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सूर्य का सिंह में गोचर

कल श्रावण शुक्ल सप्तमी यानी 17 अगस्त को 06:50 के लगभग सूर्यदेव अपने मित्र ग्रह चन्द्र की कर्क राशि से निकल कर अपनी स्वयं की राशि सिंह और मघा नक्षत्र में प्रस्थान कर जाएँगे, जहाँ तीन सितम्बर को बुध का प्रस्थान भी हो जाएगा | सिंह सूर्य की मूल त्रिकोण राशि है | और जब कोई ग्रह अपनी मूल त्रिकोण राशि अथवा अपनी उच्च राशि में आता है तो वह बली माना जाता है | जहाँ 17 सितम्बर को लगभग 06:46 तक भ्रमण करने के पश्चात बुध की कन्या राशि में प्रविष्ट हो जाएँगे | अपनी इस यात्रा के दौरान सूर्यदेव 31 अगस्त से पूर्वा फाल्गुनी तथा 13 सितम्बर से उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में भ्रमण करेंगे | सूर्य के सिंह में संक्रमण के समय गर करण और शुक्ल योग होगा |

मेष राशि क्योंकि सूर्य की उच्च राशि है और सिंह सूर्य की अपनी मूल त्रिकोण राशि है इसलिए इन दोनों राशियों के लिए तो सूर्य का यह गोचर अनुकूल ही रहने की सम्भावना है | तो जानने का प्रयास करते हैं सिंह राशि में सूर्य के संक्रमण के जनसाधारण पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

मेष : आपकी राशि से पंचमेश पंचम भाव में ही गोचर कर रहा है | यदि आप अथवा आपकी सन्तान उच्च शिक्षा अथवा किसी Professional Course के लिए जाना चाहते हैं तो आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | साथ ही सन्तान प्राप्ति के भी योग प्रतीत होते हैं | आय के नवीन अवसरों के साथ ही मन सम्मान में वृद्धि के भी संकेत हैं | स्वास्थ्य के लिए भी यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | किन्तु यदि आपने अपने Temperament पर नियन्त्रण नहीं रखा तो प्रेम सम्बन्धों में दरार की भी सम्भावना है | आपकी सन्तान का स्वभाव भी उग्र हो सकता है किन्तु उसका सहयोग आपको प्राप्त रहेगा |

वृषभ : आपकी राशि से चतुर्थेश चतुर्थ भाव में ही गोचर कर रहा है | एक ओर जहाँ आपको अपनी माता का सुख प्राप्त होगा वहीं दूसरी ओर आपके पिता के लिए किसी प्रकार के शारीरिक कष्ट की सम्भावना भी हो सकती है | आपके कार्य की दृष्टि से यह गोचर अत्यन्त अनुकूल प्रतीत होता है | नौकरी में पदोन्नति तथा अपने स्वयं के व्यवसाय में प्रगति की सम्भावना है | जो कार्य अब तक रुके हुए थे उनके भी पूर्ण होने की सम्भावना है | परिवार में मंगल कार्यों का आयोजन हो सकता है |

मिथुन : आपकी राशि से तृतीयेश का गोचर तृतीय भाव में ही हो रहा है | आपके लिए मान सम्मान और यश में वृद्धि के योग प्रतीत होते हैं | साथ ही आपके उत्साह में भी इस अवधि में वृद्धि की सम्भावना है | जिसके कारण आप अपने कार्य समय पर पूर्ण करने में सक्षम हो सकते हैं | किन्तु आपके छोटे भाई बहनों के लिए यह गोचर अधिक अनुकूल नहीं प्रतीत होता | उनके अपने स्वभाव के कारण उन्हें मानसिक और शारीरिक कष्ट का सामना करना पड़ सकता है जिसके कारण उनके कार्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है |

कर्क : आपकी राशि से द्वितीयेश का गोचर द्वितीय भाव में ही हो रहा है | आपके कार्य में प्रगति तथा आय में वृद्धि के साथ ही मान सम्मान में भी वृद्धि के योग हैं | परिवार में तथा कार्य स्थल पर सौहार्दपूर्ण वातावरण रहने की सम्भावना है | किन्तु इसके साथ ही आपका स्वभाव भी उग्र हो सकता है | साथ ही नेत्रों से सम्बन्धित कोई समस्या अथवा मानसिक तनाव के कारण माइग्रेन या उच्च रक्तचाप की समस्या भी हो सकती है | इस सबसे बचने के लिए खान पान पर नियन्त्रण रखने की आवश्यकता है | ध्यान और प्राणायम को अपनी दिनचर्या का अंग बना लेंगे तो बहुत सी समस्याओं से बच सकते हैं |

सिंह : आपके लिए आपके राश्यधिपति का अपनी ही राशि में गोचर विशेष रूप से लाभप्रद प्रतीत होता है | आपकी ऊर्जा में वृद्धि तथा व्यक्तित्व में ओज के ही साथ आपके कार्य में भी प्रगति की सम्भावना है | आपके व्यक्तित्व का प्रभाव लोगों पर पड़ेगा और इस कारण आपके मान सम्मान में भी वृद्धि की सम्भावना है | अपना स्वयं का व्यवसाय है तो बड़े भाई का सहयोग भी प्राप्त रह सकता है | नौकरी में हैं तो पदोन्नति की भी सम्भावना है | किन्तु आपको अपने क्रोध को नियन्त्रण में रखना होगा | आपको अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य का विशेष रूप से ध्यान रखने की आवश्यकता है |

