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अध्यात्म और मनोविज्ञान

अध्यात्म और मनोविज्ञान

अक्सर लोग वैराग्य के अभ्यास द्वारा मन का निग्रह करके ईश्वर प्राप्ति की बात करते हैं | यह प्रक्रिया अध्यात्म की प्रक्रिया है | यहाँ हम बात कर रहे हैं अध्यात्म और मनोविज्ञान के परस्पर सम्बन्ध की | क्या सम्बन्ध है आपस में अध्यात्म और मनोविज्ञान का ? क्या अध्यात्म के द्वारा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा सम्भव है ? किन परिस्थितियों में मनुष्य भ्रमित हो सकता है ? तो, सबसे पहले विचार करते हैं कि मनुष्य भ्रमित कब होता है | किन परिस्थितियों में वह उचित निर्णय नहीं ले पाता |

भय व आतंक के वातावरण में मनुष्य लक्ष्य च्युत हो जाता है, उसे कर्तव्याकर्तव्य का भान नहीं रहता, और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में कई बार वह ग़लत निर्णय ले बैठता है | यह भय किसी भी बात का हो सकता है | अक्सर सुनने में आता है कि प्रेम करने वाले नवविवाहितों को “ऑनर किलिंग” के नाम पर मौत के घाट उतार दिया गया | कहीं किसी दादी ने अपनी लड़की के सर से भूत का साया उतारने के लिये अपनी ही पोती की बलि दे दी | कहीं किसी पुत्र ने सम्पत्ति विवाद के चलते अपने माता पिता को ही मौत की नींद सुला दिया | कहीं विवाहेतर सम्बन्धों के कारण पति अथवा पत्नी ने अपने जीवन साथी की ही जान ले ली | इनमें ये मनोविकार कहीं समाज के भय अथवा झूठे अहंकार की पुष्टि हेतु, तो कहीं धर्म के भय से, तो कहीं कुछ छिन जाने के भय से आ जाते हैं | कुछ लोगों का स्वभाव होता है केवल “मैं” और “मेरा” (जिसे Attention seeking syndrome भी कहा जाता है) के कारण दूसरों को परेशान करना और स्वयं भी उपहास का पात्र बन जाना |

किन्तु विचारणीय बात यह है कि क्या स्वस्थ मनोवृत्ति वाले लोग ऐसे कृत्य कर सकते हैं ? वास्तव में ऐसे लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग हैं | किसी न किसी प्रकार की कुंठा से ग्रस्त हैं ये लोग | कहीं कोई एथलीट खेल में प्रथम आने के लिये नशीली दवाओं का सेवन करता पकड़ा जाता है | यह प्रतिष्ठा का भय है | धर्म का भय, लोक मर्यादा का भय, जाति अथवा समाज का भय, मान प्रतिष्ठा का भय – किसी प्रकार का भी भय मनुष्य को विक्षिप्त कर सकता है |

और इन सबसे भी बढ़कर होता है मृत्यु का भय | हम अपने रास्ते यातायात के नियमों के अनुकूल गाड़ी चला रहे हैं कि अचानक ऐसा होता है कि किसी दूसरी कार का ड्राइवर बिना आगे पीछे दाएँ बाएँ देखे गाड़ी सड़क पर ले आता है | उस समय दो ही बातें हो सकती हैं – यदि हममें समझदारी है, साहस है, तो हम सफ़ाई से अपनी गाड़ी एक ओर को बचाकर निकाल ले जाने का प्रयास करेंगे | इतने पर भी यदि दुर्घटना घट जाती है तो उसमें हमारा कोई दोष नहीं होगा | किन्तु यदि हममें साहस का अभाव है और हम आशंकित अथवा भयभीत हो जाते हैं तो हमारी गाड़ी किसी दूसरी गाड़ी से अवश्य ही टकराएगी और हम अपने साथ साथ दूसरी गाड़ी के ड्राइवर को भी दुर्घटना का शिकार बना देंगे |

कभी कभी कुछ मन्दबुद्धि लोग सत्ता, धन या पद के दम्भ में भी लक्ष्यच्युत होकर उल्टे सीधे काम कर बैठते हैं | सत्ता खोने का भी भय मनुष्य को आतंकित करता रहता है | आतंकित अथवा भयग्रस्त होकर किसी भी प्रकार का अनुचित कार्य कर बैठना भ्रमित होना है | कहने का तात्पर्य है कि मोहवश, क्रोधवश, लोभवश अथवा अहंकारवश मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है, भ्रमित हो जाता है | अतः इस भ्रम से मुक्ति पाने के लिये मन से मृत्यु का तथा अन्य किसी भी प्रकार का भय दूर करके, व्यर्थ के मोह, लोभ, क्रोध अथवा अहंकार से मुक्त होकर लक्ष्यप्राप्ति की ओर अग्रसर होना आवश्यक है | ज्ञानी पुरुष के साथ यह स्थिति नहीं आती, क्योंकि उसे पूर्ण सत्य अर्थात जीवन के अन्तिम सत्य का ज्ञान हो जाता है | जिसे यह ज्ञान नहीं होता उसे ही दिशा निर्देश की आवश्यकता होती है |

यही कार्य श्रीकृष्ण ने किया | अर्जुन ने जब दोनों सेनाओं में अपने ही प्रियजनों को आमने सामने खड़े देखा तो उनकी मृत्यु से भयाक्रान्त हो श्री कृष्ण की शरण पहुँचे “शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” तब भगवान ने सर्वप्रथम उनके मन से मृत्यु का भय दूर किया | मृत्यु को अवश्यम्भावी, देह को असत् तथा आत्मा को सत् बताते हुए अर्जुन को लोकमर्यादानुसार धर्ममार्ग पर चलते हुए लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग बताया | उनका लक्ष्य उन्हें बताया | थोड़ी फटकार देते हुए उनसे कहा कि जब तू अशोच्य के विषय में शोक करता है तो फिर बुद्धिमानों की भाँति बातें करने का नाटक क्यों करता है ? तू तो मुझे बिल्कुल उन्मत्त जान पड़ता है जो मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्पर भावों को एक साथ दिखा रहा है | जबकि वास्तवकिता तो यह है कि आत्मज्ञानी न तो मृत वस्तुओं के विषय में शोक करता है और न ही जीवित वस्तुओं के विषय में कुछ सोचता है | जिस प्रकार शरीर की कौमार, यौवन और जरा ये तीन अवस्थाएँ होती हैं उसी प्रकार एक चौथी अवस्था भी होती है – देहान्तर प्राप्ति की अवस्था | जिस प्रकार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करने पर आत्मा न तो मरती है और न ही पुनः उत्पन्न होती है, उसी प्रकार एक देह की समाप्ति पर आत्मा नष्ट नहीं हो जाती और न ही दूसरी देह में प्रवेश करने पर उसकी पुनरुत्पत्ति ही होती है – क्योंकि जिसका अन्त ही नहीं हुआ उसकी पुनरुत्पत्ति कैसे होगी… वह तो अजर अमर शाश्वत सत्य है…

“अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत !” 2/13 स्वप्न व माया के शरीर की भाँति ये सब शरीर अन्तवन्त हैं | जबकि आत्मा नित्य और निर्विकार है | अतः आत्मा को नित्य और निर्विकार मानकर तू युद्ध कर |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/16/spirituality-and-psychology/

सूर्य का वृश्चिक में गोचर

कल मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी यानी शनिवार को 24:51 (अर्द्धरात्र्योत्तर बारह बजकर इक्यावन मिनट) के लगभग भगवान भास्कर विशाखा नक्षत्र पर रहते हुए ही कौलव करण और साध्य योग में तुला राशि से निकल कर अपने मित्र ग्रह मंगल की वृश्चिक राशि में प्रस्थान करेंगे | अपनी इस यात्रा के दौरान आत्मा के कारक सूर्यदेव 20 नवम्बर से अनुराधा तथा 3 दिसम्बर से ज्येष्ठा नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए अन्त में 16 दिसम्बर को दिन में 3:28 के लगभग गुरुदेव की राशि धनु और मूल नक्षत्र में प्रविष्ट हो जाएँगे | वृश्चिक राशि से सूर्य दशमेश है तथा सूर्य की अपनी राशि सिंह से वृश्चिक राशि पञ्चम भाव बनती है | इस प्रकार इन दोनों राशियों के लिए तो यह गोचर अत्यन्त भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | 24 नवम्बर को मंगल भी वृश्चिक में प्रस्थान कर जाएगा |

इस बीच 19 को काल भैरव जयन्ती, 22-23 को उत्पन्ना एकादशी, 24 नवम्बर और नौ दिसम्बर को प्रदोष व्रत और ग्यारह दिसम्बर को दत्तात्रेय जयन्ती है | ये सभी पर्व आपके लिए मंगलमय हों…

अब संक्षेप में जानने का प्रयास करते हैं कि वृश्चिक राशि में सूर्य के संक्रमण के जनसाधारण पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं… किन्तु ध्यान रहे, ये सभी परिणाम सामान्य यानी Common हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है…

मेष : आपकी राशि से पंचमेश आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | अकारण ही आपके स्वभाव में चिडचिडापन आ सकता है जो सम्बन्धों के लिए उचित नहीं होगा, अतः सावधान रहने की आवश्यकता है | किसी भी स्थिति में आपके माता पिता तथा अधिकारीवर्ग का सहयोग और समर्थन दोनों आपको प्राप्त रहेंगे | अचानक ही कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स आपको इस अवधि में प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आपकी व्यस्तताएँ भी बढ़ सकती हैं और आर्थिक स्थिति भी और अधिक दृढ़ हो सकती है | अविवाहित हैं तो इस अवधि में विवाह के विषय में ही विचार कर सकते हैं | विवाहित हैं तो दाम्पत्य जीवन में माधुर्य बना रहने के लिए अपने स्वभाव को नियन्त्रण में रखना होगा | आपकी सन्तान तथा आपके पिता के लिए भी यह गोचर अनुकूल फल देने वाला प्रतीत होता है |

वृषभ : आपकी राशि से चतुर्थेश सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | यदि आपने अपने Temperament पर नियन्त्रण रखा तो आपके लिए यह गोचर अनुकूल फल देने वाला प्रतीत होता है | परिवार में आनन्द का वातावरण बना रह सकता है | परिवारजनों तथा मित्रों का का सहयोग आपको उपलब्ध रहेगा | आप सपरिवार कहीं भ्रमण के लिए जाने का कार्यक्रम भी इस अवाही में बना सकते हैं | अविवाहित हैं तो जीवन साथी की आपकी तलाश भी इस अवधि में पूर्ण हो सकती है | कोई प्रेम सम्बन्ध भी विवाह में परिणत हो सकता है |

मिथुन : आपकी राशि से तृतीयेश का गोचर आपके छठे भाव में हो रहा है | सम्पत्ति विषयक कोई विवाद आपके लिए समस्या उत्पन्न कर सकता है | छोटे भाई बहनों के साथ कोई विवाद गम्भीर रूप ले सकता है | किन्तु अपने पिता की मध्यस्थता से आप उस विवाद को सुलझाने में समर्थ हो सकते हैं | कार्यस्थल में सहकर्मियों का सहयोग आपको प्राप्त रहेगा | यदि आप गर्भवती महिला हैं तो आपके लिए विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है | साथ ही यात्राओं में भी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है | सूर्य की उपासना आपके लिए उचित रहेगी |

कर्क : आपकी राशि से द्वितीयेश का गोचर आपके पञ्चम भाव में हो रहा है | आपके लिए यह गोचर अत्यन्त भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आपके उत्साह में वृद्धि की सम्भावना है | जिसके कारण आप अपने कार्य समय पर पूर्ण करने में सक्षम हो सकते हैं | आप अथवा आपकी सन्तान अपने कार्य से सम्बन्धित कोई Short Term Advance Course भी इस अवधि में कर सकते हैं | आय में वृद्धि के भी संकेत हैं | नौकरी में हैं तो पदोन्नति भी सम्भव है | पॉलिटिक्स में हैं तो आपको किसी पद की प्राप्ति हो सकती है | आपके भाई बहनों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है तथा उनका सहयोग भी आपको उपलब्ध रहेगा |

सिंह : आपके लिए आपके राश्यधिपति का अपनी राशि से चतुर्थ भाव में हो रहा है | कार्य की दृष्टि से, आर्थिक दृष्टि से तथा पारिवारिक स्तर पर यह गोचर आपके लिए अनुकूल प्रतीत होता है | आपके माता पिता तथा सहकर्मियों का सहयोग भी आपको प्राप्त रहेगा | आपका यदि स्वयं का व्यवसाय है अथवा मीडिया या आई टी से आपका कोई सम्बन्ध है अथवा किसी प्रकार की Alternative Healing से सम्बन्धित कोई कार्य करते हैं तो आपके लिए उन्नति का समय प्रतीत होता है | आप इस अवधि में नया घर अथवा वाहन खरीदने की योजना भी बना सकते हैं | किन्तु अपनी माता के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

कन्या : आपके लिए आपके द्वादशेश का गोचर आपकी राशि से तीसरे भाव में गोचर हो रहा है | आपका कार्य विदेश से सम्बन्धित है तो आपकी आय में वृद्धि की सम्भावना की जा सकती है | किसी पुराने मित्र से भी इस अवधि में भेंट हो सकती है और उसके माध्यम से भी आपके कार्य में उन्नति की सम्भावना की जा सकती है | कार्य से सम्बन्धित यात्रा करनी पड़ सकती है | यह भी सम्भव है कि आप सपरिवार कहीं भ्रमण के लिए चले जाएँ | छोटे भाई बहनों के साथ सम्बन्धों में किसी प्रकार के तनाव का अनुभव कर सकते हैं | छोटे भाई बहनों के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

