अभिजित मुहूर्त

पञ्चांग के अन्तर्गत हमने पञ्चांग के पाँचों अंगों पर चर्चा के साथ ही राहुकाल, यमगंड और गुलिका पर भी बात की | अब बात करते हैं अभिजित मुहूर्त की | अभिजित नक्षत्र का काल अभिजित मुहूर्त कहलाता है | इसका देवता ब्रह्मा को माना जाता है और किसी भी कार्य के लिए इसे शुभ माना जाता है | अभिजित शब्द का अर्थ ही है जो सदा विजयी रहे – जिसे जीता न जा सके – जिसे हराया न जा सके | अतः यह तो निश्चित ही है कि इस मुहूर्त में किया गया कार्य शुभ फलदायी होगा तथा उसके पूर्ण होने की सम्भावना भी प्रबल होगी |

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वैकुण्ठ एकादशी

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है । प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं । जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है । वैदिक ज्योतिष – Vedic Astrology – के अनुसार सारी ही एकादशी किसी न किसी रूप में भगवान विष्णु से ही सम्बन्ध रखती हैं | विष्णु पुराण और पद्म पुराण के अनुसार भगवान भास्कर जब धनु राशि में संचार कर रहे थे तभी ग्यारहवें दिन मुर नाम का राक्षस विष्णु का वध करने आया | भगवान विष्णु उस समय बद्रिकाश्रम की एक गुफा में शयन कर रहे थे | तब उनसे निसृत शक्ति “हेमावती” ने उस राक्षस को भस्म करके विष्णु तथा अन्य देवताओं की रक्षा की | विष्णु ने प्रसन्न होकर उस शक्ति का नाम “एकादशी” अर्थात जो ग्यारहवें दिन उत्पन्न हुई हो – रखा | इसीलिए कई स्थानों की लौकिक बोलियों में एकादशी को “ग्यारस” भी कहा जाता है | माना जाता है कि आज के दिन भगवान विष्णु स्वर्ग अर्था “वैकुण्ठ” के द्वार सभी के लिए खोल देते हैं |

ऐसी भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था |

जो भी मान्यताएँ हों, किसी भी अन्धविश्वास का शिकार हुए बिना इन समस्त व्रत उपवासों मे मूल में निहित चरित्र शुद्धि और सदाचार की भावनाओं को अंगीकार करके अपने समस्त कर्म पूर्ण निष्ठा के साथ करते हुए हम सब अपने लक्ष्य को प्राप्त हों…

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पञ्चांग – राहुकाल

प्रत्येक दिन का एक भाग राहुकाल माना जाता है | दिनमान को आठ भागों में विभक्त करके राहुकाल की गणना की जाती है | क्योंकि सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग अलग स्थानों पर अलग अलग होता है इसलिए राहुकाल का समय और अवधि भी हर स्थान पर अलग हो सकते हैं | प्रायः इसका समय डेढ़ घंटे का रहता है जो दिनमान की अवधि के अनुसार कम अथवा अधिक भी हो सकता है | इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य आरम्भ करने की सलाह Vedic Astrologer नहीं देते |

अन्त में, शुभाशुभ मुहूर्त से भी ऊपर व्यक्ति का अपना कर्म होता है | व्यक्ति में सामर्थ्य और सकारात्मकता है तथा कार्य करने का उत्साह है तो वह अशुभ मुहूर्त को भी अनुकूल बना सकता है | कोई भी Good Astrologer अशुभ मुहूर्त का भय न दिखाकर उचित मार्गदर्शन ही करता है |

अस्तु, हम सभी कर्मशील रहते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करें…

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पञ्चांग का पंचम अंग करण

पिछले कुछ समय से पञ्चांग के विभिन्न अवयवों पर चर्चा कर रहे हैं | पञ्चांग के चार अंगों – दिन, तिथि, नक्षत्र और योग के बाद अब, पञ्चांग का पाँचवाँ अवयव है करण | तिथि का आधा भाग करण कहलाता है | चन्द्रमा जब 6 अंश पूर्ण कर लेता है तब एक करण पूर्ण होता है | कुल ग्यारह करण होते हैं | इनमें किन्स्तुघ्न, चतुष्पद, शकुनि तथा नाग ये चार करण हर माह में आते हैं और इन्हें स्थिर करण कहा जाता है | अन्य सात करण चर करण कहलाते हैं | ये एक स्थिर गति में एक दूसरे के पीछे आते हैं | इनके नाम हैं: बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि जिसे भद्रा भी कहा जाता है |

