नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या

स्रोत: नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या

नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या

 

मातृवत् लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका, नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या ||

वास्तव में ऐसी श्रद्धा और प्रज्ञा से युत होती है गुरु की सत्ता – गुरु की प्रकृति – जो माता के सामान  ममत्व का भाव रखती है तो पिता के सामान उचित मार्गदर्शन भी करती है | आज गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व है – हमारे विचार से सभी पर्वों में सबसे उत्तम पर्व है गुरु पूर्णिमा का पर्व | क्योंकि गुरु अपने ज्ञान रूपी अमृत जल से शिष्य के व्यक्तित्व की नींव को सींच कर उसे दृढ़ता प्रदान करता है और उसका रक्षण तथा विकास करता है | तो सर्वप्रथम तो समस्त गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ | वास्तव में तो – यज्ञोपवीत को छोड़कर –  गुरु पूजा न तो किसी प्रकार का कोई कर्मकाण्ड है और न ही गुरु पर किसी प्रकार का कोई उपकार ही है | यह तो एक अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रयोग है । जिसके द्वारा शिष्य अपनी श्रद्धा और सङ्कल्प के सहारे गुरु के समर्थ व्यक्तित्व के साथ स्वयं को युत करता है । गुरु की पूजा करके, गुरु के प्रति सम्मान के भाव सुमन समर्पित करके गुरु के पूर्ण रूप से विकसित प्राणों के ही कुछ अंश शिष्य को आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त होते हैं जो उसे जीवन भर दिशा निर्देश देते रहते हैं | गुरु शिष्य को ज्ञान और पुरुषार्थ का मार्ग दिखाता है, किन्तु यह शिष्य पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार उस ज्ञान और पुरुषार्थ में वृद्धि करके प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है | क्योंकि अन्ततोगत्वा पुरुषार्थ तो व्यक्ति को स्वयं ही करना पड़ता है | वास्तव में देखा जाए तो गुरु और शिष्य एक दूसरे के पूरक होते हैं | जिस प्रकार गुरु अपने ज्ञान और शक्ति से शिष्य के उत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील रहता है उसी प्रकार शिष्य का भी कर्तव्य होता है कि वह गुरु का उचित सम्मान करे |

हमारे देश में पौराणिक काल से ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूजा के रूप में मनाया जाता है | इसी दिन पंचम वेद “महाभारत” के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्मदिन भी माना जाता है और इसीलिए इसे “व्यास पूर्णिमा” भी कहा जाता है | और महर्षि वेदव्यास को ही आदि गुरु भी माना जाता है इसीलिए व्यास पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है | भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, पुराणों और उपपुराणों की रचना की, ऋषियों के अनुभवों को सरल बना कर व्यवस्थित किया, पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना की तथा विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन किया । इस सबसे प्रभावित होकर देवताओं ने महर्षि वेदव्यास को “गुरुदेव” की संज्ञा प्रदान की तथा उनका पूजन किया । तभी से व्यास पूर्णिमा को “गुरु पूर्णिमा” के रूप में मनाने की प्रथा चली आ रही है | बौद्ध ग्रंथों के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के पाँच सप्ताह बाद भगवान बुद्ध ने भी सारनाथ पहुँच कर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही अपने प्रथम पाँच शिष्यों को उपदेश दिया था | इसलिये बौद्ध धर्मावलम्बी भी इसी दिन गुरु पूजन का आयोजन करते हैं |