तुला : आपके एकादशेश का गोचर आपके दूसरे भाव में हो रहा है | आर्थिक दृष्टि से तथा कार्य की दृष्टि से आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | आपको अपने कार्य के सिलसिले में किसी मित्र के माध्यम से सहायता प्राप्त हो सकती है | आय में वृद्धि के संकेत हैं | बड़े भाई तथा पिता का सहयोग आपको अपने कार्य में प्राप्त हो सकता है | नौकरी में हैं तो अधिकारियों का सहयोग भी आपको प्राप्त रह सकता है | साथ ही किसी सम्मान प्राप्ति की सम्भावना भी है | स्वस्थ रहने तथा सम्बन्धों में मधुरता बनाए रखने के लिए खान पान पर तथा वाणी पर नियन्त्रण रखने की आवश्यकता है |

वृश्चिक : आपकी राशि से दशमेश का गोचर आपकी लग्न में ही हो रहा है | कार्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स भी आपको इस अवधि में प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आप दीर्घ समय तक व्यस्त रह सकते हैं | आपकी सन्तान के लिए भी यह समय भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आपकी वाणी इस समय प्रभावशाली बनी हुई है, उसका प्रभाव दूसरों पर अवश्य पड़ेगा | किन्तु प्रेम सम्बन्धों के लिए यह गोचर अनुकूल नहीं प्रतीत होता है | प्रेम सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न हो सकता है अथवा प्रेम सम्बन्ध टूट भी सकता है | अपना व्यवहार सन्तुलित नहीं रखा तो जीवन साथी के साथ भी सम्बन्धों में दरार उत्पन्न हो सकती है |

धनु : आपकी राशि के लिए आपका भाग्येश आपके बारहवें भाव में गोचर कर रहा है | कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं में वृद्धि की सम्भावना है | इन यात्राओं के दौरान कुछ नवीन सम्पर्क भी स्थापित हो सकते हैं जिनके कारण आपको अपने कार्य में लाभ प्राप्त हो सकता है | आप अपना निवास बदल सकते हैं | नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ स्थानान्तरण भी सम्भव है | धार्मिक स्थलों की यात्रा के लिए जा सकते हैं | परिवार में आनन्द का वातावरण बना रह सकता है | किन्तु ड्राइविंग करते समय सावधान रहने की आवश्यकता है | साथ ही स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है |

मकर : आपकी राशि से अष्टमेश का गोचर आपके एकादश भाव में हो रहा है | एकादश भाव में गोचर कर रहा है | कार्य में अकस्मात् किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न होने की सम्भावना है | किसी मित्र अथवा बड़े भाई के साथ सम्बन्धों में कुछ तनाव भी उत्पन्न हो सकता है | गुप्त शत्रुओं की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | किन्तु यदि समझदारी से काम लिया तो कुछ नया कार्य आरम्भ करके उसे आगे भी बढ़ा सकते हैं | स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है |

कुम्भ : आपके सप्तमेश का गोचर आपके दशम भाव में हो रहा है | पार्टनरशिप में जिन लोगों का कार्य है उनके लिए यह गोचर भाग्यवर्धक प्रतीत होता है | साथ ही पॉलिटिक्स से जो लोग सम्बन्ध रखते हैं उन लोगों के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | उन्हें किसी पद की प्राप्ति भी हो सकती है | परिवार में किसी बच्चे के जन्म की भी सम्भावना इस अवधि में है | साथ ही परिवार में कुछ तनाव की भी स्थिति उत्पन्न हो सकती है | माता पिता के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

मीन : आपका षष्ठेश होकर सूर्य का गोचर आपके नवम भाव में हो रहा है | आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसमें अनुकूल दिशा में प्रगति की सम्भावना है | किसी पुराने रोग से भी मुक्ति इस अवधि में सम्भव है – अथवा ऐसा भी सम्भव है कि किसी रोग की पहचान होकर उसके उचित दिशा में इलाज़ का मार्ग प्रशस्त हो जाए | यात्राओं में वृद्धि की सम्भावना है | किन्तु ये यात्राएँ सम्भव है आपके लिए बहुत अधिक सुगम्य न हों |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

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मंगल का तुला में गोचर

कल कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को दिन में दो बजकर चौबीस मिनट के लगभग मंगल चित्रा नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए तैतिल करण और सिद्ध योग में अपने शत्रु ग्रह बुध की राशि कन्या से निकल कर शुक्र की तुला राशि में प्रस्थान कर चुका है | यहाँ कुछ दिन वहाँ बुध और सूर्य का साथ भी रहेगा | तुला राशि में भ्रमण करते हुए मंगल बीस नवम्बर को स्वाति तथा दस दिसम्बर को विशाखा नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए अन्त में पच्चीस दिसम्बर को रात्रि 9:29 के लगभग अपनी स्वयं की वृश्चिक राशि में प्रस्थान कर जाएगा | तुला राशि मंगल की अपनी मेष राशि के लिए सप्तम भाव और वृश्चिक के लिए बारहवाँ भाव बनती है, तथा तुला राशि के लिए मंगल द्वितीयेश और सप्तमेश बनता है | तुला राशि में संचार करते हुए मंगल की दृष्टियाँ मकर, मेष तथा वृषभ राशियों पर रहेंगी | इन्हीं सब तथ्यों के आधार पर जानने का प्रयास करते हैं मंगल के तुला राशि में गोचर के विभिन्न राशियों के जातकों पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

किन्तु ध्यान रहे, किसी एक ही ग्रह के गोचर के आधार पर स्पष्ट फलादेश नहीं किया जा सकता | उसके लिए योग्य Astrologer द्वारा व्यक्ति की कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन आवश्यक है |

मेष : आपके राश्यधिपति और अष्टमेश का गोचर आपके सप्तम भाव में हो रहा है, जहाँ से आपके कार्य स्थान, लग्न तथा धन भाव पर मंगल की दृष्टियाँ हैं | आपके लिए तथा आपके जीवन साथी के लिए कार्य की दृष्टि से तथा आर्थिक दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | पार्टनरशिप में यदि कोई कार्य है तो उसमें किसी प्रकार का व्यवधान उपस्थित हो सकता है अतः इस ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है | किन्तु आप अपने व्यवहार तथा प्रयासों से सभी अवरोधों को दूर करने में समर्थ भी हो सकते हैं | आपको अपने तथा अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता होगी | यदि अविवाहित हैं तो जीवन साथी की खोज भी इस अवधि में पूर्ण हो सकती है | किन्तु साथ ही यदि अपनी वाणी पर नियन्त्रण नहीं रखा तो दाम्पत्य जीवन तथा प्रेम सम्बन्धों में तनाव भी उत्पन्न हो सकता है |

वृषभ : आपका सप्तमेश और द्वादशेश होकर मंगल का गोचर आपके छठे भाव में हो रहा है, जहाँ से आपके नवम भाव पर, बारहवें भाव पर तथा आपकी लग्न पर उसकी दृष्टियाँ हैं | किसी आवश्यक कार्य के लिए आपको विदेश यात्राएँ करनी पड़ सकती हैं | साथ ही इन यात्राओं में स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है | किन्तु आपके उत्साह में तथा निर्णायक क्षमता में वृद्धि के कारण आपके कार्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | कोई नवीन कार्य आपको प्राप्त हो सकता है, किन्तु सोच समझ कर ही आगे बढें | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसका परिणाम आपके पक्ष में आ सकता है | प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे लोगों के लिए तथा स्पोर्ट्स से जुड़े लोगों के लिए यह गोचर अनुकूल परिणाम देने वाला प्रतीत होता है |

