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नक्षत्र एक विश्लेषण

प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार जातक की चारित्रिक विशेषताएँ तथा उसका व्यक्तित्व

हम बात कर रहे हैं अश्विनी नक्षत्र के विषय में | इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है, बड़ी और चमकदार आँखें होती हैं और चौड़ा मस्तक होता है | स्वास्थ्य सामान्यतः अच्छा रहता है | साहित्य और अस्न्गीत में सी जातक की रूचि हो सकती है | शुद्ध हृदय इस जातक की वाणी मधुर होती है | यह जातक विद्वान्, स्थिर प्रकृति, अपने कार्यों में कुशल, विश्वसनीय तथा अपने परिवार में सम्मानित व्यक्ति होता है | आत्मसम्मान की भावना उसमें कूट कूट कर भरी होती है और जब दूसरे उसका सम्मान करते हैं तो उसे बहुत अच्छा लगता है | आर्थिक रूप से सम्भव हो मध्यम स्तर का हो, किन्तु दयालु तथा दानादि करने वाला होता है और धार्मिक प्रकृति का होता है | छोटी से छोटी बातों को बारीकी से देखना इसका स्वभाव होता है और दूसरों की छोटी से छोटी भूल की ओर इशारा करने में इसे संकोच नहीं होता | यह जातक आज्ञाकारी, सत्यवादी, अपने अधीनस्थ लोगों की तथा परिवार के लोगों की देखभाल करने वाला, अच्छे स्वभाव का, कार्य को समय पर पूर्ण करने वाला तथा वेद शास्त्रों का ज्ञाता भी हो सकता है |

यदि जातक की कुण्डली में यह नक्षत्र अशुभ प्रभाव में होगा तो जातक अहंकारी हो सकता है तथा अकारण ही घूमते रहने में इसकी रूचि हो सकती है | अशुभ प्रभाव में होने पर जातक दूसरों को धोखा भी दे सकता है तथा आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित भी रह सकता है | विवाहित व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध बनाना ऐसे जातक अक स्वभाव हो सकता है | गठिया बुखार, शरीर में दर्द अथवा स्मृतिहीनता जैसी समस्या से ग्रस्त हो सकता है |

इस नक्षत्र का प्रथम चरण “तस्करांश” कहलाता है, दूसरा चरण “भोग्यांश”, कहलाता है, तीसरा चरण “विलक्षणान्श” और चतुर्थ चरण “धर्मांश” कहलाता है | प्रथम तीन चरणों में उत्पन्न जातक प्रायः अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से होते हैं और साहसी, धनी, उत्तम भोजन करने वाले, पढ़े लिखे होते हैं किन्तु अकारण ही बेचैन रहते हैं और Restless होते हैं तथा सदा लड़ने को तत्पर रहते हैं | जीवन में समस्त सुखों का उपभोग करते हैं | Highly sexy हो सकते हैं और दूसरों के जीवन साथी के साथ इनके सम्बन्ध हो सकते हैं | चतुर्थ पाद में जन्म लेने वाले जातक प्रायः ईश्वरभक्त होते हैं और धनी तथा दयालु होते हैं |

अधोमुखी यह नक्षत्र तमोगुण प्रधान नक्षत्र है तथा नक्षत्र पुरुष की दाहिनी जँघा में इसका निवास माना गया है | वैदिक पञ्चांग के अनुसार यह नक्षत्र अश्विनी माह का प्रमुख नक्षत्र है – जो सितम्बर-अक्टूबर के मध्य आता है | मेष राशि में 13 डिग्री बीस मिनट तक इसका विस्तार होता है | इस नक्षत्र से सम्बन्धित वस्तुएँ हैं अश्व, उत्तम वस्त्राभूषण, वाहन तथा लोहे और स्टील से निर्मित अन्य वस्तुएँ |

औषधि ग्रहण करने के लिए तथा स्वास्थ्य में सुधार सम्बन्धी कार्य आरम्भ करने के लिए यह नक्षत्र अत्यन्त अनुकूल माना जाता है | इसके अतिरिक्त यात्रा आरम्भ करने के लिए, कृषिकर्म आरम्भ करने के लिए, बच्चे को प्रथम बार विद्यालय भेजने के लिए, गृहनिर्माण आरम्भ करने और गृहप्रवेश के लिए तथा अन्य भी सभी प्रकार के शुभ कार्यों का आरम्भ करने के लिए यह नक्षत्र शुभ माना जाता है | हाथी और घोड़ों की ख़रीद फ़रोख्त के लिए तथा नए वाहन में प्रथम बार यात्रा करने के लिए और नवीन वस्त्राभूषण धारण करने के लिए भी यह नक्षत्र अनुकूल माना गया है | किन्तु विवाह से सम्बन्धित कार्यों के लिए यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता |

यदि यह नक्षत्र अशुभ प्रभाव में हो तो उस अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए घोड़ों के सहित रथ दान करने का अथवा पितृ कर्म करने का सुझाव दिया जाता है | इस युग में रथ घोड़े आदि दान करना सम्भव नहीं अतः ज्योतिषी घोड़े सहित रथ की मूर्ति दान करने का सुझाव देते हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/07/20/constellation-nakshatras-49/

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नक्षत्र एक विश्लेषण

प्रत्येक नक्षत्र के अनुसार जातक की चारित्रिक विशेषताएँ तथा उसका व्यक्तित्व

पिछले अध्यायों में हम प्रत्येक नक्षत्र के नाम की व्युत्पत्ति और उसके अर्थ, नक्षत्रों के आधार वैदिक महीनों के विभाजन, नक्षत्रों के देवता, अधिपति ग्रह आदि विषयों पर चर्चा करने के साथ ही इस विषय पर भी प्रकाश डाल चुके हैं कि किस राशि में किस नक्षत्र का कितने अंशों तक प्रसार होता है | साथ ही नक्षत्रों के गुण (सत्व, रज, तमस), उनके लिंग, जाति अथवा वर्ण, नाड़ी, योनी, गण, वश्य तथा प्रत्येक नक्षत्र के तत्वों पर भी संक्षेप में चर्चा कर चुके हैं | अब इस अध्याय से इन्हीं समस्त विषयों पर विस्तार से बात करने का प्रयास करेंगे |

इस अध्याय से हमारा प्रयास होगा यह बताने का कि इन समस्त नक्षत्रों के देवताओं, अधिपति ग्रहों, गुणों, लिंग, नाड़ी, योनी, गण, वश्य, जाति तथा तत्वों आदि को यदि ध्यान में रखकर किसी कुण्डली का निरीक्षण परीक्षण किया जाए तो जातक विशेष की Personality और उसका गुण स्वभाव किस प्रकार का हो सकता है | क्योंकि जैसा कि सदा लिखते आए हैं कि किसी एक ही आधार पर किसी जातक के गुण स्वभाव तथा व्यक्तित्व का ज्ञान करना अर्थ का अनर्थ भी कर सकता है | इस प्रक्रिया में कुण्डली का समग्र अध्ययन करने की आवश्यकता होती है | साथ ही प्रत्येक नक्षत्र से सम्बन्धित पदार्थों और वस्तुओं के विषय में बात करेंगे | नक्षत्रों के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए Remedies पर चर्चा करेंगे कि किस नक्षत्र के लिए क्या उपाय किया जाना चाहिए | तो आज सबसे पहले प्रथम नक्षत्र अश्विनी को लेते हैं:

