होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

फागुन का है रंग चढ़ा लो देखो कैसा खिला खिला सा |

मस्त बहारों के आँगन में टेसू का रंग घुला घुला सा ||

राधा संग बरजोरी करते कान्हा, मन उल्लास भरा सा

कौन किसे समझाए, सब पर ही है कोई नशा चढ़ा सा ||

सभी के जीवन में सुख, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, स्वास्थ्य, प्रेम, उल्लास और हर्ष के इन्द्रधनुषी रंग बिखरते रहें, इसी भावना के साथ सभी को अबीर की चमक, गुलाल के रंग और पलाश पुष्प की भीनी भीनी ख़ुशबू से युक्त रंग और सुगन्ध के पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएँ…

 

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रंग की एकादशी

रंग की एकादशी – कुछ भूली बिसरी यादें

कल रविवार 17 मार्च को फाल्गुन शुक्ल एकादशी है | यों आज रात्रि ग्यारह बजकर चौंतीस मिनट के लगभग वणिज करण, शोभन योग और पुनर्वसु नक्षत्र में एकादशी तिथि का आगमन हो जाएगा, किन्तु उदया तिथि होने के कारण कल एकादशी का उपवास रखा जाएगा | इस प्रकार जैसी कि मान्यता है कि द्वादशी तिथि में एकादशी का परायण उचित रहता है, तो कल सायं आठ बजकर इक्यावन मिनट के लगभग द्वादशी तिथि का भी आगमन हो जाएगा | यह एकादशी आमलकी एकादशी कहलाती है और इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा अर्चना का विधान है | किन्तु एक अन्य महत्त्व भी इस एकादशी का है | इसे “रंग की एकादशी” भी कहा जाता है | बृज में जहाँ होलाष्टक यानी फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होली के उत्सव का आरम्भ हो जाता है वहीं काशी विश्वनाथ मन्दिर में फाल्गुन शुक्ल एकादशी से इस उत्सव का आरम्भ माना जाता है | होलाष्टक के विषय में जहाँ मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को भगवान कृष्ण प्रथम बार राधा जी के परिवार से मिलने बरसाने गए थे तो वहाँ लड्डू बाँटे गए थे, वहीं काशी विश्वनाथ में रंग की एकादशी के विषय में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माता पार्वती को अपने घर लिवा लाने के लिए पर्वतराज हिमालय की नगरी की ओर प्रस्थान किया था |

होलाष्टक के विषय में एक और भी मान्यता है कि तारकासुर का उत्पात जब बहुत अधिक बढ़ गया तो ऐसा माना गया कि केवल शिव और पार्वती से उत्पन्न सन्तान ही  उसका वध करने में सक्षम होगी | किन्तु शिवपत्नी सती ने जब से अपने पिता के यज्ञ का विध्वंस करने के लिए उसमें आत्माहुति दी थी तब से शिव घोर तपस्या में लीन हो गए थे | किसी भी उपाय से जब उनका तप भंग नहीं किया जा सका तो देवताओं ने कामदेव की सहायता ली और उन्होंने प्रेम का बाण उन पर चला दिया | जिसके कारण शिवजी का तीसरा नेत्र खुल गया और उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया | माना जाता है कि यह घटना फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को ही घटित हुई थी | तब कामदेव की पत्नी रति ने शिव को तपस्या से प्रसन्न किया और उन्होंने कामदेव को रति के साथ छाया रूप में विचरण करने का वरदान दिया | रति की तपस्या के वे आठ दिन होलाष्टक कहलाए | तभी भगवान शिव का ध्यान पार्वती की तपस्या पर गया और वे फाल्गुन शुक्ल एकादशी को उनसे विवाह करने निकल पड़े |

बहरहाल, मान्यताएँ कुछ भी हों, कथाएँ कितनी भी हों, सत्य बस यही है कि होली का उत्साहपूर्ण रंगपर्व ऐसे समय आरम्भ होता है जब सर्दी धीरे धीरे पीछे खिसक रही होती है और गर्मी चुपके से अपने पैर आगे बढ़ाने की ताक में होती है | साथ में वसन्त की खुमारी हर किसी के सर चढ़ी होती है | फिर भला हर कोई मस्ती में भर झूम क्यों न उठेगा | कोई विरह वियोगी ही होगा जो ऐसे मदमस्त कर देने वाले मौसम में भी एक कोने में सूना सूखा और चुपचाप खड़ा रह जाएगा |