मिथुन : षष्ठेश और एकादशेश होकर मंगल का गोचर आपके पंचम भाव में हो रहा है जहाँ से आपके अष्टम, एकादश और द्वादश भावों पर उसकी दृष्टियाँ हैं | आपके लिए उत्साह में वृद्धि के संकेत प्रतीत होते हैं | नौकरी में पदोन्नति की सम्भावना की जा सकती है | किसी अप्रत्याशित स्थान से प्रॉपर्टी अथवा अर्थलाभ की सम्भावना भी की जा सकती है | मित्रों का सहयोग प्राप्त रहेगा | आप इस अवधि में अपने कार्य से सम्बन्धित Advanve course के लिए भी प्रयास कर सकते हैं | आपकी सन्तान के लिए भी ये गोचर लाभदायक प्रतीत होता है | यदि आपकी सन्तान विवाह योग्य है तो उसके विवाह की भी सम्भावना इस अवधि में की जा सकती है | अविवाहित हैं तो इस अवधि में जीवन साथी की खोज भी पूर्ण हो सकती है | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

कर्क : आपके लिए पंचमेश और दशमेश होकर योगकारक बन जाता है तथा इसका गोचर आपके चतुर्थ भाव में हो रहा है | सप्तम, दशम तथा एकादश भावों पर इसकी दृष्टियाँ हैं | योगकारक होते हुए भी आपके लिए यह गोचर मिश्रित फल देने वाला प्रतीत होता है | कार्य में प्रगति तथा आर्थिक स्थिति में दृढ़ता के संकेत हैं | नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ ही किसी ऐसे स्थान पर आपका ट्रांसफर भी हो सकता है जहाँ आप पहले से जाना चाहते थे | यदि आपने अपने व्यवहार को नियन्त्रित नहीं रखा तो पारिवारिक स्तर पर वातावरण तनावपूर्ण रह सकता है अतः इस ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है | सहकर्मियों से तथा पार्टनर के साथ किसी प्रकार की बहस आपके हित में नहीं रहेगी | अविवाहित हैं तो इस अवधि में आपका विवाह सम्बन्ध भी कहीं निश्चित हो सकता है |

सिंह : आपका चतुर्थेश और नवमेश होकर आपका योगकारक बनता हुआ मंगल का गोचर आपके तृतीय भाव में हो रहा है | जहाँ से आपके छठे भाव, नवम भाव और कर्मस्थान पर इसकी दृष्टियाँ हैं | यह गोचर उत्साहवर्द्धक तथा कार्य की दृष्टि से और आर्थिक दृष्टि से भाग्यवर्द्धक प्रतीत होता है | आपका स्वयं का व्यवसाय तो उसमें लाभ की सम्भावना है | नौकरी में हैं तो अचानक ही पदोन्नति के साथ अर्थलाभ की भी सम्भावना है | किन्तु साथ ही आपके छोटे भाई बहनों के साथ अथवा कार्यस्थल पर विरोध के स्वर भी मुखर हो सकते हैं | धार्मिक गतिविधियों में रुचि में वृद्धि की भी सम्भावना | आप सपरिवार किसी तीर्थस्थान की यात्रा के लिए भी जा सकते हैं | पॉलिटिक्स में जो लोग हैं उनके लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता है |

कन्या : आपका तृतीयेश और अष्टमेश होकर मंगल का गोचर आपके द्वितीय भाव में हो रहा है, जहाँ से आपके पञ्चम, अष्टम और नवम भावों पर मंगल की दृष्टियाँ रहेंगी | आपके लिए अचानक ही नौकरी में पदोन्नति तथा मान सम्मान में वृद्धि के संकेत प्रतीत होते हैं | अपना स्वयं का व्यवसाय है तो उसमें उन्नति तथा आर्थिक लाभ की सम्भावना भी की जा सकती है | किन्तु साथ ही गुप्त विरोधियों की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | सम्बन्धों में मधुरता बनाए रखने के लिए वाणी पर तथा स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने के लिए खान पान पर ध्यान रखने की आवश्यकता है | हाँ आपकी प्रभावशाली वाणी का लाभ आपको अपने कार्य में अवश्य प्राप्त हो सकता है | किसी वसीयत के माध्यम से आपको लाभ की सम्भावना है | आपकी सन्तान के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | धार्मिक तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में वृद्धि की सम्भावना की जा सकती है |

तुला : आपका द्वितीयेश और सप्तमेश होकर मंगल का गोचर आपकी लग्न में ही हो रहा है और आपके चतुर्थ, सप्तम और अष्टम भावों को देख रहा है | परिवार में किसी नवीन सदस्य के आगमन की सम्भावना है अथवा किसी बच्चे का जन्म भी इस अवधि में हो सकता है | आप कोई नया घर बेचकर उसमें शिफ्ट कर सकते हैं | प्रॉपर्टी के व्यवसाय से सम्बद्ध लोगों के लिए, डॉक्टर्स तथा मीडिया से सम्बद्ध लोगों के लिए और पॉलिटिक्स के क्षेत्र से सम्बद्ध लोगों के लिए यह गोचर विशेष रूप से अनुकूल प्रतीत होता है | विवाह के लिए भी समय अनुकूल प्रतीत होता है | विवाहित हैं तो दाम्पत्य जीवन में प्रगाढ़ता के संकेत प्रतीत होते हैं | आप सपत्नीक कहीं घूमने जाने का कार्यक्रम भी बना सकते हैं | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | स्वभाव में चिडचिडापन आ सकता है अतः योग ध्यान का अभ्यास आपके लिए आवश्यक है |

वृश्चिक : आपका लग्नेश और षष्ठेश होकर मंगल का गोचर आपके बारहवें भाव में हो रहा है जहाँ से आपके तीसरे, छठे तथा सातवें भावों पर मंगल की दृष्टि है | आपके लिए यह गोचर अधिक अनुकूल नहीं प्रतीत होता | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की विशेष रूप से आवश्यकता है | इस अवधि में आप सपरिवार कहीं घूमने जाने का कार्यक्रम भी बना सकते हैं | यात्राओं के दौरान किसी प्रकार की दुर्घटना अथवा चोरी आदि के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है | आपके छोटे भाई बहनों के लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है, किन्तु उनके साथ आपके सम्बन्धों में कुछ तनाव भी उत्पन्न हो सकता है | जीवन साथी तथा सन्तान के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की विशेष रूप से आवश्यकता है |