अश्विनी :

सदैव सेवाभ्युदितो विनीतः सत्यान्वितः प्राप्तसमस्तसम्पत् |

योषाविभूषात्मजभूरितोष: स्यादश्विनी जन्मनि मानवस्य ||

अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न जातक देखने में आकर्षक, भाग्यशाली, चतुर, आभूषणप्रिय, Opposite Sex के लोगों द्वारा प्रेम किया जाने वाला, बहादुर, बुद्धिमान तथा दृढ़ इच्छाशक्ति से युक्त होता है | वैज्ञानिक अथवा डॉक्टर हो सकता है | अपने Subordinates तथा सहकर्मियों के द्वारा सम्मान का पात्र हो सकता है तथा सरकारी तन्त्रों से उसे लाभ प्राप्त हो सकता है |

राशिचक्र के इस प्रथम नक्षत्र का अर्थ है अश्वारोही यानी घुड़सवार | पौराणिक कथाओं में अश्विनी का विवरण एक अप्सरा के रूप में उपलब्ध होता है | उसे विश्वकर्मा की पुत्री तथा सूर्य की पत्नी के रूप में जाना जाता है | ऐसे विवरण उपलब्ध होते हैं कि जब अश्विनी अपने पति का तेज सहन नहीं कर सकी तो उसने छाया (शनि की माता) को अपने पति की सेवा के लिए नियुक्त किया और अपनी पहचान छिपाने के लिए वन में जाकर अश्वि – घोड़ी – का रूप बनाकर रहने लगी | अश्विनी का दूसरा नाम संज्ञा भी है | जब छाया ने सूर्य को सारी बातें बताईं तो तो वे भी वन में चले गए और अश्व के रूप में अपनी पत्नी के साथ रहना आरम्भ कर दिया | यही अप्सरा अश्विनी दोनों अश्विनी कुमारों की माता मानी जाती है | ऐसी भी मान्यताएँ हैं कि सूर्य का वीर्य इतना बलशाली था कि माँ अश्विनी उसे अपने गर्भ में धारण नहीं कर सकीं और उन्होंने उसे अपने दोनों नासारन्ध्रों में धारण कर लिया (पौराणिक कथाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए) | जुडवाँ अश्विनी कुमार देवों के चिकित्सक माने जाते हैं |

इस नक्षत्र के अन्य नाम तथा अर्थ हैं नासत्य – जो सत्य न हो, दस्त्रा – असभ्य, आक्रामक, विनाशकारी, गधा, दो की संख्या, चोर, शीत ऋतु, अश्वियुक् – घुड़सवार, तुरग – वाजि – अश्व – हय आदि अश्व के पर्यायवाची |

इस नक्षत्र का प्रतीक है घोड़े का सर – क्योंकि इस नक्षत्र में तीन तारे अश्व के सर की आकृति बनाते हुए होते हैं | दोनों अश्विनी कुमार इस नक्षत्र के देवता हैं जिनकी प्रसिद्धि एक सैनिक, अश्वारोही तथा चिकित्सक के रूप में है | इस नक्षत्र का स्वामी है केतु तथा अधिपति ग्रह है मंगल | लघु संज्ञा वाला यह नक्षत्र वैश्य वर्ग, देव गण, आदि नाड़ी, अश्व योनि तथा चतुष्पद वश्य के अन्तर्गत आता है | पुरुष प्रकृति का यह नक्षत्र वायु तत्व प्रधान है तथा इसका वर्ण यानी रंग रक्त के समान लाल माना जाता है |

इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक अश्वारोही हो सकता है, अश्वों की देखभाल करने वाला हो सकता है, अश्वों की चोरी करने वाला हो सकता है अथवा अश्वों से सम्बन्धित व्यवसाय से उसे अर्थलाभ हो सकता है | वह एक सैनिक भी हो सकता है अथवा रोगों के निदान की अद्भुत सामर्थ्य से युक्त एक अच्छा चिकित्सक भी हो सकता है | वह सेना का कोई अधिकारी भी हो सकता है और कोई सेवक भी हो सकता है | कारागार में किसी पद पर उसकी नियुक्ति हो सकती है अथवा कोर्ट या पुलिस विभाग में कार्यरत हो सकता है | प्रायः ऐसा देखा गया है कि जिस जातक के ग्रह इस नक्षत्र में अनुकूल स्थिति में स्थित होते हैं वह एक सफल चिकित्सक होता है |

इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक ट्रांसपोर्ट अथवा Travel Agencies से सम्बन्धित किसी विभाग में भी कार्यरत हो सकता है | किसी आधिकारिक पद पर आसीन हो सकता है | कन्या और कुम्भ लग्नों के लिए इन राशियों से तीसरे भाव का स्वामी तथा भाई बहनों (Siblings) का कारक मंगल यदि इस नक्षत्र में विद्यमान हो तो जातक के जुड़वाँ भाई बहन हो सकते हैं | यदि पितृकारक या सूर्य अथवा गुरु अथवा नवमेश या दशमेश इस नक्षत्र में विद्यमान हो तो जातक के पिता के Twin Siblings हो सकते हैं |

शेष आगे…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/07/19/constellation-nakshatras-48/

सूर्य का कर्क में गोचर

सूर्य का कर्क में गोचर – कर्क संक्रान्ति

आज गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व है, सर्वप्रथम गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ…

आज खण्डग्रास चन्द्रग्रहण भी है | जैसा कि हम अपने पूर्व के लेखों में भी लिखते आए हैं कि सूर्य ग्रहण और चन्द्रग्रहण बहुत ही आकर्षक खगोलीय घटनाएँ हैं अतः इनसे भयभीत हुए बिना इनके सौन्दर्य की सराहना करने की आवश्यकता है | किन्तु फिर भी जो लोग ग्रहण के वेध को मानते हैं उनके लिए आज रात्रि 25:32 (अर्द्ध रात्र्योत्तर एक बजकर बत्तीस मिनट) पर ग्रहण का स्पर्श काल होगा और 28:30 (कल सूर्योदय से लगभग एक घंटा पूर्व यानी चार बजकर तीस मिनट) पर मोक्ष काल होगा |

लगभग उसी समय यानी कल सूर्योदय से एक घंटा पूर्व चार बजकर चौंतीस मिनट के लगभग सूर्यदेव बुध की मिथुन राशि से निकल कर अपने मित्र ग्रह चन्द्र की कर्क राशि में प्रस्थान कर जाएँगे, जहाँ मंगल और बुध पहले से ही विराजमान हैं | कर्क राशि में आने पर राहू-केतु के प्रभाव से सूर्य को मुक्ति भी प्राप्त होगी | मंगल सूर्य का मित्र ग्रह है | अपनी इस यात्रा के आरम्भ में सूर्य अभी पुनर्वसु नक्षत्र पर है, जहाँ से 20 जुलाई को पुष्य तथा 3 अगस्त को आश्लेषा नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए अन्त में 17 अगस्त को दोपहर एक बजकर दो मिनट के लगभग अपनी स्वयं की राशि सिंह में तथा मघा नक्षत्र पर प्रस्थान कर जाएंगे | कर्क राशि सूर्य की अपनी राशि सिंह से बारहवाँ भाव है और सूर्य की उच्च राशि मेष से चतुर्थ भाव है |

