Category Archives: Vedic Astrology

शुक्र का कन्या राशि में गोचर

कल श्रावण कृष्ण पञ्चमी को कौलव करण और अतिगण्ड योग में 12:27 के लगभग समस्त सांसारिक सुख, समृद्धि, विवाह, परिवार सुख, कला, शिल्प, सौन्दर्य, बौद्धिकता, राजनीति तथा समाज में मान प्रतिष्ठा में वृद्धि आदि का कारक शुक्र शत्रु ग्रह सूर्य की सिंह राशि से निकल कर मित्र ग्रह बुध की कन्या राशि में प्रविष्ट हो जाएगा | इस प्रस्थान के समय शुक्र उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में होगा | यहाँ से 11 अगस्त को हस्त नक्षत्र और 25 अगस्त को चित्रा नक्षत्र में भ्रमण करते हुए पहली सितम्बर को 23:27 के लगभग अपनी राशि तुला में प्रवेश कर जाएगा | उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र का स्वामी सूर्य, हस्त का नक्षत्र का स्वामी चन्द्रमा तथा चित्रा नक्षत्र का स्वामी ग्रह मंगल है | आइये जानने का प्रयास करते हैं कि प्रत्येक राशि के लिए शुक्र के कन्या राशि में गोचर के सम्भावित परिणाम क्या रह सकते हैं…

मेष : शुक्र आपका द्वितीयेश और सप्तमेश होकर आपके छठे भाव में गोचर करने जा रहा है | एक ओर आपके उत्साह और मनोबल में वृद्धि के संकेत हैं तो वहीं दूसरी ओर आपके लिए यह गोचर चुनौतियों से भरा प्रतीत होता है | उन मित्रों को पहचानकर उनसे दूर होने की आवश्यकता है जो आपसे प्रेम दिखाते हैं लेकिन मन में ईर्ष्या का भाव रखते हैं | पार्टनरशिप में कोई व्यवसाय है तो उसमें व्यवधान उत्पन्न हो सकता है | प्रेम सम्बन्धों और वैवाहिक जीवन में किसी प्रकार की दरार के संकेत हैं | किन्तु यदि आप कलाकार अथवा वक्ता हैं तो आपके कार्य की दृष्टि से अनुकूल समय प्रतीत होता है | किसी कोर्ट केस का निर्णय आपके पक्ष में आ सकता है |

वृषभ : आपका राश्यधिपति तथा षष्ठेश होकर शुक्र आपके पंचम भाव में गोचर कर रहा है | सन्तान के साथ यदि कुछ समय से किसी प्रकार की अनबन चल रही है तो उसके दूर होने की सम्भावना इस अवधि में की जा सकती है | मान सम्मान में वृद्धि के संकेत हैं | नौकरी के लिए इन्टरव्यू दिया है तो उसमें भी सफलता की सम्भावना है | सन्तान के लिए भी यह गोचर समय अनुकूल प्रतीत होता है | आपके व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन होने की सम्भावना है |

मिथुन : आपका पंचमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से चतुर्थ भाव में हो रहा है | उत्साह में वृद्धि का समय प्रतीत होता है | आप कोई नया वाहन अथवा घर खरीदने की योजना बना सकते हैं | किन्तु परिवार में किसी प्रकार के तनाव की भी समभावना है | स्वास्थ्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | किन्तु महिलाओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है | आपके तथा आपकी सन्तान की विदेश यात्राओं में भी वृद्धि हो सकती है |

कर्क : आपका चतुर्थेश और एकादशेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से तीसरे  भाव में हो रहा है | आपके मित्रों तथा सम्बन्धियों में वृद्धि के योग हैं | भाई बहनों तथा सहकर्मियों के साथ सम्बन्धों में माधुर्य बना रहने की सम्भावना है | आपकी किसी बहन का विवाह भी इस अवधि में सम्भव है | आर्थिक स्थिति में दृढ़ता के संकेत हैं | किसी महिला मित्र के माध्याम से धन प्राप्ति के भी योग बन रहे हैं | प्रॉपर्टी अथवा वाहनों की खरीद फरोख्त में लाभ की सम्भावना है |

सिंह : आपका तृतीयेश और दशमेश होकर शुक्र का गोचर आपकी राशि से दूसरे भाव में हो रहा है | आपकी वाणी तथा व्यक्तित्व में निखार आने के साथ ही आपको किसी प्रकार का पुरूस्कार आदि भी प्राप्त हो सकता है | यदि आप दस्कार हैं, कलाकार हैं अथवा सौन्दर्य प्रसाधनों से सम्बन्धित कोई कार्य आपका है, या मीडिया से किसी प्रकार सम्बद्ध हैं तो आपके कार्य की प्रशंसा के साथ ही आपको कुछ नए प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त होने की सम्भावना है | इन प्रोजेक्ट्स के कारण आप बहुत दीर्घ समय तक व्यस्त रह सकते हैं तथा अर्थ लाभ कर सकते हैं |