प्राचीन काल में जब आश्रम व्यवस्था थी तब २५ वर्ष की आयु हो जाने तक विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर ही समस्त शास्त्रों का तथा युद्ध, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला इत्यादि कलाओं का, ज्योतिष आदि अनेकों विधाओं आदि का अध्ययन किया करते थे | और प्रायः यह अध्ययन निःशुल्क होता था | गुरुजन इस कार्य के लिये किसी प्रकार की “दक्षिणा” आदि नहीं लेते थे | उन गुरुजनों तथा उनके आश्रम में रह रहे शिष्यों के जीवन यापन का समस्त भार गृहस्थ लोग वहन किया करते थे | उस समय आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन तथा शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात् गुरुकुल छोड़कर जब सांसारिक जीवन में प्रविष्ट होने का समय होता था उस समय भी गुरुजनों का पूजन करके यथाशक्ति गुरुदक्षिणा आदि देने की प्रथा थी | और इस गुरुपूजा के अवसर पर न केवल गुरुओं का स्वागत सत्कार किया जाता था, बल्कि माता पिता तथा अन्य गुरुजनों की भी गुरु के समान ही पूजा अर्चना की जाती थी | वैसे भी व्यक्ति के प्रथम गुरु तो उसके माता पिता ही होते हैं |

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से प्रायः वर्षा आरम्भ हो जाती है और उस समय तो चार चार महीनों तक इन्द्रदेव धरती पर अमृत रस बरसाते रहते थे | आवागमन के साधन इतने थे नहीं, इसलिए उन चार महीनों तक सभी ऋषि मुनि एक ही स्थान पर निवास करते थे | अतः इन चार महीनों तक प्रतिदिन गुरु के सान्निध्य का सुअवसर शिष्य को प्राप्त हो जाता था और उसकी शिक्षा निरवरोध चलती रहती थी | क्योंकि विद्या अधिकाँश में गुरुमुखी होती थी, अर्थात लिखा हुआ पढ़कर कण्ठस्थ करने का विधान उस युग में नहीं था, बल्कि गुरु के मुख से सुनकर विद्या को ग्रहण किया जाता था | गुरु के मुख से सुनकर उस विद्या का व्यावहारिक पक्ष भी विद्यार्थियों को समझ आता था और वह विद्या जीवनपर्यन्त शिष्य को न केवल स्मरण रहती थी, बल्कि उसके जीवन का अभिन्न अंग ही बन जाया करती थी | इस समय मौसम भी अनुकूल होता था – न अधिक गर्मी न सर्दी | तो जिस प्रकार सूर्य से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता तथा फसल उपजाने की सामर्थ्य प्राप्त होती है उसी प्रकार गुरुचरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञानार्जन की सामर्थ्य प्राप्त होती थी और उनके व्यक्तित्व की नींव दृढ़ होती थी जो उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती थी |

“अज्ञान्तिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया, चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः |” अर्थ सर्वविदित ही है – अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर भगाने के लिये जिस गुरु ने ज्ञान की शलाका से नेत्रों को प्रकाश प्रदान किया उस गुरु का मैं अभिवादन करता हूँ | तथा “गुरुर्ब्रह्मागुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरुर्सक्षात्परब्रहम तस्मै श्री गुरवे नमः |” अर्थात शिष्य के लिये तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब कुछ गुरु ही होता है | वही उसके लिये परब्रह्म होता है | भारतीय संस्कृति में गुरु को गोविन्द अर्थात उस परम तत्व ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है, क्योंकि वह गुरु ही होता है जो शिष्य के मन से अज्ञान का आवरण हटाकर उसे ज्ञान अर्थात ईश्वर के दर्शन कराता है, तभी तो कहा गया है कि “गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय | बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो मिलाय ||”

आज स्थिति यह है कि ५ सितम्बर को हम टीचर्स डे तो मनाते हैं, जो कि अच्छी बात है – क्योंकि उस दिन हम अपने देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिवस मनाते हैं – लेकिन विचारणीय बात यह है कि गुरु पूर्णिमा बस एक औपचारिक पर्व भर बनकर रह गया है | कुछ संगीत आदि कलाओं की शिक्षा देने वाले घरानों को इसका अपवाद अवश्य कहा जा सकता है | क्योंकि वहाँ संगीत आदि का ज्ञान भी गुरुमुख से सुनकर या गुरु के समक्ष बैठकर क्रियात्मक रूप से ही ग्रहण किया जाता है | संगीत आदि कलाओं का ज्ञान कोई पुस्तकों का विषय नहीं है |