कन्या : आपके लिए आपके द्वादशेश का गोचर आपके द्वादश भाव में ही हो रहा है | यदि आपका कार्य कहीं विदेशों से सम्बद्ध है तो कार्य में प्रगति तथा विदेश यात्राओं में वृद्धि की सम्भावना है | यदि आप किसी सरकारी नौकरी में हैं तो आपका कहीं ट्रांसफर भी हो सकता है | ननिहाल के पक्ष से किसी प्रकार का मनमुटाव सम्भव है | यदि कोई कोर्ट केस चल रहा है तो इस अवधि में उसका निर्णय आपके पक्ष में आ सकता है | आपके लिए एक ओर जहाँ किसी पुरानी बीमारी से मुक्ति की सम्भावना है वहीं दूसरी ओर नेत्र सम्बन्धी विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं |

तुला : आपकी राशि से एकादश भाव में सूर्य का गोचर आय में वृद्धि की ओर तथा नौकरी में पदोन्नति की ओर संकेत करता है | आपका अपना कार्य है तो उसमें भी प्रगति की सम्भावना है | किसी प्रकार का अवार्ड या सम्मान आदि भी आपको इस अवधि में प्राप्त हो सकता है | किन्तु साथ ही किसी घनिष्ठ मित्र अथवा बड़े भाई के साथ किसी प्रकार का मतभेद भी हो सकता है | आप कोई नया वाहन भी इस अवधि में खरीद सकते हैं | आपके अपने स्वास्थ्य की दृष्टि से समय अनुकूल प्रतीत होता है, किन्तु सन्तान के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | छात्रों के लिए यह गोचर अनुकूल फल देने वाला प्रतीत होता है |

वृश्चिक : आपकी राशि से दशमेश का गोचर दशम भाव में ही हो रहा है | नौकरी में हैं तो पदोन्नति और मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं | अपना स्वयं का व्यवसाय है तो उसमें भी प्रगति की सम्भावना है | आपके लिए कार्य तथा आय के नवीन स्रोत इस अवधि में उपस्थित हो सकते हैं | परिवार में किसी प्रकार के मंगल कार्य की भी सम्भावना है | किन्तु आपको अपनी माता जी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | साथ ही यदि आप गर्भवती महिला हैं और डिलीवरी निकट है तो आपको सावधान रहने की आवश्यकता है |

धनु : आपकी राशि के लिए आपका भाग्येश भाग्य स्थान में ही गोचर कर रहा है | आपके लिए वास्तव में यह गोचर भाग्यवर्धक प्रतीत होता है | नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ ही कहीं ट्रांसफर भी हो सकता है | अपना स्वयं का कार्य है तो उसमें भी लाभ की सम्भावना है | आपके लिए पराक्रम और मान सम्मान में वृद्धि के संकेत प्रतीत होते हैं | किसी प्रकार का अवार्ड या सम्मान आदि भी आपको इस अवधि में प्राप्त हो सकता है | विदेश यात्राओं के भी योग प्रतीत होते हैं | धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में रूचि बढ़ सकती है |

मकर : आपकी राशि से अष्टमेश अष्टम भाव में ही गोचर कर रहा है | आपके लिए यह गोचर बहुत अनुकूल नहीं प्रतीत होता | आपके कार्य में आपके स्वयं के अथवा आपके पिता या परिवार के किसी बुज़ुर्ग व्यक्ति के स्वास्थ्य के कारण विघ्न उपस्थित हो सकता है | अचानक ही आपके विरोधियों के भी स्वर मुखर हो सकते हैं | आपको स्वयं को ज्वर, मानसिक तनाव के कारण माइग्रेन, उच्च रक्तचाप अथवा नेत्र विकार जैसी कोई समस्या का सामना करना पड़ सकता है | किन्तु अपने स्वभाव को संयमित रखेंगे तो बहुत सी समस्याओं से बच सकते हैं |

कुम्भ : आपके लियेः गोचर मिश्रित फल देने वाला प्रतीत होता है | पार्टनरशिप में कोई कार्य कर रहे हैं तो उसमें प्रगति की सम्भावना है | किन्तु आपके बिजनेस पार्टनर का स्वभाव इस अवधि में कुछ उग्र हो सकता है | साथ ही दाम्पत्य जीवन में जीवन साथी का सहयोग और साथ तो प्राप्त रहेगा किन्तु उसके स्वभाव की उग्रता के कारण आपको मानसिक तनाव हो सकता | अच्छा यही रहेगा कि अपनी वाणी और Temperament पर नियन्त्रण रखें | दूर पास की यात्राओं के योग भी बन रहे हैं |

मीन : आपका षष्ठेश होकर सूर्य का गोचर छठे भाव में ही हो रहा है | एक ओर आपके विरोधियों में वृद्धि की सम्भावना है वहीं दूसरी ओर आपके उत्साह में वृद्धि की भी सम्भावना है जिसके कारण आप अपने विरोधियों पर स्वयं ही विजय प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं | किसी प्रकार का कोई लीगल केस का भी सामना करना पड़ सकता है | किन्तु साथ ही परिवार के लोगों का सहयोग आपको प्राप्त रहेगा और उनके कारण आपके आत्मबल में भी वृद्धि होगी | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | आपके ननिहाल के पक्ष के साथ या तो मनमुटाव हो सकता है अथवा किसी का स्वास्थ्य चिन्ता का विषय हो सकता है |

अन्त में, उपरोक्त परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |साथ ही, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/16/sun-transit-in-leo/

 

 