कन्या : आपका द्वितीयेश और भाग्येश होकर शुक्र आपकी राशि में ही गोचर कर रहा है | आर्थिक रूप से स्थिति में दृढ़ता आने के साथ ही आपके लिए कार्य से सम्बन्धित लम्बी विदेश यात्राओं के योग भी प्रतीत होते हैं | आपको कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स भी प्राप्त हो सकते हैं जिनके कारण आप बहुत समय तक व्यस्त रह सकते हैं | आपकी वाणी तथा व्यक्तित्व ऐसा है कि लोग स्वयं ही आपकी ओर आकर्षित हो जाते हैं | धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि में वृद्धि हो सकती है |

तुला : लग्नेश और अष्टमेश होकर शुक्र आपकी राशि से बारहवें भाव में गोचर कर रहा है | स्वास्थ्य की दृष्टि से यह गोचर अनुकूल नहीं प्रतीत होता | लम्बी विदेश यात्राओं के योग हैं, किन्तु इन यात्राओं के दौरान आपको अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने की तथा दुर्घटना आदि के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है | साथ ही ऐसा कोई कार्य न करें जिसके कारण आपके मान सम्मान की हानि होने की सम्भावना है |

वृश्चिक : आपके लिए आपका सप्तमेश और द्वादशेश होकर शुक्र का गोचर आपके लाभ स्थान में हो रहा है | कार्य से सम्बन्धित यात्राओं में वृद्धि के साथ ही आर्थिक स्थिति में दृढ़ता के भी संकेत हैं | आप अपने जीवन साथी के साथ कहीं देशाटन के लिए भी जा सकते हैं | आपको अपने मित्रों तथा बड़े भाई का सहयोग प्राप्त होता रहेगा | सामाजिक गतिविधियों में वृद्धि के भी संकेत हैं | यदि किसी प्रेम सम्बन्ध में हैं तो वह विवाह में परिणत हो सकता है | दाम्पत्य जीवन में अन्तरंगता के संकेत हैं |

धनु : आपका षष्ठेश और एकादशेश आपकी राशि से दशम भाव में गोचर कर रहा है | उत्साह में वृद्धि के संकेत हैं | यदि आपका कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसके अनुकूल दिशा में प्रगति की सम्भावना है | यदि आप किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो उसमें भी आपको सफलता प्राप्त हो सकती है | किन्तु साथ ही विरोधियों की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | किसी बात पर भाई बहनों अथवा बॉस के साथ कोई विवाद भी उत्पन्न हो सकता है | अपने आचरण से थोड़ा Diplomatic होने की आवश्यकता है | साथ ही स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है | पैसे के लेन देन के समय सावधान रहें |

मकर : आपका योगकारक आपकी राशि से नवम भाव में गोचर कर रहा है | आपके कार्य में हर प्रकार से लाभ के संकेत हैं | नौकरी में हैं तो पदोन्नति के साथ स्थानान्तरण के भी संकेत हैं | आपका अपना व्यवसाय है तो उसमें भी प्रगति की सम्भावना है | कलाकारों को किसी प्रकार का पुरूस्कार आदि भी प्राप्त हो सकता है | परिवार में धार्मिक अथवा माँगलिक कार्यों के आयोजनों की सम्भावना है | सामाजिक गतिविधियों में वृद्धि के साथ ही मान प्रतिष्ठा में वृद्धि के भी संकेत हैं | लम्बी दूरी की यात्राओं के भी योग हैं |

कुम्भ : आपका योगकारक शुक्र आपकी राशि से अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | परिवार में अप्रत्याशित रूप से किसी विवाद के उत्पन्न होने की सम्भावना है | किन्तु साथ ही भौतिक सुख सुविधाओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | आपको किसी वसीयत के माध्यम से प्रॉपर्टी अथवा वाहन का लाभ भी हो सकता है | यदि आप स्वयं कोई प्रॉपर्टी अथवा वाहन खरीदना चाहते हैं तो इस विचार को अभी कुछ समय के लिए स्थगित करना ही हित में होगा | परिवार में माँगलिक आयोजन जैसे किसी का विवाह आदि हो सकते हैं जिनके कारण परिवार में उत्सव का वातावरण बन सकता है | साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में आपकी रूचि बढ़ सकती है | मन की भावनाओं पर नियन्त्रण रखने की आवश्यकता है |

मीन : आपके लिए तृतीयेश और अष्टमेश होकर शुक्र का गोचर आपके सप्तम भाव में हो रहा है | छोटे भाई बहनों के कारण जीवन साथी के साथ किसी प्रकार का विवाद सम्भव है | आप स्वयं भी इस दौरान ऐसा कोई कार्य न करें जिसके कारान आपकी मान प्रतिष्ठा को किसी प्रकार की हानि होने की सम्भावना हो | कार्यक्षेत्र में आपको कठिन परिश्रम करना पड़ सकता है | अपने, भाई बहनों के तथा जीवन सतही के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है |