कर्क संक्रान्ति का महत्त्व मकर संक्रान्ति के समान ही होता है | कल से भगवान भास्कर दक्षिण दिशा की अपनी यात्रा आरम्भ कर देंगे और छह माह बाद मकर संक्रान्ति पर पुनः उत्तर दिशा की यात्रा आरम्भ कर देंगे | कर्क संक्रान्ति को श्रावण संक्रान्ति अथवा सावन संक्रान्ति भी कहा जाता है | कल सूर्य के कर्क में संक्रमण के समय श्रावण कृष्ण प्रतिपदा तिथि, बालव करण और विषकुम्भ योग होगा | कर्क संक्रान्ति से दिन की अवधि घटती जाती है और रात्रि की अवधि में वृद्धि होती जाती है | शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात माना गया है | इसी कारण वैदिक काल से ही उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता है | चातुर्मास अथवा चौमासा और श्राद्ध पक्ष भी इसी अवधि में आते हैं | संक्रान्ति काल में सूर्य, भगवान् विष्णु तथा शिव की पूजा अर्चना का विशेष महत्त्व माना जाता है |

तो जानने का प्रयास करते हैं कर्क राशि में सूर्य के संक्रमण के जनसाधारण पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

किन्तु ध्यान रहे, ये सभी परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |

मेष : आपका पंचमेश आपकी राशि से चतुर्थ भाव में प्रवेश करेगा | आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | परिवार में उत्सव, मंगल कार्य आदि की सम्भावना है | आपके कार्य में प्रगति की सम्भावना भी इस अवधि में की जा सकती है | ये गोचर आपके तथा आपकी सन्तान दोनों के ही लिए अनुकूल प्रतीत होता है | साथ ही आपकी सन्तान की ओर से भी आपको शुभ समाचार प्राप्त हो सकते हैं | किन्तु परिवार में – विशेष रूप से सन्तान अथवा पिता के साथ – किसी प्रकार का व्यर्थ का विवाद भी सम्भव है | इससे बचने के लिए अपने Temperament में सुधार की आवश्यकता है |

वृषभ : आपकी राशि से चतुर्थेश का गोचर आपके तृतीय भाव में हो रहा है | एक ओर कहाँ आत्मविश्वास में वृद्धि के संकेत हैं वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों को अपने कार्य अथवा स्वयं की योग्यता को लेकर सन्देह भी हो सकता है | भाई बहनों के साथ किसी प्रकार का विवाद भी सम्भव है, किन्तु पिता अथवा परिवार के किसी बुज़ुर्ग की मध्यस्थता से आप उस विवाद को सुलझा सकते हैं | धार्मिक गतिविधियों में वृद्धि की सम्भावना है |

मिथुन : आपकी राशि से तृतीयेश का गोचर दूसरे भाव में हो रहा है | भाई बहनों के साथ सम्बन्धों में प्रगाढ़ता के संकेत तो हैं किन्तु साथ ही किसी बात पर कोई विवाद भी उत्पन्न हो सकता है जिसके कारण आपको किसी प्रकार का मानसिक कष्ट भी हो सकता है | अतः किसी भी विवाद को बढ़ने न देने का प्रयास करना आपके हित में होगा | तनाव के कारण आपको माइग्रेन आदि की समस्या भी सम्भव है | साथ ही आपको अपनी वाणी और खान पान पर भी संयम रखने की आवश्यकता है |

कर्क : द्वितीयेश का गोचर लग्न में हो रहा है | मित्र ग्रह की राशि है किन्तु अशुभ प्रभाव में भी है | एक ओर जहाँ कार्य के सिलसिले में विदेश यात्राएँ करनी पड़ सकती हैं | इन यात्राओं में एक ओर जहाँ अर्थलाभ की आशा की जा सकती है वहीं दूसरी ओर अपने तथा जीवन साथी के स्वास्थ्य की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | पिता के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है | आपकी वाणी प्रभावशाली बनी हुई है जिसका लाभ आपको अपने कार्य में प्राप्त हो सकता है |

सिंह : आपके राश्यधिपति का आपके बारहवें भाव में गोचर कर रहा है | आपको कहीं बाहर से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स आपको प्राप्त हो सकते हैं जो लम्बे समय तक आपको व्यस्त रखते हुए धनलाभ कराने में सक्षम होंगे | साथ ही नौकरी में प्रमोशन, मान सम्मान में वृद्धि तथा व्यवसाय में उन्नति के भी संकेत हैं | परिवार, मित्रों, बड़े भाई, पिता तथा अधिकारियों का सहयोग भी प्राप्त रहेगा | किन्तु आपको अपनी वाणी और व्यवहार पर संयम रखने की आवश्यकता है | साथ ही स्वास्थ्य के प्रति भी सावधान रहने की आवश्यकता है |

कन्या : आपका द्वादशेश आपके लाभ स्थान में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से कार्य की दृष्टि से समय अत्यन्त उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है | यदि आपके कार्य का सम्बन्ध विदेशों से है तब तो आपके लिए विशेष रूप से उत्साहवर्द्धक समय प्रतीत होता है | साथ ही कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | किन्तु सन्तान अथवा पिता के साथ ब्यर्थ के विवाद से बचने की आवश्यकता है | सन्तान की ओर से कोई शुभ समाचार इस अवधि में प्राप्त हो सकता है |

तुला : आपका एकादशेश आपके कर्म स्थान में गोचर कर रहा है | कार्य की दृष्टि से भाग्यवर्द्धक समय प्रतीत होता है | नौकरी में पदोन्नति की सम्भावना है | अपने स्वयं के व्यवसाय में भी वृद्धि की सम्भावना है | मित्रों का सहयोग इस अवधि में उपलब्ध रहेगा | किन्तु परिवार के सदस्यों, पिता अथवा सहकर्मियों के साथ अपना व्यवहार यदि विनम्र नहीं रखा तो व्यर्थ का विवाद उत्पन्न हो सकता है |

वृश्चिक : आपकी राशि से दशमेश आपके भाग्य स्थान में गोचर कर रहा है | कार्य तथा आर्थिक दृष्टि से समय भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | कोई नया कार्य इस अवधि में करना चाहते हैं तो उसके लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं के भी योग हैं | कार्य में अप्रत्याशित लाभ की भी सम्भावना है | धार्मिक तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में रूचि में वृद्धि की भी सम्भावना है | किन्तु स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है |

धनु : आपका भाग्येश आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | कार्य में उन्नति के संकेत हैं | किन्तु अकारण ही मानसिक तनाव की समस्या भी हो सकती है | गुप्त शत्रुओं से सावधान रहने की आवश्यकता है | रहस्य विद्यायों जैसे ज्योतिष आदि तथा धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में वृद्धि भी इस अवधि में हो सकती है | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

मकर : आपका अष्टमेश सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | मिश्रित फलों की सम्भावना है | पार्टनरशिप में कोई कार्य है तो उसमें किसी ग़लतफ़हमी के कारण व्यवधान भी उत्पन्न हो सकता है | साथ ही किसी अप्रत्याशित स्रोत से कार्य में लाभ की भी सम्भावना है | अपना तथा अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है |

