मेरी बातें

आज़ादी के इस पुनीत पर्व पर अपनी एक पुरानी रचना के कुछ अंश “स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनाओं” के साथ…

आज़ादी का दिन फिर आया |
बड़े यत्न से करी साधना, कितने जन बलिदान हो गए |
किन्तु हाय दुर्भाग्य, न जाने कहाँ सभी वरदान खो गए |
आशाओं के सुमन न विकसे, पूरा हो अरमान न पाया ||१||
महल सभी बन गए दुमहले, और दुमहले किले बन गए |
कितने मिले धूल में, लेकिन कितने नये कुबेर बन गए |
आयोगों का गठन हुआ, मन का संगठन नहीं हो पाया ||९||
फाड़ रहा है आज मनुज धरती सागर अम्बर की छाती |
चन्दा क्या, मंगल के ज्वालामुखि में भी है फेंकी बाती |
मनु के सुत ने मनुज कहाकर भी मानवता को बिसराया ||१०||
फिर भी है संतोष कि धरती अपनी है, अम्बर अपना है |
अपने घर को आज हमें फिर नई सम्पदा से भरना है |
किन्तु अभी तक हमने अपना खोया बहुत, बहुत कम पाया ||११||
ग्राथित हो रहे अनगिनती सूत्रों की डोरी में हम सारे |
होंगे सभी आपदाओं के बन्धन छिन्न समस्त हमारे |
श्रम संयम आर अनुशासन का सुगम मन्त्र यदि हमको भाया ||१२||

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मेरी बातें

उलझन मेरी

तनिक निकट आओ तब ही कुछ सुलझे ये उलझन मेरी |
मन में है मची हुई हलचल, है यही बड़ी उलझन मेरी ||
होगा तुमको ज्ञात, प्रेम की पगडण्डी कितनी सँकरी है |
पुष्पों के संग शूलों से भी भरी हुई यह डगर पड़ी है ||
पुष्पों पर चलने हित मग से शूल हटाओगे तुम कैसे |
तनिक निकट आओ तब ही कुछ सुलझे ये उलझन मेरी ||
तुम बन बैठे यदि निष्ठुर तो मुझको बड़ी दूर पाओगे |
और किसी एकाकी क्षण में फिर तुम व्याकुल हो जाओगे ||
कैसे मन बहलाओगे, व्याकुलता दूर भगाओगे |
तनिक निकट आओ तब ही कुछ सुलझे ये उलझन मेरी ||
आस निराशा की घड़ियों में नहीं कोई जब साथी होगा |
मेरी स्मृतियों का ही फिर कोई पुष्प खिलाना होगा ||
कैसे मुझे मनाओगे, और प्रेम पुष्प महकाओगे |
तनिक निकट आओ तब ही कुछ सुलझे ये उलझन मेरी ||

मेरी बातें

खुद ही से उलझ बैठे हैं

आपने एक प्रश्न किया था हमसे, किन्तु हम मौन बने बैठे हैं |
आपको लगता है हम निरुत्तर हैं, हम तो खुद ही से उलझ बैठे हैं ||
कल हम दोनों में जो बात हुई, उसकी मध्यस्थता करी जिसने
आज वे सभी लोग देखो तो कितने क़ामयाब बने बैठे हैं ||
किसी ने एक शब्द भी नहीं बोला, ना ही एक छन्द किसी ने लिक्खा
किन्तु फिर भी सारे ही मुखौटे ये क़िस्सों की क़िताब बने बैठे हैं ||
जिसने भी तुम्हारी मदभरी आँखें नज़र भरके एक बार देखी हैं
सारे ही वे दृश्य आज उसके लिये प्यार की शराब बने बैठे हैं ||