किन्तु ध्यान रहे, ये समस्त फल सामान्य हैं | व्यक्ति विशेष की कुण्डली का व्यापक अध्ययन करके ही किसी निश्चित परिणाम पर पहुँचा जा सकता है | अतः कुण्डली का विविध सूत्रों के आधार पर व्यापक अध्ययन कराने के लिए किसी Astrologer के पास ही जाना उचित रहेगा |

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देवशयनी एकादशी

देवशयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी, पद्मनाभा एकादशी

हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्त्व है | प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती है, और अधिमास हो जाने पर ये छब्बीस हो जाती हैं | इनमें से आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है | इस एकादशी को पद्मनाभा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है | तथा उसके लगभग चार माह बाद सूर्य के तुला राशि में आ जाने पर आने वाली कार्तिक शुक्ल एकादशी देव प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है |

“आषाढ़ शुक्लपक्षे तु शयनी हरिवासर: |

दीपदानेन पलाशपत्रे भुक्त्याव्रतेन च

चातुर्मास्यं नयन्तीह ते नरा मम वल्लभा: ||” – पद्मपुराण उत्तरखण्ड / 54/24, 32

मान्यता है कि इन चार महीनों में – जिन्हें चातुर्मास कीं संज्ञा दी गई है – भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन हेतु प्रस्थान कर जाते हैं | भगवान विष्णु की इस निद्रा को योग निद्रा भी कहा जाता है | इस अवधि में यज्ञोपवीत, विवाह, गृह प्रवेश आदि संस्कार वर्जित होते हैं |

भारतीय संस्कृति में व्रतादि का विधान पूर्ण वैज्ञानिक आधार पर मौसम और प्रकृति को ध्यान में रखकर किया गया है | चातुर्मास अर्थात आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर श्रावण, भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीने वर्षा के माने जाते हैं | भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए वर्षा के ये चार महीने कृषि के लिए बहुत उत्तम माने गए हैं | किसान विवाह आदि समस्त सामाजिक उत्तरदायित्वों से मुक्त रहकर इस अवधि में पूर्ण मनोयोग से कृषि कार्य कर सकता था | आवागमन के साधन भी उन दिनों इतने अच्छे नहीं थे | साथ ही चौमासे के कारण सूर्य चन्द्र से प्राप्त होने वाली ऊर्जा भी मन्द हो जाने से जीवों की पाचक अग्नि भी मन्द पड़ जाती है | अस्तु, इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए जो व्यक्ति इन चार महीनों में जहाँ होता था वहीं रहकर अध्ययन अध्यापन करते हुए आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता था तथा खान पान पर नियन्त्रण रखता था ताकि पाचन तन्त्र उचित रूप से कार्य कर सके | और वर्षा ऋतु बीत जाते ही देव प्रबोधिनी एकादशी से समस्त कार्य पूर्ववत आरम्भ हो जाते थे |

सुप्तेत्वयिजगन्नाथ जगत्सुप्तंभवेदिदम् । विबुद्धेत्वयिबुध्येतजगत्सर्वचराचरम् ॥

हे जगन्नाथ ! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सो जाता है तथा आपके जागने पर समस्त चराचर पुनः जागृत हो जाता है तथा फिर से इसके समस्त कर्म पूर्ववत आरम्भ हो जाते हैं…

आज देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास का आरम्भ हो रहा है… देवशयनी एकादशी सभी के लिए शुभ हो और चातुर्मास में सभी अपने अपने कर्तव्य धर्म का सहर्ष पालन करें… यही शुभकामना अपने साथ ही सभी के लिए… पूरा पढ़ने के लिए क्लिक करें…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/23/devashayani-ekadashi/

 

नक्षत्र – एक विश्लेषण

हम सभी जानते हैं कि ज्योतिष एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और सम सामयिक विषय है | वेदांगों के अन्तर्गत ज्योतिष को अन्तिम वेदान्त माना गया है | प्रथम वेदांग है शिक्षा – जिसे वेद की नासिका माना गया है | दूसरा वेदांग है व्याकरण जिसे वेद का मुख माना जाता है | तीसरे वेदांग निरुक्त को वेदों का कान, कल्प को हाथ, छन्द को चरण और ज्योतिष को वेदों का नेत्र माना जाता है |

वेद की प्रवृत्ति यज्ञों के सम्पादन के निमित्त हुई थी | और यज्ञों का सम्पादन विशेष मुहूर्त में ही सम्भव है | इसी समय विशेष के निर्धारण के लिए ज्योतिष की आवश्यकता प्रतीत हुई | और इस प्रकार ग्रह नक्षत्रों से सम्बन्धित ज्ञान ही ज्योतिष कहलाया | नक्षत्र, तिथि, पक्ष, मास, ऋतु तथा सम्वत्सर – काल के इन समस्त खण्डों के साथ यज्ञों का निर्देश वेदों में उपलब्ध है | वास्तव में तो वैदिक साहित्य के रचनाकाल में ही भारतीय ज्योतिष पूर्णरूप से अस्तित्व में आ चुका था | सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में इसके प्रमाण इधर उधर बिखरे पड़े हैं | हमारे ऋषि मुनि किस प्रकार समस्त ग्रहों नक्षत्रों से अपने और समाज के लिए मंगल कामना करते थे इसी का ज्वलन्त उदाहरण है प्रस्तुत मन्त्र:

