खैर, जैसे तैसे करके वो शुभ घड़ी भी आ जाती थी कि हमारे पास सो रही सारी महिलाएँ खर्राटे लेने लगती थीं – दोपहर तक के काम काज से थकी हुई जो होती थीं | बस  फिर क्या था, हम सब बच्चे अपने अपने सर उठाकर एक दूसरे को इशारा करते थे और धीरे से पलंग से उठकर दबे पाँव कमरे से निकल भागते थे | लेकिन बाहर निकल कर फिर अगले पहरे को देखना होता था – जहाँ घर के नौकर चाकर या बड़े भाई बन्धु सुस्ता रहे होते थे | अगर जाग रहे हैं तो उनकी चापलूसी करके भाग जाते थे बाहर चबूतरे पर | मुहल्ले पड़ोस के बच्चे भी इसी तरह भाग आते थे और फिर मचाते थे धमा चौकड़ी | हम सभी बच्चे आपस में बड़े अच्छे मित्र हुआ करते थे | साथ खेलना कूदना, लड़ना झगड़ना और फिर से एक हो जाना | घरवाले कभी बच्चों के बीच में नहीं पड़ते थे |

उधर, एक दो घन्टे सोने के बाद महिलाओं की आँख खुल जाती थी | जागती तो नींद पूरी होने पर ही थीं पर दोष हमारे सर मढ़ा जाता था “क्या बात है… कितना शोर मचाते हो भर दुपहरी… न सोते हो न सोने देते हो… नींद भी पूरी नहीं होने दी तुम सबके शोर ने… चलो अब भीतर आकर हाथ मुँह साफ़ करो, नहाओ और नाश्ता करके पढ़ाई लेकर बैठो…” और इस तरह हम बच्चों की आज़ादी का हो जाता था ख़ात्मा… मुँह बनाते हम सब फिर घर के भीतर…

दिन का स्कूल होता था तो शाम शाम चार बजे तक छुट्टी होती थी | सर्दियों में दिन भी छोटे ही होते हैं तो शाम से ही धुंधलका छा जाता था | ऐसे में घर आकर फिर बाहर जाने का तो प्रश्न ही नहीं था | घर पहुँचकर कुछ देर घर में ही खेल कूद करके फिर पढ़ने बैठा दिया जाता था |बहुत हुआ तो घर में ही बेडमिन्टन खेल लिया, कैरम लेकर बैठ गए | बहुत छुटपन में तो दोस्तों के साथ मिलकर गुड़िया गुड्डे का ब्याह भी रचाया था | लेकिन अपने घर पर ही | वहीं सारे मित्र आ जाया करते थे |

कहने का अभिप्राय ये कि स्कूल के दोस्तों से घर वापस आने के बाद फिर मिलना नहीं होता था | हाँ किसी को कोई काम पूछना है तो वो लोग घर आ जाते थे और साथ बैठकर पढ़ाई करते समय कुछ गप्पें भी हो जाया करती थीं | हाँ हमारे घर के सामने सुल्लढ़ रहा करते थे उनका चबूतरा कच्चा था तो वहाँ कुछ देर के लिए कंचा गोली या गिल्ली डंडा खेलने के लिए जाने की इज़ाज़त घरवालों ने दी हुई थी | मुहल्ले के लड़के लड़कियों के साथ वहाँ धमा चौकड़ी हर रोज़ मचा करती थी | बड़ा मज़ा आया करता था | बीच बीच में कभी कभार सुल्लढ़ चाचा को हमारे शोर से गुस्सा भी आ जाया करता था और चबूतरे पर आकर मीठी झिड़की भी दे दिया करते थे, पर हम बच्चे कहाँ सुनने वाले थे |