हमें याद आता है हमारे शहर में मालिनी नदी के पार छोटी सी बस्ती थी | रंगपंचमी यानी फाल्गुन शुक्ल पंचमी से रात को भोजन आदि से निवृत होकर सब लोग चौपाल में इकट्ठा हो जाते थे | उन दिनों रात का भोजन अधिकांशतः दिन छिपते ही हो जाया करता था | रात को सारंगी और बाँसुरी से काफी पीलू के सुर उभरने शुरू होते, धीरे धीरे खड़ताल खड़कनी शुरू होती, चिमटे चिमटने शुरू होते, मँजीरे झनकने की आवाज़ें कानों में आतीं और साथ में धुनुकनी शुरू होतीं ढोलकें धमार, चौताल, ध्रुपद या कहरवा की लय पर – फिर धीरे धीरे कंठस्वर उनमें मिल जाते और आधी रात के भी बाद तक काफी, बिरहा, चैती, फाग, धमार, ध्रुपद, रसिया और उलटबांसियों के साथ ही स्वांग का जो दौर चलता तो अपने अपने घरों में बिस्तरों में दुबके लोग भी अपना सुर मिला देते | हमारे पिताजी को अक्सर वे लोग साथ में ले जाया करते थे तो जब पिताजी वापस लौटते थे तो वही सब गुनगुनाते कब में घर की सीढ़ियाँ चढ़ जाते थे उन्हें कुछ होश ही नहीं रहता था | और ऐसा नहीं था कि उस चौपाल में गाने बजाने वाले लोग कलाकार होते थे | सीधे सादे ग्रामीण किसान होते थे, पर होली की मस्ती जो कुछ उनसे प्रदर्शन करा देती थी वह लाजवाब होता था और इस तरह फ़जां में घुल मिल जाता था कि रात भर ठीक से नींद पूरी न होने पर भी किसी को कोई शिकायत नहीं होती थी, उल्टे फिर से उसी रंग और रसभरी रात का इंतज़ार होता था | तो ऐसा असर होता है इस पर्व में |

और रंग की एकादशी से तो सारे स्कूल कालेजों और शायद ऑफिसेज़ की भी होली की छुट्टियाँ ही हो जाया करती थीं | फिर तो हर रोज़ बस होली का हुडदंग मचा करता था | रंग की एकादशी को हर कोई स्कूल कॉलेज ज़रूर जाता था – अपने दोस्तों और टीचर्स के साथ होली खेले बिना भला कैसा रहा जा सकता था ? और टीचर्स भी बड़े जोश के साथ अपने स्टूडेंट्स के साथ उस दिन होली खेलते थे |

घरों में होली के पकवान बनने शुरू हो जाया करते थे | जो होली के दिन तक भी पूरे नहीं हो पाते थे | होलिकादहन के स्थल पर जो अष्टमी के दिन होलिका और प्रहलाद के प्रतीकस्वरूप दो दण्ड स्थापित किये गए थे अब उनके चारों ओर वृक्षों से गिरे हुए सूखे पत्तों, टहनियों, लकड़ियों आदि के ढेर तथा बुरकल्लों की मालाओं आदि को इकठ्ठा किया जाने का कार्यक्रम शुरू हो जाता था | ध्यान ये रखा जाता था कि अनावश्यक रूप से किसी पेड़ को न काटा जाए | हाँ शरारत के लिए किसी दोस्त के घर का मूढा कुर्सी या चारपाई या किसी के घर का दरवाज़ा होली की भेंट चढ़ाने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होती थी | और ये कार्य लड़कियाँ नहीं करती थीं | विशेष रूप से हर लड़का हर दूसरे लड़के के घर के दरवाज़े और फर्नीचर पर अपना मालिकाना हक समझता था और होलिका माता को अर्पण कर देना अपना परम कर्त्तव्य तथा पुण्य कर्म समझता था | और इसी गहमागहमी में आ जाता था होलिकादहन का पावन मुहूर्त |