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: |

स्वस्ति न तार्क्ष्योSरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ||

प्रस्तुत मन्त्र में राशि चक्र के समान चार भाग करके परिधि पर समान दूरी वाले चारों बिन्दुओं पर पड़ने वाले नक्षत्रों से अपने व समस्त संसार के कल्याण की कामना इन ऋषि मुनियों ने की है | इन्द्र से चित्रा का, पूषा से रेवती का, तार्क्ष्य से श्रवण का तथा बृहस्पति से पुष्य नक्षत्रों का ग्रहण किया गया है | चित्रा का अन्तिम भाग कन्या राशि के अन्त पर और रेवती का अन्तिम भाग मीन राशि के अन्त पर 180 अंश का कोण बनाते हैं | यही स्थिति श्रवण व पुष्य नक्षत्रों की मकर व कर्क राशियों में है |

तैत्तिरीय शाखा के अनुसार चित्रा नक्षत्र का स्वामी इन्द्र को माना गया है | भारत में प्राचीन काल में नक्षत्रों के जो स्वरूप माने जाते थे उनके अनुसार चित्रा नक्षत्र का स्वरूप लम्बे कानों वाले उल्लू के जैसा माना गया है | अतः इन्द्र का नाम वृद्धश्रवा भी है | जो सम्भवतः इसलिए भी है कि इन्द्र को लम्बे कानों वाले चित्रा नक्षत्र का अधिपति माना गया है | अतः यहाँ वृद्धश्रवा का अभिप्राय चित्रा नक्षत्र से ही है | पूषा का नक्षत्र रेवती तो सर्वसम्मत ही है | तार्क्ष्य शब्द से अभिप्राय श्रवण से है | श्रवण नक्षत्र में तीन तारे होते हैं | तीन तारों का समूह तृक्ष तथा उसका अधिपति तार्क्ष्य | तार्क्ष्य को गरुड़ का विशेषण भी माना गया है | और इस प्रकार तार्क्ष्य उन विष्णु भगवान का भी पर्याय हो गया जिनका वाहन गरुड़ है | अरिष्टनेमि अर्थात कष्टों को दूर करने वाला सुदर्शन चक्र – भगवान विष्णु का अस्त्र | पुष्य नक्षत्र का स्वामी देवगुरु बृहस्पति को माना गया है | विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में नक्षत्र पुरुष का विस्तृत वर्णन मिलता है | उसके अनुसार भगवान विष्णु ने अपने शरीर के ही अंगों से अभिजित सहित 28 नक्षत्रों की उत्पत्ति की और बाद में दयावश अपने ही शरीर में रहने के लिए स्थान भी दे दिया | बृहत्संहिता में भी इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/19/constellation-nakshatras-2/

नक्षत्र

ज्योतिष से सम्बन्धित अपने लेखों में हम अब तक बहुत से योगों पर चर्चा कर चुके हैं | ग्रहों के विषय में संक्षिप्त रूप से चर्चा | हमने पञ्चांग के पाँचों अंगों के विषय में जानने का प्रयास किया | संस्कारों पर – विशेष रूप से जन्म से पूर्व के संस्कार और जन्म के बाद नामकरण संस्कार पर चर्चा की | आज से उन्हीं संस्कारों के मुहूर्त निर्णय के लिए आवश्यक तथा पञ्चांग के पाँचों अंगों में सबसे महत्त्वपूर्ण अंग “नक्षत्र” पर विस्तार से प्रकाश डालने का प्रयास आरम्भ करते हैं… “आरम्भ” इसलिए, क्योंकि विषय लम्बा है, जिसमें बहुत समय लग सकता है…