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

27 नक्षत्रों का हिन्दी महीनों में विभाजन तथा हिन्दी माहों के वैदिक नाम

पिछले अध्याय में चर्चा की थी 27 नक्षत्रों की और उनके नामों का उल्लेख किया था | जैसा कि पहले भी लिखा है कि जिस हिन्दी माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को जिस नक्षत्र का उदय होता है उसी के आधार पर उस माह का नाम रखा गया है | इन 12 हिन्दी महीनों के वैदिक नाम भी हैं | तो, अब बात करते हैं कि इन 27 नक्षत्रों का बारह वैदिक महीनों में किस प्रकार से विभाजन हुआ है – अर्थात किस माह में कौन कौन से नक्षत्र आते हैं, तथा उन महीनों के वैदिक और हिन्दी नाम क्या हैं…

हिन्दी महीनों में सबसे प्रथम महीना है चैत्र का – और इसका वैदिक नाम है मधु | इस मधु अर्थात चैत्र माह में चित्रा और स्वाति ये दो नक्षत्र आते हैं | मधु माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र का उदय होता है, अतः इस माह का हिन्दी नाम चैत्र रखा गया |

वैशाख माह का वैदिक नाम है माधव तथा इसमें विशाखा और अनुराधा ये दो नक्षत्र आते हैं | क्योंकि माधव माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र का उदय होता है, इसलिए इस माह का हिन्दी नाम वैशाख हुआ |

ज्येष्ठ का वैदिक नाम है शुक्र और इसके अन्तर्गत ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र आते हैं | इसमें भी ज्येष्ठ नक्षत्र का शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को उदय होने के कारण इसका नाम ज्येष्ठा हुआ |

आषाढ़ माह का वैदिक नाम शुचि है तथा इसमें दोनों आषाढ़ – यानी पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ आते हैं | शुचि माह में शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र का उदय होता है और उसके बाद आता है उत्तराषाढ़ नक्षत्र | यही कारण है कि इस माह का हिन्दी नाम आषाढ़ है |

श्रावण माह का वैदिक नाम नभ है तथा इसमें श्रवण और धनिष्ठा नक्षत्रों का समावेश होता है | नभ नामक वैदिक माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र का उदय होता है अतः इस माह का हिन्दी नाम श्रावण है |

भाद्रपद माह का वैदिक नाम नभस्य है तथा इसमें तीन नक्षत्र आते हैं – शतभिषज और दोनों भाद्रपद – यानी पूर्वा भाद्रपद और उत्तर भाद्रपद | नभस्य माह में शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा तिथि को पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र का उदय होता है इसलिए इसका हिन्दी नाम भाद्रपद हुआ |

आश्विन माह का वैदिक नाम है ईश, तथा इसमें भी तीन नक्षत्र आते हैं – रेवती, अश्विनी और भरणी | इस माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को अश्विनी नक्षत्र का उदय होता है अतः इस माह का हिन्दी नाम आश्विन है |

कार्तिक माह का वैदिक नाम ऊर्जा है और इस माह में दो नक्षत्र आते हैं – कृत्तिका और रोहिणी | ऊर्जा नामक वैदिक माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को ऊर्जावान कृत्तिका नक्षत्र का उदय होने के कारण इस माह का हिन्दी नाम कार्तिक हुआ |

मृगशिर माह का वैदिक नाम है सह तथा इसमें जो दो नक्षत्र आते हैं वे हैं मृगशिरा और आर्द्रा | जैसा कि आप समझ ही गए होंगे, इस माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा तिथि को मृगशिरा नक्षत्र का उदय होता है इसीलिए इस माह का हिन्दी नाम है मृगशिर |

पौष माह का वैदिक नाम है सहस्य – जो सह के साथ आए – तथा इसके अन्तर्गत पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र आते हैं | इस माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को उदय होता है पुष्य नक्षत्र का, इसीलिए इस माह का हिन्दी नाम पौष हुआ |

माघ माह का वैदिक नाम है तप तथा इसमें दो नक्षत्र – आश्लेषा और मघा होते हैं | निश्चित रूप से इस माह की शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा को मघा नक्षत्र का उदय होने के कारण ही इसका हिन्दी नाम मघा हुआ |

फाल्गुन माह का वैदिक नाम है तपस्य तथा इसमें तीन नक्षत्र आते हैं – दोनों फाल्गुन – अर्थात पूर्वा फाल्गुनी और उत्तर फाल्गुनी और साथ में हस्त | इस माह में भी निश्चित रूप से शुक्ल चतुर्दशी-पूर्णिमा तिथि को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र का उदय होता है और इसीलिए इसका हिन्दी नाम फाल्गुन है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/10/constellation-nakshatras-9/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

27 नक्षत्रों के वैदिक नाम

अब मुहूर्त आदि के लिए प्रमुख रूप से विचारणीय वैदिक ज्योतिष के महत्त्वपूर्ण अंग नक्षत्रों की वार्ता को आगे बढाते हुए  27 नक्षत्रों के वैदिक नामों पर प्रकाश डालते हैं | जैसे कि पहले ही बताया है कि किसी भी हिन्दी अथवा वैदिक महीने के नाम उस नक्षत्र के नाम पर होता है जो उस माह की पूर्णिमा के दिन होता है | अर्थात किसी भी माह की पूर्णिमा को जिस नक्षत्र का उदय हो रहा होगा, उस माह का नाम उसी नक्षत्र के नाम पर होगा |

उदाहरण के लिए चैत्र माह की पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र का उदय होता है इसलिए इस माह का नाम चैत्र रखा गया | वैशाख माह की पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र का उदय होता है इसलिए इस नक्षत्र का नाम वैशाख रखा गया, इत्यादि इत्यादि…

