Category Archives: Alternative Practices

ध्यान के लिए तैयारियाँ – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान के लिए तैयारियाँ :

अब तक बात चल रही थी कि ध्यान कहते किसे हैं तथा ध्यान के सम्बन्ध में किस प्रकार के भ्रम हो सकते हैं | अब बात करते हैं ध्यान के लिए स्वयं को तैयार करने की |

ध्यान के अभ्यास में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और आवश्यक चरण है ध्यान के अभ्यास के लिए स्वयं को तैयार करना – जिसकी हम प्रायः उपेक्षा कर देते हैं | उचित तैयारी के अभाव में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हर तरह की उलझनें उत्पन्न होंगी जो ध्यान को गहन और स्थिर नहीं होने देंगी | आपका शरीर जब तक स्वयं ध्यान की स्थिति में नहीं पहुँच जाता अथवा ध्यान में आपको सहयोग नहीं देता तब तक शारीरिक समस्याएँ और असुविधाएँ निश्चित रूप से आपको ध्यान का अभ्यास करने से रोकेंगी |

सामान्य शारीरिक समस्याएँ जो प्रायः हर किसी के साथ हो सकती हैं वे हैं :

किसी प्रकार की बीमारी |

किसी तनाव अथवा विश्राम के अभाव में सुविधाजनक स्थिति में बैठने में असुविधा |

थकान अथवा आलस्य |

दिन भर की तनावपूर्ण घटनाओं के कारण शरीर में बेचैनी और घबराहट |

भोजन से सम्बन्धित समस्याएँ – या तो भूखे हैं अथवा आवश्यकता से अधिक भोजन किया हुआ है |

इनमें से बहुत सी समस्याएँ तो ऐसी हैं जिनका समाधान अपनी जीवन शैली में सुधार अथवा परिवर्तन करके किया जा सकता है | वास्तव में सत्य तो यही है कि रोग के निदान की अपेक्षा रोग से बचने का प्रयास कहीं अधिक श्रेयस्कर होता है | यद्यपि ठण्ड लग जाना अथवा ऐसी ही कुछ अन्य छोटी छोटी शारीरिक समस्याएँ तो ऐसी होती हैं कि इनके चलते हुए भी आप ध्यान का अभ्यास कर सकते हैं | ध्यान में वास्तविक शारीरिक व्यवधान है किसी गम्भीर रोग के कारण शरीर में बेचैनी, दर्द अथवा ध्यान केन्द्रित करने में असमर्थता | सौभाग्य से ध्यान आपको बहुत सी शारीरिक समस्याओं के प्रति सम्वेदनशील बना देता है और आप समझ जाते हैं कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आपके शरीर की क्या आवश्यकताएँ हैं और इस प्रकार आप सावधान रहकर बीमारी से भी बच सकते हैं |

इन शारीरिक समस्याओं से कैसे बचा जाए इस विषय में आगे बात करेंगे | शारीरिक तनाव और थकान को दूर करने के लिए कुछ विशेष अभ्यास भी बताए जाएँगे | साथ ही भोजन तथा शान्तिपूर्ण और गहरी नींद के विषय में भी चर्चा की जाएगी और यह भी कि इन बातों से आपके द्वारा किये जा रहे ध्यान के अभ्यास पर क्या प्रभाव पड़ता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/16/meditation-and-its-practices-11/

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ध्यान धर्म नहीं है – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान धर्म नहीं है :

पिछले अध्याय में हम चर्चा कर रहे थे कि भ्रमवश कुछ अन्य स्थितियों को भी ध्यान समझ लिया जाता है | जैसे चिन्तन मनन अथवा सम्मोहन आदि की स्थिति को भी ध्यान समझ लिया जाता है |

किन्तु हम आपको बता दें कि ध्यान न तो चिन्तन मनन है और न ही किसी प्रकार की सम्मोहन अथवा आत्म विमोहन की स्थिति है | ध्यान कोई ऐसा अपरिचित अभ्यास भी नहीं है जिसके कारण आपको अपनी मान्यताओं और संस्कृति को त्यागना पड़े अथवा धर्म परिवर्तन करना पड़े | बल्कि ध्यान स्वयं को प्रत्येक स्तर पर जानने की एक व्यावहारिक, वैज्ञानिक और क्रमबद्ध पद्धति है | ध्यान का सम्बन्ध संसार की किसी संस्कृति अथवा धर्म से नहीं है, बल्कि यह एक शुद्ध और सरल पद्धति है जीवन को गहराई से जानने की और अन्त में प्रकृतिस्थ हो जाने की |

