स्वस्ति श्री शर्मा का “अन्दाज़-ए-बयाँ”

“Andaz-e-Bayan” of Swasti S Sharma / स्वस्ति श्री शर्मा का “अन्दाज़-ए-बयाँ”

Damadam mast kalandar / दमदम मस्त कलंदर

 

ज़िन्दगी को तपा लिया मैंने

ज़िन्दगी को तपा लिया मैंने, उसका कुन्दन बना लिया मैंने |

आँधियाँ जिसको रोशनी देंगी उस शमा को जला लिया मैंने ||

घटाओं उट्ठो बिजलियाँ लेकर, लो नशेमन बना लिया मैंने |

ग़म तो मरहम है दिल के ज़ख्मों पर, दर्द को दिल बना लिया मैंने……

हसीं ये महफ़िल जाम भरा है, मस्त वो नगमा आज भी है |

दिल का नशेमन ना जाने क्यों तिनका तिनका आज भी है ||

कौन नहीं है, किसकी कमी है, दिल क्यों हैराँ आज भी है |

जाने क्या हम खो बैठे जो चाक गिरेबाँ आज भी है ||

घुँघरू तेरे झनकारें तो दिल में होती हलचल सी |

पर इनमें ना जाने किसका ग़म ये नुमायाँ आज भी है ||

दिल में बसी हैं कितनी यादें, कितनी मुरादें जी में हैं |

पगला ये दिल ना जाने क्यों तनहा तनहा आज भी है ||

हम आए हैं लेकर अपनी तनहाई इन हाथों में |

सनम दिखा दे तेरी महफ़िल जवाँ जवाँ क्या आज भी है ??

साक़ी आज पिला दे इतनी, बेहोशी में खो जाएँ |

वरना तेरी महफ़िल में दिल वीराँ वीराँ आज भी है ||

 

मेरे उपन्यास “नूपुरपाश” से……

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