कुम्भ : आपके लिए यह गोचर उतना अनुकूल नहीं प्रतीत होता | दाम्पत्य जीवन अथवा प्रेम सम्बन्धों में तनाव के संकेत प्रतीत होते हैं | किसी कोर्ट केस के कारण भी तनाव हो सकता है | सन्तान अथवा छोटे भाई बहनों के साथ भी कोई विवाद बड़ा रूप ले सकता है | अच्छा यही रहेगा इस समय किसी बहस में न पड़कर शान्तिपूर्वक समय आनुकूल होने की प्रतीक्षा करें |

मीन : षष्ठेश का पंचम भाव में गोचर है | एक ओर आपके आत्मविश्वास में वृद्धि तथा नौकरी में पदोन्नति के संकेत हैं | वहीं दूसरी ओर सन्तान अथवा परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ अकारण ही बहस भी हो सकती है | यदि आप पॉलिटिक्स में हैं तो आपको कोई पद प्राप्त होने की सम्भावना है | यदि किसी प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा है तो वह आपके पक्ष में आ सकता है | परिवार में किसी बच्चे का जन्म भी हो सकता है |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/07/16/sun-transit-in-cancer-2019/

 

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नम:॥

ब्रह्मज्ञान के भण्डार, महर्षि वशिष्ठ के वंशज साक्षात भगवान विष्णु के स्वरूप महर्षि व्यास को हम नमन करते हैं और उन्हीं के साथ भगवान विष्णु को भी नमन करते हैं जो महर्षि व्यास का ही रूप हैं |

आज 25:49 (अर्द्धरात्र्योत्तर एक बजकर उन्चास मिनट) पर पूर्णिमा तिथि का आगमन होने के कारण कल यानी मंगलवार 16 जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाएगा – जिसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है | पंचम वेद “महाभारत” के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्मदिन इसी दिन मनाया जाता है | महर्षि वेदव्यास को ही आदि गुरु भी माना जाता है इसीलिए व्यास पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा एक दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं | भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, पुराणों और उपपुराणों की रचना की, ऋषियों के अनुभवों को सरल बना कर व्यवस्थित किया, पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना की तथा विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र का लेखन किया । इस सबसे प्रभावित होकर देवताओं ने महर्षि वेदव्यास को “गुरुदेव” की संज्ञा प्रदान की तथा उनका पूजन किया । तभी से व्यास पूर्णिमा को “गुरु पूर्णिमा” के रूप में मनाने की प्रथा चली आ रही है |

आषाढ़ मास की पूर्णिमा का महत्त्व बौद्ध समाज में भी गुरु पूर्णिमा के रूप में ही है | बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के पाँच सप्ताह बाद भगवान बुद्ध ने भी सारनाथ पहुँच कर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही अपने प्रथम पाँच शिष्यों को उपदेश दिया था | इसलिये बौद्ध धर्मावलम्बी भी इसी दिन गुरु पूजन का आयोजन करते हैं | साथ ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा होने के कारण इसे आषाढ़ी पूर्णिमा भी कहा जाता है |

चातुर्मास का आरम्भ भी इसी दिन से हो जाता है | जैन मतावलम्बियों के लिए चातुर्मास का विशेष महत्त्व है | सभी जानते हैं कि अहिंसा का पालन जैन धर्म का प्राण है | क्योंकि इन चार महीनों में बरसात होने के कारण अनेक ऐसे जीव जन्तु भी सक्रिय हो जाते हैं जो आँखों से दिखाई देते | ऐसे में मनुष्य के अधिक चलने फिरने के कारण इन जीवों की हत्या अहो सकती है | इसीलिए जैन साधू इन चार महीनों में एक ही स्थान पर निवास करते हैं और स्वाध्याय आदि करते हुए अपना समय व्यतीत करते हैं |

कल ही कर्क संक्रान्ति भी है – भगवान भास्कर का दक्षिण दिशा में प्रस्थान हेतु कर्क राशि में संक्रमण | और कल खण्डग्रास चन्द्रग्रहण भी है | जैसा कि हम अपने पूर्व के लेखों में भी लिखते आए हैं कि सूर्य ग्रहण और चन्द्रग्रहण बहुत ही आकर्षक खगोलीय घटनाएँ हैं अतः इनसे भयभीत हुए बिना इनके सौन्दर्य की सराहना करने की आवश्यकता है | किन्तु फिर भी जो लोग ग्रहण के वेध को मानते हैं उनके लिए कल रात्रि 25:32 (अर्द्ध रात्र्योत्तर एक बजकर बत्तीस मिनट) पर ग्रहण का स्पर्श काल होगा और 28:30 (अगले दिन सूर्योदय से लगभग एक घंटा पूर्व यानी चार बजकर तीस मिनट) पर मोक्ष काल होगा | लगभग ग्रहण से मुक्ति के ही समय चार बजकर चौंतीस मिनट के लगभग सूर्यदेव कर्क राशि में प्रस्थान कर जाएँगे |

यहाँ हम बात कर रहे हैं गुरु पूर्णिमा की…

मातृवत् लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका,

नमोऽस्तु गुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या ||

वास्तव में ऐसी श्रद्धा और प्रज्ञा से युत होती है गुरु की सत्ता – गुरु की प्रकृति – जो माता के सामान  ममत्व का भाव रखती है तो पिता के सामान उचित मार्गदर्शन भी करती है | अर्थात गुरु अपने ज्ञान रूपी अमृत जल से शिष्य के व्यक्तित्व की नींव को सींच कर उसे दृढ़ता प्रदान करता है और उसका रक्षण तथा विकास करता है | तो सर्वप्रथम तो समस्त गुरुजनों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ |

हमारे देश में पौराणिक काल से ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूजा के रूप में मनाया जाता है | इस अवसर पर न प्रथम गुरु जननी-जनक युगलकेवल गुरुओं का स्वागत सत्कार किया जाता था, बल्कि माता पिता तथा अन्य गुरुजनों की भी गुरु के समान ही पूजा अर्चना की जाती थी | वैसे भी व्यक्ति के प्रथम गुरु तो उसके माता पिता ही होते हैं |

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से प्रायः वर्षा आरम्भ हो जाती है और उस समय तो चार चार महीनों तक इन्द्रदेव धरती पर अमृत रस बरसाते रहते थे | आवागमन के साधन इतने थे नहीं, इसलिए उन चार महीनों तक अर्थात चातुर्मास की अवधि में सभी ऋषि मुनि एक ही स्थान पर निवास करते थे | और इस प्रकार इन चार महीनों तक प्रतिदिन गुरु के सान्निध्य का सुअवसर शिष्य को प्राप्त हो जाता था और उसकी शिक्षा निरवरोध चलती रहती थी | क्योंकि विद्या अधिकाँश में गुरुमुखी होती थी, अर्थात लिखा हुआ पढ़कर कण्ठस्थ करने का विधान उस युग में नहीं था, बल्कि गुरु के मुख से सुनकर विद्या को ग्रहण किया जाता था | गुरु के मुख से सुनकर उस विद्या का व्यावहारिक पक्ष भी विद्यार्थियों को समझ आता था और वह विद्या जीवनपर्यन्त शिष्य को न केवल स्मरण रहती थी, बल्कि उसके जीवन का अभिन्न अंग ही बन जाया करती थी | इस समय मौसम भी अनुकूल होता था – न अधिक गर्मी न सर्दी | तो जिस प्रकार सूर्य से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता तथा फसल उपजाने की सामर्थ्य प्राप्त होती है उसी प्रकार गुरुचरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञानार्जन की सामर्थ्य प्राप्त होती थी और उनके व्यक्तित्व की नींव दृढ़ होती थी जो उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती थी |