गन्ने के किनारों पर जौ की बालियाँ लपेट कर घर के पुरुष प्रज्वलित होलिका की परिक्रमा करते हुए आहुति देते थे और होलिका की अग्नि में भुने हुए इस गन्ने को प्रसादस्वरूप वितरित करते थे | अगली सुबह होलिका की अग्नि से हर घर का चूल्हा जलता था | रात भर होलिका की अग्नि पर टेसू के फूलों का रंग पकता था जो सुबह सुबह कुछ विशिष्ट परिवारों में भेजा जाता था और बाक़ी बचा रंग बड़े बड़े ड्रमों में भरकर होली के जुलूस में ले जाया जाता था और हर आते जाते को उस रंग से सराबोर किया जाता था | गुनगुना मन को लुभाने वाली ख़ुशबू वाला टेसू के फूलों का रंग जब घर में आता तो पूरा घर ही एक नशीली सी ख़ुशबू से महक उठता |

दोपहर को इधर सब नहा धोकर तैयार होते और उधर होली पर बना देसी घी का सूजी का गरमा गरमा हलवा प्रसाद के रूप में हर घर में पहुँचा दिया जाता | हलवे का प्रसाद ग्रहण करके और भोजनादि से निवृत्त होकर नए वस्त्र पहन कर शाम को सब एक दूसरे के घर होली मिलने जाते | अब त्यौहार आता अपने समापन की ओर | नजीबाबाद जैसे सांस्कृतिक विरासत के धनी शहर में भला कोई पर्व संगीत और साहित्य संगोष्ठी से अछूता रहा जाए ऐसा कैसे सम्भव था ? तो रात को संगीत और कवि गोष्ठियों का आयोजन होता जो अगली सुबह छह सात बजे जाकर सम्पन्न होता | रात भर चाय, गुझिया, समोसे, दही भल्ले पपड़ी चाट के दौर भी चलते रहते | यानी रंग की पञ्चमी से जो होली के गान का आरम्भ होता उसका उत्साह बढ़ते बढ़ते होलाष्टक तक अपने शैशव को पार करता हुआ रंग की एकादशी को किशोरावस्था को प्राप्त होकर होली आते आते पूर्ण युवा हो जाता था |

याद आते हैं वे दिन… याद आते हैं वे लोग… उन्हीं दिनों और उन्हीं लोगों का स्मरण करते हुए, सभी को कल रंग की एकादशी के साथ ही अग्रिम रूप से होली की रंग भरी… उमंग भरी… हार्दिक शुभकामनाएँ…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/03/16/ekadashi-of-colours-some-memories/

 

 

होली है हुडदंग मचा लो

होली है, हुडदंग मचा लो, सारे बन्धन तोड़ दो |

और नियम संयम की सारी आज दीवारें तोड़ दो ||

कैसा नखरा, किसका नखरा, आज सभी को रंग डालो |

जो होगा देखा जाएगा, आज न रंग में भंग डालो ||

माना गोरी सर से पल्ला खिसकाके देगी गाली

तीखी धार कटारी की है, मत समझो भोली भाली |

पर टेसू के रंग में इसको सराबोर तुम आज करो

शहद पगी गाली के बदले मुख गुलाल से लाल करो ||

पूरा बरस दबा रक्खी थी साध, उसे पूरी कर लो

जी भरके गाली दो, मन की हर कालिख़ बाहर फेंको ||

नहीं कोई है रीत, नहीं है कोई बन्दिश होली में

मन को जिसमें ख़ुशी मिले, बस ऐसी तुम मस्ती भर लो ||

जो रूठा हो, आगे बढ़के उसको गले लगा लो आज

बाँहों में भरके आँखों से मन की तुम कह डालो आज |

शरम हया की बात करो मत, बन्धन ढीले आज करो

नाचो गाओ धूम मचाओ, पिचकारी में रंग भरो ||

गोरी चाहे प्यार के रंग में रंगना, उसका मान रखो

कान्हा चाहे निज बाँहों में भरना, उसका दिल रख लो |

डालो ऐसा रंग, न छूटे बार बार जो धुलकर भी

तन मन पुलकित हो, कुछ ऐसा प्रेम प्यार का रंग भर दो ||

सभी के जीवन में सुख, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, स्वास्थ्य, प्रेम, उल्लास और हर्ष के इन्द्रधनुषी रंग बिखरते रहें, इसी भावना के साथ सभी को अबीर की चमक, गुलाल के रंग और टेसू की भीनी भीनी ख़ुशबू से युक्त रंग और सुगन्ध के पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएँ…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/03/02/happy-holi/

 

 

 

