तुम अच्छी हो – श्रेष्ठ औरों से

सीमित है मेरा संसार, एक छोटे से अन्धकारपूर्ण कक्ष तक…

जब नहीं होता समाधान किसी समस्या का मेरे पास

बैठ जाती हूँ अपने इसी अँधेरे कक्ष में

आँसू की गर्म बूँदें ढुलक आती हैं मेरे गालों पर

मेरी छाती पर, मेरे हृदय पर…

जानती हूँ मैं, कोई नहीं है वहाँ मेरे लिये

जानती हूँ मैं, कोई महत्व नहीं सत्ता का मेरी

जानती हूँ मैं, कुछ भी नहीं है मेरे वश में…

तब आती है हल्की सी परछाईं समर्पण की

रगड़ती हुई रीढ़ को मेरी

शान्त करती हुई माँसपेशियों को मेरी

और किसी की स्नेहसिक्त वाणी देती है मुझे आश्वासन

“चिन्ता मत करो

मैं ही लाई हूँ तुम्हें यहाँ

मैं ही निकालूँगी तुम्हें यहाँ से…”

कौन है यह ? मेरी परम प्रिय आत्मा…

जब सारा संसार फेर लेता है आँखों को मेरी ओर से

जब सारा संसार उठा लेता है विशवास मुझ पर से

पुनः सुनाई देती है वही स्नेहसिक्त ध्वनि

“तुम अच्छी हो, श्रेष्ठ औरों से…

समय आ गया है त्यागने का सारे दुःख दर्द

समझो आँसू की उन गर्म बूँदों को

जो गिर पड़ी हैं हम दोनों के मध्य

और गिराओ उन्हें

और तब तुम हो जाओगी एक

मेरे साथ….”

 

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वंशी की वह मधुर ध्वनि

वंशी की वह मधुर ध्वनि

सुना था मैंने, ईश्वर है हर जगह |

सोचा मैंने “क्यों नहीं सुन पाती उसका मधुर गान ?”

उत्तर मिला अपने भीतर से ही

“क्योंकि हमेशा करती हूँ प्रयास

सुनने का उस मधुर गान को |”

और प्रयास ले जाते हैं दूर लक्ष्य से |

अपने इस प्रयास में

सुनती हूँ मैं ध्वनियाँ

ध्वनियाँ, परिचित और अपरिचित

ध्वनियाँ, डालती हुई व्यवधान मेरी एकाग्रता में

ध्वनियाँ, देती हुई चुनौतियाँ मेरे ध्यान को

ध्वनियाँ, करती हुई मुझे आकर्षित

ध्वनियाँ, संगीतमय, कोलाहलमय

तब एक दिन पहुँच गई अपने भीतर

हो गई लीन

अपने मन के सागर की लहरों की

मधुर स्वरलहरियों में |

और हो गई ध्वनिहीन, मौन

समाप्त हो गया मेरा सारा प्रयास

सुनने को ईश्वर का वह मधुर गान

और तब सुनाई दी

वंशी की वह मधुर ध्वनि

जो थी निराकार, शाश्वत, चिरन्तन…

आज स्मार्तों का श्री कृष्ण जन्म महोत्सव है… सभी को श्री कृष्ण जन्म महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/09/02/shree-krishna-janmashtami-2/

 