सूर्य सिद्धान्त के अनुसार आश्विन, भाद्रपद और फाल्गुन माह में तीन तीन नक्षत्र होते हैं और शेष नौ महीनों में दो दो नक्षत्र होते हैं | ये 27 नक्षत्र हैं – अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषज, पूर्वा भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती |

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: |

स्वस्ति न तार्क्ष्योSरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ||

अगले अध्याय में चर्चा करेंगे इन 27 नक्षत्रों का हिन्दी महीनों में विभाजन किस प्रकार किया गया है तथा इन नक्षत्रों के आधार पर हिन्दी के बारह महीनों के वैदिक नाम क्या हैं…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/08/constellation-nakshatras-8/

नक्षत्र – एक विश्लेषण

वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों का महत्त्व

प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि नक्षत्रों को वैदिक ज्योतिष में इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया गया ? जैसा कि हमने पहले भी बताया, नक्षत्र किसी भी ग्रह की गति तथा स्थिति को मापने के लिए एक स्केल अथवा मापक यन्त्र का कार्य करते हैं | यही कारण है कि पञ्चांग (Indian Vedic Ephemeris) के पाँच अंगों में एक प्रमुख अंग नक्षत्र को माना जाता है | पञ्चांग के पाँच अंग हैं – तिथि (चन्द्रमा की गति के अनुसार), वार (सप्ताह का दिन), योग (चन्द्रमा के विविध योग), करण (यह भी चन्द्रमा के ही विविध योग हैं), और नक्षत्र | इस प्रकार नक्षत्र पञ्चांग का एक महत्त्वपूर्ण अंग हो जाता है |

किसी भी माह में आने वाली पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उस माह का नाम उसी नक्षत्र के नाम पर होता है | किसी भी शुभ, माँगलिक अथवा आवश्यक कार्य को करने के लिए जो मुहूर्त अर्थात अनुकूल समय नियत किया जाता है उसकी गणना भी नक्षत्रों के ही आधार पर होती है | विवाह से पूर्व वर वधू की कुण्डलियों का मिलान (Horoscope Matching) भी इन नक्षत्रों के ही आधार पर किया जाता है | यात्रा आरम्भ करने के लिए, कोर्ट में केस फाइल करने के लिए, किसी रोग से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अथवा हमारे दिन प्रतिदिन के अन्य भी अनेक कार्यों में हम इन नक्षत्रों की सहायता लेते हैं | वैदिक परम्परा में तो बच्चे के विद्यारम्भ के लिए भी शुभ मुहूर्त निश्चित किया जाता है जब वह अपने गुरु के समक्ष प्रथम बार उपस्थित होता है | ऐसा माना जाता है कि विपत और वध नक्षत्र में कोई भी आवश्यक अथवा शुभ कार्य नहीं किया जाना चाहिए |

इस समस्त प्रक्रिया का उद्देश्य यही है कि कार्य से सम्बन्धित ग्रह की अनुकूल अथवा प्रतिकूल स्थिति का आकलन कर सकें | जितनी भी ग्रह दशाएँ हैं – चाहे वह विंशोत्तरी दशा हो, अष्टोत्तरी हो, कृष्णमूर्ति हो या कोई भी हो – सभी केवल नक्षत्रों पर ही आधारित हैं | यदि किसी जातक का जन्म क्रूर अथवा अशुभ नक्षत्र में हुआ है अथवा किसी जातक की किसी ऐसे ग्रह की दशा चल रही है जो किसी अशुभ नक्षत्र में स्थित है तो उस व्यक्ति को उस नक्षत्र से सम्बन्धित देवता की पूजा अर्चना तथा दानादि आदि के द्वारा उस नक्षत्र के अशुभ प्रभाव को कम करने का सुझाव दिया जाता है | महाभारत में पूरा का पूरा एक अध्याय ही अशुभ नक्षत्रों का अशुभत्व कम करने के विषय में है | तो नक्षत्रों के महत्त्व को कैसे कम करके आँका जा सकता है ?

वैदिक साहित्य में नक्षत्रों का बड़ा सूक्ष्म विवेचन उपलब्ध होता है क्योंकि उस समय ज्योतिष नक्षत्र प्रधान था | वेदों में नक्षत्रों के उडू, रिक्ष, नभ, रोचना आदि पर्यावाची नाम भी उपलब्ध होते हैं | ऋग्वेद में तो एक स्थान पर सूर्य को भी नक्षत्र की संज्ञा दी गई है | अन्य नक्षत्रों में उस समय सप्तर्षि और अगस्त्य का नाम आता है | नक्षत्रों से सम्बन्धित सूची विशेष रूप से अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, शतपथ ब्राहमण और गणित ज्योतिष के सबसे प्राचीन ग्रन्थ लगध के वेदांग ज्योतिष में उपलब्ध होती है | ऋग्वेद के अनुसार जिस लोक का कभी क्षय नहीं होता उसे नक्षत्र कहा जाता है | तेत्तिरीय संहिता के अनुसार सभी नक्षत्र देव ग्रह हैं और रोचन तथा शोभन हैं और आकाश को अलंकृत करते हैं | इनके मध्य सूक्ष्म जल का समुद्र है, ये उसमें तैरते हैं | इसीलिए सम्भवतः इन्हें तारा अथवा तारक भी कहा जाता है |