होलिका दहन और रंगपर्व

कल होलिका दहन का पर्व है और सायंकाल सात बजकर सैतीस मिनट पर भद्रा की समाप्ति पर होलिका दहन का मुहूर्त आरम्भ होता है, और उसके बाद आरम्भ हो जाएँगी रंगों की मस्तीभरी बौछारें | होलिका दहन अर्थात सत्य, निष्ठा, विश्वास, आस्था, उदारता आदि सद्भावों की अग्नि में असत्य, अविश्वास, अनास्था, क्रूरता, घृणा, द्वेष, क्रोध रूपी दुर्भावों की होलिका का दहन | यों होलिका दहन के विषय में भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद तथा उनकी बुआ होलिका की कथा सभी जानते हैं |

दिति का पुत्र था दैत्यराज हिरण्यकशिपु, जिनकी सन्तान के रूप में भक्तर्षि प्रह्लाद का जन्म हुआ | हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके वर प्राप्त किया था कि वह अमर हो जाए और तीनों लोकों में कोई भी प्राणी उसका वध न कर सके | इस वर के कारण वह बहुत अधिक आततायी हो गया था और छल कपट तथा क्रूरता के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार जमा कर स्वयं को भगवान घोषित कर दिया था | दूसरी ओर उसका पुत्र प्रह्लाद अत्यन्त उदारमना था तथा भगवान विष्णु का परमभक्त था और सत्य, न्याय, सदाचार, निष्ठा तथा विश्वास के मार्ग पर चलकर अध्यात्म साधना में लीन रहता था |

अपने पुत्र की यही बातें हिरण्यकशिपु को नहीं भाती थीं, क्योंकि वह चाहता था कि अन्य प्रजाजनों की ही भाँति उसका पुत्र भी केवल उसे ही भगवान मानकर उसी की पूजा करे | प्रह्लाद ने जब अपने पिता तथा गुरुकुल में अपने दैत्य सहपाठियों को भी ईशभक्ति की सलाह दी तो हिरण्यकशिपु आपे से बाहर हो गया और उसने तरह तरह से प्रह्लाद का वध करने के प्रयास आरम्भ कर दिए | प्रह्लाद को भोजन में विष दिया गया, हाथी के पैरों तले रौंदने का प्रयास किया गया, नागदंश से उसे मारने का प्रयास किया गया | किन्तु भगवान विष्णु ने हर बार अपने भक्त के प्राणों की रक्षा ही की | यहाँ तक कि दैत्यपुरोहितों को माया से कृत्या बनाने का आदेश भी दिया गया जो स्त्री के आकार की अत्यन्त विशाल अग्नि की ज्वाला ही थी | किन्तु वह भी अपने ही ताप में जलकर भस्म हो गई |

हिरण्यकशीपु को जब इस बात का पता चला तो वह भयभीत हो उठा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि देवताओं ने उसका अन्त करने के लिए ही प्रह्लाद के रूप में यह मायाजाल बिछाया हो | और तब प्रह्लाद का वध करने के उपाय और भी अधिक तेज़ कर दिए गए | हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वर प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती | हिरण्यकशिपु ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि की ज्वाला में कूद जाए | वर के प्रताप से वह तो बच जाएगी किन्तु उसकी गोद में बैठे प्रहलाद का अन्त हो जाएगा | और होलिका ने ऐसा ही किया | किन्तु भगवान विष्णु ने यहाँ भी प्रह्लाद की रक्षा की और होलिका उस अग्नि में जलकर भस्म हो गई | इसी कथा को आधार बनाकर होलिका दहन का आयोजन किया जाता है – जो प्रतीक है इस तथ्य का कि सत्य का कभी अन्त नहीं हो सकता और असत्य तथा दुष्टता कभी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकते |

देखा जाए तो होलिका छल, कपट, दम्भ, लालच, क्रोध, घृणा, द्वेष आदि अनगिनत दुर्भावों की प्रतीक है जो प्रह्लाद रूपी निश्छलता, उदारता, निष्ठा, विश्वास, आस्था जैसे सद्भावों को जलाकर भस्म कर देना चाहती है | किन्तु यदि व्यक्ति का संकल्प दृढ़ है तो किसी प्रकार की होलिका भी उसके सद्गुणों को भस्मीसात् नहीं कर सकती |