कुछ लोग अपने स्वयं के प्रचार प्रसार के लिए किसी व्यक्तिगत अभ्यास की प्रक्रिया को “ध्यान” बताकर साधक को दिग्भ्रमित कर देते हैं | किन्तु वास्तव में वे लोग ध्यान का धर्म और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ मिश्रण कर देते हैं | जिसका परिणाम ये होता है कि साधक चिन्ता में पड़ जाता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि ध्यान के अभ्यास से उसके धार्मिक विश्वासों में बाधा उत्पन्न हो जाएगी अथवा किसी अन्य संस्कृति या धर्म को अपनाना पड़ेगा | ऐसा कुछ भी नहीं है |

धर्म जहाँ सिखाता है कि आपकी धारणाएँ और विश्वास क्या होने चाहियें, वहीं ध्यान सीधा स्वयं को अनुभव करना सिखाता है | धर्म और ध्यान इन दोनों प्रक्रियाओं के बीच किसी प्रकार का संघर्ष है ही नहीं | पूजा अर्चना धर्म के अंग हैं, जिनके द्वारा दिव्य शक्ति से सम्पर्क साधने का प्रयास किया जाता है | आप एक साथ दोनों ही हो सकते हैं – पूजा अर्चना करने वाले धार्मिक व्यक्ति भी और ध्यान का अभ्यास करने वाले साधक भी | लेकिन ध्यान के अभ्यास के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं कि आप जिस धर्म का पालन कर रहे हैं वही करते रहे अथवा उसे छोड़ दें और कोई नया धर्म अपना लें |

ध्यान का अभ्यास शुद्ध सरल भाव से व्यवस्थित और क्रमबद्ध रीति से करने की आवश्यकता होती है | ध्यान के क्रम में जिन प्रमुख बातों को सीखने की आवश्यकता होती है वे हैं:

  • शरीर को किस प्रकार विश्राम कराया जाए |
  • ध्यान के लिए किस प्रकार सुविधापूर्ण और स्थिर आसन में बैठना है |
  • श्वास की प्रक्रिया को किस प्रकार लयबद्ध और स्थिर करना है |
  • मन की गाड़ी में चल रहे विचारों को किस प्रकार शान्तिपूर्वक देखना है |
  • अपने विचारों का किस प्रकार निरीक्षण करना है और उनमें से उन विचारों को किस प्रकार उन्नत करना है जो सकारात्मक हैं और आपकी उन्नति में सहायक हैं |
  • अच्छी बुरी जैसी भी परिस्थिति है उसमें किस प्रकार केन्द्रस्थ और अविचल रहा जाए |

आगे इन्हीं सब बातों पर विचार किया जाएगा ताकि आपका ध्यान अधिक आनन्ददायक, गहन और प्रभावशाली हो सके | यदि आप ध्यान की समझ, उचित प्रक्रिया और व्यवहार के साथ ध्यान का अभ्यास करते हैं तो आप स्वयं को चुस्त और ऊर्जा से भरा हुआ अनुभव करेंगे |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/14/meditation-and-its-practices-10/

मन की वृत्ति – स्वामी वेदभारती जी

मन की वृत्ति :

मन की वृत्ति होती है पुरानी आदतों की लीक से चिपके रहना और उन अनुभवों के विषय में सोचना जो सम्भवतः भविष्य में कभी न हों | मन वर्तमान में, यहीं और इसी समय में जीना नहीं जानता | ध्यान हमें वर्तमान का अनुभव करना सिखाता है | ध्यान की सहायता से जब मन अन्तःचेतना में केन्द्रित हो जाता है तो वह अपनी आत्मा के गहनतम स्तर में प्रवेश कर जाता है | और तब मन किसी प्रकार का भेद अथवा बाधा उत्पन्न नहीं करता और पूर्ण रूप से चेतना को केन्द्रित करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है | और यही ध्यान की पहली शर्त है | वे लोग वास्तव में भाग्यशाली हैं जिन्हें इस सत्य का ज्ञान है और जिन्होंने ध्यान का अभ्यास आरम्भ कर दिया है | उनसे भी अधिक सौभाग्यशाली वे लोग हैं जो नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास कर रहे हैं | और सबसे अधिक सौभाग्यशाली वे कुछ लोग हैं जिन्होंने ध्यान को अपने जीवन में प्राथमिकता दी है और नियमित रूप से इसका अभ्यास करते हैं |