“देव ग्रहा: वै नक्षत्राणि य एवं वेद गृही भवति |

रोचन्ते रोचनादिवी सलिलंवोइदमन्तरासीतयदतरस्तंताकानां तारकत्वम् ||”

शतपथ ब्राहमण के अनुसार समस्त देवताओं का घर नक्षत्र लोक ही है – नक्षत्राणि वै सर्वेषां देवानां आयतनम् |

ऋग्वेद के दशम मण्डल के पचासीवें सूक्त में कहा गया है कि चन्द्रमा नक्षत्रों के मध्य विचरण करता है, और वहाँ सोमरस विद्यमान रहता है : अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहित: |

इस प्रकार वैदिक साहित्य में नक्षत्रों के विषय में व्यापक चर्चा उपलब्ध होती है | और इसका कारण यही है कि वेदों की प्रवृत्ति यागों के निमित्त हुई और यज्ञ मुहूर्त विशेष की अपेक्षा रखते हैं | मुहूर्त का अत्यन्त सूक्ष्म ज्ञान नक्षत्रों के आधार पर गणना करके ही सम्भव था…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/08/07/constellation-nakshatras-7/

नक्षत्र एक विश्लेषण

नक्षत्रों का महत्त्व

समस्त बारह वैदिक मासों का आधार नक्षत्र मण्डल ही है | प्रत्येक माह को पूर्ण चन्द्र की रात्रि पूर्णिमा कहलाती है | पूर्णिमा को जो नक्षत्र पड़ता है, वैदिक महीनों का नाम उन्हीं नक्षत्रों के नाम पर होता है | अर्थात प्रत्येक पूर्णिमा का चन्द्र नक्षत्र उस माह के वैदक नाम है | जैसे, चित्रा से चैत्र माह, विशाखा से वैशाख इत्यादि | किन्तु किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व पहले हमें नक्षत्रों के विषय में विस्तार से जानना होगा |

तारों के एक समूह को नक्षत्र कहते हैं | वस्तुतः नक्षत्र एक ऐसा मापक यन्त्र यानी स्केल है जिसके द्वारा हम किसी ग्रह की एक राशि से दूसरी राशि तक पहुँचने की अवधि अर्थात यात्रा की लम्बाई नाप सकते हैं | उदाहरण के लिए हम जानना चाहते हैं कि मंगल को अपनी वर्तमान राशि से दूसरी राशि पर पहुँचने में कितना समय लगेगा | इसके लिए आवश्यक है कि हमें मंगल की वर्तमान स्थिति का पता हो कि वर्तमान में वह किस नक्षत्र के किस चरण अर्थात किस भाग पर स्थित है | और वहाँ से जिस राशि पर उसे जाना है वहाँ किस नक्षत्र का कौन सा चरण हो सकता है | इस सबका अध्ययन कर लेने के बाद हम कह सकते हैं कि मंगल ने इतने समय में इतनी दूर की यात्रा की है, इतनी दूर की यात्रा और शेष है, तो पिछली यात्रा की अवधि के आधार पर वह लगभग इतनी अवधि में शेष यात्रा पूर्ण करेगा |

इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि मान लीजिये हम कहीं जा रहे हैं | मार्ग में हम कुछ बोर्ड्स देखते हैं जिन पर उस स्थान का नाम तथा पहले और दूसरे स्थान से उसकी दूरी लिखी होती है | इसके द्वारा हमें पता लग जाता है कि अब तक हम इस स्थान पर पहुँच चुके हैं अथवा इतनी दूरी तय कर चुके हैं और अब हमें अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए इतनी दूरी और तय करनी है जो हम लगभग इतने समय में पूरी कर सकते हैं | मार्ग में लगे ये बोर्ड्स स्थान विशेष तथा एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी के सूचक होते हैं | नक्षत्र इसी प्रकार के साईनबोर्ड्स हैं जिनके माध्यम से हम एक स्थान से हम किसी ग्रह की एक राशि से दूसरी राशि पर पहुँचने की दूरी और समय का अनुमान लगा सकते हैं | इस प्रकार नक्षत्र किसी ग्रह की एक राशि से दूसरी राशि के लिए यात्रा के दौरान दोनों राशियों के मध्य की दूरी तथा मार्ग के पड़ावों यानी नक्षत्रपदों का ज्ञान कराने वाले मापक यन्त्र यानी स्केल हैं | नक्षत्रों का शाब्दिक अर्थ है “आकाश में तारामण्डल के मध्य चन्द्रमा का मार्ग |”