गुरु केवल शिष्य को उसका लक्ष्य बताकर उस तक पहुँचने का मार्ग ही नहीं प्रशस्त करता अपितु उसकी चेतना को योग और आध्यात्म गुरु स्वामी वेदभारती जीअपनी चेतना के साथ समाहित करके लक्ष्य प्राप्ति की यात्रा में उसका साथ भी देता है | गुरु और शिष्य की आत्माएँ जहाँ एक हो जाती हैं वहाँ फिर अज्ञान के अन्धकार के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जाता | और गुरु के द्वारा प्रदत्त यही ज्ञान कबीर के अनुसार गोविन्द यानी ईश्वर प्राप्ति यानी अपनी अन्तरात्मा के दर्शन का मार्ग है… इसलिए गुरु की सत्ता ईश्वर से भी महान है…

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय |

बलिहारी गुरु आपने जिन गोबिंद दियो बताए ||

तो, हम सभी समस्त गुरुजनों के चरणकमलों में सादर अभिवादन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें | जय गुरुदेव…..

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देवशयनी एकादशी

देवशयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी, विष्णु एकादशी, पद्मनाभा एकादशी

हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्त्व है | प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती है, और अधिमास हो जाने पर ये छब्बीस हो जाती हैं | इनमें से आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है | साथ ही आषाढ़ मास में होने के कारण इसे आषाढ़ी एकादशी भी कहते हैं | इसी दिन से पंढरपुर यात्रा संपन्न होती है और पंढरपुर में भगवान श्री कृष्ण के ही एक रूप विट्ठल महाराज के मंदिर में इस दिन विशेष पूजा अर्चना की जाती है | इस एकादशी को पद्मनाभा एकादशी भी कहा जाता है | तथा उसके लगभग चार माह बाद सूर्य के तुला राशि में आ जाने पर आने वाली कार्तिक शुक्ल एकादशी देव प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है | इस वर्ष शुक्रवार 12 जुलाई को 25:03 (अर्द्धरात्र्योत्तर यानी बारह जुलाई को एक बजकर तीन मिनट) के लगभग एकादशी तिथि (देवशयनी एकादशी) का आगमन होगा और 13 जुलाई को रात्रि बारह बजकर तीस मिनट के लगभग द्वादशी तिथि का आगमन हो जाएगा, अतः एकादशी का उपवास बारह तारीख को ही रखा जाएगा |

“आषाढ़ शुक्लपक्षे तु शयनी हरिवासर: |

दीपदानेन पलाशपत्रे भुक्त्याव्रतेन च

चातुर्मास्यं नयन्तीह ते नरा मम वल्लभा: ||” – पद्मपुराण उत्तरखण्ड / 54/24, 32

मान्यता है कि इन चार महीनों में – जिन्हें चातुर्मास कीं संज्ञा दी गई है – भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन हेतु प्रस्थान कर जाते हैं | भगवान विष्णु की इस निद्रा को योग निद्रा भी कहा जाता है | इस अवधि में यज्ञोपवीत, विवाह, गृह प्रवेश आदि संस्कार वर्जित होते हैं |

भारतीय संस्कृति में व्रतादि का विधान पूर्ण वैज्ञानिक आधार पर मौसम और प्रकृति को ध्यान में रखकर किया गया है | चातुर्मास अर्थात आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर श्रावण, भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीने – यानी आषाढ़ मास की देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक मास में देवोत्थान एकादशी तक के चार महीने वर्षा के माने जाते हैं | इस प्रकार इस वर्ष 13 जुलाई से लेकर 8 नवम्बर तक का समय चातुर्मास के अन्तर्गत रहेगा | भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए वर्षा के ये चार महीने कृषि के लिए बहुत उत्तम माने गए हैं | किसान विवाह आदि समस्त सामाजिक उत्तरदायित्वों से मुक्त रहकर इस अवधि में पूर्ण मनोयोग से कृषि कार्य कर सकता था | आवागमन के साधन भी उन दिनों इतने अच्छे नहीं थे | साथ ही चौमासे के कारण सूर्य चन्द्र से प्राप्त होने वाली ऊर्जा भी मन्द हो जाने से जीवों की पाचक अग्नि भी मन्द पड़ जाती है | साथ ही वर्षा के कारण जो स्वच्छ और ताज़ा हवा प्राप्त होती है वह समस्त प्रकृति को एक अनोखे आनंद से भर देती है | ऐसे सुहावने मौसम में भला किसका मन होगा जो सामाजिक उत्तरदायित्वों के विषय में सोच विचार करे | अस्तु, इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए जो व्यक्ति इन चार महीनों में जहाँ होता था वहीं आनंदपूर्वक निवास करते हुए अध्ययन अध्यापन करते हुए आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता था तथा खान पान पर नियन्त्रण रखता था ताकि पाचन तन्त्र उचित रूप से कार्य कर सके | और वर्षा ऋतु बीत जाते ही देव प्रबोधिनी एकादशी से समस्त कार्य पूर्ववत आरम्भ हो जाते थे |

सुप्तेत्वयिजगन्नाथ जगत्सुप्तंभवेदिदम् । विबुद्धेत्वयिबुध्येतजगत्सर्वचराचरम् ॥

हे जगन्नाथ ! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सो जाता है तथा आपके जागने पर समस्त चराचर पुनः जागृत हो जाता है तथा फिर से इसके समस्त कर्म पूर्ववत आरम्भ हो जाते हैं…

इसके अतिरिक्त चातुर्मास का प्रथम माह श्रावण भगवान् शंकर के लिए समर्पित होता है | दूसरा माह भाद्रपद पर्वों का महीना होता है – गणेश चतुर्थी और श्री कृष्ण जन्माष्टमी जैसे बड़े पर्व इसी मास में आते हैं | चातुर्मास का तीसरा महीना होता है आश्विन का महीना – जिसमें नवरात्र और दुर्गा पूजा की धूम रहती है | और अंतिम तथा चतुर्थ माह होता है प्रकाश के महान पर्व से प्रकाशित कार्तिक माह |

आज देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास का आरम्भ हो रहा है… देवशयनी एकादशी सभी के लिए शुभ हो और चातुर्मास में सभी अपने अपने कर्तव्य धर्म का सहर्ष पालन करें… यही शुभकामना अपने साथ ही सभी के लिए…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/07/11/aashaadhi-ekadashi/

 

 