संस्कारों के विषय में बात करते हुए हमने गर्भाधान संस्कार से नामकरण संस्कार तक छह संस्कारों के विषय में बात की | इनमें से कुछ संस्कार गर्भ से पूर्व सम्पन्न किये जाते हैं, कुछ गर्भ की अवस्था में और कुछ शिशु के जन्म लेने के बाद | इनके बाद जीवन भर – पुनर्जन्म की यात्रा आरम्भ करने तक अन्य दस संस्कारों का विधान वैदिक हिन्दू परपरा में है | इनमें गर्भाधान और जातकर्म को यदि छोड़ दें तो शेष संस्कारों में मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है | यद्यपि आजकल तो बहुत से लोग जातकर्म के लिए ज्योतिषी – Astrologer – से मुहूर्त निश्चित कराने लगे हैं | हमारी कुछ मित्रों से ज्ञात हुआ कि उनकी सन्तान का जन्म ज्योतिषी द्वारा बताए गए समय पर सर्जरी के द्वारा कराया गया | उन्हें लगता है कि पहले एक बहुत अच्छी सी जन्मकुण्डली बनवा ली जाए और जब वो कुण्डली बन जाए तो उसके समय पर ही बच्चे को सर्जरी के द्वारा जन्म दे दिया जाए तो सन्तान निश्चित रूप से वैसी ही उत्पन्न होगी जैसी वे लोग चाहते हैं | उन लोगों ने जब बच्चे के जन्म से पूर्व उसके जन्म का समय निश्चित करके कुण्डली बनवाई थी तो उसके अनुसार बच्चा अत्यन्त भाग्यशाली, तीव्र बुद्धि तथा और भी बहुत से सद्गुणों से युक्त होना चाहिए था | किन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका और बच्चे का स्वभाव तथा भाग्य उस जन्मपत्री से बिल्कुल विपरीत ही निकला |

ईश्वर ने कुछ कार्यों – विशेष रूप से जन्म और मृत्यु के लिए जो समय निश्चित किया है उसमें यदि व्यवधान डाला जाएगा तो ऐसा ही होगा | बच्चे का जन्म स्वाभाविक रूप से किसी और समय होना चाहिए था – क्योंकि गर्भस्थ आत्मा ने अपनी माता का चयन करने के साथ ही संसार में प्रवेश के लिए कोई समय निश्चित किया हुआ था | किन्तु मनुष्य के हस्तक्षेप के कारण उसे किसी अन्य समय संसार में प्रविष्ट होना पड़ा | ऐसा करके उसका भाग्य तो नहीं बदला जा सकता न ? बहरहाल, ये एक विस्तृत चर्चा का विषय है | यहाँ हम बात कर रहे हैं संस्कारों में मुहूर्त के महत्त्व की | प्रत्येक संस्कार एक निश्चित और शुभ मुहूर्त में किया जाए तो निश्चित रूप से उसका परिणाम अनुकूल ही होगा | किन्तु अन्धविश्वास कहीं भी नहीं होना चाहिए | मुहूर्त निश्चित करने में नक्षत्रों की विशेष भूमिका होती है | अस्तु, अपने अगले लेख से हम वार्ता आरम्भ करेंगे नक्षत्रो के विषय में…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/18/constellation-nakshatras/

सूर्य का कर्क में गोचर – कर्क संक्रान्ति

आज यानी 16 जुलाई को 22:27 के लगभग सूर्यदेव अपने मित्र ग्रह चन्द्र की कर्क राशि में प्रस्थान कर जाएँगे | जहाँ 17 अगस्त को 06:50 तक भ्रमण करने के पश्चात अपनी स्वयं की राशि सिंह और मघा नक्षत्र में प्रविष्ट हो जाएँगे | कर्क राशि में भ्रमण करते हुए कुछ दिन इन्हें बुध का साथ मिलेगा | साथ ही इस पूरे माह कर्क राशि में राहु का साथ और मंगल तथा केतु की दृष्टि में रहेंगे | जिनमें मंगल सूर्य का मित्र ग्रह है | अपनी इस यात्रा के दौरान सूर्य अभी पुनर्वसु नक्षत्र पर है, जहाँ से 20 जुलाई को पुष्य तथा 3 अगस्त को आश्लेषा पर चले जाएँगे | कर्क राशि सूर्य की अपनी राशि सिंह से बारहवाँ भाव है और सूर्य की उच्च राशि मेष से चतुर्थ भाव है |

कर्क संक्रान्ति का महत्त्व मकर संक्रान्ति के समान ही होता है | आज से भगवान् भास्कर दक्षिण दिशा की अपनी यात्रा आरम्भ कर देंगे और छह माह बाद मकर संक्रान्ति पर पुनः उत्तर दिशा की यात्रा आरम्भ कर देंगे | कर्क संक्रान्ति को श्रवण संक्रान्ति अथवा सावन संक्रान्ति भी कहा जाता है | आज सूर्य के कर्क में संक्रमण के समय आषाढ़ शुक्ल पञ्चमी तिथि, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र, बव करण और वरीयान योग होगा | कर्क संक्रान्ति से दिन की अवधि घटती जाती है और रात्रि की अवधि में वृद्धि होती जाती है | शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात माना गया है | इसी कारण वैदिक काल से ही उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता है | चातुर्मास अथवा चौमासा और श्राद्ध पक्ष भी इसी अवधि में आते हैं | संक्रान्ति काल में सूर्य, भगवान् विष्णु तथा शिव की पूजा अर्चना का विशेष महत्त्व माना जाता है |

तो जानने का प्रयास करते हैं कर्क राशि में सूर्य के संक्रमण के जनसाधारण पर क्या सम्भावित प्रभाव हो सकते हैं…