बरखा की ये पडीं फुहारें

आज तो दिल्ली में सवेरे से ही बरखा नर्तकी ने अच्छा ख़ासा रास रचाया हुआ है | मौसम को देखकर अपना बचपन याद हो आया… मोरों का नृत्य, कोयल की कुहू कुहू, गोरैया की चिया ची… घर से बाहर निकलो तो हर घर के छत के पतनाले से बारिश के अमृत की नीचे गिरती मोटी धार – हम बच्चों की छतरियों को उड़ाती मस्ती में बहती नशीली हवाएँ… गड्ढों और नालियों के पानी में बहती कागज़ की नौकाएँ – जिनको देख ख़ुशी से तालियाँ बजाते बच्चे न जाने किन किन महासागरों की सैर कर आया करते थे… हालाँकि दिल्ली जैसे गगनचुम्बी इमारतों वाले महानगरों में आज न कागज़ की नावें हैं न वैसे नाविक बने बच्चों के झुण्ड, न मोर कहीं दीख पड़ते हैं न कोयल की कुहू कुहू कानों में रस घोल पाती है… और नन्ही सी गोरैया तो जैसे वृक्षों की बढती कटाई को देखकर कहीं ग़ायब ही हो गई है… फिर भी सवेरे से धूम मचाती इस बरखा रानी को देखकर अपनी ही एक पुरानी रचना याद हो आई… प्रस्तुत है.. लहराती ये पड़ीं फुहारें

इठलाती बलखाती देखो बरखा की ये पड़ीं फुहारें |

रिमझिम की मीठी तानों संग लहराती ये पड़ीं फुहारें ||

रिमझिम की अब झड़ी लगी है, प्रकृति नटी भी मुस्काई है

लहराते हर डार पात पर हरियाली भी बिखराई है |

रुत ने भी सिंगार किया है, मस्ती में भर पड़ीं फुहारें

रिमझिम की मीठी तानों संग लहराती ये पड़ीं फुहारें ||

कोयल गाती गान सुरीला, मोर दिखाते नाच नशीला

गन्ध सुगन्ध लिए पुरवाई दिशा दिशा में महकाई है |

मेघों की ता धिन मृदंग पर रास रचाती पड़ी फुहारें

रिमझिम की मीठी तानों संग लहराती ये पड़ीं फुहारें ||

पतनालों से जल की धारा गलियों से मिलने आई है

और बाहर आले में भीगी गौरैया भी बौराई है |

कागज़ की नावों को भी तो तैराती ये पडीं फुहारें

रिमझिम की मीठी तानों संग लहराती ये पड़ीं फुहारें ||

 

रिक्त पात्र – शून्य

क्या करना है पूर्ण पात्र का, उसका कोई लाभ नहीं है |

रिक्त पात्र हो, तो उसमें कितना भी अमृत भर जाना है ||1||

सकल सृष्टि है टिकी शून्य पर, और शून्य से आच्छादित है |

शून्य से है पाता प्रकाश जग, पूर्ण हुआ तो अन्धकार है |

क्या करना है आच्छादन का, मुझको तो प्रकाश पाना है |

पूर्ण हुई तो ठहर जाऊँगी, मुझे शून्य में बह जाना है ||2||

प्राणवायु भी शून्य कक्ष में बहती, सबको जीवन देती |

कक्ष भरा हो तो फिर वह भी भारी होकर दुःख पहुँचाती |

शून्य बने अस्तित्व, तो उसमें पीड़ा का कोई काम नहीं है |

क्या करना है निजता का, मुझको सर्वस्व लुटा जाना है ||3||

निजता तो है स्वार्थपरक, है जिससे अहंभाव ही बढ़ता |

और अस्तित्वविहीन रहे तो मन आनन्दित हुआ झूमता |

पूर्णज्ञान से बढ़कर कोई और नहीं अज्ञान जगत में |

बन अज्ञानी मुझे शून्य में मिलकर नव प्रकाश पाना है ||4||

परम तत्व का भेद न जानूँ, चरम सत्य का तथ्य न जानूँ |

योगी और वियोगी में क्या भेद, न मैं यह भी पहचानूँ |

मेरा राग विराग बना मन में नीरवता भर जाता है |

शून्य हुई चेतनता, मुझको नीरवता में खो जाना है ||5||

 

