Category Archives: Alternative Practices

दिनचर्या और जीवन शैली

गत सात दिसम्बर को WOW India की ओर से Lifestyle diseases यानी एक अननुशासित दिनचर्या के कारण होने वाली बीमारियों पर चर्चा के लिए एक वर्कशॉप का आयोजन किया गया | आयोजन सफल रहा | लेकिन उसके बाद जब हमने रिपोर्ट पोस्ट की तो कुछ लोगों ने बात की कि आज के समय में जो लोग Working हैं, यानी कहीं नौकरी आदि करते हैं उनके लिए किसी भी दिनचर्या और जीवन शैली का पूरी शिद्दत से पालन करना असम्भव हो जाता है उनके कार्यभार और समय के अभाव के कारण | उनकी बात से हम सहमत हैं – बहुत से लोगों को – महिलाओं को भी और पुरुषों को भी – कई बार ऐसी नौकरी होती है जहाँ उन्हें शिफ्ट ड्यूटी करनी पड़ती है – कभी दिन की तो कभी रात की | इसलिए ऐसे लोगों का प्रश्न बिल्कुल सही है कि कैसे एक अनुशासित दिनचर्या और एक स्वस्थ जीवन शैली को अपनाया जा सकता है ?

यहाँ सबसे पहले तो एक बात कहना चाहेंगे कि एक आदर्श दिनचर्या और जीवन शैली अपनाकर हम केवल अपने स्वास्थ्य को ही अच्छा नहीं बनाए रखते, अपितु मानसिक, आध्यात्मिक, शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक विभिन्न स्तरों पर आवश्यकतानुरूप एक सन्तुलित जीवन जी कर एक सुखद परिवार और सुखद समाज के निर्माण में भी योगदान दे सकते हैं |

अब बात करते हैं कि दिनचर्या और जीवन शैली कहते किसे हैं | दिनचर्या मन और शरीर के सन्तुलन के साथ एक ऐसा दैनिक कार्यक्रम है जो प्रकृति के चक्र को ध्यान में रखकर किया जाता है | यही कारण है हर व्यक्ति की अपनी एक विशेष दिनचर्या होती है और वह हमारी जीवन शैली का मूल होती है | यानी हम कह सकते हैं कि हमारी दिनचर्या हमारी जीवन शैली का ही एक अभिन्न अंग है | एक आदर्श दिनचर्या के लिए स्वस्थ जीवन शैली की आवश्यकता है और एक स्वस्थ जीवन शैली के लिए अनुशासित दिनचर्या की आवश्यकता है |

हमारी दिनचर्या ऐसी होनी चाहिए कि जिससे हमारा स्वास्थ्य बेहतर रहे | और जब स्वास्थ्य की बात करते हैं तो Routine and lifestyleशारीरिक, मानसिक, सामाजिक सभी प्रकार के स्वास्थ्य के विषय में बात करते हैं | तो, यदि कुछ सरल से उपायों को अनुशासनात्मक रूप से अपनी हमारी जीवन शैली भी अपने आप स्वस्थ होती जाती है | और जब हमारी दिनचर्या पूर्णतः अनुशासित होगी तथा स्वस्थ जीवन शैली का पालन करेंगे तो लक्ष्य प्राप्ति में कोई समस्या नहीं होगी |

इसमें सबसे पहले आता है समय का ध्यान रखना – यदि हमने अपने समय को अच्छी तरह व्यवस्थित कर लिया – जिसे सरल भाषा में टाइम मैनेजमेंट कहा जाता है – तो किसी प्रकार की भागमभाग की आवश्यकता ही नहीं होगी और हमारी दिनचर्या सुचारु रूप से चलती रहेगी |

सरल और स्वस्थ दिनचर्या से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं, दोष सन्तुलित होते हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है और इन का आरम्भ ताज़गीभरा रहने से सारा दिन ही आनन्द से व्यतीत होता है और हम उस के अपने समस्त कर्म भली भाँति सम्पन्न करने में सक्षम हो सकते है |

शेष आगे…. पूर्णिमा

https://www.wowindia.info/health-awareness/2019/12/11/routine-and-lifestyle/

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/12/11/routine-and-lifestyle/