जब हम कहीं यात्रा करते हैं तो मार्ग को लम्बाई को नापने के लिए मील अथवा किलोमीटर का प्रयोग किया जाता है | इसी प्रकार ग्रहों की पूर्व से पश्चिम तक की यात्रा में उनकी परस्पर दूरी तथा गति नापने के लिए नक्षत्रों का भी विभाजन किया गया है | हमारे खगोलशास्त्रियों यानी Astronauts ने समूचे भाचक्र अर्थात Zodiac को 27 बराबर भागों में विभक्त किया है | भाचक्र में राशिचक्र के ये सत्ताईस भाग ही नक्षत्र कहलाते हैं | प्रत्येक नक्षत्र में तारों का एक समूह होता है | नक्षत्र के ये तारे एक साथ मिलकर एक आकृति अथवा Image बनाते हैं जैसे हाथी, सर, सर्प, गाड़ी इत्यादि | खुले और साफ़ आकाश में हम इन आकृतियों को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं | इन 27 नक्षत्रों से ग्रहों की स्थिति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है | जिस प्रकार अपनी यात्रा के दौरान मार्ग में लगे साईनबोर्ड्स से हमें पता चल जाता है कि हम अमुक समय अमुक स्थान पर पहुँच रहे हैं और यात्रा के आरम्भ से इतने मील या किलोमीटर तक की दूरी तक आ चुके हैं | उसी प्रकार एक ज्योतिषी अथवा खगोल वैज्ञानिक नक्षत्रों की सहायता से आसानी से यह बता सकता है कि अमुक ग्रह अमुक समय इतनी डिग्री पर अमुक नक्षत्र में होगा, या अबसे पूर्व एक विशेष समय पर यह ग्रह इतनी डिग्री में इस नक्षत्र पर था | प्रत्येक नक्षत्र की अवधि 13 डिग्री 20 मिनट की होती है तथा प्रत्येक नक्षत्र चार भागों में विभक्त होता है | ये चारों भाग नक्षत्र के चरण अथवा पद कहलाते हैं | प्रत्येक पद तीन डिग्री बीस मिनट का होता है | अब, क्योंकि प्रत्येक राशि तीस डिग्री की होती है इसलिए हर राशि में सवा दो नक्षत्र आते हैं – अर्था दो नक्षत्र पूरे और तीसरे नक्षत्र का चौथाई भाग यानी एक पद | इस प्रकार चार राशियों में नौ नक्षत्र पूरे आ जाते हैं और इस प्रकार 27 नक्षत्र बारह राशियों में बराबर विभक्त हो जाते हैं |

क्योंकि हर नक्षत्र कुछ तारों का एक समूह होता है इसलिए प्रत्येक नक्षत्र का नाम उस नक्षत्र में सम्मिलित तारकदल में सबसे अधिक प्रकाशित तारे के नाम पर होता है | उदाहरण के लिए चित्रा नक्षत्र में सम्मिलित तारकसमूह में सबसे अधिक प्रकाशित तारा है चित्रा इसलिए इस नक्षत्र का नाम चित्रा रखा गया |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

महाभारत में नक्षत्र विषयक सन्दर्भ

रामायण के ही समान महाभारत में ज्योतिष विद्या के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध होते हैं | महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से पूर्व ही समस्त ज्योतिषियों, सर्वतोभद्र चक्र के ज्ञाताओं, प्रश्न मर्मज्ञों और मुहूर्तविदों ने उस समय की ग्रह नक्षत्रों आदि की स्थितियों को देखते हुए भविष्यवाणी कर दी थी कि समस्त कौरव कुल तथा सृन्जय वंश के लोगों का बड़ा भारी संहार होने वाला है (उद्योगपर्व 48/98,99) | जिस दिन दोनों पक्ष युद्ध के लिए आगे बढे उस दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्र पर था तथा आकाश में सात महाग्रह अग्नि के समान उद्दीप्त दिखाई दे रहे थे | सूर्यदेव भी उदयकाल में दो भागों में विभक्त दिखाई दे रहे थे (महाभारत भीष्मपर्व 17/2,3)

महाभारत के ही उद्योगपर्व में ग्रहों तथा नक्षत्रों के अशुभ योगों का विस्तार से वर्णन किया गया है | श्री कृष्ण जब कर्ण से भेंट करने जाते हैं तो कर्ण कहते हैं “शनि जैसा उग्र ग्रह रोहिणी नक्षत्र को पीड़ित कर रहा है, जो प्रजा के लिए बहुत अशुभ है | ज्येष्ठा नक्षत्र में स्थित मंगल वक्र होकर गोचर में अनुराधा नक्षत्र में संचार करने वाला है | यह स्थिति राजा के मित्रों के लिए अशुभ है | तथा महापात नामक ग्रह चित्रा नक्षत्र को पीड़ित कर रहा है, यह स्थिति स्वयं राजा के लिए शुभ नहीं है:

प्राजापत्यं हि नक्षत्रं ग्रहस्तीक्ष्णो महाद्युति: |

शनैश्चर: पीडयति पीडयन् प्राणिनोSधिकम् ||

कृत्वा चांगारको वक्रं ज्येष्ठायां मधुसूदन |

अनुराधां प्रार्थयते मैत्रं संगमयन्निव || (उद्योगपर्व 143/8-11)