मेरे मानस का शुभ्र हंस

मैंने देखा

खिड़की की जाली के बीच से आती

रेशम की डोर सी प्रकाश की एक किरण को

मुझ तक पहुँचते ही जो बदल गई

एक विशाल प्रकाश पुंज में

और लपेट कर मुझे

उड़ा ले चली एक उन्मुक्त पंछी की भाँति

उसी प्रकाश-किरण के पथ से / दूर आकाश में

जहाँ कोई अनदेखा

भर रहा था वंशी के छिद्रों में / अलौकिक सुरों के आलाप

जहाँ चारों ओर पुष्पित थे / अलौकिक रंगीन पुष्प

उस प्रकाश पुंज ने पहुँचा दिया मुझे

एक दिव्य हिमाच्छादित सरोवर पर

जिसमें खिले थे अनोखे नीलपद्म

और श्वेत हंस कर रहे थे अठखेलियाँ

नींद टूटी – स्वप्न भी टूटा

लेकिन नहीं – है विश्वास मुझे

सत्य होगा मेरा स्वप्न

जब मैं पहुँच जाऊँगी

अपनी आत्मा के शीतल सरोवर तक

मन्त्र पुष्पों से सज्जित

ध्यान के प्रकाश पथ से

अपने भीतर उतरती हुई

तब मेरा परिचय होगा

आत्मसरोवर में खिले हुए उस चैतन्य नीलपद्म से

जिसके साथ अठखेलियाँ कर रहा होगा

मेरे मानस का शुभ्र हंस…

 

षडजान्तर

सुबह सुबह उनींदे भाव से खोली जब खिड़की रसोई की

बारिश में भीगे ठण्डी हवा के रेशमी झोंके ने

लपेट लिया प्यार से अपने आलिंगन में

और भर दिया एक सुखद सा अहसास मेरे तन मन में…

बाहर झाँका

वर्षा की बूँदों के सितार पर / हवा छेड़ रही थी मधुर राग

जिसकी धुन पर झूमते लहलहाते वृक्ष गा रहे थे मंगल गान…

वृक्षों के आलिंगन में सिमटे पंछी

झोंटे लेते मस्त हुए मानों निद्रामग्न लेटे थे…

कभी कोई चंचल फुहार बारिश की

करती अठखेली उनके नाज़ुक से परों के साथ

करती गुदगुदी सी उनके तन में और मन में

तो चहचहा उठते वंशी सी मीठी सुरीली ध्वनि में…

कहीं दूर आम के पेड़ों के बीच स्वयं को छिपाए कोयल

कुहुक उठती मित्र पपीहे के निषाद में अपनी पंचम को मिला

मानों मिलकर गा रहे हों राग देस या कि मेघ मलहार

कभी मिल जाती उनके बीच में दादुरवृन्द की गंधार ध्वनि भी

मानों वीणा के मिश्रित स्वरों के मध्य से उपज रही हो

एक ध्वनि अन्तर गंधार की

जो नहीं है प्रत्यक्ष, किन्तु समाया हुआ है षडज-गंधार के अन्तर में…

शायद इसीलिए बरखा के स्वरों से

गूँज उठता है षडज का नाद दसों दिशाओं में

घोषणा सी करता हुआ कि स्वर ही नहीं

प्रणव के रूप में समस्त ब्रह्माण्ड भी उत्पन्न हुआ है षडज से ही…

और ऐसे सुरीले मौसम में खिड़की पर सिर टिकाए

सोचने लगा प्रफुल्लित मन

कि शायद हो गया है भान प्रकृति को

अपने इस श्रुतिपूर्ण सत्य का

तभी तो रात भर मेघ बजाते रहे मृदंग

और मस्त बनी बिजुरिया दिखलाती रही झूम झूम कर

अनेकों भावों और अनुभावों से युक्त मस्त नृत्य / सारी रात…

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ.