मेरी बातें

अन्तर्विरोध

है कितना अन्तर्विरोध मन में, कितनी लाचारी है |
जग के सिद्धान्तों को लख होती मुझको हैरानी है ||
हर एक परिचय के चेहरे पर देखो एक मुखौटा है
केवल नक़ली हैं रंग हैं इसमें, नहीं कोई मौलिकता है |
इसको चतुराई जग समझा, किन्तु यही नादानी है
जग के सिद्धान्तों को लख होती मुझको हैरानी है ||
वस्त्र समझकर प्यार भरे सम्बन्धों को सबने ओढ़ा
किन्तु पुराने हुए तनिक तब नया कोई नाता जोड़ा |
वस्त्रों के समान सम्बन्ध बदलना तो मनमानी है
जग के सिद्धान्तों को लख होती मुझको हैरानी है ||
ओ सम्बन्ध बदलने वालों, ओ नित रूप बदलने वालों
तुम रह जाओगे एकाकी, अहंकार में जीने वालों |
सम्बन्धों से रहित नग्न सम व्याकुल होता प्राणी है
जग के सिद्धान्तों को लख होती मुझको हैरानी है ||
स्नेहपूर्ण निस्वार्थ ये नाते मन की द्विविधा को ढक देते
मन की घोर निराशा को निज स्नेहबिन्दु से ये धो देते |
मत फाड़ो इन पर्दों को, इनमें ये छिपी कहानी है
जग के सिद्धान्तों को लख कर होती मुझको हैरानी है ||

मेरी बातें

दिल्ली की झमाझम बारिश के बीच कुछ महिला संगठनों के तीज के कार्यक्रमों में भी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | ऐसे में मन को कुछ लिखने से नहीं रोक पाई, जो प्रस्तुत है…

आए सावन रुत आए, मेरे मन भाए
कि सुध बिसर गई |
रिमझिम साज बजाए, संगीत सुनाए
कि मन मोरा बस में नहीं ||
पेड़ों पर झूले डलवाएँ, दूर गगन के पेंग बढ़ाएँ
ऊँचे उड़ते जाएँ, कि मन को भाएँ
कि मन मोरा बस में नहीं ||
दादुर मोर पपीहा गाएँ, पियु पियु की सब टेर लगाएँ
मीठी तान सुनाएँ, कि मन को भाएँ
कि मन मोरा बस में नहीं ||
झींगुर झिल्ली शोर मचाएँ, मन मेरे बहार भर जाएँ
मन में हूक उठाएँ, कि मन को भाएँ
कि मन मोरा बस में नहीं ||
घोर गरज बादल घहराएँ, दामिनि चमक दमक दिखलाए
पवन झकोरे खाए, कि मन को भाएँ
कि मन मोरा बस में नहीं ||
पाँवों में पायल झनकाएँ, हाथों में कँगना खनकाएँ
ता थेई नाच नचाएँ, कि मन को भाएँ
कि मन मोरा बस में नहीं ||

मेरी बातें

आज हमारे पतिदेव ने हमारी प्रिय अभिनेत्री मधुबाला जी का एक बेहद ख़ूबसूरत फोटो कहीं नेट से ढूँढ़कर हमें मेल किया | उसे देखकर उनकी शोख़ी और चंचलता, उनकी खूबसूरती, उनकी अदाकारी और उस सबके साथ साथ उनके जीवन के कष्ट, अधूरापन – और उतना सब होते हुए भी हर वक़्त मस्त रहना – सब याद हो आया जैसा कि सुना पढ़ा है उनके बारे में | हालाँकि आज उनका न तो जन्मदिन ही है और न ही “कुछ और”, फिर भी हमारी ये दोनों रचनाएँ हमारी उसी प्रिय अभिनेत्री को समर्पित हैं जिनकी फ़िल्में या गाने जब हम देखने बैठते हैं तो फिर घर में कोई हमें बीच में टोक नहीं सकता इतने मगन हो जाते हैं…