 

ध्यान के कुछ अन्य आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के कुछ अन्य आसन :

ध्यान के लिए उपयुक्त आसनों पर वार्ता के क्रम में हमने मैत्री आसन, सुखासन, स्वस्तिकासन और सिद्धासन पर बात की | कुछ अन्य आसन भी ध्यान में बैठने के लिए अनुकूल हो सकते हैं | जैसे:

वज्रासन : कुछ लोग जिनके कूल्हों अथवा घुटनों में किसी प्रकार की समस्या हो वे ऐसे किसी भी आसन में बैठने में कठिनाई का अनुभव कर सकते हैं जिनमें टाँगों को एक दूसरे के आर पार करना पड़ता हो | वे लोग टखनों के ऊपर घुटनों को रखकर भी ध्यान का अभ्यास कर सकते हैं | इसे “वज्रासन” कहा जाता है |वज्रासन

सीधे ज़मीन पर इस आसन में यदि बैठेंगे तो पैरों और टखनों पर अधिक ज़ोर पड़ेगा जिसके कारण माँसपेशियों में कोई समस्या हो सकती है | यदि आप इस आसन में बैठना अधिक पसन्द करते हैं तो आपको बता दें आजकल बाज़ार में इसके लिए लकड़ी की बेंच भी उपलब्ध है | आप एक बेंच ख़रीद कर ला सकते हैं | इस बेंच पर सीधे बैठ सकते हैं जिससे आपके पैरों और टखनों पर कम जोर पड़ेगा | इस आसन से लाभ एक सीमा तक ही सम्भव है | जैसे : लम्बी अवधि के ध्यान में इस आसन पर बैठने में शरीर में स्थिरता का अभाव रहता है और शरीर एक ओर को झुकने अथवा झूलने लगता है | फिर भी जिन साधकों को शारीरिक समस्याएँ इस प्रकार की हैं उनके लिए यही आसन उचित रहेगा |

सिद्धासन : इसकी चर्चा पहले भी की है | यह कुछ ऐसे साधकों को सिखाया जाता है जो ध्यान के अन्य आसनों के अभ्यस्त हो चुके हैं, साधारण साधकों के लिए यह आसन न तो उपयोगी ही है और न ही वे इसे सरलता से लगा सकते हैं | क्योंकि पद्मासन की भाँति ही इस आसन के लिए भी शरीर को एक विशेष स्थिति में रखने की आवश्यकता होती है | और यह तभी सहायक हो सकता है जब इसे नियमबद्ध और उचित रीति से किया जाए | यदि आप इस आसन में उचित और सुविधाजनक रीति से नहीं बैठ पाते तो आपको इससे लाभ होने की अपेक्षा समस्याएँ ही अधिक उत्पन्न होंगी | ध्यान के प्रारम्भिक साधकों के लिए अथवा संसारी लोगों के लिए सिद्धासन का सुझाव देना उचित नहीं होगा |

जो लोग ध्यान में पारंगत हैं अथवा ध्यान को जिन्होंने अपने जीवन में प्राथमिकता दी है वे धीरे धीरे इस आसन में बैठना सीख सकते हैं | हाँ जो लोग समाधि की अवस्था को प्राप्त होना चाहते हैं उन्हें निश्चित रूप से ध्यान के समय इस आसन का अभ्यास करना चाहिए | ध्यान में पारंगत साधक अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इस आसन में बैठने का अभ्यास डाल सकते हैं | जब एक कुशल छात्र बिना किसी कष्ट के एक ही समय में तीन घंटे से अधिक अवधि के लिए बैठने लगता है तब “आसनसिद्धि” हो जाती है | लेकिन प्रारम्भिक विद्यार्थी जो अभी तक इस आसन के लिए तैयार नहीं हैं वे इस आसन में असुविधा का ही अनुभव करेंगे | जिस आसन का अभ्यास आपने नहीं किया है ऐसे आसन में बैठने के प्रयास में माँसपेशियों और नसों में खिंचाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं |

सिद्धासन में बैठने के लिए मूलबन्ध – जिसमें गुदा की माँसपेशियों को सँकुचित करके भीतर की ओर खींचा जाता है – सिद्धासनलगाते हुए बाएँ पैर की एड़ी को मूलाधार – अंडकोष – पर रखिये | अब दूसरे पैर की एड़ी को जननेन्द्रिय के ऊपर प्यूबिक बोन (Pubic Bone) यानी जँघा के ऊपर की अस्थि पर रखिये | पैरों और टाँगों को इस तरह रखिये कि टखने एक सीध में अथवा एक दूसरे को स्पर्श कर सकें | दाहिने पैर की अँगुलियों को बाँयी जँघा और पिण्डली के बीच में कुछ इस भाँति रखिये कि केवल बड़ी अँगुली दिखाई दे | अब बाँए पैर की अँगुलियों को उठाकर दाहिनी जँघा और पिण्डली के बीच में इस प्रकार रखें कि केवल बड़ी अंगुलि दिखाई दे | दोनों हाथ दोनों घुटनों पर रखिये |

ध्यान रहे, हम इस आसन की सलाह नहीं देते – उन लोगों को छोड़कर जो किसी योग्य प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में इसे सीख रहे हैं | क्योंकि अगर इसे ठीक से नहीं किया गया तो जैसा ऊपर कहा गया है – साधकों को किसी प्रकार की शारीरिक समस्या का सामना करना पड़ सकता है | परम्परा से तो ये आसन उन व्यक्तियों को सिखाया जाता है जो सन्यासी जीवन व्यतीत करना चाहते हैं | लेकिन यह सोचना भी उचित नहीं होगा कि केवल पुरुष ही इस आसन को लगा सकते हैं, कम सुविधाजनक होते हुए भी महिला साधिकाएँ और नन्स इस आसन के अभ्यास करती हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/12/09/meditation-and-its-practices-24/

ध्यान के लिए सुविधाजनक आसन – स्वामी वेदभारती जी

अपने लिए सुविधाजनक आसन का चयन :

टाँगों में लचीलेपन के अभाव में सम्भव है कुछ प्रारम्भिक साधकों को सिद्धासन आरम्भ में सुविधाजनक न लगे | आप टाँगों को आर पार मोड़कर ऐसा कोई भी आसन बना सकते हैं जिससे आपके शरीर को इधर उधर झूले बिना, हिले डुले बिना स्थिर होकर बैठने में सहायता मिले, अथवा जैसा कि पहले बताया गया – आरम्भ में आप मैत्री आसन में भी बैठ सकते हैं | यहाँ पुनः इस बात को दोहराना आवश्यक हो जाता है कि जिस भी आसन में आप बैठें – सबसे पहले आपका सिर गर्दन और धड़ एक सीध में होना चाहिए जिससे आपकी रीढ़ सीढ़ी रहे, उसके बाद ही टाँगों को किसी विशेष प्रकार से रखिये |

कुछ अभ्यासियों को अगले आसनों को सीखने की इतनी शीघ्रता होती है कि भली भाँति सीखे बिना ही उन्हें लगाना आरम्भ कर देते हैं | जिसका परिणाम यह होता है कि वे उचित रूप से नहीं बैठ पाते, क्योंकि वे कन्धों को ऊपर खींचकर कूबड़ सा बना लेते हैं जिससे रीढ़ में बल पड़ जाता है | ऐसा करने का दुष्परिणाम यह होगा कि आपके शरीर जो बैठने में असुविधा होगी और आपके श्वास की प्रक्रिया में बाधा पड़ेगी | साथ ही ध्यान की प्रगाढ़ता के लिए उपयोगी ऊर्जा के भीतरी स्रोत भी इससे अवरुद्ध हो जाएँगे |

कमर की माँसपेशियों के साथ समस्याएँ :

बचपन से ही ग़लत ढंग से चलने और बैठने के स्वभाव के कारण बहुत से लोगों का बैठने के ढंग – आसन यानी PosturesPosture ही बिगड़ चुका होता है | और इस कारण रीढ़ को सहारा देने वाली माँसपेशियाँ पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पातीं और आयु में वृद्धि के साथ साथ माँसपेशियों में बल पड़ना आरम्भ हो जाता है | जिससे उनके शरीर को ही नुकसान पहुँचता है | जब आप प्रथम बार ध्यान के लिए बैठना आरम्भ करते हैं तब सम्भव है आपको लगे कि आपकी कमर की माँसपेशियाँ दुर्बल हैं और कुछ मिनट बैठने के बाद ही आप आगे की ओर झुक जाते हैं |