आज 14 अगस्त है, स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व सन्ध्या… और कल फिर से पूरा देश स्वतन्त्रता दिवस की वर्षगाँठ पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाएगा… अपने सहित सभी को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…

स्वतन्त्रता – आज़ादी – व्यक्ति को जब उसके अपने ढंग से जीवंन जीने का अवसर प्राप्त होता है तो निश्चित रूप से उसका आत्मविश्वास बढ़ने के साथ ही उसमें कर्त्तव्यपरायणता की भावना भी बढ़ जाती है और उसकी सम्वेदनशीलता में भी वृद्धि होती है | क्योंकि स्वतन्त्र व्यक्ति को जीवन में रस का अनुभव होने लगता है – उत्साह और उमंग से भरा मन नृत्य करने लगता है – व्यक्ति को विकास की गति को तीव्र करने की सामर्थ्य प्राप्त होने के साथ ही उसे नियन्त्रित करने की समझ भी प्राप्त होती है – उसकी विचारधारा को सकारात्मक दिशा प्राप्त होती है – उसमें आत्मचिन्तन तथा आत्मनिर्णय की भावना दृढ़ होती है | जब व्यक्ति इस प्रकार से पूर्ण रूप से प्रफुल्लित होगा तो भला क्यों न वह अपना यह उत्साह – अपनी यह उमंग – अपने जीवन का ये रस – दूसरों में बाँटने का इच्छुक होगा ? वह हर किसी के साथ एकता और बराबरी का व्यवहार स्वतः ही करने लग जाएगा | स्वतन्त्र व्यक्ति के मन में किसी प्रकार के भेद भाव के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता |

इस स्वतन्त्रता दिवस पर आइये मिलकर संकल्प लें कि हम देश को स्वस्थ, सुखी तथा हरा भरा बनाने में योगदान देंगे…

प्रस्तुत है अपनी ही एक पुरानी रचना की कुछ पंक्तियाँ… स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनाओं के साथ…

आज़ादी का दिन फिर आया |
बड़े यत्न से करी साधना, कितने जन बलिदान हो गए |
किन्तु हाय दुर्भाग्य, न जाने कहाँ सभी वरदान खो गए |
सत्य धर्म और शान्ति प्रेम का राग न मिलकर हमने गाया…
वर्षा आई उमड़ घुमड़ कर, काली घनी घटाएँ छाईं |
गरजे घन कारे कजरारे, मगर बिजलियाँ ही बरसाईं |
मन का मानस रहा शुष्क ही, कभी न ओर छोर लहराया…
बगिया भी है आँगन भी है, और गढ़े भी हैं हिण्डोले
पर मदमाती नहीं गुजरिया, कौन कहो फिर झूला झूले ?
मनभावन सावन फिर आया, लेकिन एक मल्हार न गाया…
जगमग जगमग दीवाली के जाने कितने दीप जलाए |
नगर नगर और गाँव गाँव में हर घर आँगन सभी सजाए |
किन्तु कहाँ का गया अँधेरा, और कहाँ उजियाला छाया…
मतवाली होली भी आई, लेकिन राख़ उड़ाती आई |
कलित कपोलों पर गुलाल की लाली कहीं न पड़ी दिखाई |
ढोल बजे, नूपुर भी छनके, मगर न केसर का रंग छाया…
महल सभी बन गए दुमहले, और दुमहले किले बन गए |
कितने मिले धूल में, लेकिन कितने नये कुबेर बन गए |
आयोगों का गठन हुआ, मन का संगठन नहीं हो पाया…
फिर भी है संतोष कि धरती अपनी है, अम्बर अपना है |
अपने घर को आज हमें फिर नई सम्पदा से भरना है |
किन्तु अभी तक हमने अपना खोया बहुत, बहुत कम पाया…
ग्राथित हो रहे अनगिनती सूत्रों की डोरी में हम सारे |
होंगे सभी आपदाओं के बन्धन छिन्न समस्त हमारे |
श्रम संयम आर अनुशासन का सुगम मन्त्र यदि हमको भाया…