मैं तो जैसी हूँ वैसी ही रहना चहूँ

अपने में ही मस्त सदा मैं रहना चाहूँ
मैं तो जैसे हूँ वैसी ही रहना चाहूँ |
हर प्रयास है व्यर्थ बदलने का अब मुझको
तुम्हें चाहिये देवी, तो फिर जाकर ढूँढो और कहीं ||
अपनी मर्ज़ी से करती हूँ मैं काम सभी
अपनी मर्ज़ी से ही मैं जीवन जीती हूँ |
मैं जाना चाहूँ जहाँ, वहाँ मैं बढ़ जाऊँ
मैं पाना चाहूँ जिसे, उसे मैं पा जाऊँ |
हर प्रयास है व्यर्थ बदलने का अब मुझको
तुम्हें चाहिये देवी, तो फिर जाकर ढूँढो और कहीं ||
मन के पंखों से दूर गगन में जाती हूँ
और मस्त हवा की हमजोली बन जाती हूँ |
सूरज के संग करती हूँ मैं कितनी बातें
और रातों को चंदा से लोरी सुनती हूँ ||
हर प्रयास है व्यर्थ बदलने का अब मुझको
तुम्हें चाहिये देवी, तो फिर जाकर ढूँढो और कहीं ||
धिरकिट धिरकिट बादल की मिरदंग बजे
सांनीधप पधनीसां बूँदों की तब तान सजे |
बिजली की पायल तब पैरों में झनकाती
मैं ता थेई थेई तत नाच दिखाती जाती हूँ |
हर प्रयास है व्यर्थ बदलने का अब मुझको
तुम्हें चाहिये देवी, तो फिर जाकर ढूँढो और कहीं ||

ना जाने क्यों भटक रहा है आज मेरे मन का हर गीत

किस पर कविता लिखूँ बताओ मुझको ऐ मेरे मनमीत
ना जाने क्यों भटक रहा है आज मेरे मन का हर गीत ||
आज लगें सब चित्र अधूरे, भावहीन ये तसवीरें
रंग सारे बेरंग लगें, मत टांगो ऐसी तसवीरें |
कैसे रंग भरूँ इनमें बतलाओ ऐ मेरे मनमीत
ना जाने क्यों भटक रहा है आज मेरे मन का हर गीत ||
आज अमावस की काली रजनी सा घना अँधेरा है
ना जाने कब क्या हो, मन को इस चिंता ने घेरा है |
कैसे मन को धीरज दूँ, बतलाओ ऐ मेरे मनमीत
ना जाने क्यों भटक रहा है आज मेरे मन का हर गीत ||
जो आश्वासन मिले वो केवल शब्दों का ताना बाना था
एक बूँद भी स्नेह नहीं था, बस इसका ही तो रोना था |
कैसे स्नेह भरूँ इनमें, बतलाओ ऐ मेरे मनमीत
ना जाने क्यों भटक रहा है आज मेरे मन का हर गीत ||

मेरी बातें

जहाँ कोई अजनबी न हो

रेशम सी ये हवाएँ, अरमां नए जगाएँ |
आओ चलें कहीं दूर जहाँ कोई अजनबी न हो ||
हवा की सनसनाहटें, बदन में झनझनाहटें
हैं मन में कुलबुलाहटें, करें बताओ क्या ?
कोयल की मीठी बोली करती है अब ठिठोली |
आओ चलें कहीं दूर जहाँ कोई अजनबी न हो ||
वो बारिशों की झनझनन, समन्दरों की वो उफ़न |
लो बह चला हमारा मन, करें बताओ क्या ?
वो रेत महकी ठण्डी, करती है गुदगुदी सी |
आओ चलें कहीं दूर जहाँ कोई अजनबी न हो ||
लो बढ़ चले हैं हम वहाँ जहाँ न डर किसी का हो |
हो तेज़ बहती आँधियाँ, या घरघराता तूफाँ हो ||
मन में जगे जो अरमां, कोई सुला न पाए |
आओ चलें कहीं दूर जहाँ कोई अजनबी न हो ||

क्या पता

क्या पता / कल ये हसीं समां रहे न रहे
आरजूओं का ये चमन खिले ना खिले |
क्या पता / सुबह के इंतज़ार में प्रेम का ये दीया
जले और जल के बुझ जाए |
क्या पता / वक़्त की आँधी काँटे साथ लाए
या मुहब्बत के फूल मुरझा जाएँ |
रंग जो आज घुला है फ़ज़ाओं में
कल हो जाए बदरंग |
इसलिये दोस्तों / मत सोचो कल क्या हो |
जी लो इसी पल को जी भरके |
राधा को भरने दो ऊँची पेंगें
हवाओं के साथ / बादलों के पार
कान्हा को देने दो झोंटे / उमंग में भर
गाओ मस्त होकर मल्हारें
जो भर दें दिल के उस कोने को भी प्यार से / बहार से
अपनेपन से जो पड़ा है रीता |