मेष : आपका पंचमेश आपकी राशि से चतुर्थ भाव में प्रवेश करेगा | आपके लिए यह गोचर अनुकूल प्रतीत होता है | परिवार में उत्सव, मंगल कार्य आदि की सम्भावना है | ये गोचर आपके तथा आपकी सन्तान दोनों के ही लिए अनुकूल प्रतीत होता है | साथ ही आपकी सन्तान की ओर से भी आपको शुभ समाचार प्राप्त हो सकते हैं | किन्तु परिवार में – विशेष रूप से सन्तान अथवा पिता के साथ – किसी प्रकार का व्यर्थ का विवाद भी सम्भव है | इससे बचने के लिए अपने Temperament में सुधार की आवश्यकता है |

वृषभ : आपकी राशि से चतुर्थेश का गोचर आपके तृतीय भाव में हो रहा है | एक ओर कहाँ आत्मविश्वास में वृद्धि के संकेत हैं वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों को अपने कार्य अथवा स्वयं की योग्यता को लेकर सन्देह भी हो सकता है | भाई बहनों के साथ किसी प्रकार का विवाद भी सम्भव है, किन्तु पिता अथवा परिवार के किसी बुज़ुर्ग की मध्यस्थता से आप उस विवाद को सुलझा सकते हैं |

मिथुन : आपकी राशि से तृतीयेश का गोचर दूसरे भाव में हो रहा है | भाई बहनों के साथ सम्बन्धों में प्रगाढ़ता के संकेत तो हैं किन्तु साथ ही किसी बात पर कोई विवाद भी उत्पन्न हो सकता है जिसके कारण आपको किसी प्रकार का मानसिक कष्ट भी हो सकता है | अतः किसी भी विवाद को बढ़ने न देने का प्रयास करना आपके हित में होगा | तनाव के कारण आपको माइग्रेन आदि की समस्या भी सम्भव है |

कर्क : द्वितीयेश का गोचर लग्न में हो रहा है | मित्र ग्रह की राशि है किन्तु अशुभ प्रभाव में भी है | एक ओर जहाँ कार्य के सिलसिले में विदेश यात्राएँ करनी पड़ सकती हैं | इन यात्राओं में एक ओर जहाँ अर्थलाभ की आशा की जा सकती है वहीं दूसरी ओर अपने तथा जीवन साथी के स्वास्थ्य की ओर से भी सावधान रहने की आवश्यकता है | पिता के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है |

सिंह : आपके राश्यधिपति का आपके बारहवें भाव में गोचर कर रहा है | आपको कहीं बाहर से कुछ नवीन प्रोजेक्ट्स आपको प्राप्त हो सकते हैं जो लम्बे समय तक आपको व्यस्त रखते हुए धनलाभ कराने में सक्षम होंगे | साथ ही नौकरी में प्रमोशन, मान सम्मान में वृद्धि तथा व्यवसाय में उन्नति के भी संकेत हैं | परिवार, मित्रों, बड़े भाई, पिता तथा अधिकारियों का सहयोग भी प्राप्त रहेगा | किन्तु आपको अपनी वाणी और व्यवहार पर संयम रखने की आवश्यकता है |

कन्या : आपका द्वादशेश आपके लाभ स्थान में गोचर कर रहा है | निश्चित रूप से कार्य की दृष्टि से समय अत्यन्त उत्साहवर्द्धक प्रतीत होता है | यदि आपके कार्य का सम्बन्ध विदेशों से है तब तो आपके लिए विशेष रूप से उत्साहवर्द्धक समय प्रतीत होता है | साथ ही कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं में वृद्धि की भी सम्भावना है | सन्तान अथवा पिता के साथ ब्यर्थ के विवाद से बचने की आवश्यकता है |

तुला : आपका एकादशेश आपके कर्म स्थान में गोचर कर रहा है | कार्य की दृष्टि से भाग्यवर्द्धक समय प्रतीत होता है | नौकरी में पदोन्नति की सम्भावना है | अपने स्वयं के व्यवसाय में भी वृद्धि की सम्भावना है | किन्तु परिवार के सदस्यों, पिता अथवा सहकर्मियों के साथ अपना व्यवहार यदि विनम्र नहीं रखा तो व्यर्थ का विवाद उत्पन्न हो सकता है |

वृश्चिक : आपकी राशि से दशमेश आपके भाग्य स्थान में गोचर कर रहा है | कार्य तथा आर्थिक दृष्टि से समय अनुकूल प्रतीत होता है | कार्य से सम्बन्धित विदेश यात्राओं के भी योग हैं | कार्य में अप्रत्याशित लाभ की भी सम्भावना है | धार्मिक तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में रूचि में वृद्धि की भी सम्भावना है |

धनु : आपका भाग्येश आपके अष्टम भाव में गोचर कर रहा है | कार्य में उन्नति के संकेत हैं | किन्तु अकारण ही मानसिक तनाव की समस्या भी हो सकती है | गुप्त शत्रुओं से सावधान रहने की आवश्यकता है | रहस्य विद्यायों जैसे ज्योतिष आदि तथा धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में वृद्धि भी इस अवधि में हो सकती है | स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है |