कॉलेज गए तो उस समय तक टेलीफोन की सुविधाएँ पहले से कुछ बेहतर हो गई थीं और काफ़ी घरों में फोन लग गए थे | तो कॉलेज से आने के बाद कभी कभार फोन पर बात हो जाया करती थी मित्रगणों से | या फिर साथ बैठकर नोट्स बनाने हैं तो किसी एक के घर पहुँच जाया करते थे | पर क्योंकि अब “कुछ बड़े” हो गए थे तो मित्रों के साथ कभी कभार घूमने फिरने या सिनेमा देखने की छूट भी मिल गई थी | पर वो सब भी कभी हफ़्ता दस दिन में ही नम्बर आता था | कॉलेज के कैन्टीन में तो माहौल ऐसा रहता था जैसे देश की सारी समस्याओं को हल करने का जिम्मा हम लोगों का ही था | या फिर देश की बातें नहीं तो साहित्यकारों या संगीतकारों पर बहस | कभी कभी बड़ा गरमा भी जाता था माहौल – मसलन मुँशी प्रेमचन्द वाले दोस्तोयव्स्की वालों से भिड़ जाते थे या फिर शेक्सपियर वाले कालिदास वालों से… रफ़ी साहब वाले मन्ना डे वालों से या फिर कुमार गन्धर्व वाले पण्डित भीमसेन जोशी वालों से… वगैरा वगैरा… पर उसका भी एक अलग ही आनन्द था…

या फिर होली पर एक साथ मिलकर एक दूसरे पर रंग डालना, हुल्लड़ मचाना, दिवाली पर पटाखे फुलझड़ी छुड़ाना और ऐसे ही कई छोटे बड़े तीज त्यौहारों पर ख़ूब मस्ती हुआ करती थी | स्कूल कॉलेज से पिकनिक पर भी जाना हुआ करता था |

फिर जब काम से लग गए तब तो पूरी तरह उसी में खो गए थे | वहीं साथ के लोगों से थोड़ी बहुत गप्पबाज़ी हो जाया करती थी | बहुत ज़्यादा दोस्तों के साथ घूमना फिरना गप्पें लगाना उन दिनों चलन में नहीं था | जीवन बहुत सादा था – सुविधाएँ सीमित थीं – जितना हो सकता था हो जाता था | हालाँकि पुराने कुछ मित्रों से आज भी मित्रता यथावत है – पर कोई कहीं है तो कोई कहीं – हर कोई अपनी अपनी घर गिरस्ती में उलझा हुआ है – तो उतना मिलना निश्चित रूप से नहीं हो पाता है | लेकिन सोशल मीडिया ने बहुत सहायता की है उन सबके साथ सम्पर्क बनाए रखने में – साथ ही नए मित्र बनाने में | तो आज के लिहाज़ से देखा जाए तो ये “फ्रेण्डशिप डे” वास्तव में एक बहुत मायने रखता है | उस समय कुछ दूसरी तरह का समाज और व्यस्तताएँ थीं पर “फ्रेण्डशिप डे” जैसा कुछ नहीं था – जो सारे मित्र मिलकर मना लिया करते या अपने घरों में बैठे ही किसी एक विशेष दिन एक दूसरे को “विश” कर दिया करते | आज वो समय और सुविधाएँ हैं कि घर बैठे मोबाइल या लैपटॉप पर अंगुलियाँ घुमाकर मित्रों को शुभकामना सन्देश भेजे जा सकें तो क्यों न मित्रों को इसके लिए और उनकी सुख समृद्धि के लिए शुभकामनाएँ दी जाएँ… पर सीमित सुविधाओं और उस समय की पारिवारिक और सामाजिक परिस्थियों के चलते भी जितने मित्र बने और पीछे छूट गए वे वास्तव में आज भी याद आते हैं, और मन अपनी ही एक पुरानी रचना दोहराने लगता है “काश के बचपन एक बार फिर अपना रंग दिखा जाता…”

बचपन के वे सारे साथी कोई मुझे लौटा जाता, कहाँ और कैसे हैं, इतना कोई मुझे बतला जाता ||

वो कंचे की गोली और वो गिल्ली पर डंडे की मार, सुल्लड़ के कच्चे चबूतरे पर होती थी जीत या हार |

शोर मचाते, सुल्लड़ आके मीठी झाड़ पिला जाता ||

कभी खींचना बाल, कभी टंगड़ी दे मुझे गिरा देना, और मेरा अंकल से कहकर मार उसे पिटवा देना |

ना जाने क्यों, यह सबही तो मुझको आज रुला जाता ||

वो मेरी नन्ही सी गुड़िया और सुनील का प्यारा गुड्डा, धूम धाम से उनका फिर वह ब्याह रचाना ढोल बजाना |

इसी तरह हर रोज़ नया कोई गुल देखो खिलता जाता ||

घर में धमा चौकड़ी, बदले में माँ की मीठी झिड़की, आज तलक भी सारी बातें मुझको नई नई लगतीं |

काश कि बचपन एक बार फिर अपना रंग दिखा जाता ||

Swas & Friends