धनु : आपकी राशि के लिए पंचमेश तथा द्वादशेश होकर मंगल का गोचर आपके लाभ स्थान में हो रहा है तथा वहाँ से दूसरे, पाँचवें और छठे भावों पर उसकी दृष्टियाँ हैं | यह गोचर आपके स्वयं के लिए तथा आपकी सन्तान के लिए अनुकूल प्रतीत होता है तथा उसकी ओर से कोई शुभ समाचार इस अवधि में प्राप्त हो सकता है | किन्तु सन्तान के साथ बहस सम्बन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है | आर्थिक स्थिति में दृढ़ता की सम्भावना की जा सकती है | किसी घनिष्ठ मित्र के माध्यम से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त हो सकते हैं | किन्तु ऐसे मित्रों तथा सम्बन्धियों को पहचान कर उनसे दूरी बनाने की आवश्यकता होगी जो आपसे ईर्ष्या रखते हैं | नौकरी की खोज में हैं तो उसमें भी सफलता प्राप्त हो सकती है | विद्यार्थियों के लिए यह समय अत्यन्त अनुकूल प्रतीत होता है | स्वास्थ्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | किसी पुरानी बीमारी से मुक्ति भी इस अवधि में सम्भव है |

मकर : आपके चतुर्थेश और एकादशेश का गोचर आपके दशम भाव में हो रहा है तथा वहाँ से आपकी लग्न को और चतुर्थ तथा पञ्चम भावों को देख रहा है | आपके लिए उत्साह में वृद्धि के साथ ही कार्य में उन्नति के संकेत भी हैं | नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ ही आय में वृद्धि के भी संकेत हैं | किसी पुरूस्कार आदि की प्राप्ति की सम्भावना भी इस अवधि में की जा सकती है | अधिकारियों तथा सहकर्मियों का सहयोग आपको उपलब्ध रहेगा | अपना स्वयं का व्यवसाय है तो उसमें भी आप वृद्धि कर सकते हैं अथवा कोई नई ब्रांच खोल सकते हैं | आपकी सन्तान की ओर से कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है | आप स्वयं भी उच्च शिक्षा के लिए प्रयास कर सकते हैं | माता जी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की विशेष रूप से आवश्यकता है | परिवार में कार्यस्थल पर किसी भी बहस से बचने का प्रयास आवश्यक है |

कुम्भ : आपके लिए आपके तृतीयेश और दशमेश का गोचर आपके भाग्य स्थान में हो रहा है | जहाँ से आपके बारहवें, तीसरे और चौथे भावों पर उसकी दृष्टियाँ हैं | आपके लिए यह गोचर मिश्रित फल देने वाला कहा जा सकता है | यदि आपका कार्य विदेश से सम्बन्ध रखता है तो आपके लिए विदेश यात्राओं में वृद्धि के साथ ही कार्य में प्रगति के भी संकेत प्रतीत होते हैं | किन्तु यात्राओं में तथा पारिवारिक समस्याओं पर धन व्यय होने के साथ ही परिवार में तनावपूर्ण स्थिति के भी संकेत प्रतीत होते हैं | विशेष रूप से छोटे भाई बहनों तथा माता जी के साथ सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न हो सकता है | ऐसी स्थिति में अपने व्यवहार की शान्ति बनाए रखना ही सर्वोत्तम उपाय है | माता जी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की विशेष रूप से आवश्यकता है | घर को Renovate कराने में पैसा खर्च हो सकता है | परिवार में किसी नए सदस्य का आगमन भी सम्भव है | आध्यात्मिक तथा धार्मिक गतिविधियों में वृद्धि की भी सम्भावना है |

मीन : आपके लिए आपका द्वितीयेश और भाग्येश होकर मंगल का गोचर आपकी राशि से अष्टम भाव में हो रहा है | जहाँ से आपके लाभ स्थान, द्वितीय भाव तथा तीसरे भाव पर मंगल की दृष्टियाँ हैं | आपको अचानक ही किसी ऐसे स्रोत से आर्थिक लाभ की सम्भावना है जहाँ की आपने कल्पना भी नहीं की होगी | किसी वसीयत के माध्यम से आपको प्रॉपर्टी का लाभ भी हो सकता है | आपके छोटे भाई बहनों के लिए भी लाभ की सम्भावना इस अवधि में की जा सकती है | सम्भव है आपको किसी कार्य में आरम्भ में व्यवधान का भी अनुभव हो | किन्तु वह व्यवधान अधिक समय नहीं रहेगा और आपका कार्य पुनः आगे बढ़ सकता है | आपकी वाणी इस अवधि में अत्यन्त प्रभावपूर्ण रहेगी और आपके कार्य में आपको उसका लाभ भी प्राप्त होगा | हाँ, सम्बन्धों में मधुरता बनाए रखने के लिए वाणी पर तथा स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने के लिए खान पान पर संयम रखने की आवश्यकता है |

अन्त में, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/10/mars-transit-in-libra/

 

 

गीता – कर्मयोग – कर्म की तीन संज्ञाएँ

गीता के जीवन-दर्शन के अनुसार मनुष्य बहुत महान है और असीम शक्ति का भण्डार है | वास्तव में गीता एक ऐसा पवित्र ग्रंथ है जो मनुष्य को सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है | मृत्यु के संभावित भय को दूर कर हमें कर्तव्यपरायण होने की शिक्षा देता है | मनुष्य को बताता है कि बिना फल की चिन्ता के किया गया कर्म सर्वश्रेष्ठ होता है | कर्म की सविस्तार चर्चा करते हुए गीता में कहा गया है “कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं न विकर्मण:, अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: |” (4/17) – कर्म की गति गहन है | “करमन की गति न्यारी |”

कर्म, अकर्म और विकर्म का परिपाक करके ही विचार करना चाहिये | याज्ञवल्क्य तथा अन्य स्मृतिकारों ने तो मानवता के पतन का करण ही यह बताया है कि यदि मनुष्य विधि नियम रूप से प्रतिपादित कर्मों का त्याग तथा निषिद्ध कर्मों की उपादेयता अर्थात इन्द्रियों को अनुशासित सीमा के अतिरिक्त प्रवाहित होने देगा तो मानवता का पतन निश्चित है “विहितस्यानुष्ठानात् निन्दितस्य च सेवनात् अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणाम् नरः पतनमृच्छति |”

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि कौन से कर्म कर्तव्य हैं और कौन से अकर्तव्य ? तथा मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है अथवा परतन्त्र ? और क्या भोग के बिना कर्मों का नाश और मुक्ति सम्भव है ? यद्यपि कर्म के रहस्य को समझने में बुद्धिमान पुरुषों की बुद्धि भी चकरा जाती है “किं कर्म किमकर्मेति कवयोSप्यत्र मोहिता: |” तथापि गीता में इसका अत्यन्त युक्तियुक्त वर्णन उपलब्ध होता है | गीता का तृतीय अध्याय तो कर्मयोग के नाम से ही जाना जाता है, किन्तु अन्य अनेकों स्थानों पर भी कर्म की चर्चा आई है, जो भक्तिमिश्रित है |