यदि आप दिन भर बैठने, खड़े होने और चलने के समय अपने शरीर के अंगों की स्थिति पर ध्यान देना आरम्भ कर देंगे तो बहुत शीघ्र आप इस समस्या से मुक्ति पा सकते हैं | यदि आप अपने शरीर को ढीला ढाला या झुका हुआ पाते हैं तो अपनी मुद्रा सुधारें | ऐसा करने से आपकी कमर की माँसपेशियाँ भली भाँति कार्य करना आरम्भ कर देंगी | कुछ हठ योग के आसन जैसे भुजंगासन, नौकासन, धनुरासन और बालासन भी आपकी कमर की माँसपेशियों को बल देने में सहायक होंगे, जिससे वे माँसपेशियाँ आपकी रीढ़ के स्तम्भ को सहारा दे सकें |

कुछ अभ्यासार्थी जिनका बैठने का ढंग सही नहीं होता वे प्रायः पूछते हैं कि ध्यान के समय क्या दीवार का सहारा Sitting Posturesलिया जा सकता है ? आरम्भ में मुद्रा सीधी करने के लिए के लिए आप ऐसा कर सकते हैं, लेकिन किसी बाहरी सहारे पर अधिक समय तक निर्भर रहना उचित नहीं होगा | आरम्भ से ही पूर्ण एकाग्रता और नियमित अभ्यास के द्वारा आसन को ठीक करने का प्रयास करें | अपने किसी मित्र से कह सकते हैं कि वह देखकर बताए कि आपका आसन उचित है अथवा नहीं | अथवा शीशे में एक ओर से देखकर स्वयं ही अनुमान लगाने का प्रयास कीजिए | यदि आपकी रीढ़ पूर्ण रूप से सीध में होगी तो अपनी कमर पर हाथ फिराने पर रीढ़ की हड्डी में उभारों पर गाँठ का अनुभव नहीं होगा |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/30/meditation-and-its-practices-23/

ध्यान के आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान में बैठने के लिए आसन (Posture) :

बहुत सारे आसन हैं जिनमें आपकी रीढ़ सीढ़ी रहती है और आप आराम से सुविधाजनक स्थिति में अपनी टाँगों को किसी प्रकार से तोड़े मरोड़े बिना बैठे रह सकते हैं | वास्तव में ध्यान में हाथों अथवा पैरों पर ध्यान देने की अपेक्षा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आपकी रीढ़ सीधी हो | और इस आसन में बैठने के लिए सबसे सरल आसन है

मैत्री आसन :मैत्री आसन

इस आसन में आप किसी कुर्सी अथवा बेंच पर बैठ सकते हैं | आपके पैर फर्श पर सीधे रखे हों अथवा बेंच के ऊपर सुखासन में हों | इस आसन का प्रयोग कोई भी कर सकता है | यहाँ तक कि जिनके शरीर में लचीलापन नहीं होता अथवा जिन्हें भूमि पर बैठने में कठिनाई होती है वे लोग भी इस आसन में आराम से बैठ सकते हैं | इस आसन में बैठने से ध्यान के समय आपको किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नहीं होगा |

सुखासन : यदि आपके शरीर में लचीलापन है तो आप एक वैकल्पिक आसन – सुखासन – में बैठना चाहेंगे | इसमें आप दोनों टाँगों को एक दूसरे के आर पार मोड़कर बैठते हैं | अर्थात एक पैर दूसरे पैर के घुटने के नीचे ज़मीन पर टिका होता है और दूसरे पैर का घुटना उस पैर पर आराम से रखा होता है | एक मोटे तह किये हुए कम्बल पर बैठिये जिससे आपके घुटनों और टखनों पर अधिक दबाव न पड़ने पाए | आपके ध्यान का आसन अर्थात जिस आसन या स्थान पर आप बैठे हैं वह स्थिर हो, किन्तु न तो अधिक कठोर हो और न ही हिलने डुलने वाला हो | यह आसन अधिक ऊँचा भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे आपके शरीर की स्थिति में व्यवधान उत्पन्न होगा |

