TAKE CHARGE OF YOUR LIFE

DO NOT BE BOGGED DOWN BY FEARS AND PHOBIAS

स्रोत: TAKE CHARGE OF YOUR LIFE

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TAKE CHARGE OF YOUR LIFE

DO NOT BE BOGGED DOWN BY FEARS AND PHOBIAS

TAKE CHARGE OF YOUR LIFE

DO NOT BE BOGGED DOWN BY FEARS AND PHOBIAS

 All types of fears and phobias root in our subconscious and affect our life in a very negative way. They seriously affect our self-confidence and take away our self-esteem. They badly affect our career, personal relationships, decision making and adversely influence our creativity and talents. We do not realize that many fears and phobias originate from childhood and even from our past lives. Fears and Phobias limit our potential and poorly affect our growth. Most of the time we hesitate to share our fears and phobias for being ridiculed or made fun of.

 Now these fears and phobias can be treated and completely cured using mind related scientific techniques without any use of drug or medication just by increasing power of mind.

Swasti Shree Sharma CMS-CHt FIBH (USA) is a qualified, professionally trained and well experienced Clinical Hypnotherapist and Past Life Regression Therapist from America. She is the first practicing Clinical Hypnotherapist and Past Life Regression therapist in India to be certified by the International Board of Hypnotherapy (USA).  Swasti is giving consultations and helping many clients to cure their suffering from all kind of fears and phobias, with very high degree of success.  

 “I feel blessed to meet you. I am much healed. Immense thanks Swasti” AJ New Delhi

“Now I am able to sort my relationship issue and move ahead in life. I am grateful” NR Noida

“Wow !! I am a different person now. I feel very confident after consulting Swasti” PM Gurgaon

“I no more fear traveling in lifts. Also my smoking habit is gone. Swasti is amazing” RK Delhi

 In USA, Europe and most western countries, Clinical Hypnotherapy and Past Life Regression Therapy is a well known, successful and highly effective therapy to cure fears and phobias for the last many decades. Now its popularity is growing in the whole world because thousands of people are being cured every day.

 CALL NOW 70-42-32-1200

OR email: Swasti.HypnotherapyIndia@gmail.com

 

तमाम हो गया

लो ऐसे ही और एक दिन देखो आज तमाम हो गया

भोर हुई और धूप चढ़ गई, शोर मचा और साँझ ढल गई

लो ऐसे ही और एक दिन देखो आज तमाम हो गया ||

एक दिवस यों कहा कली ने भँवरे से, ना अब मुझको छू

भँवरा बोला, अरी बावली फिर तू ही आ मुझे चूम ले |

और तभी एक झोंका आया, डाल हिली, भू गगन हिल गए

कली और भँवरे के देखो अनजाने ही अधर मिल गए ||

प्राण तपे और प्यास जग उठी, मेघ घिरे और झड़ी लग गई

और यों ही सागर में सरिता का चिर मिलन तमाम हो गया ||

एक बार था चन्द्र खिला, पर रूठी हुई चन्द्रिका बैठी

बार बार पूछा चंदा ने, पर वह तो बस दूर खड़ी थी |

मगर तभी एक बादल गरजा, बिजली ने भी क्रोध दिखाया

और डरी वह चन्द्रकिरण खुद ही जा लिपटी निज प्रियतम से ||

स्नेह बढ़ा और साँस रुक गई, तिमिर खिला और ज्योति बिक गई

लो ऐसे ही और एक दीपक यह आज तमाम हो गया ||

एक रात एक तारा टूटा पतझर में उजड़े पेड़ों पर

विहँस कहा पुष्पों ने यह है बुझा दिया, इसका क्या होगा |

तभी कहा एक शुष्क पत्र ने, यह भी अपने ही जैसा है

एक दु:खी से एक दु:खी को सदा प्यार ही तो मिलता है ||

रूप हँसा और रास रच गया, मिलन हुआ पर विरह बच गया

लो ऐसे ही और एक यह देखो स्वप्न तमाम हो गया ||

जीवन की इस कड़ी धूप में दो पंछी थे मुक्त गगन में

हँस हँस उड़ते, मगर तभी एक आँधी उठी और तम बरसा |

हाथों से तब हाथ था छूटा, साँसों का हर तार था टूटा

जग ने पथ में काँटे बोए, नियति नटी का प्यार था झूठा ||

रोया जीवन, मृत्यु हँस पड़ी, आयु लुटी और धूल बच गई

ब्रह्मा की रचना का यों ही देखो काम तमाम हो गया ||

 

 

मैं अपनाती हूँ

जीवन संग क्रीड़ा के हित शूलों को भी मैं अपनाती हूँ

 