कर्म की तीन संज्ञाएँ बताई गई हैं – कर्म, अकर्म और विकर्म | इनमें पहली संज्ञा है कर्म | मन वाणी और शरीर से होने वाली विधिसंगत उत्तम क्रिया ही कर्म है | किन्तु ऐसी क्रिया भी कर्ता के भावों की भिन्नता के कारण अकर्म या विकर्म बन जाती है | जैसे फल की इच्छा से शुद्ध भावनापूर्वक जो यज्ञ तप दान सेवा आदि विधिसंगत उत्तम कर्म किया जाता है वह कर्म होता है | किन्तु यदि उन्हीं विधेय कर्मों के फल की कामना के रूप में अशुद्ध भावना है तो वह कर्म विधेय होते हुए भी उसमें तमोगुण आ जाने के कारण विकर्म बन जाता है “मूढ़ग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः, परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् |” (17/19)

इसी प्रकार आसक्तिरहित भगवदर्पण बुद्धि से अपना कर्तव्य समझ कर जो कर्म किया जाता है, कर्तापन के अभिमान से रहित होकर जो कर्म किया जाता है वह अकर्म हो जाता है “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्, यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् | शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:, सन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ||” (9/27,28) इस प्रकार के भावार्थयुक्त अनेकों कथन गीता में यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं |

दूसरे प्रकार के कर्म विकर्म कहलाते हैं | ये कर्म निषिद्ध होने के कारण दुःखदायी होते हैं | ये कर्म निन्दित होते हुए भी यदि शुद्ध फल की कामना से किये जाएँ तो कर्म बन जाते हैं “जातस्य हि ध्रुवोर्मृत्यु: ध्रुवं जन्म मृतस्य च, तस्मादपरिहार्येSर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि |” (2/27) जैसे कि हिंसा निषिद्ध कर्म है, किन्तु लोककल्याणार्थ यदि किसी आतंकी का वध करना पड़ जाए तो उसमें लोककल्याण की शुद्ध भावना निहित होने के कारण वह विकर्म भी कर्म की श्रेणी में आ जाता है | इसी प्रकार आसक्ति और अहंकार से रहित होकर शुद्ध भाव से किये गए विकर्म भी अकर्म हो जाते हैं “सुखसु:खे समं कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ, ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि |” (2/38) तथा “यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते, हत्वापि सा इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते |” (18/17)

कर्मों की तीसरी संज्ञा है अकर्म | जो कर्म या कर्मत्याग किसी फल की उत्पत्ति का कारण न हो वह अकर्म हो जाता है “प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्, आत्मान्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते || दु:खेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्प्रह:, वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते || यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्, नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||” (2/55-57)

कर्ता के भावानुसार कर्म और विकर्म की भाँति अकर्म भी कर्म या विकर्म हो जाता है | यदि किसी व्यक्ति को कर्म त्यागने के पश्चात यह अभिमान आ जाए कि उसने तो कर्मों का त्याग किया है तो यह “त्यागरूप” कर्म हो जाएगा | इसी प्रकार स्वार्थ के कारण या दूसरों को ठगने के लिये कर्मत्याग विकर्म हो जाता है | “कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्, इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ||” (3/6) तथा “नियतस्य तु सन्यास: कर्मणो नोपपद्यते, मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तिते | दु:खमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन, स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ||” (18/7,8)

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देवोत्थान एकादशी और तुलसी विवाह

हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्त्व है | Astrologers तथा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती है, और अधिमास हो जाने पर ये छब्बीस हो जाती हैं | इनमें से आषाढ़ शुक्ल एकादशी को जब सूर्य मिथुन राशि में संचार करता है तब उसे देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है | इस एकादशी को पद्मनाभा भी कहा जाता है | तथा उसके लगभग चार माह बाद सूर्य के तुला राशि में आ जाने पर आने वाली कार्तिक शुक्ल एकादशी देव प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है | मान्यता है कि इन चार महीनों में – जिन्हें चातुर्मास कीं संज्ञा दी गई है – भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन हेतु प्रस्थान कर जाते हैं | भगवान विष्णु की इस निद्रा को योग निद्रा भी कहा जाता है | इस अवधि में यज्ञोपवीत, विवाह, गृह प्रवेश आदि संस्कार वर्जित होते हैं | इस वर्ष कल यानी गुरूवार सात नवम्बर को प्रातः 9:55 पर एकादशी तिथि आरम्भ हो जाएगी, किन्तु दशमीवेधी होने के कारण एकादशी का व्रत शुक्रवार नौ नवम्बर को ही रखा जाएगा | इस दिन उदयकाल में एकादशी तिथि होगी और दिन में बारह बजकर तेईस मिनट तक रहेगी |

कार्तिक शुक्ल द्वादशी तिथि का आरम्भ कल दिन में बारह बजकर चौबीस मिनट पर होगा और नौ तारीख को दोपहर दो बजकर अड़तीस मिनट तक रहेगी | अर्थात सूर्योदय काल में नौ तारीख को द्वादशी होने के कारण इसी दिन तुलसी विवाहतुलसी विवाह का कार्यक्रम आरम्भ हो जाएगा जो कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा यानी बारह नवम्बर को सम्पन्न होगा | नौ तारीख को ही प्रदोष का व्रत भी है | आँवला, वट वृक्ष, पीपल के वृक्ष तथा तुलसी आदि की पूजा केवल धार्मिक रीति रिवाज़ भर ही नहीं हैं अपितु इनके माध्यम से प्रकृति के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना में वृद्धि के निमित्त इन पर्वों का आयोजन वैदिक सभ्यता का प्रमुख अंग रहा है | वृक्षों की पूजा अर्चना करने के बाद अथवा तुलसी विवाह के जैसे धार्मिक व्यवहार करने के बाद वृक्षों को किसी भी प्रकार कष्ट पहुँचाने का कोई प्रयास भी नहीं कर सकेगा – मूलभूत भावना यही थी इन पर्वों के आयोजन के पीछे |

भारतीय संस्कृति में व्रतादि का विधान पूर्ण वैज्ञानिक आधार पर मौसम और प्रकृति को ध्यान में रखकर किया गया है | चातुर्मास अर्थात आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर श्रावण, भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीने वर्षा के माने जाते हैं | भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए वर्षा के ये चार महीने कृषि के लिए बहुत उत्तम माने गए हैं | किसान विवाह आदि समस्त सामाजिक उत्तरदायित्वों से मुक्त रहकर इस अवधि में पूर्ण मनोयोग से कृषि कार्य कर सकता था | आवागमन के साधन भी उन दिनों इतने अच्छे नहीं थे | साथ ही चौमासे के कारण सूर्य चन्द्र से प्राप्त होने वाली ऊर्जा भी मन्द हो जाने से जीवों की पाचक अग्नि भी मन्द पड़ जाती है | अस्तु, इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए जो व्यक्ति इन चार महीनों में जहाँ होता था वहीं रहकर अध्ययन अध्यापन करते हुए आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता था तथा खान पान पर नियन्त्रण रखता था ताकि पाचन तन्त्र उचित रूप से कार्य कर सके | और वर्षा ऋतु बीत जाते ही देव प्रबोधिनी एकादशी से समस्त कार्य पूर्ववत आरम्भ हो जाते थे |