साथ ही आगे और भी लिखा है कि चन्द्र भी अपनी राशि बदल चुका है | साथ ही सूर्य को भी राहु का ग्रहण लगने वाला है | यह सारी की सारी ही ग्रहस्थिति ऐसी है जो किसी अशुभ घटना की ओर संकेत करती है | भीष्मपर्व में भी ऐसी ही अनिष्टकारी ग्रहस्थिति का वर्णन है | भीष्मपर्व के तृतीय अध्याय में व्यास जी कहते हैं कि राहु सूर्य के निकट आ रहा है | केतु चित्रा का अतिक्रमण करके स्वाति पर स्थित हो रहा है (इसका अभिप्राय यही रहा होगा कि राहु केतु उन्हीं अंशों पर थे जिन पर सूर्यदेव थे |) अत्यन्त भयंकर धूमकेतु पुष्य नक्षत्र को आक्रान्त करके वहीं स्थित हो रहा है | जो दोनों सेनाओं का भयंकर अमंगल करेंगे | मंगल वक्र होकर मघा पर, बृहस्पति श्रवण पर तथा सूर्यपुत्र शनि पूर्वा फाल्गुनी को पीड़ित कर रहे हैं | शुक्र पूर्वा भाद्रपद पर प्रकाशित हो रहा है और सब ओर घूम फिर कर परिघ नामक उपग्रह के साथ उत्तर भाद्रपद पर दृष्टि लगाए है | श्वेतकेतु नामक उपग्रह अग्नि के समान प्रज्वलित होकर ज्येष्ठा नक्षत्र पर स्थित है | चित्रा व स्वाति के मध्य में स्थित क्रूर ग्रह राहु सदा वक्री होकर रोहिणी व चन्द्र और सूर्य को पीड़ित कर रहा है तथा अत्यन्त प्रदीप्त होकर ध्रुव के बांयी ओर जा रहा है | यह स्थिति अत्यन्त ही अमंगलसूचक है | (चित्रा व स्वाति के मध्य स्थित होकर राहु सर्वतोभद्र चक्र के वेध के अनुसार कृत्तिका को पीड़ित करेगा) | ऐसे में युद्ध आदि के साथ भयंकर आँधी और तूफ़ान की भी सम्भावना रहती है | मघा में स्थित होकर मंगल बार बार वक्री होकर बृहस्पति से युक्त श्रवण नक्षत्र को देख रहा है | इस सबका प्रभाव रेवती पर भी प्रतिकूल पड़ रहा है (भीष्मपर्व 3/11/19) इसी अध्याय में आगे (श्लोक 27,28) और भी लिखा है कि वर्षपर्यन्त एक ही राशि पर रहने वाले दो प्रकाशमान ग्रह बृहस्पति और शनि तिर्यग्वेध के द्वारा विशाखा के समीप पहुँच गए हैं | प्रायः पक्ष 14 से 16 दिनों के होते हैं, किन्तु इस समय तेरह दिन का ही पक्ष हो रहा है | और एक ही मास में एक ही दिन त्रयोदशी को चन्द्र और सूर्य का ग्रहण हो रहा है | यह स्थिति भयंकर वर्षा व उत्पातों की सूचक है | इसी अध्याय में आगे (श्लोक 31) यह भी बताया गया है कि अश्विनी से लेकर सभी नक्षत्रों को तीन भागों में बाँटने पर जो नौ नौ नक्षत्रों के तीन समुदाय होते हैं वे क्रमशः अश्वपति, गजपति तथा नरपति के छत्र कहलाते हैं | अर्थात अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य और आश्लेषा इन नौ नक्षत्रों का समूह अश्वपति के अन्तर्गत, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा का वर्ग गजपति के अन्तर्गत, तथा मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषज, पूर्वा भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती नक्षत्रों का समूह नरपति के छत्र के अन्तर्गत आता है | ये सब अथवा इनमें से कोई भी जब पापग्रहों से आक्रान्त होते हैं तो क्षत्रियों के विनाश के सूचक होते हैं और इन्हें नक्षत्र-नक्षत्र कहा जाता है | इन तीनों समुदायों अथवा सम्पूर्ण नक्षत्र-नक्षत्रों में यदि शीर्ष स्थान पर वेध हो तो वह ग्रह महान उत्पातकारक होगा |

अस्तु, हमारे प्राचीन इतिहास ग्रन्थों में ज्योतिष का इतना विशद विवेचन यही इंगित करता है कि उस समय न केवल धर्माचार्य, अपितु जनसाधारण भी ज्योतिष में रूचि और ज्योतिष का ज्ञान रखते थे | और ज्योतिष का प्रयोग केवल मनुष्यों के लिए फलकथन तक ही सीमित नहीं था, वरन युद्ध, वर्षा, आँधी, तूफ़ान अदि के विषय में मनुष्यों को पहले से ही चेतावनी देने के लिए भी ज्योतिष का प्रयोग किया जाता था | और बाढ़ या सूखे आदि से होने वाली तबाही से काफी हद तक बचने का प्रयास किया जाता था और साथ ही शान्ति विधान आदि के लिए उपयोगी पूजा पाठ आदि का विधान भी बताया जाता था | महाभारत के ही अनुशासन पर्व के चौसठवें अध्याय में समस्त नक्षत्रों की सूची दी गई है तथा यह बताया गया है कि किस नक्षत्र में दानादि करने से किस प्रकार का पुण्य प्राप्त होता है | भीष्मपर्व में उत्तरायण और दक्षिणायन में मृत्यु के फल बताए गए हैं | सत्ताईस नक्षत्रों के सत्ताईस देवता तथा उन देवताओं के स्वरूप और स्वभाव के अनुसार उन पर प्रकाश डाला गया है | साथ ही एक तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है कि उस समय ग्रहों के साथ साथ नक्षत्रों का सबसे अधिक महत्त्व था | या यों कहिये कि उस समय ज्योतिष नक्षत्र प्रधान था |

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नक्षत्र – एक विश्लेषण

पौराणिक ग्रन्थों जैसे रामायण में नक्षत्र विषयक सन्दर्भ

वेदांग ज्योतिष के प्रतिनिधि ग्रन्थ दो वेदों से सम्बन्ध रखने वाले उपलब्ध होते हैं | एक याजुष् ज्योतिष – जिसका सम्बन्ध यजुर्वेद से है | दूसरा आर्च ज्योतिष – जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद से है | इन दोनों ही ग्रन्थों में वैदिककालीन ज्योतिष का समग्र वर्णन उपलब्ध होता है | बाद में यज्ञ भाग के विविध विधानों के साथ साथ दैनिक जीवन में भी ज्योतिष का महत्त्व वैदिक काल में ही जनसामान्य को मान्य हो गया था | परवर्ती ब्राहमण और संहिता काल में तो अनेक विख्यात ज्योतिषाचार्यों का वर्णन तथा रचनाएँ हमें उपलब्ध होती ही हैं | जिनमें पाराशर, गर्ग, वाराहमिहिर, आदिभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य तथा कमलाकर जैसे ज्योतिर्विदों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं | ज्योतिषीय गणना का मूलाधार वाराहमिहिर का सूर्य सिद्धान्त ही है |