पुष्प मिलें कितने ही मुझको, कितने ही गलहार बनें

जीवन संग क्रीड़ा के हित शूलों को भी मैं अपनाती हूँ ||

जीवन एक अनबुझी पहेली, धूप छाँव की भ्रामक माया

ऊषा के ही संग चली आती है रजनी की भी छाया |

अवसर सुधापान के मुझको मिलते रहते जाने कितने

पर विष को भी सम्मानित करने के हित मैं अपनाती हूँ ||

पुष्पों की है नियति यही, दो दिन सुगन्ध सरसाते हैं

पर शूलों के घाव उम्र भर तक मन को सहलाते हैं |

मलय पवन के संग चली आती है पथ की धूल निराली

उसी धूल को सम्मानित करने हित मैं अपनाती हूँ ||

विरह मिलन की धूप छाँव नित करती रहती आँखमिचौली

तीव्र विरह में जल जाती है मिलन रास की भी तो होली |

लाज भरी यह सेज रात की कुछ पल ही अभिसार है करती

उसी याद को सम्मानित करने के हित मैं अपनाती हूँ ||

 

लहरों का यह खेल

कोई समझ न पाया उसको जिसका है यह खेल

लहरों का या खेल अनोखा, लहरों का यह खेल |

एक लहर इस तट को जाती, दूजी उस तट को है जाती

कभी कभी पथ में हो जाता है दोनों का मेल ||

अनगिन नौका और जलयान यहाँ हैं लंगर डाले रहते

और अनगिनत राही इस उस तट पर नित्य उतरते रहते |

इसी तरह तो वर्ष सदी और कल्प यहाँ हैं बीते जाते

पर न कभी रुकने पाता है ऐसा अद्भुत खेल ||

एक सनातन क्रम में चलता, नित्य नया पर रूप बदलता

जग जीवन एक डोर बंधी कठपुतली जैसा सदा नाचता |

किसी चक्र सम ऊपर नीचे भाग्य निरन्तर चक्कर खाता

पर न कभी थमने पाता है मायावी यह खेल ||

किन्तु कौन यह, जो कि स्वयं को जरा काल मृत्युंजय कहता

एक डोर को काट, दूसरी में पुतली को बाँध नचाता |

इस जगती को बार बार वह निज की क्रीडास्थली बताता

कोई समझ न पाया उसको जिसका है यह खेल ||

 

नैया आगे बढती जाए

बिना पाल पतवार ओ माँझी उम्र की नैया चलती जाए

बिना पाल पतवार ओ माँझी उम्र की नैया चलती जाए |

कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||

कभी लहर के ऊपर उछले, कभी मध्य में भी छिप जाए |

डूब डूब के फिर उतराए, मगर पार लगने न पाए ||

मध्य धार में सन्ध्या के पंछी सम हर पल झोंटे खाए |

कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||

धारा की पहचान नहीं है, नदिया का कुछ ज्ञान नहीं है |

चहूँ ओर पानी ही पानी, होता तट का भान नहीं है ||

अँधियारी रजनी है, तट भी पल भर को न उसे सुझाए |

कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||

नए पुराने कर्मफलों की पूँजी की गठरी थी संग में |

वह सारी ही पूँजी तिल तिल करके आज समाई जल में ||

किया प्रमाद, तो बार बार अब क्यों फिर हाथ मले पछताए |

कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||

नहीं उसे अब ज्ञान दिशा का, नहीं उसे अब भान निशा का |

कैसा उद्गम, कैसा संगम, नहीं उसे आभास विदा का ||

अब तो जहाँ श्वास है टूटे उसी घाट पर वह उतराए |

कितनी तेज़ बहे पुरवैया, नैया आगे बढ़ती जाए ||

 

 

 

 

 

बयार…..

सरल नहीं पकड़ना

सरल नहीं पकड़ना / पुष्पों के गिर्द इठलाती तितली को |

हर वृक्ष पर पुष्पित हर पुष्प उसका है

तभी तो इतराती फिरती है कभी यहाँ कभी वहाँ / निर्बाध गति से |

बाँध सकोगे मुक्त आकाश में ऊँची उड़ान भरते पक्षियों को ?

समस्त आकाश है क्रीड़ास्थली उनकी

हाथ फैलाओगे कहाँ तक ?

कितने बाँध बना दो कल कल छल छल करती नदिया पर

उन्मुक्त प्रवाह से निकाल ही लेगी राह जहाँ तहाँ से

पहुँचने को प्रियतम सागर के पास |

स्वच्छन्द बहती मलय पवन की बयार के साथ

बहते चले जाओगे तुम भी किसी अनजानी सी दिशा में |

क्योंकि ये तितलियाँ, कल कल छल छल बहती नदिया,

खगचर, मलयानिल / मचलते हैं, प्रवाहित होते हैं

पूर्ण स्वच्छन्दता से, अपनी शर्तों पर…