यदि आपकी टाँगों में लचीलापन नहीं है अथवा जाँघ की माँसपेशियों में तनाव है तो आप देखेंगे कि आपके घुटने सुखासनज़मीन पर टिक नहीं पाते | इस स्थिति में कूल्हों के नीचे एक और कुशन अथवा तह किया हुआ एक और कम्बल लगा सकते हैं जिससे आपको बैठने में सहायता मिलेगी | आसन में बैठने से पहले यदि शरीर को खिंचाव देने वाले सरल से अभ्यास (Stretch Exercises) कर लिए जाएँ तो शरीर में लचीलापन बढाने में सहायता मिलती है जिससे आप और अधिक सुविधापूर्वक ध्यान के लिए बैठ सकते हैं | जिस भी आसन का आप चयन करें उसका नियमित रूप से अभ्यास कीजिए और उसे जल्दी जल्दी बदलने का प्रयास मत कीजिए | यदि आप नियमित रूप से एक ही आसन में बैठने का अभ्यास करते हैं तो हीरे धीरे वह आसन आपके लिए स्थिर और अधिक सुविधाजनक हो जाएगा |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/28/meditation-and-its-practices-21/

ध्यान के आसन – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के आसन (Posture)

ध्यान एक ऐसी सरल प्रक्रिया है कि जिसका आनन्द हर कोई ले सकता है | जैसा कि पहले भी बता चुके हैं – ध्यान के लिए शान्तचित्त होकर सुविधाजनक, आरामदायक और स्थिर आसन में बैठ जाएँ | शरीर को स्थिर करें, श्वास प्रक्रिया को स्थिर और लयबद्ध करें, और मन को स्थिर तथा केन्द्रित करें | ध्यान की इन तीनों प्रक्रियाओं के विषय में विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है –

  • शरीर की स्थिति किस प्रकार होनी चाहिए कि वह ध्यान के समय विश्रान्त, स्थिर और सुविधापूर्ण स्थिति में रह सके |
  • श्वास प्रक्रिया को स्थिर और लयबद्ध करने की क्या आवश्यकता है और
  • इसे किस प्रकार किया जा सकता है |
  • मन को स्थिर और लक्ष्य पर किस प्रकार केन्द्रित किया जाए कि ध्यान की स्थिति स्वतः प्राप्त की जा सके |

ये तीन स्थितियाँ चेतना को शरीर के बाह्य स्तर से बहुत गहरी अन्तःचेतना अथवा सूक्ष्म स्तर तक ले जाती हैं | सबसे पहले शरीर की स्थिति…

ध्यान के लिए बैठने के आसन :

ध्यान के लिए उपयुक्त आसन में बैठने के लिए तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है – आसन स्थिर हो, दृढ़ हो, आरामदायक हो और सुविधाजनक हो | यदि ध्यान के समय शरीर इधर उधर हिलता डुलता झूलता रहेगा, शरीर में कहीं खिंचाव या दर्द होगा तो ध्यान के अभ्यास में निश्चित रूप से बाधा पड़ेगी | कुछ लोग समझते हैं कि ध्यान के लिए पद्मासन जैसे कठिन आसन में बैठना आवश्यक है | किन्तु ऐसा नहीं है | ध्यान के आसन के लिए केवल एक बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है कि आप ऐसे आसन में बैठें कि आपका सर, गर्दन और धड़ एक सीध में हों जिससे आपको श्वास लेने में सुविधा हो और आप श्वास के आवागमन को अपने उदर में अनुभव कर सकें |

सिर, गर्दन और धड़ की स्थिति :