नक्षत्र एक विश्लेषण

27 नक्षत्रों की नक्षत्र पुरुष के शरीर से उत्पत्ति और निवास

तथा उनके रंग, गुण, वर्ण और लिंग

भारतीय वैदिक ज्योतिषी विष्णु पुराण की उस मान्यता का अनुमोदन करते हैं जिसके अनुसार नक्षत्रों की उत्पत्ति नक्षत्र पुरुष अर्थात काल पुरुष से हुई है | नक्षत्र पुरुष को स्वयं भगवान् विष्णु का अवतार माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि क्योंकि सभी 27 नक्षत्र भगवान विष्णु के शरीर के किसी न किसी अंग से उत्पन्न हुए हैं इसलिए भगवान विष्णु ने नक्षत्रों को स्वयं ही अपने शरीर में निवास करने की आज्ञा भी दे दी थी | साथ ही प्रत्येक नक्षत्र का एक विशेष रंग होता है, एक विशेष गुण होता है, प्रत्येक नक्षत्र की एक जाति अथवा वर्ण होता है तथा प्रत्येक नक्षत्र पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक लिंगों में से किसी एक लिंग का भी होता है | जो निम्नवत है:

अश्विनी : इस नक्षत्र का रंग रक्त के समान लाल होता है | इसका निवास नक्षत्र पुरुष की सीधी जाँघ में होता है | गुण इसका तमस है | पुरुष प्रकृति का यह नक्षत्र वैश्य वर्ग के अन्तर्गत आता है |

भरणी : इसका रंग भी रक्त के समान लाल माना गया है तथा इसका निवास नक्षत्र पुरुष के सर में माना गया है | रजस गुणसम्पन्न यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का चाण्डाल वर्ग का नक्षत्र माना जाता है |

कृत्तिका : श्वेत वर्ण के इस नक्षत्र का भी गुण रजस ही होता है तथा इसका निवास नक्षत्र पुरुष की पीठ में माना गया है | ब्राह्मण वर्ग का यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का माना जाता है |

रोहिणी : इस नक्षत्र का निवास बायीं जँघा में माना गया है | वर्ण इसका भी श्वेत ही होता है | रजस गुण वाला यह नक्षत्र वैश्य वर्ग के अन्तर्गत माना जाता है तथा इसे स्त्री प्रकृति का माना जाता है |

मृगशिर : इसका निवास नक्षत्र पुरुष के नेत्रों में मन गया है तथा इसका रंग धुँधला सफ़ेद यानी Gray माना जाता है | तमस गुण वाला यह नक्षत्र नपुंसक प्रकृति का सेवक वर्ग के अन्तर्गत आता है |

आर्द्रा : इस नक्षत्र का निवास नक्षत्र पुरुष के बालों में माना जाता है | हरितवर्णी यह नक्षत्र भी तामस गुण का होता है तथा स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग के अन्तर्गत आता है |

पुनर्वसु : इसका निवास काल पुरुष की अँगुलियों में माना जाता है तथा इसका रंग सीसे यानी Lead के जैसा माना जाता है | सात्विक गुणसम्पन्न यह नक्षत्र वैश्य वर्ग का पुरुष प्रकृति का नक्षत्र माना जाता है |

पुष्य : इस नक्षत्र का निवास नक्षत्र पुरुष के मुख में माना जाता है | श्याम वर्ण का यह नक्षत्र तमस गुण से युक्त पुरुष प्रकृति का तथा क्षत्रिय वर्ग के अन्तर्गत आता है |

आश्लेषा : नक्षत्र पुरुष के नाखूनों में निवास करने वाले इस नक्षत्र का भी श्यामवर्ण ही माना जाता है | सात्विक गुणसम्पन्न स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग के अन्तर्गत आता है |

मघा : नक्षत्र पुरुष की नासिका में इसका निवास माना जाता है तथा इसका रंग दूधिया माना जाता है | तमस वृत्ति का यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का माना जाता है तथा यह वैश्य वर्ण के अन्तर्गत आता है |

पूर्वा फाल्गुनी : इसका निवास नक्षत्र पुरुष के निम्नांगों यानी Anus में माना जाता है | हल्के भूरे रंग का यह नक्षत्र रजस गुण से युक्त स्त्री प्रकृति का माना जाता है तथा ब्राह्मण वर्ग में आता है |

उत्तर फाल्गुनी : इसका निवास भी नक्षत्र पुरुष के निम्नांगों में ही माना जाता है | गहरा भूरा इसका रंग माना जाता है | रजस गुण वाला यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का क्षत्रिय वर्ग का नक्षत्र माना जाता है |

हस्त : नाम के अनुरूप ही इसका वास नक्षत्र पुरुष के दोनों हाथों में माना जाता है | हरितवर्णी यह नक्षत्र रजस गुण से युक्त पुरुष प्रकृति का वैश्य नक्षत्र माना जाता है |

चित्रा : नक्षत्र पुरुष के मस्तक में इसका वास माना जाता है | चमकीला नीला रंग इसका माना जाता है | तमस गुण वाला यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का होता है तथा सेवक वर्ग के अन्तर्गत माना जाता है |

स्वाति : इसका वास नक्षत्र पुरुष के दाँतों में माना जाता है तथा यह तमोगुण प्रधान चमकीले नीले रंग का नक्षत्र होता है | स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग में आता है |

विशाखा : सुनहरे वर्ण वाले इस नक्षत्र का वास नक्षत्र पुरुष की दोनों भुजाओं में होता है | सात्विक गुणसम्पन्न स्त्री प्रकृति यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग में आता है |

अनुराधा : नक्षत्र पुरुष के वक्ष में निवास करने वाले तमोगुणी इस नक्षत्र का लाली लिए हुए भूरा रंग होता है | पुरुष प्रकृति यह नक्षत्र वैश्य वर्ग में आता है |

ज्येष्ठा : दूधिया रंग वाले इस नक्षत्र का वास नक्षत्र पुरुष की गर्दन में माना गया है | सात्विक गुणसम्पन्न यह नक्षत्र स्त्री ओरकृति का माना जाता है तथा सेवक वर्ग के अन्तर्गत आता है |

मूल : भूरे-पीले रंग का यह नक्षत्र काल पुरुष के पैरों में निवास करता है | तमोगुणयुक्त यह नक्षत्र नपुंसक वृत्ति का माना जाता है तथा चाण्डाल वर्ग में आता है |

पूर्वाषाढ़ :काले रंग के इस नक्षत्र का निवास स्थान नक्षत्र पुरुष के उरुभाग को माना गया है | रजस गुण युक्त तथा स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र ब्राहमण वर्ग में आता है |

उत्तराषाढ़ : इसक अवर्ण भी काला होता है तथा इसका भी निवास स्थान नक्षत्र पुरुष के उरुभाग में माना जाता है | रजोगुण युक्त स्त्री प्रकृति यह नक्षत्र क्षत्रिय वर्ग में माना जाता है |

श्रवण : हलके नीले रंग के इस नक्षत्र का वास नाम के अनुरूप ही नक्षत्र पुरुष के दोनों कानों में माना गया है | रजोगुण प्रधान यह नक्षत्र पुरुष प्रकृति का है तथा चाण्डाल वर्ग में आता है |

धनिष्ठा : स्लेटी रंग के इस बक्षात्र का निवास स्थान काल पुरुष की कमर को माना जाता है | तमोगुण युक्त यह नक्षत्र स्त्री प्रकृति का है तथा सेवक वर्ग में आता है |