आज स्थिति यह है कि स्कूल कालेजों में “गुरु” अथवा “शिक्षक” न रहकर “टीचर” रह गए हैं  | जिनके लिये विद्यादान शिष्य को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाने की अपेक्षा धनोपार्जन का साधन अधिक होता है | उसी प्रकार शिष्य के लिये भी ज्ञानार्जन उस परम तत्व से साक्षात्कार का माध्यम न रहकर अच्छी नौकरी प्राप्त करने अथवा अच्छा व्यवसाय स्थापित करने के लिये ऊँची शिक्षा ग्रहण करके उसका सर्टिफिकेट अथवा डिग्री प्राप्त करने का माध्यम ही बन गया है | उच्च शिक्षा प्राप्त करके व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति करने की सोचना अच्छी बात है, लेकिन शिक्षा के, ज्ञान के उच्च और उदात्त आदर्शों का व्यावसायीकरण हो जाना अच्छी बात नहीं | शिक्षा का व्यावसायीकरण हो जाने पर गुर शिष्य के मध्य स्वस्थ और पवित्र सम्बन्ध स्थापित हो ही नहीं सकता |

रही सही कसर पूरी कर दी है तथाकथित “सद्गुरुओं” ने जिन्होंने समाज की धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए स्वयं का इतना पतन कर लिया है कि उनके लिये शिष्य से येन केन प्रकारेण धन तथा अन्य प्रकार के लाभ प्राप्त करना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है जीवन का | और कुछ ढोंगी गुरु तो और भी नीचे गिर जाते हैं – आए दिन अखबारों और टी वी चैनल्स के माध्यम से ऐसी घटनाओं की जानकारी मिलती रहती है | और ऐसा नहीं है कि उनके भक्तों में केवल अनपढ़ कहे जाने वाले लोग ही शामिल हों, अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इन ढोंगी गुरुओं के चक्कर में फँस जाते हैं |

देखा जाए तो आज कुछ ही गिने चुने “सद्गुरु” ऐसे होंगे जो आगम निगम और पुराणों का, उपनिषदों आदि का महर्षि वेदव्यास के समान सम्पादन करके शिष्यों के लिये समर्पित कर दें | ऐसे गुरु कभी यह नहीं कहते कि वे गुरु हैं और लोगों को मोक्ष का मार्ग, ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाने के लिये आए हैं | वे उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये कभी कुछ ऐसा नहीं बताते जो तर्क संगत न हो | सरल और विनम्र होते हैं | उनके मन में शिष्यों के प्रति भी तथा अन्य लोगों के प्रति भी अगाध स्नेह भरा होता है | ज्ञान का सच्चे अर्थों में भण्डार होते हैं | पर ऐसे गुरु हैं कितने, और उन्हें खोजा किस तरह जाए ? स्कूल कालेजों में भी विद्यार्थियों को मन से पढ़ाने वाले शिक्षक मिल सकते हैं, जो ट्यूशन के लालच में स्कूल का काम घर पर ट्यूशन के समय कराने के लिए नहीं छोड़ेंगे बल्कि स्कूल में पूरा कराएँगे | जो किताबी ज्ञान के साथ साथ बच्चों को संस्कारवान भी बना सकते हैं | किन्तु इस सबके लिए आवश्यकता है कि आधुनिक तथाकथित प्रगति की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाए स्कूल कालेजों में भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखते हुए शिक्षा व्यवस्था बनाई जाए जहाँ “फोटोकापी” बनाने के स्थान पर एक योग्य और सुसंस्कृत व्यक्तित्व के विकास की ओर ध्यान दिया जाए | प्रगति तो आवश्यक है, किन्तु उसके लिए अन्धाधुन्ध कुछ भी कर गुज़रना अच्छी बात नहीं | क्योंकि पढ़ाई पैसे से नहीं होती वरन् गुरु में यदि अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण निष्ठा है, अपने विषय का पूर्ण ज्ञान है, शिष्य के प्रति तथा अपने कर्तव्य के प्रति पूरी ईमानदारी का भाव है तब ही वह गुरु लालच का त्याग करके अपना कार्य करेगा |