ध्यान का अभ्यास आरम्भ करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि ध्यान वास्तव में है क्या | फिर अपने अनुकूल अभ्यास का चयन करके कुछ समय तक बिना किसी अवकाश के और यदि सम्भव हो तो प्रत्येक दिन एक निश्चित समय पर इसका अभ्यास करने की आवश्यकता है | कुछ लोगों में धैर्य का अभाव होने के कारण वे कुछ समय अभ्यास करके छोड़ देते हैं और यह मान बैठते हैं कि यह पद्धति निरर्थक और अप्रामाणिक है | यह तो ऐसा हुआ कि एक बच्चा ट्यूलिप का पौधा लगाए और सोचने लगे कि सप्ताह भर में उस पर पुष्प आ जाएँगे – जो कि सम्भव ही नहीं है – और ऐसा होते न देखकर निराश हो जाए | यदि आप नियमित अभ्यास करेंगे तो निश्चित रूप से प्रगति होगी | नियमित अभ्यास से सुधार में असफल होने की सम्भावना ही नहीं है | आरम्भ में आप अनुभव करेंगे कि शरीर का तनाव शान्त हो रहा है और भावनाओं में स्थिरता आ रही है | धीरे धीरे और गहन अनुभव होने आरम्भ हो जाएँगे | ध्यान के कुछ विशेष लाभ समय के साथ धीरे धीरे होते हैं – नाटकीय रूप से अथवा सरलता से नहीं हो जाते | ध्यान का अभ्यास नियमित रूप से किया जाएगा तो ध्यान प्रगाढ़ होता जाएगा | आगे हम बताएँगे कि इस बात का निश्चय कैसे किया जाए कि ध्यान में कितनी दृढ़ता आई है और यह भी कि अगले चरण पर कब जाया जाए |

अगले अध्याय में हम बात करेंगे कुछ दूसरी मानसिक प्रक्रियाओं के विषय में, जिन्हें भ्रमवश ध्यान समझ लिया जाता है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/10/meditation-and-its-practices-8/

बढ़ता प्रदूषण और Odd-Even

बढ़ता प्रदूषण और Odd-Even

कल रात कहीं बड़े जोर शोर से आतिशबाज़ी चल रही थी | ऐसा प्रतीत होता था शायद कहीं आतिशबाजी की प्रतियोगिता चल रही थी | हम क्यों नहीं इस बात को समझ पा रहे हैं कि आतिशबाज़ी का धुआँ प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है इसी तरह से बहुत सी आतिशबाज़ी, वाहनों का धुआँ, फैक्ट्री आदि का धुआँ मिलकर धुएँ का एक ऐसा गुबार खड़ा कर देते हैं कि लगता है हम लोग गैस चेम्बर में जी रहे हैं | समझ नहीं आता हम जा किस दिशा में रहे हैं…

पिछले कुछ दिनों से एक समाचार सुर्ख़ियों में है – दिल्ली सरकार नवम्बर से Odd-Even Formula फिर से लागू करने जा रही है | दिल्ली में एक तो त्यौहारों और शादियों के मौसम में आतिशबाजी, दूसरे मौसम बदलने के कारण आतिशबाज़ी और कार आदि से निकला धुआँ ऊपर नहीं उठ पाता जिसके कारण प्रदूषण की मात्रा बढ़ जाती है | इससे बचने के लिए ये उपाय वास्तव में कारगर होता रहा है और सम्भवतः कोई भी इसका विरोध नहीं करेगा | लेकिन विचारणीय प्रश्न ये है कि क्या हम सब दिल्ली सरकार के इस क़दम का “वास्तविक अर्थों” में समर्थन करने के लिए तैयार हैं ?