अन्त में इतना अवश्य कहेंगे कि शुभ मुहूर्त – Auspicious Time – में यदि कोई कार्य आरम्भ किया जा सकता है तो अवश्य करना चाहिए | किन्तु यदि कार्य आवश्यक ही हो और कोई शुभ मुहूर्त नहीं मिल रहा हो तो Vedic Astrologer व्यक्ति को इस शुभाशुभ मुहूर्त के भय से ऊपर उठकर सकारात्मक भाव के साथ कर्म करने की ही सलाह देते हैं…

 

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सन्तान गोपाल मन्त्र

एक अच्छी स्वस्थ सन्तान हर माता पिता का सपना होता है | किन्तु किसी कारणवश महिला Conceive नहीं कर पाती या गर्भपात हो जाता है तो उनका ये सपना जैसे टूट कर बिखर जाता है | कई बार तो एक दूसरे पर दोषारोपण का सिलसिला भी शुरू हो जाता है | पतिपक्ष के लोग पत्नी को गर्भ धारण करने में असमर्थ बताने लगते हैं तो पत्नी पति को नपुंसक बताने में नहीं हिचकिचाती | ऐसी स्थिति में मेडिकल साइंस सहायता करती है | आजकल मेडिकल साइंस इतनी एडवांस हो गई है कि सन्तान के इच्छुक दम्पतियों को चिन्ता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं | किन्तु फिर भी हैरान परेशान दम्पति ज्योतिषियों के चक्कर लगाते रहते हैं कि कहीं से तो कोई आशा की किरण दिखाई दे | प्रायः सभी Vedic Astrologers उनकी कुण्डली के पंचम भाव का अध्ययन करके उन्हें उपाय सुझाते हैं और साथ में सन्तान गोपाल मन्त्र के जाप की सलाह देते हैं |

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धनु राशि में सूर्य का संक्रमण

यों तो ग्रहों का भाचक्र में भ्रमण एक खगोलीय घटना है जो अपने नियमित अन्तराल पर घटती रहती है | किन्तु Vedic Astrology की दृष्टि से ग्रहों के संक्रमण का प्रकृति पर प्रत्यक्ष प्रभाव होता है और मानव भी उस प्रभाव से अछूता नहीं रहता | आज प्रातः 03:00 पर सूर्य का संक्रमण धनु राशि में हुआ है और यहाँ भगवान भास्कर पूरा एक माह रहने वाले हैं | हम सभी जानते हैं कि समस्त चराचर जगत को ऊर्जा तथा पुनर्जीवन सूर्य से ही प्राप्त होता है | यही कारण है कि सूर्य को प्राणों का अथवा आत्मा का कारक माना जाता है | सूर्य की राशि सिंह है, उच्च राशि मेष है और नीच राशि तुला है | आइये जानते हैं विभिन्न राशियों पर सूर्य के धनु राशि में गोचर का क्या सम्भावित प्रभाव मानव मात्र पर हो सकता है | यह प्रभाव चन्द्रमा की राशि को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है और चन्द्रमा एक राशि में पूरे चौबीस घंटे रहता है तथा उन चौबीस घण्टों में हज़ारों बच्चों का जन्म होता है | आवश्यक नहीं कि सबके लिए नीचे लिखी बातें सत्य सिद्ध हो जाएँ | किसी व्यक्ति की कुण्डली का अध्ययन करते समय केवल एक ही तथ्य का आकलन नहीं किया जाता है अपितु बहुत से सूत्रों के आधार पर किसी कुण्डली का अध्ययन किया जाता है तब किसी सम्भावित परिणाम पर पहुँच सकते हैं | साथ ही, हर एक वर्ष में सूर्य पूरी बारह राशियों में भ्रमण करता है अतः आवश्यक नहीं कि हर वर्ष सूर्य के किसी विशिष्ट राशि में गोचर होने पर समान परिणाम ही परिलक्षित हों | इसलिए अधिक सत्य फलकथन के लिए तो आपको किसी अच्छे वैदिक ज्योतिषी – Vedic Astrologer – से स्वयं मिलकर ही कुण्डली का समग्र अध्ययन कराना होगा | तथापि, यदि दस प्रतिशत लोगों को भी इसका लाभ मिल सका तो अपना ये पयास सफल मानेंगे…

अन्त में, सदा की भाँति इतना अवश्य कहेंगे कि यदि कर्म करते हुए भी सफलता नहीं प्राप्त हो रही हो तो किसी अच्छे ज्योतिषी – A Good Astrologer – के पास दिशानिर्देश के लिए अवश्य जाइए, किन्तु अपने कर्म और प्रयासों के प्रति निष्ठावान रहिये – क्योंकि केवल आपके कर्म और उचित प्रयास ही आपको जीवन में सफल बनाएँगे…

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