पञ्चांग – राहुकाल

प्रत्येक दिन का एक भाग राहुकाल माना जाता है | दिनमान को आठ भागों में विभक्त करके राहुकाल की गणना की जाती है | क्योंकि सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग अलग स्थानों पर अलग अलग होता है इसलिए राहुकाल का समय और अवधि भी हर स्थान पर अलग हो सकते हैं | प्रायः इसका समय डेढ़ घंटे का रहता है जो दिनमान की अवधि के अनुसार कम अथवा अधिक भी हो सकता है | इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य आरम्भ करने की सलाह Vedic Astrologer नहीं देते |

अन्त में, शुभाशुभ मुहूर्त से भी ऊपर व्यक्ति का अपना कर्म होता है | व्यक्ति में सामर्थ्य और सकारात्मकता है तथा कार्य करने का उत्साह है तो वह अशुभ मुहूर्त को भी अनुकूल बना सकता है | कोई भी Good Astrologer अशुभ मुहूर्त का भय न दिखाकर उचित मार्गदर्शन ही करता है |

अस्तु, हम सभी कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करें…

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पञ्चांग का पंचम अंग करण

पिछले कुछ समय से पञ्चांग के विभिन्न अवयवों पर चर्चा कर रहे हैं | पञ्चांग के चार अंगों – दिन, तिथि, नक्षत्र और योग के बाद अब, पञ्चांग का पाँचवाँ अवयव है करण | तिथि का आधा भाग करण कहलाता है | चन्द्रमा जब 6 अंश पूर्ण कर लेता है तब एक करण पूर्ण होता है | कुल ग्यारह करण होते हैं | इनमें किन्स्तुघ्न, चतुष्पद, शकुनि तथा नाग ये चार करण हर माह में आते हैं और इन्हें स्थिर करण कहा जाता है | अन्य सात करण चर करण कहलाते हैं | ये एक स्थिर गति में एक दूसरे के पीछे आते हैं | इनके नाम हैं: बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि जिसे भद्रा भी कहा जाता है |

अन्त में इतना अवश्य कहेंगे कि शुभ मुहूर्त – Auspicious Time – में यदि कोई कार्य आरम्भ किया जा सकता है तो अवश्य करना चाहिए | किन्तु यदि कार्य आवश्यक ही हो और कोई शुभ मुहूर्त नहीं मिल रहा हो तो Vedic Astrologer व्यक्ति को इस शुभाशुभ मुहूर्त के भय से ऊपर उठकर सकारात्मक भाव के साथ कर्म करने की ही सलाह देते हैं…

 

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