शायद हमारी ये बात आपको कुछ अजीब लगे, किन्तु सत्य है | अभी से कुछ मित्र सम्प्रदायवादी मैसेज फॉरवर्ड हवा में फैलता प्रदूषणकरने लगे हैं कि “अमुक सम्प्रदाय में ऐसा होने से कोई प्रदूषण आदि का प्रश्न नहीं उठता, हिन्दुओं के त्यौहारों पर ही सब याद क्यों आता है ?” ये क्या वही बात नहीं हुई कि “जब सामने वाला साफ़ सड़क पर कूड़ा फेंक रहा है तो हमारे अकेले के जागरूक होने से क्या होगा ? सरकार को पहले उन्हें रोकना चाहिए… हम भी वैसा ही करते हैं जो दूसरे कर रहे हैं…”

हमारी यही मनोवृत्ति बहुत सारे सुधारों के रास्ते में रोड़ा अटकाती है | यदि सामने वाले ने कुछ अनुचित किया तो क्या हमें सही कार्य करके उदाहरण प्रस्तुत नहीं करना चाहिए ? क्या सारी बातों की ज़िम्मेदारी सरकारों और पुलिस वालों की है ? हमें यदि अपने अधिकारों की चिन्ता है तो क्या अपने उत्तरदायित्वों का बोध नहीं होना चाहिए ?

अभी शादी ब्याह का मौसम चलेगा और लोग रात रात भर बैंड बाजे के साथ ही डी जे का भी शोर मचाएँगे | साथ में भयंकर रूप से आतिशबाज़ी भी होगी | ये बैंड बाजे वाले,  डी जे और आतिशबाजी वाले तो महीनों पहले से बुक हो ऊफ ये शोरजाते हैं | साथ में दीपावली की आतिशबाज़ी – जो बस शुरू ही होने वाली है | कहीं किसी पुराण अथवा धर्मशास्त्र में नहीं लिखा कि आतिशबाज़ी अथवा शोर के अभाव में दीपावली का पर्व अधूरा रहा जाएगा अथवा ब्याह शादी सफल नहीं होगी | ये सब करते हुए क्या कभी हमारी आत्मा ने हमें धिक्कारा है कि जो प्रकृति हमारे जन्म का कारण है, जो प्रकृति हमें स्वस्थ और दीर्घायु बनाए रखने के लिए स्वच्छ और स्वस्थ जलवायु तथा भोजन वस्त्रादि के रूप में अन्य अनेकों सुविधाएँ प्रदान करने में तत्पर रहती है उसके साथ कितना जघन्य अपराध कर रहे हैं ध्वनि और वायु प्रदूषण की मात्रा में वृद्धि करके ? और यदि हमारा पर्यावरण प्रदूषण इसी प्रकार बढ़ता रहा तो क्या हम स्वस्थ और सुखी रह पाएँगे ?

इसलिए मित्रों, आप सभी से करबद्ध अनुरोध है कि इस दीवाली और शादियों के मौसम में किसी भी प्रकार की “धर्म सम्प्रदाय” की भावना से ऊपर उठकर आतिशबाज़ी के धुएँ और अन्य प्रकार के व्यर्थ के शोर शराबे से “बाज़” आएँ, अपनी माता सरीखी प्रकृति का सम्मान करें ताकि हम और हमारे बाद आने वाली पीढ़ियाँ स्वच्छ और स्वस्थ हवा में साँस ले सकें और व्यर्थ के शोर से रहित शान्त तथा हर्षोल्लासपूर्ण वातावरण में अपने व्यक्तित्वों का विकास कर सकें… और यदि हम ऐसा करने में क़ामयाब हो गए तो फिर किसी सरकार को किसी प्रकार के Odd-Even Formula को लागू करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी…

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/10/increase-in-pollution-and-odd-even/

 

ध्यान और इसका अभ्यास – स्वामी वेदभारती जी

ध्यान और इसका अभ्यास

हिमालयन योग परम्परा के गुरु स्वामी वेदभारती जी की पुस्तक Meditation and it’s practices के कुछ अंश ध्यान के साधकों के लिए…