परवर्ती साहित्य और इतिहास में यदि हम रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थों का अध्ययन करें तो यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आता है कि उस काल में भी प्रत्येक आचार्य ज्योतिषाचार्य अवश्य होते थे | इन दोनों ही इतिहास ग्रन्थों में ज्योतिषीय आधार पर फल कथन यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं | भगवान् राम की जन्मपत्री बनाकर उनके भविष्य का फलकथन आचार्यों ने किया था | श्री राम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में हुआ था | उस समय सूर्य मेष में दशम भाव में, मंगल मकर में सप्तम में, शनि तुला में चतुर्थ में, गुरु कर्क में लग्न में, और शुक्र मीन का होकर नवम भाव में – इस प्रकार ये पाँच ग्रह अपनी अपनी उच्च राशियों में विराजमान थे | लग्न में गुरु के साथ चन्द्रमा भी था…

…….. चैत्रे नावमिके तिथौ ||

नक्षत्रेSदितिदैवत्ये सवोच्चसंस्थेषु पञ्चसु |

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ||… वा. रा. बालकाण्ड 18/8,9

भरत का जन्म पुष्य नक्षत्र और मीन लग्न में हुआ था | लक्षमण और शत्रुघ्न आश्लेषा नक्षत्र और करके लग्न में पैदा हुए थे | उस समय सूर्य भी अपनी उच्च राशि में विद्यमान थे |

पुण्ये जातस्तु भरतो मीनलग्ने प्रसन्नधी: |

सर्पे जातौ तु सौमित्री कुलीरेSभ्युदिते रवौ ||… वा. रा. बालकाण्ड 18/15

साथ ही यह भी कहा गया है कि ये चारों भाई दोनों भाद्रपद नक्षत्रों के चारों तारों के समान कान्तिमान थे (वा. रा. बालकाण्ड 18/16)

श्री राम व उनके तीनों भाइयों के विवाह का मुहूर्त बताते हुए महर्षि वशिष्ठ कहते हैं…

उत्तरे दिवसे ब्रह्मन् फल्गुनीभ्यां मनीषिण: |

वैवाहिकं प्रशंसन्ति भगो यत्र प्रजापतिः ||… वा रा. बालकाण्ड 72/13

अर्थात, आने वाले दो दिन दोनों फाल्गुनी नक्षत्रों से युक्त हैं | जिनके देवता प्रजापति भग हैं | विद्वानों ने इस नक्षत्र में किया गया वैवाहिक कर्म सबसे अधिक उत्तम माना है |

राम के राज्याभिषेक के लिए राजा दशरथ बहुत चिन्तित थे | क्योंकि ऋषियों ने कुछ इस प्रकार की भविष्यवाणियाँ की थीं जिनके अनुसार राज्याभिषेक में बाधा पड़ सकती थी | इसीलिए दशरथ चाहते थे कि भरत के ननिहाल से आने से पहले ही राम का राज्याभिषेक हो जाए तो अच्छा है (वा. रा. अयोध्याकाण्ड 4/18,25) इसी प्रकार अयोध्याकाण्ड ही 41वें सर्ग में राम के वनगमन के समय उत्पातकालिक ग्रह स्थिति का वर्णन भी देखने योग्य है | श्री राम जब अयोध्या से जा रहे थे उस समय छह ग्रह वक्री होकर एक ही स्थान पर स्थित थे |

त्रिशंकुर्लोहितांगश्च बृहस्पतिबुधावपि |

दारुणा: सोममभ्येत्य ग्रहा: सर्वे व्यवस्थिता: || वा. रा. अयोध्याकाण्ड 41/11

इसी प्रकार युद्धकाण्ड में रावण मरण के समय की ग्रहस्थिति भी दर्शनीय है | राम रावण युद्ध के समय की ग्रहस्थिति का कलात्मक वर्णन देखते ही बनता है | श्री राम रूपी चन्द्रमा को रावण रूपी राहु से ग्रस्त हुआ देखकर बुध से रहा नहीं गया और वह भी चन्द्रप्रिया रोहिणी नामक नक्षत्र पर जा बैठा | यह स्थिति प्रजा के लिए अहितकर थी | सूर्य की किरणें मन्द हो गई थीं | सूर्यदेव अत्यन्त प्रखर कबन्ध के चिह्न से युक्त धूमकेतु नामक उत्पात ग्रह से संसक्त दिखाई दे रहे थे | आकाश में इक्ष्वाकु वंश के नक्षत्र विशाखा पर – जिसके कि देवता इन्द्र और अग्नि हैं – मंगलदेव विराजमान थे (वा. रा. युद्धकाण्ड 102/32-35) यहाँ एक यह बात भी स्पष्ट दिखाई दे रही है कि उस समय किसी भी वंश का मुखिया जिस नक्षत्र में जन्म लेता होगा सम्भवतः वह नक्षत्र समस्त परिवार के लिए पूज्य हो जाता होगा | इसीलिए विशाखा नक्षत्र को इक्ष्वाकु वंश का नक्षत्र बताया गया है | ये सभी इस बात के ज्वलन्त प्रमाण हैं कि उस काल में ज्योतिष शास्त्र को परम प्रमाण माना जाता था |

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