ठिठुराती भीषण ठण्ड में

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ठिठुराती भीषण ठण्ड में

ठिठुराती भीषण ठण्ड में

जब प्रकृति नटी ने छिपा लिया हो स्वयं को

चमकीली बर्फ की घनी चादर में

छाई हो चारों ओर घरों की छत पर और आँगन में

खामोशी के साथ “टप टप” बरसती धुँध

नहीं दीख पड़ता कि चादर के उस पार दूसरा कौन है

और फिर इसी द्विविधा को दूर करने

धीरे धीरे मीठी मुस्कान के सूर्यदेव का ऊपर उठाना

जो कर देता है खिलखिलाती स्वर्णिम धूप को आगे

मिटाने को मन की द्विविधा

जो परोस देती है स्वर्ण में पिरोई मोतियों की लड़ियाँ

प्रकति की विशाल थाली में

तब याद आता है अपना बचपन

वो माँ का रजाई के भीतर हाथ डालकर

हौले हौले से अपने ठंडे हाथ मुँह पर फिराकर पुकारना

वो दोस्तों के साथ धूप रहते आँगन में चारपाई पर बैठकर मूँगफली खाना

और माँ को स्वेटर बुनते देखना

या फिर दोस्तों के साथ धूप में बाहर चबूतरे पर धमा चौकड़ी मचाना

साँझ ढलते है माँ का फिर से पुकारना भीतर आने के लिए

धूप सेंकते माँ पिताजी की मूँगफली छीलते और गज़क खाते मीठी नोंक झोंक

और देखते ही देखते फिर से छिप जाना कोहरे की घनी चादर में

प्रकृति सुकुमारी का

जिसके साथ शुरू हो जाती थी माँ और पिताजी की

बिटिया को अपनी बाहों की निवास में छिपा लेने की मीठी होड़

और इसी मिठास के साथ धीरे धीरे बड़े होते जाना

जिम्मेदारियों और काम का बोझ खुद अपने ऊपर आ जाना

क्योंकि आज न माँ है न पिताजी

बल्कि मैं खुद बन चुकी हूँ अपनी बिटिया के लिए एक मीठा गर्म अहसास

“माँ”

इस पल्लवित पुष्पित प्रकृति के साथ ही

और अब जब देखती हूँ बर्फ का लंहगा पहने

कोहरे की चादर में लिपटी

शान्तचित्त ध्यान में मग्न प्रकृति को

तो अहसास होने लगा है खुद अपने भीतर की शान्ति और ऊष्मा का

सूर्य की मुस्कराहट के साथ खिलखिलाती मोती बिखराती धूप से

जब धीरे धीरे भंग होता है प्रकृति का ध्यान

और जुट जाती है वह अपने नित्य प्रति के कर्तव्य कर्मों में

तब अहसास होता है मानव जीवन की प्रगति यात्रा का

ठण्ड ठिठुर रही तो क्या

शीघ्र ही वसन्त भी तो आने वाला है

बर्फ को पिघलाती और धुँध को छाँटते हुए

फिर आएगी गर्मी और फिर बरसात…

नहीं रुकने पाती प्रगति की यह प्रगति पथ की यात्रा…

चलती रहती है अनवरत निरन्तर निर्बाध…

इसी तरह तरह युगों युगों तक…

सूर्योदय

समस्याएँ जीवन का एक अभिन्न अंग

जिनसे नहीं है कोई अछूता इस जगत में

किन्तु समस्याओं पर विजय प्राप्त करके जो बढ़ता है आगे

नहीं रोक सकती उसे फिर कोई बाधा

हर सन्ध्या अस्त होता है सूर्य

पुनः उदित होने को अगली भोर में

जो दिलाता है विश्वास हमें

कि नहीं है जैसा मेरा उदय और अवसान स्थाई

उसी प्रकार नहीं है कोई सुख अथवा समस्या भी स्थाई

रोम रोम को आह्लादित करते सुख के मध्य से ही

सर उठाती है कोई समस्या

जो हिला देती है व्यक्ति को भीतर तक

किन्तु चिन्ता किस बात की – कल होने वाला है अन्त इस समस्या का

किन्तु नहीं है यह अन्त भी चिरस्थाई

आनन्द के समुद्र में गोते लगाते

कल फिर उपज सकती हैं नवीन समस्याएँ

जो नहीं रहेंगी परसों

और चलता रहता है यही क्रम अनवरत निरन्तर युगों युगों तक

इसीलिए तो भोर के केसर जैसी लालिमायुत रश्मिपथ पर

धीरे धीरे ऊपर उठता सूर्य देता है संदेसा जग को

कि उठो, जागो मीठी नींद से,

और भुलाकर कल की चिन्ताएँ बढ़ चलो प्रगति पथ पर

सूर्योदय से पूर्व का दृश्य

भरता है एक नवीन ऊर्जा

और एक नवीन चेतना कण कण में

और शीत की ये सुहानी पीत भोर

करती है नवीन आशा का संचार कण कण में…

आशा और सफलता

जीवन में सफलता प्राप्त करनी है तो सोच सकारात्मक बनाए रखने के साथ ही मन में आशा को जगाए रखना आवश्यक है | सकारात्मक सोच और आशावान व्यक्ति से किसी भी प्रकार की निराशा और चिन्ता कोसों दूर भागते हैं जिसके कारण उसका मन और शरीर दोनों स्वस्थ बने रहते हैं और वह अपनी सफलता के लिए उचित दिशा में प्रयास कर पाता है… ऐसे व्यक्ति को भला लक्ष्य प्राप्ति से कौन रोक सकता है…