मकर : आपका अष्टमेश सप्तम भाव में गोचर कर रहा है | मिश्रित फलों की सम्भावना है | पार्टनरशिप में कोई कार्य है तो उसमें किसी ग़लतफ़हमी के कारण व्यवधान भी उत्पन्न हो सकता है | साथ ही किसी अप्रत्याशित स्रोत से कार्य में लाभ की भी सम्भावना है | अपना तथा अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की भी आवश्यकता है |

कुम्भ : आपके लिए यह गोचर उतना अनुकूल नहीं प्रतीत होता | दाम्पत्य जीवन अथवा प्रेम सम्बन्धों में तनाव के संकेत प्रतीत होते हैं | किसी कोर्ट केस के कारण भी तनाव हो सकता है | सन्तान अथवा छोटे भाई बहनों के साथ भी कोई विवाद बड़ा रूप ले सकता है | अच्छा यही रहेगा इस समय किसी बहस में न पड़कर शान्तिपूर्वक समय आनुकूल होने की प्रतीक्षा करें |

मीन : षष्ठेश का पंचम भाव में गोचर है | एक ओर आपके आत्मविश्वास में वृद्धि तथा नौकरी में पदोन्नति के संकेत हैं | वहीं दूसरी ओर सन्तान अथवा परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ अकारण ही बहस भी हो सकती है | यदि आप पॉलिटिक्स में हैं तो आपको कोई पद प्राप्त होने की सम्भावना है | यदि किसी प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा है तो वह आपके पक्ष में आ सकता है | परिवार में किसी बच्चे का जन्म भी हो सकता है |

अन्त में, उपरोक्त परिणाम सामान्य हैं | किसी कुण्डली के विस्तृत फलादेश के लिए केवल एक ही ग्रह के गोचर को नहीं देखा जाता अपितु उस कुण्डली का विभिन्न सूत्रों के आधार पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है |

साथ ही, ग्रहों के गोचर अपने नियत समय पर होते ही रहते हैं | सबसे प्रमुख तो व्यक्ति का अपना कर्म होता है | तो, कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य की ओर हम सभी अग्रसर रहें यही कामना है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2018/07/16/sun-transit-in-cancer/

 

आषाढ़ गुप्त नवरात्र

कल आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ीय गुप्त नवरात्रों का भी आरम्भ हो रहा है | देश के लगभग सभी प्रान्तों में वर्ष में दो बार माँ भगवती की उपासना के लिए नौ दिनों तक नवरात्रों का अयोजन किया जाता है – एक चैत्र माह में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल नवमी तक – जिन्हें वासन्तिक अथवा साम्वत्सरिक नवरात्र कहा जाता है | दूसरे शरद ऋतु में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक चलते हैं – जिन्हें शारदीय नवरात्र कहा जाता है | किन्तु इनके अतिरिक्त भी वर्ष में दो बार नवरात्रों का आयोजन किया जाता है – आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से आषाढ़ शुक्ल नवमी तक तथा माघ शुक्ल प्रतिपदा से माघ शुक्ल नवमी तक | इन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है – आषाढ़ीय गुप्त नवरात्र और माघ गुप्त नवरात्र | इन नवरात्रों में भी साम्वत्सरिक और शारदीय नवरात्रों की ही भाँति माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जाती है |

गुप्त नवरात्रों का तान्त्रिक उपासकों के लिए विशेष महत्त्व है | तान्त्रिक लोग इन दिनों विशेष सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए शुक्ल दशमी तक दश महाविद्याओं की गुप्त रूप से उपासना करते हैं | सम्भवतः इसीलिए इन्हें “गुप्त नवरात्र” कहा जाता है, और सम्भवतः इसीलिए इस समय पूजा अर्चना की इतनी धूम और चहल पहल नहीं होती | गुप्त नवरात्रों के विषय में विस्तृत विवरण तथा कथाएँ विशेष रूप से देवी भागवत महापुराण में उपलब्ध होती हैं |

इस वर्ष कल यानी 13 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से गुप्त नवरात्रों का आरम्भ हो रहा है और 21 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल नवमी को इनका समापन हो जाएगा | कल सूर्योदय काल से लेकर 08:17 तक आषाढ़ अमावस्या है और उसके बाद आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा आ जाएगी, जो अगले दिन यानी 14 जुलाई को सूर्योदय से पूर्व चार बजकर बत्तीस मिनट तक रहेगी | इस प्रकार प्रतिपदा का क्षय भी हो रहा है, किन्तु घट स्थापना कल ही होगी और इसके लिए शुभ मुहूर्त है सिंह लग्न में प्रातः 08:17 से 10:31 तक | यदि इस समय घट स्थापना नहीं की जा सकती है तो फिर अभिजित मुहूर्त में 11:59 से 12:54 के मध्य घट स्थापना कर लेनी चाहिए | पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें…