होलिका दहन के बाद रंगों की वर्षा आरम्भ हो जाती है और उसके साथ उद्भव हो जाता है एक नवीन आनन्द का – एक नवीन उल्लास का | रंग हमारे जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं | व्यक्ति के जीवन में हताशा और निराशा भर गई हो तो रंगों का जादू उसे दूर करके नई ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है | हमारी भावनाओं के साथ – हमारे आवेगों के साथ रंगों का बहुत गहरा सम्बन्ध है | रंग प्रतीक हैं आकर्षण के, आनन्द के, हर्षोल्लास के | रंग प्रतीक हैं उन समस्त भूमिकाओं के – उन समस्त सम्बन्धों के – जिनका व्यक्ति अपने जीवनकाल में विभिन्न स्तरों पर विविध परिस्थितियों में निर्वाह करता है | और होलिका दहन के बाद रंगों का उत्सव इसी बात का संकेत है कि व्यक्ति को समस्त दुर्भावों को भस्म करके अपने विभिन्न प्रकार के उत्तरदायित्वों का पूर्ण आनन्द एवं उत्साह के साथ निर्वाह करना चाहिए |

तो आइये साथ मिलकर वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, घृणा जैसे अनेकों दुर्भावों की होलिका को भस्म करके समस्त प्रकार के सद्भावों के प्रह्लाद को जीवनदान दें, ताकि प्रकृति द्वारा प्रदत्त सभी प्रकार के रंगों की बौछारों से समस्त जड़ चेतन आनन्दित, आह्लादित और उत्साहित होकर झूम उठे…

होली की रंगभरी हार्दिक शुभकामनाएँ…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/02/28/holika-dahan/

 

होलाष्टक

आज रात्र्योत्तर दो बजकर उनतीस मिनट (23 फरवरी प्रातः 02:29) पर फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि लग जाएगी | इसी समय से होलाष्टक आरम्भ हो जाएँगे | 1 मार्च सायं 07:37 के बाद यानी भद्रा समाप्ति पर होलिका दहन का मुहूर्त है, और उसके बाद प्रातः रंगों की बरसात के साथ ही होलाष्टक समाप्त हो जाएँगे |

फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से आरम्भ होकर पूर्णिमा तक की आठ दिनों की अवधि होलाष्टक के नाम से जानी जाती है और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को होलाष्टक समाप्त हो जाते हैं | इसी दिन से होली के पर्व का आरम्भ हो जाता है | Vedic Astrologers इसे “होलाष्टक दोष” की संज्ञा देते हैं और कुछ स्थानों पर इस अवधि में बहुत से शुभ कार्यों की मनाही होती है | ज्योतिषियों की मान्यता है कि इस अवधि में विवाह संस्कार, भवन निर्माण आदि नहीं करना चाहिए न ही कोई नया कार्य इस अवधि में आरम्भ करना चाहिए | ऐसा करने से अनेक प्रकार के कष्ट, क्लेश, विवाह सम्बन्ध विच्छेद, रोग आदि अनेक प्रकार की अशुभ बातों की सम्भावना बढ़ जाती है | किन्तु जन्म और मृत्यु के बाद किये जाने वाले संस्कारों के करने पर प्रतिबन्ध नहीं होता |

फाल्गुन कृष्ण अष्टमी को होलिका दहन के स्थान को गंगाजल से पवित्र करके होलिका दहन के लिए दो दण्ड स्थापित किये जाते हैं, जिन्हें होलिका और प्रहलाद का प्रतीक माना जाता है | फिर उनके मध्य में उपले, घास फूस और लकड़ी आदि का ढेर लगा दिया जाता है | इसके बाद होलिका दहन तक हर दिन इस ढेर में वृक्षों से गिरी हुई लकड़ियाँ और घास फूस आदि डालते रहते हैं और अन्त में होलिका दहन के दिन इसमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है | ऐसा करने का कारण सम्भवतः यह रहा होगा कि होलिका दहन के अवसर तक वृक्षों से गिरी हुई लकड़ियों और घास फूस का इतना बड़ा ढेर इकट्ठा हो जाए कि होलिका दहन के लिए वृक्षों की कटाई न परनी पड़े |