ध्यान एक प्रक्रिया :—

ध्यान की प्रक्रिया में मन से आग्रह किया जाता है सोचने विचारने, स्मरण करने, समस्याओं का समाधान करने और भूतकाल की घटनाओं अथवा भविष्य की आशाओं पर केन्द्रित होने के स्वभाव को छोड़ने का | ध्यान के द्वारा हमें मन में निरन्तर चल रहे विचारों और अनुभवों की गति को धीमा करने में सहायता प्राप्त होती है और मन धीरे धीरे इन गतिविधियों के स्थान पर अन्तःचेतना और जागरूकता पर केन्द्रित होना आरम्भ कर देता है, क्योंकि ध्यान समस्याओं और परिस्थितियों के विषय में नहीं सोचता | ध्यान न तो हवाई किले बनाने जैसी स्थिति है, न दिवास्वप्न है, और न ही इसमें मन को व्यर्थ में कल्पना जगत में विचरण करने की अनुमति है | ध्यान में स्वयं के साथ ही वार्तालाप अथवा विचार विमर्श भी नहीं चलता और न ही सोच विचार में वृद्धि होती है | ध्यान तो सरल, शान्त और प्रयास रहित केन्द्र बिन्दु है चेतना और जागरूकता का |

ध्यान के अभ्यास में सबसे पहले प्रयास किया जाता है कि हमारे मन में जो भी व्यवधान हैं, पूर्वाग्रह हैं, निरन्तर प्रवाहित होती रहने वाली विचारश्रृंखलाएँ हैं और इस दृश्य जगत के बहुत सारे जो अनुभव हमारे मन के साथ जुड़े हुए हैं वे सब समाप्त हो जाएँ | और इसके लिए हम मन को रिक्त करने का प्रयास नहीं करते – क्योंकि यह सम्भव ही नहीं है | अपितु इसके लिए हम मन को किसी अन्तर्निहित गूढ़ तत्व अथवा वस्तु पर केन्द्रित होने देते हैं, जिससे हमारी चेतना आत्मकेन्द्रित हो जाती है | मन को इस प्रकार आत्मकेन्द्रित करके हम मन की दूसरी तनावपूर्ण प्रक्रियाओं जैसे किसी बात की चिन्ता करना, योजना बनाना, सोचना अथवा कारण तलाश करना आदि को शान्त करने में सहायता करते हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/10/01/meditation-and-its-practices-4/

ध्यान और इसका अभ्यास – स्वामी वेदभारती जी

हिमालयन योग परम्परा के गुरु स्वामी वेदभारती जी की पुस्तक Meditation and it’s practices के कुछ अंश ध्यान के साधकों के लिए…

ध्यान क्या है

सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक समाज में लोग उन योग्यताओं में निपुण होते हैं जो अपनी संस्कृति के अनुसार कार्य करने और जीवन जीने के लिए उपयोगी होती हैं – जैसे: किस तरह वार्तालाप करना है, किस प्रकार के विचार होने चाहियें, किसी कार्य को किस प्रकार करना चाहिए, किस रूप में वस्तुओं को देखना परखना चाहिए और बाह्य जगत को किस प्रकार अनुभव करना चाहिए | जिस संसार में हम रहते हैं उसे समझने की प्रक्रिया में हम बायोलोजी (जीवविज्ञान), ईकोलोजी (पर्यावरण विज्ञान), कैमिस्ट्री (रसायन विज्ञान) जैसे विज्ञानों का अध्ययन करते हैं | किन्तु कोई विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय ऐसा नहीं है जिसमें सिखाया जाता हो कि अपनी अन्तःचेतना को – अपने भीतर के जगत को – कैसे जाना जाए | हम अपने भीतर और बाहर को जाने बिना केवल यही सीखते रहते हैं कि किस प्रकार अपने लक्ष्य को प्राप्त किया जाए, हमारे समाज की कार्यप्रणाली कैसी है और हमारे सामाजिक मूल्य क्या हैं | जिसका परिणाम होता है कि हम स्वयं को ही नहीं समझ पाते और दूसरों की सलाह और सुझावों पर आश्रित हो जाते हैं |