साथ ही धर्म और आध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों को भी “धर्म” और “आध्यात्मिकता” में अन्तर समझना होगा और धर्मान्धता तथा धर्मोन्माद का त्याग करना होगा | तभी एक ऐसे गुरु को प्राप्त कर सकते हैं जो स्वयं को “भगवान” बताने की अपेक्षा अपने शिष्यों के मानस में ज्ञान रूपी चंद्रमा की धवल ज्योत्स्ना प्रसारित करके अज्ञान रूपी अमावस्या से शिष्य को मुक्ति दिला सके | क्योंकि गुरु केवल शिक्षक ही नहीं होता अपितु माता के समान हम पर ममता का भाव रखते हुए हमें संस्कार भी प्रदान करता है और पिता के समान हमें उचित मार्ग भी दिखाता है | हमारा आत्मबल बढ़ाता है | हमें अपनी अन्तःशक्ति से परिचित कराके उसे विकसित करने के उपाय भी बताता है | साधना का मार्ग सरल बनाता है – फिर चाहे वह साधना आत्मतत्व से साक्षात्कार के लिये हो अथवा धनोपार्जन के योग्य बनने के लिये विद्यालय और कालेजों की शिक्षा की हो | ऐसा हो जाने पर ही गुरु पूर्णिमा का पर्व सार्थक हो पाएगा | और तभी प्रत्येक शिष्य गुरु के प्रति कृतज्ञ भाव से, गुरु के चरणों में श्रद्धानत होकर समर्पित हो सकेगा |

केवल एक दिन गुरु पूजा को उत्सव के रूप में मनाकर हम सब शान्त होकर बैठ जाते हैं अगले वर्ष की प्रतीक्षा में | हमें जीवनपर्यन्त गुरु के उपकारों का स्मरण करना चाहिए | तो आइये एक बार पुनः गुरु के चरणकमलों में सादर अभिवादन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें | जय गुरुदेव…..

गुरुदेव

 

अर्थों को सार्थकता दे दें

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शब्दों के उदास होने पर अर्थ स्वयं पगला जाते हैं |

आओ शब्दों को बहला दें, अर्थों को सार्थकता दे दें ||

दिल का दीपक यदि जल जाए, जीवन भर प्रकाश फैलाए

और दिये की जलती लौ में दर्द कहीं फिर नज़र न आए |

स्नेह तनिक सा बढ़ जाए तो दर्द कहीं पर छिप जाते हैं

आओ बाती को उकसा दें, प्रेममयी आभा फैला दें ||

शूलमध्य कुछ पुष्प खिलें तो उपवन का यौवन बढ़ जाए

और अनगिनत मस्त तितलियाँ उसके आस पास मंडराएँ |

होकर उनसे आकर्षित, कुछ भ्रमर वहाँ फिर आ जाते हैं

आओ उनका मिलन करा दें, स्नेह का कुछ सौरभ महका दें ||

बहते आँसू से लिख डाली जिसने अपनेपन की गीता

कैसे कह सकते हो उसको, वह है अपनेपन से रीता ?

होता है पीड़ित जब मन, कुछ गीत अधर पर आ जाते हैं

आओ, जिनको ढूँढा है, उन गीतों को भी कुछ चहका…

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बेहद याद आते हो तुम

बेहद याद आते हो तुम
जब बरसती हैं सुख की रसभीनी बून्दें / मानस पर मेरे
जब होती है कोई उपलब्धि मुझे / या मेरे अपनों को
सोचती हूँ, काश तुम होते पास मेरे / सुनाती ख़ुशी से उछल कर तुम्हें
गिनाती अपनी सबकी उपलब्धियाँ
और तब तुम भी झूमते मेरे साथ ख़ुशी में / लगा लेते मुझे अपने गले
उत्साह से देते थपकियाँ मेरी पीठ पर