सुप्तेत्वयिजगन्नाथ जगत्सुप्तंभवेदिदम् ।

विबुद्धेत्वयिबुध्येतजगत्सर्वचराचरम् ॥

हे जगन्नाथ ! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सो जाता है तथा आपके जागने पर समस्त चराचर पुनः जागृत हो जाता है तथा फिर से इसके समस्त कर्म पूर्ववत आरम्भ हो जाते हैं…

इस दिन केरल में गुरुवयूर मन्दिर में इस दिन विशेष अर्चना की जाती है तथा इसे गुरुवयूर एकादशी के नाम से ही जाना जाता है | कुछ स्थानों पर इसे योगेश्वर अथवा रुक्मिणी द्वादशी भी कहा जाता है और विष्णु भगवान् के कृष्ण रूप की उपासना उनकी पटरानी रुक्मिणी देवी के साथ की जाती है | ऐसा इसलिए क्योंकि रुक्मिणी वास्तव में प्रेम-भक्ति और समर्पण का एक अद्भुत सामन्जस्य थीं | कृष्ण को देखना तो दूर उनसे मिली तक नहीं थीं, केवल उनके विषय में सुन भर रखा था और इतने से ही उनके लिए मन में प्रेम बसा लिया, और प्रेम भी इतना प्रगाढ़ कि उनके प्रति मन ही मन पूर्ण रूप से समर्पित हो गईं – पूर्ण रूप से प्रेम मिश्रित भक्ति भाव का समर्पण था यह | सम्भवतः इसीलिए कुछ स्थानों पर भगवान् श्री कृष्ण के साथ उनकी पट्टमहिषी रुक्मिणी की पूजा भी की जाती है |

कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक की पाँच तिथियाँ भीष्म पंचक के नाम से भी जानी जाती हैं | मान्यता है कि जब महाभारत युद्ध के बाद पाण्डवों की जीत हो गयी, तब श्रीकृष्ण पाण्डवों को भीष्म पितामह के पास ले गये और उनसे अनुरोध किया कि वह पाण्डवों को ज्ञान प्रदान करें | शर शैया पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा कर रहे भीष्म ने कृष्ण के अनुरोध पर कृष्ण सहित पाण्डवों को राज धर्म, वर्ण धर्म एवं मोक्ष धर्म का ज्ञान दिया | भीष्म द्वारा ज्ञान देने का क्रम एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक पाँच तक चलता रहा | भीष्म जब ज्ञान दे चुके तब श्रीकृष्ण ने कहा कि “आपने जिन पाँच दिनों में ज्ञान दिया है ये दिन आज से सबके लिए मंगलकारी रहेंगे तथा इन्हें ‘भीष्म पंचक’ के नाम से जाना जाएगा |” इन्हें “पंच भिखा” भी कहा जाता है |

अस्तु, देव प्रबोधिनी एकादशी तथा तुलसी विवाह के महत्त्व के समझते हुए हम सभी के मनों में प्रकृति के प्रति सम्मान के भाव में वृद्धि हो इसी भावना के साथ सभी को इन दोनों पर्वों की अनेकशः हार्दिक शुभकामनाएँ…

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अच्छा जीवन

कल कोई मित्र घर पर आए हुए थे | बातों बातों में वो कहने लगे “हम तो और कुछ नहीं चाहते, बस इतना चाहते हैं कि हमारा बेटा अच्छा जीवन जीये… अब देखो जी वो हमारे साले का बेटा है, अभी तीन चार साल ही तो नौकरी को हुए हैं, और देखो उसके पास क्या नहीं है… एक ये हमारे साहबजादे हैं, इनसे कितना भी कहते रहो कि भाई से कुछ सीखो, पर इनके तो कानों पर जूँ नहीं रेंगती… इतना कहते हैं भाई सपने बड़े देखोगे तभी बड़े आदमी बनोगे…”

उनका बेटा बहू भी वहीं बैठे थे तो बेटा “क्या पापा आप भी न हर समय बस…” बोलकर वहाँ से उठ गया और दूसरे कमरे में जा बैठा | मैं सोचने लगी “अच्छा जीवन” की हमारी परिभाषा क्या है ? ये जो इनका बेटा अभी इनसे अप्रसन्न होकर यहाँ से उठकर चला गया क्या यही है “अच्छा जीवन” ? जबकि इसके पास भी तो सारी सुख सुविधाएँ हैं, फिर ये क्यों इसकी तुलना अपने भतीजे से कर रहे हैं ? क्या तथाकथित “बड़े सपने” देखना अच्छा जीवन है ? जितना कुछ अपने पास है उससे अधिक प्राप्त करने के सपने देखना अच्छा जीवन है ? जो कुछ अपने पास है उसे सुरक्षित रखने के सपने देखना अच्छा जीवन है ? क्योंकि “बड़े सपने देखकर ही तो बड़े कार्य करने में सक्षम हो पाएँगे | क्योंकि तब हम “बड़े सपने” सत्य करने का प्रयास करेंगे” |

बड़े सपने तो कुछ भी हो सकते हैं – जैसे अथाह धन सम्पत्ति तथा भोग विलास के भौतिक साधनों को एकत्र करना भी हो सकता है, अथवा आत्मोन्नति के लिए प्रयास करना… दूसरों की निस्वार्थ भाव से सेवा करना… अपने भीतर के सुख और सन्तोष में वृद्धि करना ताकि उसके द्वारा हम दूसरों के जीवन में भी वही सुख और सन्तोष प्रदान कर सकें आदि भी हो सकता है… और इस सबके लिए अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है…

यों देखा जाए तो सपने “छोटे या बड़े” हमारी कल्पना की तथा पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्थाओं की उपज होते हैं | जबकि वास्तव में सपना सपना होता है – न छोटा न बड़ा… एक साकार हो जाए तो दूसरा आरम्भ हो जाता है… कई बार जीवन में कुछ ऐसी अनहोनी घट जाती है कि हमें लगने लगता है हमारे सारे स्वप्न समाप्त हो गए, कहीं खो गए | सम्भव है जीवन की आपा धापी में हम दूसरों की अपेक्षा कहीं पीछे छूट गए हों, अथवा अकारण ही दैवकोप के कारण हमारा कुछ विशिष्ट हमसे छिन गया हो, या ऐसा ही बहुत कुछ – जिसकी कल्पना मात्र से हम सम्भव हैं काँप उठें… किन्तु इसे दु:स्वप्न समझकर भूल जाने में ही भलाई होती है… एक “बड़ा” स्वप्न टूटा तो क्या ? फिर से नवीन स्वप्न सजाने होंगे… तभी हम आगे बढ़ सकेंगे… जीवन सामान्य रूप से जी सकेंगे… अपने साथ साथ दूसरों के भी सपनों को साकार कर सकेंगे…