ध्यान एक पूर्ण रूप से पृथक, विलक्षण और नियमबद्ध प्रक्रिया है | लक्ष्य पर एकाग्रचित्त होने के लिए और स्वयं को शारीरिक, मानसिक और श्वास जैसे विभिन्न स्तरों पर समझने के लिए एक सरल सी प्रक्रिया है | जैसे जैसे ध्यान की अवधि बढ़ती जाती है वैसे वैसे आपको ध्यान के अनके सकारात्मक परिणामों का अनुभव होने लगता है – जैसे आप आनन्द में वृद्धि का अनुभव करने लगते हैं, आपको अपने मस्तिष्क की स्पष्टता में वृद्धि का अनुभव होने लगता है तथा चेतनता में वृद्धि का अनुभव होने लगता है | जैसे जैसे आप शान्ति का अनुभव करने लगते हैं वैसे वैसे आपके शरीर, स्नायु मण्डल और मस्तिष्क में तनाव के सारे लक्षण दूर होते जाते हैं |

आरम्भ में ध्यान चिकित्सकीय होता है अर्थात रोग निदान में सहायता करता है | यह स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार की माँसपेशियों तथा आपके स्वाधीन स्नायुतन्त्र के तनाव को दूर करता है, साथ ही मानसिक तनाव से भी मुक्ति दिलाता है | ध्यान का साधक शान्त मस्तिष्क को प्राप्त करता है और तनाव के प्रति मन की प्रतिक्रियाओं को कम करके रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है | आप देखेंगे कि कुछ दिनों के निष्ठा पूर्ण प्रयास से न केवल आपकी क्षुधा नियन्त्रित होगी बल्कि क्रोध जैसी कुछ प्रतिक्रियाओं पर भी नियन्त्रण होगा | ध्यान नींद की आवश्यकता में कमी लाने के साथ साथ शरीर और मस्तिष्क को भी और अधिक ऊर्जावान बनाता है |

प्रायः सभी लेखक, कवि और दार्शनिक अपनी सृजनात्मकता और कल्पनाशीलता में वृद्धि करना चाहते हैं | उनकी इच्छा होती है कि ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र का भली भाँति विस्तार हो | ध्यान एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है जिससे आपके दैनिक जीवन में आपकी जन्मजात प्रतिभा में वृद्धि होती है |

ध्यान का स्वास्थ्य पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है | आज के युग में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो किसी सीमा तक मानसिक विकारों से ग्रस्त होते हैं और जो उनकी अपनी सोच तथा भावनाओं की ही उपज होते हैं | हाल ही में वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस प्रकार के रोगों का निदान किसी प्रकार की परम्परागत औषधियों अथवा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा द्वारा नहीं किया जा सकता | क्योंकि जब रोग आपके मस्तिष्क अथवा किसी प्रकार की भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की देन है तो किसी प्रकार की बाह्य चिकित्सा ही किस प्रकार उसका निदान कर सकती है ? यदि आप अपने मस्तिष्क और भावनाओं को समझे बिना केवल बाह्य चिकित्सा पद्धति का ही सहारा लेते हैं तो आप सदा के लिए चिकित्सकों पर निर्भर हो जाते हैं | इसके विपरीत ध्यान की पद्धति आत्मनिर्भरता उत्पन्न करती है और जीवन में हर प्रकार की समस्याओं से प्रभावशाली ढंग से जूझने के लिए आवश्यक आत्मबल आपमें उत्पन्न करती है |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/09/30/meditation-and-its-practices-3/

Alvida Depression

Alvida Depression (Full Video)

People often complain that they are depressed, OR they are feeling sad and stressed. It is important to understand depression, anxiety and stress and as well emotions responsible for sadness. It’s also important to differentiate  between all these feelings. Depression may also be the root cause of many types of body pains.

At Life Care Centre, DGF (Delhi Gynecologist Forum) and WOW (Well Being of Women) India organized a workshop to address this issue.

In this video, Swasti Shree Sharma, CMS-CHt FIBH (USA) ( Past Life Regression Therapist & Medical Support Clinical Hypnotherapist – Certified by International Board of Hypnotherapy) covered all these topics and suggested simple exercises to deal with depression.

To book your appointment with Swasti Shree Sharma, you may call: 7042321200, or visit www.lifebeforelives.com for more information.