ताकि बढ़ती रहूँ मैं इसी तरह सदा / चरम लक्ष्य की ओर अपने |

बेहद याद आते हो तुम
जब पाती हूँ ख़ुद को एकाकी / भरी भीड़ में भी
जब नहीं सुनी जाती बात मेरी / नहीं समझी जाती सोच मेरी
जब छा जाते हैं दुःख के काले बादल / पर नहीं बरसता अमृत रस कहीं से भी
जब नहीं मिलता हल किसी समस्या का / नहीं मिलता उत्तर किसी प्रश्न का
तब ढूँढती हैं आँखें तुम्हें हर ओर
मिल जाओ तुम कहीं / और भाग कर छिप जाऊँ मैं / आँचल में तुम्हारे
समा जाऊँ गोद में तुम्हारी / बन कर फिर वही छोटी सी गुड़िया
और मेरे बालों में स्नेहसिक्त अँगुलियाँ फिराते तुम
प्यार से देते थपकियाँ मेरी पीठ पर / बोलो नेहपगी दृढ़ वाणी में
तुम्हारा कोई भी कष्ट नहीं है बड़ा / तुम्हारी संकल्पशक्ति और साहस से
तुम्हारी कोई भी समस्या / कोई भी प्रश्न नहीं है बड़ा / तुम्हारी योग्यता से
गिर पड़ने पर मेरे / हाथ पकड़ उठा लो मुझे / और बोलो
उठो, साहस के साथ जगाओ / अपने सुप्त पड़ चुके संकल्पों को
प्रयास करो कौशल, उत्साह और साहस के साथ / पाने का अपने लक्ष्य को
पीछे रह जायेंगे सारे अवसाद / सारी समस्याएँ
मिल जायेंगे तब उत्तर / सभी प्रश्नों के ।
पर नहीं आज तुम साथ मेरे
मात्र अहसास भर है होने का तुम्हारे / मेरी आत्मा में / मेरे अस्तित्व में
क्योंकि तुम्हीं से तो बना है अस्तित्व मेरा

सींचा जिसे तुमने अपने रक्त से / अपने नेह जल से / अपनी ममता से
अपने संकल्प से दृढ़ता से जुड़े रहेने को / दिया आधार जिसे तुमने अपने विश्वास का

सजाने को जिसका रूप दिए तुमने आभूषण / साहस और उत्साहों के

ऊँचा उड़ने को जिसे दिए तुमने पंख / आदर्श, नैतिकता और संकल्पों के
हाँ, तुम सदा साथ हो मेरे / मेरी यादों में / मेरी सोचों में / मेरे अस्तित्व में

अभिषिक्त करते हुए सदा अपने नेहमिश्रित आशीषों से…

फिर भी न जाने क्यों… बेहद याद आते हो तुम…

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मेघों ने बाँसुरी बजाई

मौसम ने अपनी ही एक पुरानी रचना याद दिला दी:-

मेघों ने बाँसुरी बजाई, झूम उठी पुरवाई रे |

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

उमड़ा स्नेह गगन के मन में, बादल बन कर बरस गया

प्रेमाकुल धरती ने नदियों की बाँहों से परस दिया |

लहरों ने एकतारा छेड़ा, कोयलिया इतराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

बूँदों के दर्पण में कली कली निज रूप निहार रही

धरती हरा घाघरा पहने नित नव कर श्रृंगार रही |

सजी लताएँ, हौले हौले डोल उठी अमराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

अँबुवा की डाली पे सावन के झूले मन को भाते

हर इक राधा पेंग बढ़ाए, और हर कान्हा दे झोंटे |

हर क्षण, प्रतिपल, दसों दिशाएँ लगती हैं मदिराई रे

बरखा जब गा उठी, प्रकृति भी दुलहिन बन शरमाई रे ||

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