और यही है वास्तव में वह अनुभूति जिसे हम कहते हैं “अच्छा जीवन”… हम जीवन में कितने भी सम्बन्ध बना लें, कितनी भी धन सम्पत्ति एकत्र कर लें, किन्तु कुछ भी सदा विद्यमान नहीं रहता… सब कुछ नश्वर है… मानव शरीर की ही भाँति… जो पञ्चतत्वों से निर्मित होकर पञ्चतत्व में ही विलीन हो जाता है… तो क्यों न कोई ऐसा “बड़ा” स्वप्न सजाया जाए जो हमारे आत्मोत्थान में सहायक हो…? ताकि हमारी “अच्छे जीवन” की परिभाषा सत्य सिद्ध हो सके…

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गोपाष्टमी

कार्तिक शुक्ल अष्टमी गोपाष्टमी के नाम से जानी जाती है | कल अर्द्धरात्र्योत्तर दो बजकर छप्पन मिनट से अष्टमी तिथि है जो कल सूर्योदय से पूर्व चार बजकर छप्पन मिनट तक रहेगी | यह पर्व विशेष रूप से मथुरा वृन्दावन और बृज के क्षेत्रों में मनाया जाने वाला पर्व है | इसी प्रकार का पर्व महाराष्ट्र और उसके आस पास के क्षेत्रों में दीपावली से पूर्व कार्तिक कृष्ण द्वादशी को “गौवत्स द्वादशी” के नाम से भी मनाया जाता है | गोवर्धन पूजा की ही भाँति गोपाष्टमी पर्व का भी भारतीय लोक जीवन में काफी महत्व है | पौराणिक तथा लोक मान्यताओं के अनुसार कृष्ण ने समस्त गोप ग्वालों को अपने प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता बताई कि हमारे नदी, पर्वत, वन, गउएँ, वनस्पतियाँ सब प्राणिमात्र के लिए कितने जीवनोपयोगी हैं | तो क्यों न हम इन्द्र जैसे देवताओं की पूजा करने की अपेक्षा अपने इन प्राकृतिक संसाधनों की पूजा अर्चना करें | इस बात पर इन्द्र कुपित हो गए और उनके क्रोध के कारण बृज में मूसलाधार वर्षा के कारण बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई तो उससे बचने के लिए कृष्ण समस्त बृजवासियों को गोवर्धन पर्वत के नीचे ले गए और सात दिन तक सब उसी पर्वत के नीचे रहकर मूसलाधार वर्षा से सबको बचाते रहे | अन्त में गोपाष्टमी के दिन इन्द्र ने अपनी हार स्वीकार कर ली और कृष्ण से क्षमा याचना की | इसी की स्मृति में गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाता है |

कुछ ऐसी भी लोक मान्यता है कि इसी दिन से कृष्ण ने गौओं को वन में ले जाना आरम्भ किया था जिसके लिए माता यशोदा ने ऋषि शाण्डिल्य से मुहूर्त भी निकलवाया था |

मान्यताएँ और कथाएँ जितनी भी हों, वास्तविकता तो यह है कि इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है | शास्त्रों में गाय को गंगा नदी के समान ही पवित्र माना गया है | भविष्य पुराण में लक्ष्मी का स्वरूप भी गाय को माना गया है | जिस प्रकार देवी लक्ष्मी को समस्त प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली माना गया है उसी प्रकार गाय भी व्यक्ति के लिए अनेक प्रकार से सुख समृद्धिदायक होती है | गाय के दूध से जहाँ स्वास्थ्य लाभ होता है वहीं उसका गोबर खाद में काम आने के अतिरिक्त अनेक प्रकार के औषधीय गुणों से युक्त भी माना जाता है | साथ ही गाय में समस्त देवताओं का वास भी माना जाता है | पद्मपुराण के अनुसार गाय के मुख में चारों वेदों का निवास है | अन्य वैदिक मान्यताओं के अनुसार गाय के अंग प्रत्यंग में दिव्य शक्तियों का निवास है | अर्थात गाय केवल दूध देने वाला पशु मात्र ही नहीं है अपितु देवताओं की प्रतिनिधि है | इस प्रकार गौ सम्पूर्ण मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय है |

जैसा कि पिछले लेख में भी लिखा था, वैदिक संस्कृति में गौ का बहुत महत्त्व माना गया है | आश्रमों के नित्य प्रति के कार्यों में गौ से प्राप्त प्रत्येक वस्तु का उपयोग होता था इसलिए आश्रमों में गौ पालन अनिवार्य था | पंचगव्य का प्रयोग कायाकल्प करने के लिए किया जाता था | आयुर्वेद ग्रन्थों में भी इसका वर्णन उपलब्ध होता है | अथर्ववेद में तो पूरा का पूरा सूक्त ही गौ को समर्पित है |

“गावो भगो गाव इन्द्रो मे” (अथर्ववेद सा. 4/21/5) अर्थात मेरा सौभाग्य और मेरा ऐश्वर्य दोनों गायों से ही है | “स्व आ दमे सुदुधा पस्य धेनु:” (ऋग्वेद 2/35/7) अर्थात अपने घर में ही उत्तम दूध देने वाली गौ हो |

इसके अतिरिक्त गौ को रुद्रों की माता, वसुओं की कन्या तथा आदित्यों की बहिन माना गया है और ऐसी भी मान्यता है कि गाय की नाभि में अमृत होता है | इस प्रकार अनगिनत मन्त्र गौ की महिमा से युक्त वैदिक और पौराणिक साहित्य में उपलब्ध होते हैं | साथ ही गाय में समस्त देवों का वास भी माना गया है | और ऐसा सम्भवतः गौ की उपादेयता के कारण ही माना गया होगा | प्राचीन काल में घरों के भीतर और बाहर गोबर के लेप का भी कारण यही था गोबर में स्थान को स्वच्छ और कीटाणु मुक्त रखने के तत्व होते हैं | ऐसा भी माना जाता है कि अपने सींगों के माध्यम से गाय सभी आकाशीय ऊर्जाओं को संचित कर लेती है और वही ऊर्जा हमें गौमूत्र, दूध और गोबर तथा गौ दुग्ध से प्राप्त अन्य पदार्थों जैसे घी, दही, छाछ मक्खन आदि के द्वारा प्राप्त होती हैं | माना जाता है कि गुरु वशिष्ठ ने तो गाय की उपादेयता के कारण ही कुछ प्रजातियाँ भी तैयार की थीं जिनमें कपिला, देवनी, नन्दिनी और भौमा प्रमुख थीं |

इसी समस्त के प्रति श्रद्धा और आस्था व्यक्त करने हेतु कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी पर्व के रूप में मथुरा, वृंदावन और बृज के अन्य क्षेत्रों के साथ साथ प्रायः समस्त उत्तर भारत में हिन्दू परिवारों में इस पर्व को मनाया जाता है | आज के दिन गायों और उनके बछड़े को सजाकर उनकी पूजा करके उन्हें वन में भेजा जाता है और सायंकाल उनके घर लौटने पर पुनः उनकी पूजा की जाती है |

अस्तु, मूल रूप से गौ वंश तथा उनकी रक्षा के महत्त्व को प्रदर्शित करते हुए गौवत्स द्वादशी और गोपाष्टमी जैसे पर्वों के महत्त्व को हम सब भी समझें तथा प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनें, इसी कामना के साथ सभी को गोपाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

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