शतभिषज : नीर जैसा यह नक्षत्र नकला पुरुष के होठों में निवास करता है | यह तमोगुण से युक्त माना जाता है | नपुंसक वृत्ति का यह नक्षत्र चाण्डाल वर्ग में आता है |

पूर्वा भाद्रपद : इस नक्षत्र का वर्ण है स्लेटी तथा यह नक्षत्र पुरुष के वक्षस्थल में निवास करता है | सात्विकगुणसम्पन्न यह नक्षत्र पुरुष प्रकृति का ब्राह्मण वर्ग का नक्षत्र माना जाता है |

उत्तर भाद्रपद : इसका वर्ण बैंगनी माना गया है तथा इसका निवास स्थान कल पुरुष का वक्षस्थल माना जाता है | तमोगुण युक्त यह नक्षत्र पुरुष प्रकृति का क्षत्रिय वर्ग का नक्षत्र माना जाता है |

रेवती : इस नक्षत्र का रंग होता है भूरा तथा यह नक्षत्र पुरुष की कोख में निवास करता है | सात्विक गुण सम्पन्न स्त्री प्रकृति का यह नक्षत्र वैश्य वर्ग में आता है |

अन्त में पुनः यही कहेंगे कि किसी जातक के गुण स्वभाव आदि का ज्योतिषीय आधार पर निर्णय करते समय केवल इन्हीं तथ्यों के आधार पर निर्णय करेंगे तो अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है | इसके लिए आवश्यकता है किसी योग्य और अनुभवी Astrologer द्वारा जन्म कुण्डली का गहन अध्ययन कराया जाए |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/07/03/constellation-nakshatras-47/

शुक्र का मिथुन में गोचर

शुक्र का मिथुन में गोचर 

आज यानी 28 जून को 25:34 (अर्द्धरात्र्योत्तर एक बजकर चौंतीस मिनट) के लगभग समस्त सांसारिक सुख, समृद्धि, विवाह, परिवार सुख, कला, शिल्प, सौन्दर्य, बौद्धिकता, राजनीति तथा समाज में मान प्रतिष्ठा में वृद्धि आदि का कारक शुक्र अपनी स्वयं की राशि से निकल कर अपने मित्र ग्रह बुध की मिथुन राशि में प्रस्थान करेगा | इस प्रस्थान के समय आषाढ़ कृष्ण एकादशी तिथि, बालव करण और धृति योग होगा तथा शुक्र इस समय मृगशिरा नक्षत्र में होगा और सूर्य, शनि तथा राहू-केतु के प्रभाव में रहेगा | इनमें शनि और शुक्र एक दूसरे के लिए योगकारक ग्रह हैं तथा सूर्य के साथ इसकी शत्रुता है | मिथुन राशि में संचार करते हुए चार जुलाई को आर्द्रा नक्षत्र तथा पन्द्रह जुलाई को पुनर्वसु नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए अन्त में तेईस जुलाई को मध्यरात्रि बारह बजकर पचास मिनट के लगभग अपने शत्रु ग्रह चन्द्रमा की कर्क राशि में प्रविष्ट हो जाएगा | मिथुन राशि में संचार की इस अवधि में शुक्र नौ जुलाई को अस्त भी हो जाएगा | मिथुन राशि शुक्र की अपनी राशि वृषभ से दूसरा भाव तथा तुला से नवम भाव बनता है | अतः इन दोनों राशियों के लिए तो यह गोचर अनुकूल ही प्रतीत होता है | इन्हीं सब आधारों पर आइये जानने का प्रयास करते हैं कि प्रत्येक राशि के लिए शुक्र के मिथुन में गोचर के सम्भावित परिणाम क्या रह सकते हैं…

किन्तु ध्यान रहे, ये समस्त फल सामान्य हैं | व्यक्ति विशेष की कुण्डली का व्यापक अध्ययन करके ही किसी निश्चित परिणाम पर पहुँचा जा सकता है | अतः कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन कराने के लिए किसी Vedic Astrologer के पास ही जाना उचित रहेगा |

मेष : शुक्र आपका द्वितीयेश और सप्तमेश होकर आपके तीसरे भाव में गोचर कर रहा है जहाँ आपका पंचमेश पहले से विराजमान है | आपकी बुद्धि इस अवधि में तीव्र रहेगी तथा आपकी लेखन क्षमता में इस अवधि में निखार आने की सम्भावना है | आपकी वाणी इस समय प्रभावशाली रहेगी और आपके लेखन तथा आपकी वाणी का लाभ आपको अपने कार्य में अवश्य प्राप्त हो सकता है | अविवाहित हैं तो आप Romantically किसी के साथ Involve हो सकते हैं जो आपके लिए अनुकूल हो सकता है | भाई बहनों के साथ सम्बन्धों में किसी प्रकार के तनाव की सम्भावना है | धार्मिक अथवा आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि बढ़ सकती है |

वृषभ : आपका राश्यधिपति तथा षष्ठेश होकर शुक्र आपके दूसरे भाव में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से आपके लिए उत्साह में वृद्धि का समय प्रतीत होता है | आपकी वाणी का प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा अतः इस समय का लाभ उठाएँ | किन्तु साथ ही जो भी बोलेन सोच समझ कर ही बोलें | किसी की निन्दा अथवा बिना माँगे किसी को सलाह देना आपके लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है | परिवार में किसी माँगलिक कार्य के संपन्न होने की सम्भावना के साथ ही पारिवारिक क्लेश की सम्भावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता | अपनी माता जी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | साथ ही खान पान पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है | विशेष रूप से महिलाओं को अपनी Gynaecologist से Regular Check-up कराते रहना चाहिए |

मिथुन : आपका पंचमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपके तृतीयेश के साथ आपकी राशि में ही हो रहा है | आप स्वयं अथवा आपकी सन्तान कहीं बाहर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जा सकते हैं | छोटे भाई बहनों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है तथा उनका सहयोग भी आपको उपलब्ध रहेगा, किन्तु उनके साथ किसी भी विवाद से बचने की आवश्यकता है | सन्तान के साथ सम्बन्धों में मधुरता बनी रहने की सम्भावना है | आप अपने बनाव श्रृंगार की ओर पहले से अधिक ध्यान देना आरम्भ कर सकते हैं | सन्तान तथा जीवन साथी के स्वास्थ्य का विशेष रूप से ध्यान रखने की आवश्यकता है | आपको किसी प्रकार के तनाव के कारण माइग्रेन अथवा गर्मी या पित्त से सम्बन्धित कोई समस्या हो सकती है |

कर्क : आपका चतुर्थेश और एकादशेश होकर शुक्र का गोचर आपके बारहवें भाव में हो रहा है | यदि आपका कार्य कहीं विदेश से सम्बन्धित है तो किसी महिला मित्र के माध्यम से आपको नवीन प्रोजेक्ट्स मिलने तथा अर्थलाभ की सम्भावना है | आप अपना वर्तमान निवास बेचकर नया घर खरीदने की योजना भी बना सकते हैं | यदि आप कलाकार हैं तो आपको अपनी कला के प्रदर्शन के अवसर उपलब्ध होंगे जहाँ आपकी कला की प्रशंसा के साथ ही आपको आर्थिक लाभ तथा पुरूस्कार आदि भी प्राप्त होने की सम्भावना है | अपनी माता जी के स्वास्थ्य का विशेष रूप से ध्यान रखने की आवश्यकता है |