गुप्त नवरात्रों में माँ भगवती सभी की मनोकामना पूर्ण करें…

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संस्कार – जन्म से पुनर्जन्म

जन्म से पुनर्जन्म – षष्ठी पूजन और नामकरण – इन दोनों संस्कारों का भी सम्बन्ध गर्भ संस्कारों से ही है | गर्भाधान गर्भ से पूर्व का संस्कार, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन गर्भ धारण करने के बाद के संस्कार तथा जातकर्म, षष्ठी पूजन और नामकरण जन्म के तुरन्त बाद के संस्कार | षष्ठी पूजन – नाम के अनुरूप ही जन्म के छठे दिन किया जाता है | इसका उद्देश्य है षष्ठी देवी की पूजा अर्चना के माध्यम से समस्त देवी देवताओं से प्रार्थना करना कि नवजात शिशु का मंगल हो तथा वह शरीर, मन और अन्तःकरण से बलिष्ठ एवं गुणी बने | और इसके बाद किया जाता है नामकरण संस्कार |

“नामधेयं दशम्या च द्वादश्यां वास्यकारयेत् | पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ||” (मनु. 2/30) दसवें अथवा बारहवें दिन पुण्य तिथि, नक्षत्र आदि शुभ मुहूर्त देखकर शिशु का नामकरण करना चाहिये | लेकिन सर्वसम्मत मान्यता यह है कि ग्यारहवें दिन नामकरण किया जाता है | किन्तु आवश्यक नहीं कि दसवें अथवा ग्यारहवें दिन ही नामकरण किया जाए – परिवार की रीति के अनुसार ही नामकरण के लिए मुहूर्त सिद्ध किया जाता है | नाम ऐसा हो जो सुगम और सुन्दर होने के साथ साथ मंगल, सामर्थ्य और धनवत्ता का द्योतक भी हो | कहा जाता है कि नाम अच्छा होने से गुण भी अच्छे होते हैं |

जब से मनुष्य ने भाषा की खोज की उसने दिन प्रतिदिन प्रयोग की जाने वस्तुओं को किसी न किसी नाम से पुकारना आरम्भ कर दिया | जैसे जैसे समाज जागरूक होता गया वैसे वैसे सभ्य भी होता गया | और इसी क्रम में नाम की महत्ता भी सभी को अनुभव होने लगी | और धीरे धीरे नामकरण को धार्मिक संस्कारों के साथ जोड़ दिया गया | बृहस्पति के अनुसार “नामाखिलस्य व्यवहारहेतु: शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतु: | नाम्नैव कीर्तिं लभते मनुष्य: तत: प्रशस्तं खलु नामकर्म ||” अर्थात समस्त व्यवहार का आरम्भ नाम से ही होता है | यही मनुष्य के लिये शुभदायक होता है, भाग्यदायक होता है | नाम से ही मनुष्य को प्रसिद्धि प्राप्त होती है | इसीलिये नामकरण संस्कार सबसे प्रमुख संस्कार है |

इस संस्कार का उदेश्य केवल शिशु को नाम भर देना नहीं है, अपितु उसे श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर उच्च से उच्चतर मानव के रूप में विकसित करना भी है | चरक के अनुसार नाम ऐसे होने चाहियें जिनका कोई अर्थ हो, क्योंकि नाम का उद्देश्य केवल सम्बोधन भर देना नहीं था अपितु उस नाम के माध्यम से बालक के समक्ष उसके लिए एक लक्ष्य भी प्रतुत किया जाता था | नाम भी ऐसा होना चाहिए जो बोलने और सुनने में कठिन न हो, तथा कानों को अच्छा लगे |

आध्यात्मिक दृष्टि से “कः कतर: कतमः“ सिद्धान्त नामकरण का आधार होता था | अर्थात तुम कौन हो ? तुम ब्रह्मवत हो और सुख हो | तुम कौन-तर हो ? तुम ब्रह्मतर हो अर्थात ब्रह्म के गुण तुममें विद्यमान हैं | तुम कौन-तम हो ? तुम ब्रह्मतम हो अर्थात पूर्ण रूप से ब्रह्मस्वरूप ही हो | ब्रह्म का अर्थ होता है व्यापकत्व | इस प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से उस परब्रह्म के साथ – समग्र के साथ – सम्बन्ध जिस नाम से प्रतीत होता हो ऐसा नाम रखने की प्रथा उस समय थी | किन्तु सर्वमान्य धारणा यही थी कि नाम सुन्दर, कर्णप्रिय तथा बोलने में सरल होना चाहिए | साथ ही जातक के जन्म नक्षत्र के आधार पर नाम रखा जाता था |

इस प्रकार शिशु के जन्म एक पश्चात होने वाले संस्कारों में ज्योतिषीय आधार पर नक्षत्र आदि की गणना के द्वारा मुहूर्त सिद्ध करके नामकरण संस्कार का विशेष महत्त्व था, आज भी है, और सदा रहेगा…

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