ध्यान के सभी आसनों में सिर और गर्दन बिल्कुल बीच में होने चाहियें ताकि गर्दन न तो इधर उधर झूल सके और न ही एक ओर को झुक सके | सिर को गर्दन से सहारा मिलना चाहिए और कन्धों अथवा गर्दन में किसी प्रकार का खिंचाव हुए बिना गर्दन कन्धों के ऊपर स्थिर रहे | चेहरा सामने की ओर और नेत्र धीरे से बन्द हों | नेत्रों को आराम से बिना किसी दबाव के अपने आप बन्द होने दें | दुर्भाग्य से कुछ लोगों को बताया जाता है कि ध्यान की प्रक्रिया में सिर के ऊपर एक विशेष बिन्दु पर एकटक देखना है | किन्तु ऐसा करने से नेत्रों की माँसपेशियों में खिंचाव पड़ता है और कभी कभी तो सिर में दर्द तक हो जाता है | योग की प्रक्रिया में ऐसे कुछ अभ्यास हैं जिनमें नेत्रों को किसी एक बिन्दु पर स्थिर करना होता है, किन्तु ध्यान की प्रक्रिया में ऐसा नहीं है | चेहरे की माँसपेशियों पर कोई खिंचाव डाले बिना उन्हें ढीला छोड़ देना है | मुँह भी बिना किसी प्रयास अथवा दबाव के आराम से बन्द होना चाहिए | श्वास का आवागमन नासारन्ध्रों (Nostrils) से होना चाहिए |

कन्धों, भुजाओं और हाथों की स्थिति :

ध्यान के सभी आसनों में आपके कन्धे और हाथ ढीले छोड़े हुए (Relaxed) हों और आराम से आपके घुटनों पर रखे हुए हों | आपकी कलाई इतनी ढीली पड़ी हुई हो कि अगर कोई उसे उठाना चाहे तो बिना किसी प्रयास के उठा सके | आपका अँगूठा और तर्जनी अँगुली हलके से कुछ इस तरह जुड़े हुए हों कि उनका घेरा बन जाए, जिसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि एक परिधि है जिसके भीतर ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/27/meditation-and-its-practices-20/

धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

हम प्रायः दो शब्द साथ साथ सुनते हैं – संस्कृति और धर्म | संस्कृति अपने सामान्य अर्थ में एक व्यवस्था का मार्ग है, और धर्म इस मार्ग का पथ प्रदर्शक, प्रकाश नियामक एवं समन्वयकारी सिद्धान्त है | अतः धर्म वह प्रयोग है जिसके द्वारा संस्कृति को जाना जा सकता है | भारत में आदिकाल से ही आदर्श व्यक्ति और आदर्श समाज के विकास के लिये धर्म का आश्रय लिया गया है | धर्म की प्रधानता, धार्मिक प्रेरणा एवं धार्मिक भावनाओं का अन्य सब प्रेरणाओं पर प्रभुत्व केवल भारतीय संस्कृति की ही विशेषता नहीं है, अपितु यह सदा से ही समस्त संसार में मानव मन तथा मानव समाज की सर्वमान्य अवस्था रही है | भारत ने सम्पूर्ण धर्म का मूल वेद को स्वीकार किया है, अतः भारतीय दृष्टि के अनुसार जो वेदानुकूल है, वेद सम्मत है, वही धर्म है | वेदज्ञों की स्मृति तथा शील ही धर्म है, और यह शील तेरह प्रकार का है – ब्रह्मण्यता, देव-पितृ भक्ति, सौम्यता, अनसूयता, मृदुता, मित्रता, प्रियवादिता, सत्यता, कृतज्ञता, शरण्यता, कारुण्य, प्रशान्ति और वेदों के आचार तथा वेदों के वैकल्पिक विषयों में आत्मतुष्टि |

भारत एक धर्मप्राण देश है और यहाँ का जनमानस धर्म पर अवलम्बित है | जीवन के सभी छोटे बड़े कार्य यहाँ धर्म के आधार पर व्यवस्थित होते हैं | धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया है “धारयतीति धर्मः” अर्थात् समाज या व्यक्ति को धारण करने वाले तत्व को धर्म कहा जाता है | इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि “धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है | वास्तव में विश्व में विनाश की ओर जाने की प्रवृत्ति धर्मत्याग से ही आई है | प्राचीन समाज ने कहा “धर्मं चर” अर्थात् धर्म का आचरण करो, उसी से कल्याण होगा | आधुनिक समाज का नारा है “धर्म और ईश्वर की दासता से मुक्ति पाओ | यह दुर्बलता है | नियम बन्धन व्यर्थ हैं | मन स्वतन्त्र रहना चाहिये | मन की आज्ञा मानो |”