सिंह : आपका तृतीयेश और दशमेश होकर शुक्र का गोचर आपके लाभ स्थान में आपके राश्यधिपति के साथ ही हो रहा है | यदि आप दस्कार हैं, गीत-संगीत-नृत्य के कलाकार हैं अथवा किसी प्रकार की Alternative healing therapy से आपका सम्बन्ध है या आप मीडिया से सम्बन्ध रखते हैं तो आपके लिए यह गोचर अत्यन्त अनुकूल प्रतीत होता है | आपको अपनी कला के प्रदर्शन के अवसर उपलब्ध होंगे तथा आपके कार्य की प्रशंसा होगी | सौन्दर्य प्रसाधनों से सम्बन्धित कोई कार्य करते हैं अथवा ब्यूटी पार्लर का व्यवसाय है या Cosmetic Dentist हैं तो आपके लिए भी यह गोचर विशेष रूप से अनुकूल प्रतीत होता है | अपने कार्य में आपको सहकर्मियों तथा मित्रों का सहयोग प्राप्त होने की सम्भावना है |

कन्या : आपका द्वितीयेश और भाग्येश होकर शुक्र दशम भाव में गोचर कर रहा है | आपके लिए यह गोचर अत्यन्त भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आर्थिक रूप से स्थिति में दृढ़ता आने के साथ ही आपके लिए कार्य से सम्बन्धित लम्बी विदेश यात्राओं के योग भी प्रतीत होते हैं | आपको महिला मित्रों के माध्यम से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आप बहुत समय तक व्यस्त रह सकते हैं | आवश्यकता है अपनी अन्तर्मुखी प्रवृत्ति तथा आलस्य का त्याग करके Active हो जाने की | साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि में वृद्धि हो सकती है |

तुला : लग्नेश और अष्टमेश होकर शुक्र आपकी राशि से भाग्य स्थान में गोचर कर रहा है | अप्रत्याशित लाभ की सम्भावना इस अवधि में की जा सकती है | कार्य से सम्बन्धित यात्राओं में वृद्धि के संकेत प्रतीत होते है | किसी ऐसे स्थान से प्रॉपर्टी का लाभ भी हो सकता है जहाँ के विषय में आपने कल्पना भी नहीं की होगी | इसके अतिरिक्त विरोधियों को भी पहचान कर उनसे दूरी बनाकर चलने की आवश्यकता है | आपकी रूचि धार्मिक तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में बढ़ सकती है, किन्तु पोंगा पण्डितों को पहचान कर उनसे बचने की आवश्यकता है | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | गर्भवती महिलओं को विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है |

वृश्चिक : आपके लिए आपका सप्तमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपके अष्टम भाव में हो रहा है | अन्य ग्रहों की युति और दृष्टियाँ भी इस प्रकार की हैं कि आपके लिए यह गोचर अधिक अनुकूल नहीं प्रतीत होता | विशेष रूप से आपको अपने तथा अपने जीवां साथी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर अप्रत्याशित व्यय की भी सम्भावना है | अतः नियमित रूप से चेकअप कराने तथा खान पान के प्रति सजग रहने की स्स्वश्यकता है | इसके अतिरिक्त यात्राओं के योग हैं, किन्तु यदि इन यात्राओं को कुछ समय के लिए स्थगित कर सकते हैं तो आपके लिए उचित रहेगा | यदि कहीं पैसा Invest करना चाहते हैं तो उसके लिए समय अभी अनुकूल नहीं प्रतीत होता | Drive करते समय सावधान रहें |

धनु : आपका षष्ठेश और एकादशेश आपके सप्तम भाव में अपनी ही राशि में गोचर कर रहा है | यदि आपका कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसका परिणाम आपके पक्ष में आ सकता है तथा उसके माध्यम से भी आपको अर्थलाभ भी हो सकता है | यदि आप किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो उसमें सफलता प्राप्त होने की सम्भावना है | आपके जीवन साथी के लिए भी कार्य में लाभ की सम्भावना है | मित्रों, जीवन साथी तथा अधिकारी वर्ग का सहयोग आपको उपलब्ध रहेगा | किन्तु जीवन साथी का Temperament किसी कारणवश अनियन्त्रित हो सकता है | अतः किसी प्रकार के तनाव की सम्भावना से बचने के लिए आपके लिए अपने Temperament को नियन्त्रित रखना आवश्यक है |

मकर : आपका योगकारक आपके छठे भाव में गोचर कर रहा है | उत्साह में वृद्धि के संकेत हैं | एक ओर जहाँ आपके अपने कार्य के लिए यह गोचर अत्यधिक अनुकूल प्रतीत होता है वहीं दूसरी ओर आपकी सन्तान के लिए भी भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आप यदि वर्तमान कार्य छोड़कर कोई नया कार्य आरम्भ करना चाहते हैं तो उसके लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आप इस अवधि में अपने स्टाफ में नई नियुक्तियाँ भी कर सकते हैं | किन्तु सम्बन्धित व्यक्तियों के Documents की अच्छी तरह जाँच पड़ताल अवश्य कर लें | सहकर्मियों के साथ कुछ उपहार आदि का आदान प्रदान भी इस अवधि में सम्भव है |

कुम्भ : आपका भी योगकारक शुक्र आपके पंचम भाव में गोचर कर रहा है | आपके तथा आपकी सन्तान के लिए अत्यन्त भाग्यवर्द्धक समय प्रतीत होता है | किन्तु सन्तान के साथ व्यर्थ के विवाद से बचने की आवश्यकता होगी | परिवार में माँगलिक आयोजन जैसे किसी का विवाह आदि हो सकते हैं जिनके कारण परिवार में उत्सव का वातावरण बन सकता है | परिवार में किसी नए सदस्य का आगमन – जैसे बच्चे का जन्म आदि – भी हो सकता है | आप नया घर अथवा वाहन भी इस अवधि में खरीद सकते हैं अथवा वर्तमान निवास को ही Renovate करा सकते हैं | साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि बढ़ सकती है |

मीन : आपके लिए तृतीयेश और अष्टमेश होकर शुक्र का गोचर आपके चतुर्थ भाव में हो रहा है | आपके लिए पारिवारिक दृष्टि से यह गोचर बहुत अधिक अनुकूल नहीं प्रतीत होता | छोटे भाई बहनों के कारण किसी प्रकार का विवाद सम्भव है | किन्तु अपनी माता जी अथवा परिवार किसी बड़ी महिला सदस्य की मध्यस्थता से आप वह विवाद सुलझा सकते हैं | यदि नया घर अथवा वाहन खरीदना चाहते हैं तो उसके लिए समय अभी अनुकूल नहीं प्रतीत होता | साथ ही परिवार के लोगों का – विशेष रूप से अपनी माता जी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं – यह एक ऐसी खगोलीय घटना है जिसका प्रभाव मानव सहित समस्त प्रकृति पर पड़ता है | वास्तव में सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

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