मान्यता ऐसी भी है कि तारकासुर नामक असुर ने जब देवताओं पर अत्याचार बढ़ा दिए तब उसके वध का एक ही उपाय ब्रह्मा जी ने बताया, और वो ये था कि भगवान शिव और पार्वती की सन्तान ही उसका वध करने में समर्थ हो सकती है | तब नारद जी के कहने पर पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिए घोर तप का आरम्भ कर दिया | किन्तु शिव तो दक्ष के यज्ञ में सती के आत्मदाह के पश्चात् ध्यान में लीन हो गए थे | पार्वती से उनकी भेंट कराने के लिए उनका उस ध्यान की अवस्था से बाहर आना आवश्यक था | समस्या यह थी कि जो कोई भी उनकी साधना भंग करने का प्रयास करता वही उनके कोप का भागी बनता | तब कामदेव ने अपना बाण छोड़कर भोले शंकर का ध्यान भंग करने का साहस किया | कामदेव के इस अपराध का परिणाम वही हुआ जिसकी कल्पना सभी देवों ने की थी – भगवान शंकर ने अपने क्रोध की ज्वाला में कामदेव को भस्म कर दिया | अन्त में कामदेव की पत्नी रति के तप से प्रसन्न होकर शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन देने का आश्वासन दिया | माना जाता है कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को ही भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था और बाद में रति ने आठ दिनों तक उनकी प्रार्थना की थी | इसी के प्रतीकस्वरूप होलाष्टक के दिनों में कोई शुभ कार्य करने की मनाही होती है |

वैसे व्यावहारिक रूप से पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में होलाष्टक का विचार अधिक किया जाता है, अन्य अंचलों में होलाष्टक का कोई दोष प्रायः नहीं माना जाता |

अतः, मान्यताएँ चाहें जो भी हों, इतना निश्चित है कि होलाष्टक आरम्भ होते ही मौसम में भी परिवर्तन आना आरम्भ हो जाता है | सर्दियाँ जाने लगती हैं और मौसम में हल्की सी गर्माहट आ जाती है जो बड़ी सुखकर प्रतीत होती है | प्रकृति के कण कण में वसन्त की छटा तो व्याप्त होती है है | कोई विरक्त ही होगा जो ऐसे सुहाने मदमस्त कर देने वाले मौसम में ब्याह शादी या ऐसी ही अन्य सांसारिक बातों के विषय में विचार करेगा | जनसाधारण का रसिक मन तो ऐसे में सारे काम काज भुलाकर वसन्त और फाग की मस्ती में झूम ही उठेगा…

तो, क्यों न होलाष्टक की इन आठ दिनों की अवधि में स्वयं को सभी प्रकार के सामाजिक रीति रिवाज़ों के बन्धन से मुक्त करके इस अवधि को वसन्त और फाग के हर्ष और उल्लास के साथ व्यतीत किया जाए…

रंगों के पर्व की अभी से हार्दिक शुभकामनाएँ…

http://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/02/22/vedic-astrologer-holashtak/

 

सबही को एकरंग करो तो

जिससे यह तन मन रंग जाए ऐसा कोई रंग भरो तो |

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

यह दीवार घृणा की ऊँची आसमान तक खड़ी हुई है

भू पर ही जन जन में भू नभ जैसी दूरी पड़ी हुई है |

आँगन समतल करो, ढहाने का इसके कुछ ढंग करो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

दुर्भावों का हिरणाकश्यप घेर रहा है सबके मन को

विषम होलिका लिपट रही है इस पावन प्रहलाद के तन को

सच पर आँच नहीं आएगी, जला असत्य अपंग करो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

मुख गुलाल से लाल हुआ है, किन्तु न मन अनुराग रंगा है

रंग से केवल तन भीगा है, मन तो बिल्कुल ही सूखा है |

दुगुना होगा असर, नियम संयम की सच्ची गंध भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

एक दूसरे पर आरोपों की कीचड़ क्यों ये उछल रही है

पिचकारी से रंग के बदले नफ़रत क्यों ये निकल रही है |

ये बेशर्म ठिठोली छोड़ो, मधर हास्य के व्यंग्य भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

खींचे कोई घूँघट का पट, हाथ पकड़ कर नीचे कर दो

मत रोको गोरी के मग को, उसे नेह आदर से भर दो |

राधा स्वयं चली आएगी, सरस श्याम का रंग भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

भीतर से यदि नहीं रंगा तो मिट्टी है मिट्टी का चोला

दुनिया का यह वैभव क्या है, हिम से ढका आग का गोला |

वहम और सन्देह तजो सब, मन में नई उमंग भरो तो

प्रेमगीत की पिचकारी से सबही को एकरंग करो तो ||

होली