धर्म सदा एक ही है, अनेक नहीं हो सकता | अग्नि का धर्म उष्णता है, वह एक ही है, उसका अन्य कोई धर्म नहीं है | आज जो राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म, समाज धर्म, मानव धर्म आदि के नारे हैं वे सभी भ्रामक हैं | धर्म सौ दो सौ नहीं हो सकते | धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है ? दुःखहीन शाश्वत सुख पाने का भ्रान्तिहीन प्रयत्न ही धर्म है | धर्म का यही स्वरूप भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठित है | यही प्रयत्न मानव को अन्तर्मुखी बनाता है | जो प्रयत्न बहिर्मुख करता है वही अधर्म है | अन्तर्मुखी प्रेरणा भारत के जन जन में सर्वत्र देखने को मिल सकती है | धनी-निर्धन, पढ़ा लिखा-अनपढ़, हर व्यक्ति यही वाक्य कहता मिलेगा “अरे यह धन और धरती यहीं रह जाएँगे, कोई छाती पर रखकर नहीं ले जाएगा |” इस प्रकार सिद्ध होता है कि भारत के जन मानस में धर्म त्याग भावना के रूप में प्रतिष्ठित है | यह बात दूसरी है कि उसके अनुसार आचरण मुखर नहीं है |

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन |

सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत: || – गीता 18/9

जो कर्म फलेच्छा तथा आसक्ति को छोड़कर यह कर्तव्य है ऐसा जानकार किया जाता है वह त्याग सात्त्विक त्याग है और वही धर्म की भावना का मूलाधार है…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/26/religious-believes-and-renunciation/

ध्यान और इसका अभ्यास – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के अभ्यास पर वार्ता करते हुए ध्यान के अभ्यास में भोजन की भूमिका पर हम चर्चा कर रहे हैं | इसी क्रम में आगे…

भोजन भली भाँति चबाकर करना चाहिये | अच्छा होगा यदि भोजन धीरे धीरे और स्वाद का अनुभव करते हुए ग्रहण किया जाए | पाचनतंत्र को और अधिक उत्तम बनाने के लिए भोजन में तरल पदार्थों की मात्रा अधिक होनी चाहिए | ताज़े फल और सलाद भी आपके भोजन का आवश्यक अंग होने चाहियें | भूख से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कारण बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं | भोजन के बाद मुँह और दाँतों की सफाई करें और पाचनतंत्र को विश्राम दें | दो भोजन के बीच में कुछ नाश्ता आदि न लें | वास्तव में भोजन ध्यान के अभ्यास, सम्भोग तथा नींद से कम से कम चार घंटे पूर्व कर लेना चाहिए | अर्थात ध्यान के अभ्यास और भोजन में, सम्भोग और भोजन में अथवा निद्रा और भोजन में कम से कम चार घंटे का अंतराल रखेंगे तो आपके लिए श्रेष्ठ रहेगा | भोजन के तुरन्त सोने के लिए चले जाना स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं होता |

पाचन क्रिया और भोजन के प्रति आपके शरीर की प्रतिक्रिया का आपके ध्यान एक अभ्यास पर व्यापक प्रभाव पड़ता है | क्योंकि भोजन करने के तीन चार घंटे बाद तक ध्यान का अभ्यास नहीं किया जा सकता इसीलिए प्रातः जल्दी उठकर ध्यान का अभ्यास करना सबसे अधिक उपयुक्त रहेगा | उस समय आपका शरीर पिछले दिन के भोजन को पचा चुका होता है और हल्का तथा चुस्त अनुभव कर रहा होता है | शाम को यदि आपने देर से भोजन किया है अथवा भरपेट भारी भोजन किया है तो आपको देर रात तक प्रतीक्षा करनी होगी इस बात के लिए कि आपका भोजन पच जाए और तब आप ध्यान का अभ्यास आरम्भ करके ध्यान केन्द्रित कर सकें |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/22/meditation-and-its-practices-18/